सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 900, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 900

श्लोक २४ ]

  • साधक-संजीवनी *

८९९

परिशिष्ट भाव —पूर्वश्लोकमें आये 'देहेऽस्मिन् पुरुषः परः' की व्याख्या इस श्लोकमें करते हैं। जिसका विवेक जाग्रत् हो गया है अर्थात् 'देहेऽस्मिन् पुरुषः परः'—यह अनुभवमें आ गया है, वह अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार सब कर्म करते हुए भी निर्लप रहता है। वास्तवमें मनुष्यमात्रका स्वरूप निर्लिप्त ही है, पर गुणोंके संगसे वह लिप्त हो जाता है और बार-बार जन्मता-मरता है (इसी अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। गुणोंका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ है, पुरुषके साथ नहीं (इसी अध्यायका उन्नीसवाँ-बीसवाँ श्लोक)।

'सर्वथा वर्तमानोऽपि' पदोंमें आये 'अपि' का तात्पर्य है कि वह आसक्त मनुष्यकी तरह सब बर्ताव करता हुआ भी निर्वाकार रहता है (गीता—तीसरे अध्यायका पचीसवाँ श्लोक)।

'न स भूयोऽभिजायते'—जैसे छाछसे निकला हुआ मक्खन पुनः छाछमें मिलकर दही नहीं बनता, ऐसे ही प्रकृतिजन्म गुणोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर मनुष्य पुनः गुणोंसे नहीं बँधता। उसकी ब्रह्मसे सधर्मता हो जाती है अर्थात् जैसे ब्रह्माका जन्म-मरण नहीं होता, ऐसे ही उसका भी जन्म-मरण नहीं होता।

छठे अध्यायके इक्तीसवाँ श्लोकमें आया है—'सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते' और यहाँ आया है—'सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते'। छठे अध्यायमें आये 'स योगी मयि वर्तते' पदोंमें प्रेमकी प्राप्ति है और यहाँ आये 'न स भूयोऽभिजायते' पदोंमें बोधकी प्राप्ति है। प्रेम और बोध—दोनोंमें ही गुणोंका संग नहीं रहता। दोनोंमें अन्तर यह है कि बोधमें तो जन्म-मरणसे मुक्ति होती है, पर प्रेममें मुक्तिके साथ-साथ भगवान्से अभिन्नता होती है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जन्मरहित होनेमें प्रकृति-पुरुषको यथार्थ जानना कारण बताया। अब यह जिज्ञासा होती है कि क्या जन्म-मरणसे रहित होनेका और भी कोई उपाय है? इसपर भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें चार साधन बताते हैं।

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।

अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥

केचित्= कई मनुष्ययोगेन= सांख्ययोगके द्वाराआत्मना= अपने-आपसे
ध्यानेन= ध्यानयोगके द्वारा,= औरआत्मनि= अपने-आपमें
अन्ये= कईअपरे= कईआत्मानम्= परमात्मतत्त्वका
साङ्ख्येन,कर्मयोगेन= कर्मयोगके द्वारापश्यन्ति= अनुभव करते हैं।

व्याख्या —'ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मान-मात्मना'—पाँचवाँ अध्यायके सताईसवाँ-अट्ठाईसवाँ श्लोकोंमें; छठे अध्यायके दसवाँसे अट्ठाईसवाँ श्लोकतक; और आठवाँ अध्यायके आठवाँसे चौदहवाँ श्लोकतक जो सगुण-साकार, निर्गुण-निराकार आदिके ध्यानका वर्णन हुआ है, उस ध्यानमें जिसकी जैसी रुचि, ब्रह्मा-विश्वास और योग्यता है, उसके अनुसार ध्यान करके कई साधक अपने-आपसे अपनेमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं।

जो सम्बन्ध-विच्छेद प्रकृति और पुरुषको अलग-अलग जाननेसे होता है, वह सम्बन्ध-विच्छेद ध्यानसे भी होता है। ध्यान न तो चित्तकी मूढ़ वृत्तिमें होता है और न क्षिप्त वृत्तिमें होता है। ध्यान विक्षिप्त वृत्तिमें आरम्भ होता है। चित्त जब स्वरूपमें एकाग्र हो जाता है, तब समाधि हो जाती है। एकाग्र होनेपर चित्त निरुद्ध हो जाता है। इस

तरह जिस अवस्थामें चित्त निरुद्ध हो जाता है। उस अवस्थामें चित्त संसार, शरीर, वृत्ति, चिन्तन आदिसे भी उपरत हो जाता है। उस समय ध्यानयोगी अपने-आपसे अपने-आपमें अपना अनुभव करके सन्तुष्ट हो जाता है (गीता—छठे अध्यायका उन्नीसवाँ-बीसवाँ श्लोक)।

'अन्ये साङ्ख्येन योगेन'—दूसरे अध्यायके ग्यारहवाँसे तीसवाँ श्लोकतक; चौथे अध्यायके तैंतीसवाँसे उन्नालीसवाँ श्लोकतक; पाँचवाँ अध्यायके आठवाँ, नववाँ तथा तेरहवाँसे छब्बीसवाँ श्लोकतक; और बारहवाँ अध्यायके चौथे-पाँचवाँ आदि श्लोकोंमें कहे हुए सांख्ययोगके द्वारा कई साधक अपने-आपसे अपनेमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं।

सांख्ययोग नाम है विवेकका। उस विवेकके द्वारा सत्-असत्का निर्णय हो जाता है कि 'सत्' नित्य है,