श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
८६२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
मान लेता है। यह 'मैं' न तो जड़ है और न चेतन ही है। जड़में विशेषता देखकर यह जड़के साथ एक होकर कहता है कि 'मैं धनवान् हूँ; मैं विद्वान् हूँ' आदि; और चेतनमें विशेषता देखकर यह चेतनके साथ एक होकर कहता है कि 'मैं आत्मा हूँ; मैं ब्रह्म हूँ' आदि। यही प्रकृतिस्थ पुरुष है, जो प्रकृतिजन्य गुणोंके संगसे ऊँच-नीच योनियोंमें बार-बार जन्म लेता रहता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह निकला कि प्रकृतिस्थ पुरुषमें जड़ और चेतन—दोनों अंश विद्यमान हैं। चेतनकी रूचि परमात्माकी तरफ जानेकी है; किन्तु भूलसे उसने जड़के साथ तादात्म्य कर लिया। तादात्म्यमें जो जड़-अंश है, उसका आकर्षण
परिशिष्ट भाव—'इदम्' (क्षेत्र) के अन्तर्गत अनन्त ब्रह्माण्ड हैं। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें जितने भी शरीर हैं, उनमें 'परा' (जीव) क्षेत्रज्ञ है और 'अपरा' (जगत्) क्षेत्र है। जीव जगत्को जाननेवाला और परमात्माको माननेवाला है। जाननेवाला व्यापक होता है। अतः क्षेत्रज्ञके एक अंशमें अनन्त ब्रह्माण्ड हैं—'येन सर्वमिदं तत्तम्' (गीता २।१७)। साधकको जानना चाहिये कि मैं क्षेत्र नहीं हूँ, प्रत्युत क्षेत्रको जाननेवाला क्षेत्रज्ञ हूँ।
दृश्य द्रष्टाके किसी अंशमें होता है। जैसे, आँखसे सब कुछ देखनेपर भी आँख नहीं भरती। अतः वास्तवमें आँख दृश्यसे भी बड़ी हुई। बुद्धिसे कितनी ही बातें जान लें, पर बुद्धि कभी भरती नहीं, खाली ही रहती है। ज्यों भरते हैं, त्यों खाली होती है। अतः बुद्धि बड़ी हुई। ब्रह्माजीकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय भी हमारी बुद्धिके जाननेके अन्तर्गत हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण सम्पूर्ण शरीर दृश्य हैं। ऐसे ही स्थूल, सूक्ष्म और कारण सम्पूर्ण सृष्टि भी दृश्य है। यह सम्पूर्ण दृश्य द्रष्टा (क्षेत्रज्ञ)-के किसी अंशमें है।
जैसे धनके सम्बन्धसे मनुष्य 'धनवान्' कहलाता है; किन्तु धनका सम्बन्ध न रहनेपर धनवान् (व्यक्ति) तो रहता है, पर उसकी 'धनवान्' संज्ञा नहीं रहती। ऐसे ही क्षेत्रके सम्बन्धसे स्वयं 'क्षेत्रज्ञ' कहलाता है; किन्तु क्षेत्रका सम्बन्ध न रहनेपर क्षेत्रज्ञ (स्वयं) तो रहता है, पर उसकी 'क्षेत्रज्ञ' संज्ञा नहीं रहती। तात्पर्य है कि एक ही चिन्मय तत्त्व (समझनेकी दृष्टिसे) क्षेत्रके सम्बन्धसे क्षेत्रज्ञ, क्षरके सम्बन्धसे अक्षर, शरीरके सम्बन्धसे शरीरी, दृश्यके सम्बन्धसे द्रष्टा, साक्ष्यके सम्बन्धसे साक्षी और करणके सम्बन्धसे कर्ता कहा जाता है। वास्तवमें उस तत्त्वका कोई नाम नहीं है। वह केवल अनुभवरूप है।
सम्बन्ध—उस क्षेत्रज्ञका स्वरूप क्या है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरर्जानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥
| भारत | = हे भरतवंशीन्द्रव | अपि | = ही | ज्ञानम् | = ज्ञान है, |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुन! (तू) | विद्धि | = समझ | तत् | = वही | |
| सर्वक्षेत्रेषु | = सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें | च | = और | मम | = मेरे |
| क्षेत्रज्ञम् | = क्षेत्रज्ञ | क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः | = क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका | मतम् | = मतमें |
| माम् | = मुझे | यत् | = जो | ज्ञानम् | = ज्ञान है। |
व्याख्या—'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत'— सम्पूर्ण क्षेत्रों-(शरीरों-में) 'मैं हूँ'—ऐसा जो अहंभाव है, उसमें 'मैं' तो क्षेत्र है (जिसको पूर्वश्लोकमें 'एतत्' कहा
है) और 'हूँ' मैं-पनका ज्ञाता क्षेत्रज्ञ है (जिसको पूर्वश्लोकमें 'वेत्ति' पदसे जाननेवाला कहा है)। 'मैं' का सम्बन्ध होनेसे ही 'हूँ' है। अगर 'मैं' का सम्बन्ध
श्लोक २ ]
- साधक-संजीवनी *
८६३
न रहे तो 'हूँ' नहीं रहेगा, प्रत्युत 'है' रहेगा। कारण कि 'है' ही 'मैं' के साथ सम्बन्ध होनेसे 'हूँ' कहा जाता है। अतः वास्तवमें क्षेत्रज्ञ-(‘हूँ’-) की परमात्मा-(‘है’-) के साथ एकता है। इसी बातको भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें मेरेको ही क्षेत्रज्ञ समझो।
मनुष्य किसी विषयको जानता है, तो वह जाननेमें आनेवाला विषय 'ज्ञेय' कहलाता है। उस ज्ञेयको वह किसी करणके द्वारा ही जानता है। करण दो तरहका होता है—बहिःकरण और अन्तःकरण। मनुष्य विषयोंको बहिःकरण-(श्रोत्र, नेत्र आदि-) से जानता है और बहिःकरणको अन्तःकरण-(मन, बुद्धि आदि-) से जानता है। उस अन्तःकरणकी चार वृत्तियाँ हैं—मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। इन चारोंमें भी अहंकार सबसे सूक्ष्म है, जो कि एकदेशीय है। यह अहंकार भी जिससे देखा जाता है, जाना जाता है, वह जानेवाला प्रकाशस्वरूप क्षेत्रज्ञ है। उस अहंभावके भी ज्ञाता क्षेत्रज्ञको साक्षात् मेरा स्वरूप समझो।
यहाँ 'विद्धि' पद कहनेका तात्पर्य है कि हे अर्जुन! जैसे तू अपनेको शरीरमें मानता है और शरीरको अपना मानता है, ऐसे ही तू अपनेको मेरेमें जान (मान) और मेरेको अपना मान। कारण कि तुमने शरीरके साथ जो एकता मान रखी है, उसको छोड़नेके लिये मेरे साथ एकता माननी बहुत आवश्यक है।
जैसे यहाँ भगवान्ने 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि' पदोंसे क्षेत्रज्ञकी अपने साथ एकता बतायी है, ऐसे ही गीतामें अन्य जगह भी एकता बतायी है; जैसे—दूसरे अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें भगवान्ने शरीरी-(क्षेत्रज्ञ-)के लिये कहा कि 'जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उसको तुम अविनाशी समझो'-'अविनाशि तु तद्धिद्धि येन सर्वमिदं ततम्' और नवें अध्यायके चौथे श्लोकमें अपने लिये कहा कि 'मेरसे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है'-'मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।' यहाँ तो भगवान्ने क्षेत्रज्ञ-(अंश-) की अपने (अंशीके) साथ एकता बतायी है और आगे इसी अध्यायके चौतीसवें श्लोकमें शरीर-संसार-(कार्य-) की प्रकृति-(कारण-) के साथ एकता बतायेंगे। तात्पर्य है कि शरीर तो प्रकृतिका अंश है, इसलिये तुम इससे सर्वथा विमुख हो जाओ; और तुम मेरे अंश हो, इसलिये तुम मेरे सम्मुख हो जाओ।
शरीरकी संसारके साथ स्वाभाविक एकता है। परन्तु यह जीव शरीरको संसारसे अलग मानकर उसके साथ ही
अपनी एकता मान लेता है। परमात्माके साथ क्षेत्रज्ञकी स्वाभाविक एकता होते हुए भी शरीरके साथ एकता माननेसे यह अपनेको परमात्मासे अलग मानता है। शरीरको संसारसे अलग मानना और अपनेको परमात्मासे अलग मानना—ये दोनों ही गलत मान्यताएँ हैं। अतः भगवान् यहाँ 'विद्धि' पदसे आज्ञा देते हैं कि क्षेत्रज्ञ मेरे साथ एक है, ऐसा समझो। तात्पर्य है कि तुमने जहाँ शरीरके साथ अपनी एकता मान रखी है, वहीं मेरे साथ अपनी एकता मान लो, जो कि वास्तवमें है।
शास्त्रोंमें प्रकृति, जीव और परमात्मा—इन तीनोंका अलग-अलग वर्णन आता है; परन्तु यहाँ 'अपि' पदसे भगवान् एक विलक्षण भावकी ओर लक्ष्य कराते हैं कि शास्त्रोंमें परमात्माके जिस सर्वव्यापक स्वरूपका वर्णन हुआ है, वह तो मैं हूँ ही, इसके साथ ही सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञरूपसे पृथक्-पृथक् दीखनेवाला भी मैं ही हूँ। अतः प्रस्तुत पदोंका यही भाव है कि क्षेत्रज्ञरूपसे परमात्मा ही है—ऐसा जानकर साधक मेरे साथ अभिन्नताका अनुभव करे।
स्वयं संसारसे भिन्न और परमात्मासे अभिन्न है। इसलिये यह नियम है कि संसारका ज्ञान तभी होता है, जब उससे सर्वथा भिन्नताका अनुभव किया जाय। तात्पर्य है कि संसारसे रागरहित होकर ही संसारके वास्तविक स्वरूपको जाना जा सकता है। परन्तु परमात्माका ज्ञान उनसे अभिन्न होनेसे ही होता है। इसलिये परमात्माका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करानेके लिये भगवान् क्षेत्रज्ञके साथ अपनी अभिन्नता बता रहे हैं। इस अभिन्नताको यथार्थरूपसे जाननेपर परमात्माका वास्तविक ज्ञान हो जाता है।
'क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोजनं यतन्ज्ञानं मतं मम'— क्षेत्र-(शरीर-)की सम्पूर्ण संसारके साथ एकता है और क्षेत्रज्ञ-(जीवात्मा-) की मेरे साथ एकता है—ऐसा जो क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका ज्ञान है, वही मेरे मतमें यथार्थ 'ज्ञान' है।
'मतं मम' कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें अनेक विद्याओंका, अनेक भाषाओंका, अनेक लिपियोंका, अनेक कलाओंका, तीनों लोक और चौदह भुवनोंका जो ज्ञान है, वह वास्तविक ज्ञान नहीं है। कारण कि वह ज्ञान सांसारिक व्यवहारमें काममें आनेवाला होते हुए भी संसारमें फँसाने-वाला होनेसे अज्ञान ही है। वास्तविक ज्ञान तो वही है, जिससे स्वयंका शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाय और फिर संसारमें जन्म न हो, संसारकी परतन्त्रता न हो। यही ज्ञान भगवान्के मतमें यथार्थ ज्ञान है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
परिशिष्ट भाव— क्षेत्रज्ञ (जीव) और ब्रह्म एक ही हैं। एक क्षेत्रके सम्बन्धसे वह 'क्षेत्रज्ञ' है और सम्पूर्ण क्षेत्रोंके सम्बन्धसे रहित होनेपर वह 'ब्रह्म' है।
'इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रम्' पदोंसे यह सिद्ध हुआ कि शरीर (क्षेत्र)-की अनन्त ब्रह्माण्डों (सृष्टिमात्र)-के साथ एकता है और 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्वि' पदोंसे यह सिद्ध हुआ कि स्वयं (क्षेत्रज्ञ)-की अनन्त-अपर-असीम परमात्माके साथ एकता है। अतः हमारेसे दूर-से-दूर कोई वस्तु है तो वह शरीर है और नजदीक-से-नजदीक कोई वस्तु है तो वह परमात्मा है। तात्पर्य है कि शरीर और संसार एक हैं तथा स्वयं और परमात्मा एक हैं (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। यही ज्ञान है।
ब्रह्मके लिये 'माम्' कहनेका तात्पर्य है कि ब्रह्म और ईश्वर दो नहीं हैं, प्रत्युत एक ही हैं— 'मया तत्तमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना' (गीता ९।४) 'यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है'। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें जो निलिप्तरूपसे सर्वत्र परिपूर्ण चेतन है, वह ब्रह्म है और जो अनन्त ब्रह्माण्डोंका मालिक है, वह ईश्वर है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके ज्ञानको ही अपने मतमें ज्ञान बताकर अब भगवान् क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागको सुननेकी आज्ञा देते हैं।
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्। स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥
| तत् | = वह | च | = और | च | = और |
|---|---|---|---|---|---|
| क्षेत्रम् | = क्षेत्र | यतः | = जिससे | यत्प्रभावः | = जिस प्रभाववाला |
| यत् | = जो है | यत् | = जो | है, | |
| च | = और | (पैदा हुआ है) | तत् | = वह सब | |
| यादृक् | = जैसा है | च | = तथा | समासेन | = संक्षेपमें |
| च | = तथा | सः | = वह क्षेत्रज्ञ (भी) | मे | = मुझसे |
| यद्विकारि | = जिन विकारोंवाला है | यः | = जो है | शृणु | = सुन। |
व्याख्या— 'तत्क्षेत्रम्'—'तत्' शब्द दोका वाचक होता है—पहले कहे हुए विषयका और दूरीका। इसी अध्यायके पहले श्लोकमें जिसको 'इदम्' पदसे कहा गया है, उसीको यहाँ 'तत्' पदसे कहा है। क्षेत्र सब देशमें नहीं है, सब कालमें नहीं है और अभी भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है—यह क्षेत्रकी (स्वयंसे) दूरी है।
'यच्च' —उस क्षेत्रका जो स्वरूप है, जिसका वर्णन इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकमें हुआ है।
'यादृक् च' —उस क्षेत्रका जैसा स्वभाव है, जिसका वर्णन इसी अध्यायके छब्बीसवें-सत्ताईसवें श्लोकोंमें उसे उत्पन्न और नष्ट होनेवाला बताकर किया गया है।
'यद्विकारि' —यद्यपि प्रकृतिका कार्य होनेसे इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकमें आये तेईस तत्त्वोंको भी विकार कहा गया है, तथापि यहाँ उपर्युक्त पदसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके माने हुए सम्बन्धके कारण क्षेत्रमें उत्पन्न होनेवाले इच्छा-द्वेषादि
विकारोंको ही विकार कहा गया है, जिनका वर्णन छठे श्लोकमें हुआ है।
'यतश्च यत्' —यह क्षेत्र जिससे पैदा होता है अर्थात् प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सात विकार और तीन गुण, जिनका वर्णन इसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें हुआ है।
'स च' —पहले श्लोकके उत्तरार्धमें जिस क्षेत्रज्ञका वर्णन हुआ है, उसी क्षेत्रज्ञका वाचक यहाँ 'सः' पद है और उसीके विषयमें यहाँ सुननेके लिये कहा जा रहा है।
'यः' —इस क्षेत्रज्ञका जो स्वरूप है, जिसका वर्णन इसी अध्यायके बीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें और बाईसवें श्लोकमें किया गया है।
'यत्प्रभावश्च' —वह क्षेत्रज्ञ जिस प्रभाववाला है; जिसका वर्णन इसी अध्यायके इकतीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक किया गया है।
'तत्समासेन मे शृणु' —यहाँ 'तत्' पदके अन्तर्गत
श्लोक ४ ]
- साधक-संजीवनी *
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क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ—दोनोंको लेना चाहिये। तात्पर्य है कि वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारोंवाला और जिससे पैदा हुआ है—इस तरह क्षेत्रके विषयमें चार बातें और वह क्षेत्रज्ञ जो है और जिस प्रभाववाला है—इस तरह क्षेत्रज्ञके विषयमें दो बातें तू मेरेसे संक्षेपमें सुन।
यद्यपि इस अध्यायके आरम्भमें पहले दो श्लोकोंमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका सूत्ररूपसे वर्णन हुआ है, जिसको भगवान्ने 'ज्ञान' भी कहा है तथापि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विभागका स्पष्टरूपसे विवेचन (विकारसहित क्षेत्र और निर्वाकार क्षेत्रज्ञके स्वरूपका प्रभावसहित विवेचन) इस तीसरे श्लोकसे आरम्भ किया गया है। इसलिये भगवान् इसको सावधान होकर सुननेकी आज्ञा देते हैं।
इस श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रके विषयमें तो चार बातें सुननेकी आज्ञा दी है, पर क्षेत्रज्ञके विषयमें केवल दो बातें—स्वरूप और प्रभाव ही सुननेकी आज्ञा दी है। इससे यह शंका हो सकती है कि क्षेत्रका प्रभाव भी क्यों नहीं कहा गया और साथ ही क्षेत्रज्ञके स्वभाव, विकार और
जिससे जो पैदा हुआ—इन विषयोंपर भी क्यों नहीं कहा गया? इसका समाधान यह है कि एक क्षण भी एक रूपमें स्थिर न रहनेवाले क्षेत्रका प्रभाव हो ही क्या सकता है? प्रकृतिस्थ (संसारी) पुरुषके अन्तःकरणमें धनादि जड पदार्थोंका महत्त्व रहता है, इसीलिये उसको संसारमें क्षेत्रका (धनादि जड पदार्थोंका) प्रभाव दीखता है। वास्तवमें स्वतन्त्ररूपसे क्षेत्रका कुछ भी प्रभाव नहीं है। अतः उसके प्रभावका कोई वर्णन नहीं किया गया।
क्षेत्रज्ञका स्वरूप उत्पत्ति-विनाशरहित है, इसलिये उसका स्वभाव भी उत्पत्ति-विनाशरहित है। अतः भगवान्ने उसके स्वभावका अलगसे वर्णन न करके स्वरूपके अन्तर्गत ही कर दिया। क्षेत्रके साथ अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही क्षेत्रज्ञमें इच्छा-द्वेषादि विकारोंकी प्रतीति होती है, अन्यथा क्षेत्रज्ञ (स्वरूपतः) सर्वथा निर्वाकार ही है। अतः निर्वाकार क्षेत्रज्ञके विकारोंका वर्णन सम्भव ही नहीं। क्षेत्रज्ञ अद्वितीय, अनादि और नित्य है। अतः इसके विषयमें 'कौन किससे पैदा हुआ'—यह प्रश्न ही नहीं बनता।
परिशिष्ट भाव —भगवान्ने द्वारा 'तत्समासेन मे शृणु' कहनेका तात्पर्य है कि साधकके लिये ज्यादा जाननेकी जरूरत नहीं है। ज्यादा जाननेमें समय तो ज्यादा खर्च होगा, पर साधन कम होगा।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जिसको संक्षेपसे सुननेके लिये कहा गया है, उसका विस्तारसे वर्णन कहाँ हुआ है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्विर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥
यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका तत्त्व—
ऋषिभिः = ऋषियोंके द्वारा बहुधा = बहुत विस्तारसे गीतम् = कहा गया है (तथा) छन्दोभिः = वेदोंकी ऋचाओंद्वारा | विविधैः = बहुत प्रकारसे पृथक् = विभागपूर्वक (कहा गया है) च = और हेतुमद्विः = युक्तियुक्त (एवं) | विनिश्चितैः = निश्चित किये हुए ब्रह्मसूत्रपदैः = ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा एव = भी (कहा गया है)। ---|---|---
व्याख्या —'ऋषिभिर्बहुधा गीतम्'—वैदिक मन्त्रोंके द्रष्टा तथा शास्त्रों, स्मृतियों और पुराणोंके रचयिता ऋषियोंने अपने-अपने (शास्त्र, स्मृति आदि) ग्रन्थोंमें जड-चेतन, सत्-असत्, शरीर-शरीरी, देह-देही, नित्य-अनित्य आदि शब्दोंसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका बहुत विस्तारसे वर्णन किया है।
'छन्दोभिर्विविधैः पृथक्'—यहाँ 'विविधैः' विशेषणसहित 'छन्दोभिः' पद ऋक्, यजुः, साम और अथर्व—इन चारों वेदोंके 'संहिता' और 'ब्राह्मण' भागोंके मन्त्रोंका वाचक है। इन्हींके अन्तर्गत सम्पूर्ण उपनिषद् और भिन्न-भिन्न शाखाओंको भी समझ लेना चाहिये। इनमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका अलग-अलग वर्णन किया गया है।
'ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्विर्विनिश्चितैः'—अनेक
८६६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
युक्तियोंसे युक्त तथा अच्छी तरहसे निश्चित किये हुए ब्रह्म-सूत्रके पदोंद्वारा भी क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके तत्त्वका वर्णन किया गया है। इस श्लोकमें भगवान्का आशय यह मालूम देता है कि
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका जो संक्षेपसे वर्णन मैं कर रहा हूँ, उसे अगर कोई विस्तारसे देखना चाहे तो वह उपर्युक्त ग्रन्थोंमें देख सकता है।
सम्बन्ध—तीसरे श्लोकमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विषयमें जिन छः बातोंको संक्षेपसे सुननेकी आज्ञा दी थी, उनमेंसे क्षेत्रकी दो बातोंका अर्थात् उसके स्वरूप और विकारोंका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चैन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥
अव्यक्तम् | = मूल प्रकृति | च | = और | इन्द्रिय- | ---|---|---|---|---|--- च | = और | दश | = दस | गोचराः | = इन्द्रियोंके बुद्धिः | = समष्टि बुद्धि (महतत्त्व), | इन्द्रियाणि | = इन्द्रियाँ, | | पाँच विषय— अहङ्कारः | = समष्टि अहंकार, | एकम् | = एक मन | एव | = यही (चौबीस महाभूतानि | = पाँच महाभूत | च | = तथा | | तत्त्वोंवाला | | पञ्च | = पाँचों | | क्षेत्र है।)
व्याख्या—‘अव्यक्तमेव च’ —अव्यक्त नाम मूल प्रकृतिका है। मूल प्रकृति समष्टि बुद्धिका कारण होनेसे और स्वयं किसीका भी कार्य न होनेसे केवल ‘प्रकृति’ ही है।
‘बुद्धिः’ —यह पद समष्टि बुद्धि अर्थात् महतत्त्वका वाचक है। इस बुद्धिसे अहंकार पैदा होता है, इसलिये यह ‘प्रकृति’ है और मूल प्रकृतिका कार्य होनेसे यह ‘विकृति’ है। तात्पर्य है कि यह बुद्धि ‘प्रकृति-विकृति’ है।
‘अहंकारः’ —यह पद समष्टि अहंकारका वाचक है। इसको अहंभाव भी कहते हैं। पंचमहाभूतका कारण होनेसे यह अहंकार ‘प्रकृति’ है और बुद्धिका कार्य होनेसे यह ‘विकृति’ है। तात्पर्य है कि यह अहंकार ‘प्रकृति-विकृति’ है।
महाभूतानि —पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच महाभूत हैं। महाभूत दो प्रकारके होते हैं—पंचीकृत और अपंचीकृत। एक-एक महाभूतके पाँच विभाग होकर जो मिश्रण होता है, उसको ‘पंचीकृत महाभूत’ कहते हैं*।
- आकाशके दो विभाग हैं, जिनमेंसे आधा भाग आकाश अपने स्वरूपसे रहा और दूसरे आधे भागके चार विभाग किये। उनमेंसे उसने एक भाग वायुको, एक भाग तेजको, एक भाग जलको और एक भाग पृथ्वीको दिया। वायुके दो विभाग हैं। उनमेंसे आधा भाग वायु अपने स्वरूपसे रही और दूसरे आधे भागके चार विभाग किये, जिनको क्रमशः आकाश, तेज, जल और पृथ्वीको दिया। तेजके दो विभाग हैं। उनमेंसे आधा भाग तेज अपने स्वरूपसे रहा और दूसरे आधे भागके चार विभाग करके क्रमशः एक-एक भाग आकाश, वायु, जल और पृथ्वीको दिया। जलके दो विभाग हैं। उनमेंसे आधा भाग जल अपने स्वरूपसे रहा और दूसरे आधे भागके चार विभाग करके क्रमशः एक-एक भाग आकाश, वायु, तेज और पृथ्वीको दिया। ऐसे ही पृथ्वीके दो विभाग हैं। उनमेंसे आधा भाग पृथ्वी अपने स्वरूपसे रही और दूसरे आधे भागके चार विभाग करके क्रमशः एक-एक भाग आकाश, वायु, तेज और जलको दिया। इस तरह पाँचों महाभूतोंका पंचीकरण—मिश्रण होनेसे इसको ‘पंचीकृत महाभूत’ कहते हैं।
इन पाँच महाभूतोंके विभाग न होनेपर इनको ‘अपंचीकृत महाभूत’ कहते हैं। यहाँ इन्हीं अपंचीकृत महाभूतोंका वाचक ‘महाभूतानि’ पद है। इन महाभूतोंको ‘पंचतन्मात्राएँ’ तथा ‘सूक्ष्ममहाभूत’ भी कहते हैं।
दस इन्द्रियाँ, एक मन और शब्दादि पाँच विषयोंके कारण होनेसे ये महाभूत ‘प्रकृति’ हैं और अहंकारके कार्य होनेसे ये ‘विकृति’ हैं। तात्पर्य है कि ये पंचमहाभूत ‘प्रकृति-विकृति’ हैं।
‘इन्द्रियाणि दश’ —श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा वाक्, पाणि, पाद, उपस्थ और पायु—ये पाँच कर्मनेन्द्रियाँ हैं। ये दसों इन्द्रियाँ अपंचीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीका भी कारण न होनेसे केवल ‘विकृति’ ही हैं।
‘एकं च’ —अपंचीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीका भी कारण न होनेसे मन केवल ‘विकृति’ ही है।
श्लोक ६ ]
- साधक-संजीवनी *
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‘पंच चैन्द्रियगोचराः’—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये (पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके) पाँच विषय हैं। अर्पचीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीके भी कारण न होनेसे ये पाँचों विषय केवल ‘विकृति’ ही हैं।
इन सबका निष्कर्ष यह निकला कि पाँच महाभूत, एक अहंकार और एक बुद्धि—ये सात ‘प्रकृति-विकृति’
हैं, मूल प्रकृति केवल ‘प्रकृति’ है और दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके विषय—ये सोलह केवल ‘विकृति’ हैं। इस तरह इन चौबीस तत्त्वोंके समुदायका नाम ‘क्षेत्र’ है। इसीका एक तुच्छ अंश यह मनुष्य-शरीर है, जिसको भगवान्ने पहले श्लोकमें ‘इदं शरीरम्’ और तीसरे श्लोकमें ‘तत्क्षेत्रम्’ पदसे कहा है।
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥
| इच्छा | = इच्छा, | चेतना | = चेतना (प्राणशक्ति) | एतत् | = यह |
|---|---|---|---|---|---|
| द्वेषः | = द्वेष, | (और) | क्षेत्रम् | = क्षेत्र | |
| सुखम् | = सुख, | धृतिः | = धृति— | समासेन | = संक्षेपसे |
| दुःखम् | = दुःख, | सविकारम् | = इन विकारों— | उदाहृतम् | = कहा |
| सङ्घातः | = संघात (शरीर) | सहित | गया है। |
व्याख्या—‘इच्छा’—अमुक वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदि मिले—ऐसी जो मनमें चाहना रहती है, उसको इच्छा कहते हैं। क्षेत्रके विकारोंमें भगवान् सबसे पहले इच्छारूप विकारका नाम लेते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि इच्छा मूल विकार है; क्योंकि ऐसा कोई पाप और दुःख नहीं है, जो सांसारिक इच्छाओंसे पैदा न होता हो अर्थात् सम्पूर्ण पाप और दुःख सांसारिक इच्छाओंसे ही पैदा होते हैं।
‘द्वेषः’—कामना और अभिमानमें बाधा लगनेपर क्रोध पैदा होता है। अन्तःकरणमें उस क्रोधका जो सूक्ष्म रूप रहता है, उसको ‘द्वेष’ कहते हैं। यहाँ ‘द्वेषः’ पदके अन्तर्गत क्रोधको भी समझ लेना चाहिये।
‘सुखम्’—अनुकूलताके आनेपर मनमें जो प्रसन्नता होती है अर्थात् अनुकूल परिस्थिति जो मनको सुहाती है, उसको ‘सुख’ कहते हैं।
‘दुःखम्’—प्रतिकूलताके आनेपर मनमें जो हलचल होती है अर्थात् प्रतिकूल परिस्थिति जो मनको सुहाती नहीं है, उसको ‘दुःख’ कहते हैं।
‘सङ्घातः’—चौबीस तत्त्वोंसे बने हुए शरीररूप समूहका नाम ‘संघात’ है। शरीरका उत्पन्न होकर सत्तारूपसे दीखना भी विकार है तथा उसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होते रहना भी विकार है।
‘चेतना’—चेतना नाम प्राणशक्तिका है अर्थात् शरीरमें जो प्राण चल रहे हैं, उसका नाम ‘चेतना’ है। इस चेतनामें परिवर्तन होता रहता है, जैसे—सात्त्विक-वृत्ति आनेपर
प्राणशक्ति शान्त रहती है और चिन्ता, शोक, भय, उद्वेग आदि होनेपर प्राणशक्ति वैसी शान्त नहीं रहती, शुब्ध हो जाती है। यह प्राणशक्ति निरन्तर नष्ट होती रहती है। अतः यह भी विकाररूप ही है।
साधारण लोग प्राणवालोंको चेतन और निष्प्राण-वालोंको अचेतन कहते हैं, इस दृष्टिसे यहाँ प्राणशक्तिको ‘चेतना’ कहा गया है।
‘धृतिः’—धृति नाम धारणशक्तिका है। यह धृति भी बदलती रहती है। मनुष्य कभी धैर्यको धारण करता है और कभी (प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर) धैर्यको छोड़ देता है। कभी धैर्य ज्यादा रहता है और कभी धैर्य कम रहता है। मनुष्य कभी अच्छी बातको धारण करता है और कभी विपरीत बातको धारण करता है। अतः धृति भी क्षेत्रका विकार है।
[अठारहवें अध्यायके तैंतीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक धृतिके सात्त्विकी, राजसी और तामसी—इन तीन भेदोंका वर्णन किया गया है। परमात्माकी तरफ चलनेमें सात्त्विकी धृतिकी बड़ी आवश्यकता है।]
‘एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्’—जैसे पहले श्लोकमें ‘इदं शरीरम्’ कहकर व्यक्ति शरीरसे अपनेको अलग देखनेके लिये कहा, ऐसे ही दृश्य—(क्षेत्र और उसमें होनेवाले विकार—) से द्रष्टाको अलग दिखानेके लिये यहाँ ‘एतत्’ पद आया है।
पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने समष्टि संसारका वर्णन किया और यहाँ छठे श्लोकमें व्यक्ति शरीरके विकारोंका वर्णन
८६८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
क्रिया; क्योंकि समष्टि संसारमें इच्छा-द्वेषादि विकार होते ही नहीं। तात्पर्य यह है कि व्यक्ति शरीर समष्टि संसारसे और समष्टि संसार व्यक्ति शरीरसे अलग नहीं है अर्थात् ये दोनों एक हैं। जैसे इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रज्ञके साथ अपनी एकता बतायी, ऐसे ही यहाँ व्यक्ति शरीर और उसमें होनेवाले विकारोंकी समष्टि संसारके साथ एकता बताते हैं। आगे इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने पुरुषकी स्थिति शरीरमें न बतकर प्रकृतिमें बतायी है—‘पुरुषः प्रकृतिस्थो हि। ’ इससे भी सिद्ध होता है कि पुरुषकी स्थिति (सम्बन्ध) व्यक्ति शरीरमें हो जानेसे उसकी स्थिति समष्टि प्रकृतिमें हो जाती है; क्योंकि व्यक्ति शरीर और समष्टि प्रकृति—दोनों एक ही हैं। वास्तवमें देखा जाय तो व्यक्ति है ही नहीं, केवल समष्टि ही है। व्यक्ति केवल भूलसे मानी हुई है। जैसे समुद्रकी लहरोंको समुद्रसे अलग मानना भूल है, ऐसे ही व्यक्ति शरीरको समष्टि संसारसे अलग (अपना) मानना भूल ही है।
विशेष बात
क्षेत्रज्ञ जब अविवेकसे क्षेत्रके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब क्षेत्रमें इच्छा-द्वेषादि विकार पैदा हो जाते हैं। क्षेत्रज्ञका वास्तविक स्वरूप तो सर्वथा निर्विकार ही है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके संयोगसे पैदा होनेवाले विकार सर्वथा मिटाये जा सकते हैं; क्योंकि क्षेत्रज्ञका क्षेत्रके साथ संयोग केवल माना हुआ है। इस माने हुए संयोगको मिटानेके लिये भगवान् इस अध्यायके पहले श्लोकमें शरीरको अपनेसे पृथक् देखनेके लिये और फिर दूसरे श्लोकमें परमात्मासे
परिशिष्ट भाव —क्षेत्रके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख आदि विकार क्षेत्रज्ञमें होते हैं—‘पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ’ (१३।२०)। इच्छा-द्वेषादि सभी विकार तादात्म्य (जड़-चेतनकी ग्रन्थि) में हैं। तादात्म्यमें भी ये विकार जड़-अंशमें रहते हैं।
यहाँ भगवान्ने चौबीस तत्त्वोंवाले शरीरको तथा उसके सात विकारोंको ‘एतत् ’ (यह) कहा है—‘एतक्षेत्रम् ’। इसका तात्पर्य है कि स्वयं क्षेत्रसे मिला हुआ नहीं है, प्रत्युत सर्वथा अलग है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों ही शरीर ‘एतत् ’ पदके अन्तर्गत होनेसे हमारा स्वरूप नहीं है। यहाँ विशेष ध्यान देनेकी बात है कि जब अहंकारका कारण ‘महतत्त्व’ और ‘मूल प्रकृति’ को भी ‘एतत् ’ शब्दसे कह दिया तो फिर अहंकारके ‘एतत् ’ होनेमें कहना ही क्या है। अहम्से नजदीक महतत्त्व है और महतत्त्वसे नजदीक प्रकृति है, वह प्रकृति भी ‘एतत् क्षेत्रम् ’ में है। तात्पर्य है कि अहम् हमारा स्वरूप है ही नहीं। जो मनुष्य स्वयंको और अहम् (क्षेत्र) को अलग-अलग जान लेता है, उसका फिर कभी जन्म नहीं होता और वह परमात्माको प्राप्त हो जाता है (गीता—तेरहवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)।
- ज्ञान किसीका भी दोषी नहीं होता; जैसे— भोजन करते समय जीभमें स्वादका ज्ञान होना दोष नहीं है, प्रत्युत भोजनके पदार्थमें राग या द्वेष होना दोष है।
श्लोक ७ ]
- साधक-संजीवनी *
८६९
सम्बन्ध—शरीरके साथ तादात्म्य कर लेनेसे ही इच्छा, द्वेष आदि विकार पैदा होते हैं और उन विकारोंका स्वयंपर असर पड़ता है। इसलिये भगवान् शरीरके साथ किये हुए तादात्म्यको मिटानेके लिये आवश्यक बीस साधनोंका 'ज्ञान' के नामसे आगेके पाँच श्लोकोंमें वर्णन करते हैं।
अमानित्वमदभिभत्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥
| अमानित्वम् = अपनेमें श्रेष्ठताका भाव न होना, | क्षान्तिः = क्षमा, | स्थैर्यम् = स्थिरता (और) |
|---|---|---|
| अदभिभत्वम् = दिखावटीपन न होना, | आर्जवम् = सरलता, | आत्म-विनिग्रहः = मनका वशमें होना। |
| अहिंसा = अहिंसा, | आचार्योपासनम् = गुरुकी सेवा, | |
| शौचम् = बाहर-भीतरकी शुद्धि, |
व्याख्या— 'अमानित्वम्'—अपनेमें मानीपनके अभावका नाम 'अमानित्व' है। वर्ण, आश्रम, योग्यता, विद्या, गुण, पद आदिको लेकर अपनेमें श्रेष्ठताका भाव होता है कि 'मैं मान्य हूँ, आदरणीय हूँ,' परन्तु यह भाव उत्पत्ति-विनाशशील शरीरके साथ तादात्म्य होनेसे ही होता है। अतः इसमें जड़ताकी ही मुख्याता रहती है। इस मानीपनके रहनेसे साधकको वास्तविक ज्ञान नहीं होता। यह मानीपन साधकमें जितना कम रहेगा, उतना ही जड़ताका महत्त्व कम होगा। जड़ताका महत्त्व जितना कम होगा, जड़ताको लेकर अपनेमें मानीपनका भाव भी उतना ही कम होगा, और साधक उतना ही चिन्मयताकी तरफ तेजीसे लगेगा।
उपाय— जब साधक खुद बड़ा बन जाता है, तब उसमें मानीपन आ जाता है। अतः साधकको चाहिये कि जो श्रेष्ठ पुरुष हैं, साधनमें अपनेसे बड़े हैं, तत्त्वज्ञ (जीवनमुक्त) हैं, उनका संग करे, उनके पासमें रहे, उनके अनुकूल बन जाय। इससे मानीपन दूर हो जाता है। इतना ही नहीं, उनके संगसे बहुत-से दोष सुगमतापूर्वक दूर हो जाते हैं।
गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—'सबहि मानप्रद आपु अमानी ' (मानस ७।३८।२) अर्थात् संत सभीको मान देनेवाले और स्वयं अमानी—मान पानेकी इच्छासे रहित होते हैं। इसी तरह साधकको भी मानीपन दूर करनेके लिये सदा दूसरोंको मान, आदर, सत्कार, बड़ाई आदि देनेका स्वभाव बनाना चाहिये। ऐसा स्वभाव तभी बन सकता है, जब वह दूसरोंको किसी-न-किसी दृष्टिसे अपनेसे श्रेष्ठ माने। यह नियम है कि प्रत्येक मनुष्य भिन्न-भिन्न स्थितिवाला होते हुए भी कोई-न-कोई विशेषता रखता ही है। यह विशेषता वर्ण, आश्रम, गुण, विद्या, बुद्धि, योग्यता, पद, अधिकार आदि किसी भी कारणसे हो
सकती है। अतः साधकको चाहिये कि वह दूसरोंकी विशेषताकी तरफ दृष्टि रखकर उनका सदा सम्मान करे। इस प्रकार दूसरोंको मान देनेका भीतरसे स्वभाव बन जानेसे स्वयं मान पानेकी इच्छाका स्वतः अभाव होता चला जाता है। हाँ, दूसरोंको मान देते समय साधकका उद्देश्य अपनेमें मानीपन मिटानेका होना चाहिये, बदलेमें दूसरोंसे मान पानेका नहीं।
विशेष बात
गीतामें भगवान्ने भक्तिमार्गके साधकमें सबसे पहले भयका अभाव बताया है—'अभयम् ' (१६।१), और अन्तमें मानीपनका अभाव बताया है—'नातिमानिता ' (१६।३)। परन्तु ज्ञानमार्गके साधनमें मानीपनका अभाव सबसे पहले बताया है—'अमानित्वम् ' (१३।७) और भयका अभाव सबसे अन्तमें बताया है—'तत्त्वज्ञानार्थ-दर्शनम् ' (१३।११)। इसका तात्पर्य यह है कि जैसे बालक अपनी माँको देखकर अभय हो जाता है, ऐसे ही भक्तिमार्गमें साधक प्रह्लादजीकी तरह आरम्भसे ही सब जगह अपने प्रभुको ही देखता है, इसलिये वह आरम्भमें ही अभय हो जाता है। भक्तमें स्वयं अमानी रहकर दूसरोंको मान देनेकी आदत शुरूसे ही रहती है। अन्तमें उसका देहाध्यास अर्थात् शरीरसे मानी हुई एकता अपने-आप मिट जाती है, तो वह सर्वथा अमानी हो जाता है। परन्तु ज्ञानमार्गमें साधक आरम्भसे ही शरीरके साथ अपनी एकता नहीं मानता (इसी अध्यायका पहला श्लोक), इसलिये वह आरम्भमें ही अमानी हो जाता है; क्योंकि शरीरसे एकता माननेसे ही मानीपन आता है। अन्तमें वह तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सब जगह देखकर अभय हो जाता है।
'अदभिभत्वम्' —दम्भ नाम दिखावटीपनका है। लोग हमारेमें अच्छे गुण देखेंगे तो वे हमारा आदर करेंगे, हमें
८७०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
माला पहनायेंगे, हमारी पूजा करेंगे, हमें ऊँचे आसनपर बैठायेंगे आदिको लेकर अपनेमें वैसा गुण न होनेपर भी गुण दिखाना, अपनेमें गुण कम होनेपर भी उसे बाहरसे ज्यादा प्रकट करना—यह सब दम्भ है।
अपनेमें सदाचार है, शुद्धि है, पवित्रता है, पर अगर लोगोंके सामने हम पवित्रता रखेंगे तो वे हमारी हँसी उड़ायेंगे, हमारी निन्दा करेंगे—ऐसा सोचकर अपनी पवित्रता छोड़ देना और सामनेवालेकी तरह बन जाना भी दम्भ है। जैसे, आजकल विवाह आदिके अवसरोंपर, क्लबों-होटलोंके स्वागत-समारोहोंमें अथवा वायुयान आदिपर यात्रा करते समय पवित्र आचरणवाले सज्जन भी मान-सत्कार आदिके लिये अपवित्र खाद्य पदार्थ लेते देखे जाते हैं। यह भी दम्भ ही है। इसी तरह दुराचारी पुरुष भी अच्छे लोगोंके समुदायमें आनेपर मान, सत्कार, कीर्ति, प्रतिष्ठा आदिकी प्राप्तिकी इच्छासे अपनेको बाहरसे धर्मात्मा, भक्त, सेवक, दानी आदि प्रकट करने लगते हैं, तो यह भी दम्भ ही है।
कोई साधक एकान्तमें, बंद कमरेमें बैठकर जप, ध्यान, चिन्तन कर रहा है और साथमें आलस्य, नींद भी ले रहा है। परन्तु जब बाहरसे उसपर श्रद्धा, पूज्यभाव रखनेवाले आदमीकी आवाज आती है, तब उस आवाजको सुनते ही वह सावधान होकर जप-ध्यान करने लग जाता है और उसके नींद-आलस्य भाग जाते हैं। यह भी एक सूक्ष्म दम्भ है। इसमें भी देखा जाय तो आवाज सुनकर सावधान हो जाना कोई दोष नहीं है, पर उसमें जो दिखावटीपनका भाव आ जाता है कि यह आदमी मेरेमें अश्रद्धा न कर ले, यह भाव आना दोष है। इस भावके स्थानपर ऐसा भाव आना चाहिये कि भगवान्ने बड़ा अच्छा किया कि मेरेको सावधान करके जप-ध्यानमें लगा दिया। इन सब प्रकारके दम्भोंका अभाव होना 'अदभिभत्व' है।
'उपाय' —साधकको अपना उद्देश्य एकमात्र परमात्म-प्राप्तिका ही रखना चाहिये, लोगोंको दिखानेका किंचिन्मात्र भी नहीं। अगर उसमें दिखावटीपन आ जायगा तो उसके साधनमें शिथिलता आ जायगी, जिससे उद्देश्यकी सिद्धिमें बाधा लग जायगी। अतः उसको कोई अच्छा, बुरा, ऊँच, नीच जो कुछ भी समझे, इसकी तरफ खयाल न करके वह अपने साधनमें लगा रहे। ऐसी सावधानी रखनेसे दम्भ मिट जाता है।
'अहिंसा' —मन, वाणी और शरीरसे कभी किसीको किंचिन्मात्र भी दुःख न देनेका नाम 'अहिंसा' है। कर्ता-भेदसे हिंसा तीन प्रकारकी होती है—कृत (स्वयं हिंसा
करना), कारित (किसीसे हिंसा करवाना) और अनुमोदित (हिंसाका अनुमोदन-समर्थन करना)।
उपर्युक्त तीन प्रकारकी हिंसा तीन भावोंसे होती है—क्रोधसे, लोभसे और मोहसे। तात्पर्य है कि क्रोधसे भी कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा होती है; लोभसे भी कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा होती है तथा मोहसे भी कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा होती है। इस तरह हिंसा नौ प्रकारकी हो जाती है।
उपर्युक्त नौ प्रकारकी हिंसामें तीन मात्राएँ होती हैं—मृदुमात्रा, मध्यमात्रा और अधिमात्रा। किसीको थोड़ा दुःख देना मृदुमात्रामें हिंसा है, मृदुमात्रासे अधिक दुःख देना मध्यमात्रामें हिंसा है और बहुत अधिक घायल कर देना अथवा खत्म कर देना अधिमात्रामें हिंसा है। इस तरह मृदु, मध्य और अधिमात्राके भेदसे हिंसा सत्ताईस प्रकारकी हो जाती है।
उपर्युक्त सत्ताईस प्रकारकी हिंसा तीन करणोंसे होती है—शरीरसे, वाणीसे और मनसे। इस तरह हिंसा इक्यासी प्रकारकी हो जाती है। इनमेंसे किसी भी प्रकारकी हिंसा न करनेका नाम 'अहिंसा' है।
अहिंसा भी चार प्रकारकी होती है—देशगत, कालगत, समयगत और व्यक्तिगत। अमुक तीर्थमें, अमुक मन्दिरमें, अमुक स्थानमें किसीको दुःख नहीं देना है—यह 'देशगत अहिंसा' है। अमावस्या, पूर्णिमा, व्यक्तिपात आदि पर्वोंके दिन किसीको दुःख नहीं देना है—यह 'कालगत अहिंसा' है। सन्तके मिलनेपर, पुत्रके जन्म-दिनपर, पिताके निधन-दिवसपर किसीको दुःख नहीं देना है—यह 'समयगत अहिंसा' है। गाय, हरिण आदिको तथा गुरुजन, माता-पिता, बालक आदिको दुःख नहीं देना है—यह 'व्यक्तिगत अहिंसा' है।
किसी भी देश, काल आदिमें क्रोध-लोभ-मोहपूर्वक किसीको भी शरीर, वाणी और मनसे किसी भी प्रकारसे दुःख न देनेसे यह सार्वभौम अहिंसा 'महाव्रत' कहलाती है।
उपाय —जैसे साधारण प्राणी अपने शरीरका सुख चाहता है, ऐसे ही साधकको सबके सुखमें अपना सुख, सबके हितमें अपना हित और सबकी सेवामें अपनी सेवा माननी चाहिये अर्थात् सबके सुख, हित और सेवासे अपना सुख, हित और सेवा अलग नहीं माननी चाहिये। 'सब अपने ही स्वरूप हैं'—ऐसा विवेक जाग्रत् रहनेसे उसके द्वारा किसीको दुःख देनेकी क्रिया होगी ही नहीं और उसमें अहिंसाभाव स्वतः आ जायगा।
श्लोक ७ ]
- साधक-संजीवनी *
८७९
‘शान्तिः’ —शान्ति नाम सहनशीलता अर्थात् क्षमाका है। अपनेमें सामर्थ्य होते हुए भी अपराध करनेवालेको कभी किसी प्रकारसे किंचिन्मात्र भी दण्ड न मिले—ऐसा भाव रखना तथा उससे बदला लेने अथवा किसी दूसरेके द्वारा दण्ड दिलवानेका भाव न रखना ही ‘शान्ति’ है।
‘उपाय’ —(१) सहनशीलता अपने स्वरूपमें स्वतः—सिद्ध है; क्योंकि अपने स्वरूपमें कभी विकृति आती ही नहीं। अतः कभी ‘अमुकने दुःख दिया है, अपराध किया है’—ऐसी कोई वृत्ति आ भी जाय, तो उस समय यह विचार स्वतः आना चाहिये कि हमारा कोई बिगाड़ कर ही नहीं सकता, हमारेमें कोई विकृति आ ही नहीं सकती, वह हमारे स्वरूपतक पहुँच ही नहीं सकती। ऐसा विचार करनेसे क्षमाभाव स्वतः आ जाता है।
(२) जैसे भोजन करते समय अपने ही दाँतोंसे अपनी जीभ कट जाय, तो हम दाँतोंपर क्रोध नहीं करते, दाँतोंको दण्ड नहीं देते। हाँ, जीभ ठीक हो जाय—यह बात तो मनमें आती है, पर दाँतोंको तोड़ दें—यह भाव मनमें कभी आता ही नहीं। कारण कि दाँतोंको तोड़ने तो एक नयी पीड़ा और होगी अर्थात् पीड़ा दुगुनी होगी, जिससे हमारेको ही दुःख होगा, हमारा ही अनिष्ट होगा। ऐसे ही बिना कारण कोई हमारा अपराध करता है, हमें दुःख देता है, उसको अगर हम दण्ड देंगे, दुःख देंगे तो वास्तवमें हमारा ही अनिष्ट होगा; क्योंकि वह भी तो अपना ही स्वरूप है (गीता—छठे अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)।
‘आर्जवम्’ —सरल-सीधेपनके भावको ‘आर्जव’ कहते हैं। साधकके शरीर, मन और वाणीमें सरल-सीधापन होना चाहिये। शरीरकी सजावटका भाव न होना, रहन-सहनमें सादगी तथा चाल-दालमें स्वाभाविक सीधापन होना, ऍठ-अकड़ न होना—यह ‘शरीरकी सरलता’ है। छल, कपट, ईर्ष्या, द्वेष आदिका न होना तथा निष्कपटता, सौम्यता, हितैषिता, दया आदिका होना—यह ‘मनकी सरलता’ है। व्यंग्य, निन्दा, चुगली आदि न करना, चुभनेवाले एवं अपमानजनक वचन न बोलना तथा सरल, प्रिय और हितकारक वचन बोलना—यह ‘वाणीकी सरलता’ है।
उपाय —अपनेको एक देशमें माननेसे अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरके साथ सम्बन्ध रखनेसे अपनेमें दूसरोंकी अपेक्षा विशेषता दीखती है। इससे व्यवहारमें भी चलते-फिरते, उठते-बैठते आदि क्रिया करते हुए कुछ टेंढापन, अकड़ आ जाती है। अतः शरीरके साथ अपना सम्बन्ध न माननेसे और अपने स्वरूपकी तरफ दृष्टि
रखनेसे यह अकड़ मिट जाती है और साधकमें स्वतः सरलता, नम्रता आ जाती है।
‘आचार्योपासनम्’ —विद्या और सदुपदेश देनेवाले गुरुका नाम भी आचार्य है और उनकी सेवासे भी लाभ होता है; परन्तु यहाँ ‘आचार्य’ पद परमात्मतत्त्वको प्राप्त जीवनमुक्त महापुरुषका ही वाचक है। आचार्यको दण्डवत् प्रणाम करना, उनका आदर-सत्कार करना और उनके शरीरको सुख पहुँचानेकी शास्त्रविहित चेष्टा करना भी उनकी उपासना है, पर वास्तवमें उनके सिद्धान्तों और भावोंके अनुसार अपना जीवन बनाना ही उनकी सच्ची उपासना है। कारण कि देहाभिमानीकी सेवा तो उसके देहकी सेवा करनेसे ही हो जाती है, पर गुणातीत महापुरुषके केवल देहकी सेवा करना उनकी पूर्ण सेवा नहीं है।
भगवान्ने दैवी सम्पत्तिके लक्षणोंमें ‘आचार्योपासनम्’ पद न देकर यहाँ ज्ञानके साधनोंमें उसे दिया है। इसमें एक विशेष रहस्यकी बात मालूम देती है कि ज्ञानमार्गमें गुरुकी जितनी आवश्यकता है, उतनी आवश्यकता भक्तिमार्गमें नहीं है। कारण कि भक्तिमार्गमें साधक सर्वथा भगवान्के आश्रित रहकर ही साधन करता है, इसलिये भगवान् स्वयं उसपर कृपा करके उसके योगक्षेमका वहन करते हैं (गीता—नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक), उसकी कमियोंको, विघ्न-बाधाओंको दूर कर देते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका अठ्ठावनवाँ श्लोक) और उसको तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति करा देते हैं (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। परन्तु ज्ञानमार्गमें साधक अपनी साधनाके बलपर चलता है, इसलिये उसमें कुछ सूक्ष्म कर्मियाँ रह सकती हैं; जैसे—(१) शास्त्रों एवं संतोंके द्वारा ज्ञान प्राप्त करके जब साधक शरीरको (अपनी धारणासे) अपनेसे अलग मानता है, तब उसे शान्ति मिलती है। ऐसी दशामें वह यह मान लेता है कि मेरेको तत्त्वज्ञान प्राप्त हो गया! परन्तु जब मान-अपमानकी स्थिति सामने आती है अथवा अपनी इच्छाके अनुकूल या प्रतिकूल घटना घटती है, तब अन्तःकरणमें हर्ष-शोक पैदा हो जाते हैं, जिससे सिद्ध होता है कि अभी तत्त्वज्ञान हुआ नहीं।
(२) किसी आदमीके द्वारा अचानक अपना नाम सुनायी पड़नेपर अन्तःकरणमें ‘इस नामवाला शरीर मैं हूँ’—ऐसा भाव उत्पन्न हो जाता है, तो समझना चाहिये कि अभी मेरी शरीरमें ही स्थिति है।
(३) साधनाकी ऊँची स्थिति प्राप्त होनेपर जाग्रत्-अवस्थामें तो साधकको जड़-चेतनका विवेक अच्छी तरह
८७२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
रहता है, पर निद्रावस्थामें उसकी विस्मृति हो जाती है। इसलिये नींदसे जगनेपर साधक उस विवेकको पकड़ता है, जब कि सिद्ध महापुरुषका विवेक स्वाभाविक रूपसे रहता है।
(४) साधकमें पूज्यजनोंसे भी मान-आदर पानेकी इच्छा हो जाती है; जैसे—जब वह संतों या गुरुजनोंकी सेवा करता है, सत्संग आदिमें मुख्यतासे भाग लेता है, तब उसके भीतर ऐसा भाव पैदा होता है कि वे संत या गुरुजन मेरेको दूसरोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ मानें। यह उसकी सूक्ष्म कमी ही है।
इस प्रकार साधकमें कई कमियोंके रहनेकी सम्भावना रहती है, जिनकी तरफ खयाल न रहनेसे वह अपने अधूरे ज्ञानको भी पूर्ण मान सकता है। इसलिये भगवान् ‘आचार्योपासनम्’ पदसे यह कह रहे हैं कि ज्ञानमार्गके साधकको आचार्यके पास रहकर उनकी अधीनतामें ही साधन करना चाहिये। चौथे अध्यायके चौतीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि ‘तू तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंके पास जा, उनको दण्डवत्-प्रणाम कर, उनकी सेवा कर और अपनी जिज्ञासा-पूर्तिके लिये नम्रतापूर्वक प्रश्न कर तो वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी महात्मा तेरेको ज्ञानका उपदेश देंगे।’ इस प्रकार साधन करनेपर वे महापुरुष उसकी उन सूक्ष्म कमियोंको, जिनको वह खुद भी नहीं जानता, दूर करके उसको सुगमतासे परमात्मतत्त्वका अनुभव करा सकते हैं।
साधकको शुरुमें ही सोच-समझकर आचार्य, संत-महापुरुषके पास जाना चाहिये। आचार्य (गुरु) कैसा हो? इस सम्बन्धमें ये बातें ध्यानमें रखनी चाहिये—
(१) अपनी दृष्टिमें जो वास्तविक बौधवान्, तत्त्वज्ञ दीखते हैं।
(२) जो कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि साधनोंको ठीक-ठीक जाननेवाले हों।
(३) जिनके संगसे, वचनोंसे हमारे हृदयमें रहनेवाली शंकाएँ बिना पूछे ही स्वतः दूर हो जाती हों।
(४) जिनके पासमें रहनेसे प्रसन्नता, शान्तिका अनुभव होता हो।
(५) जो हमारे साथ केवल हमारे हितके लिये ही सम्बन्ध रखते हुए दीखते हों।
(६) जो हमारेसे किसी भी वस्तुकी किंचिन्मात्र भी आशा न रखते हों।
(७) जिनकी सम्पूर्ण चेष्टाएँ केवल साधकोंके हितके लिये ही होती हों।
(८) जिनके पासमें रहनेसे लक्ष्यकी तरफ हमारी लगन स्वतः बढ़ती हो।
(९) जिनके संग, दर्शन, भाषण, स्मरण आदिसे हमारे दुर्गुण-दुराचार दूर होकर स्वतः सदगुण-सदाचाररूप दैवी सम्पत्ति आती हो।
(१०) जिनके सिवाय और किसीमें वैसी अलौकिकता, विलक्षणता न दीखती हो।
ऐसे आचार्य, संतके पास रहना चाहिये और केवल अपने उद्धारके लिये ही उनसे सम्बन्ध रखना चाहिये। वे क्या करते हैं, क्या नहीं करते? वे ऐसी क्रिया क्यों करते हैं? वे कब किसके साथ कैसा बताव करते हैं? आदिमें अपनी बुद्धि नहीं लगानी चाहिये अर्थात् उनकी क्रियाओंमें तर्क नहीं लगाना चाहिये। साधकको तो उनके अधीन होकर रहना चाहिये, उनकी आज्ञा, रखके अनुसार मात्र क्रियाएँ करनी चाहिये और श्रद्धाभावपूर्वक उनकी सेवा करनी चाहिये। अगर वे महापुरुष न चाहते हों तो उनसे गुरु-शिष्यका व्यावहारिक सम्बन्ध भी जोड़नेकी आवश्यकता नहीं है। हाँ, उनको हृदयसे गुरु मानकर उनपर श्रद्धा रखनेमें कोई आपत्ति नहीं है।
अगर ऐसे महापुरुष न मिलें तो साधकको चाहिये कि वह केवल परमात्माके परायण होकर उनके ध्यान, चिन्तन आदिमें लग जाय और विश्वास रखे कि परमात्मा अवश्य गुरुकी प्राप्ति करा देंगे। वास्तवमें देखा जाय तो पूर्णतया परमात्मापर निर्भर हो जानेके बाद गुरुका काम परमात्मा ही पूर्ण कर देते हैं; क्योंकि गुरुके द्वारा भी वस्तुतः परमात्मा ही साधकका मार्ग-दर्शन करते हैं।
उपाय —जिस साधकका परमात्मप्राप्तिका ही उद्देश्य है, उसमें यह भाव रहना चाहिये कि आजतक जिस-किसीको जो कुछ भी मिला है, वह गुरुकी, सन्तोंकी सेवासे, उनकी प्रसन्नतासे, उनके अनुकूल बननेसे ही मिला है*; अतः मेरेको भी सच्चे हृदयसे सन्तोंकी सेवा करनी है।
विशेष बात
शिष्यका कर्तव्य है—गुरुकी सेवा करना। अगर शिष्य अपने कर्तव्यका तत्परतासे पालन करे तो उसका संसारसे
- इस विषयमें किसीने कहा है—
न कुछ हम हँपके सीखें हैं, न कुछ हम रोके सीखें हैं। जो कुछ थोड़ा-सा सीखें हैं, किसीके होके सीखें हैं।
श्लोक ८ ]
- साधक-संजीवनी *
८७३
सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और वह गुरु-तत्त्वके साथ एक हो जाता है अर्थात् उसमें गुरुत्व आ जाता है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर मुक्ति और गुरु-तत्त्वसे एक होनेपर भक्ति प्राप्त होती है। शिष्यमें गुरुत्व आनेसे उसमें शिष्यत्व नहीं रहता। उसपर शास्त्र आदिका शासन नहीं रहता। अगर शिष्य अपने कर्तव्यका पालन न करे तो उसका नाम तो शिष्य रहेगा, पर उसमें शिष्यत्व नहीं रहेगा। शिष्यत्व न रहनेसे उसका संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं होगा और उसमें गुरुत्व भी नहीं आयेगा। अतः उसमें संसारकी दासता रहेगी।
गुरु केवल मेरा ही कल्याण करे—ऐसा भाव रखना भी शिष्यके लिये बन्धन है। शिष्यको चाहिये कि वह अपने लिये कुछ भी न चाहकर सर्वथा गुरुके समर्पित हो जाय, उनकी मरजीमें ही अपनी मरजी मिला दे।
गुरुका कर्तव्य है—शिष्यका कल्याण करना। अगर गुरु अपने कर्तव्यका पालन न करे तो उसका नाम तो गुरु रहेगा, पर उसमें गुरुत्व नहीं रहेगा। गुरुत्व न रहनेसे उसमें शिष्यका दासत्व रहेगा। जबतक गुरु शिष्यसे कुछ भी (धन, मान, बड़ाई आदि) चाहता है, तबतक उसमें गुरुत्व न रहकर शिष्यकी दासता रहती है।
‘शौचम्’ —बाहर-भीतरकी शुद्धिका नाम शौच है। जल, मिट्टी आदिसे शरीरकी शुद्धि होती है और दया, क्षमा, उदारता आदिसे अन्तःकरणकी शुद्धि होती है।
उपाय —शरीर बना ही ऐसे पदार्थोंसे है कि इसको चाहे जितना शुद्ध करते रहें, यह अशुद्ध ही रहता है। इससे बार-बार अशुद्धि ही निकलती रहती है। अतः इसको बार-बार शुद्ध करते-करते ही इसकी वास्तविक अशुद्धिका ज्ञान होता है, जिससे शरीरसे अरुचि (उपरामता) हो जाती है।
वर्ण, आश्रम आदिके अनुसार सच्चाईके साथ धनका उपार्जन करना; झूठ, कपट आदि न करना; पराय हक न आने देना; खान-पानमें पवित्र चीजें काममें लाना आदिसे अन्तःकरणकी शुद्धि होती है।
‘स्थैर्यम्’ —स्थैर्य नाम स्थिरताका, विचलित न होनेका है। जो विचार कर लिया है, जिसको लक्ष्य बना लिया
है, उससे विचलित न होना ‘स्थैर्य’ है। मेरेको तत्त्वज्ञान प्राप्त करना ही है—ऐसा दृढ़ निश्चय करना और विघ्न-बाधाओंके आनेपर भी उनसे विचलित न होकर अपने निश्चयके अनुसार साधनमें तत्परतापूर्वक लगे रहना—इसीको यहाँ ‘स्थैर्यम्’ पदसे कहा गया है।
उपाय —(१) सांसारिक भोग और संग्रहमें आसक्त पुरुषोंकी बुद्धि एक निश्चयपर दृढ़ नहीं रहती (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)। अतः साधकको भोग और संग्रहकी आसक्तिका त्याग कर देना चाहिये।
(२) साधक अगर किसी छोटे-से-छोटे कार्यका भी विचार कर ले, तो उस विचारकी हिंसा न करे अर्थात् उसपर दृढ़तासे स्थिर रहे। ऐसा करनेसे उसका स्थिर रहनेका स्वभाव बन जायगा।
(३) साधकका संतो और शास्त्रोंके वचनोंपर जितना अधिक विश्वास होगा, उतनी ही उसमें स्थिरता आयेगी।
‘आत्मविनिग्रहः’ —यहाँ आत्मा नाम मनका है, और उसको वशमें करना ही ‘आत्मविनिग्रह’ है। मनमें दो तरहकी चीजें पैदा होती हैं—स्फुरणा और संकल्प। स्फुरणा अनेक प्रकारकी होती है और वह आती-जाती रहती है। पर जिस स्फुरणामें मन चिपक जाता है, जिसको मन पकड़ लेता है, वह ‘संकल्प’ बन जाती है। संकल्पमें दो चीजें रहती हैं—राग और द्वेष। इन दोनोंको लेकर मनमें चिन्तन होता है। स्फुरणा तो दर्पणके दृश्यकी तरह होती है। दर्पणमें दृश्य दीखता तो है, पर कोई भी दृश्य चिपकता नहीं अर्थात् दर्पण किसी भी दृश्यको पकड़ता नहीं। परन्तु संकल्प कैमरेकी फिल्मकी तरह होता है, जो दृश्यको पकड़ लेता है। अभ्याससे अर्थात् मनको बार-बार ध्येयमें लगानेसे स्फुरणाएँ नष्ट हो जाती हैं और वैराग्यसे अर्थात् किसी वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिमें राग, महत्त्व न रहनेसे संकल्प नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार अभ्यास और वैराग्यसे मन वशमें हो जाता है (गीता—छठे अध्यायका पैंतीसवाँ श्लोक)।
उपाय —(मनके वशमें करनेके उपाय छठे अध्यायके छब्बीसवें श्लोककी व्याख्यामें देखने चाहिये)।
परिशिष्ट भाव —भगवान् क्षेत्रके साथ माने हुए सम्बन्ध-(तादात्म्य-) को तोड़नेके लिये ज्ञानके साधन बताते हैं। ये साधन तादात्म्यको तोड़नेमें सहायक हैं।
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इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च। जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
| इन्द्रियार्थेषु | = इन्द्रियोंके विषयोंमें | च | = और | वृद्धावस्था तथा |
|---|---|---|---|---|
| वैराग्यम् | = वैराग्यका होना, | जन्ममृत्यु- | व्याधियोंमें दुःख- | |
| अनहङ्कारः, | जराव्याधि- | रूप दोषोंको | ||
| एव | = अहंकारका भी न | दुःखदोषानु- | बार-बार | |
| होना | दर्शनम् | = जन्म, मृत्यु, | देखना। |
व्याख्या —‘इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम्’—लोक-परलोकके शब्दादि समस्त विषयोंमें इन्द्रियोंका खिंचाव न होना ही इन्द्रियोंके विषयोंमें रागरहित होना है। इन्द्रियोंका विषयोंके साथ सम्बन्ध होनेपर भी तथा शास्त्रके अनुसार जीवन-निर्वाहके लिये इन्द्रियोंद्वारा विषयोंका सेवन करते हुए भी साधकको विषयोंमें राग, आसक्ति, प्रियता नहीं होनी चाहिये।
उपाय —(१) विषयोंमें राग होनेसे ही विषयोंकी महत्ता दीखती है, संसारमें आकर्षण होता है और इसीसे सब पाप होते हैं। अगर हमारा विषयोंमें ही राग रहेगा तो तत्त्वबोध कैसे होगा? परमात्मतत्त्वमें हमारी स्थिति कैसे होगी? अगर रागका त्याग कर दें तो परमात्मामें स्थिति हो जायगी—ऐसा विचार करनेसे विषयोंसे वैराग्य हो जाता है।
(२) बड़े-बड़े धनी, शूरवीर, राजा-महाराजा हुए और उन्होंने बहुत-से भोगोंको भोगा, पर अन्तमें उनका क्या रहा? कुछ नहीं रहा। उनके शरीर कमजोर हो गये और अन्तमें सब चले गये। इस प्रकार विचार करनेसे भी वैराग्य हो जाता है।
(३) जिन्होंने भोग नहीं भोगे हैं, जिनके पास भोग-सामग्री नहीं है, जो संसारसे विरक्त हैं, उनकी अपेक्षा जिन्होंने बहुत भोग भोगे हैं और भोग रहे हैं, उनमें क्या विलक्षणता, विशेषता आयी? कुछ नहीं, प्रत्युत भोग भोगनेवाले तो शोक-चिन्तामें डूबे हुए हैं। ऐसा विचार करनेसे भी वैराग्य होता है।
‘अनहंकार एव च’—प्रत्येक व्यक्तिके अनुभवमें ‘मैं हूँ’—इस प्रकारकी एक वृत्ति होती है। यह वृत्ति ही शरीरके साथ मिलकर ‘मैं शरीर हूँ’—इस प्रकार एकदेशीयता अर्थात् अहंकार उत्पन्न कर देती है। इसीके कारण शरीर, नाम, क्रिया, पदार्थ, भाव, ज्ञान, त्याग, देश, काल आदिके साथ अपना सम्बन्ध मानकर जीव ऊँच-नीच योनियोंमें जन्मता-मरता रहता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। यह अहंकार साधनमें प्रायः बहुत दूरतक रहता है। वास्तवमें इसकी सत्ता नहीं है, फिर भी स्वयंकी मान्यता
होनेके कारण व्यक्तित्वके रूपमें इसका भान होता रहता है। भगवान्द्वारा ज्ञानके साधनोंमें इस पदका प्रयोग किये जानेका तात्पर्य शरीरादिमें माने हुए अहंकारका सर्वथा अभाव करनेमें है; क्योंकि जड़-चेतनका यथार्थ बोध होनेपर इसका सर्वथा अभाव हो जाता है। मनुष्यमात्र अहंकाररहित हो सकता है, इसीलिये भगवान् यहाँ ‘अनहंकारः’ पदसे अहंकारका त्याग करनेकी बात कहते हैं।
अभिमान और अहंकारका प्रयोग एक साथ होनेपर उनसे अलग-अलग भावोंका बोध होता है। सांसारिक चीजोंके सम्बन्धसे अभिमान पैदा होता है। ऐसे ही त्याग, वैराग्य, विद्या आदिको लेकर अपनेमें विशेषता देखनेसे भी अभिमान पैदा होता है। शरीरको ही अपना स्वरूप माननेसे अहंकार पैदा होता है। यहाँ ‘अनहंकारः’ पदसे अभिमान और अहंकार—दोनोंके सर्वथा अभावका अर्थ लेना चाहिये।
मनुष्यको नींदसे जगनेपर सबसे पहले ‘अहम्’ अर्थात् ‘मैं हूँ’—इस वृत्तिका ज्ञान होता है। फिर मैं अमुक शरीर, नाम, जाति, वर्ण, आश्रम आदिका हूँ—ऐसा अभिमान होता है। यह एक क्रम है। इसी प्रकार पारमार्थिक मार्गमें भी अहंकारके नाशका एक क्रम है। सबसे पहले स्थूल-शरीरसे सम्बन्धित धनादि पदार्थोंका अभिमान मिटता है। फिर कर्मन्द्रियोंके सम्बन्धसे रहनेवाले कर्तृत्वाभिमानका नाश होता है। उसके बाद बुद्धिकी प्रधानतासे रहनेवाला ज्ञातापनका अहंकार मिटता है। अन्तमें ‘अहम्’ वृत्तिकी प्रधानतासे जो साक्षीपनका अहंकार है, वह भी मिट जाता है। तब सर्वत्र परिपूर्ण सच्चिदानन्दधनस्वरूप स्वतः रह जाता है।
उपाय —(१) अपनेमें श्रेष्ठताकी भावनासे ही अभिमान पैदा होता है। अभिमान तभी होता है, जब मनुष्य दूसरोंकी तरफ देखकर यह सोचता है कि वे मेरी अपेक्षा तुच्छ हैं। जैसे, गाँवभरमें एक ही लखपति हो तो दूसरोंको देखकर उसको लखपति होनेका अभिमान होता है। परन्तु अगर दूसरे सभी करोड़पति हों तो उसको अपने लखपति होनेका अभिमान नहीं होता। अतः अभिमानरूप दोषको मिटानेके लिये साधकको चाहिये कि वह दूसरोंकी कमीकी
श्लोक ८ ]
- साधक-संजीवनी *
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तरफ कभी न देखे, प्रत्युत अपनी कमियोंको देखकर उनको दूर करे१।
(२) एक ही आत्मा जैसे इस शरीरमें व्याप्त है, ऐसे ही वह अन्य शरीरोंमें भी व्याप्त है—‘सर्वगतः’ (गीता २।२४)। परन्तु मनुष्य अज्ञानसे सर्वव्यापी आत्माको एक अपने शरीरमें ही सीमित मानकर शरीरको ‘मैं’ मान लेता है। जैसे मनुष्य बैंकमें रखे हुए बहुत-से रुपयोंमेंसे केवल अपने द्वारा जमा किये हुए कुछ रुपयोंमें ही ममता करके, उनके साथ अपना सम्बन्ध मानकर अपनेको धनी मान लेता है, ऐसे ही एक शरीरमें ‘मैं शरीर हूँ’—ऐसी अहंता करके वह कालसे सम्बन्ध मानकर ‘मैं इस समयमें हूँ’, देशसे सम्बन्ध मानकर ‘मैं यहाँ हूँ’, बुद्धिसे सम्बन्ध मानकर ‘मैं समझदार हूँ’, वाणीसे सम्बन्ध मानकर ‘मैं वक्ता हूँ’ आदि अहंकार कर लेता है। इस प्रकारके सम्बन्ध न मानना ही अहंकाररहित होनेका उपाय है।
(३) शास्त्रोंमें परमात्माका ‘सच्चिदानन्दधन’-रूपसे वर्णन आया है। ‘सत्’ (सत्ता), ‘चित्’ (ज्ञान) और ‘आनन्द’ (अविनाशी सुख)—ये तीनों परमात्माके भिन्न-भिन्न स्वरूप नहीं हैं, प्रत्युत एक ही परमात्मतत्त्वके तीन नाम हैं। अतः साधक इन तीनोंमेंसे किसी एक विशेषणसे भी परमात्माका लक्ष्य करके निर्विकल्प२ हो सकता है। निर्विकल्प होनेसे उसको परमात्मतत्त्वमें अपनी स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है और अहंकारका सर्वथा नाश हो जाता है। इसको इस प्रकार समझना चाहिये—
(क) ‘सत्’—परमात्मतत्त्व सदासे ही था, सदासे है और सदा ही रहेगा। वह कभी बनता-बिगड़ता नहीं, कम-ज्यादा भी नहीं होता, सदा ज्यों-का-त्यों रहता है—ऐसा बुद्धिके द्वारा विचार करके निर्विकल्प होकर स्थिर हो जानेसे साधकका बुद्धिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और उस सत्-तत्त्वमें अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। ऐसा अनुभव होनेपर फिर अहंकार नहीं रहता।
१-तेरे भावे जो करे, भली बुरी संसार। ‘नारायण’ तू बैठिके, अपनी भवन बूहार॥
२-संसारके चिन्तनसे साधकका कोई प्रयोजन होता नहीं और अचिन्त्य परमात्मतत्त्व चिन्तनमें आता नहीं—यही निर्विकल्पता है।
३-किसी सेठने सुना कि अमुक दूकानमें इतना नफा हुआ है और साथ ही यह भी सुना कि अमुक दूकानमें इतना नुकसान हुआ है। इस प्रकार नफा और नुकसान—इन दोनोंमें तो फरक है, पर इन दोनोंके ज्ञानमें कोई फरक नहीं है; ज्ञान तो एक ही है। अगर ज्ञान एक न होता तो नफा और नुकसान—दोनोंकी धिन्मताका ज्ञान कैसे होता? इसी तरह ‘मैं’, ‘तू’, ‘यह’ और ‘वह’—ये चारों अलग-अलग होनेपर भी इनका प्रकाशक ज्ञान एक ही है। जिस सामान्य प्रकाशमें ‘मैं’ में क्रियाएँ होती हैं, उसी प्रकाशमें ‘तू’, ‘यह और वह’ में भी क्रियाएँ होती हैं। उस सामान्य प्रकाशमें ‘मैं’, ‘तू’, ‘यह और वह’ का भेद नहीं है। उस सामान्य प्रकाशका सम्बन्ध यदि है तो चारोंके साथ है और यदि नहीं है तो किसीके भी साथ नहीं है।
(ख) ‘चित्’—जैसे प्रत्येक व्यक्तिके शरीरादि ‘अहम्’ के अन्तर्गत दृश्य हैं, ऐसे ही ‘अहम्’ भी (मैं, तू, यह और वहके रूपमें) एक ज्ञानके अन्तर्गत दृश्य है३। उस ज्ञान- (चेतन- ) में निर्विकल्प होकर स्थिर हो जानेसे परमात्मतत्त्वमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। फिर अहंकार नहीं रहता।
(ग) ‘आनन्द’—साधकलोग प्रायः बुद्धि और अहम्को प्रकाशित करनेवाले ‘चेतन’ को भी बुद्धिके द्वारा ही जाननेकी चेष्टा किया करते हैं। वास्तवमें बुद्धिके द्वारा जाने अर्थात् सीखे हुए विषयको ‘ज्ञान’ की संज्ञा देना और उससे अपने-आपको ज्ञानी मान लेना भूल ही है। बुद्धिको प्रकाशित करनेवाला तत्त्व बुद्धिके द्वारा कैसे जाना जा सकता है? यद्यपि साधकके पास बुद्धिके सिवाय ऐसा और कोई साधन नहीं है, जिससे वह तत्त्व जाना जा सके, तथापि बुद्धिके द्वारा केवल जड़ संसारकी वास्तविकताको ही जाना जा सकता है। बुद्धि जिससे प्रकाशित होती है, उस तत्त्वको बुद्धि नहीं जान सकती। उस तत्त्वको जाननेके लिये बुद्धिसे भी सम्बन्ध-विच्छेद करना आवश्यक है। बुद्धिको प्रकाशित करनेवाले परमात्मतत्त्वमें निर्विकल्परूपसे स्थित हो जानेपर बुद्धिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। फिर एक ‘आनन्द’-स्वरूप (जहाँ दुःखका लेश भी नहीं है) परमात्मतत्त्व ही शेष रह जाता है, जो स्वयं ज्ञानस्वरूप और सत्स्वरूप भी है। इस प्रकार तत्त्वमें निर्विकल्प (चुप) हो जानेपर ‘आनन्द-ही-आनन्द है’—ऐसा अनुभव होता है। ऐसा अनुभव होनेपर फिर अहंकार नहीं रहता।
‘जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्’—जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोगोंके दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखनेका तात्पर्य है—जैसे आँवामें मटका पकता है, ऐसे ही जन्मसे पहले माताके उदरमें बच्चा जठराग्निमें पकता रहता है। माताके खाये हुए नमक, मिर्च आदि क्षार और तीखे पदार्थोंसे बच्चेके शरीरमें जलन होती है। गर्भाशयमें
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
रहनेवाले सूक्ष्म जन्तु भी बच्चेको काटते रहते हैं। प्रसवके समय माताको जो पीड़ा होती है, उसका कोई अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। वैसे ही पीड़ा उदरसे बाहर आते समय बच्चेको होती है। इस तरह जन्मके दुःखरूप दोषोंका बार-बार विचार करके इस विचारको दृढ़ करना कि इसमें केवल दुःख-ही-दुःख है।
जो जन्मता है, उसको मरना ही पड़ता है—यह नियम है। इससे कोई बच ही नहीं सकता। मृत्युके समय जब प्राण शरीरसे निकलते हैं, तब हजारों बिच्छू शरीरमें एक साथ डंक मारते हैं—ऐसी पीड़ा होती है। उभ्रभरमें कमाये हुए धनसे, उभ्रभरमें रहे हुए मकानसे और अपने परिवारसे जब वियोग होता है और फिर उनके मिलनेकी सम्भावना नहीं रहती, तब (ममता-आसक्तिके कारण) बड़ा भारी दुःख होता है। जिस धनको कभी किसीको दिखाना नहीं चाहता था, जिस धनको परिवारवालोंसे छिपा-छिपाकर तिजोरीमें रखा था, उसकी चाबी परिवारवालोंके हाथमें पड़ी देखकर मनमें असह्य वेदना होती है। इस तरह मृत्युके दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखे।
वृद्धावस्थामें शरीर और अवयवोंकी शक्ति क्षीण हो जाती है, जिससे चलने-फिरने, उठने-बैठनेमें कष्ट होता है। हरेक तरहका भोजन पचता नहीं। बड़ा होनेके कारण परिवारसे आदर चाहता है, पर कोई प्रयोजन न रहनेसे घरवाले निरादर, अपमान करते हैं। तब मनमें पहलेकी बातें याद आती हैं कि मैंने धन कमाया है, इनको पाला-पोसा है, पर आज ये मेरा तिरस्कार कर रहे हैं! इन बातोंको लेकर बड़ा दुःख होता है। इस तरह वृद्धावस्थाके दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखे।
यह शरीर व्याधियोंका, रोगोंका घर है—‘शरीरं
परिशिष्ट भाव—एक ‘दुःखका भोग’ होता है और सुखकी इच्छा करना ‘दुःखका भोग’ है। दुःखके कारणकी खोज करके उसको मिटाना ‘दुःखका प्रभाव’ है। यहाँ दुःखके प्रभावको ‘दुःखदोषानुदर्शनम्’ पदसे कहा गया है।
दुःखका भोग करनेसे अर्थात् दुःखी होनेसे विवेक लुप्त हो जाता है। परन्तु दुःखका प्रभाव होनेसे विवेक लुप्त नहीं होता, प्रत्युत मनुष्य विवेकदृष्टिसे दुःखके कारणकी खोज करता है और खोज करके उसको मिटाता है। सुखकी इच्छा ही सम्पूर्ण दुःखोंका कारण है। कारणके मिटनेपर कार्य अपने-आप मिट जाता है; अतः सुखकी इच्छा मिटनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है।
व्याधिमन्दिरम्।’ शरीरमें वात, कफ आदिसे पैदा होनेवाले अनेक प्रकारके रोग होते रहते हैं और उन रोगोंसे शरीरमें बड़ी पीड़ा होती है। इस तरह रोगोंके दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखे।
यहाँ बार-बार देखनेका तात्पर्य बार-बार चिन्तन करनेसे नहीं है, प्रत्युत विचार करनेसे है। जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोगोंके दुःखोंको बार-बार देखनेसे अर्थात् विचार करनेसे उनके मूल कारण—उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंमें राग स्वाभाविक ही कम हो जाता है अर्थात् भोगोंसे वैराग्य हो जाता है। तात्पर्य है कि जन्म, मृत्यु आदिके दुःखरूप दोषोंको देखना भोगोंसे वैराग्य होनेमें हेतु है; क्योंकि भोगोंके रागसे अर्थात् गुणोंके संगसे ही जन्म होता है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजनजन्मसु’ (गीता १३।२१) और जो जन्म होता है, वह सम्पूर्ण दुःखोंका कारण है। भगवान्ने पुनर्जन्मको दुःखालय बताया है—‘पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्’ (गीता ८।१५)।
शरीर आदि जड़ पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे, उनको महत्त्व देनेसे, उनका आश्रय लेनेसे ही सम्पूर्ण दोष उत्पन्न होते हैं—‘देहाभिमाननि सर्वं दोषाः प्रादुर्भवन्ति।’ परमात्माका स्वरूप अथवा उसका ही अंश होनेके ही कारण जीवात्मा स्वयं निर्दोष है—‘चेतन अमल सहज सुखरासी’ (मानस ७।११७।१)। यही कारण है कि जीवात्माको दुःख और दोष अच्छे नहीं लगते; क्योंकि वे इसके सजातीय नहीं हैं। जीव अपने द्वारा ही पैदा किये दोषोंके कारण सदा दुःख पाता रहता है। अतः भगवान् जन्म, मृत्यु आदिके दुःखरूप दोषोंके मूल कारण देहाभिमानको विचारपूर्वक मिटानेके लिये कह रहे हैं।
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु। नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ १ ॥
श्लोक ९ ]
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| असक्ति: | = आसक्तिरहित होना, | अनभिष्वङ्गः | = एकात्मता (घनिष्ठ सम्बन्ध) न होना | प्रतिकूलताकी प्राप्तिमें |
|---|---|---|---|---|
| पुत्रदार- | च | = और | नित्यम्, | |
| गृहादिषु | = पुत्र, स्त्री, घर | इष्टानिष्टोप- | समचित्तत्वम् | |
| आदिमें | पत्तिषु | = अनुकूलता- | = चित्तका नित्य सम रहना। |
व्याख्या —‘असक्ति ’—उत्पन्न होनेवाली (सांसारिक) वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें जो प्रियता है, उसको ‘सक्ति’ कहते हैं। उस ‘सक्ति’ से रहित होनेका नाम ‘असक्ति’ है।
सांसारिक वस्तुओं, व्यक्तियों आदिसे सुख लेनेकी इच्छासे, सुखकी आशासे और सुखके भोगसे ही मनुष्यकी उनमें आसक्ति, प्रियता होती है। कारण कि मनुष्यको संयोगके सिवाय सुख नहीं दीखता, इसलिये उसको संयोगजन्य सुख प्रिय लगता है। परन्तु वास्तविक सुख संयोगके वियोगसे होता है (गीता—छठे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक), इसलिये साधकके लिये सांसारिक आसक्तिका त्याग करना बहुत आवश्यक है।
उपाय —संयोगजन्य सुख आरम्भमें तो अमृतकी तरह दीखता है, पर परिणाममें विषकी तरह होता है (गीता—अठारहवें अध्यायका अडुतीसवाँ श्लोक)। संयोगजन्य सुख भोगनेवालेको परिणाममें दुःख भोगना ही पड़ता है—यह नियम है। अतः संयोगजन्य सुखके परिणामपर दृष्टि रखनेसे उसमें आसक्ति नहीं रहती।
‘अनभिष्वंगः पुत्रदारगृहादिषु’ —पुत्र, स्त्री, घर, धन, जमीन, पशु आदिके साथ माना हुआ जो घनिष्ठ सम्बन्ध है, गाढ़ मोह है, तादात्म्य है, मानी हुई एकात्मता है, जिसके कारण शरीरपर भी असर पड़ता है, उसका नाम ‘अभिष्वंग’ है*। जैसे—पुत्रके साथ माताकी एकात्मता रहनेके कारण जब पुत्र बीमार हो जाता है, तब माताका शरीर कमजोर हो जाता है। ऐसे ही पुत्रके, स्त्रीके मर जानेपर मनुष्य कहता है कि मैं मर गया, धनके चले जानेपर कहता है कि मैं मारा गया, आदि। ऐसी एकात्मतासे रहित होनेके लिये यहाँ ‘अनभिष्वंगः ’ पद आया है।
उपाय —जिनके साथ अपना घनिष्ठ सम्बन्ध दीखे, उनकी सेवा करे, उनको सुख पहुँचाये, पर उनसे सुख
लेनेका उद्देश्य न रखे। उद्देश्य तो उनसे अभिष्वंग (तादात्म्य) दूर करनेका ही रखे। अगर उनसे सेवा लेनेका उद्देश्य रखेंगे तो उनसे तादात्म्य हो जायगा। हाँ, उनकी प्रसन्नताके लिये कभी उनसे सेवा लेनी भी पड़े तो उसमें राजी न हो; क्योंकि राजी होनेसे अभिष्वंग हो जायगा। तात्पर्य है कि किसीके भी साथ अपनेको लिप्त न करे। इस बातकी बहुत सावधानी रखे।
‘नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु’ —‘इष्ट’ अर्थात् मनके अनुकूल वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना आदिके प्राप्त होनेपर चित्तमें राग, हर्ष, सुख आदि विकार न हो और ‘अनिष्ट’ अर्थात् मनके प्रतिकूल वस्तु, व्यक्ति आदिके प्राप्त होनेपर चित्तमें द्वेष, शोक, दुःख, उद्वेग आदि विकार न हो। तात्पर्य है कि अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंके प्राप्त होनेपर चित्तमें निरन्तर समता रहे, चित्तपर उनका कोई असर न पड़े। इसको भगवान्ने ‘सिद्ध्यसिद्धयोः समो भूत्वा ’ (२।४८) पदोंसे भी कहा है।
उपाय —मनुष्यको जो कुछ अनुकूल सामग्री मिली है, उसको वह अपने लिये मानकर सुख भोगता है—यह महान् बाधक है। कारण कि संसारकी सामग्री केवल संसारकी सेवामें लगानेके लिये ही मिली है, अपने शरीर-इन्द्रियोंको सुख पहुँचानेके लिये नहीं। ऐसे ही मनुष्यको जो कुछ प्रतिकूल सामग्री मिली है, वह दुःख भोगनेके लिये नहीं मिली है, प्रत्युत संयोगजन्य सुखका त्याग करनेके लिये, मनुष्यको सांसारिक राग, आसक्ति, कामना, ममता आदिसे छुड़ानेके लिये ही मिली है। तात्पर्य है कि अनुकूल और प्रतिकूल—दोनों परिस्थितियों मनुष्यको सुख-दुःखसे ऊँचा उठाकर (उन दोनोंसे अतीत) परमात्म-तत्त्वको प्राप्त करनेके लिये ही मिली हैं—ऐसा दृढ़तासे मान लेनेसे साधकका चित्त इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिमें स्वतः सम रहेगा।
- पुत्र, स्त्री आदिके साथ यथायोग्य बर्ताव करना, उनमें अपनापन न रखकर उनकी सेवा करना ‘अभिष्वंग’ नहीं है, प्रत्युत यह तो निलिप्तता, असंगता है, जो कि अमरताका अनुभव करानेवाली है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
मयि चानन्ययोगेन भक्तिर्व्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि
॥ १० ॥
| मयि | = मुझमें | भक्तिः | = भक्तिका होना, | च | = और |
|---|---|---|---|---|---|
| अनन्ययोगेन | = अनन्ययोगके द्वारा | विविक्त- | जनसंसदि | = जन-समुदायमें | |
| अव्यभि- | देशसेवित्वम् | = एकान्त स्थानमें | अरतिः | = प्रीतिका न होना। | |
| चारिणी | = अव्यभिचारिणी | रहनेका स्वभाव होना |
व्याख्या —'मयि चानन्ययोगेन भक्तिर्व्यभिचारिणी'—संसारका आश्रय लेनेके कारण साधकका देहाभिमान बना रहता है। यह देहाभिमान अव्यक्तके ज्ञानमें प्रधान बाधा है। इसको दूर करनेके लिये भगवान् यहाँ तत्त्वज्ञानका उद्देश्य रखकर अनन्ययोगद्वारा अपनी अव्यभिचारिणी भक्ति करनेका साधन बता रहे हैं। तात्पर्य है कि भक्तिरूप साधनसे भी देहाभिमान सुगमतापूर्वक दूर हो सकता है।
भगवान्के सिवाय और किसीसे कुछ भी पानेकी इच्छा न हो अर्थात् भगवान्के सिवाय मनुष्य, गुरु, देवता, शास्त्र आदि मेरेको उस तत्त्वका अनुभव करा सकते हैं तथा अपने बल, बुद्धि, योग्यतासे मैं उस तत्त्वको प्राप्त कर लूँगा—इस प्रकार किसी भी वस्तु, व्यक्ति आदिका सहारा न हो और 'भगवान्की कृपासे ही मेरेको उस तत्त्वका अनुभव होगा'—इस प्रकार केवल भगवान्का ही सहारा हो—यह भगवान्में 'अनन्ययोग' होना है।
अपना सम्बन्ध केवल भगवान्के साथ ही हो, दूसरे किसीके साथ किंचिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध न हो—यह भगवान्में 'अव्यभिचारिणी भक्ति' होना है।
तात्पर्य है कि तत्त्वप्राप्तिका साधन (उपाय) भी भगवान् ही हों और साध्य (उपेय) भी भगवान् ही हों—यही अनन्ययोगके द्वारा भगवान्में अव्यभिचारिणी भक्तिका होना है। जिस साधकमें ज्ञानके साथ-साथ भक्तिके भी संस्कार हों, उसके लिये यह साधन बहुत उपयोगी है। भक्तिपरायण साधक अगर तत्त्वज्ञानका उद्देश्य रखकर एकमात्र भगवान्का ही आश्रय ग्रहण करता है, तो केवल इसी साधनसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति कर सकता है। गुणातीत होनेके उपायोंमें भी भगवान्ने अव्यभिचारिणी भक्तिकी बात कही है (गीता—चौदहवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)।
शंका—यहाँ तो भक्तिसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति बतायी गयी है और अठारहवें अध्यायके चौवनवें-पचपनवें श्लोकोंमें ज्ञानसे भक्तिकी प्राप्ति कही गयी है, ऐसा क्यों? समाधान —जैसे भक्ति दो प्रकारकी होती है—साधन-
भक्ति और साध्य-भक्ति, ऐसे ही ज्ञान भी दो प्रकारका होता है—साधन-ज्ञान और साध्य-ज्ञान। साध्य-भक्ति और साध्य-ज्ञान—दोनों तत्त्वतः एक ही हैं। साधन-भक्ति और साधन-ज्ञान—ये दोनों साध्य-भक्ति अथवा साध्य-ज्ञानकी प्राप्तिके साधन हैं। अतः जहाँ भक्तिसे तत्त्वज्ञान-(साध्य-ज्ञान-) की प्राप्तिकी बात कही है, वह भी ठीक है और जहाँ ज्ञानसे पराभक्ति-(साध्य-भक्ति-)की प्राप्तिकी बात कही है, वह भी ठीक है। अतः साधकको चाहिये कि उसमें कर्म, ज्ञान अथवा भक्ति—जिस संस्कारकी प्रधानता हो, उसीके अनुरूप साधनमें लग जाय। सावधानी केवल इतनी रखे कि उद्देश्य केवल परमात्माका ही हो, प्रकृति अथवा उसके कार्यका नहीं। ऐसा उद्देश्य होनेपर वह उसी साधनसे परमात्माको प्राप्त कर लेता है।
शंका —भगवान्ने ज्ञानके साधनोंमें अपनी भक्तिको किसलिये बताया? क्या ज्ञानयोगका साधक भगवान्की भक्ति भी करता है?
समाधान —ज्ञानयोगके साधक (जिज्ञासु) दो प्रकारके होते हैं—भावप्रधान (भक्तिप्रधान) और विवेकप्रधान (ज्ञानप्रधान)।
(१) भावप्रधान जिज्ञासु वह है, जो भगवान्का आश्रय लेकर तत्त्वको जानना चाहता है (गीता—सातवें अध्यायका सोलहवाँ और तेरहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें 'माम्', 'मम', तीसरे श्लोकमें 'मे', इस (दसवें) श्लोकमें 'मयि' और अठारहवें श्लोकमें 'मद्भक्तः' तथा 'मद्भावाय' पदोंके आनेसे सिद्ध होता है कि अठारहवें श्लोकतक भावप्रधान जिज्ञासुका प्रकरण है। परन्तु उन्नीसवेंसे चौतीसवें श्लोकतक एक बार भी 'अस्मद्' ('मैं' वाचक) पदका प्रयोग नहीं हुआ है, इसलिये वहाँ विवेकप्रधान जिज्ञासुका प्रकरण है। अतः यहाँ भावप्रधान जिज्ञासुका प्रसंग होनेसे ज्ञानके साधनोंके अन्तर्गत भक्तिरूप साधकका वर्णन किया गया है।
दूसरी बात, जैसे सात्त्विक भोजनमें पुष्टिके लिये घी या
श्लोक १० ]
- साधक-संजीवनी *
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दूधकी आवश्यकता होती है, तो वहाँ घी और दूध सान्त्वक भोजनके साथ मिलकर भी पुष्टि करते हैं और अकेले-अकेले भी पुष्टि करते हैं। ऐसे ही भगवान्की भक्ति ज्ञानके साधनोंमें मिलकर भी परमात्मप्राप्तिमें सहायक होती है और अकेली भी गुणातीत बना देती है (गीता—चौदहवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)। पातंजलयोगदर्शनमें भी परमात्मप्राप्तिके लिये अष्टांगयोगके साधनोंमें सहायकरूपसे 'ईश्वरप्रणिधान' अर्थात् भक्तिरूप नियम कहा है और उसी भक्तिको स्वतन्त्ररूपसे भी कहा है। इससे सिद्ध होता है कि भक्तिरूप साधन अपनी एक अलग विशेषता रखता है। इस विशेषताके कारण भी ज्ञानके साधनोंमें भक्तिका वर्णन किया गया है।
(२) विवेकप्रधान जिज्ञासु वह है, जो सत्-असत्का विचार करते हुए तीव्र विवेक-वैराग्यसे युक्त होकर तत्त्वको जानना चाहता है (इसी अध्यायके उन्नीसवेंसे चौतीसवें श्लोकतक)।
विचार करके देखा जाय तो आजकल आध्यात्मिक जिज्ञासाकी कमी और भोगासक्तिकी बहुलताके कारण विवेकप्रधान जिज्ञासु बहुत कम देखनेमें आते हैं। ऐसे साधकोंके लिये भक्तिरूप साधन बहुत उपयोगी है। अतः यहाँ भक्तिका वर्णन करना युक्तिसंगत प्रतीत होता है।
उपाय —केवल भगवान्को ही अपना मानना और भगवान्का ही आश्रय लेकर ब्रह्म-विश्वासपूर्वक भगवनामका जप, कीर्तन, चिन्तन, स्मरण आदि करना ही भक्तिका सुगम उपाय है।
‘विविक्तदेशसेवित्वम्’ —‘में एकात्ममें रहकर परमात्मतत्त्वका चिन्तन करूँ, भजन-स्मरण करूँ, सत्-शास्त्रोंका स्वाध्याय करूँ, उस तत्त्वको गहरा उत्तरकर समझूँ, मेरी वृत्तियोंमें और मेरे साधनमें कोई भी विघ्न-बाधा न पड़े, मेरे साथ कोई न रहे और मैं किसीके साथ न रहूँ’—साधककी ऐसी स्वाभाविक अभिलाषाका नाम ‘विविक्तदेश-सेवित्व’ है। तात्पर्य यह हुआ कि साधककी रुचि तो एकात्ममें रहनेकी ही होनी चाहिये, पर ऐसा एकात्म न मिले तो मनमें किंचिन्मात्र भी विकार नहीं होना चाहिये। उसके मनमें यही विचार होना चाहिये कि संसारके संगका, संयोगका तो स्वतः ही वियोग हो रहा है और स्वरूपमें असंगता स्वतःसिद्ध है। इस स्वतःसिद्ध
असंगतामें संसारका संग, संयोग, सम्बन्ध कभी हो ही नहीं सकता। अतः संसारका संग कभी बाधक हो ही नहीं सकता।
केवल निर्जन वन आदिमें जाकर और अकेले पड़े रहकर यह मान लेना कि ‘में एकात्म स्थानमें हूँ’ वास्तवमें भूल ही है; क्योंकि सम्पूर्ण संसारका बीज यह शरीर तो साथमें है ही। जबतक इस शरीरके साथ सम्बन्ध है, तबतक सम्पूर्ण संसारके साथ सम्बन्ध बना ही हुआ है। अतः एकात्म स्थानमें जानेका लाभ तभी है, जब देहाभिमानके नाशका उद्देश्य मुख्य हो।
वास्तविक एकात्म वह है, जिसमें एक तत्त्वके सिवाय दूसरी कोई चीज न उत्पन्न हुई, न है और न होगी। जिसमें न इन्द्रियाँ हैं, न प्राण हैं, न मन है और न अन्तःकरण है। जिसमें न स्थूलशरीर है, न सूक्ष्मशरीर है और न कारणशरीर है। जिसमें न व्यष्टि शरीर है और न समष्टि संसार है। जिसमें केवल एक तत्त्व-ही-तत्त्व है अर्थात् एक तत्त्वके सिवाय और कुछ है ही नहीं। कारण कि एक परमात्मतत्त्वके सिवाय पहले भी कुछ नहीं था और अन्तमें भी कुछ नहीं रहेगा। बीचमें जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी प्रतीतिके द्वारा ही प्रतीत हो रहा है अर्थात् जिनसे संसार प्रतीत हो रहा है, वे इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदि भी स्वयं प्रतीति ही हैं। अतः प्रतीतिके द्वारा ही प्रतीति हो रही है। हमारा (स्वरूपका) सम्बन्ध शरीर और अन्तःकरणके साथ कभी हुआ ही नहीं; क्योंकि शरीर और अन्तःकरण प्रकृतिका कार्य है और स्वरूप सदा ही प्रकृतिसे अतीत है। इस प्रकार अनुभव करना ही वास्तवमें ‘विविक्तदेशसेवित्व’ है।
‘अरतिर्जनसंसदि’ —साधारण मनुष्य-समुदायमें प्रीति, रुचि न हो अर्थात् कहाँ क्या हो रहा है, कब क्या होगा, कैसे होगा आदि-आदि सांसारिक बातोंको सुननेकी कोई भी इच्छा न हो तथा समाचार सुनानेवाले लोगोंसे मिलें, कुछ समाचार प्राप्त करें—ऐसी किंचिन्मात्र भी इच्छा, प्रीति न हो। परन्तु हमारेसे कोई तत्त्वकी बात पूछना चाहता है, साधनके विषयमें चर्चा करना चाहता है, उससे मिलनेके लिये मनमें जो इच्छा होती है, वह ‘अरतिर्जनसंसदि’ नहीं है। ऐसे ही जहाँ तत्त्वकी बात होती हो, आपसमें तत्त्वका विचार होता हो अथवा हमारी दृष्टिमें कोई परमात्मतत्त्वको जाननेवाला हो, ऐसे पुरुषोंके संगकी जो रुचि होती है, वह जनसमुदायमें रुचि नहीं
१-श्रीचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः। ( योगदर्शन २। ३२ )
२-ईश्वरप्रणिधानान्ना। ( योगदर्शन १। २३ )
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
कहलाती, प्रत्युत वह तो आवश्यक है। कहा भी गया है— संगः सर्वात्मना त्याज्यः स चेत्यक्तुं न शक्यते। स सद्धिः सह कर्तव्यः सतां संगो हि भेषजम्॥ (मार्कण्डेयपुराण ३७। २३)
अर्थात् आसक्तिपूर्वक किसीका भी संग नहीं करना चाहिये; परन्तु अगर ऐसी असंगता न होती हो, तो श्रेष्ठ पुरुषोंका संग करना चाहिये। कारण कि श्रेष्ठ पुरुषोंका संग असंगता प्राप्त करनेकी ओषध है।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतद्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥
अध्यात्मज्ञान- नित्यत्वम् | = अध्यात्मज्ञानमें नित्य-निरन्तर रहना, | एतत् | = —यह (पूर्वीक बीस साधन-समुदाय) तो | यत् | = जो ---|---|---|---|---|--- तत्त्वज्ञानार्थ- दर्शनम् | = तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सब जगह | ज्ञानम् | = ज्ञान है (और) | अन्यथा | = विपरीत है, | | | | अज्ञानम् | = वह अज्ञान है— | | | | इति | = ऐसा | | | | प्रोक्तम् | = कहा गया है।
व्याख्या —‘अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् ’—सम्पूर्ण शास्त्रोंका तात्पर्य मनुष्यको परमात्माकी तरफ लगानेमें, परमात्म-प्राप्ति करानेमें है—ऐसा निश्चय करनेके बाद परमात्मतत्त्व जितना समझमें आया है, उसका मनन करे। युक्ति-प्रयुक्तिये देखा जाय तो परमात्मतत्त्व भावरूपसे पहले भी था, अभी भी है और आगे भी रहेगा। परन्तु संसार पहले भी नहीं था और आगे भी नहीं रहेगा तथा अभी भी प्रतिक्षण अभवमें जा रहा है। संसारकी तो उत्पत्ति और विनाश होता है, पर उसका जो आधार, प्रकाशक है, वह परमात्मतत्त्व नित्य-निरन्तर रहता है। उस परमात्मतत्त्वके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। परमात्माकी सत्तासे ही संसार सत्तावाला दीखता है। इस प्रकार संसारकी स्वतन्त्र सत्ताके अभवका और परमात्माकी सत्ताका नित्य-निरन्तर मनन करते रहना ‘अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् ’ है।
उपाय —आध्यात्मिक ग्रन्थोंका पठन-पाठन, तत्त्वज्ञ महापुरुषोंसे तत्त्वज्ञान-विषयक श्रवण और प्रश्नोत्तर करना। ‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ’—तत्त्वज्ञानका अर्थ है— परमात्मा। उस परमात्माका ही सब जगह दर्शन करना, उसका ही सब जगह अनुभव करना ‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ’ है। वह परमात्मा सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है। एकान्तमें अथवा व्यवहारमें, सब समय साधककी दृष्टि, उसका लक्ष्य केवल उस परमात्मापर ही रहे। एक परमात्माके सिवाय उसको दूसरी कोई सत्ता
दीखे ही नहीं। सब जगह, सब समय समभावसे परिपूर्ण परमात्माको ही देखनेका उसका स्वभाव बन जाय—यही ‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ’ है। इसके सिद्ध होनेपर साधकको परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।
‘एतद्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ’—‘अमानित्वम् ’ से लेकर ‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ’ तक ये जो बीस साधन कहे गये हैं, ये सभी साधन देहाभिमान मिटानेवाले होनेसे और परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें सहायक होनेसे ‘ज्ञान’ नामसे कहे गये हैं। इन साधनोंसे विपरीत मानित्व, दम्भित्व, हिंसा आदि जितने भी दोष हैं, वे सभी देहाभिमान बढ़ानेवाले होनेसे और परमात्मतत्त्वसे विमुख करनेवाले होनेसे ‘अज्ञान’ नामसे कहे गये हैं।
विशेष बात
यदि साधकमें इतना तीव्र विवेक जाग्रत् हो जाय कि वह शरीरसे माने हुए सम्बन्धका त्याग कर सके, तो उसमें यह साधन-समुदाय स्वतः प्रकट हो जाता है। फिर उसको इन साधनोंका अलग-अलग अनुष्ठान करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। विनाशी शरीरको अपने अविनाशी स्वरूपसे अलग देखना मूल साधन है। अतः सभी साधकोंको चाहिये कि वे शरीरको अपनेसे अलग अनुभव करें, जो कि वास्तवमें अलग ही है!
पूर्वीक किसी भी साधनका अनुष्ठान करनेके लिये मुख्यतः दो बातोंकी आवश्यकता है—(१) साधकका
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
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उद्देश्य केवल परमात्माको प्राप्त करना हो और (२) शास्त्रोंको पढ़ते-सुनते समय यदि विवेकद्वारा शरीरको अपनेसे अलग समझ ले, तो फिर दूसरे समयमें भी उसी विवेकपर स्थिर रहे। इन दो बातोंके दृढ़ होनेसे साधन-समुदायके सभी साधन सुगम हो जाते हैं।
शरीर तो बदल गया, पर मैं वही हूँ, जो कि बचपनमें था—यह सबके अनुभवकी बात है। अतः शरीरके साथ अपना सम्बन्ध वास्तविक न होकर केवल माना हुआ है—ऐसा निश्चय होनेपर ही वास्तविक साधन आरम्भ होता है। साधककी बुद्धि जितने अंशमें परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको धारण करती है, उतने ही अंशमें उसमें विवेककी जागृति तथा संसारसे वैराग्य हो जाता है। भगवान्ने विवेक और वैराग्यको पुष्ट करनेके लिये ज्ञानके आवश्यक साधनोंका वर्णन किया है।
जब मनुष्यका उद्देश्य परमात्मप्राप्ति करना ही हो जाता है, तब दुर्गुणों एवं दुराचारोंकी जड़ कट जाती है, चाहे साधकको इसका अनुभव हो या न हो! जैसे वृक्षकी जड़ कटनेपर भी बड़ी टहनीपर लगे हुए पत्ते कुछ दिनतक हरे दीखते हैं; किन्तु वास्तवमें उन पत्तोंके हरेपनकी भी
जड़ कट चुकी है। इसलिये कुछ दिनोंके बाद कटी हुई टहनीके पत्तोंका हरापन मिट जाता है। ऐसे ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका दृढ़ उद्देश्य होते ही दुर्गुण-दुराचार मिट जाते हैं। यद्यपि साधकको आरम्भमें ऐसा अनुभव नहीं होता और उसको अपनेमें अवगुण दीखते हैं, तथापि कुछ समयके बाद उनका सर्वथा अभाव दीखने लग जाता है।
साधन करते समय कभी-कभी साधकको अपनेमें दुर्गुण दिखायी दे सकते हैं। परन्तु वास्तवमें साधनमें लगनेसे पहले उसमें जो दुर्गुण रहे थे, वे ही जाते हुए दिखायी देते हैं। यह नियम है कि दरवाजेसे आनेवाले और जानेवाले—दोनों ही दिखायी देते हैं। यदि साधन करते समय अपनेमें दुर्गुण बढ़ते हुए दीखते हों, तो समझना चाहिये कि दुर्गुण आ रहे हैं। परन्तु यदि अपनेमें दुर्गुण कम होते हुए दीखते हों, तो समझना चाहिये कि दुर्गुण जा रहे हैं। ऐसी अवस्थामें साधकको निराश नहीं होना चाहिये, प्रत्युत अपने उद्देश्यपर दृढ़ रहकर तत्परतापूर्वक साधनमें लगे रहना चाहिये। इस प्रकार साधनमें लगे रहनेसे दुर्गुण-दुराचारोंका सर्वथा अभाव हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विभागका ज्ञान करानेमें हेतु होनेसे इन बीस साधनोंको ‘ज्ञान’ नामसे कहा गया है। इससे जो विपरीत है, वह अज्ञान है। साधन न करनेसे मनुष्य ज्ञानकी बातें तो सीख लेता है, पर अनुभव नहीं कर सकता। अतः साधन न करनेसे अज्ञान (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञको एक देखना) रहता है और अज्ञानके रहते हुए अगर कोई सीखकर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागका विवेचन करता है तो वह वास्तवमें देहाभिमानको ही पुष्ट करता है। परन्तु जो ये साधन करता है, उसमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विभाग करनेकी योग्यता आ जाती है।
सम्बन्ध—पूर्वोक्त ज्ञान-(साधन-समुदाय-) के द्वारा जिसको जाना जाता है, उस साध्य-तत्त्वका अब ‘ज्ञेय’ नामसे वर्णन आरम्भ करते हैं।
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ञात्त्वामृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥
| यत् | = जो | ज्ञात्वा | = जानकर (मनुष्य) | तत् | = उसको |
|---|---|---|---|---|---|
| ज्ञेयम् | = ज्ञेय (पूर्वोक्त ज्ञानसे जाननेयोग्य) है, | अमृतम् | = अमरताका | न | = न |
| तत् | = उस (परमात्मतत्त्व) को | अश्नुते | = अनुभव कर लेता है। | सत् | = सत् |
| प्रवक्ष्यामि | = मैं अच्छी तरहसे कहूँगा, | अनादिमत् | = (वह ज्ञेय-तत्त्व) अनादिवाला | उच्यते | = कहा जा सकता है (और) |
| यत् | = जिसको | परम् | = (और) परम | न, असत् | = न असत् ही (कहा जा सकता है)। |
| ब्रह्म | = ब्रह्म है। |