श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 882, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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उद्देश्य केवल परमात्माको प्राप्त करना हो और (२) शास्त्रोंको पढ़ते-सुनते समय यदि विवेकद्वारा शरीरको अपनेसे अलग समझ ले, तो फिर दूसरे समयमें भी उसी विवेकपर स्थिर रहे। इन दो बातोंके दृढ़ होनेसे साधन-समुदायके सभी साधन सुगम हो जाते हैं।
शरीर तो बदल गया, पर मैं वही हूँ, जो कि बचपनमें था—यह सबके अनुभवकी बात है। अतः शरीरके साथ अपना सम्बन्ध वास्तविक न होकर केवल माना हुआ है—ऐसा निश्चय होनेपर ही वास्तविक साधन आरम्भ होता है। साधककी बुद्धि जितने अंशमें परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको धारण करती है, उतने ही अंशमें उसमें विवेककी जागृति तथा संसारसे वैराग्य हो जाता है। भगवान्ने विवेक और वैराग्यको पुष्ट करनेके लिये ज्ञानके आवश्यक साधनोंका वर्णन किया है।
जब मनुष्यका उद्देश्य परमात्मप्राप्ति करना ही हो जाता है, तब दुर्गुणों एवं दुराचारोंकी जड़ कट जाती है, चाहे साधकको इसका अनुभव हो या न हो! जैसे वृक्षकी जड़ कटनेपर भी बड़ी टहनीपर लगे हुए पत्ते कुछ दिनतक हरे दीखते हैं; किन्तु वास्तवमें उन पत्तोंके हरेपनकी भी
जड़ कट चुकी है। इसलिये कुछ दिनोंके बाद कटी हुई टहनीके पत्तोंका हरापन मिट जाता है। ऐसे ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका दृढ़ उद्देश्य होते ही दुर्गुण-दुराचार मिट जाते हैं। यद्यपि साधकको आरम्भमें ऐसा अनुभव नहीं होता और उसको अपनेमें अवगुण दीखते हैं, तथापि कुछ समयके बाद उनका सर्वथा अभाव दीखने लग जाता है।
साधन करते समय कभी-कभी साधकको अपनेमें दुर्गुण दिखायी दे सकते हैं। परन्तु वास्तवमें साधनमें लगनेसे पहले उसमें जो दुर्गुण रहे थे, वे ही जाते हुए दिखायी देते हैं। यह नियम है कि दरवाजेसे आनेवाले और जानेवाले—दोनों ही दिखायी देते हैं। यदि साधन करते समय अपनेमें दुर्गुण बढ़ते हुए दीखते हों, तो समझना चाहिये कि दुर्गुण आ रहे हैं। परन्तु यदि अपनेमें दुर्गुण कम होते हुए दीखते हों, तो समझना चाहिये कि दुर्गुण जा रहे हैं। ऐसी अवस्थामें साधकको निराश नहीं होना चाहिये, प्रत्युत अपने उद्देश्यपर दृढ़ रहकर तत्परतापूर्वक साधनमें लगे रहना चाहिये। इस प्रकार साधनमें लगे रहनेसे दुर्गुण-दुराचारोंका सर्वथा अभाव हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विभागका ज्ञान करानेमें हेतु होनेसे इन बीस साधनोंको ‘ज्ञान’ नामसे कहा गया है। इससे जो विपरीत है, वह अज्ञान है। साधन न करनेसे मनुष्य ज्ञानकी बातें तो सीख लेता है, पर अनुभव नहीं कर सकता। अतः साधन न करनेसे अज्ञान (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञको एक देखना) रहता है और अज्ञानके रहते हुए अगर कोई सीखकर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागका विवेचन करता है तो वह वास्तवमें देहाभिमानको ही पुष्ट करता है। परन्तु जो ये साधन करता है, उसमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विभाग करनेकी योग्यता आ जाती है।
सम्बन्ध—पूर्वोक्त ज्ञान-(साधन-समुदाय-) के द्वारा जिसको जाना जाता है, उस साध्य-तत्त्वका अब ‘ज्ञेय’ नामसे वर्णन आरम्भ करते हैं।
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ञात्त्वामृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥
| यत् | = जो | ज्ञात्वा | = जानकर (मनुष्य) | तत् | = उसको |
|---|---|---|---|---|---|
| ज्ञेयम् | = ज्ञेय (पूर्वोक्त ज्ञानसे जाननेयोग्य) है, | अमृतम् | = अमरताका | न | = न |
| तत् | = उस (परमात्मतत्त्व) को | अश्नुते | = अनुभव कर लेता है। | सत् | = सत् |
| प्रवक्ष्यामि | = मैं अच्छी तरहसे कहूँगा, | अनादिमत् | = (वह ज्ञेय-तत्त्व) अनादिवाला | उच्यते | = कहा जा सकता है (और) |
| यत् | = जिसको | परम् | = (और) परम | न, असत् | = न असत् ही (कहा जा सकता है)। |
| ब्रह्म | = ब्रह्म है। |