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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 862, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 862

श्लोक १ ]

  • साधक-संजीवनी *

८६१

महापुरुष इस जीवात्माको 'क्षेत्रज्ञ' नामसे कहते हैं। तात्पर्य है कि क्षेत्रकी तरफ दृष्टि रहनेसे, क्षेत्रके साथ सम्बन्ध रहनेसे ही इस जीवात्माको वे ज्ञानी महापुरुष 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं। अगर यह जीवात्मा क्षेत्रके साथ सम्बन्ध न रखे, तो फिर इसकी 'क्षेत्रज्ञ' संज्ञा नहीं रहेगी, यह परमात्मस्वरूप हो जायगा (गीता—तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।

मामिक बात

यह नियम है कि जहाँसे बन्धन होता है, वहाँसे खोलनेपर ही (बन्धनसे) छुटकारा हो सकता है। अतः मनुष्यशरीरसे ही बन्धन होता है और मनुष्यशरीरके द्वारा ही बन्धनसे मुक्ति हो सकती है। अगर मनुष्यका अपने शरीरके साथ किसी प्रकारका भी अहंता-ममतारूप सम्बन्ध न रहे, तो वह मात्र संसारसे मुक्त ही है। अतः भगवान् शरीरके साथ माने हुए अहंता-ममतारूप सम्बन्धका विच्छेद करनेके लिये शरीरको 'क्षेत्र' बताकर उसको इदंता-(पृथक्ता-) से देखनेके लिये कह रहे हैं, जो कि वास्तवमें पृथक् है ही।

शरीरको इदंतासे देखना केवल अपना कल्याण चाहने-वाले साधकोंके लिये ही नहीं, प्रत्युत मनुष्यमात्रके लिये परम आवश्यक है। कारण कि अपना उद्धार करनेका अधिकार और अवसर मनुष्यशरीरमें ही है। यही कारण है कि गीताका उपदेश आरम्भ करते ही भगवान्ने सबसे पहले शरीर और शरीरीकी पृथक्ताका वर्णन किया है।

'इदम्' का अर्थ है—'यह' अर्थात् अपनेसे अलग दीखनेवाला। सबसे पहले देखनेमें आता है—पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाशसे बना यह स्थूलशरीर। यह दृश्य है और परिवर्तनशील है। इसको देखनेवाले हैं—नेत्र। जैसे दृश्यमें रंग, आकृति, अवस्था, उपयोग आदि सभी बदलते रहते हैं, पर उनको देखनेवाले नेत्र एक ही रहते हैं, ऐसे ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धरूप विषय भी बदलते रहते हैं, पर उनको जाननेवाले कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका एक ही रहते हैं। जैसे नेत्रोंसे ठीक दीखना, कम दीखना और बिलकुल न दीखना—ये नेत्रमें होनेवाले परिवर्तन मनके द्वारा जाने जाते हैं, ऐसे ही कान, त्वचा, जिह्वा और नासिकामें होनेवाले परिवर्तन भी मनके द्वारा जाने जाते हैं। अतः पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ (कान, त्वचा, नेत्र,

जिह्वा और नासिका) भी दृश्य हैं। कभी क्षुब्ध और कभी शान्त, कभी स्थिर और कभी चंचल—ये मनमें होनेवाले परिवर्तन बुद्धिके द्वारा जाने जाते हैं। अतः मन भी दृश्य है। कभी ठीक समझना, कभी कम समझना और कभी बिलकुल न समझना—ये बुद्धिमें होनेवाले परिवर्तन स्वयं (जीवात्मा-) के द्वारा जाने जाते हैं। अतः बुद्धि भी दृश्य है। बुद्धि आदिके द्रष्टा स्वयं-(जीवात्मा-) में कभी परिवर्तन हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं और होना सम्भव भी नहीं। वह सदा एकरस रहता है; अतः वह कभी किसीका दृश्य नहीं हो सकता*।

इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयको तो जान सकती हैं, पर विषय अपनेसे पर (सूक्ष्म, श्रेष्ठ और प्रकाशक) इन्द्रियोंको नहीं जान सकते। इसी तरह इन्द्रियाँ और विषय मनको नहीं जान सकते; मन, इन्द्रियाँ और विषय बुद्धिको नहीं जान सकते; तथा बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और विषय स्वयंको नहीं जान सकते। न जाननेमें मुख्य कारण यह है कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि तो सापेक्ष द्रष्टा हैं अर्थात् एक-दूसरेकी सहायतासे केवल अपनेसे स्थूल रूपको देखनेवाले हैं; किन्तु स्वयं (जीवात्मा) शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिसे अत्यन्त सूक्ष्म और श्रेष्ठ होनेके कारण निरपेक्ष द्रष्टा है अर्थात् दूसरे किसीकी सहायताके बिना खुद ही देखनेवाला है।

उपर्युक्त विवेचनमें यद्यपि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिको भी द्रष्टा कहा गया है, तथापि वहाँ भी यह समझ लेना चाहिये कि स्वयं-(जीवात्मा-) के साथ रहनेपर ही इनके द्वारा देखा जाना सम्भव होता है। कारण कि मन, बुद्धि आदि जड़ प्रकृतिका कार्य होनेसे स्वतन्त्र द्रष्टा नहीं हो सकते। अतः स्वयं ही वास्तविक द्रष्टा है। दृश्य पदार्थ (शरीर), देखनेकी शक्ति (नेत्र, मन, बुद्धि) और देखनेवाला (जीवात्मा)— इन तीनोंमें गुणोंकी भिन्नता होनेपर भी तात्त्विक एकता है। कारण कि तात्त्विक एकताके बिना देखनेका आकर्षण, देखनेकी सामर्थ्य और देखनेकी प्रवृत्ति सिद्ध ही नहीं होती। यहाँ यह शंका हो सकती है कि स्वयं (जीवात्मा) तो चेतन है, फिर वह जड़ बुद्धि आदिको (जिससे उसकी तात्त्विक एकता नहीं है।) कैसे देखता है? इसका समाधान यह है कि स्वयं जड़से तादात्म्य करके जड़के सहित अपनेको 'मैं'

  • रूप दृश्य लोचन दृक् तददृश्य दृक् तु मानसम्। दृश्या धीवृत्तयः साक्षी दृगेव न तु दृश्यते॥ (वाक्यमुष्ठा १)

'सर्वप्रथम नेत्र द्रष्टा हैं और रूप दृश्य है। फिर मन द्रष्टा है और नेत्रादि इन्द्रियाँ दृश्य हैं। फिर बुद्धि द्रष्टा है और मन दृश्य है। अन्तमें बुद्धिकी वृत्तियोंका भी जो द्रष्टा है, वह साक्षी (स्वयंप्रकाश आत्मा) किसीका भी दृश्य नहीं है।'