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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ८ ]

  • साधक-संजीवनी *

८७५

तरफ कभी न देखे, प्रत्युत अपनी कमियोंको देखकर उनको दूर करे१।

(२) एक ही आत्मा जैसे इस शरीरमें व्याप्त है, ऐसे ही वह अन्य शरीरोंमें भी व्याप्त है—‘सर्वगतः’ (गीता २।२४)। परन्तु मनुष्य अज्ञानसे सर्वव्यापी आत्माको एक अपने शरीरमें ही सीमित मानकर शरीरको ‘मैं’ मान लेता है। जैसे मनुष्य बैंकमें रखे हुए बहुत-से रुपयोंमेंसे केवल अपने द्वारा जमा किये हुए कुछ रुपयोंमें ही ममता करके, उनके साथ अपना सम्बन्ध मानकर अपनेको धनी मान लेता है, ऐसे ही एक शरीरमें ‘मैं शरीर हूँ’—ऐसी अहंता करके वह कालसे सम्बन्ध मानकर ‘मैं इस समयमें हूँ’, देशसे सम्बन्ध मानकर ‘मैं यहाँ हूँ’, बुद्धिसे सम्बन्ध मानकर ‘मैं समझदार हूँ’, वाणीसे सम्बन्ध मानकर ‘मैं वक्ता हूँ’ आदि अहंकार कर लेता है। इस प्रकारके सम्बन्ध न मानना ही अहंकाररहित होनेका उपाय है।

(३) शास्त्रोंमें परमात्माका ‘सच्चिदानन्दधन’-रूपसे वर्णन आया है। ‘सत्’ (सत्ता), ‘चित्’ (ज्ञान) और ‘आनन्द’ (अविनाशी सुख)—ये तीनों परमात्माके भिन्न-भिन्न स्वरूप नहीं हैं, प्रत्युत एक ही परमात्मतत्त्वके तीन नाम हैं। अतः साधक इन तीनोंमेंसे किसी एक विशेषणसे भी परमात्माका लक्ष्य करके निर्विकल्प२ हो सकता है। निर्विकल्प होनेसे उसको परमात्मतत्त्वमें अपनी स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है और अहंकारका सर्वथा नाश हो जाता है। इसको इस प्रकार समझना चाहिये—

(क) ‘सत्’—परमात्मतत्त्व सदासे ही था, सदासे है और सदा ही रहेगा। वह कभी बनता-बिगड़ता नहीं, कम-ज्यादा भी नहीं होता, सदा ज्यों-का-त्यों रहता है—ऐसा बुद्धिके द्वारा विचार करके निर्विकल्प होकर स्थिर हो जानेसे साधकका बुद्धिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और उस सत्-तत्त्वमें अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। ऐसा अनुभव होनेपर फिर अहंकार नहीं रहता।

१-तेरे भावे जो करे, भली बुरी संसार। ‘नारायण’ तू बैठिके, अपनी भवन बूहार॥

२-संसारके चिन्तनसे साधकका कोई प्रयोजन होता नहीं और अचिन्त्य परमात्मतत्त्व चिन्तनमें आता नहीं—यही निर्विकल्पता है।

३-किसी सेठने सुना कि अमुक दूकानमें इतना नफा हुआ है और साथ ही यह भी सुना कि अमुक दूकानमें इतना नुकसान हुआ है। इस प्रकार नफा और नुकसान—इन दोनोंमें तो फरक है, पर इन दोनोंके ज्ञानमें कोई फरक नहीं है; ज्ञान तो एक ही है। अगर ज्ञान एक न होता तो नफा और नुकसान—दोनोंकी धिन्मताका ज्ञान कैसे होता? इसी तरह ‘मैं’, ‘तू’, ‘यह’ और ‘वह’—ये चारों अलग-अलग होनेपर भी इनका प्रकाशक ज्ञान एक ही है। जिस सामान्य प्रकाशमें ‘मैं’ में क्रियाएँ होती हैं, उसी प्रकाशमें ‘तू’, ‘यह और वह’ में भी क्रियाएँ होती हैं। उस सामान्य प्रकाशमें ‘मैं’, ‘तू’, ‘यह और वह’ का भेद नहीं है। उस सामान्य प्रकाशका सम्बन्ध यदि है तो चारोंके साथ है और यदि नहीं है तो किसीके भी साथ नहीं है।

(ख) ‘चित्’—जैसे प्रत्येक व्यक्तिके शरीरादि ‘अहम्’ के अन्तर्गत दृश्य हैं, ऐसे ही ‘अहम्’ भी (मैं, तू, यह और वहके रूपमें) एक ज्ञानके अन्तर्गत दृश्य है३। उस ज्ञान- (चेतन- ) में निर्विकल्प होकर स्थिर हो जानेसे परमात्मतत्त्वमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। फिर अहंकार नहीं रहता।

(ग) ‘आनन्द’—साधकलोग प्रायः बुद्धि और अहम्को प्रकाशित करनेवाले ‘चेतन’ को भी बुद्धिके द्वारा ही जाननेकी चेष्टा किया करते हैं। वास्तवमें बुद्धिके द्वारा जाने अर्थात् सीखे हुए विषयको ‘ज्ञान’ की संज्ञा देना और उससे अपने-आपको ज्ञानी मान लेना भूल ही है। बुद्धिको प्रकाशित करनेवाला तत्त्व बुद्धिके द्वारा कैसे जाना जा सकता है? यद्यपि साधकके पास बुद्धिके सिवाय ऐसा और कोई साधन नहीं है, जिससे वह तत्त्व जाना जा सके, तथापि बुद्धिके द्वारा केवल जड़ संसारकी वास्तविकताको ही जाना जा सकता है। बुद्धि जिससे प्रकाशित होती है, उस तत्त्वको बुद्धि नहीं जान सकती। उस तत्त्वको जाननेके लिये बुद्धिसे भी सम्बन्ध-विच्छेद करना आवश्यक है। बुद्धिको प्रकाशित करनेवाले परमात्मतत्त्वमें निर्विकल्परूपसे स्थित हो जानेपर बुद्धिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। फिर एक ‘आनन्द’-स्वरूप (जहाँ दुःखका लेश भी नहीं है) परमात्मतत्त्व ही शेष रह जाता है, जो स्वयं ज्ञानस्वरूप और सत्स्वरूप भी है। इस प्रकार तत्त्वमें निर्विकल्प (चुप) हो जानेपर ‘आनन्द-ही-आनन्द है’—ऐसा अनुभव होता है। ऐसा अनुभव होनेपर फिर अहंकार नहीं रहता।

‘जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्’—जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोगोंके दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखनेका तात्पर्य है—जैसे आँवामें मटका पकता है, ऐसे ही जन्मसे पहले माताके उदरमें बच्चा जठराग्निमें पकता रहता है। माताके खाये हुए नमक, मिर्च आदि क्षार और तीखे पदार्थोंसे बच्चेके शरीरमें जलन होती है। गर्भाशयमें

८७६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

रहनेवाले सूक्ष्म जन्तु भी बच्चेको काटते रहते हैं। प्रसवके समय माताको जो पीड़ा होती है, उसका कोई अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। वैसे ही पीड़ा उदरसे बाहर आते समय बच्चेको होती है। इस तरह जन्मके दुःखरूप दोषोंका बार-बार विचार करके इस विचारको दृढ़ करना कि इसमें केवल दुःख-ही-दुःख है।

जो जन्मता है, उसको मरना ही पड़ता है—यह नियम है। इससे कोई बच ही नहीं सकता। मृत्युके समय जब प्राण शरीरसे निकलते हैं, तब हजारों बिच्छू शरीरमें एक साथ डंक मारते हैं—ऐसी पीड़ा होती है। उभ्रभरमें कमाये हुए धनसे, उभ्रभरमें रहे हुए मकानसे और अपने परिवारसे जब वियोग होता है और फिर उनके मिलनेकी सम्भावना नहीं रहती, तब (ममता-आसक्तिके कारण) बड़ा भारी दुःख होता है। जिस धनको कभी किसीको दिखाना नहीं चाहता था, जिस धनको परिवारवालोंसे छिपा-छिपाकर तिजोरीमें रखा था, उसकी चाबी परिवारवालोंके हाथमें पड़ी देखकर मनमें असह्य वेदना होती है। इस तरह मृत्युके दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखे।

वृद्धावस्थामें शरीर और अवयवोंकी शक्ति क्षीण हो जाती है, जिससे चलने-फिरने, उठने-बैठनेमें कष्ट होता है। हरेक तरहका भोजन पचता नहीं। बड़ा होनेके कारण परिवारसे आदर चाहता है, पर कोई प्रयोजन न रहनेसे घरवाले निरादर, अपमान करते हैं। तब मनमें पहलेकी बातें याद आती हैं कि मैंने धन कमाया है, इनको पाला-पोसा है, पर आज ये मेरा तिरस्कार कर रहे हैं! इन बातोंको लेकर बड़ा दुःख होता है। इस तरह वृद्धावस्थाके दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखे।

यह शरीर व्याधियोंका, रोगोंका घर है—‘शरीरं

परिशिष्ट भाव—एक ‘दुःखका भोग’ होता है और सुखकी इच्छा करना ‘दुःखका भोग’ है। दुःखके कारणकी खोज करके उसको मिटाना ‘दुःखका प्रभाव’ है। यहाँ दुःखके प्रभावको ‘दुःखदोषानुदर्शनम्’ पदसे कहा गया है।

दुःखका भोग करनेसे अर्थात् दुःखी होनेसे विवेक लुप्त हो जाता है। परन्तु दुःखका प्रभाव होनेसे विवेक लुप्त नहीं होता, प्रत्युत मनुष्य विवेकदृष्टिसे दुःखके कारणकी खोज करता है और खोज करके उसको मिटाता है। सुखकी इच्छा ही सम्पूर्ण दुःखोंका कारण है। कारणके मिटनेपर कार्य अपने-आप मिट जाता है; अतः सुखकी इच्छा मिटनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है।

व्याधिमन्दिरम्।’ शरीरमें वात, कफ आदिसे पैदा होनेवाले अनेक प्रकारके रोग होते रहते हैं और उन रोगोंसे शरीरमें बड़ी पीड़ा होती है। इस तरह रोगोंके दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखे।

यहाँ बार-बार देखनेका तात्पर्य बार-बार चिन्तन करनेसे नहीं है, प्रत्युत विचार करनेसे है। जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोगोंके दुःखोंको बार-बार देखनेसे अर्थात् विचार करनेसे उनके मूल कारण—उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंमें राग स्वाभाविक ही कम हो जाता है अर्थात् भोगोंसे वैराग्य हो जाता है। तात्पर्य है कि जन्म, मृत्यु आदिके दुःखरूप दोषोंको देखना भोगोंसे वैराग्य होनेमें हेतु है; क्योंकि भोगोंके रागसे अर्थात् गुणोंके संगसे ही जन्म होता है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजनजन्मसु’ (गीता १३।२१) और जो जन्म होता है, वह सम्पूर्ण दुःखोंका कारण है। भगवान्ने पुनर्जन्मको दुःखालय बताया है—‘पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्’ (गीता ८।१५)।

शरीर आदि जड़ पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे, उनको महत्त्व देनेसे, उनका आश्रय लेनेसे ही सम्पूर्ण दोष उत्पन्न होते हैं—‘देहाभिमाननि सर्वं दोषाः प्रादुर्भवन्ति।’ परमात्माका स्वरूप अथवा उसका ही अंश होनेके ही कारण जीवात्मा स्वयं निर्दोष है—‘चेतन अमल सहज सुखरासी’ (मानस ७।११७।१)। यही कारण है कि जीवात्माको दुःख और दोष अच्छे नहीं लगते; क्योंकि वे इसके सजातीय नहीं हैं। जीव अपने द्वारा ही पैदा किये दोषोंके कारण सदा दुःख पाता रहता है। अतः भगवान् जन्म, मृत्यु आदिके दुःखरूप दोषोंके मूल कारण देहाभिमानको विचारपूर्वक मिटानेके लिये कह रहे हैं।

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु। नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ १ ॥

श्लोक ९ ]

  • साधक-संजीवनी *

८७७

असक्ति:= आसक्तिरहित होना,अनभिष्वङ्गः= एकात्मता (घनिष्ठ सम्बन्ध) न होनाप्रतिकूलताकी प्राप्तिमें
पुत्रदार-= औरनित्यम्,
गृहादिषु= पुत्र, स्त्री, घरइष्टानिष्टोप-समचित्तत्वम्
आदिमेंपत्तिषु= अनुकूलता-= चित्तका नित्य सम रहना।

व्याख्या —‘असक्ति ’—उत्पन्न होनेवाली (सांसारिक) वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें जो प्रियता है, उसको ‘सक्ति’ कहते हैं। उस ‘सक्ति’ से रहित होनेका नाम ‘असक्ति’ है।

सांसारिक वस्तुओं, व्यक्तियों आदिसे सुख लेनेकी इच्छासे, सुखकी आशासे और सुखके भोगसे ही मनुष्यकी उनमें आसक्ति, प्रियता होती है। कारण कि मनुष्यको संयोगके सिवाय सुख नहीं दीखता, इसलिये उसको संयोगजन्य सुख प्रिय लगता है। परन्तु वास्तविक सुख संयोगके वियोगसे होता है (गीता—छठे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक), इसलिये साधकके लिये सांसारिक आसक्तिका त्याग करना बहुत आवश्यक है।

उपाय —संयोगजन्य सुख आरम्भमें तो अमृतकी तरह दीखता है, पर परिणाममें विषकी तरह होता है (गीता—अठारहवें अध्यायका अडुतीसवाँ श्लोक)। संयोगजन्य सुख भोगनेवालेको परिणाममें दुःख भोगना ही पड़ता है—यह नियम है। अतः संयोगजन्य सुखके परिणामपर दृष्टि रखनेसे उसमें आसक्ति नहीं रहती।

‘अनभिष्वंगः पुत्रदारगृहादिषु’ —पुत्र, स्त्री, घर, धन, जमीन, पशु आदिके साथ माना हुआ जो घनिष्ठ सम्बन्ध है, गाढ़ मोह है, तादात्म्य है, मानी हुई एकात्मता है, जिसके कारण शरीरपर भी असर पड़ता है, उसका नाम ‘अभिष्वंग’ है*। जैसे—पुत्रके साथ माताकी एकात्मता रहनेके कारण जब पुत्र बीमार हो जाता है, तब माताका शरीर कमजोर हो जाता है। ऐसे ही पुत्रके, स्त्रीके मर जानेपर मनुष्य कहता है कि मैं मर गया, धनके चले जानेपर कहता है कि मैं मारा गया, आदि। ऐसी एकात्मतासे रहित होनेके लिये यहाँ ‘अनभिष्वंगः ’ पद आया है।

उपाय —जिनके साथ अपना घनिष्ठ सम्बन्ध दीखे, उनकी सेवा करे, उनको सुख पहुँचाये, पर उनसे सुख

लेनेका उद्देश्य न रखे। उद्देश्य तो उनसे अभिष्वंग (तादात्म्य) दूर करनेका ही रखे। अगर उनसे सेवा लेनेका उद्देश्य रखेंगे तो उनसे तादात्म्य हो जायगा। हाँ, उनकी प्रसन्नताके लिये कभी उनसे सेवा लेनी भी पड़े तो उसमें राजी न हो; क्योंकि राजी होनेसे अभिष्वंग हो जायगा। तात्पर्य है कि किसीके भी साथ अपनेको लिप्त न करे। इस बातकी बहुत सावधानी रखे।

‘नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु’ —‘इष्ट’ अर्थात् मनके अनुकूल वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना आदिके प्राप्त होनेपर चित्तमें राग, हर्ष, सुख आदि विकार न हो और ‘अनिष्ट’ अर्थात् मनके प्रतिकूल वस्तु, व्यक्ति आदिके प्राप्त होनेपर चित्तमें द्वेष, शोक, दुःख, उद्वेग आदि विकार न हो। तात्पर्य है कि अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंके प्राप्त होनेपर चित्तमें निरन्तर समता रहे, चित्तपर उनका कोई असर न पड़े। इसको भगवान्ने ‘सिद्ध्यसिद्धयोः समो भूत्वा ’ (२।४८) पदोंसे भी कहा है।

उपाय —मनुष्यको जो कुछ अनुकूल सामग्री मिली है, उसको वह अपने लिये मानकर सुख भोगता है—यह महान् बाधक है। कारण कि संसारकी सामग्री केवल संसारकी सेवामें लगानेके लिये ही मिली है, अपने शरीर-इन्द्रियोंको सुख पहुँचानेके लिये नहीं। ऐसे ही मनुष्यको जो कुछ प्रतिकूल सामग्री मिली है, वह दुःख भोगनेके लिये नहीं मिली है, प्रत्युत संयोगजन्य सुखका त्याग करनेके लिये, मनुष्यको सांसारिक राग, आसक्ति, कामना, ममता आदिसे छुड़ानेके लिये ही मिली है। तात्पर्य है कि अनुकूल और प्रतिकूल—दोनों परिस्थितियों मनुष्यको सुख-दुःखसे ऊँचा उठाकर (उन दोनोंसे अतीत) परमात्म-तत्त्वको प्राप्त करनेके लिये ही मिली हैं—ऐसा दृढ़तासे मान लेनेसे साधकका चित्त इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिमें स्वतः सम रहेगा।

  • पुत्र, स्त्री आदिके साथ यथायोग्य बर्ताव करना, उनमें अपनापन न रखकर उनकी सेवा करना ‘अभिष्वंग’ नहीं है, प्रत्युत यह तो निलिप्तता, असंगता है, जो कि अमरताका अनुभव करानेवाली है।

८७८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

मयि चानन्ययोगेन भक्तिर्व्यभिचारिणी ।

विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि

॥ १० ॥

मयि= मुझमेंभक्तिः= भक्तिका होना,= और
अनन्ययोगेन= अनन्ययोगके द्वाराविविक्त-जनसंसदि= जन-समुदायमें
अव्यभि-देशसेवित्वम्= एकान्त स्थानमेंअरतिः= प्रीतिका न होना।
चारिणी= अव्यभिचारिणीरहनेका स्वभाव होना

व्याख्या —'मयि चानन्ययोगेन भक्तिर्व्यभिचारिणी'—संसारका आश्रय लेनेके कारण साधकका देहाभिमान बना रहता है। यह देहाभिमान अव्यक्तके ज्ञानमें प्रधान बाधा है। इसको दूर करनेके लिये भगवान् यहाँ तत्त्वज्ञानका उद्देश्य रखकर अनन्ययोगद्वारा अपनी अव्यभिचारिणी भक्ति करनेका साधन बता रहे हैं। तात्पर्य है कि भक्तिरूप साधनसे भी देहाभिमान सुगमतापूर्वक दूर हो सकता है।

भगवान्के सिवाय और किसीसे कुछ भी पानेकी इच्छा न हो अर्थात् भगवान्के सिवाय मनुष्य, गुरु, देवता, शास्त्र आदि मेरेको उस तत्त्वका अनुभव करा सकते हैं तथा अपने बल, बुद्धि, योग्यतासे मैं उस तत्त्वको प्राप्त कर लूँगा—इस प्रकार किसी भी वस्तु, व्यक्ति आदिका सहारा न हो और 'भगवान्की कृपासे ही मेरेको उस तत्त्वका अनुभव होगा'—इस प्रकार केवल भगवान्का ही सहारा हो—यह भगवान्में 'अनन्ययोग' होना है।

अपना सम्बन्ध केवल भगवान्के साथ ही हो, दूसरे किसीके साथ किंचिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध न हो—यह भगवान्में 'अव्यभिचारिणी भक्ति' होना है।

तात्पर्य है कि तत्त्वप्राप्तिका साधन (उपाय) भी भगवान् ही हों और साध्य (उपेय) भी भगवान् ही हों—यही अनन्ययोगके द्वारा भगवान्में अव्यभिचारिणी भक्तिका होना है। जिस साधकमें ज्ञानके साथ-साथ भक्तिके भी संस्कार हों, उसके लिये यह साधन बहुत उपयोगी है। भक्तिपरायण साधक अगर तत्त्वज्ञानका उद्देश्य रखकर एकमात्र भगवान्का ही आश्रय ग्रहण करता है, तो केवल इसी साधनसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति कर सकता है। गुणातीत होनेके उपायोंमें भी भगवान्ने अव्यभिचारिणी भक्तिकी बात कही है (गीता—चौदहवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)।

शंका—यहाँ तो भक्तिसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति बतायी गयी है और अठारहवें अध्यायके चौवनवें-पचपनवें श्लोकोंमें ज्ञानसे भक्तिकी प्राप्ति कही गयी है, ऐसा क्यों? समाधान —जैसे भक्ति दो प्रकारकी होती है—साधन-

भक्ति और साध्य-भक्ति, ऐसे ही ज्ञान भी दो प्रकारका होता है—साधन-ज्ञान और साध्य-ज्ञान। साध्य-भक्ति और साध्य-ज्ञान—दोनों तत्त्वतः एक ही हैं। साधन-भक्ति और साधन-ज्ञान—ये दोनों साध्य-भक्ति अथवा साध्य-ज्ञानकी प्राप्तिके साधन हैं। अतः जहाँ भक्तिसे तत्त्वज्ञान-(साध्य-ज्ञान-) की प्राप्तिकी बात कही है, वह भी ठीक है और जहाँ ज्ञानसे पराभक्ति-(साध्य-भक्ति-)की प्राप्तिकी बात कही है, वह भी ठीक है। अतः साधकको चाहिये कि उसमें कर्म, ज्ञान अथवा भक्ति—जिस संस्कारकी प्रधानता हो, उसीके अनुरूप साधनमें लग जाय। सावधानी केवल इतनी रखे कि उद्देश्य केवल परमात्माका ही हो, प्रकृति अथवा उसके कार्यका नहीं। ऐसा उद्देश्य होनेपर वह उसी साधनसे परमात्माको प्राप्त कर लेता है।

शंका —भगवान्ने ज्ञानके साधनोंमें अपनी भक्तिको किसलिये बताया? क्या ज्ञानयोगका साधक भगवान्की भक्ति भी करता है?

समाधान —ज्ञानयोगके साधक (जिज्ञासु) दो प्रकारके होते हैं—भावप्रधान (भक्तिप्रधान) और विवेकप्रधान (ज्ञानप्रधान)।

(१) भावप्रधान जिज्ञासु वह है, जो भगवान्का आश्रय लेकर तत्त्वको जानना चाहता है (गीता—सातवें अध्यायका सोलहवाँ और तेरहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें 'माम्', 'मम', तीसरे श्लोकमें 'मे', इस (दसवें) श्लोकमें 'मयि' और अठारहवें श्लोकमें 'मद्भक्तः' तथा 'मद्भावाय' पदोंके आनेसे सिद्ध होता है कि अठारहवें श्लोकतक भावप्रधान जिज्ञासुका प्रकरण है। परन्तु उन्नीसवेंसे चौतीसवें श्लोकतक एक बार भी 'अस्मद्' ('मैं' वाचक) पदका प्रयोग नहीं हुआ है, इसलिये वहाँ विवेकप्रधान जिज्ञासुका प्रकरण है। अतः यहाँ भावप्रधान जिज्ञासुका प्रसंग होनेसे ज्ञानके साधनोंके अन्तर्गत भक्तिरूप साधकका वर्णन किया गया है।

दूसरी बात, जैसे सात्त्विक भोजनमें पुष्टिके लिये घी या

श्लोक १० ]

  • साधक-संजीवनी *

८७९

दूधकी आवश्यकता होती है, तो वहाँ घी और दूध सान्त्वक भोजनके साथ मिलकर भी पुष्टि करते हैं और अकेले-अकेले भी पुष्टि करते हैं। ऐसे ही भगवान्की भक्ति ज्ञानके साधनोंमें मिलकर भी परमात्मप्राप्तिमें सहायक होती है और अकेली भी गुणातीत बना देती है (गीता—चौदहवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)। पातंजलयोगदर्शनमें भी परमात्मप्राप्तिके लिये अष्टांगयोगके साधनोंमें सहायकरूपसे 'ईश्वरप्रणिधान' अर्थात् भक्तिरूप नियम कहा है और उसी भक्तिको स्वतन्त्ररूपसे भी कहा है। इससे सिद्ध होता है कि भक्तिरूप साधन अपनी एक अलग विशेषता रखता है। इस विशेषताके कारण भी ज्ञानके साधनोंमें भक्तिका वर्णन किया गया है।

(२) विवेकप्रधान जिज्ञासु वह है, जो सत्-असत्का विचार करते हुए तीव्र विवेक-वैराग्यसे युक्त होकर तत्त्वको जानना चाहता है (इसी अध्यायके उन्नीसवेंसे चौतीसवें श्लोकतक)।

विचार करके देखा जाय तो आजकल आध्यात्मिक जिज्ञासाकी कमी और भोगासक्तिकी बहुलताके कारण विवेकप्रधान जिज्ञासु बहुत कम देखनेमें आते हैं। ऐसे साधकोंके लिये भक्तिरूप साधन बहुत उपयोगी है। अतः यहाँ भक्तिका वर्णन करना युक्तिसंगत प्रतीत होता है।

उपाय —केवल भगवान्को ही अपना मानना और भगवान्का ही आश्रय लेकर ब्रह्म-विश्वासपूर्वक भगवनामका जप, कीर्तन, चिन्तन, स्मरण आदि करना ही भक्तिका सुगम उपाय है।

‘विविक्तदेशसेवित्वम्’ —‘में एकात्ममें रहकर परमात्मतत्त्वका चिन्तन करूँ, भजन-स्मरण करूँ, सत्-शास्त्रोंका स्वाध्याय करूँ, उस तत्त्वको गहरा उत्तरकर समझूँ, मेरी वृत्तियोंमें और मेरे साधनमें कोई भी विघ्न-बाधा न पड़े, मेरे साथ कोई न रहे और मैं किसीके साथ न रहूँ’—साधककी ऐसी स्वाभाविक अभिलाषाका नाम ‘विविक्तदेश-सेवित्व’ है। तात्पर्य यह हुआ कि साधककी रुचि तो एकात्ममें रहनेकी ही होनी चाहिये, पर ऐसा एकात्म न मिले तो मनमें किंचिन्मात्र भी विकार नहीं होना चाहिये। उसके मनमें यही विचार होना चाहिये कि संसारके संगका, संयोगका तो स्वतः ही वियोग हो रहा है और स्वरूपमें असंगता स्वतःसिद्ध है। इस स्वतःसिद्ध

असंगतामें संसारका संग, संयोग, सम्बन्ध कभी हो ही नहीं सकता। अतः संसारका संग कभी बाधक हो ही नहीं सकता।

केवल निर्जन वन आदिमें जाकर और अकेले पड़े रहकर यह मान लेना कि ‘में एकात्म स्थानमें हूँ’ वास्तवमें भूल ही है; क्योंकि सम्पूर्ण संसारका बीज यह शरीर तो साथमें है ही। जबतक इस शरीरके साथ सम्बन्ध है, तबतक सम्पूर्ण संसारके साथ सम्बन्ध बना ही हुआ है। अतः एकात्म स्थानमें जानेका लाभ तभी है, जब देहाभिमानके नाशका उद्देश्य मुख्य हो।

वास्तविक एकात्म वह है, जिसमें एक तत्त्वके सिवाय दूसरी कोई चीज न उत्पन्न हुई, न है और न होगी। जिसमें न इन्द्रियाँ हैं, न प्राण हैं, न मन है और न अन्तःकरण है। जिसमें न स्थूलशरीर है, न सूक्ष्मशरीर है और न कारणशरीर है। जिसमें न व्यष्टि शरीर है और न समष्टि संसार है। जिसमें केवल एक तत्त्व-ही-तत्त्व है अर्थात् एक तत्त्वके सिवाय और कुछ है ही नहीं। कारण कि एक परमात्मतत्त्वके सिवाय पहले भी कुछ नहीं था और अन्तमें भी कुछ नहीं रहेगा। बीचमें जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी प्रतीतिके द्वारा ही प्रतीत हो रहा है अर्थात् जिनसे संसार प्रतीत हो रहा है, वे इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदि भी स्वयं प्रतीति ही हैं। अतः प्रतीतिके द्वारा ही प्रतीति हो रही है। हमारा (स्वरूपका) सम्बन्ध शरीर और अन्तःकरणके साथ कभी हुआ ही नहीं; क्योंकि शरीर और अन्तःकरण प्रकृतिका कार्य है और स्वरूप सदा ही प्रकृतिसे अतीत है। इस प्रकार अनुभव करना ही वास्तवमें ‘विविक्तदेशसेवित्व’ है।

‘अरतिर्जनसंसदि’ —साधारण मनुष्य-समुदायमें प्रीति, रुचि न हो अर्थात् कहाँ क्या हो रहा है, कब क्या होगा, कैसे होगा आदि-आदि सांसारिक बातोंको सुननेकी कोई भी इच्छा न हो तथा समाचार सुनानेवाले लोगोंसे मिलें, कुछ समाचार प्राप्त करें—ऐसी किंचिन्मात्र भी इच्छा, प्रीति न हो। परन्तु हमारेसे कोई तत्त्वकी बात पूछना चाहता है, साधनके विषयमें चर्चा करना चाहता है, उससे मिलनेके लिये मनमें जो इच्छा होती है, वह ‘अरतिर्जनसंसदि’ नहीं है। ऐसे ही जहाँ तत्त्वकी बात होती हो, आपसमें तत्त्वका विचार होता हो अथवा हमारी दृष्टिमें कोई परमात्मतत्त्वको जाननेवाला हो, ऐसे पुरुषोंके संगकी जो रुचि होती है, वह जनसमुदायमें रुचि नहीं

१-श्रीचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः। ( योगदर्शन २। ३२ )

२-ईश्वरप्रणिधानान्ना। ( योगदर्शन १। २३ )

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

कहलाती, प्रत्युत वह तो आवश्यक है। कहा भी गया है— संगः सर्वात्मना त्याज्यः स चेत्यक्तुं न शक्यते। स सद्धिः सह कर्तव्यः सतां संगो हि भेषजम्॥ (मार्कण्डेयपुराण ३७। २३)

अर्थात् आसक्तिपूर्वक किसीका भी संग नहीं करना चाहिये; परन्तु अगर ऐसी असंगता न होती हो, तो श्रेष्ठ पुरुषोंका संग करना चाहिये। कारण कि श्रेष्ठ पुरुषोंका संग असंगता प्राप्त करनेकी ओषध है।

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।

एतद्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥

अध्यात्मज्ञान- नित्यत्वम् | = अध्यात्मज्ञानमें नित्य-निरन्तर रहना, | एतत् | = —यह (पूर्वीक बीस साधन-समुदाय) तो | यत् | = जो ---|---|---|---|---|--- तत्त्वज्ञानार्थ- दर्शनम् | = तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सब जगह | ज्ञानम् | = ज्ञान है (और) | अन्यथा | = विपरीत है, | | | | अज्ञानम् | = वह अज्ञान है— | | | | इति | = ऐसा | | | | प्रोक्तम् | = कहा गया है।

व्याख्या —‘अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् ’—सम्पूर्ण शास्त्रोंका तात्पर्य मनुष्यको परमात्माकी तरफ लगानेमें, परमात्म-प्राप्ति करानेमें है—ऐसा निश्चय करनेके बाद परमात्मतत्त्व जितना समझमें आया है, उसका मनन करे। युक्ति-प्रयुक्तिये देखा जाय तो परमात्मतत्त्व भावरूपसे पहले भी था, अभी भी है और आगे भी रहेगा। परन्तु संसार पहले भी नहीं था और आगे भी नहीं रहेगा तथा अभी भी प्रतिक्षण अभवमें जा रहा है। संसारकी तो उत्पत्ति और विनाश होता है, पर उसका जो आधार, प्रकाशक है, वह परमात्मतत्त्व नित्य-निरन्तर रहता है। उस परमात्मतत्त्वके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। परमात्माकी सत्तासे ही संसार सत्तावाला दीखता है। इस प्रकार संसारकी स्वतन्त्र सत्ताके अभवका और परमात्माकी सत्ताका नित्य-निरन्तर मनन करते रहना ‘अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् ’ है।

उपाय —आध्यात्मिक ग्रन्थोंका पठन-पाठन, तत्त्वज्ञ महापुरुषोंसे तत्त्वज्ञान-विषयक श्रवण और प्रश्नोत्तर करना। ‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ’—तत्त्वज्ञानका अर्थ है— परमात्मा। उस परमात्माका ही सब जगह दर्शन करना, उसका ही सब जगह अनुभव करना ‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ’ है। वह परमात्मा सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है। एकान्तमें अथवा व्यवहारमें, सब समय साधककी दृष्टि, उसका लक्ष्य केवल उस परमात्मापर ही रहे। एक परमात्माके सिवाय उसको दूसरी कोई सत्ता

दीखे ही नहीं। सब जगह, सब समय समभावसे परिपूर्ण परमात्माको ही देखनेका उसका स्वभाव बन जाय—यही ‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ’ है। इसके सिद्ध होनेपर साधकको परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।

एतद्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ’—‘अमानित्वम् ’ से लेकर ‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ’ तक ये जो बीस साधन कहे गये हैं, ये सभी साधन देहाभिमान मिटानेवाले होनेसे और परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें सहायक होनेसे ‘ज्ञान’ नामसे कहे गये हैं। इन साधनोंसे विपरीत मानित्व, दम्भित्व, हिंसा आदि जितने भी दोष हैं, वे सभी देहाभिमान बढ़ानेवाले होनेसे और परमात्मतत्त्वसे विमुख करनेवाले होनेसे ‘अज्ञान’ नामसे कहे गये हैं।

विशेष बात

यदि साधकमें इतना तीव्र विवेक जाग्रत् हो जाय कि वह शरीरसे माने हुए सम्बन्धका त्याग कर सके, तो उसमें यह साधन-समुदाय स्वतः प्रकट हो जाता है। फिर उसको इन साधनोंका अलग-अलग अनुष्ठान करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। विनाशी शरीरको अपने अविनाशी स्वरूपसे अलग देखना मूल साधन है। अतः सभी साधकोंको चाहिये कि वे शरीरको अपनेसे अलग अनुभव करें, जो कि वास्तवमें अलग ही है!

पूर्वीक किसी भी साधनका अनुष्ठान करनेके लिये मुख्यतः दो बातोंकी आवश्यकता है—(१) साधकका

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

८८९

उद्देश्य केवल परमात्माको प्राप्त करना हो और (२) शास्त्रोंको पढ़ते-सुनते समय यदि विवेकद्वारा शरीरको अपनेसे अलग समझ ले, तो फिर दूसरे समयमें भी उसी विवेकपर स्थिर रहे। इन दो बातोंके दृढ़ होनेसे साधन-समुदायके सभी साधन सुगम हो जाते हैं।

शरीर तो बदल गया, पर मैं वही हूँ, जो कि बचपनमें था—यह सबके अनुभवकी बात है। अतः शरीरके साथ अपना सम्बन्ध वास्तविक न होकर केवल माना हुआ है—ऐसा निश्चय होनेपर ही वास्तविक साधन आरम्भ होता है। साधककी बुद्धि जितने अंशमें परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको धारण करती है, उतने ही अंशमें उसमें विवेककी जागृति तथा संसारसे वैराग्य हो जाता है। भगवान्ने विवेक और वैराग्यको पुष्ट करनेके लिये ज्ञानके आवश्यक साधनोंका वर्णन किया है।

जब मनुष्यका उद्देश्य परमात्मप्राप्ति करना ही हो जाता है, तब दुर्गुणों एवं दुराचारोंकी जड़ कट जाती है, चाहे साधकको इसका अनुभव हो या न हो! जैसे वृक्षकी जड़ कटनेपर भी बड़ी टहनीपर लगे हुए पत्ते कुछ दिनतक हरे दीखते हैं; किन्तु वास्तवमें उन पत्तोंके हरेपनकी भी

जड़ कट चुकी है। इसलिये कुछ दिनोंके बाद कटी हुई टहनीके पत्तोंका हरापन मिट जाता है। ऐसे ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका दृढ़ उद्देश्य होते ही दुर्गुण-दुराचार मिट जाते हैं। यद्यपि साधकको आरम्भमें ऐसा अनुभव नहीं होता और उसको अपनेमें अवगुण दीखते हैं, तथापि कुछ समयके बाद उनका सर्वथा अभाव दीखने लग जाता है।

साधन करते समय कभी-कभी साधकको अपनेमें दुर्गुण दिखायी दे सकते हैं। परन्तु वास्तवमें साधनमें लगनेसे पहले उसमें जो दुर्गुण रहे थे, वे ही जाते हुए दिखायी देते हैं। यह नियम है कि दरवाजेसे आनेवाले और जानेवाले—दोनों ही दिखायी देते हैं। यदि साधन करते समय अपनेमें दुर्गुण बढ़ते हुए दीखते हों, तो समझना चाहिये कि दुर्गुण आ रहे हैं। परन्तु यदि अपनेमें दुर्गुण कम होते हुए दीखते हों, तो समझना चाहिये कि दुर्गुण जा रहे हैं। ऐसी अवस्थामें साधकको निराश नहीं होना चाहिये, प्रत्युत अपने उद्देश्यपर दृढ़ रहकर तत्परतापूर्वक साधनमें लगे रहना चाहिये। इस प्रकार साधनमें लगे रहनेसे दुर्गुण-दुराचारोंका सर्वथा अभाव हो जाता है।

परिशिष्ट भाव —क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विभागका ज्ञान करानेमें हेतु होनेसे इन बीस साधनोंको ‘ज्ञान’ नामसे कहा गया है। इससे जो विपरीत है, वह अज्ञान है। साधन न करनेसे मनुष्य ज्ञानकी बातें तो सीख लेता है, पर अनुभव नहीं कर सकता। अतः साधन न करनेसे अज्ञान (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञको एक देखना) रहता है और अज्ञानके रहते हुए अगर कोई सीखकर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागका विवेचन करता है तो वह वास्तवमें देहाभिमानको ही पुष्ट करता है। परन्तु जो ये साधन करता है, उसमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विभाग करनेकी योग्यता आ जाती है।

सम्बन्ध—पूर्वोक्त ज्ञान-(साधन-समुदाय-) के द्वारा जिसको जाना जाता है, उस साध्य-तत्त्वका अब ‘ज्ञेय’ नामसे वर्णन आरम्भ करते हैं।

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ञात्त्वामृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥

यत्= जोज्ञात्वा= जानकर (मनुष्य)तत्= उसको
ज्ञेयम्= ज्ञेय (पूर्वोक्त ज्ञानसे जाननेयोग्य) है,अमृतम्= अमरताका= न
तत्= उस (परमात्मतत्त्व) कोअश्नुते= अनुभव कर लेता है।सत्= सत्
प्रवक्ष्यामि= मैं अच्छी तरहसे कहूँगा,अनादिमत्= (वह ज्ञेय-तत्त्व) अनादिवालाउच्यते= कहा जा सकता है (और)
यत्= जिसकोपरम्= (और) परमन, असत्= न असत् ही (कहा जा सकता है)।
ब्रह्म= ब्रह्म है।

८८२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

व्याख्या —[ इस श्लोकमें भगवान्ने 'प्रवक्ष्यामि' पदसे ज्ञेय तत्त्वका वर्णन करनेके लिये प्रतिज्ञा की है, 'अमृतमश्नुते' पदसे उसे जाननेका फल बताया है, 'अनादिमत्' पदसे उसका लक्षण बताया है, 'परं ब्रह्म' पदोंसे उसका नाम बताया है, और 'न सत्तनासदुच्यते' पदोंसे उसका वर्णन किया है। ]

'ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि' —भगवान् यहाँ ज्ञेय तत्त्वके वर्णनका उपक्रम करते हुए प्रतिज्ञा करते हैं कि जिसकी प्राप्तिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है, जिसका वर्णन उपनिषदों, शास्त्रों और ग्रन्थोंमें किया गया है, उस प्रापणीय ज्ञेय तत्त्वका मैं अच्छी तरहसे वर्णन करूँगा।

'ज्ञेयम्' (अवश्य जाननेयोग्य) कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें जितने भी विषय, पदार्थ, विद्यार्थ, कलाएँ आदि हैं, वे सभी अवश्य जाननेयोग्य नहीं हैं। अवश्य जाननेयोग्य तो एक परमात्मा ही है। कारण कि सांसारिक विषयोंको कितना ही जान लें, तो भी जानना बाकी ही रहेगा। सांसारिक विषयोंकी जानकारीसे जन्म-मरण भी नहीं मिटेगा। परन्तु परमात्माको तत्त्वसे ठीक जान लेनेपर जानना बाकी नहीं रहेगा और जन्म-मरण भी मिट जायगा। अतः संसारमें परमात्माके सिवाय जाननेयोग्य दूसरा कोई है ही नहीं।

'यन्ज्ञात्वामृतमश्नुते' —उस ज्ञेय तत्त्वको जाननेपर अमरताका अनुभव हो जाता है अर्थात् स्वतःसिद्ध तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है, जिसकी प्राप्ति होनेपर जानना, करना, पाना आदि कुछ भी बाकी नहीं रहता।

वास्तवमें स्वयं पहलेसे ही अमर है, पर उसने मरणशील शरीरादिके साथ एकता करके अपनेको जन्मने-मरनेवाला मान लिया है। परमात्मतत्त्वको जाननेसे यह भूल मिट जाती है और वह अपने वास्तविक स्वरूपको पहचान लेता है अर्थात् अमरताका अनुभव कर लेता है।

'अनादिमत्' —उससे यावन्मात्र संसार उत्पन्न होता है, उसीमें रहता है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है। परन्तु वह आदि, मध्य और अन्तमें ज्यों-का-त्यों विद्यमान रहता है। अतः वह 'अनादि' कहा जाता है।

'परं ब्रह्म' —'ब्रह्म' प्रकृतिको भी कहते हैं, वेदको

परिशिष्ट भाव —परमात्मतत्त्वको 'ज्ञेय' कहनेका तात्पर्य है कि वह तत्त्व जाननेयोग्य है, उसको जानना चाहिये और वह जाननेमें शक्य है अर्थात् जाना जा सकता है। वास्तवमें वह तत्त्व जाननेमें आता नहीं है; क्योंकि प्रकृतिसे अतीत होनेके कारण वह प्रकृतिकी पकड़में नहीं आता। परन्तु वह स्वयंसे प्राप्त किया जा सकता है।

भी कहते हैं, पर 'परम ब्रह्म' तो एक परमात्मा ही है। जिससे बढ़कर दूसरा कोई व्यापक, निर्विकार, सदा रहनेवाला तत्त्व नहीं है, वह 'परम ब्रह्म' कहा जाता है।

'न सत्तनासदुच्यते' —उस तत्त्वको 'सत्' भी नहीं कह सकते और 'असत्' भी नहीं कह सकते। कारण कि असत्की भावना-(सत्ता-) के बिना उस परमात्मतत्त्वमें सत् शब्दका प्रयोग नहीं होता, इसलिये उसको 'सत्' नहीं कह सकते और उस परमात्मतत्त्वका कभी अभाव नहीं होता, इसलिये उसको 'असत्' भी नहीं कह सकते। तात्पर्य है कि उस परमात्मतत्त्वमें सत्-असत् शब्दोंकी अर्थात् वाणीकी प्रवृत्ति होती ही नहीं—ऐसा वह करण-निरपेक्ष तत्त्व है।

जैसे पृथ्वीपर रात और दिन—ये दो होते हैं। इनमें भी दिनके अभावको 'रात' और रातके अभावको 'दिन' कह देते हैं। परन्तु सूर्यमें रात और दिन—ये दो भेद नहीं होते। कारण कि रात तो सूर्यमें है ही नहीं और रातका अत्यन्त अभाव होनेसे सूर्यमें दिन भी नहीं कह सकते; क्योंकि 'दिन' शब्दका प्रयोग रातकी अपेक्षासे किया जाता है। यदि रातकी सत्ता न रहे तो न दिन कह सकते हैं, न रात। ऐसे ही सत्की अपेक्षासे 'असत्' शब्दका प्रयोग होता है और असत्की अपेक्षासे 'सत्' शब्दका प्रयोग होता है। जहाँ परमात्माको 'सत्' कहा जाता है, वहाँ असत्की अपेक्षासे ही कहा जाता है। परन्तु जहाँ असत्का अत्यन्त अभाव है, वहाँ परमात्माको 'सत्' नहीं कह सकते और जो परमात्मा निरन्तर सत् है, उसको 'असत्' नहीं कह सकते। अतः परमात्मामें सत् और असत्—इन दोनों शब्दोंका प्रयोग नहीं होता। जैसे सूर्य दिन-रात दोनोंसे विलक्षण केवल प्रकाशरूप है, ऐसे ही वह ज्ञेय तत्त्व सत्-असत् दोनोंसे विलक्षण है*।

दूसरी बात, सत्-असत्का निर्णय बुद्धि करती है और ऐसा कहना भी वहीं होता है, जहाँ वह मन, वाणी और बुद्धिका विषय होता है। परन्तु ज्ञेय तत्त्व मन, वाणी और बुद्धिसे सर्वथा अतीत है; अतः उसकी सत्-असत् संज्ञा नहीं हो सकती।

  • राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहं मोह निसा लवलेसा॥

सहज प्रकासरूप भगवाना। नहिं तहं पुनि बिग्यान बिहाना॥ (मानस १।११६।३)

श्लोक १३ ]

  • साधक-संजीवनी *

८८३

प्रकृति और पुरुष—दोनोंको अनादि कहा गया है (गीता—इसी अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक); अतः दोनोंका मालिक होनेसे परमात्माको यहाँ ‘अनादिमत्’ अर्थात् अनादिवाला कहा गया है*। सातवें अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें भगवान्ने अपना प्रकृतिको ‘इतीयं मे’ कहकर और परा प्रकृति (जीवात्मा)-को ‘मे पराम्’ कहकर दोनोंको अपने अधीन बताया है; अतः दोनोंके मालिक भगवान् ही हुए। उपनिषद्में भी आया है—

क्षरं प्रधानममुताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। (श्वेताश्वतर० १।१०)

‘प्रकृति तो क्षर (परिवर्तनशील) है और इसको भोगनेवाला पुरुष (जीवात्मा) अमृतस्वरूप अक्षर (अपरिवर्तनशील) है। इन दोनों (प्रकृति और पुरुष)-को एक ईश्वर अपने शासनमें रखता है।’

गीतामें एक ही समग्र परमात्माका तीन प्रकारसे वर्णन आया है—

(१) परमात्मा सत् भी हैं और असत् भी हैं—‘सदसच्चाहम्’ (९।१९)।

(२) परमात्मा सत् भी हैं, असत् भी हैं और सत्-असत्से पर भी हैं—‘सदसत्तत्परं यत्’ (११।३७)।

(३) परमात्मा न सत् हैं और न असत् ही हैं—‘न सत्तनासदुच्यते’ (१३।१२)।

—इसका तात्पर्य है कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय कुछ भी नहीं है। वह मन, बुद्धि और वाणीसे सर्वथा अतीत है, इसलिये उसका वर्णन नहीं किया जा सकता, पर उसको प्राप्त किया जा सकता है।

वास्तवमें परमात्मतत्त्वका वर्णन शब्दोंसे नहीं कर सकते। उसको असत्की अपेक्षासे सत्, विकारकी अपेक्षासे निर्विकार, एकदेशीयकी अपेक्षासे सर्वदेशीय कह देते हैं, पर वास्तवमें उस तत्त्वमें सत्, निर्विकार आदि शब्द लागू होते ही नहीं। कारण कि सभी शब्दोंका प्रयोग सापेक्षतासे और प्रकृतिके सम्बन्धसे होता है, पर तत्त्व निरपेक्ष और प्रकृतिसे अतीत है। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, गुण आदिको लेकर ही संज्ञा बनती है। परमात्मामें देश, काल आदि हैं ही नहीं, फिर उनकी संज्ञा कैसे? इसलिये यहाँ आया है कि उस तत्त्वको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है।

परमात्मतत्त्वका आदि (आरम्भ) नहीं है। जो सदासे है, उसका आदि कैसे? सब अपर हैं, वह पर है। वह न सत् है, न असत्। आदि-अनादि, पर-अपर और सत्-असत्का भेद प्रकृतिके सम्बन्धसे है। वह तत्त्व तो आदि-अनादि पर-अपर और सत्-असत्से विलक्षण है। इस प्रकार भगवान्ने ज्ञेय-तत्त्वका वर्णन करनेकी जो बात कही है, वह वास्तवमें वर्णन नहीं है, प्रत्युत लक्षक अर्थात् लक्ष्यकी तरफ दृष्टि करानेवाला है। इसका तात्पर्य ज्ञेय-तत्त्वका लक्ष्य करानेमें है, कोरा वर्णन करनेमें नहीं। इसलिये साधकको भी लक्षककी दृष्टिसे ही विचार करना चाहिये, केवल सीखनेकी दृष्टिसे नहीं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें ‘वह तत्त्व न सत् कहा जा सकता है, न असत्’—ऐसा कहकर ज्ञेय तत्त्वका निर्गुण-निराकाररूपसे वर्णन किया। अब आगेके श्लोकमें उसी ज्ञेय तत्त्वका सगुण-निराकाररूपसे वर्णन करते हैं।

सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।

सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥

तत्= वे (परमात्मा)सर्वतोऽक्षि-कानोंवाले हैं।
सर्वतःपाणि-शिरोमुखम्= सब जगह नेत्रों,लोके = (वे) संसारमें
पादम्= सब जगहसिरों और मुखोंवालेसर्वम् = सबको
हाथों और(तथा)आवृत्य = व्याप्त करके
पैरोंवाले,सर्वतःश्रुतिम्= सब जगहतिष्ठति = स्थित हैं।
  • ‘अनादिमत्परं ब्रह्म’ पदोंका ऐसा अर्थ भी ले सकते हैं—‘अनादि, मत्परं ब्रह्म’ अर्थात् ब्रह्म मेरे परायण (आश्रित) है—‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्’ (गीता १३।२७)

८८४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

व्याख्या—‘सर्वतः पाणिपादं तत्’ —जैसे स्याहीमें सब जगह सब तरहकी लिपियाँ विद्यमान हैं; अतः लेखक स्याहीसे सब तरहकी लिपियाँ लिख सकता है। सोनेमें सब जगह सब तरहके गहने विद्यमान हैं; अतः सुनार सोनेमें किसी भी जगहसे जो गहना बनाना चाहे, बना सकता है। ऐसे ही भगवान्के सब जगह ही हाथ और पैर हैं; अतः भक्त भक्तिसे जहाँ-कहीं जो कुछ भी भगवान्के हाथोंमें देना चाहता है, अर्पण करना चाहता है, उसको ग्रहण करनेके लिये उसी जगह भगवान्के हाथ मौजूद हैं। भक्त बाहरसे अर्पण करना चाहे अथवा मनसे, पूर्वमें देना चाहे अथवा पश्चिममें, उत्तरमें देना चाहे अथवा दक्षिणमें, उसे ग्रहण करनेके लिये वहाँ भगवान्के हाथ मौजूद हैं। ऐसे ही भक्त जलमें, स्थलमें, अग्निमें, जहाँ-कहीं जिस किसी भी संकटमें पड़नेपर भगवान्को पुकारता है, उसकी रक्षा करनेके लिये वहाँ ही भगवान्के हाथ तैयार हैं अर्थात् भगवान् वहाँ ही अपने हाथोंसे उसकी रक्षा करते हैं।

भक्त जहाँ-कहीं भगवान्के चरणोंमें चन्दन लगाना चाहता है, पुष्प चढ़ाना चाहता है, नमस्कार करना चाहता है, उसी जगह भगवान्के चरण मौजूद हैं। हजारों-लाखों भक्त एक ही समयमें भगवान्के चरणोंकी अलग-अलग पूजा करना चाहें, तो उनके भावके अनुसार वहाँ ही भगवान्के चरण मौजूद हैं।

‘सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्’ —भक्त भगवान्को जहाँ दीपक दिखाता है, आरती करता है, वहाँ ही भगवान्के नेत्र हैं। भक्त जहाँ शरीरसे अथवा मनसे नृत्य करता है, वहाँ ही भगवान् उसके नृत्यको देख लेते हैं। तात्पर्य है कि जो भगवान्को सब जगह देखता है, भगवान् भी उसकी दृष्टिसे कभी ओझल नहीं होते (गीता—छठे अध्यायका तीसवों श्लोक)।

भक्त जहाँ भगवान्के मस्तकपर चन्दन लगाना चाहे, पुष्प चढ़ाना चाहे, वहाँ ही भगवान्का मस्तक है।

भक्त जहाँ भगवान्को भोग लगाना चाहे, वहाँ ही भगवान्का मुख है अर्थात् भक्तद्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए

परिशिष्ट भाव —परमात्मामें सब जगह सब कुछ है। जैसे, कलम और स्याहीमें किस जगह कौन-सी लिपि नहीं है? जानकार आदमी उस एक ही कलम और स्याहीसे अनेक लिपियाँ लिख देता है। सोनेकी डलीमें किस जगह कौन-सा गहना नहीं है? सुनार उस एक डलीमेंसे कड़ा, कण्ठी, हार, नथ आदि अनेक गहने निकाल लेता है। इसी तरह लोहेमें किस जगह कौन-सा औजार अथवा अस्त्र-शस्त्र नहीं है? मिट्टी और पत्थरमें किस जगह कौन-सी मूर्ति नहीं है? ऐसे ही परमात्मामें किस जगह क्या नहीं है? परमात्मासे ही यह सब सृष्टि पैदा हुई है, उसीमें स्थित रहती है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाती है। पहले भी वही है, पीछे भी वही है, फिर बीचमें दूसरी चीज कैसे आये? कहाँसे आये? इस बातको

पदार्थको भगवान् वहाँ ही खा लेते हैं (गीता—नवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)।

‘सर्वतःश्रुतिमत्’ —भक्त जहाँ-कहीं जोरसे बोलकर प्रार्थना करे, धीरेसे बोलकर प्रार्थना करे अथवा मनसे प्रार्थना करे, वहाँ ही भगवान् अपने कानोंसे सुन लेते हैं।

मनुष्योंके सब अवयव (अंग) सब जगह नहीं होते अर्थात् जहाँ नेत्र हैं, वहाँ कान नहीं होते और जहाँ कान हैं, वहाँ नेत्र नहीं होते; जहाँ हाथ हैं, वहाँ पैर नहीं होते और जहाँ पैर हैं, वहाँ हाथ नहीं होते इत्यादि। परन्तु भगवान्की इन्द्रियाँ, उनके अवयव सब जगह हैं। अतः भगवान् नेत्रोंसे सुन भी सकते हैं, बोल भी सकते हैं, ग्रहण भी कर सकते हैं इत्यादि। तात्पर्य है कि वे सभी अवयवोंसे सभी क्रियाएँ कर सकते हैं; क्योंकि उनके सभी अवयवोंमें सभी अवयव मौजूद हैं। उनके छोटे-से-छोटे अंशमें भी सब-की-सब इन्द्रियाँ हैं।

भगवान्के सब जगह हाथ, पैर, नेत्र, सिर, मुख और कान कहनेका तात्पर्य है कि भगवान् किसी भी प्राणीसे दूर नहीं हैं। कारण कि भगवान् सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें परिपूर्णरूपसे विद्यमान हैं। संतोने कहा है—

चहुँ दिसि आरति चहुँ दिसि पूजा।

चहुँ दिसि राम और नहि दूजा॥

संसारी आदमीको जैसे बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे सब जगह संसार-ही-संसार दीखता है, संसारके सिवाय दूसरा कुछ दीखता ही नहीं, ऐसे ही परमात्माको तत्त्वसे जाननेवाले पुरुषको सब जगह परमात्मा-ही-परमात्मा दीखते हैं।

‘लोकैः सर्वमावृत्य तिष्ठति’ —अनन्त सृष्टियाँ हैं, अनन्त ब्रह्माण्ड हैं, अनन्त ऐश्वर्य हैं और उन सबमें देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदि भी अनन्त हैं, वे सभी परमात्माके अन्तर्गत हैं। परमात्मा उन सबको व्याप्त करके स्थित हैं। दसवें अध्यायके बयालीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है कि मैं सारे संसारको एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हूँ।

श्लोक १४ ]

  • साधक-संजीवनी *

८८५

साधक दृढ़तासे स्वीकार कर ले तो फिर परमात्मा दीखने लग जायगा; क्योंकि वास्तवमें हैं ही वही, दूसरी चीज है ही नहीं! भगवान् कहते हैं—

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥

(श्रीमद्भागवतम् ११.११.३२)

‘सृष्टिसे पहले भी मैं ही विद्यमान था, मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं था और सृष्टि उत्पन्न होनेके बाद जो कुछ भी यह संसार दीखता है, वह भी मैं ही हूँ। सत्, असत् तथा सत्-असत्से परे जो कुछ कल्पना की जा सकती है, वह भी मैं ही हूँ। सृष्टिके सिवाय भी जो कुछ है, वह मैं ही हूँ और सृष्टिका नाश होनेपर जो शेष रहता है, वह भी मैं ही हूँ।’ तात्पर्य है कि सत्ता एक ही है। इन्द्रोंमें उलझे रहनेके कारण उसका अनुभव नहीं होता।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें सगुण-निराकारका वर्णन करके अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसकी विलक्षणता, सर्वव्यापकता और सर्वसमर्थताका वर्णन करते हैं।

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। असक्तं सर्वभूच्छैव निर्गुणं गुणभोक्तं च॥ १४॥

सर्वेन्द्रियविवर्जितम् = वे(परमात्मा) सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं (और) | असक्तम् = आसक्तिरहित हैं च = और | च, एव = तथा निर्गुणम् = गुणोंसे रहित हैं (और) ---|---|--- सर्वेन्द्रियगुणाभासम् = सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं; | सर्वभूत् = सम्पूर्ण संसारका भरण-पोषण करनेवाले हैं | गुणभोक्तं = सम्पूर्ण गुणोंके भोक्ता हैं।

व्याख्या—‘सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्’— पहले परमात्मा हैं, फिर परमात्माकी शक्ति प्रकृति है। प्रकृतिका कार्य महत्त्व, महत्त्वका कार्य अहंकार, अहंकारका कार्य पंचमहाभूत, पंचमहाभूतोंका कार्य मन एवं दस इन्द्रियाँ और दस इन्द्रियोंका कार्य पाँच विषय—ये सभी प्रकृतिके कार्य हैं। परमात्मा प्रकृति और उसके कार्यसे अतीत हैं। वे चाहे सगुण हों या निर्गुण, साकार हों या निराकार, सदा प्रकृतिसे अतीत ही रहते हैं। वे अवतार लेते हैं, तो भी प्रकृतिसे अतीत ही रहते हैं। अवतारके समय वे प्रकृतिको अपने वशमें करके प्रकट होते हैं। जो अपनेको गुणोंमें लिप्त, गुणोंसे बँधा हुआ मानकर

जन्मा-मरता था, वह बड़ा जीव भी जब परमात्माको प्राप्त होनेपर गुणातीत (गुणोंसे रहित) कहा जाता है, तो फिर परमात्मा गुणोंमें बद्ध कैसे हो सकते हैं? वे तो सदा ही गुणोंसे अतीत (रहित) हैं। अतः वे प्राकृत इन्द्रियोंसे रहित हैं अर्थात् संसारी जीवोंकी तरह हाथ, पैर, नेत्र, सिर, मुख, कान आदि इन्द्रियोंसे युक्त नहीं हैं; किन्तु उन-उन इन्द्रियोंके विषयोंको ग्रहण करनेमें सर्वथा समर्थ हैं। जैसे— वे कानोंसे रहित होनेपर भी भक्तोंकी पुकार सुन लेते हैं, त्वचासे रहित होनेपर भी भक्तोंका आलिंगन करते हैं, नेत्रोंसे रहित होनेपर भी प्राणिमात्रको निरन्तर देखते रहते हैं, रसनासे रहित होनेपर भी भक्तोंके द्वारा लगाये हुए भोगका आस्वादन

१-विषयोंका ज्ञान इन्द्रियोंसे ही होता है। इन्द्रियाँ ही विषयोंको प्रकाशित करती हैं। इसलिये विषय इन्द्रियोंका कार्य हैं। २-(१) अपाणिपादो जवनो ग्रीहाता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। (श्वेताश्वतरोपनिषद् ३।१९) ‘वे परमात्मा हाथ-पैरोंसे रहित होनेपर भी ग्रहण करनेमें समर्थ तथा वेगपूर्वक चलनेवाले हैं। वे नेत्रोंके बिना ही देखते हैं और कानोंके बिना ही सुनते हैं।’ (२) बिनु पद चलद् सुनद् बिनु काना। कर बिनु करम करद् बिधि नाना॥ आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥ तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहद् ग्रान बिनु बास असेषा॥ (मानस १।११८।३-४)

८८६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

करते हैं, आदि-आदि। इस तरह ज्ञानेन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी परमात्मा शब्द, स्पर्श आदि विषयोंको ग्रहण करते हैं। ऐसे ही वे वाणीसे रहित होनेपर भी अपने प्यारे भक्तोंसे बातें करते हैं, चरणोंसे रहित होनेपर भी भक्तके पुकारनेपर दौड़कर चले आते हैं, हाथोंसे रहित होनेपर भी भक्तके दिये हुए उपहारको ग्रहण करते हैं, आदि-आदि। इस तरह कर्मेन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी परमात्मा कर्मेन्द्रियोंका सब कार्य करते हैं। यही इन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी भगवान्का इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करना है।

‘असक्तं सर्वभूच्छेव’ —भगवान्का सभी प्राणियोंमें अपनापन, प्रेम है, पर किसी भी प्राणीमें आसक्ति नहीं है। आसक्ति न होनेपर भी वे ब्रह्मासे चींटीपर्यन्त सम्पूर्ण प्राणियोंका पालन-पोषण करते हैं। जैसे माता-पिता अपने बालकका पालन-पोषण करते हैं, उससे कई गुना अधिक पालन-पोषण भगवान् प्राणियोंका करते हैं। कौन प्राणी

कहाँ है और किस प्राणीको कब किसी वस्तु आदिकी जरूरत पड़ती है, इसको पूरी तरह जानते हुए भगवान् उस वस्तुको आवश्यकतानुसार यथोचित रीतिसे पहुँचा देते हैं। प्राणी पृथ्वीपर हो, समुद्रमें हो, आकाशमें हो अथवा स्वर्गमें हो अर्थात् त्रिलोकियोंमें कहीं भी कोई छोटा-से-छोटा अथवा बड़ा-से-बड़ा प्राणी हो, उसका पालन-पोषण भगवान् करते हैं। प्राणिमात्रके सुहृद् होनेसे वे अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंके द्वारा पाप-पुण्योंका नाश करके प्राणिमात्रको शुद्ध, पवित्र करते रहते हैं।

‘निर्गुणं गुणभोक्तुं च’ —वे परमात्मा सम्पूर्ण गुणोंसे रहित होनेपर भी सम्पूर्ण गुणोंके भोक्ता हैं। तात्पर्य है कि जैसे माता-पिता बालककी मात्र क्रियाओंको देखकर प्रसन्न होते हैं, ऐसे ही परमात्मा भक्तके द्वारा की हुई मात्र क्रियाओंको देखकर प्रसन्न होते हैं, अर्थात् भक्तलोग जो भी क्रियायें करते हैं, उन सब क्रियाओंके भोक्ता भगवान् ही बनते हैं।

परिशिष्ट भाव —इस प्रकरणमें ब्रह्मकी मुख्यता होनेपर भी प्रस्तुत श्लोकमें ‘समग्र’ परमात्माका वर्णन हुआ है। यह समग्र ही ज्ञेय-तत्त्व है। अतः समग्रकी मुख्यता ज्ञान और भक्ति—दोनोंमें है—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९), ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (छान्दोग्य० ३।१४।१)

इस श्लोकका तात्पर्य है कि एक परमात्माके सिवाय और किसीकी भी सत्ता नहीं है। हम जो कुछ भी कहेंगे, वह परमात्मासे अलग नहीं है। सबसे रहित भी वही है और सबके सहित भी वही है।

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।

सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥

तत्= वे (परमात्मा)(प्राणियोंके रूपमें)(वे ही हैं)
भूतानाम्= सम्पूर्ण प्राणियोंकेएव= भी (वे ही हैं)
बहिः, अन्तः= बाहर-भीतर (परिपूर्ण हैं)= एवं
= औरदूरस्थम्= दूर-से-दूर
चरम्, अचरम्= चर-अचर= तथा
अन्तिके= नजदीक-से-नजदीक भी
= और
तत्= वे
सूक्ष्मत्वात्= अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे
अविज्ञेयम्= जाननेमें नहीं आते।

व्याख्या —[ज्ञेय तत्त्वका वर्णन बारहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक—कुल छः श्लोकोंमें हुआ है। उनमेंसे यह पन्द्रहवाँ श्लोक चौथा है। इस श्लोकके अन्तर्गत पहलेके तीन श्लोकोंका और आगेके दो श्लोकोंका भाव भी आ गया है। अतः यह श्लोक इस प्रकरणका सार है।]

‘बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च’ —जैसे बर्फके बने हुए घड़ोंको समुद्रमें डाल दिया जाय तो उन घड़ोंके बाहर भी जल है, भीतर भी जल है और वे खुद भी (बर्फके बने होनेसे) जल ही हैं। ऐसे ही सम्पूर्ण चर-अचर प्राणियोंके बाहर भी परमात्मा हैं, भीतर भी परमात्मा हैं

श्लोक १५ ]

  • साधक-संजीवनी *

८८७

और वे खुद भी परमात्मस्वरूप ही हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे घड़ोंमें जलके सिवाय दूसरा कुछ नहीं है अर्थात् सब कुछ जल-ही-जल है, ऐसे ही संसारमें परमात्माके सिवाय दूसरा कोई तत्त्व नहीं है अर्थात् सब कुछ परमात्मा- ही-परमात्मा हैं। इसी बातको भगवान्ने महात्माओंकी दृष्टिसे 'वासुदेवः सर्वम्' (गीता ७।१९) और अपनी दृष्टिसे 'सदसच्चाहम्' (गीता ९।१९) कहा है।

'दूरस्थं चान्तिके च तत्'—किसी वस्तुका दूर और नजदीक होना तीन दृष्टियोंसे कहा जाता है—देशकृत, कालकृत और वस्तुकृत। परमात्मा तीनों ही दृष्टियोंसे दूर-से-दूर और नजदीक-से-नजदीक हैं; जैसे—दूर-से-दूर देशमें भी वे ही परमात्मा हैं और नजदीक-से-नजदीक देशमें भी वे ही परमात्मा हैं*; पहले-से-पहले भी वे ही परमात्मा थे, पीछे-से-पीछे भी वे ही परमात्मा रहेंगे और अब भी वे ही परमात्मा हैं; सम्पूर्ण वस्तुओंके पहले भी वे ही परमात्मा हैं, वस्तुओंके अन्तमें भी वे ही परमात्मा हैं और वस्तुओंके रूपमें भी वे ही परमात्मा हैं।

उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंके संग्रह और सुख-भोगकी इच्छा करनेवालेके लिये परमात्मा (तत्त्वतः समीप होनेपर भी) दूर हैं। परन्तु जो केवल परमात्माके ही सममुख है, उसके लिये परमात्मा नजदीक हैं। इसलिये साधकको सांसारिक भोग और संग्रहकी इच्छाका त्याग करके केवल परमात्म-प्राप्तिकी अभिलाषा जाग्रत करनी चाहिये। परमात्मप्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा होते ही परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् परमात्मासे नित्ययोगका अनुभव हो जाता है।

'सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयम्'—वे परमात्मा अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे इन्द्रियाँ और अन्तःकरणका विषय नहीं हैं अर्थात् वे परमात्मा इनकी पकड़में नहीं आते। अब प्रश्न उठता है कि जब जाननेमें नहीं आते, तो फिर उनका अभाव होगा? उनका अभाव नहीं है। जैसे परमाणुरूप जल सूक्ष्म होनेसे नेत्रोंसे नहीं दीखता, पर न दीखनेपर भी उसका

अभाव नहीं है। वह जल परमाणुरूपसे आकाशमें रहता है और स्थूल होनेपर बूँदें, ओले आदिके रूपमें दीखने लग जाता है। ऐसे ही परमात्मा अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिके द्वारा जाननेमें नहीं आते; क्योंकि वे इनसे परे हैं, अतीत हैं।

जीवोंके अज्ञानके कारण ही वे परमात्मा जाननेमें नहीं आते। जैसे, कहींपर 'श्रीमद्भगवद्गीता' शब्द लिखा हुआ है। जो पढ़ा-लिखा नहीं है, उसको तो केवल लकीरें ही दीखती हैं और जो पढ़-लिखा है, उसको 'श्रीमद्भगवद्गीता' दीखती है। संस्कृत पढ़े हुएको यह शब्द किस धातुसे बना हुआ है, इसका क्या अर्थ होता है—यह दीखने लग जाता है। गीताका मनन करनेवालेको गीताके गहरे भाव दीखने लग जाते हैं। ऐसे ही जिन मनुष्योंको परमात्मतत्त्वका ज्ञान नहीं है, उनको परमात्मा नहीं दीखते, उनके जाननेमें नहीं आते। परन्तु जिनको परमात्मतत्त्वका ज्ञान हो गया है, उनको तो सब कुछ परमात्मा-ही-परमात्मा दीखते हैं।

उस परमात्मतत्त्वको 'ज्ञेय' (इसी अध्यायका बारहवाँ और सत्रहवाँ श्लोक) भी कहा है और 'अविज्ञेय' भी कहा है। इसका तात्पर्य यह है कि वह स्वयंके द्वारा ही जाना जा सकता है, इसलिये वह 'ज्ञेय' है और वह इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिके द्वारा नहीं जाना जा सकता, इसलिये वह 'अविज्ञेय' है।

सर्वत्र परिपूर्ण परमात्माको जाननेके लिये यह आवश्यक है कि साधक परमात्माको सर्वत्र परिपूर्ण मान ले। ऐसा मानना भी जाननेकी तरह ही है। जैसे (बोध होनेपर) ज्ञान-(जानने-) को कोई मिटा नहीं सकता, ऐसे ही 'परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण है' इस मान्यता-(मानने-) को कोई मिटा नहीं सकता। जब सांसारिक मान्यताओं—'मैं ब्राह्मण हूँ', 'मैं साधु हूँ' आदिको (जो कि अवास्तविक हैं) कोई मिटा नहीं सकता, तब पारमार्थिक मान्यताओंको (जो कि

  • पृथ्वीसे दूर जल है, जलसे दूर तेज है, तेजसे दूर वायु है, वायुसे दूर आकाश है, आकाशसे दूर महत्तत्त्व है, महत्तत्त्वसे दूर प्रकृति है और प्रकृतिसे दूर परमात्मा हैं। इस तरह दूर-से-दूर परमात्मा हैं। दूर-से-दूर होते हुए भी वे परमात्मा व्यापकरूपसे सबमें हैं; क्योंकि परमात्मा सबके कारण हैं और कारण सब कार्यमें रहता है।

प्रकृतिसे नजदीक स्थूलशरीर है, स्थूलशरीरसे नजदीक सूक्ष्मशरीर है, सूक्ष्मशरीरसे नजदीक कारणशरीर है, कारणशरीरसे नजदीक अहम् है और अहम्से नजदीक परमात्मा है। इस तरह नजदीक-से-नजदीक परमात्मा हैं। परमात्मा जितने नजदीक हैं, उतना नजदीक दूसरा कोई भी नहीं है।

८८८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

वास्तविक हैं) कौन मिटा सकता है? तात्पर्य यह है कि दृढ़तापूर्वक मानना भी एक साधन है। जाननेकी तरह माननेकी भी बहुत महिमा है। 'परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण'

हैं'—ऐसा दृढ़तापूर्वक मान लेनेपर यह मान्यता मान्यता-रूपसे नहीं रहेगी, प्रत्युत इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे परे जो अत्यन्त सूक्ष्म परमात्मा हैं, उनका अनुभव हो जायगा।

परिशिष्ट भाव —परमात्माको बारहवें श्लोकमें 'ज्ञेय' कहा गया है। परन्तु इस श्लोकमें उनको 'अविज्ञेय' कहनेका तात्पर्य है कि परमात्मा ज्ञेय होनेपर भी संसारकी तरह ज्ञेय नहीं हैं। जैसे संसार इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे जाना जाता है, ऐसे परमात्मा इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे नहीं जाने जाते। इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि प्रकृतिके कार्य हैं और परमात्मा प्रकृतिसे अतीत हैं। प्रकृतिका कार्य प्रकृतिको भी पूरा नहीं जान सकता, फिर प्रकृतिसे अतीत परमात्माको जान ही कैसे सकता है? परमात्माको तो मानकर स्वीकार करना पड़ता है; क्योंकि स्वीकृति स्वयंमें होती है, करण (मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ)-में नहीं।* स्वयंकी परमात्माके साथ एकता है, इसलिये परमात्माकी प्राप्ति भी स्वीकृतिसे होती है, चिन्तन-मनन-वर्णन करनेसे नहीं। शरीर-संसारके साथ स्वयंकी एकता कभी हुई नहीं, है नहीं, होगी नहीं और हो सकती भी नहीं। परमात्मासे स्वयं कभी अलग हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं।

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।

भूतभर्तृ च तज्ञ्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १६ ॥

तत्= वे (परमात्मा)इव= तरहउत्पन्न करनेवाले
अविभक्तम्= (स्वयं) विभागरहित होते हुएस्थितम्= स्थित हैं
= भी= औरभूतभर्तृ
भूतेषु= सम्पूर्ण प्राणियोंमेंज्ञेयम्= (वे) जाननेयोग्य (परमात्मा ही)
विभक्तम्= विभक्तकीप्रभविष्णु= सम्पूर्ण प्राणियोंकोग्रसिष्णु

व्याख्या —'अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्'—इस त्रिलोकीय देखने, सुनने और समझनेमें जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी आते हैं, उन सबमें परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी विभक्तकी तरह प्रतीत होते हैं। विभाग केवल प्रतीति है।

जिस प्रकार आकाश घट, मठ आदिकी उपाधिसे घटाकाश, मठाकाश आदिके रूपमें अलग-अलग दीखते हुए भी तत्त्वसे एक ही है, उसी प्रकार परमात्मा भिन्न-भिन्न प्राणियोंके शरीरोंकी उपाधिसे अलग-अलग दीखते हुए भी तत्त्वसे एक ही हैं।

इसी अध्यायके सताईसवें श्लोकमें 'समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्' पदोंसे परमात्माको सम्पूर्ण प्राणियोंमें

समभावसे स्थित देखनेके लिये कहा गया है। इसी तरह अठारहवें अध्यायके बीसवें श्लोकमें 'अविभक्तं विभक्तेषु' पदोंसे सात्त्विक ज्ञानका वर्णन करते हुए भी परमात्माको अविभक्तरूपसे देखनेको ही 'सात्त्विक ज्ञान' कहा गया है।

'भूतभर्तृ च तज्ञ्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च' — इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें 'विद्धि' पदसे जिस परमात्माको जाननेकी बात कही गयी है और बारहवें श्लोकमें जिस 'ज्ञेय' तत्त्वका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा की गयी है, उसीका यहाँ ब्रह्मा, विष्णु और शिवके रूपसे वर्णन हुआ है। वस्तुतः चैतन्य तत्त्व (परमात्मा) एक ही है। वे ही परमात्मा रजोगुणकी प्रधानता स्वीकार करनेसे ब्रह्मारूपसे सबको उत्पन्न करनेवाले; सत्त्वगुणकी प्रधानता स्वीकार करनेसे

  • स्वीकृति स्वयंमें होती है, इसलिये स्वीकृतिवाली बात भूली नहीं जाती; जैसे—'मैं ब्राह्मण हूँ'; 'मैं विवाहित हूँ' आदि। परन्तु मन-बुद्धिमें होनेवाली बात भूली जाती है। स्वीकृतिवाली बातमें कोई सन्देह भी नहीं होता और विपरीत भावना भी नहीं होती।

श्लोक १७]

  • साधक-संजीवनी *

८८९

विष्णुरूपसे सबका भरण-पोषण करनेवाले और तमोगुणकी प्रधानता स्वीकार करनेसे रूढ़रूपसे सबका संहार करनेवाले हैं। तात्पर्य है कि एक ही परमात्मा सृष्टि, पालन और संहार करनेके कारण ब्रह्मा, विष्णु और शिव नाम धारण

करते हैं*। यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि परमात्मा सृष्टि-रचनादि कार्यके लिये भिन्न-भिन्न गुणोंको स्वीकार करनेपर भी उन गुणोंके वशीभूत नहीं होते। गुणोंपर उनका पूर्ण आधिपत्य रहता है।

परिशिष्ट भाव— इस श्लोकमें परमात्माके समग्ररूपका वर्णन हुआ है। जैसे संसार भौतिक दृष्टिसे एक है, ऐसे ही वास्तविक तत्त्व (परमात्मा) भी एक है, अविभक्त है। परन्तु जैसे संसार पांचभौतिक दृष्टिसे एक होते हुए भी अनेक वस्तुओं, व्यक्तियों (जड़-चेतन, स्थावर-जंगम) आदिके रूपमें दीखता है, ऐसे ही परमात्मा एक होते हुए भी अनेक रूपोंमें दीखते हैं। तात्पर्य है कि परमात्मा एक होते हुए भी अनेक हैं और अनेक होते हुए भी एक हैं। वास्तविक सत्ता कभी दो हो सकती ही नहीं; क्योंकि दो होनेसे असत् आ जाता है।

उत्पन्न करनेवाले भी परमात्मा हैं और उत्पन्न होनेवाले भी परमात्मा हैं। भरण-पोषण करनेवाले भी परमात्मा हैं और जिनका भरण-पोषण होता है, वे भी परमात्मा हैं। संहार करनेवाले भी परमात्मा हैं और जिनका संहार होता है, वे भी परमात्मा हैं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ज्ञेय तत्त्वका आधाररूपसे वर्णन किया, अब आगेके श्लोकमें उसका प्रकाशकरूपसे वर्णन करते हैं।

ज्योतिषामपि तज्योतिस्तमसः परमुच्यते।

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विच्छितम् ॥ १७ ॥

तत्= वे (परमात्मा)तमसः= अज्ञानसेज्ञानगम्यम्= ज्ञानसे प्राप्त
ज्योतिषाम्= सम्पूर्ण ज्योतियोंकेपरम्= अत्यन्त परेकरनेयोग्य
अपि= भीउच्यते= कहे गये हैं।(और)
ज्योतिः= ज्योतिज्ञानम्= (वे)सर्वस्य= सबके
(और)ज्ञानस्वरूप,हृदि= हृदयमें
ज्ञेयम्= जाननेयोग्य,विच्छितम्= विराजमान हैं।

व्याख्या— ‘ज्योतिषामपि तज्योतिः’—ज्योति नाम प्रकाश-(ज्ञान-) का है अर्थात् जिनसे प्रकाश मिलता है, ज्ञान होता है, वे सभी ज्योति हैं। भौतिक पदार्थ सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, तारा, अग्नि, विद्युत् आदिके प्रकाशमें दीखते हैं; अतः भौतिक पदार्थोंकी ज्योति (प्रकाशक) सूर्य, चन्द्र आदि हैं।

वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक शब्दोंका ज्ञान कानसे होता है; अतः शब्दकी ज्योति (प्रकाशक) ‘कान’ है। शीत-उष्ण, कोमल-कठोर आदिके स्पर्शका ज्ञान त्वचासे होता है; अतः स्पर्शकी ज्योति (प्रकाशक) ‘त्वचा’ है। श्वेत, नील, पीत आदि रूपाँका ज्ञान नेत्रसे होता है; अतः रूपकी ज्योति (प्रकाशक) ‘नेत्र’ है। खट्टा, मीठा, नमकीन आदि रसोंका ज्ञान जिह्वासे होता है; अतः रसकी ज्योति

(प्रकाशक) ‘जिह्वा’ है। सुगन्ध-दुर्गन्धका ज्ञान नाकसे होता है; अतः गन्धकी ज्योति (प्रकाशक) ‘नाक’ है। इन पाँचों इन्द्रियोंसे शब्दादि पाँचों विषयोंका ज्ञान तभी होता है, जब उन इन्द्रियोंके साथ मन रहता है। अगर उनके साथ मन न रहे तो किसी भी विषयका ज्ञान नहीं होता। अतः इन्द्रियोंकी ज्योति (प्रकाशक) ‘मन’ है। मनसे विषयोंका ज्ञान होनेपर भी जबतक बुद्धि उसमें नहीं लगती, बुद्धि मनके साथ नहीं रहती, तबतक उस विषयका स्पष्ट और स्थायी ज्ञान नहीं होता। बुद्धिके साथ रहनेसे ही उस विषयका स्पष्ट और स्थायी ज्ञान होता है। अतः मनकी ज्योति (प्रकाशक) ‘बुद्धि’ है। बुद्धिसे कर्तव्य-अकर्तव्य, सत्-असत्, नित्य-अनित्यका ज्ञान होनेपर भी अगर स्वयं (कर्ता) उसको धारण नहीं करता, तो वह बौद्धिक ज्ञान ही

  • सृष्टिस्थित्यन्तकरणाद् ब्रह्माविष्णुशिवात्मकः। स संज्ञां याति भगवानेक एव जनार्दनः॥

( पद्मपुराण, सृष्टि० २।११४)

८९०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

रह जाता है; वह ज्ञान जीवनमें, आचरणमें नहीं आता। वह बात स्वयंमें नहीं बैठती। जो बात स्वयंमें बैठ जाती है, वह फिर कभी नहीं जाती। अतः बुद्धिकी ज्योति (प्रकाशक) ‘स्वयं’ है। स्वयं भी परमात्माका अंश है और परमात्मा अंशी है। स्वयंमें ज्ञान, प्रकाश परमात्मासे ही आता है। अतः स्वयंकी ज्योति (प्रकाशक) ‘परमात्मा’ है। उस स्वयंप्रकाश परमात्माको कोई भी प्रकाशित नहीं कर सकता।

तात्पर्य यह हुआ कि परमात्माका प्रकाश (ज्ञान) स्वयंमें आता है। स्वयंका प्रकाश बुद्धिमें, बुद्धिका प्रकाश मनमें, मनका प्रकाश इन्द्रियोंमें और इन्द्रियोंका प्रकाश विषयोंमें आता है। मूलमें इन सबमें प्रकाश परमात्मासे ही आता है। अतः इन सब ज्योतियोंका ज्योति, प्रकाशकोंका प्रकाशक परमात्मा ही है*। जैसे एक-एकके पीछे बैठे हुए परीक्षाधी अपनेसे आगे बैठे हुएको तो देख सकते हैं, पर अपनेसे पीछे बैठे हुएको नहीं, ऐसे ही अहम्, बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ आदि भी अपनेसे आगेवालेको तो देख (जान) सकते हैं, पर अपनेसे पीछेवालेको नहीं। जैसे सबसे पीछे बैठा हुआ परीक्षाधी अपने आगे बैठे हुए समस्त परीक्षाधियोंको देख सकता है, ऐसे ही परमप्रकाशक परमात्मा अहम्, बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ आदि सबको देखता है, प्रकाशित करता है, पर उसको कोई प्रकाशित नहीं कर सकता। वह परमात्मा सम्पूर्ण चर-अचर जगत्का समानरूपसे निरपेक्ष प्रकाशक है—‘यस्य भासा सर्वमिदं विभाति सचराचरम्’ (श्रीमद्भद्रा १०।१३।५५)। वहाँ प्रकाशक, प्रकाश और प्रकाश्य—यह त्रिपुटी नहीं है।

‘तमसः परमुच्यते’—वह परमात्मा अज्ञानसे अत्यन्त परे अर्थात् सर्वथा असम्बद्ध और निर्लिप्त है। इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहम्—इनमें तो ज्ञान और अज्ञान दोनों आते-जाते हैं; परन्तु जो सबका परम प्रकाशक है, उस परमात्मामें अज्ञान कभी आता ही नहीं, आ सकता ही नहीं और आना सम्भव ही नहीं। जैसे सूर्यमें अंधेरा कभी आता ही नहीं, ऐसे ही उस परमात्मामें अज्ञान कभी आता ही नहीं। अतः उस परमात्माको अज्ञानसे अत्यन्त परे कहा गया है।

‘ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यम्’—उस परमात्मामें कभी अज्ञान नहीं आता। वह स्वयं ज्ञानस्वरूप है और उसीसे सबको प्रकाश मिलता है। अतः उस परमात्माको ‘ज्ञान’ अर्थात्

ज्ञानस्वरूप कहा गया है।

इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिके द्वारा भी (जाननेमें आनेवाले) विषयोंका ज्ञान होता है, पर वे अवश्य जाननेयोग्य नहीं हैं; क्योंकि उनको जान लेनेपर भी जानना बाकी रह जाता है, जानना पूरा नहीं होता। वास्तवमें अवश्य जाननेयोग्य तो एक परमात्मा ही है—‘अवसि देखिअहि देखन जोगू॥’ (मानस १।२२९।३) उस परमात्माको जान लेनेके बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रहता। पन्द्रहवें अध्यायमें भगवान्ने अपने लिये कहा है कि ‘सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य मैं ही हूँ’ (पन्द्रहवें श्लोक); ‘जो मुझे जान लेता है, वह सर्ववित् हो जाता है’ (उन्नीसवें श्लोक)। अतः परमात्माको ‘ज्ञेय’ कहा गया है।

ज्ञानके द्वारा असत्का त्याग होनेपर परमात्माको तत्त्वसे जाना जा सकता है। अतः उस परमात्माको ‘ज्ञानगम्य’ कहा गया है।

‘हृदि सर्वस्य विच्छितम्’—वह परमात्मा सबके हृदयमें नित्य-निरन्तर विराजमान है। तात्पर्य है कि यद्यपि वह परमात्मा सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, अवस्था आदिमें परिपूर्णरूपसे व्यापक है, तथापि उसका प्राप्तिस्थान तो हृदय ही है।

उस परमात्माका अपने हृदयमें अनुभव करनेका उपाय है—

(१) मनुष्य हरेक विषयको जानता है तो उस जानकारीमें सत् और असत्—ये दोनों रहते हैं। इन दोनोंका विभाग करनेके लिये साधक यह अनुभव करे कि मेरी जो जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और बालकपन, जवानी, बुढ़ापा आदि अवस्थाएँ तो भिन्न-भिन्न हुई, पर मैं एक रहा। सुखदायी-दुःखदायी, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ आयीं और चली गयीं, पर उनमें मैं एक ही रहा। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिका संयोग-वियोग हुआ, पर उनमें भी मैं एक ही रहा। तात्पर्य यह हुआ कि अवस्थाएँ, परिस्थितियाँ, संयोग-वियोग तो भिन्न-भिन्न (तरह-तरहके) हुए, पर उन सबमें जो एक ही रहा है, भिन्न-भिन्न नहीं हुआ है, उसका (उन सबसे अलग करके) अनुभव करे। ऐसा करनेसे जो सबके हृदयमें विराजमान है, उसका अनुभव हो जायगा; क्योंकि यह स्वयं परमात्मासे अभिन्न है।

  • (१) विषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता॥

सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥ (मानस १।१९७।३)

(२) जो ज्योतियोंका ज्योति है, सबसे प्रथम जो भासता। अव्यय सनातन दिव्य दीपक, सर्व विश्व प्रकाशता॥

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

८११

(२) जैसे अत्यन्त भूखा अन्नके बिना और अत्यन्त प्यासा जलके बिना रह नहीं सकता, ऐसे ही उस परमात्माके बिना रह नहीं सके, बेचैन हो जाय। उसके बिना न भूख लगे, न प्यास लगे और न नींद आये। उस परमात्माके सिवाय और कहीं वृत्ति जाय ही नहीं। इस तरह

परिशिष्ट भाव —बारहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक जिस ज्ञेय-तत्त्वका वर्णन हुआ है, वह भगवान्का समग्ररूप ('वासुदेवः सर्वम्') ही है। कारण कि इसमें निर्गुण-निराकार (बारहवाँ श्लोक), सगुण-निराकार (तेरहवाँ श्लोक) और सगुण-साकार (सोलहवाँ श्लोक)—तीनों ही रूपोंका वर्णन हुआ है।

'ज्ञानगम्यम्' —परमात्मा तत्त्वज्ञानसे ही जाने जाते हैं, क्रिया, वस्तु आदिसे नहीं। तत्त्वज्ञानके सिवाय उनको जाननेका दूसरा कोई साधन नहीं है। मनुष्य कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग आदि जिस साधनसे परमात्माको जानेगा, वास्तवमें तत्त्वज्ञानसे ही जानेगा। श्रद्धा-भक्ति, विश्वास, भगवत्कृपा आदिसे भी जानेगा तो तत्त्वज्ञानसे ही जानेगा। कारण कि जानना ज्ञानसे ही होता है।

यहाँ 'ज्ञानगम्यम्' पदका अर्थ 'साधन-समुदायसे प्राप्त होनेयोग्य' भी लिया जा सकता है, जिसका वर्णन इसी अध्यायके सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक हुआ है।

सम्बन्ध—पहले श्लोकसे सत्रहवें श्लोकतक क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयका जो वर्णन हुआ है, अब आगेके श्लोकमें फलसहित उसका उपसंहार करते हैं।

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समाप्तः ।

मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥

इति= इस प्रकारज्ञेयम्= ज्ञेयकोविज्ञाय= तत्त्वसे
क्षेत्रम्= क्षेत्रसमाप्तः= संक्षेपसेजानकर
तथा= तथाउक्तम्= कहा गया है।मद्भावाय= मेरे भावको
ज्ञानम्= ज्ञानमद्भक्तः= मेरा भक्तउपपद्यते= प्राप्त हो
= औरएतत्= इसकोजाता है।

व्याख्या —'इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समाप्तः'—इसी अध्यायके पाँचवें और छठे श्लोकमें जिसका वर्णन किया गया है, वह 'क्षेत्र' है; सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक जिस साधन-समुदायका वर्णन किया गया है, वह 'ज्ञान' है और बारहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक जिसका वर्णन किया गया है, वह 'ज्ञेय' है। इस तरह मैंने क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयका संक्षेपसे वर्णन किया है।

'मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते' —मेरा भक्त

परिशिष्ट भाव —यहाँ 'मद्भक्त एतद्विज्ञाय' पदोंका तात्पर्य है कि समग्र परमात्माका ज्ञान भक्तिसे ही हो सकता है*। अतः साधकको भक्त होना चाहिये।

इस श्लोकमें आये 'मद्भावायोपपद्यते' पदको गीतामें कई प्रकारसे कहा गया है; जैसे—'मद्भावमागताः' (४।१०), 'मम साधर्म्यमागताः' (१४।२), 'मद्भवं सोऽधिगच्छति' (१४।१९)। 'मद्भाव' का अर्थ है—मुझ

क्षेत्रको, साधन-समुदायरूप ज्ञानको और ज्ञेय तत्त्व-(परमात्मा-) को तत्त्वसे जानकर मेरे भावको प्राप्त हो जाता है।

क्षेत्रको ठीक तरहसे जान लेनेपर क्षेत्रसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। ज्ञानको अर्थात् साधन-समुदायको ठीक तरहसे जाननेसे, अपनासे देहाभिमान (व्यक्तित्व) मिट जाता है। ज्ञेय तत्त्वको ठीक तरहसे जान लेनेपर उसकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् परमात्मतत्त्वके साथ अभिन्नाताका अनुभव हो जाता है।

  • प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥ (मानस, उत्तर० ४९।३)

८९२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

परमात्माकी सत्ता। यह सिद्धान्त है कि सत्ता एक ही होती है, दो नहीं होती। भगवान्ने गीतामें ज्ञान और भक्ति—दोनोंमें ही अपने भावकी प्राप्ति बतायी है। 'ज्ञान' में इसका तात्पर्य है—ब्रह्मसे साधर्म्य होना अर्थात् जैसे ब्रह्म सत्-चित्-आनन्दरूप है, ऐसे ही ज्ञानी महापुरुषका भी सत्-चित्-आनन्दरूप होना। 'भक्ति' में इसका तात्पर्य है—भक्तकी भगवान्के साथ आत्मीयता अर्थात् अभिन्नता होना।

सम्बन्ध—इसी अध्यायके पहले और दूसरे श्लोकमें जिस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका संक्षेपसे वर्णन किया था, उसीका विस्तारसे वर्णन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

प्रकृतिं पुरुषं चैव विदध्यनादी उभावपि।

विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १९ ॥

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।

पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥

प्रकृतिम्= प्रकृतिगुणान्= गुणोंकोहेतुः= हेतु
= औरअपि= भीउच्यते= कही जाती है
पुरुषम्= पुरुषप्रकृतिसम्भवान्, एव= प्रकृतिसे ही(और)
उभौ= दोनोंकोउत्पन्नसुखदुःखानाम्= सुख-
एव= ही (तुम)विद्धि= समझो।दुःखोंके
अनादी= अनादिकार्यकरणकर्तृत्वे= कार्य औरभोक्तृत्वे= भोक्तापनमें
विद्धि= समझोकरणके द्वारा होनेवालीपुरुषः= पुरुष
= औरक्रियाओंको उत्पन्नहेतुः= हेतु
विकारान्= विकारोंकोकरनेमेंउच्यते= कहा
= तथाप्रकृतिः= प्रकृतिजाता है।

व्याख्या —[इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रके विषयमें 'यच्च' (जो है), 'यादृक् च' (जैसा है), 'यद्विकारि' (जिन विकारोंवाला है) और 'यतश्च यत्' (जिससे जो उत्पन्न हुआ है)—ये चार बातें सुननेकी आज्ञा दी थी। उनमेंसे 'यच्च' का वर्णन पाँचवें श्लोकमें और 'यद्विकारि' का वर्णन छठे श्लोकमें कर दिया। 'यादृक् च' का वर्णन आगे इसी अध्यायके छब्बीसवें-सत्ताईसवें श्लोकोंमें करेंगे। अब 'यतश्च यत्' का वर्णन करते हुए प्रकृतिसे विकारों और गुणोंको उत्पन्न हुआ बताते हैं। इसमें भी देखा जाय तो विकारोंका वर्णन पहले छठे श्लोकमें 'इच्छा द्वेषः' आदि पदोंसे किया जा चुका है। यहाँ गुण प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं—यह बात नयी बतायी है।

बारहवेंसे अठारहवें श्लोकतक 'ज्ञेय तत्त्व'-(परमात्मा-) का वर्णन है और यहाँ उन्नीसवेंसे चौतीसवें श्लोकतक 'पुरुष'-(क्षेत्रज्ञ-) का वर्णन है। वहाँ तो ज्ञेय

तत्त्वके अन्तर्गत ही सब कुछ है और यहाँ पुरुषके अन्तर्गत सब कुछ है अर्थात् वहाँ ज्ञेय तत्त्वके अन्तर्गत पुरुष है और यहाँ पुरुषके अन्तर्गत ज्ञेय तत्त्व है। तात्पर्य यह है कि ज्ञेय तत्त्व (परमात्मा) और पुरुष (क्षेत्रज्ञ)—दोनों तत्त्वसे दो नहीं हैं, प्रत्युत एक ही हैं।]

'प्रकृतिं पुरुषं चैव विदध्यनादी उभावपि' —यहाँ 'प्रकृतिम्' पद सम्पूर्ण क्षेत्र-(जगत्-)की कारणरूप मूल प्रकृतिका वाचक है। सात प्रकृति-विकृति (पंचमहाभूत, अहंकार और महत्त्व) तथा सोलह विकृति (दस, इन्द्रियाँ, मन और पाँच विषय)—ये सभी प्रकृतिके कार्य हैं और प्रकृति इन सबकी मूल कारण है।

'पुरुषम्' पद यहाँ क्षेत्रज्ञका वाचक है, जिसको इसी अध्यायके पहले श्लोकमें क्षेत्रको जाननेवाला कहा गया है।

प्रकृति और पुरुष—दोनोंको अनादि कहनेका तात्पर्य है कि जैसे परमात्माका अंश यह पुरुष (जीवात्मा) अनादि

श्लोक १९-२० ]

  • साधक-संजीवनी *

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है, ऐसे ही यह प्रकृति भी अनादि है। इन दोनोंके अनादिपनेमें फर्क नहीं है; किन्तु दोनोंके स्वरूपमें फर्क है। जैसे—प्रकृति गुणोंवाली है और पुरुष गुणोंसे सर्वथा रहित है; प्रकृतिमें विकार होता है और पुरुषमें विकार नहीं होता; प्रकृति जगत्की कारण बनती है और पुरुष किसीका भी कारण नहीं बनाता; प्रकृतिमें कार्य एवं कारण-भाव है और पुरुष कार्य एवं कारण-भावसे रहित है।

‘उभौ एव’ कहनेका तात्पर्य है कि प्रकृति और पुरुष—दोनों अलग-अलग हैं। अतः जैसे प्रकृति और पुरुष अनादि हैं, ऐसे ही उन दोनोंका यह भेद (विवेक) भी अनादि है।

इसी अध्यायके पहले श्लोकमें आये ‘इदं शरीरं क्षेत्रम्’ पदोंसे मनुष्य-शरीरकी तरफ ही दृष्टि जाती है अर्थात् व्यक्ति मनुष्य-शरीरका ही बोध होता है और ‘क्षेत्रज्ञः’ पदसे मनुष्य-शरीरको जाननेवाले व्यक्ति क्षेत्रज्ञका ही बोध होता है। अतः प्रकृति और उसके कार्यमात्रका बोध करानेके लिये यहाँ ‘प्रकृतिम्’ पदका और मात्र क्षेत्रज्ञोंका बोध करानेके लिये यहाँ ‘पुरुषम्’ पदका प्रयोग किया गया है।

इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें क्षेत्रज्ञकी परमात्माके साथ एकता जाननेके लिये ‘विद्धि’ पदका प्रयोग किया था और यहाँ पुरुषकी प्रकृतिसे भिन्नता जाननेके लिये ‘विद्धि’ पदका प्रयोग किया गया है। तात्पर्य है कि मनुष्य स्वयंको और शरीरको एक समझता है, इसलिये भगवान् यहाँ ‘विद्धि’ पदसे अर्जुनको यह आज्ञा देते हैं कि ये दोनों सर्वथा अलग-अलग हैं—इस बातको तुम ठीक तरहसे समझ लो।

‘विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्’—इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना और धृति—इन सात विकारोंको तथा सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न हुए समझो। इसका तात्पर्य यह है कि पुरुषमें विकार और गुण नहीं हैं।

सातवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें तो भगवान्ने गुणोंको अपनेसे उत्पन्न बताया है और यहाँ गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न बताते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि वहाँ भक्तिका प्रकरण होनेसे भगवान्ने गुणोंको अपनेसे उत्पन्न बताया है और गुणमयी मायासे तरनेके लिये अपनी शरणागति बतायी है। परन्तु यहाँ ज्ञानका प्रकरण होनेसे गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न बताया है। अतः साधक गुणोंसे

अपना सम्बन्ध न मानकर ही गुणोंसे छूट सकता है।

‘कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते’—आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन दस-(महाभूतों और विषयों-)का नाम ‘कार्य’ है। श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना, घ्राण, वाणी, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा तथा मन, बुद्धि और अहंकार—इन तेरह-(बहिःकरण और अन्तःकरण-)का नाम ‘करण’ है। इन सबके द्वारा जो कुछ क्रियाएँ होती हैं, उनको उत्पन्न करनेमें प्रकृति ही हेतु है।

जो उत्पन्न होता है, वह ‘कार्य’ कहलाता है और जिसके द्वारा कार्यकी सिद्धि होती है, वह ‘करण’ कहलाता है अर्थात् क्रिया करनेके जितने औजार (साधन) हैं, वे सब ‘करण’ कहलाते हैं। करण तीन तरहके होते हैं—(१) कर्मन्द्रियाँ, (२) ज्ञानेन्द्रियाँ और (३) मन, बुद्धि एवं अहंकार। कर्मन्द्रियाँ स्थूल हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ सूक्ष्म हैं और मन, बुद्धि एवं अहंकार अत्यन्त सूक्ष्म हैं। कर्मन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंको ‘बहिःकरण’ कहते हैं तथा मन, बुद्धि और अहंकारको ‘अन्तःकरण’ कहते हैं। जिनसे क्रियाएँ होती हैं, वे कर्मन्द्रियाँ हैं और कर्मन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियोंपर जो शासन करते हैं, वे मन, बुद्धि और अहंकार हैं। तात्पर्य है कि कर्मन्द्रियोंपर ज्ञानेन्द्रियोंका शासन है, ज्ञानेन्द्रियोंपर मनका शासन है, मनपर बुद्धिका शासन है और बुद्धिपर अहंकारका शासन है। मन, बुद्धि और अहंकारके बिना कर्मन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ काम नहीं करतीं। ज्ञानेन्द्रियोंके साथ जब मनका सम्बन्ध हो जाता है, तब विषयोंका ज्ञान होता है। मनसे जिन विषयोंका ज्ञान होता है, उन विषयोंमेंसे कौन-सा विषय ग्राह्य है और कौन-सा त्याज्य है, कौन-सा विषय ठीक है और कौन-सा बेठीक है—इसका निर्णय बुद्धि करती है। बुद्धिके द्वारा निर्णीत विषयोंपर अहंकार शासन करता है।

अहंकार दो तरहका होता है—(१) अहंवृत्ति और (२) अहंकर्ता। अहंवृत्ति किसीके लिये कभी दोषी नहीं होती, पर उस अहंवृत्तिके साथ जब स्वयं (पुरुष) अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है, तादात्म्य कर लेता है, तब वह अहंकर्ता बन जाता है। तात्पर्य है कि अहंवृत्तिसे मोहित होकर, उसके परवश होकर स्वयं उस अहंवृत्तिमें अपनी स्थिति मान लेता है तो वह कर्ता बन जाता है—‘अहंकार-विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३।२७)।

प्रकृतिका कार्य बुद्धि (महत्त्व) है और बुद्धिका कार्य अहंवृत्ति (अहंकार) है। यह अहंवृत्ति है तो बुद्धिका कार्य,

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

पर इसके साथ तादात्म्य करके स्वयं बुद्धिका मालिक बन जाता है अर्थात् कर्ता और भोक्ता बन जाता है—‘पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजानुगुणान् ’ (गीता १३।२१)। परन्तु जब तत्त्वका बोध हो जाता है, तब स्वयं न कर्ता बनता है और न भोक्ता ही बनता है—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ’ (गीता १३।३१)। फिर कर्तृत्व-भोक्तृत्वरहित पुरुषके शरीरद्वारा जो कुछ क्रियाएँ होती हैं, वे सब क्रियाएँ अहंवृत्तिसे ही होती हैं। इसी अहंवृत्तिके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको गीतामें कई तरहसे बताया गया है; जैसे—प्रकृतिके द्वारा ही सब क्रियाएँ होती हैं। (तेरहवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक); प्रकृतिके गुणोंद्वारा ही सब क्रियाएँ होती हैं (तीसरे अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक); गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (तीसरे अध्यायका अठ्ठाईसवाँ श्लोक); गुणोंके सिवाय दूसरा कोई कर्ता नहीं है (चौदहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक); इन्द्रियाँ ही अपने-अपने विषयोंमें बरत रही हैं (पाँचवें अध्यायका नवाँ श्लोक) आदि। तात्पर्य है कि बहिःकरण और अन्तःकरणके द्वारा जो क्रियाएँ होती हैं, वे सब प्रकृतिसे ही होती हैं।

‘पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते’ —अनुकूल परिस्थितिके आनेपर सुखी (राजी) होना—यह सुखका भोग है और प्रतिकूल परिस्थितिके आनेपर दुःखी (नाराज) होना—यह दुःखका भोग है। यह सुख-दुःखका भोग पुरुष-(चेतन)-में ही होता है—प्रकृति-(जड-)-में नहीं; क्योंकि जड प्रकृतिमें सुखी-दुःखी होनेकी सामर्थ्य नहीं है। अतः सुख-दुःखके भोकापनमें पुरुष हेतु कहा गया है। अगर पुरुष अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंसे मिलकर राजी-नाराज न हो तो वह सुख-दुःखका भोक्ता नहीं बन सकता।

सातवें अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें भगवान्ने अपना (जड) और परा (चेतन) नामसे अपनी दो प्रकृतियोंका वर्णन किया है। ये दोनों प्रकृतियाँ भगवान्के स्वभाव हैं, इसलिये ये दोनों स्वतः ही भगवान्की ओर जा रही हैं। परन्तु परा प्रकृति (चेतन), जो परमात्माका अंश ही है और जिसकी स्वाभाविक रूचि परमात्माकी ओर जानेकी ही है, तात्कालिक सुखभोगमें आकर्षित होकर

अपरा प्रकृति-(जड-)-के साथ तादात्म्य कर लेता है। इतना ही नहीं, प्रकृतिके साथ तादात्म्य करके वह ‘प्रकृतिस्थ पुरुष’के रूपमें अपनी एक स्वतन्त्र सत्ताका निर्माण कर लेता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक), जिसको ‘अहम्’ कहते हैं। इस ‘अहम्’ में जड और चेतन दोनों हैं। सुख-दुःखरूप जो विकार होता है, वह जड-अंशमें ही होता है, पर जडसे तादात्म्य होनेके कारण उसका परिणाम ज्ञाता चेतनपर होता है अर्थात् जडके सम्बन्धसे सुख-दुःखरूप विकारको चेतन अपनेमें मान लेता है कि ‘मैं सुखी हूँ’, ‘मैं दुःखी हूँ’। जैसे, घाटा लगता है दूकानमें, पर दूकानदार कहता है कि मुझे घाटा लग गया। ज्वर शरीरमें आता है, पर मान लेता है कि मेरेमें ज्वर आ गया। स्वयंमें ज्वर नहीं आता*, यदि आता तो कभी मिटता नहीं।

सुख-दुःखका परिणाम चेतनपर होता है, तभी वह सुख-दुःखसे मुक्ति चाहता है। अगर वह सुखी-दुःखी न हो, तो उसमें मुक्तिकी इच्छा हो ही नहीं सकती। मुक्तिकी इच्छा जडके सम्बन्धसे ही होती है; क्योंकि जडको स्वीकार करनेसे ही बन्धन हुआ है। जो अपनेको सुखी-दुःखी मानता है, वही सुख-दुःखरूप विकारसे अपनी मुक्ति चाहता है और उसीकी मुक्ति होती है। तात्पर्य है कि तादात्म्यमें मुक्ति-(कल्याण-)-की इच्छामें चेतनकी मुख्यता और भोगोंकी इच्छामें जडकी मुख्यता होती है, इसलिये अन्तमें कल्याणका भागी चेतन ही होता है, जड नहीं।

विकृतिमात्र जडमें ही होती है, चेतनमें नहीं। अतः वास्तवमें सुखी-दुःखी ‘होना’ चेतनका धर्म नहीं है, प्रत्युत जडके संगसे अपनेको सुखी-दुःखी ‘मानना’ ज्ञाता चेतनका स्वभाव है। तात्पर्य है कि चेतन सुखी-दुःखी होता नहीं, प्रत्युत (सुखाकार-दुःखाकार वृत्तिसे मिलकर) अपनेको सुखी-दुःखी मान लेता है। चेतनमें एक-दूसरेसे विरुद्ध सुख-दुःखरूप दो भाव हो ही कैसे सकते हैं? दो रूप परिवर्तनशील प्रकृतिमें ही हो सकते हैं। जो परिवर्तनशील नहीं है, उसके दो रूप नहीं हो सकते। तात्पर्य यह है कि सब विकार परिवर्तनशीलमें ही हो सकते हैं। चेतन स्वयं ज्यों-का-त्यों रहते हुए भी परिवर्तनशील प्रकृतिके संगसे उसके विकारोंको अपनेमें आरोपित करता रहता है। यह

  • आत्मानं चेद विजानीयादयमसीति पुरुषः। किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुष्यंज्वरेत्॥

(बृहदारण्यक ४।४।१२)

‘यदि पुरुष आत्माको ‘मैं यही हूँ’ इस प्रकार विशेषरूपसे जान जाय, तो फिर क्या इच्छा करता हुआ और किस कामनासे शरीरके ज्वर-(ताप-)-से अनुत्पन्न हो?’