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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 890

श्लोक १७]

  • साधक-संजीवनी *

८८९

विष्णुरूपसे सबका भरण-पोषण करनेवाले और तमोगुणकी प्रधानता स्वीकार करनेसे रूढ़रूपसे सबका संहार करनेवाले हैं। तात्पर्य है कि एक ही परमात्मा सृष्टि, पालन और संहार करनेके कारण ब्रह्मा, विष्णु और शिव नाम धारण

करते हैं*। यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि परमात्मा सृष्टि-रचनादि कार्यके लिये भिन्न-भिन्न गुणोंको स्वीकार करनेपर भी उन गुणोंके वशीभूत नहीं होते। गुणोंपर उनका पूर्ण आधिपत्य रहता है।

परिशिष्ट भाव— इस श्लोकमें परमात्माके समग्ररूपका वर्णन हुआ है। जैसे संसार भौतिक दृष्टिसे एक है, ऐसे ही वास्तविक तत्त्व (परमात्मा) भी एक है, अविभक्त है। परन्तु जैसे संसार पांचभौतिक दृष्टिसे एक होते हुए भी अनेक वस्तुओं, व्यक्तियों (जड़-चेतन, स्थावर-जंगम) आदिके रूपमें दीखता है, ऐसे ही परमात्मा एक होते हुए भी अनेक रूपोंमें दीखते हैं। तात्पर्य है कि परमात्मा एक होते हुए भी अनेक हैं और अनेक होते हुए भी एक हैं। वास्तविक सत्ता कभी दो हो सकती ही नहीं; क्योंकि दो होनेसे असत् आ जाता है।

उत्पन्न करनेवाले भी परमात्मा हैं और उत्पन्न होनेवाले भी परमात्मा हैं। भरण-पोषण करनेवाले भी परमात्मा हैं और जिनका भरण-पोषण होता है, वे भी परमात्मा हैं। संहार करनेवाले भी परमात्मा हैं और जिनका संहार होता है, वे भी परमात्मा हैं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ज्ञेय तत्त्वका आधाररूपसे वर्णन किया, अब आगेके श्लोकमें उसका प्रकाशकरूपसे वर्णन करते हैं।

ज्योतिषामपि तज्योतिस्तमसः परमुच्यते।

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विच्छितम् ॥ १७ ॥

तत्= वे (परमात्मा)तमसः= अज्ञानसेज्ञानगम्यम्= ज्ञानसे प्राप्त
ज्योतिषाम्= सम्पूर्ण ज्योतियोंकेपरम्= अत्यन्त परेकरनेयोग्य
अपि= भीउच्यते= कहे गये हैं।(और)
ज्योतिः= ज्योतिज्ञानम्= (वे)सर्वस्य= सबके
(और)ज्ञानस्वरूप,हृदि= हृदयमें
ज्ञेयम्= जाननेयोग्य,विच्छितम्= विराजमान हैं।

व्याख्या— ‘ज्योतिषामपि तज्योतिः’—ज्योति नाम प्रकाश-(ज्ञान-) का है अर्थात् जिनसे प्रकाश मिलता है, ज्ञान होता है, वे सभी ज्योति हैं। भौतिक पदार्थ सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, तारा, अग्नि, विद्युत् आदिके प्रकाशमें दीखते हैं; अतः भौतिक पदार्थोंकी ज्योति (प्रकाशक) सूर्य, चन्द्र आदि हैं।

वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक शब्दोंका ज्ञान कानसे होता है; अतः शब्दकी ज्योति (प्रकाशक) ‘कान’ है। शीत-उष्ण, कोमल-कठोर आदिके स्पर्शका ज्ञान त्वचासे होता है; अतः स्पर्शकी ज्योति (प्रकाशक) ‘त्वचा’ है। श्वेत, नील, पीत आदि रूपाँका ज्ञान नेत्रसे होता है; अतः रूपकी ज्योति (प्रकाशक) ‘नेत्र’ है। खट्टा, मीठा, नमकीन आदि रसोंका ज्ञान जिह्वासे होता है; अतः रसकी ज्योति

(प्रकाशक) ‘जिह्वा’ है। सुगन्ध-दुर्गन्धका ज्ञान नाकसे होता है; अतः गन्धकी ज्योति (प्रकाशक) ‘नाक’ है। इन पाँचों इन्द्रियोंसे शब्दादि पाँचों विषयोंका ज्ञान तभी होता है, जब उन इन्द्रियोंके साथ मन रहता है। अगर उनके साथ मन न रहे तो किसी भी विषयका ज्ञान नहीं होता। अतः इन्द्रियोंकी ज्योति (प्रकाशक) ‘मन’ है। मनसे विषयोंका ज्ञान होनेपर भी जबतक बुद्धि उसमें नहीं लगती, बुद्धि मनके साथ नहीं रहती, तबतक उस विषयका स्पष्ट और स्थायी ज्ञान नहीं होता। बुद्धिके साथ रहनेसे ही उस विषयका स्पष्ट और स्थायी ज्ञान होता है। अतः मनकी ज्योति (प्रकाशक) ‘बुद्धि’ है। बुद्धिसे कर्तव्य-अकर्तव्य, सत्-असत्, नित्य-अनित्यका ज्ञान होनेपर भी अगर स्वयं (कर्ता) उसको धारण नहीं करता, तो वह बौद्धिक ज्ञान ही

  • सृष्टिस्थित्यन्तकरणाद् ब्रह्माविष्णुशिवात्मकः। स संज्ञां याति भगवानेक एव जनार्दनः॥

( पद्मपुराण, सृष्टि० २।११४)