श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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तरफ कभी न देखे, प्रत्युत अपनी कमियोंको देखकर उनको दूर करे१।
(२) एक ही आत्मा जैसे इस शरीरमें व्याप्त है, ऐसे ही वह अन्य शरीरोंमें भी व्याप्त है—‘सर्वगतः’ (गीता २।२४)। परन्तु मनुष्य अज्ञानसे सर्वव्यापी आत्माको एक अपने शरीरमें ही सीमित मानकर शरीरको ‘मैं’ मान लेता है। जैसे मनुष्य बैंकमें रखे हुए बहुत-से रुपयोंमेंसे केवल अपने द्वारा जमा किये हुए कुछ रुपयोंमें ही ममता करके, उनके साथ अपना सम्बन्ध मानकर अपनेको धनी मान लेता है, ऐसे ही एक शरीरमें ‘मैं शरीर हूँ’—ऐसी अहंता करके वह कालसे सम्बन्ध मानकर ‘मैं इस समयमें हूँ’, देशसे सम्बन्ध मानकर ‘मैं यहाँ हूँ’, बुद्धिसे सम्बन्ध मानकर ‘मैं समझदार हूँ’, वाणीसे सम्बन्ध मानकर ‘मैं वक्ता हूँ’ आदि अहंकार कर लेता है। इस प्रकारके सम्बन्ध न मानना ही अहंकाररहित होनेका उपाय है।
(३) शास्त्रोंमें परमात्माका ‘सच्चिदानन्दधन’-रूपसे वर्णन आया है। ‘सत्’ (सत्ता), ‘चित्’ (ज्ञान) और ‘आनन्द’ (अविनाशी सुख)—ये तीनों परमात्माके भिन्न-भिन्न स्वरूप नहीं हैं, प्रत्युत एक ही परमात्मतत्त्वके तीन नाम हैं। अतः साधक इन तीनोंमेंसे किसी एक विशेषणसे भी परमात्माका लक्ष्य करके निर्विकल्प२ हो सकता है। निर्विकल्प होनेसे उसको परमात्मतत्त्वमें अपनी स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है और अहंकारका सर्वथा नाश हो जाता है। इसको इस प्रकार समझना चाहिये—
(क) ‘सत्’—परमात्मतत्त्व सदासे ही था, सदासे है और सदा ही रहेगा। वह कभी बनता-बिगड़ता नहीं, कम-ज्यादा भी नहीं होता, सदा ज्यों-का-त्यों रहता है—ऐसा बुद्धिके द्वारा विचार करके निर्विकल्प होकर स्थिर हो जानेसे साधकका बुद्धिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और उस सत्-तत्त्वमें अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। ऐसा अनुभव होनेपर फिर अहंकार नहीं रहता।
१-तेरे भावे जो करे, भली बुरी संसार। ‘नारायण’ तू बैठिके, अपनी भवन बूहार॥
२-संसारके चिन्तनसे साधकका कोई प्रयोजन होता नहीं और अचिन्त्य परमात्मतत्त्व चिन्तनमें आता नहीं—यही निर्विकल्पता है।
३-किसी सेठने सुना कि अमुक दूकानमें इतना नफा हुआ है और साथ ही यह भी सुना कि अमुक दूकानमें इतना नुकसान हुआ है। इस प्रकार नफा और नुकसान—इन दोनोंमें तो फरक है, पर इन दोनोंके ज्ञानमें कोई फरक नहीं है; ज्ञान तो एक ही है। अगर ज्ञान एक न होता तो नफा और नुकसान—दोनोंकी धिन्मताका ज्ञान कैसे होता? इसी तरह ‘मैं’, ‘तू’, ‘यह’ और ‘वह’—ये चारों अलग-अलग होनेपर भी इनका प्रकाशक ज्ञान एक ही है। जिस सामान्य प्रकाशमें ‘मैं’ में क्रियाएँ होती हैं, उसी प्रकाशमें ‘तू’, ‘यह और वह’ में भी क्रियाएँ होती हैं। उस सामान्य प्रकाशमें ‘मैं’, ‘तू’, ‘यह और वह’ का भेद नहीं है। उस सामान्य प्रकाशका सम्बन्ध यदि है तो चारोंके साथ है और यदि नहीं है तो किसीके भी साथ नहीं है।
(ख) ‘चित्’—जैसे प्रत्येक व्यक्तिके शरीरादि ‘अहम्’ के अन्तर्गत दृश्य हैं, ऐसे ही ‘अहम्’ भी (मैं, तू, यह और वहके रूपमें) एक ज्ञानके अन्तर्गत दृश्य है३। उस ज्ञान- (चेतन- ) में निर्विकल्प होकर स्थिर हो जानेसे परमात्मतत्त्वमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। फिर अहंकार नहीं रहता।
(ग) ‘आनन्द’—साधकलोग प्रायः बुद्धि और अहम्को प्रकाशित करनेवाले ‘चेतन’ को भी बुद्धिके द्वारा ही जाननेकी चेष्टा किया करते हैं। वास्तवमें बुद्धिके द्वारा जाने अर्थात् सीखे हुए विषयको ‘ज्ञान’ की संज्ञा देना और उससे अपने-आपको ज्ञानी मान लेना भूल ही है। बुद्धिको प्रकाशित करनेवाला तत्त्व बुद्धिके द्वारा कैसे जाना जा सकता है? यद्यपि साधकके पास बुद्धिके सिवाय ऐसा और कोई साधन नहीं है, जिससे वह तत्त्व जाना जा सके, तथापि बुद्धिके द्वारा केवल जड़ संसारकी वास्तविकताको ही जाना जा सकता है। बुद्धि जिससे प्रकाशित होती है, उस तत्त्वको बुद्धि नहीं जान सकती। उस तत्त्वको जाननेके लिये बुद्धिसे भी सम्बन्ध-विच्छेद करना आवश्यक है। बुद्धिको प्रकाशित करनेवाले परमात्मतत्त्वमें निर्विकल्परूपसे स्थित हो जानेपर बुद्धिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। फिर एक ‘आनन्द’-स्वरूप (जहाँ दुःखका लेश भी नहीं है) परमात्मतत्त्व ही शेष रह जाता है, जो स्वयं ज्ञानस्वरूप और सत्स्वरूप भी है। इस प्रकार तत्त्वमें निर्विकल्प (चुप) हो जानेपर ‘आनन्द-ही-आनन्द है’—ऐसा अनुभव होता है। ऐसा अनुभव होनेपर फिर अहंकार नहीं रहता।
‘जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्’—जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोगोंके दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखनेका तात्पर्य है—जैसे आँवामें मटका पकता है, ऐसे ही जन्मसे पहले माताके उदरमें बच्चा जठराग्निमें पकता रहता है। माताके खाये हुए नमक, मिर्च आदि क्षार और तीखे पदार्थोंसे बच्चेके शरीरमें जलन होती है। गर्भाशयमें