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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 863

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

मान लेता है। यह 'मैं' न तो जड़ है और न चेतन ही है। जड़में विशेषता देखकर यह जड़के साथ एक होकर कहता है कि 'मैं धनवान् हूँ; मैं विद्वान् हूँ' आदि; और चेतनमें विशेषता देखकर यह चेतनके साथ एक होकर कहता है कि 'मैं आत्मा हूँ; मैं ब्रह्म हूँ' आदि। यही प्रकृतिस्थ पुरुष है, जो प्रकृतिजन्य गुणोंके संगसे ऊँच-नीच योनियोंमें बार-बार जन्म लेता रहता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह निकला कि प्रकृतिस्थ पुरुषमें जड़ और चेतन—दोनों अंश विद्यमान हैं। चेतनकी रूचि परमात्माकी तरफ जानेकी है; किन्तु भूलसे उसने जड़के साथ तादात्म्य कर लिया। तादात्म्यमें जो जड़-अंश है, उसका आकर्षण

परिशिष्ट भाव—'इदम्' (क्षेत्र) के अन्तर्गत अनन्त ब्रह्माण्ड हैं। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें जितने भी शरीर हैं, उनमें 'परा' (जीव) क्षेत्रज्ञ है और 'अपरा' (जगत्) क्षेत्र है। जीव जगत्को जाननेवाला और परमात्माको माननेवाला है। जाननेवाला व्यापक होता है। अतः क्षेत्रज्ञके एक अंशमें अनन्त ब्रह्माण्ड हैं—'येन सर्वमिदं तत्तम्' (गीता २।१७)। साधकको जानना चाहिये कि मैं क्षेत्र नहीं हूँ, प्रत्युत क्षेत्रको जाननेवाला क्षेत्रज्ञ हूँ।

दृश्य द्रष्टाके किसी अंशमें होता है। जैसे, आँखसे सब कुछ देखनेपर भी आँख नहीं भरती। अतः वास्तवमें आँख दृश्यसे भी बड़ी हुई। बुद्धिसे कितनी ही बातें जान लें, पर बुद्धि कभी भरती नहीं, खाली ही रहती है। ज्यों भरते हैं, त्यों खाली होती है। अतः बुद्धि बड़ी हुई। ब्रह्माजीकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय भी हमारी बुद्धिके जाननेके अन्तर्गत हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण सम्पूर्ण शरीर दृश्य हैं। ऐसे ही स्थूल, सूक्ष्म और कारण सम्पूर्ण सृष्टि भी दृश्य है। यह सम्पूर्ण दृश्य द्रष्टा (क्षेत्रज्ञ)-के किसी अंशमें है।

जैसे धनके सम्बन्धसे मनुष्य 'धनवान्' कहलाता है; किन्तु धनका सम्बन्ध न रहनेपर धनवान् (व्यक्ति) तो रहता है, पर उसकी 'धनवान्' संज्ञा नहीं रहती। ऐसे ही क्षेत्रके सम्बन्धसे स्वयं 'क्षेत्रज्ञ' कहलाता है; किन्तु क्षेत्रका सम्बन्ध न रहनेपर क्षेत्रज्ञ (स्वयं) तो रहता है, पर उसकी 'क्षेत्रज्ञ' संज्ञा नहीं रहती। तात्पर्य है कि एक ही चिन्मय तत्त्व (समझनेकी दृष्टिसे) क्षेत्रके सम्बन्धसे क्षेत्रज्ञ, क्षरके सम्बन्धसे अक्षर, शरीरके सम्बन्धसे शरीरी, दृश्यके सम्बन्धसे द्रष्टा, साक्ष्यके सम्बन्धसे साक्षी और करणके सम्बन्धसे कर्ता कहा जाता है। वास्तवमें उस तत्त्वका कोई नाम नहीं है। वह केवल अनुभवरूप है।

सम्बन्ध—उस क्षेत्रज्ञका स्वरूप क्या है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरर्जानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥

भारत= हे भरतवंशीन्द्रवअपि= हीज्ञानम्= ज्ञान है,
अर्जुन! (तू)विद्धि= समझतत्= वही
सर्वक्षेत्रेषु= सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें= औरमम= मेरे
क्षेत्रज्ञम्= क्षेत्रज्ञक्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः= क्षेत्र-क्षेत्रज्ञकामतम्= मतमें
माम्= मुझेयत्= जोज्ञानम्= ज्ञान है।

व्याख्या—'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत'— सम्पूर्ण क्षेत्रों-(शरीरों-में) 'मैं हूँ'—ऐसा जो अहंभाव है, उसमें 'मैं' तो क्षेत्र है (जिसको पूर्वश्लोकमें 'एतत्' कहा

है) और 'हूँ' मैं-पनका ज्ञाता क्षेत्रज्ञ है (जिसको पूर्वश्लोकमें 'वेत्ति' पदसे जाननेवाला कहा है)। 'मैं' का सम्बन्ध होनेसे ही 'हूँ' है। अगर 'मैं' का सम्बन्ध