श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 901, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
सर्वव्यापक है, स्थिर स्वभाववाला है, अचल है, अव्यक्त है, अचिन्त्य है; और 'असत्' चल है, अनित्य है, विकारी है, परिवर्तनशील है। ऐसे विवेक-विचारसे सांख्ययोगी प्रकृति और उसके कार्यसे बिलकुल अलग हो जाता है और अपने-आपसे अपने-आपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव कर लेता है।
'कर्मयोगेन चापरे' —दूसरे अध्यायके सैतालीसवेंसे तिरपनवें श्लोकतक; तीसरे अध्यायके सातवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक; चौथे अध्यायके सोलहवेंसे बतीसवें श्लोकतक; पाँचवें अध्यायके छठे-सातवें आदि श्लोकोंमें कहे हुए कर्मयोगके द्वारा कई साधक अपने-आपसे अपनेमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं।
जो सम्बन्ध-विच्छेद प्रकृति और पुरुषको अलग-अलग जाननेसे होता है, वह सम्बन्ध-विच्छेद कर्मयोगसे भी होता है। कर्मयोगी जो कुछ भी करे, वह केवल
परिशिष्ट भाव — जैसे पूर्वश्लोकमें विवेकके महत्त्वको मुक्तिका उपाय बताया, ऐसे ही यहाँ ध्यानयोग आदि अन्य उपाय बताते हैं। गीतामें ध्यानयोगसे परमात्मप्राप्तिकी बात छठे अध्यायके अठ्ठाईसवें श्लोकमें कही है, सांख्ययोगसे परमात्मप्राप्तिकी बात दूसरे अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें कही है और कर्मयोगसे परमात्मप्राप्तिकी बात दूसरे अध्यायके इकहत्तरवें श्लोकमें कही है। ये सभी परमात्मप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन हैं।
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातिरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥
| अन्ये | = दूसरे मनुष्य | तु | = पर | च, ते | = ऐसे वे |
|---|---|---|---|---|---|
| एवम् | = इस प्रकार | अन्येभ्यः | = दूसरोंसे | श्रुतिपरायणाः | = सुननेके अनुसार |
| ( ध्यानयोग, | ( जीवन्मुक्त | आचरण करनेवाले | |||
| सांख्ययोग, | महापुरुषोंसे) | मनुष्य | |||
| कर्मयोग | श्रुत्वा | = सुनकर | अपि | = भी | |
| आदि | एव | = ही | मृत्युम् | = मृत्युको | |
| साधनोंको) | उपासते | = उपासना | अतिरन्ति | = तर | |
| अजानन्तः | = नहीं जानते, | करते हैं, | जाते हैं। |
व्याख्या —'अन्ये त्वेवमजानन्तः'……'मृत्युं श्रुति-परायणाः'—कई ऐसे तत्त्वप्राप्तिकी उत्कण्ठावाले मनुष्य हैं, जो ध्यानयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, हठयोग, लययोग आदि साधनोंको समझते ही नहीं; अतः वे साधन उनके अनुष्ठानमें भी नहीं आते। ऐसे मनुष्य केवल तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंकी आज्ञाका पालन करके मृत्युको तर
संसारके हितके लिये ही करे। यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि जो कुछ भी करे, वह सब मात्र प्राणियोंके कल्याणके लिये ही करे, अपने लिये नहीं। ऐसा करनेसे स्वयंका उन क्रियाओंसे, पदार्थ, शरीर आदिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और अपने-आपसे अपनेमें परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।
मनुष्यने स्वाभाविक ही अपनेमें देहको स्वीकार किया है, माना है। इस मान्यताको दूर करनेके लिये अपनेमें परमात्माको देखना अर्थात् देहकी जगह अपनेमें परमात्माको मानना बहुत आवश्यक है।
अपनेमें परमात्माको देखना करणनिरपेक्ष होता है। करणसापेक्ष ज्ञान प्रकृतिके सम्बन्धसे होता है। इसलिये साधक किसी करणके द्वारा परमात्मामें स्थित नहीं होता, प्रत्युत स्वयं ही स्थित होता है स्वयंकी परमात्मामें स्थिति किसी करणके द्वारा हो ही नहीं सकती।
जाते हैं अर्थात् तत्त्वज्ञानको प्राप्त कर लेते हैं। जैसे धनी आदमीकी आज्ञाका पालन करनेसे धन मिलता है, ऐसे ही तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंकी आज्ञाका पालन करनेसे तत्त्वज्ञान मिलता है। हाँ, इसमें इतना फरक है कि धनी जब देता है, तब धन मिलता है; परन्तु सन्त-महापुरुषोंकी आज्ञाका पालन करनेसे, उनके मनके, संकेतके, आज्ञाके