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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

व्याख्या—‘सर्वतः पाणिपादं तत्’ —जैसे स्याहीमें सब जगह सब तरहकी लिपियाँ विद्यमान हैं; अतः लेखक स्याहीसे सब तरहकी लिपियाँ लिख सकता है। सोनेमें सब जगह सब तरहके गहने विद्यमान हैं; अतः सुनार सोनेमें किसी भी जगहसे जो गहना बनाना चाहे, बना सकता है। ऐसे ही भगवान्के सब जगह ही हाथ और पैर हैं; अतः भक्त भक्तिसे जहाँ-कहीं जो कुछ भी भगवान्के हाथोंमें देना चाहता है, अर्पण करना चाहता है, उसको ग्रहण करनेके लिये उसी जगह भगवान्के हाथ मौजूद हैं। भक्त बाहरसे अर्पण करना चाहे अथवा मनसे, पूर्वमें देना चाहे अथवा पश्चिममें, उत्तरमें देना चाहे अथवा दक्षिणमें, उसे ग्रहण करनेके लिये वहाँ भगवान्के हाथ मौजूद हैं। ऐसे ही भक्त जलमें, स्थलमें, अग्निमें, जहाँ-कहीं जिस किसी भी संकटमें पड़नेपर भगवान्को पुकारता है, उसकी रक्षा करनेके लिये वहाँ ही भगवान्के हाथ तैयार हैं अर्थात् भगवान् वहाँ ही अपने हाथोंसे उसकी रक्षा करते हैं।

भक्त जहाँ-कहीं भगवान्के चरणोंमें चन्दन लगाना चाहता है, पुष्प चढ़ाना चाहता है, नमस्कार करना चाहता है, उसी जगह भगवान्के चरण मौजूद हैं। हजारों-लाखों भक्त एक ही समयमें भगवान्के चरणोंकी अलग-अलग पूजा करना चाहें, तो उनके भावके अनुसार वहाँ ही भगवान्के चरण मौजूद हैं।

‘सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्’ —भक्त भगवान्को जहाँ दीपक दिखाता है, आरती करता है, वहाँ ही भगवान्के नेत्र हैं। भक्त जहाँ शरीरसे अथवा मनसे नृत्य करता है, वहाँ ही भगवान् उसके नृत्यको देख लेते हैं। तात्पर्य है कि जो भगवान्को सब जगह देखता है, भगवान् भी उसकी दृष्टिसे कभी ओझल नहीं होते (गीता—छठे अध्यायका तीसवों श्लोक)।

भक्त जहाँ भगवान्के मस्तकपर चन्दन लगाना चाहे, पुष्प चढ़ाना चाहे, वहाँ ही भगवान्का मस्तक है।

भक्त जहाँ भगवान्को भोग लगाना चाहे, वहाँ ही भगवान्का मुख है अर्थात् भक्तद्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए

परिशिष्ट भाव —परमात्मामें सब जगह सब कुछ है। जैसे, कलम और स्याहीमें किस जगह कौन-सी लिपि नहीं है? जानकार आदमी उस एक ही कलम और स्याहीसे अनेक लिपियाँ लिख देता है। सोनेकी डलीमें किस जगह कौन-सा गहना नहीं है? सुनार उस एक डलीमेंसे कड़ा, कण्ठी, हार, नथ आदि अनेक गहने निकाल लेता है। इसी तरह लोहेमें किस जगह कौन-सा औजार अथवा अस्त्र-शस्त्र नहीं है? मिट्टी और पत्थरमें किस जगह कौन-सी मूर्ति नहीं है? ऐसे ही परमात्मामें किस जगह क्या नहीं है? परमात्मासे ही यह सब सृष्टि पैदा हुई है, उसीमें स्थित रहती है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाती है। पहले भी वही है, पीछे भी वही है, फिर बीचमें दूसरी चीज कैसे आये? कहाँसे आये? इस बातको

पदार्थको भगवान् वहाँ ही खा लेते हैं (गीता—नवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)।

‘सर्वतःश्रुतिमत्’ —भक्त जहाँ-कहीं जोरसे बोलकर प्रार्थना करे, धीरेसे बोलकर प्रार्थना करे अथवा मनसे प्रार्थना करे, वहाँ ही भगवान् अपने कानोंसे सुन लेते हैं।

मनुष्योंके सब अवयव (अंग) सब जगह नहीं होते अर्थात् जहाँ नेत्र हैं, वहाँ कान नहीं होते और जहाँ कान हैं, वहाँ नेत्र नहीं होते; जहाँ हाथ हैं, वहाँ पैर नहीं होते और जहाँ पैर हैं, वहाँ हाथ नहीं होते इत्यादि। परन्तु भगवान्की इन्द्रियाँ, उनके अवयव सब जगह हैं। अतः भगवान् नेत्रोंसे सुन भी सकते हैं, बोल भी सकते हैं, ग्रहण भी कर सकते हैं इत्यादि। तात्पर्य है कि वे सभी अवयवोंसे सभी क्रियाएँ कर सकते हैं; क्योंकि उनके सभी अवयवोंमें सभी अवयव मौजूद हैं। उनके छोटे-से-छोटे अंशमें भी सब-की-सब इन्द्रियाँ हैं।

भगवान्के सब जगह हाथ, पैर, नेत्र, सिर, मुख और कान कहनेका तात्पर्य है कि भगवान् किसी भी प्राणीसे दूर नहीं हैं। कारण कि भगवान् सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें परिपूर्णरूपसे विद्यमान हैं। संतोने कहा है—

चहुँ दिसि आरति चहुँ दिसि पूजा।

चहुँ दिसि राम और नहि दूजा॥

संसारी आदमीको जैसे बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे सब जगह संसार-ही-संसार दीखता है, संसारके सिवाय दूसरा कुछ दीखता ही नहीं, ऐसे ही परमात्माको तत्त्वसे जाननेवाले पुरुषको सब जगह परमात्मा-ही-परमात्मा दीखते हैं।

‘लोकैः सर्वमावृत्य तिष्ठति’ —अनन्त सृष्टियाँ हैं, अनन्त ब्रह्माण्ड हैं, अनन्त ऐश्वर्य हैं और उन सबमें देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदि भी अनन्त हैं, वे सभी परमात्माके अन्तर्गत हैं। परमात्मा उन सबको व्याप्त करके स्थित हैं। दसवें अध्यायके बयालीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है कि मैं सारे संसारको एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हूँ।