श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 889, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
वास्तविक हैं) कौन मिटा सकता है? तात्पर्य यह है कि दृढ़तापूर्वक मानना भी एक साधन है। जाननेकी तरह माननेकी भी बहुत महिमा है। 'परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण'
हैं'—ऐसा दृढ़तापूर्वक मान लेनेपर यह मान्यता मान्यता-रूपसे नहीं रहेगी, प्रत्युत इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे परे जो अत्यन्त सूक्ष्म परमात्मा हैं, उनका अनुभव हो जायगा।
परिशिष्ट भाव —परमात्माको बारहवें श्लोकमें 'ज्ञेय' कहा गया है। परन्तु इस श्लोकमें उनको 'अविज्ञेय' कहनेका तात्पर्य है कि परमात्मा ज्ञेय होनेपर भी संसारकी तरह ज्ञेय नहीं हैं। जैसे संसार इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे जाना जाता है, ऐसे परमात्मा इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे नहीं जाने जाते। इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि प्रकृतिके कार्य हैं और परमात्मा प्रकृतिसे अतीत हैं। प्रकृतिका कार्य प्रकृतिको भी पूरा नहीं जान सकता, फिर प्रकृतिसे अतीत परमात्माको जान ही कैसे सकता है? परमात्माको तो मानकर स्वीकार करना पड़ता है; क्योंकि स्वीकृति स्वयंमें होती है, करण (मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ)-में नहीं।* स्वयंकी परमात्माके साथ एकता है, इसलिये परमात्माकी प्राप्ति भी स्वीकृतिसे होती है, चिन्तन-मनन-वर्णन करनेसे नहीं। शरीर-संसारके साथ स्वयंकी एकता कभी हुई नहीं, है नहीं, होगी नहीं और हो सकती भी नहीं। परमात्मासे स्वयं कभी अलग हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं।
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।
भूतभर्तृ च तज्ञ्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १६ ॥
| तत् | = वे (परमात्मा) | इव | = तरह | उत्पन्न करनेवाले |
|---|---|---|---|---|
| अविभक्तम् | = (स्वयं) विभागरहित होते हुए | स्थितम् | = स्थित हैं | च |
| च | = भी | च | = और | भूतभर्तृ |
| भूतेषु | = सम्पूर्ण प्राणियोंमें | ज्ञेयम् | = (वे) जाननेयोग्य (परमात्मा ही) | च |
| विभक्तम् | = विभक्तकी | प्रभविष्णु | = सम्पूर्ण प्राणियोंको | ग्रसिष्णु |
व्याख्या —'अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्'—इस त्रिलोकीय देखने, सुनने और समझनेमें जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी आते हैं, उन सबमें परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी विभक्तकी तरह प्रतीत होते हैं। विभाग केवल प्रतीति है।
जिस प्रकार आकाश घट, मठ आदिकी उपाधिसे घटाकाश, मठाकाश आदिके रूपमें अलग-अलग दीखते हुए भी तत्त्वसे एक ही है, उसी प्रकार परमात्मा भिन्न-भिन्न प्राणियोंके शरीरोंकी उपाधिसे अलग-अलग दीखते हुए भी तत्त्वसे एक ही हैं।
इसी अध्यायके सताईसवें श्लोकमें 'समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्' पदोंसे परमात्माको सम्पूर्ण प्राणियोंमें
समभावसे स्थित देखनेके लिये कहा गया है। इसी तरह अठारहवें अध्यायके बीसवें श्लोकमें 'अविभक्तं विभक्तेषु' पदोंसे सात्त्विक ज्ञानका वर्णन करते हुए भी परमात्माको अविभक्तरूपसे देखनेको ही 'सात्त्विक ज्ञान' कहा गया है।
'भूतभर्तृ च तज्ञ्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च' — इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें 'विद्धि' पदसे जिस परमात्माको जाननेकी बात कही गयी है और बारहवें श्लोकमें जिस 'ज्ञेय' तत्त्वका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा की गयी है, उसीका यहाँ ब्रह्मा, विष्णु और शिवके रूपसे वर्णन हुआ है। वस्तुतः चैतन्य तत्त्व (परमात्मा) एक ही है। वे ही परमात्मा रजोगुणकी प्रधानता स्वीकार करनेसे ब्रह्मारूपसे सबको उत्पन्न करनेवाले; सत्त्वगुणकी प्रधानता स्वीकार करनेसे
- स्वीकृति स्वयंमें होती है, इसलिये स्वीकृतिवाली बात भूली नहीं जाती; जैसे—'मैं ब्राह्मण हूँ'; 'मैं विवाहित हूँ' आदि। परन्तु मन-बुद्धिमें होनेवाली बात भूली जाती है। स्वीकृतिवाली बातमें कोई सन्देह भी नहीं होता और विपरीत भावना भी नहीं होती।