श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
रह जाता है; वह ज्ञान जीवनमें, आचरणमें नहीं आता। वह बात स्वयंमें नहीं बैठती। जो बात स्वयंमें बैठ जाती है, वह फिर कभी नहीं जाती। अतः बुद्धिकी ज्योति (प्रकाशक) ‘स्वयं’ है। स्वयं भी परमात्माका अंश है और परमात्मा अंशी है। स्वयंमें ज्ञान, प्रकाश परमात्मासे ही आता है। अतः स्वयंकी ज्योति (प्रकाशक) ‘परमात्मा’ है। उस स्वयंप्रकाश परमात्माको कोई भी प्रकाशित नहीं कर सकता।
तात्पर्य यह हुआ कि परमात्माका प्रकाश (ज्ञान) स्वयंमें आता है। स्वयंका प्रकाश बुद्धिमें, बुद्धिका प्रकाश मनमें, मनका प्रकाश इन्द्रियोंमें और इन्द्रियोंका प्रकाश विषयोंमें आता है। मूलमें इन सबमें प्रकाश परमात्मासे ही आता है। अतः इन सब ज्योतियोंका ज्योति, प्रकाशकोंका प्रकाशक परमात्मा ही है*। जैसे एक-एकके पीछे बैठे हुए परीक्षाधी अपनेसे आगे बैठे हुएको तो देख सकते हैं, पर अपनेसे पीछे बैठे हुएको नहीं, ऐसे ही अहम्, बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ आदि भी अपनेसे आगेवालेको तो देख (जान) सकते हैं, पर अपनेसे पीछेवालेको नहीं। जैसे सबसे पीछे बैठा हुआ परीक्षाधी अपने आगे बैठे हुए समस्त परीक्षाधियोंको देख सकता है, ऐसे ही परमप्रकाशक परमात्मा अहम्, बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ आदि सबको देखता है, प्रकाशित करता है, पर उसको कोई प्रकाशित नहीं कर सकता। वह परमात्मा सम्पूर्ण चर-अचर जगत्का समानरूपसे निरपेक्ष प्रकाशक है—‘यस्य भासा सर्वमिदं विभाति सचराचरम्’ (श्रीमद्भद्रा १०।१३।५५)। वहाँ प्रकाशक, प्रकाश और प्रकाश्य—यह त्रिपुटी नहीं है।
‘तमसः परमुच्यते’—वह परमात्मा अज्ञानसे अत्यन्त परे अर्थात् सर्वथा असम्बद्ध और निर्लिप्त है। इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहम्—इनमें तो ज्ञान और अज्ञान दोनों आते-जाते हैं; परन्तु जो सबका परम प्रकाशक है, उस परमात्मामें अज्ञान कभी आता ही नहीं, आ सकता ही नहीं और आना सम्भव ही नहीं। जैसे सूर्यमें अंधेरा कभी आता ही नहीं, ऐसे ही उस परमात्मामें अज्ञान कभी आता ही नहीं। अतः उस परमात्माको अज्ञानसे अत्यन्त परे कहा गया है।
‘ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यम्’—उस परमात्मामें कभी अज्ञान नहीं आता। वह स्वयं ज्ञानस्वरूप है और उसीसे सबको प्रकाश मिलता है। अतः उस परमात्माको ‘ज्ञान’ अर्थात्
ज्ञानस्वरूप कहा गया है।
इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिके द्वारा भी (जाननेमें आनेवाले) विषयोंका ज्ञान होता है, पर वे अवश्य जाननेयोग्य नहीं हैं; क्योंकि उनको जान लेनेपर भी जानना बाकी रह जाता है, जानना पूरा नहीं होता। वास्तवमें अवश्य जाननेयोग्य तो एक परमात्मा ही है—‘अवसि देखिअहि देखन जोगू॥’ (मानस १।२२९।३) उस परमात्माको जान लेनेके बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रहता। पन्द्रहवें अध्यायमें भगवान्ने अपने लिये कहा है कि ‘सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य मैं ही हूँ’ (पन्द्रहवें श्लोक); ‘जो मुझे जान लेता है, वह सर्ववित् हो जाता है’ (उन्नीसवें श्लोक)। अतः परमात्माको ‘ज्ञेय’ कहा गया है।
ज्ञानके द्वारा असत्का त्याग होनेपर परमात्माको तत्त्वसे जाना जा सकता है। अतः उस परमात्माको ‘ज्ञानगम्य’ कहा गया है।
‘हृदि सर्वस्य विच्छितम्’—वह परमात्मा सबके हृदयमें नित्य-निरन्तर विराजमान है। तात्पर्य है कि यद्यपि वह परमात्मा सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, अवस्था आदिमें परिपूर्णरूपसे व्यापक है, तथापि उसका प्राप्तिस्थान तो हृदय ही है।
उस परमात्माका अपने हृदयमें अनुभव करनेका उपाय है—
(१) मनुष्य हरेक विषयको जानता है तो उस जानकारीमें सत् और असत्—ये दोनों रहते हैं। इन दोनोंका विभाग करनेके लिये साधक यह अनुभव करे कि मेरी जो जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और बालकपन, जवानी, बुढ़ापा आदि अवस्थाएँ तो भिन्न-भिन्न हुई, पर मैं एक रहा। सुखदायी-दुःखदायी, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ आयीं और चली गयीं, पर उनमें मैं एक ही रहा। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिका संयोग-वियोग हुआ, पर उनमें भी मैं एक ही रहा। तात्पर्य यह हुआ कि अवस्थाएँ, परिस्थितियाँ, संयोग-वियोग तो भिन्न-भिन्न (तरह-तरहके) हुए, पर उन सबमें जो एक ही रहा है, भिन्न-भिन्न नहीं हुआ है, उसका (उन सबसे अलग करके) अनुभव करे। ऐसा करनेसे जो सबके हृदयमें विराजमान है, उसका अनुभव हो जायगा; क्योंकि यह स्वयं परमात्मासे अभिन्न है।
- (१) विषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता॥
सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥ (मानस १।१९७।३)
(२) जो ज्योतियोंका ज्योति है, सबसे प्रथम जो भासता। अव्यय सनातन दिव्य दीपक, सर्व विश्व प्रकाशता॥