श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 892, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १८ ]
- साधक-संजीवनी *
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(२) जैसे अत्यन्त भूखा अन्नके बिना और अत्यन्त प्यासा जलके बिना रह नहीं सकता, ऐसे ही उस परमात्माके बिना रह नहीं सके, बेचैन हो जाय। उसके बिना न भूख लगे, न प्यास लगे और न नींद आये। उस परमात्माके सिवाय और कहीं वृत्ति जाय ही नहीं। इस तरह
परिशिष्ट भाव —बारहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक जिस ज्ञेय-तत्त्वका वर्णन हुआ है, वह भगवान्का समग्ररूप ('वासुदेवः सर्वम्') ही है। कारण कि इसमें निर्गुण-निराकार (बारहवाँ श्लोक), सगुण-निराकार (तेरहवाँ श्लोक) और सगुण-साकार (सोलहवाँ श्लोक)—तीनों ही रूपोंका वर्णन हुआ है।
'ज्ञानगम्यम्' —परमात्मा तत्त्वज्ञानसे ही जाने जाते हैं, क्रिया, वस्तु आदिसे नहीं। तत्त्वज्ञानके सिवाय उनको जाननेका दूसरा कोई साधन नहीं है। मनुष्य कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग आदि जिस साधनसे परमात्माको जानेगा, वास्तवमें तत्त्वज्ञानसे ही जानेगा। श्रद्धा-भक्ति, विश्वास, भगवत्कृपा आदिसे भी जानेगा तो तत्त्वज्ञानसे ही जानेगा। कारण कि जानना ज्ञानसे ही होता है।
यहाँ 'ज्ञानगम्यम्' पदका अर्थ 'साधन-समुदायसे प्राप्त होनेयोग्य' भी लिया जा सकता है, जिसका वर्णन इसी अध्यायके सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक हुआ है।
सम्बन्ध—पहले श्लोकसे सत्रहवें श्लोकतक क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयका जो वर्णन हुआ है, अब आगेके श्लोकमें फलसहित उसका उपसंहार करते हैं।
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समाप्तः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥
| इति | = इस प्रकार | ज्ञेयम् | = ज्ञेयको | विज्ञाय | = तत्त्वसे |
|---|---|---|---|---|---|
| क्षेत्रम् | = क्षेत्र | समाप्तः | = संक्षेपसे | जानकर | |
| तथा | = तथा | उक्तम् | = कहा गया है। | मद्भावाय | = मेरे भावको |
| ज्ञानम् | = ज्ञान | मद्भक्तः | = मेरा भक्त | उपपद्यते | = प्राप्त हो |
| च | = और | एतत् | = इसको | जाता है। |
व्याख्या —'इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समाप्तः'—इसी अध्यायके पाँचवें और छठे श्लोकमें जिसका वर्णन किया गया है, वह 'क्षेत्र' है; सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक जिस साधन-समुदायका वर्णन किया गया है, वह 'ज्ञान' है और बारहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक जिसका वर्णन किया गया है, वह 'ज्ञेय' है। इस तरह मैंने क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयका संक्षेपसे वर्णन किया है।
'मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते' —मेरा भक्त
परिशिष्ट भाव —यहाँ 'मद्भक्त एतद्विज्ञाय' पदोंका तात्पर्य है कि समग्र परमात्माका ज्ञान भक्तिसे ही हो सकता है*। अतः साधकको भक्त होना चाहिये।
इस श्लोकमें आये 'मद्भावायोपपद्यते' पदको गीतामें कई प्रकारसे कहा गया है; जैसे—'मद्भावमागताः' (४।१०), 'मम साधर्म्यमागताः' (१४।२), 'मद्भवं सोऽधिगच्छति' (१४।१९)। 'मद्भाव' का अर्थ है—मुझ
क्षेत्रको, साधन-समुदायरूप ज्ञानको और ज्ञेय तत्त्व-(परमात्मा-) को तत्त्वसे जानकर मेरे भावको प्राप्त हो जाता है।
क्षेत्रको ठीक तरहसे जान लेनेपर क्षेत्रसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। ज्ञानको अर्थात् साधन-समुदायको ठीक तरहसे जाननेसे, अपनासे देहाभिमान (व्यक्तित्व) मिट जाता है। ज्ञेय तत्त्वको ठीक तरहसे जान लेनेपर उसकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् परमात्मतत्त्वके साथ अभिन्नाताका अनुभव हो जाता है।
- प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥ (मानस, उत्तर० ४९।३)