श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 884, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १३ ]
- साधक-संजीवनी *
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प्रकृति और पुरुष—दोनोंको अनादि कहा गया है (गीता—इसी अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक); अतः दोनोंका मालिक होनेसे परमात्माको यहाँ ‘अनादिमत्’ अर्थात् अनादिवाला कहा गया है*। सातवें अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें भगवान्ने अपना प्रकृतिको ‘इतीयं मे’ कहकर और परा प्रकृति (जीवात्मा)-को ‘मे पराम्’ कहकर दोनोंको अपने अधीन बताया है; अतः दोनोंके मालिक भगवान् ही हुए। उपनिषद्में भी आया है—
क्षरं प्रधानममुताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। (श्वेताश्वतर० १।१०)
‘प्रकृति तो क्षर (परिवर्तनशील) है और इसको भोगनेवाला पुरुष (जीवात्मा) अमृतस्वरूप अक्षर (अपरिवर्तनशील) है। इन दोनों (प्रकृति और पुरुष)-को एक ईश्वर अपने शासनमें रखता है।’
गीतामें एक ही समग्र परमात्माका तीन प्रकारसे वर्णन आया है—
(१) परमात्मा सत् भी हैं और असत् भी हैं—‘सदसच्चाहम्’ (९।१९)।
(२) परमात्मा सत् भी हैं, असत् भी हैं और सत्-असत्से पर भी हैं—‘सदसत्तत्परं यत्’ (११।३७)।
(३) परमात्मा न सत् हैं और न असत् ही हैं—‘न सत्तनासदुच्यते’ (१३।१२)।
—इसका तात्पर्य है कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय कुछ भी नहीं है। वह मन, बुद्धि और वाणीसे सर्वथा अतीत है, इसलिये उसका वर्णन नहीं किया जा सकता, पर उसको प्राप्त किया जा सकता है।
वास्तवमें परमात्मतत्त्वका वर्णन शब्दोंसे नहीं कर सकते। उसको असत्की अपेक्षासे सत्, विकारकी अपेक्षासे निर्विकार, एकदेशीयकी अपेक्षासे सर्वदेशीय कह देते हैं, पर वास्तवमें उस तत्त्वमें सत्, निर्विकार आदि शब्द लागू होते ही नहीं। कारण कि सभी शब्दोंका प्रयोग सापेक्षतासे और प्रकृतिके सम्बन्धसे होता है, पर तत्त्व निरपेक्ष और प्रकृतिसे अतीत है। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, गुण आदिको लेकर ही संज्ञा बनती है। परमात्मामें देश, काल आदि हैं ही नहीं, फिर उनकी संज्ञा कैसे? इसलिये यहाँ आया है कि उस तत्त्वको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है।
परमात्मतत्त्वका आदि (आरम्भ) नहीं है। जो सदासे है, उसका आदि कैसे? सब अपर हैं, वह पर है। वह न सत् है, न असत्। आदि-अनादि, पर-अपर और सत्-असत्का भेद प्रकृतिके सम्बन्धसे है। वह तत्त्व तो आदि-अनादि पर-अपर और सत्-असत्से विलक्षण है। इस प्रकार भगवान्ने ज्ञेय-तत्त्वका वर्णन करनेकी जो बात कही है, वह वास्तवमें वर्णन नहीं है, प्रत्युत लक्षक अर्थात् लक्ष्यकी तरफ दृष्टि करानेवाला है। इसका तात्पर्य ज्ञेय-तत्त्वका लक्ष्य करानेमें है, कोरा वर्णन करनेमें नहीं। इसलिये साधकको भी लक्षककी दृष्टिसे ही विचार करना चाहिये, केवल सीखनेकी दृष्टिसे नहीं।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें ‘वह तत्त्व न सत् कहा जा सकता है, न असत्’—ऐसा कहकर ज्ञेय तत्त्वका निर्गुण-निराकाररूपसे वर्णन किया। अब आगेके श्लोकमें उसी ज्ञेय तत्त्वका सगुण-निराकाररूपसे वर्णन करते हैं।
सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥
| तत् | = वे (परमात्मा) | सर्वतोऽक्षि- | कानोंवाले हैं। | |
|---|---|---|---|---|
| सर्वतःपाणि- | शिरोमुखम् | = सब जगह नेत्रों, | लोके = (वे) संसारमें | |
| पादम् | = सब जगह | सिरों और मुखोंवाले | सर्वम् = सबको | |
| हाथों और | (तथा) | आवृत्य = व्याप्त करके | ||
| पैरोंवाले, | सर्वतःश्रुतिम् | = सब जगह | तिष्ठति = स्थित हैं। |
- ‘अनादिमत्परं ब्रह्म’ पदोंका ऐसा अर्थ भी ले सकते हैं—‘अनादि, मत्परं ब्रह्म’ अर्थात् ब्रह्म मेरे परायण (आश्रित) है—‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्’ (गीता १३।२७)