श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक २६ ]
- साधक-संजीवनी *
१०९
अनुसार तत्परतापूर्वक चलनेसे मनुष्य स्वतः उस परमात्म-तत्त्वको प्राप्त हो जाता है, जो कि सबको सदासे ही स्वतः-स्वाभाविक प्राप्त है। कारण कि धन तो धनीके अधीन होता है, पर परमात्मतत्त्व किसीके अधीन नहीं है।
शरीरके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही मृत्यु होती है। जो मनुष्य महापुरुषोंकी आज्ञाके परायण हो जाते हैं, उनका शरीरसे माना हुआ सम्बन्ध छूट जाता है। अतः वे मृत्युको तर जाते हैं अर्थात् वे पहले शरीरकी मृत्युसे अपनी मृत्यु मानते थे, उस मान्यतासे रहित हो जाते हैं।
ऐसे श्रुतिपरायण साधकोंकी तीन श्रेणियाँ होती हैं— १—यदि साधकमें सांसारिक सुख-भोगकी इच्छा नहीं है, केवल तत्त्वप्राप्तिकी ही उत्कट अभिलाषा है और वह जिनकी आज्ञाका पालन करता है, वे अनुभवी महापुरुष हैं, तो साधकको शीघ्र ही परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।
२—यदि साधकमें सुखभोगकी इच्छा शेष है, तो केवल महापुरुषकी आज्ञाका पालन करनेसे ही उसकी उस इच्छाका नाश हो जायगा और उसको परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी।
३—साधक जिनकी आज्ञाका पालन करता है, वे अनुभवी महापुरुष नहीं हैं, पर साधकमें किंचिन्मात्र भी
परिशिष्ट भाव —जिन मनुष्योंमें शास्त्रोंको समझनेकी योग्यता नहीं है, जिनका विवेक कमजोर है, पर जिनके भीतर मृत्युसे तरनेकी उत्कट अभिलाषा है, ऐसे मनुष्य भी जीवन्मुक्त सन्त-महात्माओंकी आज्ञाका पालन करके मृत्युको तर जाते हैं।
उपनिषद्में एक कथा आती है। जबालाका पुत्र सत्यकाम गौतम ऋषिके पास उपदेश लेने गया। ऋषिने उसको चार सौ कृश तथा निर्बल गायें देकर कहा कि तू इनके पीछे-पीछे जा। सत्यकामने उत्साहपूर्वक कहा कि इनकी संख्या एक हजार होनेपर ही मैं वापिस आऊँगा। ऐसा कहकर वह उन गायोंको वनमें ले गया और वहाँ उनका पालन-पोषण करने लगा। बहुत वर्ष बीतनेपर जब उनकी संख्या एक हजार हो गयी, तब एक साँड़ने उससे कहा कि हमारी संख्या एक हजार हो गयी है, अब तू हमारेको आचार्यके पास पहुँचा दे, ऐसा कहकर उस साँड़ने सत्यकामको ब्रह्मके प्रथम पादका उपदेश दिया। दूसरे ही दिन सत्यकाम गायोंको लेकर गुरुकुलकी ओर रवाना हो गया। रास्तेमें उसको अग्निने ब्रह्मके दूसरे पादका, हंसने ब्रह्मके तीसरे पादका और मदगु [एक जलचर पक्षी]—ने ब्रह्मके चौथे पादका उपदेश दिया। इस प्रकार रास्तेमें ही ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके वह गौतम ऋषिके पास पहुँचा। गुरुके पूछनेपर उसने सारी बात बतायी और उनसे अपने श्रीमुखसे उपदेश देनेकी प्रार्थना की। तब गौतम ऋषिने उसको उपदेश दिया (छान्दोग्य० चौथा अध्याय, चौथेसे नवें खण्डतक)। इस तरह केवल तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त महापुरुषकी आज्ञा माननेसे ही सत्यकामको तत्त्वज्ञान हो गया।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि श्रुतिपरायण साधक भी मृत्युको तर जाते हैं, तो अब प्रश्न होता है कि जन्म-मरणके होनेमें क्या कारण है? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
यावत्सज्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजड्भम् ।
क्षेत्रक्षेत्रत्रज्ञसंयोगान्निद्रिद्धि
भरतर्षभ ॥ २६ ॥
१०२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
भरतर्षभ | = हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! | यावत्, | | क्षेत्रक्षेत्रज्ञ- | ---|---|---|---|---|--- स्थावर- | | किञ्चित् | = जितने भी | संयोगात् | = क्षेत्र और जड़मम् | = स्थावर और | सत्त्वम् | = प्राणी | | क्षेत्रज्ञके संयोगसे जंगम | | सञ्जायते | = पैदा होते हैं, | | (उत्पन्न हुए) | | तत् | = उनको (तुम) | विद्धि | = समझो।
व्याख्या —‘यावत्संजायते’“क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्”—स्थिर रहनेवाले वृक्ष, लता, दूब, गुल्म, त्वक्सार, बेंत, बाँस, पहाड़ आदि जितने भी स्थावर प्राणी हैं और चलने-फिरनेवाले मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, मछली, कछुआ आदि जितने भी जंगम (थलचर, जलचर, नभचर) प्राणी हैं, वे सब-के-सब क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही पैदा होते हैं।
उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थ ‘क्षेत्र’ हैं और जो इस क्षेत्रको जाननेवाला, उत्पत्ति-विनाशरहित एवं सदा एकरस रहनेवाला है, वह ‘क्षेत्रज्ञ’ है। उस क्षेत्रज्ञ-(प्रकृतिस्थ पुरुष-)का जो शरीरके साथ मैं-मेरेपनका सम्बन्ध मानना है—यही क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका संयोग है। इस माने हुए संयोगके कारण ही इस जीवको स्थावर-जंगम योनियोंमें
जन्म लेना पड़ता है। इसी क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके संयोगको पहले इक्कीसवें श्लोकमें ‘गुणसंगः’ पदसे कहा है। तात्पर्य यह हुआ कि निरन्तर परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके साथ तादात्म्य कर लेनेसे स्वयं जीवात्मा भी अपनेको जन्मने-मरनेवाला मान लेता है।
[ स्थावर-जंगम प्राणियोंके पैदा होनेकी बात तो यहाँ ‘संजायते’ पदसे कह दी और उनके मरनेकी बात आगेके श्लोकमें ‘विनश्यत्पु’ पदसे कहेंगे। ]
‘तद्विद्धि भरतर्षभ’—यह क्षेत्रज्ञ क्षेत्रके साथ अपना सम्बन्ध मानता है, इसीसे इसका जन्म होता है; परन्तु जब यह शरीरके साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता, तब इसका जन्म नहीं होता—इस बातको तुम ठीक समझ लो।
परिशिष्ट भाव — यहाँ ‘यावत्संजायते’ के अन्तर्गत जरायुज-अण्डज-उद्भिज्ज-स्वेदज, जलचर-नभचर-थलचर, मनुष्य, देवता, पितर, भूत, प्रेत, पिशाच आदि सम्पूर्ण प्राणी लेने चाहिये। सातवें अध्यायके छठे श्लोकमें भी ‘एतद्योनीनि भूतानि’ पदोंसे यही बात कही गयी है।
भक्तिके प्रकरणमें भगवान्ने परा और अपरा—दोनोंको अपनी प्रकृति बताकर कहा कि ‘इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं और मैं ही सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ’ (गीता—सातवें अध्यायका छठा श्लोक)। परन्तु यहाँ ज्ञानके प्रकरणमें भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण प्राणी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे उत्पन्न होते हैं। तात्पर्य है कि भक्तिके प्रकरणमें भगवान् अपनी तरफ दृष्टि कराते हैं; क्योंकि भक्तका भगवान्पर ही दृढ़ विश्वास होता है। उसके साधन और साध्य—दोनों भगवान् ही होते हैं। परन्तु ज्ञानमें भगवान् क्षेत्रज्ञ (स्वरूप)-की ओर दृष्टि कराते हैं कि क्षेत्रके साथ तादात्म्य करनेके कारण ही वह जन्म-मृत्युरूप बन्धनमें पड़ा है। यहाँ प्रश्न होता है कि आकर्षण एवं मिलन (संयोग) सजातीयतामें ही होता है, फिर विजातीय क्षेत्र (जड़) के साथ क्षेत्रज्ञ (चेतन)-का संयोग कैसे हुआ? इसका उत्तर है कि जैसे रात और दिनका संयोग नहीं हो सकता, ऐसे ही क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका भी संयोग नहीं हो सकता। परन्तु परमात्माका अंश होनेके कारण क्षेत्रज्ञमें यह शक्ति है कि वह विजातीय वस्तुको भी पकड़ सकता है, उसके साथ अपना सम्बन्ध मान सकता है। उसको यह स्वतन्त्रता भगवान्ने ही दी है। परन्तु उसने इस स्वतन्त्रताका दुरुपयोग किया अर्थात् भगवान्के साथ सम्बन्ध न मानकर संसारके साथ सम्बन्ध मान लिया और जन्म-मरणके चक्रमें पड़ गया (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि क्षेत्र-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध रखनेसे, उसकी तरफ दृष्टि रखनेसे यह पुरुष जन्म-मरणमें जाता है, तो अब प्रश्न होता है कि इस जन्म-मरणके चक्करसे छूटनेके लिये उसको क्या करना चाहिये? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
श्लोक २७ ]
- साधक-संजीवनी *
१०३
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्सर्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥
| यः | = जो | परमेश्वरम् | = परमेश्वरको | पश्यति | = देखता है, |
|---|---|---|---|---|---|
| विनश्यत्सु | = नष्ट होते हुए | अविनश्यन्तम् | = नाशरहित (और) | सः | = वही |
| सर्वेषु | = सम्पूर्ण | समम् | = समरूपसे | पश्यति | = (वास्तवमें सही) |
| भूतेषु | = प्राणियोंमें | तिष्ठन्तम् | = स्थित | देखता है । |
व्याख्या—‘समं सर्वेषु भूतेषु’— परमात्माको सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम कहनेका तात्पर्य है कि सभी प्राणी विषम हैं अर्थात् स्थावर-जंगम हैं, सात्त्विक-राजस-तामस हैं, आकृतिसे छोटे-बड़े, लम्बे-चौड़े हैं, नाना वर्णवाले हैं—इस प्रकार तरह-तरहके जितने भी प्राणी हैं, उन सब प्राणियोंमें परमात्मा समरूपसे स्थित हैं। वे परमात्मा किसीमें छोटे-बड़े, कम-ज्यादा नहीं हैं।
पहले इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रज्ञके साथ अपनी एकता बताते हुए कहा था कि तू सम्पूर्ण प्राणियोंमें क्षेत्रज्ञ मेरेको समझ, उसी बातको यहाँ कहते हैं कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्मा समरूपसे स्थित हैं।
‘तिष्ठन्तम्’— सम्पूर्ण प्राणी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय—इन तीन अवस्थाओंमें जाते हैं; सर्ग-प्रलय, महासर्ग-महाप्रलयमें जाते हैं; ऊँच-नीच गतियोंमें, योनियोंमें जाते हैं अर्थात् सभी प्राणी किसी भी क्षण स्थिर नहीं रहते। परन्तु परमात्मा उन सब अस्थिर प्राणियोंमें नित्य-निरन्तर एकरूपसे स्थित रहते हैं।
‘परमेश्वरम्’— सभी प्राणी अपनेको किसी-न-किसीका ईश्वर अर्थात् मालिक मानते ही रहते हैं; परन्तु परमात्मा उन सभी प्राणियोंके तथा सम्पूर्ण जड-चेतन संसारके परम ईश्वर हैं।
‘विनश्यत्सर्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति’— प्रतिक्षण विनाशकी तरफ जानेवाले प्राणियोंमें विनाशरहित,
सदा एकरूप रहनेवाले परमात्माको जो निर्विकार देखता है, वही वास्तवमें सही देखता है। तात्पर्य है कि जो परिवर्तनशील शरीरके साथ अपने-आपको देखता है, उसका देखना सही नहीं है; किन्तु जो सदा ज्यों-के-त्यों रहनेवाले परमात्माके साथ अपने-आपको अभिनरूपसे देखता है, उसका देखना ही सही है।
पहले इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका ज्ञान ही मेरे मतमें ज्ञान है, उसी बातको यहाँ कहते हैं कि जो नष्ट होनेवाले प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित और सम देखता है, उसका देखना (ज्ञान) ही सही है। तात्पर्य है कि जैसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगमें क्षेत्रमें तो हरदम परिवर्तन होता है, पर क्षेत्रज्ञ ज्यों-का-त्यों ही रहता है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न और नष्ट होते हैं, पर परमात्मा सब अवस्थाओंमें समानरूपसे स्थित रहते हैं।
पीछेके (छब्बीसवें) श्लोकमें भगवान्ने यह बताया कि जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, वे सभी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही पैदा होते हैं। परन्तु उन दोनोंमें क्षेत्र तो किसी भी क्षण स्थिर नहीं रहता और क्षेत्रज्ञ एक क्षण भी नहीं बदलता। अतः क्षेत्रज्ञसे क्षेत्रका जो निरन्तर वियोग हो रहा है, उसका अनुभव कर ले। इस (सत्ताईसवें) श्लोकमें भगवान् यह बताते हैं कि उत्पन्न और नष्ट होनेवाले सम्पूर्ण विषम प्राणियोंमें जो परमात्मा नाशरहित और समानरूपसे स्थित रहते हैं, उनके साथ अपनी एकताका अनुभव कर ले।
परिशिष्ट भाव— जैसे आकाशमें कभी सूर्यका प्रकाश फैल जाता है, कभी अँधेरा छा जाता है, कभी धुआँ छा जाता है, कभी काले-काले बादल छा जाते हैं, कभी बिजली चमकती है, कभी वर्षा होती है, कभी ओले गिरते हैं, कभी तरह-तरहके शब्द होते हैं, गर्जना होती है; परन्तु आकाशमें कोई फर्क नहीं पड़ता। वह ज्यों-का-त्यों निर्लिप्त-निर्विकार रहता है। ऐसे ही सर्वत्र परिपूर्ण सत्तामें कभी महासर्ग और महाप्रलय होता है, कभी सर्ग और प्रलय होता है, कभी जन्म और मृत्यु होती है, कभी अकाल पड़ता है, कभी बाढ़ आती है, कभी भूचाल आता है, कभी घमासान युद्ध होता है; परन्तु सत्तामें कोई फर्क नहीं पड़ता। कितनी ही उथल-पुथल हो जाय, पर सत्ता ज्यों-की-त्यों निर्लिप्त-निर्विकार रहती है। यह निर्विकारता स्वाभाविक है, जबकि विकार (संग) कुत्रिम है, माना हुआ है। बद्ध हो या मुक्त, पापी हो या धर्मात्मा, यह निर्विकार सत्ता दोनोंमें समानरूपसे स्थित है।
१०४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
जैसे, गंगाजी निरन्तर बहती रहती हैं, पर जिसके ऊपर बहती हैं, वह आधारशिला ज्यों-की-त्यों स्थिर रहती है। गंगाजीका जल कभी स्वच्छ होता है, कभी मटमैला होता है। कभी जल कम हो जाता है, कभी बाढ़ आ जाती है। कभी तपे पहाड़पर वर्षा होनेसे जल गरम हो जाता है, कभी ठण्डा हो जाता है। कभी तेज प्रवाहके कारण जल आवाज करने लगता है, कभी शान्त हो जाता है। परन्तु आधारशिला ज्यों-की-त्यों रहती है, उसमें कभी कोई फर्क नहीं पड़ता। इसी तरह कभी जलमें मछलियाँ आ जाती हैं, कभी साँप आदि जन्तु आ जाते हैं, कभी लकड़ीके सिलिपट तैरते हुए आ जाते हैं, कभी पुष्प बहते हुए आ जाते हैं, कभी कूड़ा-कचरा आ जाता है, कभी मैला आ जाता है, कभी गोबर आ जाता है, कभी कोई मुर्दा बहता हुआ आ जाता है, कभी कोई जीवित व्यक्ति तैरता हुआ आ जाता है। ये सब तो आकर चले जाते हैं, पर आधारशिला ज्यों-की-त्यों अचल-निर्विकार रहती है। ऐसे ही सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदि निरन्तर बह रही है, पर स्वयं (चिन्मय सत्ता) ज्यों-का-त्यों अचल रहता है। परिवर्तन और विनाश देश, काल आदिमें होता है, स्वयंमें नहीं।
‘यः पश्यति स पश्यति’—ये पद पाँचवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें साधनके विषयमें आये हैं और प्रस्तुत श्लोकमें सिद्धिके विषयमें आये हैं। इसीको आगे अठारहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें व्यतिरेकरीतिसे कहा गया है कि जो आत्माको कर्ता देखता है, वह दुर्मीत ठीक नहीं देखता—‘न स पश्यति दुर्मीतः’।
सम्बन्ध—अब भगवान् नष्ट होनेवाले सम्पूर्ण प्राणियोंमें अविनाशी परमात्माको देखनेका फल बताते हैं।
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्यात्मान्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥
| हि | = क्योंकि | पश्यन् | = देखनेवाला मनुष्य | ततः | = इसलिये (वह) |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वत्र | = सब जगह | आत्मना | = अपने-आपसे | पराम् | = परम |
| समवस्थितम् | = समरूपसे स्थित | आत्मानम् | = अपनी | गतिम् | = गतिको |
| ईश्वरम् | = ईश्वरको | न, हिनस्ति | = हिंसा नहीं करता, | याति | = प्राप्त हो जाता है। |
| समम् | = समरूपसे |
व्याख्या—‘समं पश्यन्हि’ ‘‘‘हिनस्यात्मान्मानम्’’—जो मनुष्य स्थावर-जंगम, जड़-चेतन प्राणियोंमें, ऊँच-नीच योनियोंमें, तीनों लोकोंमें समान रीतिसे परिपूर्ण परमात्माको देखता है अर्थात् उस परमात्माके साथ अपनी अभिन्नताका अनुभव करता है, वह अपने द्वारा अपनी हत्या नहीं करता।
जो शरीरके साथ तादात्म्य करके शरीरके बढ़नेसे अपना बढ़ना और शरीरके घटनेसे अपना घटना, शरीरके बीमार होनेसे अपना बीमार होना और शरीरके नीरोग होनेसे अपना नीरोग होना, शरीरके जन्मनेसे अपना जन्मना और शरीरके मरनेसे अपना मरना मानता है तथा शरीरके विकारोंको अपने विकार मानता है, वह अपने-आपसे अपनी हत्या करता है अर्थात् अपनेको जन्म-मरणके चक्करमें ले जाता है। परन्तु जिसकी दृष्टि शरीरकी तरफसे हटकर केवल सर्वव्यापक, सबके सासक परमात्माकी तरफ हो जाती है, वह फिर अपनी
हत्या नहीं करता अर्थात् जन्म-मरणके चक्करमें नहीं जाता, अपनेमें संसार और शरीरके विकारोंका अनुभव नहीं करता।
वास्तवमें अपने-आपकी (स्वरूपकी) हत्या अर्थात् अभाव कभी कोई कर ही नहीं सकता और अपना अभाव कभी हो भी नहीं सकता तथा अपना अभाव करना कोई चाहता भी नहीं। वास्तवमें नाशवान् शरीरके साथ तादात्म्य करना ही अपनी हत्या करना है, अपना पतन करना है, अपने-आपको जन्म-मरणमें ले जाना है।
‘ततो याति परां गतिम्’—शरीरके साथ तादात्म्य करके जो ऊँच-नीच योनियोंमें भटकता था, बार-बार जन्मता-मरता था, वह जब परमात्माके साथ अपनी अभिन्नताका अनुभव कर लेता है, तब वह परमगतिको अर्थात् नित्यप्राप्त परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
मार्मिक बात
परमात्मतत्त्व सब देशमें है, सब कालमें है, सम्पूर्ण
श्लोक २८ ]
- साधक-संजीवनी *
१०५
व्यक्तियोंमें है, सम्पूर्ण वस्तुओंमें है, सम्पूर्ण घटनाओंमें है, सम्पूर्ण परिस्थितियोंमें है, सम्पूर्ण क्रियाओंमें है। वह सबमें एक रूपसे, समान रीतिसे ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है। अब उसको प्राप्त करना कठिन है तो सुगम क्या होगा? जहाँ चाहो, वहीं प्राप्त कर लो। वास्तवमें इस संसारका जो 'है'-पना दीखता है, वह संसारका नहीं है। संसार तो एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता। इसमें केवल परिवर्तन-ही-परिवर्तन है। यह केवल परिवर्तनका ही पुंज है। जैसे पंखा तेजीसे घूमता है तो एक चक्र दीखता है, पर वास्तवमें वहाँ चक्र नहीं है, प्रत्युत पंखेकी ताड़ी ही चक्ररूपसे दीखती है। ऐसे ही यह संसार 'नहीं' होते हुए भी 'है'-रूपसे दीखता है। वास्तवमें एक परमात्मतत्त्व ही 'है'-रूपसे विद्यमान है।
विचार करें, अभी जितने शरीर आदि दीखते हैं, ये सौ वर्ष पहले थे क्या? और सौ वर्ष बाद रहेंगे क्या? ये पहले भी नहीं थे और अन्तमें भी नहीं रहेंगे; अतः ये बीचमें भी नहीं हैं। परन्तु परमात्मा सृष्टिके पैदा होनेसे पहले भी था, सृष्टिके लीन होनेके बाद भी रहेगा, अतः परमात्मा सृष्टिके समय भी ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है। जो पहले भी नहीं था, बादमें भी नहीं रहेगा, वह अभी भी नहीं है; और जो पहले भी था, बादमें भी रहेगा, वह अभी भी है। अतः संसारका जो 'है'-पना दीखता है, यह गलती है। परमात्मतत्त्व ही 'है'-रूपसे दीखता है। उस परमात्मतत्त्वकी सत्यतासे ही यह असत्य संसार मोह-(मूर्खा-ता)- के कारण सत्यकी तरह दीखता है—
जाम्बु सत्यता तँ जड् माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥
(मानस १।११७।४)
यदि मोह नहीं होगा, तो यह संसार नहीं दीखेगा, प्रत्युत एक परमात्मतत्त्व ही दीखेगा—'वासुदेवः सर्वम्' (गीता ७।१९)। कारण कि परमात्मा ही था, परमात्मा ही रहेगा, बीचमें दूसरा कहाँसे आयेगा? सोनेके जितने गहने हैं, उनमें पहले सोना ही था फिर सोना ही रहेगा; अतः बीचमें सोनेके सिवाय दूसरा कहाँसे आयेगा? गहना तो केवल (रूप, आकृति, उपयोग आदिको लेकर) कहनेके लिये है, तत्त्वतः तो सोना ही है। ऐसे ही संसार केवल कहनेके लिये है, तत्त्वतः तो परमात्मा ही है। उस परमात्माका अनुभव करनेमें ही मनुष्य-जन्मकी सफलता है।
'है'-(परमात्मा-) का अनुभव न करके 'नहीं'-
(संसार-) में उलझ जाना मनुष्यता नहीं है, प्रत्युत पशुता है। इस पशुताका त्याग करना है—'पशुबुद्धिमिमां जहि' (श्रीमद्भागवत १२।५।२)। इसलिये भगवान् कहते हैं कि जो नष्ट होनेवाले प्राणियोंमें नष्ट न होनेवाले परमात्माको देखता है, उसका देखना सही है। परन्तु जो नष्ट होनेवालेको देखता है और नष्ट न होनेवालेको नहीं देखता, वह आत्मघाती है—
योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते।
किं तेन न कृतं पापं चौरिणात्मापहारिणा॥
(महाभारत, उद्योग ४२।३७)
'जो अन्य प्रकारका (अविनाशी) होते हुए भी आत्माको अन्य प्रकारका (विनाशी) मानता है, उस आत्मघाती चोरने कौन-सा पाप नहीं किया?'
जो नाशवान् संसारको न देखकर सब जगह समानरूपसे परिपूर्ण परमात्मतत्त्वको देखता है, वह आत्मघाती नहीं होता अर्थात् वह अपने द्वारा अपनी हत्या नहीं करता, इसलिये वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। परन्तु जो सब जगह परिपूर्ण परमात्मतत्त्वको न देखकर संसार-शरीरको देखता है, वह आत्मघाती परमगतिको न प्राप्त होकर बार-बार जन्मता-मरता रहता है, दुःख पाता रहता है। इसलिये मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे (गीता—छठे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)।
जैसे दर्पणमें मुख नहीं होनेपर भी मुख दीखता है और स्वप्नमें हाथी नहीं होनेपर भी हाथी दीखता है, ऐसे ही संसार नहीं होनेपर भी संसार दीखता है। अगर संसारकी तरफ दृष्टि न रहे तो संसार 'है'-रूपसे नहीं दीखेगा। परमात्मा ही 'है'-रूपसे दीख रहा है—इस बातको साधक दृढ़तासे मान ले, फिर चाहे वह अभी न दीखे, पर बादमें दीखने लग जायगा। जैसे अभी साधक वृन्दावनमें बैठा है, तो उसे वृन्दावनको याद नहीं करना पड़ता। सोते समय, भोजन करते समय, हरेक कार्य करते समय वह वृन्दावनको याद नहीं करता; परन्तु 'मैं वृन्दावनमें हूँ'—इस बातमें उसको सन्देह नहीं होता। वह बिना याद किये याद रहता है। ऐसे ही अभी भले ही परमात्मा न दीखे, पर साधक ऐसा दृढ़तासे मान ले कि 'है'-रूपसे तो केवल परमात्मा ही है, संसार नहीं है, तो बादमें उसको ऐसा अनुभव होने लग जायगा। कारण कि मिथ्या वस्तु कबतक टिकी रहेगी और सत्य वस्तु कबतक छिपी रहेगी?
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
परिशिष्ट भाव— वास्तवमें सताईसवें-अट्टाईसवें श्लोकोंमें आत्माका ही वर्णन है; परन्तु 'परमेश्वर' और 'ईश्वर' नाम आनेसे इन श्लोकोंकी व्याख्यामें परमात्माका वर्णन किया गया है; क्योंकि आत्माका परमात्मासे साधर्म्य है (इसी अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध— इसी अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके संयोगकी बात बतायी। इस संयोगसे छूटनेके दो उपाय हैं—परमात्माके साथ अपने स्वतःसिद्ध सम्बन्धको पहचानना और प्रकृति-(शरीर-) से अपने माने हुए सम्बन्धको तोड़ना। सताईसवें-अट्टाईसवें श्लोकोंमें परमात्माके साथ सम्बन्धको पहचाननेकी बात बता दी। अब आगेके दो श्लोकोंमें प्रकृतिसे सम्बन्ध तोड़नेकी बात बताते हैं।
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ २१ ॥
| यः | = जो | क्रियमाणानि | = की जाती हुई | पश्यति | = देखता (अनुभव |
|---|---|---|---|---|---|
| कर्माणि | = सम्पूर्ण क्रियाओंको | पश्यति | = देखता है | करता) है, | |
| सर्वशः | = सब प्रकारसे | तथा | = और | ||
| प्रकृत्या | = प्रकृतिके द्वारा | आत्मानम् | = अपने-आपको | सः, च | = वही (यथार्थ |
| एव | = ही | अकर्तारम् | = अकर्ता | देखता है)। |
व्याख्या— 'प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः'—वास्तवमें चेतन तत्त्व स्वतः-स्वाभाविक निर्वाकार, सम और शान्तरूपसे स्थित है। उस चेतन तत्त्व-(परमात्मा-) की शक्ति प्रकृति स्वतः-स्वाभाविक क्रियाशील है। उसमें नित्य-निरन्तर क्रिया होती रहती है—'प्रकर्षेण करणं (भावे ल्युट्) इति प्रकृतिः '। यद्यपि प्रकृतिको सक्रिय और अक्रिय—दो अवस्थाओंवाली (सर्ग-अवस्थामें सक्रिय और प्रलय-अवस्थामें अक्रिय) कहते हैं, तथापि सूक्ष्म विचार करें तो प्रलय-अवस्थामें भी उसकी क्रियाशीलता मिटती नहीं है। कारण कि जब प्रलयका आरम्भ होता है, तब प्रकृति सर्ग-अवस्थाकी तरफ चलती है। इस प्रकार प्रकृतिमें सूक्ष्म क्रिया चलती ही रहती है। प्रकृतिकी सूक्ष्म क्रियाको ही अक्रिय-अवस्था कहते हैं; क्योंकि इस अवस्थामें सृष्टिकी रचना नहीं होती। परन्तु महासर्गमें जब सृष्टिकी रचना होती है, तब सर्गके आरम्भसे सर्गके मध्यतक प्रकृति सर्गकी तरफ चलती है और सर्गका मध्य भाग आनेपर प्रकृति प्रलयकी तरफ चलती है। इस प्रकार प्रकृतिकी स्थूल क्रियाको सक्रिय-अवस्था कहते हैं। अगर प्रलय और महाप्रलयमें प्रकृतिको अक्रिय माना जाय, तो प्रलय-महाप्रलयका आदि, मध्य और अन्त कैसे होगा?
ये तीनों तो प्रकृतिमें सूक्ष्म क्रिया होनेसे ही होते हैं। अतः सर्ग-अवस्थाकी अपेक्षा प्रलय-अवस्थामें अपेक्षाकृत अक्रियता है, सर्वथा अक्रियता नहीं है।
सूर्यका उदय होता है, फिर वह मध्यमें आ जाता है और फिर वह अस्त हो जाता है, तो इससे मालूम होता है कि प्रातः सूर्योदय होनेपर प्रकाश मध्याह्नतक बढ़ता जाता है और मध्याह्नसे सूर्यास्ततक प्रकाश घटता जाता है। सूर्यास्त होनेके बाद आधी राततक अन्धकार बढ़ता जाता है और आधी रातसे सूर्योदयतक अन्धकार घटता जाता है। वास्तवमें प्रकाश और अन्धकारकी सूक्ष्म सन्धि मध्याह्न और मध्य-रात ही है, पर वह दीखती है सूर्योदय और सूर्यास्तके समय। इस दृष्टिसे प्रकाश और अन्धकारकी क्रिया मिटती नहीं, प्रत्युत निरन्तर होती ही रहती है। ऐसे ही सर्ग और प्रलय, महासर्ग और महाप्रलयमें भी प्रकृतिमें क्रिया निरन्तर होती ही रहती है*।
इस क्रियाशील प्रकृतिके साथ जब यह पुरुष सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब शरीरद्वारा होनेवाली स्वाभाविक क्रियाएँ (तादात्म्यके कारण) अपनेमें प्रतीत होने लगती हैं।
'यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति' —प्रकृति और उसके कार्य स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरमें
- महासर्गमें समयकी गणनाका साधन सूर्य होता है; किन्तु महाप्रलयमें सूर्य भी लीन हो जाता है। अतः महासर्गके कालसे ही महाप्रलयके कालकी गणना आरम्भ हो जाती है। महाप्रलयके कालकी गणनाका एकमात्र साधन नित्य, चेतन, अविनाशी परमात्मतत्त्व ही होता है।
श्लोक ३० ]
- साधक-संजीवनी *
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खाना-पीना, चलना-फिरना, उठना-बैठना, घटना-बढ़ना, हिलना-डुलना, सोना-जागना, चिन्तन करना, समाधिस्थ होना आदि जो कुछ भी क्रियाएँ होती हैं, वे सभी प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं, स्वयंके द्वारा नहीं; क्योंकि स्वयंमें कोई क्रिया होती ही नहीं—ऐसा जो देखता है अर्थात् अनुभव करता है, वही वास्तवमें ठीक देखता है। कारण कि ऐसा देखनेसे अपनेमें अकर्तृत्व-(अकर्तापन-) का अनुभव हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —जितनी भी क्रियाएँ होती हैं, वे सब-की-सब प्रकृति-विभागमें ही होती हैं। इसमें जीवका हाथ नहीं है। प्रकृतिके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको ही गीतामें कहीं 'गुणोंसे होनेवाली क्रियाएँ' और कहीं 'इन्द्रियोंसे होनेवाली क्रियाएँ' कहा गया है; जैसे—सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं—'प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणेः कर्माणि सर्वशः ' (३।२७); गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—'गुणा गुणेषु वर्तन्ते ' (३।२८); गुणोंके सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं—'नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ' (१४।१९); इन्द्रियाँ ही इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं—'इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते ' (५।९) आदि। तात्पर्य है कि क्रियामात्र प्रकृतिजन्य ही है। अतः प्रकृति कभी किंचिन्मात्र भी अक्रिय नहीं होती और पुरुषमें कभी किंचिन्मात्र भी क्रिया नहीं होती। इसलिये गीतामें आया है कि तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी 'मैं (स्वयं) लेशमात्र भी कुछ नहीं करता हूँ'—ऐसा अनुभव करता है—'नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्यते तत्त्ववित् ' (५।८); स्वयं न करता है, न करवाता है—'नैव कुर्वन् कारयन् ' (५।१३); यह पुरुष शरीरमें रहता हुआ भी न करता है, न लिप्त होता है—'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ' (१३।३१); जो आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मीत ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है—'तत्रैव सति कर्तारमात्मानं..... ' (१८।१६) आदि।
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३० ॥
| यदा | = जिस कालमें | स्थित | विस्तारम् | = विस्तार (देखता है), |
|---|---|---|---|---|
| (साधक) | अनुपश्यति | = देखता है | तदा | = उस कालमें |
| भूतपृथग्भावम् | = प्राणियोंके | च | = और | |
| अलग-अलग | ततः | = उस प्रकृतिसे | ब्रह्म | = ब्रह्मको |
| भावोंको | एव | = ही (उन | सम्पद्यते | = प्राप्त हो |
| एकस्थम् | = एक प्रकृतिमें ही | सबका) |
व्याख्या —[प्रकृतिके दो रूप हैं—क्रिया और पदार्थ। क्रियासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये उन्तीसवों श्लोक कहा, अब पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये यह तीसवों श्लोक कहते हैं।]
'यदा भूतपृथग्भावं ..... ब्रह्म सम्पद्यते तदा '—जिस कालमें साधक सम्पूर्ण प्राणियोंके अलग-अलग भावोंको अर्थात् त्रिलोकीमें जितने जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज और स्वेदज प्राणी पैदा होते हैं, उन प्राणियोंके स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित
यहाँ क्रियाओंको प्रकृतिके द्वारा होनेवाली बताया है, कहीं गुणोंके द्वारा होनेवाली बताया है और कहीं इन्द्रियोंके द्वारा होनेवाली बताया है—ये तीनों बातें एक ही हैं। प्रकृति सबका कारण है, गुण प्रकृतिके कार्य हैं और गुणोंका कार्य इन्द्रियाँ हैं। अतः प्रकृति, गुण और इन्द्रियाँ—इनके द्वारा होनेवाली सभी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा होनेवाली ही कही जाती हैं।
देखता है, उस कालमें वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। त्रिलोकीके स्थावर-जंगम प्राणियोंके शरीर, नाम, रूप, आकृति, मनोवृत्ति, गुण, विकार, उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आदि सब एक प्रकृतिसे ही उत्पन्न हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर प्रकृतिसे ही उत्पन्न होते हैं, प्रकृतिमें ही स्थित रहते हैं और प्रकृतिमें ही लीन होते हैं। इस प्रकार देखनेवाला ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है अर्थात् प्रकृतिसे अतीत स्वतःसिद्ध अपने स्वरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। वास्तवमें वह पहलेसे ही प्राप्त था, केवल प्रकृतिजन्य पदार्थोंके साथ
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
अपना सम्बन्ध माननेसे ही उसको अपने स्वरूपका अनुभव नहीं होता था। परन्तु जब वह सबको प्रकृतिमें ही स्थित और प्रकृतिसे ही उत्पन्न देखता है, तब उसको अपने स्वतःसिद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है।
जैसे पृथ्वीसे उत्पन्न होनेवाले स्थावर-जंगम जितने भी शरीर हैं तथा उन शरीरोंमें जो कुछ भी परिवर्तन होता है, रूपान्तर होता है१ क्रियाएँ होती हैं२ वे सब पृथ्वीपर ही होती हैं। ऐसे ही प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले जितने गुण, विकार हैं तथा उनमें जो कुछ परिवर्तन होता है, घट-बद्ध होती है, वह सब-की-सब प्रकृतिमें ही होती है। तात्पर्य है कि जैसे पृथ्वीसे पैदा होनेवाले पदार्थ पृथ्वीमें ही स्थित रहनेसे और पृथ्वीमें लीन होनेसे पृथ्वीरूप ही हैं, ऐसे ही प्रकृतिसे पैदा होनेवाला सब संसार प्रकृतिमें ही स्थित रहनेसे और प्रकृतिमें ही लीन होनेसे प्रकृतिरूप ही है। इसी प्रकार स्थावर-जंगम प्राणियोंके रूपमें जो चेतन-तत्त्व है, वह निरन्तर परमात्मामें
परिशिष्ट भाव— पूर्वश्लोकमें व्यक्ति की बात और प्रस्तुत श्लोकमें कालकी बात आयी है।
भक्तिके प्रकरणमें भगवान्ने सम्पूर्ण भावोंको अपनेमें बताया है—‘भवन्ति भावा भूतानां मत् एव पृथग्विधाः’ (१०।५), पर यहाँ ज्ञानके प्रकरणमें सम्पूर्ण भावोंको प्रकृतिमें बताया है। तात्पर्य है कि जहाँ सत्-असत्का विभाग किया है, वहाँ सब भाव असत्में कहे हैं और जहाँ समग्रकी बात कही है, वहाँ सब भाव अपनेमें कहे हैं। समग्रमें सत्-असत् सब कुछ परमात्मा ही हैं—‘सदसच्चाहम्’ (१।१९)
सम्बन्ध—बाईसवें श्लोकमें जिसको देहसे पर बताया है और पीछेके (तीसवें) श्लोकमें जिसका ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है, उस पुरुष-(चेतन-) के वास्तविक स्वरूपका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥
| कौन्तेय | = हे कुन्तीनन्दन! | अव्ययः | = अविनाशी | न | = न |
|---|---|---|---|---|---|
| अयम् | = यह (पुरुष स्वयं) | परमात्मा | = परमात्मस्वरूप | करोति | = करता है |
| अनादित्वात् | = अनादि होनेसे | ही है। | (और) | ||
| (और) | शरीरस्थः | = यह शरीरमें | न | = न | |
| निर्गुणत्वात् | = गुणोंसे रहित | रहता हुआ | लिप्यते | = लिप्त | |
| होनेसे | अपि | = भी | होता है। |
१-पहले मिट्टी और बीजको तौल ले और एक पात्रमें वह तुली हुई मिट्टी बिछाकर बीज बो दे और पानी सींच दे। फसल होनेपर उसको काटकर अनाज तैयार कर ले और मिट्टीको सूखने दे। सूखनेके बाद मिट्टी और अनाजको तौलकर देखे तो मिट्टीका वजन कम तथा अनाजका वजन ज्यादा होगा। यह मिट्टी-(पृथ्वी-) का अनाजमें रूपान्तर होना है
२-क्रियाएँ दो तरह की होती हैं—होना और करना। बालकका जवान और बूढ़ा होना आदि क्रियाएँ ‘होती’ हैं और खाना-पीना आदि क्रियाएँ ‘करते’ हैं। ये सब क्रियाएँ शरीरमें ही होती हैं।
श्लोक ३१ ]
- साधक-संजीवनी *
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व्याख्या—‘अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः’— इसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें जिसको अनादि कहा है, उसीको यहाँ भी ‘अनादित्वात्’ पदसे अनादि कहा है अर्थात् यह पुरुष आदि-(आरम्भ-) से रहित है। अब प्रश्न होता है कि वहाँ तो प्रकृतिको भी अनादि कहा है, इसलिये प्रकृति और पुरुष—दोनोंमें क्या फरक रहा ? इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं—‘निर्गुणत्वात् ’ अर्थात् यह पुरुष गुणोंसे रहित है। प्रकृति अनादि तो है, पर वह गुणोंसे रहित नहीं है, प्रत्युत गुणों और विकारोंवाली है। उससे सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीनों गुण तथा विकार पैदा होते हैं। परन्तु पुरुष इन तीनों गुणों और विकारोंसे सर्वथा रहित (निर्गुण और निर्विकार) है। ऐसा यह पुरुष साक्षात् अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है अर्थात् यह पुरुष विनाशरहित परम शुद्ध आत्मा है।
‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’— यह पुरुष शरीरमें रहता हुआ भी न कुछ करता है और न किसी कर्मसे लिप्त ही होता है। तात्पर्य है कि इस पुरुष-(स्वयं-) ने न तो पहले किसी भी अवस्थामें कुछ किया है, न वर्तमानमें कुछ करता है और न आगे ही कुछ कर सकता है अर्थात् यह पुरुष सदासे ही प्रकृतिसे निलिप्त, असंग है तथा गुणोंसे रहित और अविनाशी है। इसमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व है ही नहीं।
यहाँ ‘शरीरस्थोऽपि’ कहनेका तात्पर्य है कि यह पुरुष जिस समय अपनेको शरीरमें स्थित मानकर अपनेको कार्यका कर्ता और सुख-दुःखका भोक्ता मानता है, उस समय भी वास्तवमें यह तटस्थ, प्रकाशमात्र ही रहता है। सुख-दुःखका भान इसीसे होता है; अतः इसको प्रकाशक कह सकते हैं, पर इसमें प्रकाशक-धर्म नहीं है।
परिशिष्ट भाव— पुरुष अनादि है, पर शरीर आदिवाला है। पुरुष निर्गुण है, पर शरीर गुणमय है। पुरुष परमात्मा है, पर शरीर अनात्मा है। पुरुष अव्यय है, पर शरीर नाशवान् है। इसलिये अज्ञानी मनुष्यके द्वारा पुरुष (आत्मा)-को शरीरमें स्थित माननेपर भी वास्तवमें वह शरीरमें स्थित नहीं है अर्थात् शरीरसे सर्वथा असम्बद्ध है—‘न करोति न लिप्यते ’। कारण कि शरीरका सम्बन्ध तो संसारके साथ है, पर पुरुषका सम्बन्ध परमात्मके साथ है। अतः वास्तवमें पुरुष कभी शरीरस्थ हो सकता ही नहीं। परन्तु इस वास्तविकताकी तरफ ध्यान न देनेके कारण मनुष्य उसको शरीरस्थ मान लेता है।
‘निर्गुणत्वात्’— पुरुष स्वयं निर्गुण होते हुए भी गुणोंका संग करके बँध जाता है (गीता—इसी अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। दीखता तो ऐसा ही है कि बन्धन स्वतः-स्वाभाविक है और मुक्ति कृतिसाध्य है, पर वास्तवमें मुक्ति स्वतः-स्वाभाविक है और बन्धन कृतिसाध्य है। गुणोंका सम्बन्ध पुरुषके साथ नहीं है, प्रत्युत प्रकृतिके साथ है (गीता १३।२३) इसलिये ‘अनादि, निर्गुण, परमात्मा, अव्यय’ और ‘न करोति न लिप्यते ’— ये स्वतः-स्वाभाविक हैं। साधकको इस स्वाभाविकताका अनुभव करना है।
जैसे मकानमें रहते हुए भी हम मकानसे अलग हैं, ऐसे ही शरीरमें रहते हुए माननेपर भी हम शरीरसे अलग हैं।
यहाँ ‘अपि’ पदसे ऐसा मालूम होता है कि अनादिकालसे अपनेको शरीरमें स्थित माननेवाला हेक (चौंटीसे ब्रह्मार्पयन्त) प्राणी स्वरूपसे सदा ही निलिप्त, असंग है। उसकी शरीरके साथ एकता कभी हुई ही नहीं; क्योंकि शरीर तो प्रकृतिका कार्य होनेसे सदा प्रकृतिमें ही स्थित रहता है और स्वयं परमात्माका अंश होनेसे सदा परमात्मामें ही स्थित रहता है। स्वयं परमात्मासे कभी अलग हो सकता ही नहीं। शरीरके साथ एकात्मता माननेपर भी, शरीरके साथ कितना ही घुल-मिल जानेपर भी, शरीरको ही अपना स्वरूप माननेपर भी उसकी निलिप्तता कभी नष्ट नहीं होती, वह स्वरूपसे सदा ही निलिप्त रहता है। अपनी निलिप्तताका अनुभव न होनेपर भी उसके स्वरूपमें कुछ भी विकृति नहीं होती। अतः उसने अपने स्वरूपसे न कभी कुछ किया है और न करता ही है तथा वह स्वयं न कभी लिप्त हुआ है और न लिप्त होता ही है।
यद्यपि पुरुष अपनेको शरीरमें स्थित माननेसे ही कर्ता और भोक्ता बनता है, तथापि इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि ‘प्रकृति’में स्थित पुरुष ही भोक्ता बनता है और यहाँ कहते हैं कि ‘शरीर’ में स्थित होनेपर भी पुरुष कर्ता-भोक्ता नहीं है। ऐसा कहनेका तात्पर्य यह है कि प्रकृति और उसका कार्य शरीर—दोनों एक ही हैं। अतः पुरुषको चाहे प्रकृतिमें स्थित कहो, चाहे शरीरमें स्थित कहो, एक ही बात है। एक शरीरके साथ सम्बन्ध होनेसे मात्र प्रकृतिके साथ, मात्र शरीरोंके साथ सम्बन्ध हो जाता है। वास्तवमें पुरुषका सम्बन्ध न तो व्यक्ति शरीरके साथ है और न समष्टि प्रकृतिके साथ ही है। अपना सम्बन्ध शरीरके साथ माननेसे ही वह अपनेको कर्ता-भोक्ता मान लेता है। वास्तवमें वह न कर्ता है और न भोक्ता है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
‘न करोति न लिप्यते’—यह साधनजन्य नहीं है, प्रत्युत स्वतः-स्वाभाविक है। तात्पर्य है कि स्वरूपमें लेशमात्र भी कर्तृत्व-भोक्तृत्व नहीं है—यह स्वतःसिद्ध बात है। इसमें कोई पुरुषार्थ नहीं है अर्थात् इसके लिये कुछ करना नहीं है। तात्पर्य है कि कर्तृत्व-भोक्तृत्वको मिटाना नहीं है, प्रत्युत इनको अपनेमें स्वीकार नहीं करना है, इनके अभावका अनुभव करना है; क्योंकि वास्तवमें ये अपनेमें हैं ही नहीं! इसलिये साधकको अपनेमें निरन्तर अकर्तृत्व और अभोक्तृत्वका अनुभव करना चाहिये। अपनेमें निरन्तर अकर्तृत्व और अभोक्तृत्व (निष्कामता-निर्ममता)-का अनुभव होना ही जीवन्मुक्त है। इसीको गीताने स्मृति प्राप्त होना कहा है—‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा ’ (१८।७३)
अगर स्वरूप कर्ता और भोक्ता नहीं है तो फिर कर्ता और भोक्ता कौन है? यह विचार किया जाता है। पहले यह विचार करें कि कर्ता कौन है? शरीर कर्ता नहीं है; क्योंकि यह प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है। मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार—ये चार करण हैं, जिनको ‘अन्तःकरण’ कहते हैं। यह अन्तःकरण भी कर्ता नहीं है; क्योंकि करण कर्ताके अधीन होता है। परन्तु कर्ता स्वतन्त्र होता है—‘स्वतन्त्रः कर्ता ’ (पाणि० अ० १।४।५४)। करण तो क्रियाकी सिद्धिमें अत्यन्त सहायक होता है—‘साधकतमं करणम् ’ (पाणि० अ० १।४।४२), इसलिये करणके बिना किसी क्रियाकी सिद्धि होती ही नहीं। जैसे, कलम स्वतन्त्रतासे नहीं लिखती, प्रत्युत वह तो लिखनेका एक साधन (करण) है, जो लेखक (कर्ता)-के अधीन होता है। अतः करण कर्ता नहीं होता और कर्ता करण नहीं होता। दूसरी बात, यदि करणमें कर्तापन है तो फिर सुखी-दुःखी स्वयं क्यों होता है? यदि करण सुखी-दुःखी होता है तो हमें क्या नुकसान है? सत्-स्वरूप भी कर्ता नहीं है; क्योंकि मैंपन तो प्रकृतिका कार्य है, वह प्रकृतिसे अतीतमें कैसे सम्भव है? यदि स्वरूपमें कर्तापन होता तो वह कभी मिटता नहीं; क्योंकि स्वरूप अविनाशी है। इसलिये भगवान्ने यहाँ स्वरूपमें कर्तापनका निषेध किया है—‘न करोति ’। आगे अठारहवें अध्यायमें भी भगवान्ने कहा है कि जो आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मीत ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है (गीता—अठारहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। वास्तवमें जो भोक्ता (सुखी-दुःखी) होता है, वही कर्ता होता है।
अब यह विचार करें कि भोक्ता कौन है? भोक्ता न सत् है, न असत् है। सत् भोक्ता नहीं हो सकता; क्योंकि सत्में कभी अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सतः ’, जबकि भोक्तापनका अभाव होता है—‘न लिप्यते ’। असत् भी भोक्ता नहीं हो सकता; क्योंकि असत्की सत्ता ही नहीं है—‘नासतो विद्यते भावः ’। असत्में चेतनता भी नहीं है। अतः उसमें भोक्तापनकी कल्पना ही नहीं हो सकती। तात्पर्य यह हुआ कि कर्तापन और भोक्तापन न तो सत्में हैं और न असत्में ही हैं। सत्-असत्के संयोगमें भी कर्तापन और भोक्तापन नहीं हैं; क्योंकि जैसे दिन और रातका संयोग असम्भव है, ऐसे ही सत् और असत्का संयोग भी असम्भव है। अतः कर्तापन-भोक्तापन केवल माने हुए हैं—‘कर्ताहमिति मन्यते ’ (३।२७)। जब साधक विवेकपूर्वक शरीरसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है अर्थात् मैं-मेरापनको मिटा देता है (जो कि वास्तवमें मैं नहीं), तब न कर्ता रहता है, न भोक्ता रहता है, प्रत्युत एक चिन्मय सत्ता रहती है। इस प्रकार अपनेमें कर्तापन और भोक्तापनके अभावका अनुभव होनेपर साधक मुक्त हो जाता है अर्थात् कर्ता-भोक्ता नहीं रहता, प्रत्युत शुद्ध स्वरूप (चिन्मय सत्ता) रह जाता है।
‘न करोति न लिप्यते ’ पदोंका विवेचन भगवान्ने आगे बत्तीसवें-तैंतीसवें श्लोकोंमें किया है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि वह पुरुष न करता है और न लिप्त होता है, तो अब प्रश्न होता है कि वह कैसे लिप्त नहीं होता और कैसे नहीं करता? इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥
| यथा | = जैसे | न, उपलिप्यते = (कहीं भी) लिप्त | अवस्थितः | = परिपूर्ण |
|---|---|---|---|---|
| सर्वगतम् | = सब जगह व्याप्त | नहीं होता, | आत्मा | = आत्मा |
| आकाशम् | = आकाश | तथा | = ऐसे ही | देहे |
| सौक्ष्म्यात् | = अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे | सर्वत्र | = सब जगह | न, उपलिप्यते = लिप्त नहीं होता। |
श्लोक ३३ ]
- साधक-संजीवनी *
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व्याख्या —[पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ‘न करोति’ पदोंसे पहले कर्तृत्वका और फिर ‘न लिप्यते’ पदोंसे भोक्तृत्वका अभाव बताया है। परन्तु उन दोनोंका विवेचन करते हुए इस श्लोकमें पहले भोक्तृत्वके अभावकी बात बतायी है और आगेके श्लोकमें कर्तृत्वके अभावकी बात बतायेंगे। अतः यहाँ ऐसा व्यतिक्रम रखनेमें भगवान्का क्या भाव है? इसका उत्तर यह है कि यद्यपि कर्तृत्वके बाद ही भोक्तृत्व होता है अर्थात् कर्म करनेके बाद ही उस कर्मके फलका भोग होता है, तथापि मनुष्य जो कुछ भी करता है, पहले किसी फल-(सिद्धि-) का उद्देश्य मनमें रखकर ही करता है। अतः मनमें पहले भोक्तृत्व आता है, फिर उसके अनुसार काम करता है अर्थात् फिर कर्तृत्व आता है। इस दृष्टिसे भगवान् यहाँ सबसे पहले भोक्तृत्वका निषेध करते हैं। भोक्तृत्व-(लिप्ता- ) का त्याग होनेपर कर्तृत्वका त्याग स्वतः हो जाता है अर्थात् फलेच्छाका त्याग होनेपर क्रिया करनेपर भी कर्तृत्व नहीं होता।]
‘यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते’— आकाशका कार्य वायु, तेज, जल और पृथ्वी है। अतः
परिशिष्ट भाव— चिन्मय सत्ता एक ही है, पर अहंताके कारण वह अलग-अलग दीखती है। अपरा प्रकृतिके अंश ‘अहम्’ को पकड़नेके कारण ही यह जीव ‘अंश’ कहलाता है—‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ’ (गीता १५।७)। अगर यह अहम्को न पकड़े तो एक सत्ता-ही-सत्ता है। सत्ता (होनेपन)-के सिवाय सब कल्पना है। वह चिन्मय सत्ता सब कल्पनाओंका आधार, अधिष्ठान, प्रकाशक और आश्रय है। उस सत्तामें एकदेशीयपना नहीं है। वह चिन्मय सत्ता सर्वव्यापक है। सम्पूर्ण सृष्टि (क्रियाएँ और पदार्थ) उस सत्ताके अन्तर्गत हैं। सृष्टि तो उत्पन्न और नष्ट होती रहती है, पर सत्ता ज्यों-की-त्यों रहती है। तात्पर्य है कि चिन्मय सत्ता न शरीरस्थ है और न प्रकृतिस्थ है, प्रत्युत आकाशकी तरह सर्वत्र स्थित है अर्थात् वह सम्पूर्ण शरीरोंके, सृष्टिमात्रके बाहर-भीतर सर्वत्र परिपूर्ण है। वह सर्वव्यापी सत्ता ही हमारा स्वरूप है और वही परमात्मतत्त्व है। तात्पर्य है कि सर्वदेशीय सत्ता एक ही है। वही योगियोंका योग है, वही ज्ञानियोंका ज्ञान है और वही भक्तोंका भगवान् है। साधकका लक्ष्य निरन्तर उस सत्ताकी तरफ ही रहना चाहिये।
सत्तामें एकदेशीयता अहम्के कारण दीखती है। वह अहम् सुखलोलुपतापर टिका हुआ है। साधन करते हुए भी साधक जहाँ है, वहीं सुख भोगने लग जाता है—‘सुखसंगेन बध्नाति ’ (गीता १४।६)। यह सुखलोलुपता गुणातीत होनेतक रहती है। अतः इसमें साधकको बहुत विशेष सावधान रहना चाहिये और सावधानीपूर्वक सुखलोलुपतासे बचना चाहिये।
सम्बन्ध— पूर्वश्लोकमें भगवान्ने आत्मामें भोक्तृत्वका अभाव बताया, अब आगेके श्लोकमें आत्मामें कर्तृत्वका अभाव बताते हैं।
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
भारत | = हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! | इमम् | = इस | क्षेत्री | = क्षेत्रज्ञ (आत्मा) ---|---|---|---|---|--- यथा | = जैसे | कृत्स्नम् | = सम्पूर्ण | कृत्स्नम् | = सम्पूर्ण एकः | = एक ही | लोकम् | = संसारको | क्षेत्रम् | = क्षेत्रको रविः | = सूर्य | प्रकाशयति | = प्रकाशित करता है, | प्रकाशयति | = प्रकाशित करता है, | | तथा | = ऐसे ही | |
व्याख्या—‘यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिम् रविः’ —नेत्रोंसे दीखनेवाले इस सम्पूर्ण संसारको, संसारके मात्र पदार्थोंको एक सूर्य ही प्रकाशित करता है और संसारकी सब क्रियाएँ सूर्यके प्रकाशके अन्तर्गत होती हैं; परन्तु सूर्यमें ‘मैं सबको प्रकाशित करता हूँ’ ऐसा कर्तृत्व नहीं होता। जैसे—सूर्यके प्रकाशमें ही ब्राह्मण वेदपाठ करता है और शिकारी पशुओंको मारता है, पर सूर्यका प्रकाश वेदपाठ और शिकाररूपी क्रियाओंको करने-करवानेमें कारण नहीं बनता। यहाँ ‘लोक’ शब्द मात्र संसार-(चौदह भुवनों-) का वाचक है। कारण कि मात्र संसारमें जो कुछ भी (चन्द्रमा, तारे, अग्नि, मणि, जड़ी-बूटी आदिमें) प्रकाश है, वह सब सूर्यका ही है। ‘क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत’—सूर्यकी तरह एक ही क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ, आत्मा) सम्पूर्ण क्षेत्रोंको प्रकाशित करता है अर्थात् सब क्षेत्रोंमें करना-करवानारूप सम्पूर्ण क्रियाएँ क्षेत्रीके प्रकाशमें ही होती हैं; परन्तु क्षेत्री उन क्रियाओंको करने-करवानेमें कारण नहीं बनता। सूर्य तो केवल स्थूल संसारको ही प्रकाशित करता है
परिशिष्ट भाव —जैसे सूर्य सम्पूर्ण जगत् (दृश्यमात्र)-को प्रकाशित करता है और उसके प्रकाशमें सम्पूर्ण शुभ-अशुभ क्रियाएँ होती हैं, पर सूर्य उन क्रियाओंका न तो कर्ता बनता है और न भोक्ता ही बनता है। ऐसे ही स्वयं सम्पूर्ण लोकोंके सब शरीरोंको प्रकाशित करता है अर्थात् उनको सत्ता-स्फूर्ति देता है, पर वास्तवमें स्वयं न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है, अर्थात् उसमें न कर्तृत्व आता है, न भोक्तृत्व। तात्पर्य है कि स्वयंमें प्रकाशकत्वका अभिमान नहीं है।
करनेकी जिम्मेवारी उसीपर होती है, जो कुछ कर सकता है। जैसे, कितना ही चतुर चित्रकार हो, बिना सामग्री (रंग, ब्रश आदि)-के वह चित्र नहीं बना सकता, ऐसे ही पुरुष (चेतन) बिना प्रकृतिकी सहायताके कुछ नहीं कर सकता। अतः पुरुषपर कुछ करनेकी जिम्मेवारी हो ही नहीं सकती। यह सबका अनुभव है कि शरीरके बिना हम कुछ कर सकते ही नहीं। इसलिये कुछ-न-कुछ करनेमें ही शरीरका उपयोग है। अगर हम कुछ भी न करना चाहें तो शरीरका क्या उपयोग है? कुछ भी उपयोग नहीं है। अगर हम कुछ भी देखना न चाहें तो आँख हमारे क्या काम आयी? कुछ भी सुनना न चाहें तो कान हमारे क्या काम आया? स्थूल क्रिया करनेमें स्थूलशरीर काम आता है। चिन्तन, ध्यान करनेमें सूक्ष्मशरीर काम आता है। स्थिरता, समाधिमें कारणशरीर काम आता है।* अगर कुछ न करें तो तीनों शरीर हमारे क्या काम आये? शरीर और उसके द्वारा होनेवाली क्रियाएँ संसारके ही काम आती हैं। हमारा स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है; अतः उसके लिये शरीर और उसकी क्रियाएँ कुछ काम नहीं आतीं। चिन्मय सत्तामात्रमें कोई कमी नहीं आती, वह सर्वथा पूर्ण है; अतः हमारेको अपने लिये कुछ नहीं चाहिये। चिन्मय सत्ताके सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं; क्योंकि सत्ता एक ही हो सकती है, दो हो सकती ही नहीं। अतः हमारेको किसी साथीकी जरूरत नहीं है। इस प्रकार न तो क्रियाके साथ सम्बन्ध (कर्तृत्व)
- समाधि और व्युत्थान—दोनों कारणशरीरमें होते हैं। कारणशरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ‘सहज-समाधि’ अथवा ‘सहजावस्था’ होती है।
और उसके प्रकाशमें स्थूल संसारकी ही क्रियाएँ होती हैं, पर क्षेत्री केवल स्थूल क्षेत्र-(संसार-) को ही प्रकाशित नहीं करता, प्रत्युत वह स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों क्षेत्रोंको प्रकाशित करता है तथा उसके प्रकाशमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों शरीरोंकी सम्पूर्ण क्रियाएँ होती हैं।
जैसे सम्पूर्ण संसारको प्रकाशित करनेपर भी सूर्यमें (सबको प्रकाशित करनेका) अभिमान नहीं आता और तरह-तरहकी क्रियाओंको प्रकाशित करनेपर भी सूर्यमें नानाभेद नहीं आता, ऐसे ही सम्पूर्ण क्षेत्रोंको प्रकाशित करने, उनको सत्ता-स्फूर्ति देनेपर भी क्षेत्रीमें अभिमान, कर्तृत्व नहीं आता और तरह-तरहकी क्रियाओंको प्रकाशित करनेपर भी क्षेत्रीमें नानाभेद नहीं आता। वह क्षेत्री सदा ही ज्यों-का-त्यों निर्लिप्त, असंग रहता है।
कोई भी क्रिया तथा वस्तु बिना आश्रयके नहीं होती और कोई भी प्रतीति बिना प्रकाश-(ज्ञान-) के नहीं होती। क्षेत्री सम्पूर्ण क्रियाओं, वस्तुओं और प्रतीतियोंका आश्रय और प्रकाशक है।
श्लोक ३४]
- साधक-संजीवनी *
११३
हो, न अप्राप्त वस्तुके साथ सम्बन्ध (कामना) हो और न प्राप्त वस्तुके साथ सम्बन्ध (ममता) हो तो प्रकृतिके साथ तादात्म्य नहीं रहेगा। प्रकृतिसे तादात्म्य न रहनेपर प्रकृतिमें क्रिया तो रहेगी, पर कर्ता और भोक्ता कोई नहीं रहेगा। (इसी अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—अब भगवान् क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागको जाननेका फल बताते हुए प्रकरणका उपसंहार करते हैं।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरैवमन्तरं
ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर््यान्ति ते परम् ॥ ३४ ॥
| एवम् | = इस प्रकार | च | = तथा | विदुः | = जानते हैं, |
|---|---|---|---|---|---|
| ये | = जो | ते | = वे | ||
| ज्ञानचक्षुषा | = ज्ञानरूपी नेत्रोंसे | भूतप्रकृतिमोक्षम् | = कार्य-कारण-सहित प्रकृतिसे | परम् | = परमात्माको |
| क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः | = क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके | स्वयंको अलग | यान्ति | = प्राप्त हो जाते हैं। | |
| अन्तरम् | = विभागको |
व्याख्या—[ज्ञानमार्ग विवेकसे ही आरम्भ होता है और वास्तविक विवेक-(बोध-) में ही समाप्त होता है। वास्तविक विवेक होनेपर प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होकर स्वतःसिद्ध परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है—इसी बातको यहाँ बताया गया है।]
‘क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरैवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा’—सत्-असत्, नित्य-अनित्य, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञको अलग-अलग जाननेका नाम ‘ज्ञानचक्षु’ (विवेक) है। यह क्षेत्र विकारी है, कभी एकरूप नहीं रहता। यह प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है। ऐसा कोई भी क्षण नहीं है, जिसमें यह स्थिर रहता हो। परन्तु इस क्षेत्रमें रहनेवाला, इसको जाननेवाला क्षेत्रज्ञ सदा एकरूप रहता है। क्षेत्रज्ञमें परिवर्तन न हुआ है, न होगा और न होना सम्भव ही है। इस तरह जानना, अनुभव करना ही ज्ञानचक्षुसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विभागको जानना है।
‘भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर््यान्ति ते परम्’—वास्तविक विवेक अर्थात् बोध होनेपर भूत और प्रकृतिसे अर्थात् प्रकृतिके कार्यमात्रसे तथा प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर अर्थात् प्रकृतिसे अपने अलगावका ठीक अनुभव होनेपर साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं।
भगवान्ने पहले अय्यत्तकी उपासना करनेवालोंको अपनी प्राप्ति बतायी थी—‘ते प्राणुवन्ति मामेव’ (११।४), उसी बातको इस अध्यायके अठारहवें श्लोकमें ‘मद्वावायोपपद्यते’ पदसे, तेईसवें श्लोकमें ‘न स भूयोऽभिजायते’ पदोंसे और यहाँ ‘यान्ति ते परम्’ पदोंसे कहा है।
ज्ञानमार्गमें देहाभिमान ही प्रधान बाधा है। इस बाधाको दूर करनेके लिये भगवान्ने इसी अध्यायके आरम्भमें ‘इदं शरीरम्’ पदोंसे शरीर-(क्षेत्र-) से अपनी (क्षेत्रज्ञकी) पृथक्ताका अनुभव करनेके लिये कहा, और दूसरे श्लोकमें ‘क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानम्’ पदसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके ज्ञानको वास्तविक ज्ञान कहा, फिर क्षेत्र-क्षेत्रज्ञकी पृथक्ताका कई तरहसे वर्णन किया। अब उसी विषयका उपसंहार करते हुए भगवान् अन्तमें कहते हैं कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञकी पृथक्ताको ठीक-ठीक जान लेनेसे क्षेत्रके साथ सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।
क्षेत्रज्ञने ही परमात्मासे विमुख होकर परमात्मासे भिन्नता मानी है और क्षेत्रके सम्मुख होकर क्षेत्रसे एकता मानी है। इसलिये परमात्मासे एकता और क्षेत्रसे सर्वथा भिन्नता— दोनों बातोंको कहना आवश्यक हो गया। अतः भगवान्ने इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें ‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्भि’ पदोंसे क्षेत्रज्ञकी परमात्मासे एकता बतायी और यहाँ क्षेत्रकी समष्टि संसारसे एकता बता रहे हैं। दोनोंका तात्पर्य क्षेत्रज्ञ और परमात्माकी अभिन्नता बतानेमें ही है।
जैसे किसी मकानमें चारों ओर अँधेरा है। कोई कह देता है कि मकानमें प्रेत रहते हैं, तो उसमें प्रेत दीखने लग जाते हैं अर्थात् उसमें प्रेत होनेका वहम हो जाता है। परन्तु किसी साहसी पुरुषके द्वारा मकानके भीतर जाकर प्रकाश कर देनेसे अँधेरा और प्रेत—दोनों ही मिट जाते हैं। अँधेरेमें चलते समय मनुष्य धीरे-धीरे चलता है कि कहीं ठोकर न लग जाय, कहीं गड़गड़ा न आ जाय। उसको गिरनेका और साथ ही बिच्छू, साँप, चोर आदिका भय भी लगा रहता है।
९१४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १३
परन्तु प्रकाश होते ही ये सब भय मिट जाते हैं। ऐसे ही
सर्वत्र परिपूर्ण प्रकाशस्वरूप परमात्मासे विमुख
होनेपर अन्धकारस्वरूप संसारकी स्वतन्त्र सत्ता सर्वत्र
दीखने लग जाती है और तरह-तरहके भय सताने लग
जाते हैं। परन्तु वास्तविक बोध होनेपर संसारकी स्वतन्त्र
सत्ता नहीं रहती और सब भय मिट जाते हैं। एक
प्रकाशस्वरूप परमात्मा ही शेष रह जाता है। अँधेरेको
मिटानेके लिये तो प्रकाशको लाना पड़ता है, परमात्माको
कहींसे लाना नहीं पड़ता। वह तो सब देश, काल, वस्तु,
व्यक्ति, परिस्थिति आदिमें ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है।
इसलिये संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर उसका
अनुभव अपने-आप हो जाता है।
परिशिष्ट भाव-क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागका ज्ञान 'विवेक' कहलाता है। जो साधक इस विवेकको महत्त्व
देकर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागको ठीक-ठीक जान लेते हैं तथा प्रकृति और उसके कार्य (शरीर)-को स्वयंसे सर्वथा
अलग अनुभव कर लेते हैं, वे चिन्मय परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं। उनकी दृष्टिमें एक चिन्मय तत्त्वके सिवाय
कुछ नहीं रहता।
भगवान्ने 'मद्भावायोपपद्यते' (१३।१८) पदसे सगुणकी प्राप्ति बतायी है और यहाँ 'ये विदुर्यान्ति ते परम्'
पदोंने निर्गुणकी प्राप्ति बतायी है। वास्तवमें 'मद्भाव' और 'परम्' की प्राप्ति एक ही है (गीता-आठवें अध्यायका
इक्कीसवाँ और चौदहवें अध्यायका सत्ताइसवाँ श्लोक)।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्-इन भगवान्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय
श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥
इस (तेरहवें) अध्यायमें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागका
वर्णन किया गया है। क्षेत्र अलग है और क्षेत्रज्ञ अलग है-
ऐसा अनुभव हो जानेसे क्षेत्रज्ञका परमात्माके साथ योग हो
जाता है, जो कि नित्य है। इसलिये इस अध्यायका नाम
'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' रखा गया है।
तेरहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें 'अथ त्रयोदशोऽध्यायः' के
तीन, 'श्रीभगवानुवाच' के दो, श्लोकोंके चार सौ आठ
और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका
योग चार सौ छब्बीस है।
(२) इस अध्यायमें 'अथ त्रयोदशोऽध्यायः' के
आठ, 'श्रीभगवानुवाच' के सात, श्लोकोंके एक हजार
अठ्ठासी और पुष्पिकाके बावन अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण
अक्षरोंका योग एक हजार एक सौ पचपन है। इस
अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें एक उवाच है-'श्रीभगवानुवाच'।
तेरहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके चौंतीस श्लोकोंमेंसे-पहले श्लोकके
प्रथम चरणमें तथा अठारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'मगण'
प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; सत्रहवें श्लोकके तृतीय चरणमें
तथा इकतीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'रगण' प्रयुक्त होनेसे
'र-विपुला'; और तेईसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण'
प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उनतीस
श्लोक ठीक 'पथ्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीभगवान्ने तेरहवें अध्यायके अन्तमें कहा कि ज्ञानचक्षुसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको देखनेवाला परमात्माको प्राप्त हो जाता है। अब प्रश्न होता है कि वह ज्ञान क्या है और उसकी क्या महिमा है तथा उस ज्ञानकी प्राप्तिका सरल उपाय क्या है? इसका वर्णन करनेके लिये भगवान् चौदहवें अध्यायका विषय आरम्भ करते हैं।
बन्धन दोसे होता है—प्रकृतिसे और प्रकृतिके कार्य गुणोंसे। प्रकृतिके बन्धनसे छूटनेके लिये भगवान्ने तेरहवें अध्यायका विषय बता दिया। अब प्रकृतिके कार्य गुणोंके बन्धनसे छूटनेके लिये भगवान् चौदहवें अध्यायका विषय आरम्भ करते हुए पहले दो श्लोकोंमें ज्ञानकी महिमाका वर्णन करते हैं।
श्रीभगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्। यज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| ज्ञानानाम् | = सम्पूर्ण ज्ञानोंमें | प्रवक्ष्यामि | = कहूँगा, | इतः | = इस संसारसे |
|---|---|---|---|---|---|
| उत्तमम् | = उत्तम (और) | यत् | = जिसको | (मुक्त होकर) | |
| परम् | = श्रेष्ठ | ज्ञात्वा | = जानकर | पराम् | = परम |
| ज्ञानम् | = ज्ञानको (में) | सर्वे | = सब-के-सब | सिद्धिम् | = सिद्धिको |
| भूयः | = फिर | मुनयः | = मुनिलोग | गताः | = प्राप्त हो गये हैं। |
व्याख्या—‘परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्’ —तेरहवें अध्यायके अठारहवें, तेईसवें और चौतीसवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका, प्रकृति-पुरुषका जो ज्ञान (विवेक) बताया था, उसी ज्ञानको फिर बतानेके लिये भगवान् ‘भूयः प्रवक्ष्यामि’ पदोंसे प्रतिज्ञा करते हैं। लौकिक और पारलौकिक जितने भी ज्ञान हैं अर्थात् जितनी भी विद्याओं, कलाओं, भाषाओं, लिपियों आदिका ज्ञान है, उन सबसे प्रकृति-पुरुषका भेद बतानेवाला, प्रकृतिसे अतीत करनेवाला, परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला यह ज्ञान श्रेष्ठ है, सर्वोत्कृष्ट है। इसके समान दूसरा कोई ज्ञान है ही नहीं, हो सकता ही नहीं और होना सम्भव भी नहीं। कारण कि दूसरे सभी ज्ञान संसारमें फैसानेवाले हैं, बन्धनमें डालनेवाले हैं।
यद्यपि ‘उत्तम’ और ‘पर’—इन दोनों शब्दोंका एक ही अर्थ होता है, तथापि जहाँ एक अर्थके दो शब्द एक
साथ आ जाते हैं, वहाँ उनके दो अर्थ होते हैं। अतः यहाँ ‘उत्तम’ शब्दका अर्थ है कि यह ज्ञान प्रकृति और उसके कार्य संसार-शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद करानेवाला होनेसे श्रेष्ठ है; और ‘पर’ शब्दका अर्थ है कि यह ज्ञान परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला होनेसे सर्वोत्कृष्ट है।
‘यज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः’ —जिस ज्ञानको जानकर अर्थात् जिसका अनुभव करके बड़े-बड़े मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होकर परमात्माको प्राप्त हो गये हैं, उसको मैं कहूँगा। उस ज्ञानको प्राप्त करनेपर कोई मुक्त हो और कोई मुक्त न हो—ऐसा होता ही नहीं, प्रत्युत इस ज्ञानको प्राप्त करनेवाले सब-के-सब मुनिलोग मुक्त हो जाते हैं, संसारके बन्धनसे, संसारकी परवशतासे छूट जाते हैं और परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं।
तत्त्वका मनन करनेवाले जिस मनुष्यका शरीरके साथ अपनापन नहीं रहा, वह ‘मुनि’ कहलाता है।
११६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १४ ]
‘परां सिद्धिम्’ कहनेका तात्पर्य है कि सांसारिक कार्योंकी जितनी सिद्धियाँ हैं अथवा योग-साधनसे होनेवाली अणिमा, महिमा, गरिमा आदि जितनी सिद्धियाँ हैं, वे सभी वास्तवमें असिद्धियाँ ही हैं। कारण कि वे सभी जन्म-
मरण देनेवाली, बन्धनमें डालनेवाली, परमात्मप्राप्तिमें बाधा डालनेवाली हैं। परन्तु परमात्मप्राप्तिरूप जो सिद्धि है, वह सर्वोत्कृष्ट है; क्योंकि उसको प्राप्त होनेपर मनुष्य जन्म-मरणसे छूट जाता है।
परिशिष्ट भाव —(यह चौदहवाँ अध्याय तेरहवें अध्यायका ही परिशिष्ट है।) श्रेष्ठ-क्षेत्रज्ञके विभागका ज्ञान सम्पूर्ण लौकिक-पारलौकिक ज्ञानोंसे उत्तम तथा सर्वोत्कृष्ट है। यह ज्ञान परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका रामबाण उपाय है, इसलिये इस ज्ञानको प्राप्त करनेवाले सब-के-सब साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाते अर्थात् मुक्त हो जाते हैं।
‘ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्’ पदोंका तात्पर्य है—सात्विक, राजस और तामस ज्ञानसे तथा लौकिक-पारलौकिक ज्ञानसे भी उत्तम, आखिरी ज्ञान। इस ज्ञानके सिवाय दूसरा कोई ज्ञान परमसिद्धि प्राप्त नहीं करा सकता। एक परमात्मतत्त्वके सिवाय कुछ भी नहीं है—ऐसा अनुभव हो जाना ही परमसिद्धिकी प्राप्ति है। तात्पर्य है कि परमसिद्धि प्राप्त होनेपर क्रिया तथा पदार्थका अत्यन्त अभाव हो जाता है और एक चिन्मय सत्ताके सिवाय कोई जड़ वस्तु रहती ही नहीं, जो कि वास्तवमें है।
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।
सर्गैऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥
इदम् = इस ज्ञानम् = ज्ञानका उपाश्रित्य = आश्रय लेकर मम = (जो मनुष्य) मेरी
साधर्म्यम् = सधर्माका आगताः = प्राप्त हो गये हैं, सर्गैः = (वे) महासर्गमें अपि = भी
न, उपजायन्ते = पैदा नहीं होते च = और प्रलये = महाप्रलयमें भी न, व्यथन्ति = व्यथित नहीं होते।
व्याख्या —‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य’—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने उत्तम और पर—इन दो विशेषणोंसे जिस ज्ञानकी महिमा कही थी, उस ज्ञानका अनुभव करना ही उसका आश्रय लेना है। उस ज्ञानका अनुभव होनेसे मनुष्यके सम्पूर्ण संशय मिट जाते हैं और वह ज्ञानस्वरूप हो जाता है।
‘मम साधर्म्यमागताः’ —उस ज्ञानका आश्रय लेकर मनुष्य मेरी सधर्माका प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् जैसे मेरेमें कर्तृत्व-भोक्तृत्व नहीं है, ऐसे ही उनमें भी कर्तृत्व-भोक्तृत्व नहीं रहता। जैसे मैं सदा ही निलिप्त-निर्विकार रहता हूँ, ऐसे ही उनको भी अपनी निलिप्तता-निर्विकारताका अनुभव हो जाता है।
ज्ञानी महापुरुष भगवान्के समान निलिप्त-निर्विकार तो हो जाते हैं, पर वे भगवान्के समान संसारकी उत्पत्ति, पालन और संहारका कार्य नहीं कर सकते। हाँ, योगाभ्यासके बलसे किसी योगीमें कुछ सामर्थ्य आ जाती है, पर वह सामर्थ्य भी भगवान्की सामर्थ्यके समान नहीं होती। कारण कि वह ‘युंजान योगी’ है अर्थात् उसने अभ्यास करके कुछ सामर्थ्य प्राप्त की है। परन्तु भगवान् ‘मुक्त योगी’ हैं अर्थात् भगवान्में सामर्थ्य सदासे स्वतःसिद्ध है। भगवान् सब कुछ करनेमें समर्थ हैं—‘कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं समर्थः।’
योगीकी सामर्थ्य तो सीमित होती है, पर भगवान्की सामर्थ्य असीम होती है।
‘सर्गैऽपि नोपजायन्ते’ —यहाँ ‘अपि’ पदसे यह मालूम होता है कि वे ज्ञानी महापुरुष महासर्गके आरम्भमें भी उत्पन्न नहीं होते। महासर्गके आदिमें चौदह लोकोंकी तथा उन लोकोंके अधिकारियोंकी उत्पत्ति होती है, पर वे महापुरुष उत्पन्न नहीं होते अर्थात् उनको फिर कर्मपरवश होकर शरीर धारण नहीं करना पड़ता।
‘प्रलये न व्यथन्ति च’ —महाप्रलयमें संवर्तक अगिन्से चर-अचर सभी प्राणी भस्म हो जाते हैं। समुद्रके बढ़ जानेसे पृथ्वी डूब जाती है। चौदह लोकोंमें हलचल, हाहाकार मच जाता है। सभी प्राणी दुःखी होते हैं, नष्ट होते हैं। परन्तु महाप्रलयमें उन ज्ञानी महापुरुषोंको कोई दुःख नहीं होता, उनमें कोई हलचल नहीं होती, विकार नहीं होता। वे महापुरुष जिस तत्त्वको प्राप्त हो गये हैं, उस तत्त्वमें हलचल, विकार है ही नहीं, तो फिर वे महापुरुष व्यथित कैसे हो सकते हैं? नहीं हो सकते।
महासर्गमें भी उत्पन्न न होने और महाप्रलयमें भी व्यथित न होनेका तात्पर्य यह है कि ज्ञानी महापुरुषका
श्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
११७
प्रकृति और प्रकृतिजन्य गुणोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। इसलिये प्रकृतिका सम्बन्ध रहनेसे जो जन्म-मरण
होता है, दुःख होता है, हलचल होती है, प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित महापुरुषमें वह जन्म-मरण, दुःख आदि नहीं होते।
परिशिष्ट भाव —कारणशरीरके सम्बन्धसे 'निर्विकल्प स्थिति' होती है और कारणशरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर (स्वयंमें) 'निर्विकल्प बोध' होता है। निर्विकल्प स्थिति तो सविकल्पमें बदल जाती है, पर निर्विकल्प बोध सविकल्पमें नहीं बदलता। तात्पर्य है कि निर्विकल्प स्थितिमें परिवर्तन होता है, पर निर्विकल्प बोधमें कभी परिवर्तन नहीं होता, वह सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। इस बातको यहाँ 'सर्गोऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च' पदोंसे कहा गया है।
महासर्ग और महाप्रलय प्रकृतिमें होते हैं। प्रकृतिसे अतीत तत्त्व (परमात्मा)-की प्राप्ति होनेपर महासर्ग और महाप्रलयका कोई असर नहीं पड़ता; क्योंकि प्रकृतिसे सम्बन्ध ही नहीं रहता। प्रकृतिसे सम्बन्ध न रहनेको 'आत्यन्तिक प्रलय' भी कहा गया है। तात्पर्य है कि प्रकृतिके कार्य शरीरको पकड़नेसे मनुष्य परतन्त्र हो जाता है*, जन्म-मरणमें पड़ जाता है; परन्तु प्रकृतिके कार्यसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेपर वह स्वतन्त्र हो जाता है, निरपेक्ष जीवन हो जाता है, जन्म-मरणसे सदाके लिये छूट जाता है।
'मम साधर्म्यमागताः' पदोंका तात्पर्य है कि जैसे परमात्मा सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हैं, ऐसे ही उनको प्राप्त होनेवाले ज्ञानी महापुरुष भी सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हो जाते हैं।
सम्बन्ध —जो भगवान्की सधर्मताको प्राप्त हो जाते हैं, वे तो महासर्गमें भी पैदा नहीं होते; परन्तु जो प्राणी महासर्गमें पैदा होते हैं, उनके उत्पन्न होनेकी क्या प्रक्रिया है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्नार्भ दधाम्यहम्।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३ ॥
भारत | = हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! | योनिः | = उत्पत्ति-स्थान है (और) | दधाभि | = स्थापन करता हूँ। ---|---|---|---|---|--- मम | = मेरी | अहम् | = मैं | ततः | = उससे महत, ब्रह्म | = मूल प्रकृति | तस्मिन् | = उसमें | सर्वभूतानाम् | = सम्पूर्ण प्राणियोंकी तो | | गर्भम् | = जीवरूप गर्भका | सम्भवः | = उत्पत्ति | | | | भवति | = होती है।
व्याख्या —'मम योनिर्महद्ब्रह्म'—यहाँ मूल प्रकृतिको 'महद्ब्रह्म' नामसे कहा गया है, इसके कई कारण हो सकते हैं; जैसे—
(१) परमात्मा छोटे-पन और बड़े-पनसे रहित हैं; अतः वे सूक्ष्म-से-सूक्ष्म भी हैं और महान्-से-महान् भी हैं—'अणोरणीयान्महतो महीयान्' (श्वेताश्वतरोपनिषद् ३।२०)। परन्तु संसारकी दृष्टिसे सबसे बड़ी चीज मूल प्रकृति ही है अर्थात् संसारमें सबसे बड़ा व्यापक तत्त्व मूल प्रकृति ही है। परमात्माके सिवाय संसारमें इससे बड़कर कोई व्यापक तत्त्व नहीं है। इसलिये इस मूल प्रकृतिको यहाँ 'महद्ब्रह्म' कहा गया है।
(२) 'महत' (महतत्त्व अर्थात् समष्टि बुद्धि) और 'ब्रह्म'-(परमात्मा- के बीचमें होनेसे मूल प्रकृतिको 'महद्ब्रह्म' कहा गया है।
(३) पीछेके (दूसरे) श्लोकमें 'सर्गोऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च' पदोंमें आये 'सर्ग' और 'प्रलय' शब्दोंका अर्थ क्रमशः ब्रह्माका दिन और ब्रह्माकी रात माना जा सकता है। अतः उनका अर्थ महासर्ग (ब्रह्माका प्रकट होना) और महाप्रलय (ब्रह्माका लीन होना) सिद्ध करनेके लिये यहाँ 'महद्ब्रह्म' शब्द दिया है। तात्पर्य है कि जीवन्मुक्त महापुरुषोंका इस मूल प्रकृतिसे ही सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, इसलिये वे महासर्गमें भी पैदा
- 'कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः' (३।५)
'अवशं प्रकृतेर्वशात्' (१।८)
'रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहगामे' (८।१९)
१२८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १४ ]
नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते।
सबका उत्पत्ति-स्थान होनेसे इस मूल प्रकृतिको ‘योनि ’ कहा गया है। इसी मूल प्रकृतिसे अनन्त ब्रह्माण्ड पैदा होते हैं और इसीमें लीन होते हैं। इस मूल प्रकृतिसे ही सांसारिक अनन्त शक्तियाँ पैदा होती हैं।
इस मूल प्रकृतिके लिये ‘मम ’ पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि यह प्रकृति मेरी है। अतः इसपर आधिपत्य भी मेरा ही है। मेरी इच्छाके बिना यह प्रकृति अपनी तरफसे कुछ भी नहीं कर सकती। यह जो कुछ भी करती है, वह सब मेरी अध्यक्षातमें ही करती है (गीता—नवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)।
मैं मूल प्रकृति—(महद्वब्रह्म—) से भी श्रेष्ठ साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हूँ—इसको बतानेके लिये भगवान्ने ‘मम महद्वब्रह्म ’ पदोंका प्रयोग किया है।
महद्व ब्रह्मसे भी श्रेष्ठ परब्रह्म परमात्माका अंश होते हुए भी जीव परमात्मासे विमुख होकर प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है। इतना ही नहीं, वह प्रकृतिके कार्य तीनों गुणोंसे सम्बन्ध जोड़ लेता है और उससे भी नीचे गिरकर गुणोंके भी कार्य शरीर आदिसे सम्बन्ध जोड़ लेता है और बँध जाता है। अतः भगवान् ‘मम महद्वब्रह्म ’ पदोंसे कहते हैं कि जीवका सम्बन्ध वास्तवमें मूल प्रकृतिसे भी श्रेष्ठ मुझ परमात्माके साथ है—‘मम एव अंशः ’ (गीता १५।७), इसलिये प्रकृतिके साथ सम्बन्ध मानकर उसको
परिशिष्ट भाव —भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि जन्म-मरणमें पड़ा हुआ होनेपर भी जीव मेरा ही अंश है। उसकी सधर्मता, एकता मेरे साथ है, शरीरके साथ नहीं।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें समष्टि संसारकी उत्पत्तिकी बात बतायी, अब आगेके श्लोकमें व्यक्ति शरीरोंकी उत्पत्तिका वर्णन करते हैं।
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥
| कौन्तेय | = हे कुन्तीनन्दन! | सम्भवन्ति | = पैदा होते हैं, | अहम् | = मैं |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वयोनिषु | = सम्पूर्ण योनियोंमें | तासाम् | = उन सबकी | बीजप्रदः | = बीज-स्थापन करनेवाला |
| याः | = (प्राणियोंके) जितने | महत, ब्रह्म | = मूल प्रकृति तो | पिता | = पिता हूँ। |
| मूर्तयः | = शरीर | योनिः | = माता है (और) |
व्याख्या —‘सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ’—जरायुज (जेरेके साथ पैदा होनेवाले मनुष्य, पशु आदि), अण्डज (अण्डेसे उत्पन्न होनेवाले पक्षी, सर्प आदि),
अपना पतन नहीं करना चाहिये।
‘तस्मिन्नार्थं दधाम्यहम्’ —यहाँ ‘गर्भम् ’ पद कर्म-संस्कारोंसहित जीव-समुदायका वाचक है। भगवान् कोई नया गर्भ स्थापन नहीं करते। अनादिकालसे जो जीव जन्म-मरणके प्रवाहमें पड़े हुए हैं, वे महाप्रलयके समय अपने-अपने कर्म-संस्कारोंसहित प्रकृतिमें लीन हो जाते हैं (गीता—नवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। प्रकृतिमें लीन हुए जीवोंके कर्म जब परिपक्व होकर फल देनेके लिये उन्मुख हो जाते हैं, तब महासर्गके आदिमें भगवान् उन जीवोंका प्रकृतिके साथ पुनः विशेष सम्बन्ध (जो कि कारणशरीररूपसे पहलेसे ही था) स्थापित करा देते हैं—यही भगवान्के द्वारा जीव-समुदायरूप गर्भको प्रकृतिरूप योनिमें स्थापन करना है।
‘सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत’ —भगवान्के द्वारा प्रकृतिमें गर्भ-स्थापन करनेके बाद सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है अर्थात् वे प्राणी सूक्ष्म और स्थूल शरीर धारण करके पुनर्जन्म प्राप्त करते हैं। महासर्गके आदिमें प्राणियोंका यह उत्पन्न होना ही भगवान्का विसर्ग (त्याग) है, आदिकर्म है (गीता—आठवें अध्यायका तीसरा श्लोक)।
[जीव जबतक मुक्त नहीं होता, तबतक प्रकृतिके अंश कारण-शरीरसे उसका सम्बन्ध बना रहता है और वह महाप्रलयमें कारणशरीरसहित ही प्रकृतिमें लीन होता है।]
स्वेदज (पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले जूँ, लीख आदि) और उद्भिज्ज (पृथ्वीको फोड़कर उत्पन्न होनेवाले वृक्ष, लता आदि)—सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्तिके ये चार खानि अर्थात्
स्थान हैं। इन चारोंमेंसे एक-एक स्थानसे लाखों योनियाँ
पैदा होती हैं। उन लाखों योनियोंमेंसे एक-एक योनिमें भी
जो प्राणी पैदा होते हैं, उन सबकी आकृति अलग-अलग
होती है। एक योनिमें, एक जातिमें पैदा होनेवाले प्राणियोंकी
आकृतिमें भी स्थूल या सूक्ष्म भेद रहता है अर्थात् एक समान
आकृति किसीकी भी नहीं मिलती। जैसे, एक मनुष्योनिमें
अरबों वर्षोंसे अरबों शरीर पैदा होते चले आये हैं, पर
आजतक किसी भी मनुष्यकी आकृति परस्पर नहीं
मिलती। इस विषयमें किसी कविने कहा है-
पाग भाग वाणी प्रकृति, आकृति वचन विवेक।
अक्षर मिलत न एक-से, देखे देश अनेक॥
अर्थात् पगड़ी, भाग्य, वाणी (कण्ठ), स्वभाव,
आकृति, शब्द, विचार-शक्ति और लिखनेके अक्षर-ये
सभी दो मनुष्योंके भी एक समान नहीं मिलते। इस तरह
चौरासी लाख योनियोंमें जितने शरीर अनादिकालसे पैदा
होते चले आ रहे हैं, उन सबकी आकृति अलग-अलग
है। चौरासी लाख योनियोंके सिवाय देवता, पितर, गन्धर्व,
भूत, प्रेत आदिको भी यहाँ 'सर्वयोनिषु' पदके अन्तर्गत
ले लेना चाहिये।
'तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता'-उपर्युक्त
चार खानि अर्थात् चौरासी लाख योनियाँ तो शरीरोंके पैदा
होनेके स्थान हैं और उन सब योनियोंका उत्पत्ति-स्थान
(माताके स्थानमें) 'महद्ब्रह्म' अर्थात् मूल प्रकृति है। उस मूल
प्रकृतिमें जीवरूप बीजका स्थापन करनेवाला पिता मैं हूँ।
भिन्न-भिन्न वर्ण और आकृतिवाले नाना प्रकारके
शरीरोंमें भगवान् अपने चेतन-अंशरूप बीजको स्थापित
करते हैं-इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक प्राणीमें स्थित
परमात्माका अंश शरीरोंकी भिन्नतासे ही भिन्न-भिन्न प्रतीत
होता है। वास्तवमें सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक ही परमात्मा
विद्यमान हैं (गीता-तेरहवें अध्यायका दूसरा श्लोक)। इस
बातको एक दृष्टान्तसे समझाया जाता है। यद्यपि दृष्टान्त
सर्वांशमें नहीं घटता, तथापि वह बुद्धिको दाष्ट्रान्तिकके
नजदीक ले जानेमें सहायक होता है। कपड़ा और पृथ्वी-
दोनोंमें एक ही तत्त्वकी प्रधानता है। कपड़ेको अगर जलमें
डाला जाय तो वह जलके निचले भागमें जाकर बैठ जाता
है। कपड़ा ताना (लम्बा धागा) और बाना-(आड़ा
धागा-) से बुना जाता है। प्रत्येक ताने और बानेके बीचमें
एक सूक्ष्म छिद्र रहता है। कपड़ेमें ऐसे अनेक छिद्र होते
हैं। जलमें पड़े रहनेसे कपड़ेके सम्पूर्ण तन्तुओंमें और
अलग-अलग छिद्रोंमें जल भर जाता है। कपड़ेको जलसे
बाहर निकालनेपर भी उसके तन्तुओंमें और असंख्य
छिद्रोंमें एक ही जल समानरीतिसे परिपूर्ण रहता है। इस
दृष्टान्तमें कपड़ा 'प्रकृति' है, अलग-अलग असंख्य छिद्र
'शरीर' हैं और कपड़े तथा उसके छिद्रोंमें परिपूर्ण जल
'परमात्मतत्त्व' है। तात्पर्य है कि स्थूल दृष्टिसे तो प्रत्येक
शरीरमें परमात्मतत्त्व अलग-अलग दिखायी देता है, पर
सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय तो सम्पूर्ण शरीरोंमें, सम्पूर्ण संसारमें
एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है।
परिशिष्ट भाव-चौरासी लाख योनियाँ, देवता, पितर, गन्धर्व, भूत-प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस, बालग्रह, स्थावर-
जंगम, जलचर-थलचर-नभचर, जरायुज-अण्डज-उद्भिज्ज-स्वेदज आदि सभी 'सर्वयोनिषु' पदके अन्तर्गत लेने
चाहिये। इसी बातको सातवें अध्यायके छठे श्लोकमें 'एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय' पदोंसे और तेरहवें
अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें 'यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजंगमम्' पदोंसे कहा गया है।
यहाँ 'मूर्ति' शब्दका अर्थ है-शरीर। इसके अन्तर्गत मूर्त-अमूर्त, व्यक्त-अव्यक्त दोनों शरीर लेने चाहिये। पृथ्वी,
जल और अग्नि मूर्त हैं। वायु और आकाश अमूर्त हैं। वायुप्रधान शरीर होनेसे भूत-प्रेत-पिशाच भी अमूर्त हैं।
भगवान्ने पहले-दूसरे श्लोकोंमें बताया कि प्रकृतिका सम्बन्ध न रहे तो जन्म-मरण नहीं होता और तीसरे-
चौथे श्लोकोंमें बताया कि प्रकृतिका सम्बन्ध रहनेसे जन्म-मरण होता है। इसी (तीसरे-चौथे श्लोकोंकी) बातको
आगे पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतक विस्तारसे कहा है।
सम्बन्ध-परमात्मा और उनकी शक्ति प्रकृतिके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले जीव प्रकृतिजन्य गुणोंसे कैसे बँधते हैं-
इस विषयका विवेचन आगेके श्लोकसे आरम्भ करते हैं।
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५॥
१२०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १४ ]
| महाबाहो | = हे महाबाहो! | रजः | = रज (और) | अव्ययम् | = अविनाशी |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रकृतिसम्भवाः | = प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले | तमः | = तम | देहिनम् | = देही (जीवात्मा)-को |
| सत्त्वम् | = सत्त्व, | इति | = —ये (तीनों) | देहे | = देहमें |
| गुणाः | = गुण | निबध्नन्ति | = बाँध देते हैं। |
व्याख्या—‘सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृति-सम्भवाः’ —तीसरे और चौथे श्लोकमें जिस मूल प्रकृतिको ‘महद् ब्रह्म’ नामसे कहा है, उसी मूल प्रकृतिसे सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण पैदा होते हैं।
यहाँ ‘इति’ पदका तात्पर्य है कि इन तीनों गुणोंसे अनन्त सृष्टियाँ पैदा होती हैं तथा तीनों गुणोंके तारतम्यसे प्राणियोंके अनेक भेद हो जाते हैं, पर गुण न दो होते हैं, न चार होते हैं, प्रत्युत तीन ही होते हैं।
‘निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्’ —ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो ये तीनों गुण अपनी तरफसे किसीको भी नहीं बाँधते, प्रत्युत यह पुरुष ही इन गुणोंके साथ सम्बन्ध जोड़कर बाँध जाता है। तात्पर्य है कि गुणोंके कार्य पदार्थ, धन, परिवार, शरीर, स्वभाव, वृत्तियाँ, परिस्थितियाँ, क्रियाएँ आदिको अपना मान लेनेसे यह जीव स्वयं अविनाशी होता हुआ भी बाँध जाता है, विनाशी पदार्थ, धन आदिके वशमें हो जाता है; सर्वथा स्वतन्त्र होता हुआ भी पराधीन हो जाता है। जैसे, मनुष्य जिस धनको अपना मानता है, उस धनके घटने-बढ़नेसे स्वयंपर असर पड़ता है; जिन व्यक्तियोंको अपना मानता है, उनके जन्मने-मरनेसे स्वयंपर असर पड़ता है; जिस शरीरको अपना मानता है, उसके घटने-बढ़नेसे स्वयंपर असर पड़ता है। यही गुणोंका अविनाशी देहीको बाँधना है।
यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि यह देही स्वयं अविनाशीरूपसे ज्यों-का-त्यों रहता हुआ भी गुणोंके, गुणोंकी वृत्तियोंके अधीन होकर स्वयं सात्त्विक, राजस और तामस बन जाता है। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—
ईश्वर अंस जीव अविनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी ॥ (मानस ७।११७।१)
जीवका यह अविनाशी स्वरूप वास्तवमें कभी भी गुणोंसे नहीं बाँधता; परन्तु जब वह विनाशी देहको ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरे लिये’ मान लेता है, तब वह अपनी मान्यताके कारण गुणोंसे बाँध जाता है और उसको
परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें कठिनता प्रतीत होती है (गीता—बारहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। देहाभिमानके कारण गुणोंके द्वारा देहमें बाँध जानेसे वह तीनों गुणोंसे परे अपने अविनाशी स्वरूपको नहीं जान सकता। गुणोंसे देहमें बाँध जानेपर भी जीवका जो वास्तविक अविनाशी स्वरूप है, वह ज्यों-का-त्यों ही रहता है, जिसका लक्ष्य भगवान्ने यहाँ ‘अव्ययम्’ पदसे कराया है।
यहाँ ‘देहिनम्’ पदका तात्पर्य है कि देहमें तादात्म्य, ममता और कामना होनेसे ही तीनों गुण इस पुरुषको देहमें बाँधते हैं। यदि देहमें तादात्म्य, ममता और कामना न हो, तो फिर यह परमात्मस्वरूप ही है।
विशेष बात
शरीरके साथ जीव दो तरहसे अपना सम्बन्ध जोड़ता है—(१) अभेदभावसे —अपनेको शरीरमें बैठाना, जिससे ‘मैं शरीर हूँ’ ऐसा दीखने लगता है, और (२) भेदभावसे —शरीरको अपनेमें बैठाना, जिससे ‘शरीर मेरा है’ ऐसा दीखने लगता है। अभेदभावसे सम्बन्ध जोड़नेसे जीव अपनेको शरीर मान लेता है, जिसको ‘अहंता’ कहते हैं; और भेदभावसे सम्बन्ध जोड़नेसे जीव शरीरको अपना मान लेता है, जिसको ‘ममता’ कहते हैं। इस प्रकार शरीरसे अपना सम्बन्ध जोड़नेपर सत्त्व, रज और तम—तीनों गुण अपनी वृत्तियोंके द्वारा शरीरमें अहंता-ममता दृढ़ करके जीवको बाँध देते हैं।
जैसे विवाह हो जानेपर पत्नीके पूरे परिवार-(ससुराल-) के साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है, पत्नीके वस्त्राभूषण आदिकी आवश्यकता अपनी आवश्यकता प्रतीत होने लगती है, ऐसे ही शरीरके साथ मैं-मेरेका सम्बन्ध हो जानेपर जीवका पूरे संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है और शरीर-निर्वाहकी वस्तुओंको वह अपनी आवश्यकता मानने लग जाता है। अनित्य शरीरसे सम्बन्ध (एकात्मता) माननेके कारण वह अनित्य शरीरको नित्य रखनेकी इच्छा करने लगता है; क्योंकि वह स्वयं नित्य है। शरीरके साथ सम्बन्ध माननेके कारण ही उसको मरनेका भय लगने लगता है; क्योंकि शरीर मरनेवाला है। यदि शरीरसे सम्बन्ध न रहे, तो