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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 883

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

व्याख्या —[ इस श्लोकमें भगवान्ने 'प्रवक्ष्यामि' पदसे ज्ञेय तत्त्वका वर्णन करनेके लिये प्रतिज्ञा की है, 'अमृतमश्नुते' पदसे उसे जाननेका फल बताया है, 'अनादिमत्' पदसे उसका लक्षण बताया है, 'परं ब्रह्म' पदोंसे उसका नाम बताया है, और 'न सत्तनासदुच्यते' पदोंसे उसका वर्णन किया है। ]

'ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि' —भगवान् यहाँ ज्ञेय तत्त्वके वर्णनका उपक्रम करते हुए प्रतिज्ञा करते हैं कि जिसकी प्राप्तिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है, जिसका वर्णन उपनिषदों, शास्त्रों और ग्रन्थोंमें किया गया है, उस प्रापणीय ज्ञेय तत्त्वका मैं अच्छी तरहसे वर्णन करूँगा।

'ज्ञेयम्' (अवश्य जाननेयोग्य) कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें जितने भी विषय, पदार्थ, विद्यार्थ, कलाएँ आदि हैं, वे सभी अवश्य जाननेयोग्य नहीं हैं। अवश्य जाननेयोग्य तो एक परमात्मा ही है। कारण कि सांसारिक विषयोंको कितना ही जान लें, तो भी जानना बाकी ही रहेगा। सांसारिक विषयोंकी जानकारीसे जन्म-मरण भी नहीं मिटेगा। परन्तु परमात्माको तत्त्वसे ठीक जान लेनेपर जानना बाकी नहीं रहेगा और जन्म-मरण भी मिट जायगा। अतः संसारमें परमात्माके सिवाय जाननेयोग्य दूसरा कोई है ही नहीं।

'यन्ज्ञात्वामृतमश्नुते' —उस ज्ञेय तत्त्वको जाननेपर अमरताका अनुभव हो जाता है अर्थात् स्वतःसिद्ध तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है, जिसकी प्राप्ति होनेपर जानना, करना, पाना आदि कुछ भी बाकी नहीं रहता।

वास्तवमें स्वयं पहलेसे ही अमर है, पर उसने मरणशील शरीरादिके साथ एकता करके अपनेको जन्मने-मरनेवाला मान लिया है। परमात्मतत्त्वको जाननेसे यह भूल मिट जाती है और वह अपने वास्तविक स्वरूपको पहचान लेता है अर्थात् अमरताका अनुभव कर लेता है।

'अनादिमत्' —उससे यावन्मात्र संसार उत्पन्न होता है, उसीमें रहता है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है। परन्तु वह आदि, मध्य और अन्तमें ज्यों-का-त्यों विद्यमान रहता है। अतः वह 'अनादि' कहा जाता है।

'परं ब्रह्म' —'ब्रह्म' प्रकृतिको भी कहते हैं, वेदको

परिशिष्ट भाव —परमात्मतत्त्वको 'ज्ञेय' कहनेका तात्पर्य है कि वह तत्त्व जाननेयोग्य है, उसको जानना चाहिये और वह जाननेमें शक्य है अर्थात् जाना जा सकता है। वास्तवमें वह तत्त्व जाननेमें आता नहीं है; क्योंकि प्रकृतिसे अतीत होनेके कारण वह प्रकृतिकी पकड़में नहीं आता। परन्तु वह स्वयंसे प्राप्त किया जा सकता है।

भी कहते हैं, पर 'परम ब्रह्म' तो एक परमात्मा ही है। जिससे बढ़कर दूसरा कोई व्यापक, निर्विकार, सदा रहनेवाला तत्त्व नहीं है, वह 'परम ब्रह्म' कहा जाता है।

'न सत्तनासदुच्यते' —उस तत्त्वको 'सत्' भी नहीं कह सकते और 'असत्' भी नहीं कह सकते। कारण कि असत्की भावना-(सत्ता-) के बिना उस परमात्मतत्त्वमें सत् शब्दका प्रयोग नहीं होता, इसलिये उसको 'सत्' नहीं कह सकते और उस परमात्मतत्त्वका कभी अभाव नहीं होता, इसलिये उसको 'असत्' भी नहीं कह सकते। तात्पर्य है कि उस परमात्मतत्त्वमें सत्-असत् शब्दोंकी अर्थात् वाणीकी प्रवृत्ति होती ही नहीं—ऐसा वह करण-निरपेक्ष तत्त्व है।

जैसे पृथ्वीपर रात और दिन—ये दो होते हैं। इनमें भी दिनके अभावको 'रात' और रातके अभावको 'दिन' कह देते हैं। परन्तु सूर्यमें रात और दिन—ये दो भेद नहीं होते। कारण कि रात तो सूर्यमें है ही नहीं और रातका अत्यन्त अभाव होनेसे सूर्यमें दिन भी नहीं कह सकते; क्योंकि 'दिन' शब्दका प्रयोग रातकी अपेक्षासे किया जाता है। यदि रातकी सत्ता न रहे तो न दिन कह सकते हैं, न रात। ऐसे ही सत्की अपेक्षासे 'असत्' शब्दका प्रयोग होता है और असत्की अपेक्षासे 'सत्' शब्दका प्रयोग होता है। जहाँ परमात्माको 'सत्' कहा जाता है, वहाँ असत्की अपेक्षासे ही कहा जाता है। परन्तु जहाँ असत्का अत्यन्त अभाव है, वहाँ परमात्माको 'सत्' नहीं कह सकते और जो परमात्मा निरन्तर सत् है, उसको 'असत्' नहीं कह सकते। अतः परमात्मामें सत् और असत्—इन दोनों शब्दोंका प्रयोग नहीं होता। जैसे सूर्य दिन-रात दोनोंसे विलक्षण केवल प्रकाशरूप है, ऐसे ही वह ज्ञेय तत्त्व सत्-असत् दोनोंसे विलक्षण है*।

दूसरी बात, सत्-असत्का निर्णय बुद्धि करती है और ऐसा कहना भी वहीं होता है, जहाँ वह मन, वाणी और बुद्धिका विषय होता है। परन्तु ज्ञेय तत्त्व मन, वाणी और बुद्धिसे सर्वथा अतीत है; अतः उसकी सत्-असत् संज्ञा नहीं हो सकती।

  • राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहं मोह निसा लवलेसा॥

सहज प्रकासरूप भगवाना। नहिं तहं पुनि बिग्यान बिहाना॥ (मानस १।११६।३)