श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 887, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें८८६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
करते हैं, आदि-आदि। इस तरह ज्ञानेन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी परमात्मा शब्द, स्पर्श आदि विषयोंको ग्रहण करते हैं। ऐसे ही वे वाणीसे रहित होनेपर भी अपने प्यारे भक्तोंसे बातें करते हैं, चरणोंसे रहित होनेपर भी भक्तके पुकारनेपर दौड़कर चले आते हैं, हाथोंसे रहित होनेपर भी भक्तके दिये हुए उपहारको ग्रहण करते हैं, आदि-आदि। इस तरह कर्मेन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी परमात्मा कर्मेन्द्रियोंका सब कार्य करते हैं। यही इन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी भगवान्का इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करना है।
‘असक्तं सर्वभूच्छेव’ —भगवान्का सभी प्राणियोंमें अपनापन, प्रेम है, पर किसी भी प्राणीमें आसक्ति नहीं है। आसक्ति न होनेपर भी वे ब्रह्मासे चींटीपर्यन्त सम्पूर्ण प्राणियोंका पालन-पोषण करते हैं। जैसे माता-पिता अपने बालकका पालन-पोषण करते हैं, उससे कई गुना अधिक पालन-पोषण भगवान् प्राणियोंका करते हैं। कौन प्राणी
कहाँ है और किस प्राणीको कब किसी वस्तु आदिकी जरूरत पड़ती है, इसको पूरी तरह जानते हुए भगवान् उस वस्तुको आवश्यकतानुसार यथोचित रीतिसे पहुँचा देते हैं। प्राणी पृथ्वीपर हो, समुद्रमें हो, आकाशमें हो अथवा स्वर्गमें हो अर्थात् त्रिलोकियोंमें कहीं भी कोई छोटा-से-छोटा अथवा बड़ा-से-बड़ा प्राणी हो, उसका पालन-पोषण भगवान् करते हैं। प्राणिमात्रके सुहृद् होनेसे वे अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंके द्वारा पाप-पुण्योंका नाश करके प्राणिमात्रको शुद्ध, पवित्र करते रहते हैं।
‘निर्गुणं गुणभोक्तुं च’ —वे परमात्मा सम्पूर्ण गुणोंसे रहित होनेपर भी सम्पूर्ण गुणोंके भोक्ता हैं। तात्पर्य है कि जैसे माता-पिता बालककी मात्र क्रियाओंको देखकर प्रसन्न होते हैं, ऐसे ही परमात्मा भक्तके द्वारा की हुई मात्र क्रियाओंको देखकर प्रसन्न होते हैं, अर्थात् भक्तलोग जो भी क्रियायें करते हैं, उन सब क्रियाओंके भोक्ता भगवान् ही बनते हैं।
परिशिष्ट भाव —इस प्रकरणमें ब्रह्मकी मुख्यता होनेपर भी प्रस्तुत श्लोकमें ‘समग्र’ परमात्माका वर्णन हुआ है। यह समग्र ही ज्ञेय-तत्त्व है। अतः समग्रकी मुख्यता ज्ञान और भक्ति—दोनोंमें है—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९), ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (छान्दोग्य० ३।१४।१)
इस श्लोकका तात्पर्य है कि एक परमात्माके सिवाय और किसीकी भी सत्ता नहीं है। हम जो कुछ भी कहेंगे, वह परमात्मासे अलग नहीं है। सबसे रहित भी वही है और सबके सहित भी वही है।
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥
| तत् | = वे (परमात्मा) | (प्राणियोंके रूपमें) | (वे ही हैं) |
|---|---|---|---|
| भूतानाम् | = सम्पूर्ण प्राणियोंके | एव | = भी (वे ही हैं) |
| बहिः, अन्तः | = बाहर-भीतर (परिपूर्ण हैं) | च | = एवं |
| च | = और | दूरस्थम् | = दूर-से-दूर |
| चरम्, अचरम् | = चर-अचर | च | = तथा |
| अन्तिके | = नजदीक-से-नजदीक भी | ||
| च | = और | ||
| तत् | = वे | ||
| सूक्ष्मत्वात् | = अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे | ||
| अविज्ञेयम् | = जाननेमें नहीं आते। |
व्याख्या —[ज्ञेय तत्त्वका वर्णन बारहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक—कुल छः श्लोकोंमें हुआ है। उनमेंसे यह पन्द्रहवाँ श्लोक चौथा है। इस श्लोकके अन्तर्गत पहलेके तीन श्लोकोंका और आगेके दो श्लोकोंका भाव भी आ गया है। अतः यह श्लोक इस प्रकरणका सार है।]
‘बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च’ —जैसे बर्फके बने हुए घड़ोंको समुद्रमें डाल दिया जाय तो उन घड़ोंके बाहर भी जल है, भीतर भी जल है और वे खुद भी (बर्फके बने होनेसे) जल ही हैं। ऐसे ही सम्पूर्ण चर-अचर प्राणियोंके बाहर भी परमात्मा हैं, भीतर भी परमात्मा हैं