श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक १८ ]
- साधक-संजीवनी *
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(२) जैसे अत्यन्त भूखा अन्नके बिना और अत्यन्त प्यासा जलके बिना रह नहीं सकता, ऐसे ही उस परमात्माके बिना रह नहीं सके, बेचैन हो जाय। उसके बिना न भूख लगे, न प्यास लगे और न नींद आये। उस परमात्माके सिवाय और कहीं वृत्ति जाय ही नहीं। इस तरह
परिशिष्ट भाव —बारहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक जिस ज्ञेय-तत्त्वका वर्णन हुआ है, वह भगवान्का समग्ररूप ('वासुदेवः सर्वम्') ही है। कारण कि इसमें निर्गुण-निराकार (बारहवाँ श्लोक), सगुण-निराकार (तेरहवाँ श्लोक) और सगुण-साकार (सोलहवाँ श्लोक)—तीनों ही रूपोंका वर्णन हुआ है।
'ज्ञानगम्यम्' —परमात्मा तत्त्वज्ञानसे ही जाने जाते हैं, क्रिया, वस्तु आदिसे नहीं। तत्त्वज्ञानके सिवाय उनको जाननेका दूसरा कोई साधन नहीं है। मनुष्य कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग आदि जिस साधनसे परमात्माको जानेगा, वास्तवमें तत्त्वज्ञानसे ही जानेगा। श्रद्धा-भक्ति, विश्वास, भगवत्कृपा आदिसे भी जानेगा तो तत्त्वज्ञानसे ही जानेगा। कारण कि जानना ज्ञानसे ही होता है।
यहाँ 'ज्ञानगम्यम्' पदका अर्थ 'साधन-समुदायसे प्राप्त होनेयोग्य' भी लिया जा सकता है, जिसका वर्णन इसी अध्यायके सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक हुआ है।
सम्बन्ध—पहले श्लोकसे सत्रहवें श्लोकतक क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयका जो वर्णन हुआ है, अब आगेके श्लोकमें फलसहित उसका उपसंहार करते हैं।
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समाप्तः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥
| इति | = इस प्रकार | ज्ञेयम् | = ज्ञेयको | विज्ञाय | = तत्त्वसे |
|---|---|---|---|---|---|
| क्षेत्रम् | = क्षेत्र | समाप्तः | = संक्षेपसे | जानकर | |
| तथा | = तथा | उक्तम् | = कहा गया है। | मद्भावाय | = मेरे भावको |
| ज्ञानम् | = ज्ञान | मद्भक्तः | = मेरा भक्त | उपपद्यते | = प्राप्त हो |
| च | = और | एतत् | = इसको | जाता है। |
व्याख्या —'इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समाप्तः'—इसी अध्यायके पाँचवें और छठे श्लोकमें जिसका वर्णन किया गया है, वह 'क्षेत्र' है; सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक जिस साधन-समुदायका वर्णन किया गया है, वह 'ज्ञान' है और बारहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक जिसका वर्णन किया गया है, वह 'ज्ञेय' है। इस तरह मैंने क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयका संक्षेपसे वर्णन किया है।
'मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते' —मेरा भक्त
परिशिष्ट भाव —यहाँ 'मद्भक्त एतद्विज्ञाय' पदोंका तात्पर्य है कि समग्र परमात्माका ज्ञान भक्तिसे ही हो सकता है*। अतः साधकको भक्त होना चाहिये।
इस श्लोकमें आये 'मद्भावायोपपद्यते' पदको गीतामें कई प्रकारसे कहा गया है; जैसे—'मद्भावमागताः' (४।१०), 'मम साधर्म्यमागताः' (१४।२), 'मद्भवं सोऽधिगच्छति' (१४।१९)। 'मद्भाव' का अर्थ है—मुझ
क्षेत्रको, साधन-समुदायरूप ज्ञानको और ज्ञेय तत्त्व-(परमात्मा-) को तत्त्वसे जानकर मेरे भावको प्राप्त हो जाता है।
क्षेत्रको ठीक तरहसे जान लेनेपर क्षेत्रसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। ज्ञानको अर्थात् साधन-समुदायको ठीक तरहसे जाननेसे, अपनासे देहाभिमान (व्यक्तित्व) मिट जाता है। ज्ञेय तत्त्वको ठीक तरहसे जान लेनेपर उसकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् परमात्मतत्त्वके साथ अभिन्नाताका अनुभव हो जाता है।
- प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥ (मानस, उत्तर० ४९।३)
८९२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
परमात्माकी सत्ता। यह सिद्धान्त है कि सत्ता एक ही होती है, दो नहीं होती। भगवान्ने गीतामें ज्ञान और भक्ति—दोनोंमें ही अपने भावकी प्राप्ति बतायी है। 'ज्ञान' में इसका तात्पर्य है—ब्रह्मसे साधर्म्य होना अर्थात् जैसे ब्रह्म सत्-चित्-आनन्दरूप है, ऐसे ही ज्ञानी महापुरुषका भी सत्-चित्-आनन्दरूप होना। 'भक्ति' में इसका तात्पर्य है—भक्तकी भगवान्के साथ आत्मीयता अर्थात् अभिन्नता होना।
सम्बन्ध—इसी अध्यायके पहले और दूसरे श्लोकमें जिस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका संक्षेपसे वर्णन किया था, उसीका विस्तारसे वर्णन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।
प्रकृतिं पुरुषं चैव विदध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १९ ॥
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥
| प्रकृतिम् | = प्रकृति | गुणान् | = गुणोंको | हेतुः | = हेतु |
|---|---|---|---|---|---|
| च | = और | अपि | = भी | उच्यते | = कही जाती है |
| पुरुषम् | = पुरुष | प्रकृतिसम्भवान्, एव | = प्रकृतिसे ही | (और) | |
| उभौ | = दोनोंको | उत्पन्न | सुखदुःखानाम् | = सुख- | |
| एव | = ही (तुम) | विद्धि | = समझो। | दुःखोंके | |
| अनादी | = अनादि | कार्यकरणकर्तृत्वे | = कार्य और | भोक्तृत्वे | = भोक्तापनमें |
| विद्धि | = समझो | करणके द्वारा होनेवाली | पुरुषः | = पुरुष | |
| च | = और | क्रियाओंको उत्पन्न | हेतुः | = हेतु | |
| विकारान् | = विकारोंको | करनेमें | उच्यते | = कहा | |
| च | = तथा | प्रकृतिः | = प्रकृति | जाता है। |
व्याख्या —[इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रके विषयमें 'यच्च' (जो है), 'यादृक् च' (जैसा है), 'यद्विकारि' (जिन विकारोंवाला है) और 'यतश्च यत्' (जिससे जो उत्पन्न हुआ है)—ये चार बातें सुननेकी आज्ञा दी थी। उनमेंसे 'यच्च' का वर्णन पाँचवें श्लोकमें और 'यद्विकारि' का वर्णन छठे श्लोकमें कर दिया। 'यादृक् च' का वर्णन आगे इसी अध्यायके छब्बीसवें-सत्ताईसवें श्लोकोंमें करेंगे। अब 'यतश्च यत्' का वर्णन करते हुए प्रकृतिसे विकारों और गुणोंको उत्पन्न हुआ बताते हैं। इसमें भी देखा जाय तो विकारोंका वर्णन पहले छठे श्लोकमें 'इच्छा द्वेषः' आदि पदोंसे किया जा चुका है। यहाँ गुण प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं—यह बात नयी बतायी है।
बारहवेंसे अठारहवें श्लोकतक 'ज्ञेय तत्त्व'-(परमात्मा-) का वर्णन है और यहाँ उन्नीसवेंसे चौतीसवें श्लोकतक 'पुरुष'-(क्षेत्रज्ञ-) का वर्णन है। वहाँ तो ज्ञेय
तत्त्वके अन्तर्गत ही सब कुछ है और यहाँ पुरुषके अन्तर्गत सब कुछ है अर्थात् वहाँ ज्ञेय तत्त्वके अन्तर्गत पुरुष है और यहाँ पुरुषके अन्तर्गत ज्ञेय तत्त्व है। तात्पर्य यह है कि ज्ञेय तत्त्व (परमात्मा) और पुरुष (क्षेत्रज्ञ)—दोनों तत्त्वसे दो नहीं हैं, प्रत्युत एक ही हैं।]
'प्रकृतिं पुरुषं चैव विदध्यनादी उभावपि' —यहाँ 'प्रकृतिम्' पद सम्पूर्ण क्षेत्र-(जगत्-)की कारणरूप मूल प्रकृतिका वाचक है। सात प्रकृति-विकृति (पंचमहाभूत, अहंकार और महत्त्व) तथा सोलह विकृति (दस, इन्द्रियाँ, मन और पाँच विषय)—ये सभी प्रकृतिके कार्य हैं और प्रकृति इन सबकी मूल कारण है।
'पुरुषम्' पद यहाँ क्षेत्रज्ञका वाचक है, जिसको इसी अध्यायके पहले श्लोकमें क्षेत्रको जाननेवाला कहा गया है।
प्रकृति और पुरुष—दोनोंको अनादि कहनेका तात्पर्य है कि जैसे परमात्माका अंश यह पुरुष (जीवात्मा) अनादि
श्लोक १९-२० ]
- साधक-संजीवनी *
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है, ऐसे ही यह प्रकृति भी अनादि है। इन दोनोंके अनादिपनेमें फर्क नहीं है; किन्तु दोनोंके स्वरूपमें फर्क है। जैसे—प्रकृति गुणोंवाली है और पुरुष गुणोंसे सर्वथा रहित है; प्रकृतिमें विकार होता है और पुरुषमें विकार नहीं होता; प्रकृति जगत्की कारण बनती है और पुरुष किसीका भी कारण नहीं बनाता; प्रकृतिमें कार्य एवं कारण-भाव है और पुरुष कार्य एवं कारण-भावसे रहित है।
‘उभौ एव’ कहनेका तात्पर्य है कि प्रकृति और पुरुष—दोनों अलग-अलग हैं। अतः जैसे प्रकृति और पुरुष अनादि हैं, ऐसे ही उन दोनोंका यह भेद (विवेक) भी अनादि है।
इसी अध्यायके पहले श्लोकमें आये ‘इदं शरीरं क्षेत्रम्’ पदोंसे मनुष्य-शरीरकी तरफ ही दृष्टि जाती है अर्थात् व्यक्ति मनुष्य-शरीरका ही बोध होता है और ‘क्षेत्रज्ञः’ पदसे मनुष्य-शरीरको जाननेवाले व्यक्ति क्षेत्रज्ञका ही बोध होता है। अतः प्रकृति और उसके कार्यमात्रका बोध करानेके लिये यहाँ ‘प्रकृतिम्’ पदका और मात्र क्षेत्रज्ञोंका बोध करानेके लिये यहाँ ‘पुरुषम्’ पदका प्रयोग किया गया है।
इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें क्षेत्रज्ञकी परमात्माके साथ एकता जाननेके लिये ‘विद्धि’ पदका प्रयोग किया था और यहाँ पुरुषकी प्रकृतिसे भिन्नता जाननेके लिये ‘विद्धि’ पदका प्रयोग किया गया है। तात्पर्य है कि मनुष्य स्वयंको और शरीरको एक समझता है, इसलिये भगवान् यहाँ ‘विद्धि’ पदसे अर्जुनको यह आज्ञा देते हैं कि ये दोनों सर्वथा अलग-अलग हैं—इस बातको तुम ठीक तरहसे समझ लो।
‘विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्’—इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना और धृति—इन सात विकारोंको तथा सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न हुए समझो। इसका तात्पर्य यह है कि पुरुषमें विकार और गुण नहीं हैं।
सातवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें तो भगवान्ने गुणोंको अपनेसे उत्पन्न बताया है और यहाँ गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न बताते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि वहाँ भक्तिका प्रकरण होनेसे भगवान्ने गुणोंको अपनेसे उत्पन्न बताया है और गुणमयी मायासे तरनेके लिये अपनी शरणागति बतायी है। परन्तु यहाँ ज्ञानका प्रकरण होनेसे गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न बताया है। अतः साधक गुणोंसे
अपना सम्बन्ध न मानकर ही गुणोंसे छूट सकता है।
‘कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते’—आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन दस-(महाभूतों और विषयों-)का नाम ‘कार्य’ है। श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना, घ्राण, वाणी, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा तथा मन, बुद्धि और अहंकार—इन तेरह-(बहिःकरण और अन्तःकरण-)का नाम ‘करण’ है। इन सबके द्वारा जो कुछ क्रियाएँ होती हैं, उनको उत्पन्न करनेमें प्रकृति ही हेतु है।
जो उत्पन्न होता है, वह ‘कार्य’ कहलाता है और जिसके द्वारा कार्यकी सिद्धि होती है, वह ‘करण’ कहलाता है अर्थात् क्रिया करनेके जितने औजार (साधन) हैं, वे सब ‘करण’ कहलाते हैं। करण तीन तरहके होते हैं—(१) कर्मन्द्रियाँ, (२) ज्ञानेन्द्रियाँ और (३) मन, बुद्धि एवं अहंकार। कर्मन्द्रियाँ स्थूल हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ सूक्ष्म हैं और मन, बुद्धि एवं अहंकार अत्यन्त सूक्ष्म हैं। कर्मन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंको ‘बहिःकरण’ कहते हैं तथा मन, बुद्धि और अहंकारको ‘अन्तःकरण’ कहते हैं। जिनसे क्रियाएँ होती हैं, वे कर्मन्द्रियाँ हैं और कर्मन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियोंपर जो शासन करते हैं, वे मन, बुद्धि और अहंकार हैं। तात्पर्य है कि कर्मन्द्रियोंपर ज्ञानेन्द्रियोंका शासन है, ज्ञानेन्द्रियोंपर मनका शासन है, मनपर बुद्धिका शासन है और बुद्धिपर अहंकारका शासन है। मन, बुद्धि और अहंकारके बिना कर्मन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ काम नहीं करतीं। ज्ञानेन्द्रियोंके साथ जब मनका सम्बन्ध हो जाता है, तब विषयोंका ज्ञान होता है। मनसे जिन विषयोंका ज्ञान होता है, उन विषयोंमेंसे कौन-सा विषय ग्राह्य है और कौन-सा त्याज्य है, कौन-सा विषय ठीक है और कौन-सा बेठीक है—इसका निर्णय बुद्धि करती है। बुद्धिके द्वारा निर्णीत विषयोंपर अहंकार शासन करता है।
अहंकार दो तरहका होता है—(१) अहंवृत्ति और (२) अहंकर्ता। अहंवृत्ति किसीके लिये कभी दोषी नहीं होती, पर उस अहंवृत्तिके साथ जब स्वयं (पुरुष) अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है, तादात्म्य कर लेता है, तब वह अहंकर्ता बन जाता है। तात्पर्य है कि अहंवृत्तिसे मोहित होकर, उसके परवश होकर स्वयं उस अहंवृत्तिमें अपनी स्थिति मान लेता है तो वह कर्ता बन जाता है—‘अहंकार-विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३।२७)।
प्रकृतिका कार्य बुद्धि (महत्त्व) है और बुद्धिका कार्य अहंवृत्ति (अहंकार) है। यह अहंवृत्ति है तो बुद्धिका कार्य,
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
पर इसके साथ तादात्म्य करके स्वयं बुद्धिका मालिक बन जाता है अर्थात् कर्ता और भोक्ता बन जाता है—‘पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजानुगुणान् ’ (गीता १३।२१)। परन्तु जब तत्त्वका बोध हो जाता है, तब स्वयं न कर्ता बनता है और न भोक्ता ही बनता है—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ’ (गीता १३।३१)। फिर कर्तृत्व-भोक्तृत्वरहित पुरुषके शरीरद्वारा जो कुछ क्रियाएँ होती हैं, वे सब क्रियाएँ अहंवृत्तिसे ही होती हैं। इसी अहंवृत्तिके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको गीतामें कई तरहसे बताया गया है; जैसे—प्रकृतिके द्वारा ही सब क्रियाएँ होती हैं। (तेरहवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक); प्रकृतिके गुणोंद्वारा ही सब क्रियाएँ होती हैं (तीसरे अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक); गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (तीसरे अध्यायका अठ्ठाईसवाँ श्लोक); गुणोंके सिवाय दूसरा कोई कर्ता नहीं है (चौदहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक); इन्द्रियाँ ही अपने-अपने विषयोंमें बरत रही हैं (पाँचवें अध्यायका नवाँ श्लोक) आदि। तात्पर्य है कि बहिःकरण और अन्तःकरणके द्वारा जो क्रियाएँ होती हैं, वे सब प्रकृतिसे ही होती हैं।
‘पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते’ —अनुकूल परिस्थितिके आनेपर सुखी (राजी) होना—यह सुखका भोग है और प्रतिकूल परिस्थितिके आनेपर दुःखी (नाराज) होना—यह दुःखका भोग है। यह सुख-दुःखका भोग पुरुष-(चेतन)-में ही होता है—प्रकृति-(जड-)-में नहीं; क्योंकि जड प्रकृतिमें सुखी-दुःखी होनेकी सामर्थ्य नहीं है। अतः सुख-दुःखके भोकापनमें पुरुष हेतु कहा गया है। अगर पुरुष अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंसे मिलकर राजी-नाराज न हो तो वह सुख-दुःखका भोक्ता नहीं बन सकता।
सातवें अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें भगवान्ने अपना (जड) और परा (चेतन) नामसे अपनी दो प्रकृतियोंका वर्णन किया है। ये दोनों प्रकृतियाँ भगवान्के स्वभाव हैं, इसलिये ये दोनों स्वतः ही भगवान्की ओर जा रही हैं। परन्तु परा प्रकृति (चेतन), जो परमात्माका अंश ही है और जिसकी स्वाभाविक रूचि परमात्माकी ओर जानेकी ही है, तात्कालिक सुखभोगमें आकर्षित होकर
अपरा प्रकृति-(जड-)-के साथ तादात्म्य कर लेता है। इतना ही नहीं, प्रकृतिके साथ तादात्म्य करके वह ‘प्रकृतिस्थ पुरुष’के रूपमें अपनी एक स्वतन्त्र सत्ताका निर्माण कर लेता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक), जिसको ‘अहम्’ कहते हैं। इस ‘अहम्’ में जड और चेतन दोनों हैं। सुख-दुःखरूप जो विकार होता है, वह जड-अंशमें ही होता है, पर जडसे तादात्म्य होनेके कारण उसका परिणाम ज्ञाता चेतनपर होता है अर्थात् जडके सम्बन्धसे सुख-दुःखरूप विकारको चेतन अपनेमें मान लेता है कि ‘मैं सुखी हूँ’, ‘मैं दुःखी हूँ’। जैसे, घाटा लगता है दूकानमें, पर दूकानदार कहता है कि मुझे घाटा लग गया। ज्वर शरीरमें आता है, पर मान लेता है कि मेरेमें ज्वर आ गया। स्वयंमें ज्वर नहीं आता*, यदि आता तो कभी मिटता नहीं।
सुख-दुःखका परिणाम चेतनपर होता है, तभी वह सुख-दुःखसे मुक्ति चाहता है। अगर वह सुखी-दुःखी न हो, तो उसमें मुक्तिकी इच्छा हो ही नहीं सकती। मुक्तिकी इच्छा जडके सम्बन्धसे ही होती है; क्योंकि जडको स्वीकार करनेसे ही बन्धन हुआ है। जो अपनेको सुखी-दुःखी मानता है, वही सुख-दुःखरूप विकारसे अपनी मुक्ति चाहता है और उसीकी मुक्ति होती है। तात्पर्य है कि तादात्म्यमें मुक्ति-(कल्याण-)-की इच्छामें चेतनकी मुख्यता और भोगोंकी इच्छामें जडकी मुख्यता होती है, इसलिये अन्तमें कल्याणका भागी चेतन ही होता है, जड नहीं।
विकृतिमात्र जडमें ही होती है, चेतनमें नहीं। अतः वास्तवमें सुखी-दुःखी ‘होना’ चेतनका धर्म नहीं है, प्रत्युत जडके संगसे अपनेको सुखी-दुःखी ‘मानना’ ज्ञाता चेतनका स्वभाव है। तात्पर्य है कि चेतन सुखी-दुःखी होता नहीं, प्रत्युत (सुखाकार-दुःखाकार वृत्तिसे मिलकर) अपनेको सुखी-दुःखी मान लेता है। चेतनमें एक-दूसरेसे विरुद्ध सुख-दुःखरूप दो भाव हो ही कैसे सकते हैं? दो रूप परिवर्तनशील प्रकृतिमें ही हो सकते हैं। जो परिवर्तनशील नहीं है, उसके दो रूप नहीं हो सकते। तात्पर्य यह है कि सब विकार परिवर्तनशीलमें ही हो सकते हैं। चेतन स्वयं ज्यों-का-त्यों रहते हुए भी परिवर्तनशील प्रकृतिके संगसे उसके विकारोंको अपनेमें आरोपित करता रहता है। यह
- आत्मानं चेद विजानीयादयमसीति पुरुषः। किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुष्यंज्वरेत्॥
(बृहदारण्यक ४।४।१२)
‘यदि पुरुष आत्माको ‘मैं यही हूँ’ इस प्रकार विशेषरूपसे जान जाय, तो फिर क्या इच्छा करता हुआ और किस कामनासे शरीरके ज्वर-(ताप-)-से अनुत्पन्न हो?’
श्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
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सबका अनुभव भी है कि हम सुखमें दूसरे तथा दुःखमें हैं, पर हम एक ही रहते हैं; इसीलिये कभी सुखी होते दूसरे नहीं हो जाते। सुख और दुःख दोनों अलग-अलग हैं और कभी दुःखी होते हैं।
परिशिष्ट भाव— भगवान् क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागका ही प्रकृति और पुरुषके नामसे पुनः वर्णन करते हैं। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ व्यष्टि हैं और प्रकृति-पुरुष समष्टि हैं।
एक प्रकृति-विभाग है और एक पुरुष-विभाग है। शरीर तथा संसार प्रकृति-विभागमें हैं और आत्मा तथा परमात्मा पुरुष-विभागमें हैं। जैसे प्रकृति और पुरुष अनादि हैं, ऐसे ही इन दोनोंके भेदका ज्ञान अर्थात् विवेक भी अनादि है। अतः विवेक-दृष्टिसे देखें तो ये दोनों विभाग एक-दूसरेसे बिलकुल असम्बद्ध हैं अर्थात् दोनोंमें किंचिन्मात्र भी कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रकृति तो असत्, जड़ तथा दुःखरूप है और पुरुष सत्, चित् तथा आनन्दरूप है। प्रकृति नाशवान्, विकारी तथा क्रियाशील है और पुरुष अविनाशी, निर्विकार तथा अक्रिय है। प्रकृतिकी नित्यनिवृत्ति है और पुरुषकी नित्यप्राप्ति है। गीताके आरम्भमें भी भगवान्ने इसी विभागका वर्णन शरीर और शरीरी, देह और देही, सत् और असत् आदि नामोंसे किया है। अतः इस विभागको ठीक-ठीक समझना प्रत्येक साधकके लिये बहुत आवश्यक तथा शीघ्र बोध करानेवाला है। कारण कि शरीर और शरीरीको एक मानना ही बन्धन है और इन दोनोंको बिलकुल अलग-अलग अनुभव करना ही मुक्ति है।
भगवान् शक्तिमान् हैं और प्रकृति उनकी शक्ति है। ज्ञानकी दृष्टिसे शक्ति और शक्तिमान्—दोनों अलग-अलग हैं, क्योंकि शक्तिमें तो परिवर्तन (घटना-बदना) होता है, पर शक्तिमान् ज्यों-का-त्यों रहता है। परन्तु भक्तिकी दृष्टिसे शक्ति और शक्तिमान्—दोनों अभिन्न हैं, क्योंकि शक्तिको शक्तिमान्से अलग नहीं कर सकते अर्थात् शक्तिमान्के बिना शक्तिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। ज्ञान और भक्ति—दोनोंकी बात रखनेके लिये ही भगवान्ने प्रकृतिको न अनन्त कहा है और न सान्त कहा है, प्रत्युत 'अनादि' कहा है। कारण कि अगर प्रकृतिको अनन्त (नित्य) कहें तो ज्ञानका खण्डन हो जायगा; क्योंकि ज्ञानकी दृष्टिसे प्रकृतिकी सत्ता ही नहीं है—'नासतो विद्यते भावः' (गीता २।१६)। अगर प्रकृतिको सान्त (अनित्य) कहें तो भक्तिका खण्डन हो जायगा; क्योंकि भक्तिकी दृष्टिसे प्रकृति भगवान्की शक्ति होनेसे भगवान्से अभिन्न है—'सदसच्चाहम्' (गीता ९।१९)। वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो प्रकृति और पुरुषका स्वभाव अलग-अलग होते हुए भी दोनों परस्पर अभिन्न ही हैं।
वास्तवमें परमात्माका स्वरूप 'समग्र' है। परमात्मामें कोई शक्ति न हो—ऐसा सम्भव नहीं है। अगर परमात्माको सर्वथा शक्तिरहित मानें तो परमात्मा एकदेशीय ही सिद्ध होंगे। उनमें शक्तिका परिवर्तन अथवा अदर्शन तो हो सकता है, पर शक्तिका अभाव नहीं हो सकता। शक्ति कारणरूपसे उनमें रहती ही है, अन्यथा परमात्माके सिवाय शक्ति (प्रकृति) के रहनेका स्थान कहाँ होगा? इसलिये यहाँ प्रकृति और पुरुष दोनोंको 'अनादि' कहा गया है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने पुरुषको सुख-दुःखके भोगनेमें हेतु बताया। इसपर प्रश्न होता है कि कौन-सा पुरुष सुख-दुःखका भोक्ता बनता है? इसका उत्तर अब भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
पुरुषः प्रकृतितस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजानुगुणान् ॥
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥
| प्रकृतितस्थः | = प्रकृतिमें स्थित | भुङ्क्ते | = भोक्ता बनता है | सदसद्योनिजन्मसु | = ऊँच-नीच |
|---|---|---|---|---|---|
| पुरुषः | = पुरुष (जीव) | (और) | योनियोंमें जन्म | ||
| हि | = ही | गुणसङ्गः | = गुणोंका संग | लेनेका | |
| प्रकृतिजान् | = प्रकृतिजन्म | (ही) | कारणम् | = कारण | |
| गुणान् | = गुणोंका | अस्य | = इसके | बनता है। |
१-पुरुष ही अहम्को स्वीकार करनेसे जीव, क्षेत्रज्ञ, शरीरी, देही आदि नामोंसे कहा जाता है।
२-'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्' (श्वेताश्वतर० ४।१०)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
व्याख्या—‘पुरुषः प्रकृतिस्थो’ * हि भुङ्क्ते प्रकृतिजानुगुणान् —वास्तवमें पुरुष प्रकृति-(शरीर-) में स्थित है ही नहीं। परन्तु जब वह प्रकृति-(शरीर-) के साथ तादात्म्य करके शरीरको ‘मैं’ और ‘मेरा’ मान लेता है, तब वह प्रकृतिमें स्थित कहा जाता है। ऐसा प्रकृतिस्थ पुरुष ही (गुणोंके द्वारा रचित अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिको सुखदायी-दुःखदायी मानकर) अनुकूल परिस्थितिके आने-पर सुखी होता है और प्रतिकूल परिस्थितिके आनेपर दुःखी होता है। यही पुरुषका प्रकृतिजन्म गुणोंका भोक्ता बनना है।
जैसे मोटर-दुर्घटनामें मोटर और चालक—दोनोंका हाथ रहता है। क्रियाके होनेमें तो केवल मोटरकी ही प्रधानता रहती है, पर दुर्घटनाका फल (दण्ड) मोटरसे अपना सम्बन्ध जोड़नेवाले चालक-(कर्ता-) को ही भोगना पड़ता है। ऐसे ही सांसारिक कार्योंको करनेमें प्रकृति और पुरुष—दोनोंका हाथ रहता है। क्रियाओंके होनेमें तो केवल शरीरकी ही प्रधानता रहती है, पर सुख-दुःखरूप फल शरीरसे अपना सम्बन्ध जोड़नेवाले पुरुष-(कर्ता-) को ही भोगना पड़ता है। अगर वह शरीरके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े और सम्पूर्ण क्रियाओंको प्रकृतिके द्वारा ही होती हुई माने (गीता—तेरहवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक), तो वह उन क्रियाओंका फल भोगनेवाला नहीं बनेगा।
‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ —जिन योनियोंमें सुखको बहुलता होती है, उनको ‘सत्-योनि’ कहते हैं और जिन योनियोंमें दुःखको बहुलता होती है, उनको ‘असत्-योनि’ कहते हैं। पुरुषका सत्-असत् योनियोंमें जन्म लेनेका कारण गुणोंका संग ही है।
सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृतिसे उत्पन्न
परिशिष्ट भाव —भगवान्ने उन्नीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें एवं बीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें ‘प्रकृति’ का वर्णन किया है और बीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें और यहाँ इक्कीसवें श्लोकमें ‘पुरुष’ का वर्णन किया है।
वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके साथ सम्बन्ध ही ‘गुणसंग’ है, जो जन्म-मरणका कारण है। गुणोंका संग अनित्य है और गुणोंसे असंगता नित्य है। असंगता हमारा स्वरूप है—‘असंगो ह्ययं पुरुषः ’ (बृहदा० ४।३।१५)। अगर हम अनित्य (गुणोंके संग)-को न पकड़ें तो जन्म-मरण हो ही नहीं सकता।
‘मैं’ जड़ (प्रकृति) है और ‘हूँ’ चेतन (पुरुष) है तथा ‘मैं हूँ’—यह जड़-चेतनका तादात्म्य है। इस ‘मैं हूँ’ में ही कर्तापन और भोक्तापन रहता है। अगर ‘मैं’ न रहे तो ‘हूँ’ नहीं रहेगा, प्रत्युत ‘है’ रहेगा। जैसे लोहे और अग्निमें तादात्म्य
- यहाँ पुरुषको ‘प्रकृतिस्थ’ कहनेका तात्पर्य ‘शरीरस्थ’ कहना ही है। उन्नीसवें श्लोकसे प्रकृति-पुरुषका प्रकरण चल रहा है, इसीलिये यहाँ पुरुषको प्रकृतिस्थ कहा गया है। वास्तवमें पुरुष प्रकृतिस्थ अथवा शरीरस्थ नहीं है। अपनेको स्वस्थ न माननेसे अर्थात् ‘स्व’ में अपनी स्थितिका अनुभव न करनेसे ही वह अपनेको शरीरस्थ मानता है।
होते हैं। इन तीनों गुणोंसे ही सम्पूर्ण पदार्थों और क्रियाओंको उत्पत्ति होती है। प्रकृतिस्थ पुरुष जब इन गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब ये उसके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बन जाते हैं।
प्रकृतिमें स्थित होनेसे ही पुरुष प्रकृतिजन्म गुणोंका भोक्ता बनता है और यह गुणोंका संग, आसक्ति, प्रियता ही पुरुषको ऊँच-नीच योनियोंमें ले जानेका कारण बनती है। अगर यह प्रकृतिस्थ न हो, प्रकृति-(शरीर-) में अहंता-ममता न करे, अपने स्वरूपमें स्थित रहे, तो यह पुरुष सुख-दुःखका भोक्ता कभी नहीं बनता, प्रत्युत सुख-दुःखमें सम हो जाता है, स्वस्थ हो जाता है (गीता—चौदहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। अतः यह प्रकृतिमें भी स्थित हो सकता है और अपने स्वरूपमें भी। अन्तर इतना ही है कि प्रकृतिमें स्थित होनेमें तो यह परतन्त्र है और स्वरूपमें स्थित होनेमें यह स्वाभाविक स्वतन्त्र है। बन्धनमें पड़ना इसका अस्वाभाविक है और मुक्त होना इसका स्वाभाविक है। इसलिये बन्धन इसको सुहाता नहीं है और मुक्त होना इसको सुहाता है।
जहाँ प्रकृति और पुरुष—दोनोंका भेद (विवेक) है, वहाँ ही प्रकृतिके साथ तादात्म्य करनेका, सम्बन्ध जोड़नेका अज्ञान है। इस अज्ञानसे ही यह पुरुष स्वयं प्रकृतिके साथ तादात्म्य कर लेता है। तादात्म्य कर लेनेसे यह पुरुष अपनेको प्रकृतिस्थ अर्थात् प्रकृति-(शरीर-) में स्थित मान लेता है। प्रकृतिस्थ होनेसे शरीरमें ‘मैं’ और ‘मेरा-पन’ हो जाता है। यही गुणोंका संग है। इस गुणसंगसे पुरुष बँध जाता है (गीता—चौदहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। गुणोंके द्वारा बँध जानेसे ही पुरुषकी गुणोंके अनुसार गति होती है (गीता—चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)।
श्लोक २२ ]
- साधक-संजीवनी *
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न रहनेसे लोहा पृथ्वीपर ही रह जाता है और अग्नि निराकार अग्नि-तत्त्वमें लीन हो जाती है, ऐसे ही अहम् तो प्रकृतिमें ही रह जाता है और 'हूँ' ('है' का स्वरूप होनेसे) 'है' में ही विलीन हो जाता है। 'है' में कर्तापन और भोक्तापन नहीं है। तात्पर्य है कि भोगोंमें 'हूँ' खिंचता है, 'है' नहीं खिंचता। 'हूँ' ही कर्ता-भोक्ता बनता है, 'है' 'कर्ता-भोक्ता' नहीं बनता। अतः साधक 'हूँ' को न मानकर 'है' को ही माने अर्थात् अनुभव करे।
सुख-दुःखके आने-जानेका और स्वयंके रहनेका अनुभव सबको है। पापी-से-पापी मनुष्यको भी इसका अनुभव है। ऐसा अनुभव होनेपर भी मनुष्य आगन्तुक सुख-दुःखके साथ मिलकर सुखी-दुःखी हो जाता है। इसका कारण यह है कि सुखकी आसक्ति और दुःखका भय रहनेसे 'मैं अलग हूँ और सुख-दुःख अलग हूँ'—यह विवेक काम नहीं करता। वास्तवमें स्वयं सुखी-दुःखी नहीं होता, प्रत्युत शरीरके साथ मिलकर अपनेको सुखी-दुःखी मान लेता है। तात्पर्य है कि सुख-दुःख केवल अविवेकपूर्वक की गयी मान्यतापर टिके हुए हैं।
सम्बन्ध—उन्नीसवें, बीसवें और इक्कीसवें श्लोकमें प्रकृति और पुरुषका वर्णन हुआ। अब आगेके श्लोकमें पुरुषका विशेषतासे वर्णन करते हैं।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः ॥ २२ ॥
यह पुरुष—
| उपद्रष्टा | = (शरीरके साथ सम्बन्ध रखनेसे) | भोक्ता | = (उसके संगसे सुख-दुःख भोगनेसे) | परमात्मा | = 'परमात्मा'— |
|---|---|---|---|---|---|
| 'उपद्रष्ट', | 'भोक्ता' | इति | = इस नामसे | ||
| अनुमन्ता | = (उसके साथ मिलकर सम्मति, अनुमति देनेसे) | च | = और | उक्तः | = कहा जाता है। |
| 'अनुमन्ता', | महेश्वरः | = (अपनेको उसका स्वामी माननेसे) | (यह) | ||
| भर्ता | = (अपनेको उसका भरण-पोषण करनेवाला माननेसे) | 'महेश्वर' (बन जाता है)। | अस्मिन् | = इस | |
| 'भर्ता', | च | = परन्तु | देहे, अपि | = देहमें रहता हुआ भी | |
| पुरुषः | = (स्वरूपसे यह) | (देहसे) | |||
| पुरुष | परः | = पर (सर्वथा सम्बन्धरहित) | |||
| ही है। |
व्याख्या —'उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः'—यह पुरुष स्वरूपसे नित्य है, सब जगह परिपूर्ण है, स्थिर है, अचल है, सदा रहनेवाला है (गीता—दूसरे अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। ऐसा होता हुआ भी जब यह प्रकृति और उसके कार्य शरीरकी तरफ दृष्टि डालता है अर्थात् उनके साथ अपना सम्बन्ध मानता है, तब इसकी 'उपद्रष्टा' संज्ञा हो जाती है।
यह हरेक कार्यके करनेमें सम्मति, अनुमति देता है। अतः इसका नाम 'अनुमन्ता' है।
यह एक व्यक्ति शरीरके साथ मिलकर, उसके साथ तादात्म्य करके अन्न-जल आदिसे शरीरका पालन-पोषण करता है; शीत-उष्ण आदिसे उसका संरक्षण करता है।
अतः इसका नाम 'भर्ता' हो जाता है।
यह शरीरके साथ मिलकर अनुकूल परिस्थितिके आनेसे अपनेको सुखी मानता है और प्रतिकूल परिस्थितिके आनेसे अपनेको दुःखी मानता है। अतः इसकी 'भोक्ता' संज्ञा हो जाती है।
यह अपनेको शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि तथा धन, सम्पत्ति आदिका मालिक मानता है। अतः यह 'महेश्वर' नामसे कहा जाता है।
'परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः'—पुरुष सर्वोत्कृष्ट है, परम आत्मा है, इसलिये शास्त्रोंमें इसको 'परमात्मा' नामसे कहा गया है। यह देहमें रहता हुआ भी देहके सम्बन्धसे स्वतः रहित है। आगे इसी अध्यायके
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
इकतीसवें श्लोकमें इसके विषयमें कहा गया है कि यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है। इस श्लोकमें एक ही तत्त्वको भिन्न-भिन्न उपाधियोंके सम्बन्धसे 'उपद्रष्टा' आदि पदोंसे सम्बोधित किया गया है, इसलिये इन पृथक्-पृथक् नामोंसे पुरुषके ही स्वरूपका
परिशिष्ट भाव —वास्तवमें पुरुष 'पर' ही है, पर अन्यके सम्बन्धसे वह उपद्रष्टा, अनुमन्ता आदि बन जाता है। जैसे, मनुष्य पुत्रके सम्बन्धसे 'पिता', पिताके सम्बन्धसे 'पुत्र', पत्नीके सम्बन्धसे 'पति', बहनेके सम्बन्धसे 'भाई' आदि बन जाता है। ये सम्बन्ध अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये ही हैं, ममता करनेके लिये नहीं। वास्तविक स्वरूप तो 'पर' अर्थात् सर्वथा सम्बन्धरहित ही है।
यहाँ उपद्रष्टा, अनुमन्ता आदि अनेक उपाधियोंका तात्पर्य एकतामें है कि चेतन तत्त्व वास्तवमें एक ही है। ज्ञानके प्रकरणमें प्रकृति और पुरुष दोका ही वर्णन मुख्य है। अतः यहाँ आये उपद्रष्टा, अनुमन्ता, ईश्वर आदि सब शब्द 'पुरुष'के वाचक समझने चाहिये।
सम्बन्ध—उन्नीसवें श्लोकसे बाईसवें श्लोकतक प्रकृति और पुरुषका विवेचन करके अब आगेके श्लोकमें उन दोनोंको तत्त्वसे जाननेका फल बताते हैं।
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥
| एवम् | = इस प्रकार | यः | = जो मनुष्य | हुआ |
|---|---|---|---|---|
| पुरुषम् | = पुरुषको | वेत्ति | = (अलग-अलग) | अपि |
| च | = और | जानता है, | भूयः | |
| गुणैः | = गुणोंके | सः | = वह | न, |
| सह | = सहित | सर्वथा | = सब तरहका | अभिजायते |
| प्रकृतिम् | = प्रकृतिको | वर्तमानः | = बर्ताव करता |
व्याख्या—'य एवं वेत्ति' 'न स भूयोऽभिजायते'— पूर्वश्लोकमें 'देहेऽस्मिन् पुरुषः परः' पदोंसे पुरुषको देहसे पर अर्थात् सम्बन्धरहित कहा है, उसीको यहाँ 'एवम्' पदसे कहते हैं कि जो साधक इस तरह पुरुषको देहसे, प्रकृतिसे पर अर्थात् सम्बन्धरहित जान लेता है तथा विकार, कार्य, करण, विषय आदि रूपसे जो कुछ भी संसार दीखता है, वह सब प्रकृति और उसके गुणोंका कार्य है—ऐसा यथार्थरूपसे जान लेता है, वह फिर वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिके अनुसार प्राप्त कर्तव्यकर्मको करता हुआ भी पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता। कारण कि जन्म होनेमें गुणोंका संग ही कारण है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।
यहाँ 'सर्वथा वर्तमानोऽपि' पदोंमें निषिद्ध आचरण नहीं लेना चाहिये; क्योंकि जो अपनेको देहेके सम्बन्धसे रहित अनुभव करता है और गुणोंके सहित प्रकृतिको
वर्णन समझना चाहिये। वास्तवमें उसमें किसी प्रकारका भेद नहीं है। जैसे एक ही व्यक्ति देश, काल, वेश, सम्बन्ध आदिके अनुसार भिन्न-भिन्न (पिता, चाचा, नाना, भाई आदि) नामोंसे पुकारा जाता है, ऐसे ही पुरुष भिन्न-भिन्न नामोंसे पुकारा जानेपर भी वास्तवमें एक ही है।
अपनेसे अलग अनुभव करता है, उसमें असत् वस्तुओंकी कामना पैदा हो ही नहीं सकती। कामना न होनेसे उसके द्वारा निषिद्ध आचरण होना असम्भव है; क्योंकि निषिद्ध आचरणके होनेमें कामना ही हेतु है (गीता—तीसरे अध्यायका सौतीसवाँ श्लोक)।
भगवान् यहाँ साधकको अपना वास्तविक स्वरूप जाननेके लिये सावधान करते हैं, जिससे वह अच्छी प्रकार जान ले कि स्वरूपमें वस्तुतः कोई भी क्रिया नहीं है। अतः वह किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं है और कर्ता न होनेके कारण वह भोक्ता भी नहीं होता। साधक जब अपने-आपको अकर्ता जान लेता है, तब उसका कर्तापनका अभिमान स्वतः नष्ट हो जाता है और उसमें क्रियाकी फलासक्ति भी नहीं रहती। फिर भी उसके द्वारा शास्त्रविहित क्रियाएँ स्वतः होती रहती हैं। गुणातीत होनेके कारण वह पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता।
श्लोक २४ ]
- साधक-संजीवनी *
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परिशिष्ट भाव —पूर्वश्लोकमें आये 'देहेऽस्मिन् पुरुषः परः' की व्याख्या इस श्लोकमें करते हैं। जिसका विवेक जाग्रत् हो गया है अर्थात् 'देहेऽस्मिन् पुरुषः परः'—यह अनुभवमें आ गया है, वह अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार सब कर्म करते हुए भी निर्लप रहता है। वास्तवमें मनुष्यमात्रका स्वरूप निर्लिप्त ही है, पर गुणोंके संगसे वह लिप्त हो जाता है और बार-बार जन्मता-मरता है (इसी अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। गुणोंका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ है, पुरुषके साथ नहीं (इसी अध्यायका उन्नीसवाँ-बीसवाँ श्लोक)।
'सर्वथा वर्तमानोऽपि' पदोंमें आये 'अपि' का तात्पर्य है कि वह आसक्त मनुष्यकी तरह सब बर्ताव करता हुआ भी निर्वाकार रहता है (गीता—तीसरे अध्यायका पचीसवाँ श्लोक)।
'न स भूयोऽभिजायते'—जैसे छाछसे निकला हुआ मक्खन पुनः छाछमें मिलकर दही नहीं बनता, ऐसे ही प्रकृतिजन्म गुणोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर मनुष्य पुनः गुणोंसे नहीं बँधता। उसकी ब्रह्मसे सधर्मता हो जाती है अर्थात् जैसे ब्रह्माका जन्म-मरण नहीं होता, ऐसे ही उसका भी जन्म-मरण नहीं होता।
छठे अध्यायके इक्तीसवाँ श्लोकमें आया है—'सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते' और यहाँ आया है—'सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते'। छठे अध्यायमें आये 'स योगी मयि वर्तते' पदोंमें प्रेमकी प्राप्ति है और यहाँ आये 'न स भूयोऽभिजायते' पदोंमें बोधकी प्राप्ति है। प्रेम और बोध—दोनोंमें ही गुणोंका संग नहीं रहता। दोनोंमें अन्तर यह है कि बोधमें तो जन्म-मरणसे मुक्ति होती है, पर प्रेममें मुक्तिके साथ-साथ भगवान्से अभिन्नता होती है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जन्मरहित होनेमें प्रकृति-पुरुषको यथार्थ जानना कारण बताया। अब यह जिज्ञासा होती है कि क्या जन्म-मरणसे रहित होनेका और भी कोई उपाय है? इसपर भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें चार साधन बताते हैं।
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥
| केचित् | = कई मनुष्य | योगेन | = सांख्ययोगके द्वारा | आत्मना | = अपने-आपसे |
|---|---|---|---|---|---|
| ध्यानेन | = ध्यानयोगके द्वारा, | च | = और | आत्मनि | = अपने-आपमें |
| अन्ये | = कई | अपरे | = कई | आत्मानम् | = परमात्मतत्त्वका |
| साङ्ख्येन, | कर्मयोगेन | = कर्मयोगके द्वारा | पश्यन्ति | = अनुभव करते हैं। |
व्याख्या —'ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मान-मात्मना'—पाँचवाँ अध्यायके सताईसवाँ-अट्ठाईसवाँ श्लोकोंमें; छठे अध्यायके दसवाँसे अट्ठाईसवाँ श्लोकतक; और आठवाँ अध्यायके आठवाँसे चौदहवाँ श्लोकतक जो सगुण-साकार, निर्गुण-निराकार आदिके ध्यानका वर्णन हुआ है, उस ध्यानमें जिसकी जैसी रुचि, ब्रह्मा-विश्वास और योग्यता है, उसके अनुसार ध्यान करके कई साधक अपने-आपसे अपनेमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं।
जो सम्बन्ध-विच्छेद प्रकृति और पुरुषको अलग-अलग जाननेसे होता है, वह सम्बन्ध-विच्छेद ध्यानसे भी होता है। ध्यान न तो चित्तकी मूढ़ वृत्तिमें होता है और न क्षिप्त वृत्तिमें होता है। ध्यान विक्षिप्त वृत्तिमें आरम्भ होता है। चित्त जब स्वरूपमें एकाग्र हो जाता है, तब समाधि हो जाती है। एकाग्र होनेपर चित्त निरुद्ध हो जाता है। इस
तरह जिस अवस्थामें चित्त निरुद्ध हो जाता है। उस अवस्थामें चित्त संसार, शरीर, वृत्ति, चिन्तन आदिसे भी उपरत हो जाता है। उस समय ध्यानयोगी अपने-आपसे अपने-आपमें अपना अनुभव करके सन्तुष्ट हो जाता है (गीता—छठे अध्यायका उन्नीसवाँ-बीसवाँ श्लोक)।
'अन्ये साङ्ख्येन योगेन'—दूसरे अध्यायके ग्यारहवाँसे तीसवाँ श्लोकतक; चौथे अध्यायके तैंतीसवाँसे उन्नालीसवाँ श्लोकतक; पाँचवाँ अध्यायके आठवाँ, नववाँ तथा तेरहवाँसे छब्बीसवाँ श्लोकतक; और बारहवाँ अध्यायके चौथे-पाँचवाँ आदि श्लोकोंमें कहे हुए सांख्ययोगके द्वारा कई साधक अपने-आपसे अपनेमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं।
सांख्ययोग नाम है विवेकका। उस विवेकके द्वारा सत्-असत्का निर्णय हो जाता है कि 'सत्' नित्य है,
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
सर्वव्यापक है, स्थिर स्वभाववाला है, अचल है, अव्यक्त है, अचिन्त्य है; और 'असत्' चल है, अनित्य है, विकारी है, परिवर्तनशील है। ऐसे विवेक-विचारसे सांख्ययोगी प्रकृति और उसके कार्यसे बिलकुल अलग हो जाता है और अपने-आपसे अपने-आपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव कर लेता है।
'कर्मयोगेन चापरे' —दूसरे अध्यायके सैतालीसवेंसे तिरपनवें श्लोकतक; तीसरे अध्यायके सातवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक; चौथे अध्यायके सोलहवेंसे बतीसवें श्लोकतक; पाँचवें अध्यायके छठे-सातवें आदि श्लोकोंमें कहे हुए कर्मयोगके द्वारा कई साधक अपने-आपसे अपनेमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं।
जो सम्बन्ध-विच्छेद प्रकृति और पुरुषको अलग-अलग जाननेसे होता है, वह सम्बन्ध-विच्छेद कर्मयोगसे भी होता है। कर्मयोगी जो कुछ भी करे, वह केवल
परिशिष्ट भाव — जैसे पूर्वश्लोकमें विवेकके महत्त्वको मुक्तिका उपाय बताया, ऐसे ही यहाँ ध्यानयोग आदि अन्य उपाय बताते हैं। गीतामें ध्यानयोगसे परमात्मप्राप्तिकी बात छठे अध्यायके अठ्ठाईसवें श्लोकमें कही है, सांख्ययोगसे परमात्मप्राप्तिकी बात दूसरे अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें कही है और कर्मयोगसे परमात्मप्राप्तिकी बात दूसरे अध्यायके इकहत्तरवें श्लोकमें कही है। ये सभी परमात्मप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन हैं।
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातिरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥
| अन्ये | = दूसरे मनुष्य | तु | = पर | च, ते | = ऐसे वे |
|---|---|---|---|---|---|
| एवम् | = इस प्रकार | अन्येभ्यः | = दूसरोंसे | श्रुतिपरायणाः | = सुननेके अनुसार |
| ( ध्यानयोग, | ( जीवन्मुक्त | आचरण करनेवाले | |||
| सांख्ययोग, | महापुरुषोंसे) | मनुष्य | |||
| कर्मयोग | श्रुत्वा | = सुनकर | अपि | = भी | |
| आदि | एव | = ही | मृत्युम् | = मृत्युको | |
| साधनोंको) | उपासते | = उपासना | अतिरन्ति | = तर | |
| अजानन्तः | = नहीं जानते, | करते हैं, | जाते हैं। |
व्याख्या —'अन्ये त्वेवमजानन्तः'……'मृत्युं श्रुति-परायणाः'—कई ऐसे तत्त्वप्राप्तिकी उत्कण्ठावाले मनुष्य हैं, जो ध्यानयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, हठयोग, लययोग आदि साधनोंको समझते ही नहीं; अतः वे साधन उनके अनुष्ठानमें भी नहीं आते। ऐसे मनुष्य केवल तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंकी आज्ञाका पालन करके मृत्युको तर
संसारके हितके लिये ही करे। यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि जो कुछ भी करे, वह सब मात्र प्राणियोंके कल्याणके लिये ही करे, अपने लिये नहीं। ऐसा करनेसे स्वयंका उन क्रियाओंसे, पदार्थ, शरीर आदिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और अपने-आपसे अपनेमें परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।
मनुष्यने स्वाभाविक ही अपनेमें देहको स्वीकार किया है, माना है। इस मान्यताको दूर करनेके लिये अपनेमें परमात्माको देखना अर्थात् देहकी जगह अपनेमें परमात्माको मानना बहुत आवश्यक है।
अपनेमें परमात्माको देखना करणनिरपेक्ष होता है। करणसापेक्ष ज्ञान प्रकृतिके सम्बन्धसे होता है। इसलिये साधक किसी करणके द्वारा परमात्मामें स्थित नहीं होता, प्रत्युत स्वयं ही स्थित होता है स्वयंकी परमात्मामें स्थिति किसी करणके द्वारा हो ही नहीं सकती।
जाते हैं अर्थात् तत्त्वज्ञानको प्राप्त कर लेते हैं। जैसे धनी आदमीकी आज्ञाका पालन करनेसे धन मिलता है, ऐसे ही तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंकी आज्ञाका पालन करनेसे तत्त्वज्ञान मिलता है। हाँ, इसमें इतना फरक है कि धनी जब देता है, तब धन मिलता है; परन्तु सन्त-महापुरुषोंकी आज्ञाका पालन करनेसे, उनके मनके, संकेतके, आज्ञाके
श्लोक २६ ]
- साधक-संजीवनी *
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अनुसार तत्परतापूर्वक चलनेसे मनुष्य स्वतः उस परमात्म-तत्त्वको प्राप्त हो जाता है, जो कि सबको सदासे ही स्वतः-स्वाभाविक प्राप्त है। कारण कि धन तो धनीके अधीन होता है, पर परमात्मतत्त्व किसीके अधीन नहीं है।
शरीरके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही मृत्यु होती है। जो मनुष्य महापुरुषोंकी आज्ञाके परायण हो जाते हैं, उनका शरीरसे माना हुआ सम्बन्ध छूट जाता है। अतः वे मृत्युको तर जाते हैं अर्थात् वे पहले शरीरकी मृत्युसे अपनी मृत्यु मानते थे, उस मान्यतासे रहित हो जाते हैं।
ऐसे श्रुतिपरायण साधकोंकी तीन श्रेणियाँ होती हैं— १—यदि साधकमें सांसारिक सुख-भोगकी इच्छा नहीं है, केवल तत्त्वप्राप्तिकी ही उत्कट अभिलाषा है और वह जिनकी आज्ञाका पालन करता है, वे अनुभवी महापुरुष हैं, तो साधकको शीघ्र ही परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।
२—यदि साधकमें सुखभोगकी इच्छा शेष है, तो केवल महापुरुषकी आज्ञाका पालन करनेसे ही उसकी उस इच्छाका नाश हो जायगा और उसको परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी।
३—साधक जिनकी आज्ञाका पालन करता है, वे अनुभवी महापुरुष नहीं हैं, पर साधकमें किंचिन्मात्र भी
परिशिष्ट भाव —जिन मनुष्योंमें शास्त्रोंको समझनेकी योग्यता नहीं है, जिनका विवेक कमजोर है, पर जिनके भीतर मृत्युसे तरनेकी उत्कट अभिलाषा है, ऐसे मनुष्य भी जीवन्मुक्त सन्त-महात्माओंकी आज्ञाका पालन करके मृत्युको तर जाते हैं।
उपनिषद्में एक कथा आती है। जबालाका पुत्र सत्यकाम गौतम ऋषिके पास उपदेश लेने गया। ऋषिने उसको चार सौ कृश तथा निर्बल गायें देकर कहा कि तू इनके पीछे-पीछे जा। सत्यकामने उत्साहपूर्वक कहा कि इनकी संख्या एक हजार होनेपर ही मैं वापिस आऊँगा। ऐसा कहकर वह उन गायोंको वनमें ले गया और वहाँ उनका पालन-पोषण करने लगा। बहुत वर्ष बीतनेपर जब उनकी संख्या एक हजार हो गयी, तब एक साँड़ने उससे कहा कि हमारी संख्या एक हजार हो गयी है, अब तू हमारेको आचार्यके पास पहुँचा दे, ऐसा कहकर उस साँड़ने सत्यकामको ब्रह्मके प्रथम पादका उपदेश दिया। दूसरे ही दिन सत्यकाम गायोंको लेकर गुरुकुलकी ओर रवाना हो गया। रास्तेमें उसको अग्निने ब्रह्मके दूसरे पादका, हंसने ब्रह्मके तीसरे पादका और मदगु [एक जलचर पक्षी]—ने ब्रह्मके चौथे पादका उपदेश दिया। इस प्रकार रास्तेमें ही ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके वह गौतम ऋषिके पास पहुँचा। गुरुके पूछनेपर उसने सारी बात बतायी और उनसे अपने श्रीमुखसे उपदेश देनेकी प्रार्थना की। तब गौतम ऋषिने उसको उपदेश दिया (छान्दोग्य० चौथा अध्याय, चौथेसे नवें खण्डतक)। इस तरह केवल तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त महापुरुषकी आज्ञा माननेसे ही सत्यकामको तत्त्वज्ञान हो गया।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि श्रुतिपरायण साधक भी मृत्युको तर जाते हैं, तो अब प्रश्न होता है कि जन्म-मरणके होनेमें क्या कारण है? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
यावत्सज्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजड्भम् ।
क्षेत्रक्षेत्रत्रज्ञसंयोगान्निद्रिद्धि
भरतर्षभ ॥ २६ ॥
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
भरतर्षभ | = हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! | यावत्, | | क्षेत्रक्षेत्रज्ञ- | ---|---|---|---|---|--- स्थावर- | | किञ्चित् | = जितने भी | संयोगात् | = क्षेत्र और जड़मम् | = स्थावर और | सत्त्वम् | = प्राणी | | क्षेत्रज्ञके संयोगसे जंगम | | सञ्जायते | = पैदा होते हैं, | | (उत्पन्न हुए) | | तत् | = उनको (तुम) | विद्धि | = समझो।
व्याख्या —‘यावत्संजायते’“क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्”—स्थिर रहनेवाले वृक्ष, लता, दूब, गुल्म, त्वक्सार, बेंत, बाँस, पहाड़ आदि जितने भी स्थावर प्राणी हैं और चलने-फिरनेवाले मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, मछली, कछुआ आदि जितने भी जंगम (थलचर, जलचर, नभचर) प्राणी हैं, वे सब-के-सब क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही पैदा होते हैं।
उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थ ‘क्षेत्र’ हैं और जो इस क्षेत्रको जाननेवाला, उत्पत्ति-विनाशरहित एवं सदा एकरस रहनेवाला है, वह ‘क्षेत्रज्ञ’ है। उस क्षेत्रज्ञ-(प्रकृतिस्थ पुरुष-)का जो शरीरके साथ मैं-मेरेपनका सम्बन्ध मानना है—यही क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका संयोग है। इस माने हुए संयोगके कारण ही इस जीवको स्थावर-जंगम योनियोंमें
जन्म लेना पड़ता है। इसी क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके संयोगको पहले इक्कीसवें श्लोकमें ‘गुणसंगः’ पदसे कहा है। तात्पर्य यह हुआ कि निरन्तर परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके साथ तादात्म्य कर लेनेसे स्वयं जीवात्मा भी अपनेको जन्मने-मरनेवाला मान लेता है।
[ स्थावर-जंगम प्राणियोंके पैदा होनेकी बात तो यहाँ ‘संजायते’ पदसे कह दी और उनके मरनेकी बात आगेके श्लोकमें ‘विनश्यत्पु’ पदसे कहेंगे। ]
‘तद्विद्धि भरतर्षभ’—यह क्षेत्रज्ञ क्षेत्रके साथ अपना सम्बन्ध मानता है, इसीसे इसका जन्म होता है; परन्तु जब यह शरीरके साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता, तब इसका जन्म नहीं होता—इस बातको तुम ठीक समझ लो।
परिशिष्ट भाव — यहाँ ‘यावत्संजायते’ के अन्तर्गत जरायुज-अण्डज-उद्भिज्ज-स्वेदज, जलचर-नभचर-थलचर, मनुष्य, देवता, पितर, भूत, प्रेत, पिशाच आदि सम्पूर्ण प्राणी लेने चाहिये। सातवें अध्यायके छठे श्लोकमें भी ‘एतद्योनीनि भूतानि’ पदोंसे यही बात कही गयी है।
भक्तिके प्रकरणमें भगवान्ने परा और अपरा—दोनोंको अपनी प्रकृति बताकर कहा कि ‘इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं और मैं ही सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ’ (गीता—सातवें अध्यायका छठा श्लोक)। परन्तु यहाँ ज्ञानके प्रकरणमें भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण प्राणी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे उत्पन्न होते हैं। तात्पर्य है कि भक्तिके प्रकरणमें भगवान् अपनी तरफ दृष्टि कराते हैं; क्योंकि भक्तका भगवान्पर ही दृढ़ विश्वास होता है। उसके साधन और साध्य—दोनों भगवान् ही होते हैं। परन्तु ज्ञानमें भगवान् क्षेत्रज्ञ (स्वरूप)-की ओर दृष्टि कराते हैं कि क्षेत्रके साथ तादात्म्य करनेके कारण ही वह जन्म-मृत्युरूप बन्धनमें पड़ा है। यहाँ प्रश्न होता है कि आकर्षण एवं मिलन (संयोग) सजातीयतामें ही होता है, फिर विजातीय क्षेत्र (जड़) के साथ क्षेत्रज्ञ (चेतन)-का संयोग कैसे हुआ? इसका उत्तर है कि जैसे रात और दिनका संयोग नहीं हो सकता, ऐसे ही क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका भी संयोग नहीं हो सकता। परन्तु परमात्माका अंश होनेके कारण क्षेत्रज्ञमें यह शक्ति है कि वह विजातीय वस्तुको भी पकड़ सकता है, उसके साथ अपना सम्बन्ध मान सकता है। उसको यह स्वतन्त्रता भगवान्ने ही दी है। परन्तु उसने इस स्वतन्त्रताका दुरुपयोग किया अर्थात् भगवान्के साथ सम्बन्ध न मानकर संसारके साथ सम्बन्ध मान लिया और जन्म-मरणके चक्रमें पड़ गया (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि क्षेत्र-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध रखनेसे, उसकी तरफ दृष्टि रखनेसे यह पुरुष जन्म-मरणमें जाता है, तो अब प्रश्न होता है कि इस जन्म-मरणके चक्करसे छूटनेके लिये उसको क्या करना चाहिये? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
श्लोक २७ ]
- साधक-संजीवनी *
१०३
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्सर्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥
| यः | = जो | परमेश्वरम् | = परमेश्वरको | पश्यति | = देखता है, |
|---|---|---|---|---|---|
| विनश्यत्सु | = नष्ट होते हुए | अविनश्यन्तम् | = नाशरहित (और) | सः | = वही |
| सर्वेषु | = सम्पूर्ण | समम् | = समरूपसे | पश्यति | = (वास्तवमें सही) |
| भूतेषु | = प्राणियोंमें | तिष्ठन्तम् | = स्थित | देखता है । |
व्याख्या—‘समं सर्वेषु भूतेषु’— परमात्माको सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम कहनेका तात्पर्य है कि सभी प्राणी विषम हैं अर्थात् स्थावर-जंगम हैं, सात्त्विक-राजस-तामस हैं, आकृतिसे छोटे-बड़े, लम्बे-चौड़े हैं, नाना वर्णवाले हैं—इस प्रकार तरह-तरहके जितने भी प्राणी हैं, उन सब प्राणियोंमें परमात्मा समरूपसे स्थित हैं। वे परमात्मा किसीमें छोटे-बड़े, कम-ज्यादा नहीं हैं।
पहले इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रज्ञके साथ अपनी एकता बताते हुए कहा था कि तू सम्पूर्ण प्राणियोंमें क्षेत्रज्ञ मेरेको समझ, उसी बातको यहाँ कहते हैं कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्मा समरूपसे स्थित हैं।
‘तिष्ठन्तम्’— सम्पूर्ण प्राणी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय—इन तीन अवस्थाओंमें जाते हैं; सर्ग-प्रलय, महासर्ग-महाप्रलयमें जाते हैं; ऊँच-नीच गतियोंमें, योनियोंमें जाते हैं अर्थात् सभी प्राणी किसी भी क्षण स्थिर नहीं रहते। परन्तु परमात्मा उन सब अस्थिर प्राणियोंमें नित्य-निरन्तर एकरूपसे स्थित रहते हैं।
‘परमेश्वरम्’— सभी प्राणी अपनेको किसी-न-किसीका ईश्वर अर्थात् मालिक मानते ही रहते हैं; परन्तु परमात्मा उन सभी प्राणियोंके तथा सम्पूर्ण जड-चेतन संसारके परम ईश्वर हैं।
‘विनश्यत्सर्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति’— प्रतिक्षण विनाशकी तरफ जानेवाले प्राणियोंमें विनाशरहित,
सदा एकरूप रहनेवाले परमात्माको जो निर्विकार देखता है, वही वास्तवमें सही देखता है। तात्पर्य है कि जो परिवर्तनशील शरीरके साथ अपने-आपको देखता है, उसका देखना सही नहीं है; किन्तु जो सदा ज्यों-के-त्यों रहनेवाले परमात्माके साथ अपने-आपको अभिनरूपसे देखता है, उसका देखना ही सही है।
पहले इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका ज्ञान ही मेरे मतमें ज्ञान है, उसी बातको यहाँ कहते हैं कि जो नष्ट होनेवाले प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित और सम देखता है, उसका देखना (ज्ञान) ही सही है। तात्पर्य है कि जैसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगमें क्षेत्रमें तो हरदम परिवर्तन होता है, पर क्षेत्रज्ञ ज्यों-का-त्यों ही रहता है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न और नष्ट होते हैं, पर परमात्मा सब अवस्थाओंमें समानरूपसे स्थित रहते हैं।
पीछेके (छब्बीसवें) श्लोकमें भगवान्ने यह बताया कि जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, वे सभी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही पैदा होते हैं। परन्तु उन दोनोंमें क्षेत्र तो किसी भी क्षण स्थिर नहीं रहता और क्षेत्रज्ञ एक क्षण भी नहीं बदलता। अतः क्षेत्रज्ञसे क्षेत्रका जो निरन्तर वियोग हो रहा है, उसका अनुभव कर ले। इस (सत्ताईसवें) श्लोकमें भगवान् यह बताते हैं कि उत्पन्न और नष्ट होनेवाले सम्पूर्ण विषम प्राणियोंमें जो परमात्मा नाशरहित और समानरूपसे स्थित रहते हैं, उनके साथ अपनी एकताका अनुभव कर ले।
परिशिष्ट भाव— जैसे आकाशमें कभी सूर्यका प्रकाश फैल जाता है, कभी अँधेरा छा जाता है, कभी धुआँ छा जाता है, कभी काले-काले बादल छा जाते हैं, कभी बिजली चमकती है, कभी वर्षा होती है, कभी ओले गिरते हैं, कभी तरह-तरहके शब्द होते हैं, गर्जना होती है; परन्तु आकाशमें कोई फर्क नहीं पड़ता। वह ज्यों-का-त्यों निर्लिप्त-निर्विकार रहता है। ऐसे ही सर्वत्र परिपूर्ण सत्तामें कभी महासर्ग और महाप्रलय होता है, कभी सर्ग और प्रलय होता है, कभी जन्म और मृत्यु होती है, कभी अकाल पड़ता है, कभी बाढ़ आती है, कभी भूचाल आता है, कभी घमासान युद्ध होता है; परन्तु सत्तामें कोई फर्क नहीं पड़ता। कितनी ही उथल-पुथल हो जाय, पर सत्ता ज्यों-की-त्यों निर्लिप्त-निर्विकार रहती है। यह निर्विकारता स्वाभाविक है, जबकि विकार (संग) कुत्रिम है, माना हुआ है। बद्ध हो या मुक्त, पापी हो या धर्मात्मा, यह निर्विकार सत्ता दोनोंमें समानरूपसे स्थित है।
१०४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
जैसे, गंगाजी निरन्तर बहती रहती हैं, पर जिसके ऊपर बहती हैं, वह आधारशिला ज्यों-की-त्यों स्थिर रहती है। गंगाजीका जल कभी स्वच्छ होता है, कभी मटमैला होता है। कभी जल कम हो जाता है, कभी बाढ़ आ जाती है। कभी तपे पहाड़पर वर्षा होनेसे जल गरम हो जाता है, कभी ठण्डा हो जाता है। कभी तेज प्रवाहके कारण जल आवाज करने लगता है, कभी शान्त हो जाता है। परन्तु आधारशिला ज्यों-की-त्यों रहती है, उसमें कभी कोई फर्क नहीं पड़ता। इसी तरह कभी जलमें मछलियाँ आ जाती हैं, कभी साँप आदि जन्तु आ जाते हैं, कभी लकड़ीके सिलिपट तैरते हुए आ जाते हैं, कभी पुष्प बहते हुए आ जाते हैं, कभी कूड़ा-कचरा आ जाता है, कभी मैला आ जाता है, कभी गोबर आ जाता है, कभी कोई मुर्दा बहता हुआ आ जाता है, कभी कोई जीवित व्यक्ति तैरता हुआ आ जाता है। ये सब तो आकर चले जाते हैं, पर आधारशिला ज्यों-की-त्यों अचल-निर्विकार रहती है। ऐसे ही सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदि निरन्तर बह रही है, पर स्वयं (चिन्मय सत्ता) ज्यों-का-त्यों अचल रहता है। परिवर्तन और विनाश देश, काल आदिमें होता है, स्वयंमें नहीं।
‘यः पश्यति स पश्यति’—ये पद पाँचवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें साधनके विषयमें आये हैं और प्रस्तुत श्लोकमें सिद्धिके विषयमें आये हैं। इसीको आगे अठारहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें व्यतिरेकरीतिसे कहा गया है कि जो आत्माको कर्ता देखता है, वह दुर्मीत ठीक नहीं देखता—‘न स पश्यति दुर्मीतः’।
सम्बन्ध—अब भगवान् नष्ट होनेवाले सम्पूर्ण प्राणियोंमें अविनाशी परमात्माको देखनेका फल बताते हैं।
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्यात्मान्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥
| हि | = क्योंकि | पश्यन् | = देखनेवाला मनुष्य | ततः | = इसलिये (वह) |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वत्र | = सब जगह | आत्मना | = अपने-आपसे | पराम् | = परम |
| समवस्थितम् | = समरूपसे स्थित | आत्मानम् | = अपनी | गतिम् | = गतिको |
| ईश्वरम् | = ईश्वरको | न, हिनस्ति | = हिंसा नहीं करता, | याति | = प्राप्त हो जाता है। |
| समम् | = समरूपसे |
व्याख्या—‘समं पश्यन्हि’ ‘‘‘हिनस्यात्मान्मानम्’’—जो मनुष्य स्थावर-जंगम, जड़-चेतन प्राणियोंमें, ऊँच-नीच योनियोंमें, तीनों लोकोंमें समान रीतिसे परिपूर्ण परमात्माको देखता है अर्थात् उस परमात्माके साथ अपनी अभिन्नताका अनुभव करता है, वह अपने द्वारा अपनी हत्या नहीं करता।
जो शरीरके साथ तादात्म्य करके शरीरके बढ़नेसे अपना बढ़ना और शरीरके घटनेसे अपना घटना, शरीरके बीमार होनेसे अपना बीमार होना और शरीरके नीरोग होनेसे अपना नीरोग होना, शरीरके जन्मनेसे अपना जन्मना और शरीरके मरनेसे अपना मरना मानता है तथा शरीरके विकारोंको अपने विकार मानता है, वह अपने-आपसे अपनी हत्या करता है अर्थात् अपनेको जन्म-मरणके चक्करमें ले जाता है। परन्तु जिसकी दृष्टि शरीरकी तरफसे हटकर केवल सर्वव्यापक, सबके सासक परमात्माकी तरफ हो जाती है, वह फिर अपनी
हत्या नहीं करता अर्थात् जन्म-मरणके चक्करमें नहीं जाता, अपनेमें संसार और शरीरके विकारोंका अनुभव नहीं करता।
वास्तवमें अपने-आपकी (स्वरूपकी) हत्या अर्थात् अभाव कभी कोई कर ही नहीं सकता और अपना अभाव कभी हो भी नहीं सकता तथा अपना अभाव करना कोई चाहता भी नहीं। वास्तवमें नाशवान् शरीरके साथ तादात्म्य करना ही अपनी हत्या करना है, अपना पतन करना है, अपने-आपको जन्म-मरणमें ले जाना है।
‘ततो याति परां गतिम्’—शरीरके साथ तादात्म्य करके जो ऊँच-नीच योनियोंमें भटकता था, बार-बार जन्मता-मरता था, वह जब परमात्माके साथ अपनी अभिन्नताका अनुभव कर लेता है, तब वह परमगतिको अर्थात् नित्यप्राप्त परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
मार्मिक बात
परमात्मतत्त्व सब देशमें है, सब कालमें है, सम्पूर्ण
श्लोक २८ ]
- साधक-संजीवनी *
१०५
व्यक्तियोंमें है, सम्पूर्ण वस्तुओंमें है, सम्पूर्ण घटनाओंमें है, सम्पूर्ण परिस्थितियोंमें है, सम्पूर्ण क्रियाओंमें है। वह सबमें एक रूपसे, समान रीतिसे ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है। अब उसको प्राप्त करना कठिन है तो सुगम क्या होगा? जहाँ चाहो, वहीं प्राप्त कर लो। वास्तवमें इस संसारका जो 'है'-पना दीखता है, वह संसारका नहीं है। संसार तो एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता। इसमें केवल परिवर्तन-ही-परिवर्तन है। यह केवल परिवर्तनका ही पुंज है। जैसे पंखा तेजीसे घूमता है तो एक चक्र दीखता है, पर वास्तवमें वहाँ चक्र नहीं है, प्रत्युत पंखेकी ताड़ी ही चक्ररूपसे दीखती है। ऐसे ही यह संसार 'नहीं' होते हुए भी 'है'-रूपसे दीखता है। वास्तवमें एक परमात्मतत्त्व ही 'है'-रूपसे विद्यमान है।
विचार करें, अभी जितने शरीर आदि दीखते हैं, ये सौ वर्ष पहले थे क्या? और सौ वर्ष बाद रहेंगे क्या? ये पहले भी नहीं थे और अन्तमें भी नहीं रहेंगे; अतः ये बीचमें भी नहीं हैं। परन्तु परमात्मा सृष्टिके पैदा होनेसे पहले भी था, सृष्टिके लीन होनेके बाद भी रहेगा, अतः परमात्मा सृष्टिके समय भी ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है। जो पहले भी नहीं था, बादमें भी नहीं रहेगा, वह अभी भी नहीं है; और जो पहले भी था, बादमें भी रहेगा, वह अभी भी है। अतः संसारका जो 'है'-पना दीखता है, यह गलती है। परमात्मतत्त्व ही 'है'-रूपसे दीखता है। उस परमात्मतत्त्वकी सत्यतासे ही यह असत्य संसार मोह-(मूर्खा-ता)- के कारण सत्यकी तरह दीखता है—
जाम्बु सत्यता तँ जड् माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥
(मानस १।११७।४)
यदि मोह नहीं होगा, तो यह संसार नहीं दीखेगा, प्रत्युत एक परमात्मतत्त्व ही दीखेगा—'वासुदेवः सर्वम्' (गीता ७।१९)। कारण कि परमात्मा ही था, परमात्मा ही रहेगा, बीचमें दूसरा कहाँसे आयेगा? सोनेके जितने गहने हैं, उनमें पहले सोना ही था फिर सोना ही रहेगा; अतः बीचमें सोनेके सिवाय दूसरा कहाँसे आयेगा? गहना तो केवल (रूप, आकृति, उपयोग आदिको लेकर) कहनेके लिये है, तत्त्वतः तो सोना ही है। ऐसे ही संसार केवल कहनेके लिये है, तत्त्वतः तो परमात्मा ही है। उस परमात्माका अनुभव करनेमें ही मनुष्य-जन्मकी सफलता है।
'है'-(परमात्मा-) का अनुभव न करके 'नहीं'-
(संसार-) में उलझ जाना मनुष्यता नहीं है, प्रत्युत पशुता है। इस पशुताका त्याग करना है—'पशुबुद्धिमिमां जहि' (श्रीमद्भागवत १२।५।२)। इसलिये भगवान् कहते हैं कि जो नष्ट होनेवाले प्राणियोंमें नष्ट न होनेवाले परमात्माको देखता है, उसका देखना सही है। परन्तु जो नष्ट होनेवालेको देखता है और नष्ट न होनेवालेको नहीं देखता, वह आत्मघाती है—
योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते।
किं तेन न कृतं पापं चौरिणात्मापहारिणा॥
(महाभारत, उद्योग ४२।३७)
'जो अन्य प्रकारका (अविनाशी) होते हुए भी आत्माको अन्य प्रकारका (विनाशी) मानता है, उस आत्मघाती चोरने कौन-सा पाप नहीं किया?'
जो नाशवान् संसारको न देखकर सब जगह समानरूपसे परिपूर्ण परमात्मतत्त्वको देखता है, वह आत्मघाती नहीं होता अर्थात् वह अपने द्वारा अपनी हत्या नहीं करता, इसलिये वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। परन्तु जो सब जगह परिपूर्ण परमात्मतत्त्वको न देखकर संसार-शरीरको देखता है, वह आत्मघाती परमगतिको न प्राप्त होकर बार-बार जन्मता-मरता रहता है, दुःख पाता रहता है। इसलिये मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे (गीता—छठे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)।
जैसे दर्पणमें मुख नहीं होनेपर भी मुख दीखता है और स्वप्नमें हाथी नहीं होनेपर भी हाथी दीखता है, ऐसे ही संसार नहीं होनेपर भी संसार दीखता है। अगर संसारकी तरफ दृष्टि न रहे तो संसार 'है'-रूपसे नहीं दीखेगा। परमात्मा ही 'है'-रूपसे दीख रहा है—इस बातको साधक दृढ़तासे मान ले, फिर चाहे वह अभी न दीखे, पर बादमें दीखने लग जायगा। जैसे अभी साधक वृन्दावनमें बैठा है, तो उसे वृन्दावनको याद नहीं करना पड़ता। सोते समय, भोजन करते समय, हरेक कार्य करते समय वह वृन्दावनको याद नहीं करता; परन्तु 'मैं वृन्दावनमें हूँ'—इस बातमें उसको सन्देह नहीं होता। वह बिना याद किये याद रहता है। ऐसे ही अभी भले ही परमात्मा न दीखे, पर साधक ऐसा दृढ़तासे मान ले कि 'है'-रूपसे तो केवल परमात्मा ही है, संसार नहीं है, तो बादमें उसको ऐसा अनुभव होने लग जायगा। कारण कि मिथ्या वस्तु कबतक टिकी रहेगी और सत्य वस्तु कबतक छिपी रहेगी?
१०६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
परिशिष्ट भाव— वास्तवमें सताईसवें-अट्टाईसवें श्लोकोंमें आत्माका ही वर्णन है; परन्तु 'परमेश्वर' और 'ईश्वर' नाम आनेसे इन श्लोकोंकी व्याख्यामें परमात्माका वर्णन किया गया है; क्योंकि आत्माका परमात्मासे साधर्म्य है (इसी अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध— इसी अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके संयोगकी बात बतायी। इस संयोगसे छूटनेके दो उपाय हैं—परमात्माके साथ अपने स्वतःसिद्ध सम्बन्धको पहचानना और प्रकृति-(शरीर-) से अपने माने हुए सम्बन्धको तोड़ना। सताईसवें-अट्टाईसवें श्लोकोंमें परमात्माके साथ सम्बन्धको पहचाननेकी बात बता दी। अब आगेके दो श्लोकोंमें प्रकृतिसे सम्बन्ध तोड़नेकी बात बताते हैं।
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ २१ ॥
| यः | = जो | क्रियमाणानि | = की जाती हुई | पश्यति | = देखता (अनुभव |
|---|---|---|---|---|---|
| कर्माणि | = सम्पूर्ण क्रियाओंको | पश्यति | = देखता है | करता) है, | |
| सर्वशः | = सब प्रकारसे | तथा | = और | ||
| प्रकृत्या | = प्रकृतिके द्वारा | आत्मानम् | = अपने-आपको | सः, च | = वही (यथार्थ |
| एव | = ही | अकर्तारम् | = अकर्ता | देखता है)। |
व्याख्या— 'प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः'—वास्तवमें चेतन तत्त्व स्वतः-स्वाभाविक निर्वाकार, सम और शान्तरूपसे स्थित है। उस चेतन तत्त्व-(परमात्मा-) की शक्ति प्रकृति स्वतः-स्वाभाविक क्रियाशील है। उसमें नित्य-निरन्तर क्रिया होती रहती है—'प्रकर्षेण करणं (भावे ल्युट्) इति प्रकृतिः '। यद्यपि प्रकृतिको सक्रिय और अक्रिय—दो अवस्थाओंवाली (सर्ग-अवस्थामें सक्रिय और प्रलय-अवस्थामें अक्रिय) कहते हैं, तथापि सूक्ष्म विचार करें तो प्रलय-अवस्थामें भी उसकी क्रियाशीलता मिटती नहीं है। कारण कि जब प्रलयका आरम्भ होता है, तब प्रकृति सर्ग-अवस्थाकी तरफ चलती है। इस प्रकार प्रकृतिमें सूक्ष्म क्रिया चलती ही रहती है। प्रकृतिकी सूक्ष्म क्रियाको ही अक्रिय-अवस्था कहते हैं; क्योंकि इस अवस्थामें सृष्टिकी रचना नहीं होती। परन्तु महासर्गमें जब सृष्टिकी रचना होती है, तब सर्गके आरम्भसे सर्गके मध्यतक प्रकृति सर्गकी तरफ चलती है और सर्गका मध्य भाग आनेपर प्रकृति प्रलयकी तरफ चलती है। इस प्रकार प्रकृतिकी स्थूल क्रियाको सक्रिय-अवस्था कहते हैं। अगर प्रलय और महाप्रलयमें प्रकृतिको अक्रिय माना जाय, तो प्रलय-महाप्रलयका आदि, मध्य और अन्त कैसे होगा?
ये तीनों तो प्रकृतिमें सूक्ष्म क्रिया होनेसे ही होते हैं। अतः सर्ग-अवस्थाकी अपेक्षा प्रलय-अवस्थामें अपेक्षाकृत अक्रियता है, सर्वथा अक्रियता नहीं है।
सूर्यका उदय होता है, फिर वह मध्यमें आ जाता है और फिर वह अस्त हो जाता है, तो इससे मालूम होता है कि प्रातः सूर्योदय होनेपर प्रकाश मध्याह्नतक बढ़ता जाता है और मध्याह्नसे सूर्यास्ततक प्रकाश घटता जाता है। सूर्यास्त होनेके बाद आधी राततक अन्धकार बढ़ता जाता है और आधी रातसे सूर्योदयतक अन्धकार घटता जाता है। वास्तवमें प्रकाश और अन्धकारकी सूक्ष्म सन्धि मध्याह्न और मध्य-रात ही है, पर वह दीखती है सूर्योदय और सूर्यास्तके समय। इस दृष्टिसे प्रकाश और अन्धकारकी क्रिया मिटती नहीं, प्रत्युत निरन्तर होती ही रहती है। ऐसे ही सर्ग और प्रलय, महासर्ग और महाप्रलयमें भी प्रकृतिमें क्रिया निरन्तर होती ही रहती है*।
इस क्रियाशील प्रकृतिके साथ जब यह पुरुष सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब शरीरद्वारा होनेवाली स्वाभाविक क्रियाएँ (तादात्म्यके कारण) अपनेमें प्रतीत होने लगती हैं।
'यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति' —प्रकृति और उसके कार्य स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरमें
- महासर्गमें समयकी गणनाका साधन सूर्य होता है; किन्तु महाप्रलयमें सूर्य भी लीन हो जाता है। अतः महासर्गके कालसे ही महाप्रलयके कालकी गणना आरम्भ हो जाती है। महाप्रलयके कालकी गणनाका एकमात्र साधन नित्य, चेतन, अविनाशी परमात्मतत्त्व ही होता है।
श्लोक ३० ]
- साधक-संजीवनी *
१०७
खाना-पीना, चलना-फिरना, उठना-बैठना, घटना-बढ़ना, हिलना-डुलना, सोना-जागना, चिन्तन करना, समाधिस्थ होना आदि जो कुछ भी क्रियाएँ होती हैं, वे सभी प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं, स्वयंके द्वारा नहीं; क्योंकि स्वयंमें कोई क्रिया होती ही नहीं—ऐसा जो देखता है अर्थात् अनुभव करता है, वही वास्तवमें ठीक देखता है। कारण कि ऐसा देखनेसे अपनेमें अकर्तृत्व-(अकर्तापन-) का अनुभव हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —जितनी भी क्रियाएँ होती हैं, वे सब-की-सब प्रकृति-विभागमें ही होती हैं। इसमें जीवका हाथ नहीं है। प्रकृतिके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको ही गीतामें कहीं 'गुणोंसे होनेवाली क्रियाएँ' और कहीं 'इन्द्रियोंसे होनेवाली क्रियाएँ' कहा गया है; जैसे—सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं—'प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणेः कर्माणि सर्वशः ' (३।२७); गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—'गुणा गुणेषु वर्तन्ते ' (३।२८); गुणोंके सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं—'नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ' (१४।१९); इन्द्रियाँ ही इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं—'इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते ' (५।९) आदि। तात्पर्य है कि क्रियामात्र प्रकृतिजन्य ही है। अतः प्रकृति कभी किंचिन्मात्र भी अक्रिय नहीं होती और पुरुषमें कभी किंचिन्मात्र भी क्रिया नहीं होती। इसलिये गीतामें आया है कि तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी 'मैं (स्वयं) लेशमात्र भी कुछ नहीं करता हूँ'—ऐसा अनुभव करता है—'नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्यते तत्त्ववित् ' (५।८); स्वयं न करता है, न करवाता है—'नैव कुर्वन् कारयन् ' (५।१३); यह पुरुष शरीरमें रहता हुआ भी न करता है, न लिप्त होता है—'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ' (१३।३१); जो आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मीत ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है—'तत्रैव सति कर्तारमात्मानं..... ' (१८।१६) आदि।
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३० ॥
| यदा | = जिस कालमें | स्थित | विस्तारम् | = विस्तार (देखता है), |
|---|---|---|---|---|
| (साधक) | अनुपश्यति | = देखता है | तदा | = उस कालमें |
| भूतपृथग्भावम् | = प्राणियोंके | च | = और | |
| अलग-अलग | ततः | = उस प्रकृतिसे | ब्रह्म | = ब्रह्मको |
| भावोंको | एव | = ही (उन | सम्पद्यते | = प्राप्त हो |
| एकस्थम् | = एक प्रकृतिमें ही | सबका) |
व्याख्या —[प्रकृतिके दो रूप हैं—क्रिया और पदार्थ। क्रियासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये उन्तीसवों श्लोक कहा, अब पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये यह तीसवों श्लोक कहते हैं।]
'यदा भूतपृथग्भावं ..... ब्रह्म सम्पद्यते तदा '—जिस कालमें साधक सम्पूर्ण प्राणियोंके अलग-अलग भावोंको अर्थात् त्रिलोकीमें जितने जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज और स्वेदज प्राणी पैदा होते हैं, उन प्राणियोंके स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित
यहाँ क्रियाओंको प्रकृतिके द्वारा होनेवाली बताया है, कहीं गुणोंके द्वारा होनेवाली बताया है और कहीं इन्द्रियोंके द्वारा होनेवाली बताया है—ये तीनों बातें एक ही हैं। प्रकृति सबका कारण है, गुण प्रकृतिके कार्य हैं और गुणोंका कार्य इन्द्रियाँ हैं। अतः प्रकृति, गुण और इन्द्रियाँ—इनके द्वारा होनेवाली सभी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा होनेवाली ही कही जाती हैं।
देखता है, उस कालमें वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। त्रिलोकीके स्थावर-जंगम प्राणियोंके शरीर, नाम, रूप, आकृति, मनोवृत्ति, गुण, विकार, उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आदि सब एक प्रकृतिसे ही उत्पन्न हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर प्रकृतिसे ही उत्पन्न होते हैं, प्रकृतिमें ही स्थित रहते हैं और प्रकृतिमें ही लीन होते हैं। इस प्रकार देखनेवाला ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है अर्थात् प्रकृतिसे अतीत स्वतःसिद्ध अपने स्वरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। वास्तवमें वह पहलेसे ही प्राप्त था, केवल प्रकृतिजन्य पदार्थोंके साथ
१०८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
अपना सम्बन्ध माननेसे ही उसको अपने स्वरूपका अनुभव नहीं होता था। परन्तु जब वह सबको प्रकृतिमें ही स्थित और प्रकृतिसे ही उत्पन्न देखता है, तब उसको अपने स्वतःसिद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है।
जैसे पृथ्वीसे उत्पन्न होनेवाले स्थावर-जंगम जितने भी शरीर हैं तथा उन शरीरोंमें जो कुछ भी परिवर्तन होता है, रूपान्तर होता है१ क्रियाएँ होती हैं२ वे सब पृथ्वीपर ही होती हैं। ऐसे ही प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले जितने गुण, विकार हैं तथा उनमें जो कुछ परिवर्तन होता है, घट-बद्ध होती है, वह सब-की-सब प्रकृतिमें ही होती है। तात्पर्य है कि जैसे पृथ्वीसे पैदा होनेवाले पदार्थ पृथ्वीमें ही स्थित रहनेसे और पृथ्वीमें लीन होनेसे पृथ्वीरूप ही हैं, ऐसे ही प्रकृतिसे पैदा होनेवाला सब संसार प्रकृतिमें ही स्थित रहनेसे और प्रकृतिमें ही लीन होनेसे प्रकृतिरूप ही है। इसी प्रकार स्थावर-जंगम प्राणियोंके रूपमें जो चेतन-तत्त्व है, वह निरन्तर परमात्मामें
परिशिष्ट भाव— पूर्वश्लोकमें व्यक्ति की बात और प्रस्तुत श्लोकमें कालकी बात आयी है।
भक्तिके प्रकरणमें भगवान्ने सम्पूर्ण भावोंको अपनेमें बताया है—‘भवन्ति भावा भूतानां मत् एव पृथग्विधाः’ (१०।५), पर यहाँ ज्ञानके प्रकरणमें सम्पूर्ण भावोंको प्रकृतिमें बताया है। तात्पर्य है कि जहाँ सत्-असत्का विभाग किया है, वहाँ सब भाव असत्में कहे हैं और जहाँ समग्रकी बात कही है, वहाँ सब भाव अपनेमें कहे हैं। समग्रमें सत्-असत् सब कुछ परमात्मा ही हैं—‘सदसच्चाहम्’ (१।१९)
सम्बन्ध—बाईसवें श्लोकमें जिसको देहसे पर बताया है और पीछेके (तीसवें) श्लोकमें जिसका ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है, उस पुरुष-(चेतन-) के वास्तविक स्वरूपका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥
| कौन्तेय | = हे कुन्तीनन्दन! | अव्ययः | = अविनाशी | न | = न |
|---|---|---|---|---|---|
| अयम् | = यह (पुरुष स्वयं) | परमात्मा | = परमात्मस्वरूप | करोति | = करता है |
| अनादित्वात् | = अनादि होनेसे | ही है। | (और) | ||
| (और) | शरीरस्थः | = यह शरीरमें | न | = न | |
| निर्गुणत्वात् | = गुणोंसे रहित | रहता हुआ | लिप्यते | = लिप्त | |
| होनेसे | अपि | = भी | होता है। |
१-पहले मिट्टी और बीजको तौल ले और एक पात्रमें वह तुली हुई मिट्टी बिछाकर बीज बो दे और पानी सींच दे। फसल होनेपर उसको काटकर अनाज तैयार कर ले और मिट्टीको सूखने दे। सूखनेके बाद मिट्टी और अनाजको तौलकर देखे तो मिट्टीका वजन कम तथा अनाजका वजन ज्यादा होगा। यह मिट्टी-(पृथ्वी-) का अनाजमें रूपान्तर होना है
२-क्रियाएँ दो तरह की होती हैं—होना और करना। बालकका जवान और बूढ़ा होना आदि क्रियाएँ ‘होती’ हैं और खाना-पीना आदि क्रियाएँ ‘करते’ हैं। ये सब क्रियाएँ शरीरमें ही होती हैं।
श्लोक ३१ ]
- साधक-संजीवनी *
१०९
व्याख्या—‘अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः’— इसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें जिसको अनादि कहा है, उसीको यहाँ भी ‘अनादित्वात्’ पदसे अनादि कहा है अर्थात् यह पुरुष आदि-(आरम्भ-) से रहित है। अब प्रश्न होता है कि वहाँ तो प्रकृतिको भी अनादि कहा है, इसलिये प्रकृति और पुरुष—दोनोंमें क्या फरक रहा ? इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं—‘निर्गुणत्वात् ’ अर्थात् यह पुरुष गुणोंसे रहित है। प्रकृति अनादि तो है, पर वह गुणोंसे रहित नहीं है, प्रत्युत गुणों और विकारोंवाली है। उससे सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीनों गुण तथा विकार पैदा होते हैं। परन्तु पुरुष इन तीनों गुणों और विकारोंसे सर्वथा रहित (निर्गुण और निर्विकार) है। ऐसा यह पुरुष साक्षात् अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है अर्थात् यह पुरुष विनाशरहित परम शुद्ध आत्मा है।
‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’— यह पुरुष शरीरमें रहता हुआ भी न कुछ करता है और न किसी कर्मसे लिप्त ही होता है। तात्पर्य है कि इस पुरुष-(स्वयं-) ने न तो पहले किसी भी अवस्थामें कुछ किया है, न वर्तमानमें कुछ करता है और न आगे ही कुछ कर सकता है अर्थात् यह पुरुष सदासे ही प्रकृतिसे निलिप्त, असंग है तथा गुणोंसे रहित और अविनाशी है। इसमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व है ही नहीं।
यहाँ ‘शरीरस्थोऽपि’ कहनेका तात्पर्य है कि यह पुरुष जिस समय अपनेको शरीरमें स्थित मानकर अपनेको कार्यका कर्ता और सुख-दुःखका भोक्ता मानता है, उस समय भी वास्तवमें यह तटस्थ, प्रकाशमात्र ही रहता है। सुख-दुःखका भान इसीसे होता है; अतः इसको प्रकाशक कह सकते हैं, पर इसमें प्रकाशक-धर्म नहीं है।
परिशिष्ट भाव— पुरुष अनादि है, पर शरीर आदिवाला है। पुरुष निर्गुण है, पर शरीर गुणमय है। पुरुष परमात्मा है, पर शरीर अनात्मा है। पुरुष अव्यय है, पर शरीर नाशवान् है। इसलिये अज्ञानी मनुष्यके द्वारा पुरुष (आत्मा)-को शरीरमें स्थित माननेपर भी वास्तवमें वह शरीरमें स्थित नहीं है अर्थात् शरीरसे सर्वथा असम्बद्ध है—‘न करोति न लिप्यते ’। कारण कि शरीरका सम्बन्ध तो संसारके साथ है, पर पुरुषका सम्बन्ध परमात्मके साथ है। अतः वास्तवमें पुरुष कभी शरीरस्थ हो सकता ही नहीं। परन्तु इस वास्तविकताकी तरफ ध्यान न देनेके कारण मनुष्य उसको शरीरस्थ मान लेता है।
‘निर्गुणत्वात्’— पुरुष स्वयं निर्गुण होते हुए भी गुणोंका संग करके बँध जाता है (गीता—इसी अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। दीखता तो ऐसा ही है कि बन्धन स्वतः-स्वाभाविक है और मुक्ति कृतिसाध्य है, पर वास्तवमें मुक्ति स्वतः-स्वाभाविक है और बन्धन कृतिसाध्य है। गुणोंका सम्बन्ध पुरुषके साथ नहीं है, प्रत्युत प्रकृतिके साथ है (गीता १३।२३) इसलिये ‘अनादि, निर्गुण, परमात्मा, अव्यय’ और ‘न करोति न लिप्यते ’— ये स्वतः-स्वाभाविक हैं। साधकको इस स्वाभाविकताका अनुभव करना है।
जैसे मकानमें रहते हुए भी हम मकानसे अलग हैं, ऐसे ही शरीरमें रहते हुए माननेपर भी हम शरीरसे अलग हैं।
यहाँ ‘अपि’ पदसे ऐसा मालूम होता है कि अनादिकालसे अपनेको शरीरमें स्थित माननेवाला हेक (चौंटीसे ब्रह्मार्पयन्त) प्राणी स्वरूपसे सदा ही निलिप्त, असंग है। उसकी शरीरके साथ एकता कभी हुई ही नहीं; क्योंकि शरीर तो प्रकृतिका कार्य होनेसे सदा प्रकृतिमें ही स्थित रहता है और स्वयं परमात्माका अंश होनेसे सदा परमात्मामें ही स्थित रहता है। स्वयं परमात्मासे कभी अलग हो सकता ही नहीं। शरीरके साथ एकात्मता माननेपर भी, शरीरके साथ कितना ही घुल-मिल जानेपर भी, शरीरको ही अपना स्वरूप माननेपर भी उसकी निलिप्तता कभी नष्ट नहीं होती, वह स्वरूपसे सदा ही निलिप्त रहता है। अपनी निलिप्तताका अनुभव न होनेपर भी उसके स्वरूपमें कुछ भी विकृति नहीं होती। अतः उसने अपने स्वरूपसे न कभी कुछ किया है और न करता ही है तथा वह स्वयं न कभी लिप्त हुआ है और न लिप्त होता ही है।
यद्यपि पुरुष अपनेको शरीरमें स्थित माननेसे ही कर्ता और भोक्ता बनता है, तथापि इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि ‘प्रकृति’में स्थित पुरुष ही भोक्ता बनता है और यहाँ कहते हैं कि ‘शरीर’ में स्थित होनेपर भी पुरुष कर्ता-भोक्ता नहीं है। ऐसा कहनेका तात्पर्य यह है कि प्रकृति और उसका कार्य शरीर—दोनों एक ही हैं। अतः पुरुषको चाहे प्रकृतिमें स्थित कहो, चाहे शरीरमें स्थित कहो, एक ही बात है। एक शरीरके साथ सम्बन्ध होनेसे मात्र प्रकृतिके साथ, मात्र शरीरोंके साथ सम्बन्ध हो जाता है। वास्तवमें पुरुषका सम्बन्ध न तो व्यक्ति शरीरके साथ है और न समष्टि प्रकृतिके साथ ही है। अपना सम्बन्ध शरीरके साथ माननेसे ही वह अपनेको कर्ता-भोक्ता मान लेता है। वास्तवमें वह न कर्ता है और न भोक्ता है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
‘न करोति न लिप्यते’—यह साधनजन्य नहीं है, प्रत्युत स्वतः-स्वाभाविक है। तात्पर्य है कि स्वरूपमें लेशमात्र भी कर्तृत्व-भोक्तृत्व नहीं है—यह स्वतःसिद्ध बात है। इसमें कोई पुरुषार्थ नहीं है अर्थात् इसके लिये कुछ करना नहीं है। तात्पर्य है कि कर्तृत्व-भोक्तृत्वको मिटाना नहीं है, प्रत्युत इनको अपनेमें स्वीकार नहीं करना है, इनके अभावका अनुभव करना है; क्योंकि वास्तवमें ये अपनेमें हैं ही नहीं! इसलिये साधकको अपनेमें निरन्तर अकर्तृत्व और अभोक्तृत्वका अनुभव करना चाहिये। अपनेमें निरन्तर अकर्तृत्व और अभोक्तृत्व (निष्कामता-निर्ममता)-का अनुभव होना ही जीवन्मुक्त है। इसीको गीताने स्मृति प्राप्त होना कहा है—‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा ’ (१८।७३)
अगर स्वरूप कर्ता और भोक्ता नहीं है तो फिर कर्ता और भोक्ता कौन है? यह विचार किया जाता है। पहले यह विचार करें कि कर्ता कौन है? शरीर कर्ता नहीं है; क्योंकि यह प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है। मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार—ये चार करण हैं, जिनको ‘अन्तःकरण’ कहते हैं। यह अन्तःकरण भी कर्ता नहीं है; क्योंकि करण कर्ताके अधीन होता है। परन्तु कर्ता स्वतन्त्र होता है—‘स्वतन्त्रः कर्ता ’ (पाणि० अ० १।४।५४)। करण तो क्रियाकी सिद्धिमें अत्यन्त सहायक होता है—‘साधकतमं करणम् ’ (पाणि० अ० १।४।४२), इसलिये करणके बिना किसी क्रियाकी सिद्धि होती ही नहीं। जैसे, कलम स्वतन्त्रतासे नहीं लिखती, प्रत्युत वह तो लिखनेका एक साधन (करण) है, जो लेखक (कर्ता)-के अधीन होता है। अतः करण कर्ता नहीं होता और कर्ता करण नहीं होता। दूसरी बात, यदि करणमें कर्तापन है तो फिर सुखी-दुःखी स्वयं क्यों होता है? यदि करण सुखी-दुःखी होता है तो हमें क्या नुकसान है? सत्-स्वरूप भी कर्ता नहीं है; क्योंकि मैंपन तो प्रकृतिका कार्य है, वह प्रकृतिसे अतीतमें कैसे सम्भव है? यदि स्वरूपमें कर्तापन होता तो वह कभी मिटता नहीं; क्योंकि स्वरूप अविनाशी है। इसलिये भगवान्ने यहाँ स्वरूपमें कर्तापनका निषेध किया है—‘न करोति ’। आगे अठारहवें अध्यायमें भी भगवान्ने कहा है कि जो आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मीत ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है (गीता—अठारहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। वास्तवमें जो भोक्ता (सुखी-दुःखी) होता है, वही कर्ता होता है।
अब यह विचार करें कि भोक्ता कौन है? भोक्ता न सत् है, न असत् है। सत् भोक्ता नहीं हो सकता; क्योंकि सत्में कभी अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सतः ’, जबकि भोक्तापनका अभाव होता है—‘न लिप्यते ’। असत् भी भोक्ता नहीं हो सकता; क्योंकि असत्की सत्ता ही नहीं है—‘नासतो विद्यते भावः ’। असत्में चेतनता भी नहीं है। अतः उसमें भोक्तापनकी कल्पना ही नहीं हो सकती। तात्पर्य यह हुआ कि कर्तापन और भोक्तापन न तो सत्में हैं और न असत्में ही हैं। सत्-असत्के संयोगमें भी कर्तापन और भोक्तापन नहीं हैं; क्योंकि जैसे दिन और रातका संयोग असम्भव है, ऐसे ही सत् और असत्का संयोग भी असम्भव है। अतः कर्तापन-भोक्तापन केवल माने हुए हैं—‘कर्ताहमिति मन्यते ’ (३।२७)। जब साधक विवेकपूर्वक शरीरसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है अर्थात् मैं-मेरापनको मिटा देता है (जो कि वास्तवमें मैं नहीं), तब न कर्ता रहता है, न भोक्ता रहता है, प्रत्युत एक चिन्मय सत्ता रहती है। इस प्रकार अपनेमें कर्तापन और भोक्तापनके अभावका अनुभव होनेपर साधक मुक्त हो जाता है अर्थात् कर्ता-भोक्ता नहीं रहता, प्रत्युत शुद्ध स्वरूप (चिन्मय सत्ता) रह जाता है।
‘न करोति न लिप्यते ’ पदोंका विवेचन भगवान्ने आगे बत्तीसवें-तैंतीसवें श्लोकोंमें किया है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि वह पुरुष न करता है और न लिप्त होता है, तो अब प्रश्न होता है कि वह कैसे लिप्त नहीं होता और कैसे नहीं करता? इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥
| यथा | = जैसे | न, उपलिप्यते = (कहीं भी) लिप्त | अवस्थितः | = परिपूर्ण |
|---|---|---|---|---|
| सर्वगतम् | = सब जगह व्याप्त | नहीं होता, | आत्मा | = आत्मा |
| आकाशम् | = आकाश | तथा | = ऐसे ही | देहे |
| सौक्ष्म्यात् | = अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे | सर्वत्र | = सब जगह | न, उपलिप्यते = लिप्त नहीं होता। |