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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते।

सबका उत्पत्ति-स्थान होनेसे इस मूल प्रकृतिको ‘योनि ’ कहा गया है। इसी मूल प्रकृतिसे अनन्त ब्रह्माण्ड पैदा होते हैं और इसीमें लीन होते हैं। इस मूल प्रकृतिसे ही सांसारिक अनन्त शक्तियाँ पैदा होती हैं।

इस मूल प्रकृतिके लिये ‘मम ’ पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि यह प्रकृति मेरी है। अतः इसपर आधिपत्य भी मेरा ही है। मेरी इच्छाके बिना यह प्रकृति अपनी तरफसे कुछ भी नहीं कर सकती। यह जो कुछ भी करती है, वह सब मेरी अध्यक्षातमें ही करती है (गीता—नवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)।

मैं मूल प्रकृति—(महद्वब्रह्म—) से भी श्रेष्ठ साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हूँ—इसको बतानेके लिये भगवान्ने ‘मम महद्वब्रह्म ’ पदोंका प्रयोग किया है।

महद्व ब्रह्मसे भी श्रेष्ठ परब्रह्म परमात्माका अंश होते हुए भी जीव परमात्मासे विमुख होकर प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है। इतना ही नहीं, वह प्रकृतिके कार्य तीनों गुणोंसे सम्बन्ध जोड़ लेता है और उससे भी नीचे गिरकर गुणोंके भी कार्य शरीर आदिसे सम्बन्ध जोड़ लेता है और बँध जाता है। अतः भगवान् ‘मम महद्वब्रह्म ’ पदोंसे कहते हैं कि जीवका सम्बन्ध वास्तवमें मूल प्रकृतिसे भी श्रेष्ठ मुझ परमात्माके साथ है—‘मम एव अंशः ’ (गीता १५।७), इसलिये प्रकृतिके साथ सम्बन्ध मानकर उसको

परिशिष्ट भाव —भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि जन्म-मरणमें पड़ा हुआ होनेपर भी जीव मेरा ही अंश है। उसकी सधर्मता, एकता मेरे साथ है, शरीरके साथ नहीं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें समष्टि संसारकी उत्पत्तिकी बात बतायी, अब आगेके श्लोकमें व्यक्ति शरीरोंकी उत्पत्तिका वर्णन करते हैं।

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।

तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन!सम्भवन्ति= पैदा होते हैं,अहम्= मैं
सर्वयोनिषु= सम्पूर्ण योनियोंमेंतासाम्= उन सबकीबीजप्रदः= बीज-स्थापन करनेवाला
याः= (प्राणियोंके) जितनेमहत, ब्रह्म= मूल प्रकृति तोपिता= पिता हूँ।
मूर्तयः= शरीरयोनिः= माता है (और)

व्याख्या —‘सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ’—जरायुज (जेरेके साथ पैदा होनेवाले मनुष्य, पशु आदि), अण्डज (अण्डेसे उत्पन्न होनेवाले पक्षी, सर्प आदि),

अपना पतन नहीं करना चाहिये।

‘तस्मिन्नार्थं दधाम्यहम्’ —यहाँ ‘गर्भम् ’ पद कर्म-संस्कारोंसहित जीव-समुदायका वाचक है। भगवान् कोई नया गर्भ स्थापन नहीं करते। अनादिकालसे जो जीव जन्म-मरणके प्रवाहमें पड़े हुए हैं, वे महाप्रलयके समय अपने-अपने कर्म-संस्कारोंसहित प्रकृतिमें लीन हो जाते हैं (गीता—नवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। प्रकृतिमें लीन हुए जीवोंके कर्म जब परिपक्व होकर फल देनेके लिये उन्मुख हो जाते हैं, तब महासर्गके आदिमें भगवान् उन जीवोंका प्रकृतिके साथ पुनः विशेष सम्बन्ध (जो कि कारणशरीररूपसे पहलेसे ही था) स्थापित करा देते हैं—यही भगवान्के द्वारा जीव-समुदायरूप गर्भको प्रकृतिरूप योनिमें स्थापन करना है।

‘सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत’ —भगवान्के द्वारा प्रकृतिमें गर्भ-स्थापन करनेके बाद सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है अर्थात् वे प्राणी सूक्ष्म और स्थूल शरीर धारण करके पुनर्जन्म प्राप्त करते हैं। महासर्गके आदिमें प्राणियोंका यह उत्पन्न होना ही भगवान्का विसर्ग (त्याग) है, आदिकर्म है (गीता—आठवें अध्यायका तीसरा श्लोक)।

[जीव जबतक मुक्त नहीं होता, तबतक प्रकृतिके अंश कारण-शरीरसे उसका सम्बन्ध बना रहता है और वह महाप्रलयमें कारणशरीरसहित ही प्रकृतिमें लीन होता है।]

स्वेदज (पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले जूँ, लीख आदि) और उद्भिज्ज (पृथ्वीको फोड़कर उत्पन्न होनेवाले वृक्ष, लता आदि)—सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्तिके ये चार खानि अर्थात्