श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 920, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्थान हैं। इन चारोंमेंसे एक-एक स्थानसे लाखों योनियाँ
पैदा होती हैं। उन लाखों योनियोंमेंसे एक-एक योनिमें भी
जो प्राणी पैदा होते हैं, उन सबकी आकृति अलग-अलग
होती है। एक योनिमें, एक जातिमें पैदा होनेवाले प्राणियोंकी
आकृतिमें भी स्थूल या सूक्ष्म भेद रहता है अर्थात् एक समान
आकृति किसीकी भी नहीं मिलती। जैसे, एक मनुष्योनिमें
अरबों वर्षोंसे अरबों शरीर पैदा होते चले आये हैं, पर
आजतक किसी भी मनुष्यकी आकृति परस्पर नहीं
मिलती। इस विषयमें किसी कविने कहा है-
पाग भाग वाणी प्रकृति, आकृति वचन विवेक।
अक्षर मिलत न एक-से, देखे देश अनेक॥
अर्थात् पगड़ी, भाग्य, वाणी (कण्ठ), स्वभाव,
आकृति, शब्द, विचार-शक्ति और लिखनेके अक्षर-ये
सभी दो मनुष्योंके भी एक समान नहीं मिलते। इस तरह
चौरासी लाख योनियोंमें जितने शरीर अनादिकालसे पैदा
होते चले आ रहे हैं, उन सबकी आकृति अलग-अलग
है। चौरासी लाख योनियोंके सिवाय देवता, पितर, गन्धर्व,
भूत, प्रेत आदिको भी यहाँ 'सर्वयोनिषु' पदके अन्तर्गत
ले लेना चाहिये।
'तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता'-उपर्युक्त
चार खानि अर्थात् चौरासी लाख योनियाँ तो शरीरोंके पैदा
होनेके स्थान हैं और उन सब योनियोंका उत्पत्ति-स्थान
(माताके स्थानमें) 'महद्ब्रह्म' अर्थात् मूल प्रकृति है। उस मूल
प्रकृतिमें जीवरूप बीजका स्थापन करनेवाला पिता मैं हूँ।
भिन्न-भिन्न वर्ण और आकृतिवाले नाना प्रकारके
शरीरोंमें भगवान् अपने चेतन-अंशरूप बीजको स्थापित
करते हैं-इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक प्राणीमें स्थित
परमात्माका अंश शरीरोंकी भिन्नतासे ही भिन्न-भिन्न प्रतीत
होता है। वास्तवमें सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक ही परमात्मा
विद्यमान हैं (गीता-तेरहवें अध्यायका दूसरा श्लोक)। इस
बातको एक दृष्टान्तसे समझाया जाता है। यद्यपि दृष्टान्त
सर्वांशमें नहीं घटता, तथापि वह बुद्धिको दाष्ट्रान्तिकके
नजदीक ले जानेमें सहायक होता है। कपड़ा और पृथ्वी-
दोनोंमें एक ही तत्त्वकी प्रधानता है। कपड़ेको अगर जलमें
डाला जाय तो वह जलके निचले भागमें जाकर बैठ जाता
है। कपड़ा ताना (लम्बा धागा) और बाना-(आड़ा
धागा-) से बुना जाता है। प्रत्येक ताने और बानेके बीचमें
एक सूक्ष्म छिद्र रहता है। कपड़ेमें ऐसे अनेक छिद्र होते
हैं। जलमें पड़े रहनेसे कपड़ेके सम्पूर्ण तन्तुओंमें और
अलग-अलग छिद्रोंमें जल भर जाता है। कपड़ेको जलसे
बाहर निकालनेपर भी उसके तन्तुओंमें और असंख्य
छिद्रोंमें एक ही जल समानरीतिसे परिपूर्ण रहता है। इस
दृष्टान्तमें कपड़ा 'प्रकृति' है, अलग-अलग असंख्य छिद्र
'शरीर' हैं और कपड़े तथा उसके छिद्रोंमें परिपूर्ण जल
'परमात्मतत्त्व' है। तात्पर्य है कि स्थूल दृष्टिसे तो प्रत्येक
शरीरमें परमात्मतत्त्व अलग-अलग दिखायी देता है, पर
सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय तो सम्पूर्ण शरीरोंमें, सम्पूर्ण संसारमें
एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है।
परिशिष्ट भाव-चौरासी लाख योनियाँ, देवता, पितर, गन्धर्व, भूत-प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस, बालग्रह, स्थावर-
जंगम, जलचर-थलचर-नभचर, जरायुज-अण्डज-उद्भिज्ज-स्वेदज आदि सभी 'सर्वयोनिषु' पदके अन्तर्गत लेने
चाहिये। इसी बातको सातवें अध्यायके छठे श्लोकमें 'एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय' पदोंसे और तेरहवें
अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें 'यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजंगमम्' पदोंसे कहा गया है।
यहाँ 'मूर्ति' शब्दका अर्थ है-शरीर। इसके अन्तर्गत मूर्त-अमूर्त, व्यक्त-अव्यक्त दोनों शरीर लेने चाहिये। पृथ्वी,
जल और अग्नि मूर्त हैं। वायु और आकाश अमूर्त हैं। वायुप्रधान शरीर होनेसे भूत-प्रेत-पिशाच भी अमूर्त हैं।
भगवान्ने पहले-दूसरे श्लोकोंमें बताया कि प्रकृतिका सम्बन्ध न रहे तो जन्म-मरण नहीं होता और तीसरे-
चौथे श्लोकोंमें बताया कि प्रकृतिका सम्बन्ध रहनेसे जन्म-मरण होता है। इसी (तीसरे-चौथे श्लोकोंकी) बातको
आगे पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतक विस्तारसे कहा है।
सम्बन्ध-परमात्मा और उनकी शक्ति प्रकृतिके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले जीव प्रकृतिजन्य गुणोंसे कैसे बँधते हैं-
इस विषयका विवेचन आगेके श्लोकसे आरम्भ करते हैं।
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५॥