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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

कहलाती, प्रत्युत वह तो आवश्यक है। कहा भी गया है— संगः सर्वात्मना त्याज्यः स चेत्यक्तुं न शक्यते। स सद्धिः सह कर्तव्यः सतां संगो हि भेषजम्॥ (मार्कण्डेयपुराण ३७। २३)

अर्थात् आसक्तिपूर्वक किसीका भी संग नहीं करना चाहिये; परन्तु अगर ऐसी असंगता न होती हो, तो श्रेष्ठ पुरुषोंका संग करना चाहिये। कारण कि श्रेष्ठ पुरुषोंका संग असंगता प्राप्त करनेकी ओषध है।

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।

एतद्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥

अध्यात्मज्ञान- नित्यत्वम् | = अध्यात्मज्ञानमें नित्य-निरन्तर रहना, | एतत् | = —यह (पूर्वीक बीस साधन-समुदाय) तो | यत् | = जो ---|---|---|---|---|--- तत्त्वज्ञानार्थ- दर्शनम् | = तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सब जगह | ज्ञानम् | = ज्ञान है (और) | अन्यथा | = विपरीत है, | | | | अज्ञानम् | = वह अज्ञान है— | | | | इति | = ऐसा | | | | प्रोक्तम् | = कहा गया है।

व्याख्या —‘अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् ’—सम्पूर्ण शास्त्रोंका तात्पर्य मनुष्यको परमात्माकी तरफ लगानेमें, परमात्म-प्राप्ति करानेमें है—ऐसा निश्चय करनेके बाद परमात्मतत्त्व जितना समझमें आया है, उसका मनन करे। युक्ति-प्रयुक्तिये देखा जाय तो परमात्मतत्त्व भावरूपसे पहले भी था, अभी भी है और आगे भी रहेगा। परन्तु संसार पहले भी नहीं था और आगे भी नहीं रहेगा तथा अभी भी प्रतिक्षण अभवमें जा रहा है। संसारकी तो उत्पत्ति और विनाश होता है, पर उसका जो आधार, प्रकाशक है, वह परमात्मतत्त्व नित्य-निरन्तर रहता है। उस परमात्मतत्त्वके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। परमात्माकी सत्तासे ही संसार सत्तावाला दीखता है। इस प्रकार संसारकी स्वतन्त्र सत्ताके अभवका और परमात्माकी सत्ताका नित्य-निरन्तर मनन करते रहना ‘अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् ’ है।

उपाय —आध्यात्मिक ग्रन्थोंका पठन-पाठन, तत्त्वज्ञ महापुरुषोंसे तत्त्वज्ञान-विषयक श्रवण और प्रश्नोत्तर करना। ‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ’—तत्त्वज्ञानका अर्थ है— परमात्मा। उस परमात्माका ही सब जगह दर्शन करना, उसका ही सब जगह अनुभव करना ‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ’ है। वह परमात्मा सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है। एकान्तमें अथवा व्यवहारमें, सब समय साधककी दृष्टि, उसका लक्ष्य केवल उस परमात्मापर ही रहे। एक परमात्माके सिवाय उसको दूसरी कोई सत्ता

दीखे ही नहीं। सब जगह, सब समय समभावसे परिपूर्ण परमात्माको ही देखनेका उसका स्वभाव बन जाय—यही ‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ’ है। इसके सिद्ध होनेपर साधकको परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।

एतद्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ’—‘अमानित्वम् ’ से लेकर ‘तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ’ तक ये जो बीस साधन कहे गये हैं, ये सभी साधन देहाभिमान मिटानेवाले होनेसे और परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें सहायक होनेसे ‘ज्ञान’ नामसे कहे गये हैं। इन साधनोंसे विपरीत मानित्व, दम्भित्व, हिंसा आदि जितने भी दोष हैं, वे सभी देहाभिमान बढ़ानेवाले होनेसे और परमात्मतत्त्वसे विमुख करनेवाले होनेसे ‘अज्ञान’ नामसे कहे गये हैं।

विशेष बात

यदि साधकमें इतना तीव्र विवेक जाग्रत् हो जाय कि वह शरीरसे माने हुए सम्बन्धका त्याग कर सके, तो उसमें यह साधन-समुदाय स्वतः प्रकट हो जाता है। फिर उसको इन साधनोंका अलग-अलग अनुष्ठान करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। विनाशी शरीरको अपने अविनाशी स्वरूपसे अलग देखना मूल साधन है। अतः सभी साधकोंको चाहिये कि वे शरीरको अपनेसे अलग अनुभव करें, जो कि वास्तवमें अलग ही है!

पूर्वीक किसी भी साधनका अनुष्ठान करनेके लिये मुख्यतः दो बातोंकी आवश्यकता है—(१) साधकका