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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

रहनेवाले सूक्ष्म जन्तु भी बच्चेको काटते रहते हैं। प्रसवके समय माताको जो पीड़ा होती है, उसका कोई अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। वैसे ही पीड़ा उदरसे बाहर आते समय बच्चेको होती है। इस तरह जन्मके दुःखरूप दोषोंका बार-बार विचार करके इस विचारको दृढ़ करना कि इसमें केवल दुःख-ही-दुःख है।

जो जन्मता है, उसको मरना ही पड़ता है—यह नियम है। इससे कोई बच ही नहीं सकता। मृत्युके समय जब प्राण शरीरसे निकलते हैं, तब हजारों बिच्छू शरीरमें एक साथ डंक मारते हैं—ऐसी पीड़ा होती है। उभ्रभरमें कमाये हुए धनसे, उभ्रभरमें रहे हुए मकानसे और अपने परिवारसे जब वियोग होता है और फिर उनके मिलनेकी सम्भावना नहीं रहती, तब (ममता-आसक्तिके कारण) बड़ा भारी दुःख होता है। जिस धनको कभी किसीको दिखाना नहीं चाहता था, जिस धनको परिवारवालोंसे छिपा-छिपाकर तिजोरीमें रखा था, उसकी चाबी परिवारवालोंके हाथमें पड़ी देखकर मनमें असह्य वेदना होती है। इस तरह मृत्युके दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखे।

वृद्धावस्थामें शरीर और अवयवोंकी शक्ति क्षीण हो जाती है, जिससे चलने-फिरने, उठने-बैठनेमें कष्ट होता है। हरेक तरहका भोजन पचता नहीं। बड़ा होनेके कारण परिवारसे आदर चाहता है, पर कोई प्रयोजन न रहनेसे घरवाले निरादर, अपमान करते हैं। तब मनमें पहलेकी बातें याद आती हैं कि मैंने धन कमाया है, इनको पाला-पोसा है, पर आज ये मेरा तिरस्कार कर रहे हैं! इन बातोंको लेकर बड़ा दुःख होता है। इस तरह वृद्धावस्थाके दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखे।

यह शरीर व्याधियोंका, रोगोंका घर है—‘शरीरं

परिशिष्ट भाव—एक ‘दुःखका भोग’ होता है और सुखकी इच्छा करना ‘दुःखका भोग’ है। दुःखके कारणकी खोज करके उसको मिटाना ‘दुःखका प्रभाव’ है। यहाँ दुःखके प्रभावको ‘दुःखदोषानुदर्शनम्’ पदसे कहा गया है।

दुःखका भोग करनेसे अर्थात् दुःखी होनेसे विवेक लुप्त हो जाता है। परन्तु दुःखका प्रभाव होनेसे विवेक लुप्त नहीं होता, प्रत्युत मनुष्य विवेकदृष्टिसे दुःखके कारणकी खोज करता है और खोज करके उसको मिटाता है। सुखकी इच्छा ही सम्पूर्ण दुःखोंका कारण है। कारणके मिटनेपर कार्य अपने-आप मिट जाता है; अतः सुखकी इच्छा मिटनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है।

व्याधिमन्दिरम्।’ शरीरमें वात, कफ आदिसे पैदा होनेवाले अनेक प्रकारके रोग होते रहते हैं और उन रोगोंसे शरीरमें बड़ी पीड़ा होती है। इस तरह रोगोंके दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखे।

यहाँ बार-बार देखनेका तात्पर्य बार-बार चिन्तन करनेसे नहीं है, प्रत्युत विचार करनेसे है। जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोगोंके दुःखोंको बार-बार देखनेसे अर्थात् विचार करनेसे उनके मूल कारण—उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंमें राग स्वाभाविक ही कम हो जाता है अर्थात् भोगोंसे वैराग्य हो जाता है। तात्पर्य है कि जन्म, मृत्यु आदिके दुःखरूप दोषोंको देखना भोगोंसे वैराग्य होनेमें हेतु है; क्योंकि भोगोंके रागसे अर्थात् गुणोंके संगसे ही जन्म होता है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजनजन्मसु’ (गीता १३।२१) और जो जन्म होता है, वह सम्पूर्ण दुःखोंका कारण है। भगवान्ने पुनर्जन्मको दुःखालय बताया है—‘पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्’ (गीता ८।१५)।

शरीर आदि जड़ पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे, उनको महत्त्व देनेसे, उनका आश्रय लेनेसे ही सम्पूर्ण दोष उत्पन्न होते हैं—‘देहाभिमाननि सर्वं दोषाः प्रादुर्भवन्ति।’ परमात्माका स्वरूप अथवा उसका ही अंश होनेके ही कारण जीवात्मा स्वयं निर्दोष है—‘चेतन अमल सहज सुखरासी’ (मानस ७।११७।१)। यही कारण है कि जीवात्माको दुःख और दोष अच्छे नहीं लगते; क्योंकि वे इसके सजातीय नहीं हैं। जीव अपने द्वारा ही पैदा किये दोषोंके कारण सदा दुःख पाता रहता है। अतः भगवान् जन्म, मृत्यु आदिके दुःखरूप दोषोंके मूल कारण देहाभिमानको विचारपूर्वक मिटानेके लिये कह रहे हैं।

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु। नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ १ ॥