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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 902, कुल 1299 में से

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श्लोक २६ ]

  • साधक-संजीवनी *

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अनुसार तत्परतापूर्वक चलनेसे मनुष्य स्वतः उस परमात्म-तत्त्वको प्राप्त हो जाता है, जो कि सबको सदासे ही स्वतः-स्वाभाविक प्राप्त है। कारण कि धन तो धनीके अधीन होता है, पर परमात्मतत्त्व किसीके अधीन नहीं है।

शरीरके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही मृत्यु होती है। जो मनुष्य महापुरुषोंकी आज्ञाके परायण हो जाते हैं, उनका शरीरसे माना हुआ सम्बन्ध छूट जाता है। अतः वे मृत्युको तर जाते हैं अर्थात् वे पहले शरीरकी मृत्युसे अपनी मृत्यु मानते थे, उस मान्यतासे रहित हो जाते हैं।

ऐसे श्रुतिपरायण साधकोंकी तीन श्रेणियाँ होती हैं— १—यदि साधकमें सांसारिक सुख-भोगकी इच्छा नहीं है, केवल तत्त्वप्राप्तिकी ही उत्कट अभिलाषा है और वह जिनकी आज्ञाका पालन करता है, वे अनुभवी महापुरुष हैं, तो साधकको शीघ्र ही परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।

२—यदि साधकमें सुखभोगकी इच्छा शेष है, तो केवल महापुरुषकी आज्ञाका पालन करनेसे ही उसकी उस इच्छाका नाश हो जायगा और उसको परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी।

३—साधक जिनकी आज्ञाका पालन करता है, वे अनुभवी महापुरुष नहीं हैं, पर साधकमें किंचिन्मात्र भी

परिशिष्ट भाव —जिन मनुष्योंमें शास्त्रोंको समझनेकी योग्यता नहीं है, जिनका विवेक कमजोर है, पर जिनके भीतर मृत्युसे तरनेकी उत्कट अभिलाषा है, ऐसे मनुष्य भी जीवन्मुक्त सन्त-महात्माओंकी आज्ञाका पालन करके मृत्युको तर जाते हैं।

उपनिषद्में एक कथा आती है। जबालाका पुत्र सत्यकाम गौतम ऋषिके पास उपदेश लेने गया। ऋषिने उसको चार सौ कृश तथा निर्बल गायें देकर कहा कि तू इनके पीछे-पीछे जा। सत्यकामने उत्साहपूर्वक कहा कि इनकी संख्या एक हजार होनेपर ही मैं वापिस आऊँगा। ऐसा कहकर वह उन गायोंको वनमें ले गया और वहाँ उनका पालन-पोषण करने लगा। बहुत वर्ष बीतनेपर जब उनकी संख्या एक हजार हो गयी, तब एक साँड़ने उससे कहा कि हमारी संख्या एक हजार हो गयी है, अब तू हमारेको आचार्यके पास पहुँचा दे, ऐसा कहकर उस साँड़ने सत्यकामको ब्रह्मके प्रथम पादका उपदेश दिया। दूसरे ही दिन सत्यकाम गायोंको लेकर गुरुकुलकी ओर रवाना हो गया। रास्तेमें उसको अग्निने ब्रह्मके दूसरे पादका, हंसने ब्रह्मके तीसरे पादका और मदगु [एक जलचर पक्षी]—ने ब्रह्मके चौथे पादका उपदेश दिया। इस प्रकार रास्तेमें ही ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके वह गौतम ऋषिके पास पहुँचा। गुरुके पूछनेपर उसने सारी बात बतायी और उनसे अपने श्रीमुखसे उपदेश देनेकी प्रार्थना की। तब गौतम ऋषिने उसको उपदेश दिया (छान्दोग्य० चौथा अध्याय, चौथेसे नवें खण्डतक)। इस तरह केवल तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त महापुरुषकी आज्ञा माननेसे ही सत्यकामको तत्त्वज्ञान हो गया।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि श्रुतिपरायण साधक भी मृत्युको तर जाते हैं, तो अब प्रश्न होता है कि जन्म-मरणके होनेमें क्या कारण है? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।

यावत्सज्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजड्भम् ।

क्षेत्रक्षेत्रत्रज्ञसंयोगान्निद्रिद्धि

भरतर्षभ ॥ २६ ॥

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