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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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श्लोक १५ ]

  • साधक-संजीवनी *

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और वे खुद भी परमात्मस्वरूप ही हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे घड़ोंमें जलके सिवाय दूसरा कुछ नहीं है अर्थात् सब कुछ जल-ही-जल है, ऐसे ही संसारमें परमात्माके सिवाय दूसरा कोई तत्त्व नहीं है अर्थात् सब कुछ परमात्मा- ही-परमात्मा हैं। इसी बातको भगवान्ने महात्माओंकी दृष्टिसे 'वासुदेवः सर्वम्' (गीता ७।१९) और अपनी दृष्टिसे 'सदसच्चाहम्' (गीता ९।१९) कहा है।

'दूरस्थं चान्तिके च तत्'—किसी वस्तुका दूर और नजदीक होना तीन दृष्टियोंसे कहा जाता है—देशकृत, कालकृत और वस्तुकृत। परमात्मा तीनों ही दृष्टियोंसे दूर-से-दूर और नजदीक-से-नजदीक हैं; जैसे—दूर-से-दूर देशमें भी वे ही परमात्मा हैं और नजदीक-से-नजदीक देशमें भी वे ही परमात्मा हैं*; पहले-से-पहले भी वे ही परमात्मा थे, पीछे-से-पीछे भी वे ही परमात्मा रहेंगे और अब भी वे ही परमात्मा हैं; सम्पूर्ण वस्तुओंके पहले भी वे ही परमात्मा हैं, वस्तुओंके अन्तमें भी वे ही परमात्मा हैं और वस्तुओंके रूपमें भी वे ही परमात्मा हैं।

उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंके संग्रह और सुख-भोगकी इच्छा करनेवालेके लिये परमात्मा (तत्त्वतः समीप होनेपर भी) दूर हैं। परन्तु जो केवल परमात्माके ही सममुख है, उसके लिये परमात्मा नजदीक हैं। इसलिये साधकको सांसारिक भोग और संग्रहकी इच्छाका त्याग करके केवल परमात्म-प्राप्तिकी अभिलाषा जाग्रत करनी चाहिये। परमात्मप्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा होते ही परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् परमात्मासे नित्ययोगका अनुभव हो जाता है।

'सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयम्'—वे परमात्मा अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे इन्द्रियाँ और अन्तःकरणका विषय नहीं हैं अर्थात् वे परमात्मा इनकी पकड़में नहीं आते। अब प्रश्न उठता है कि जब जाननेमें नहीं आते, तो फिर उनका अभाव होगा? उनका अभाव नहीं है। जैसे परमाणुरूप जल सूक्ष्म होनेसे नेत्रोंसे नहीं दीखता, पर न दीखनेपर भी उसका

अभाव नहीं है। वह जल परमाणुरूपसे आकाशमें रहता है और स्थूल होनेपर बूँदें, ओले आदिके रूपमें दीखने लग जाता है। ऐसे ही परमात्मा अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिके द्वारा जाननेमें नहीं आते; क्योंकि वे इनसे परे हैं, अतीत हैं।

जीवोंके अज्ञानके कारण ही वे परमात्मा जाननेमें नहीं आते। जैसे, कहींपर 'श्रीमद्भगवद्गीता' शब्द लिखा हुआ है। जो पढ़ा-लिखा नहीं है, उसको तो केवल लकीरें ही दीखती हैं और जो पढ़-लिखा है, उसको 'श्रीमद्भगवद्गीता' दीखती है। संस्कृत पढ़े हुएको यह शब्द किस धातुसे बना हुआ है, इसका क्या अर्थ होता है—यह दीखने लग जाता है। गीताका मनन करनेवालेको गीताके गहरे भाव दीखने लग जाते हैं। ऐसे ही जिन मनुष्योंको परमात्मतत्त्वका ज्ञान नहीं है, उनको परमात्मा नहीं दीखते, उनके जाननेमें नहीं आते। परन्तु जिनको परमात्मतत्त्वका ज्ञान हो गया है, उनको तो सब कुछ परमात्मा-ही-परमात्मा दीखते हैं।

उस परमात्मतत्त्वको 'ज्ञेय' (इसी अध्यायका बारहवाँ और सत्रहवाँ श्लोक) भी कहा है और 'अविज्ञेय' भी कहा है। इसका तात्पर्य यह है कि वह स्वयंके द्वारा ही जाना जा सकता है, इसलिये वह 'ज्ञेय' है और वह इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिके द्वारा नहीं जाना जा सकता, इसलिये वह 'अविज्ञेय' है।

सर्वत्र परिपूर्ण परमात्माको जाननेके लिये यह आवश्यक है कि साधक परमात्माको सर्वत्र परिपूर्ण मान ले। ऐसा मानना भी जाननेकी तरह ही है। जैसे (बोध होनेपर) ज्ञान-(जानने-) को कोई मिटा नहीं सकता, ऐसे ही 'परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण है' इस मान्यता-(मानने-) को कोई मिटा नहीं सकता। जब सांसारिक मान्यताओं—'मैं ब्राह्मण हूँ', 'मैं साधु हूँ' आदिको (जो कि अवास्तविक हैं) कोई मिटा नहीं सकता, तब पारमार्थिक मान्यताओंको (जो कि

  • पृथ्वीसे दूर जल है, जलसे दूर तेज है, तेजसे दूर वायु है, वायुसे दूर आकाश है, आकाशसे दूर महत्तत्त्व है, महत्तत्त्वसे दूर प्रकृति है और प्रकृतिसे दूर परमात्मा हैं। इस तरह दूर-से-दूर परमात्मा हैं। दूर-से-दूर होते हुए भी वे परमात्मा व्यापकरूपसे सबमें हैं; क्योंकि परमात्मा सबके कारण हैं और कारण सब कार्यमें रहता है।

प्रकृतिसे नजदीक स्थूलशरीर है, स्थूलशरीरसे नजदीक सूक्ष्मशरीर है, सूक्ष्मशरीरसे नजदीक कारणशरीर है, कारणशरीरसे नजदीक अहम् है और अहम्से नजदीक परमात्मा है। इस तरह नजदीक-से-नजदीक परमात्मा हैं। परमात्मा जितने नजदीक हैं, उतना नजदीक दूसरा कोई भी नहीं है।