श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 921, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १४ ]
| महाबाहो | = हे महाबाहो! | रजः | = रज (और) | अव्ययम् | = अविनाशी |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रकृतिसम्भवाः | = प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले | तमः | = तम | देहिनम् | = देही (जीवात्मा)-को |
| सत्त्वम् | = सत्त्व, | इति | = —ये (तीनों) | देहे | = देहमें |
| गुणाः | = गुण | निबध्नन्ति | = बाँध देते हैं। |
व्याख्या—‘सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृति-सम्भवाः’ —तीसरे और चौथे श्लोकमें जिस मूल प्रकृतिको ‘महद् ब्रह्म’ नामसे कहा है, उसी मूल प्रकृतिसे सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण पैदा होते हैं।
यहाँ ‘इति’ पदका तात्पर्य है कि इन तीनों गुणोंसे अनन्त सृष्टियाँ पैदा होती हैं तथा तीनों गुणोंके तारतम्यसे प्राणियोंके अनेक भेद हो जाते हैं, पर गुण न दो होते हैं, न चार होते हैं, प्रत्युत तीन ही होते हैं।
‘निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्’ —ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो ये तीनों गुण अपनी तरफसे किसीको भी नहीं बाँधते, प्रत्युत यह पुरुष ही इन गुणोंके साथ सम्बन्ध जोड़कर बाँध जाता है। तात्पर्य है कि गुणोंके कार्य पदार्थ, धन, परिवार, शरीर, स्वभाव, वृत्तियाँ, परिस्थितियाँ, क्रियाएँ आदिको अपना मान लेनेसे यह जीव स्वयं अविनाशी होता हुआ भी बाँध जाता है, विनाशी पदार्थ, धन आदिके वशमें हो जाता है; सर्वथा स्वतन्त्र होता हुआ भी पराधीन हो जाता है। जैसे, मनुष्य जिस धनको अपना मानता है, उस धनके घटने-बढ़नेसे स्वयंपर असर पड़ता है; जिन व्यक्तियोंको अपना मानता है, उनके जन्मने-मरनेसे स्वयंपर असर पड़ता है; जिस शरीरको अपना मानता है, उसके घटने-बढ़नेसे स्वयंपर असर पड़ता है। यही गुणोंका अविनाशी देहीको बाँधना है।
यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि यह देही स्वयं अविनाशीरूपसे ज्यों-का-त्यों रहता हुआ भी गुणोंके, गुणोंकी वृत्तियोंके अधीन होकर स्वयं सात्त्विक, राजस और तामस बन जाता है। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—
ईश्वर अंस जीव अविनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी ॥ (मानस ७।११७।१)
जीवका यह अविनाशी स्वरूप वास्तवमें कभी भी गुणोंसे नहीं बाँधता; परन्तु जब वह विनाशी देहको ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरे लिये’ मान लेता है, तब वह अपनी मान्यताके कारण गुणोंसे बाँध जाता है और उसको
परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें कठिनता प्रतीत होती है (गीता—बारहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। देहाभिमानके कारण गुणोंके द्वारा देहमें बाँध जानेसे वह तीनों गुणोंसे परे अपने अविनाशी स्वरूपको नहीं जान सकता। गुणोंसे देहमें बाँध जानेपर भी जीवका जो वास्तविक अविनाशी स्वरूप है, वह ज्यों-का-त्यों ही रहता है, जिसका लक्ष्य भगवान्ने यहाँ ‘अव्ययम्’ पदसे कराया है।
यहाँ ‘देहिनम्’ पदका तात्पर्य है कि देहमें तादात्म्य, ममता और कामना होनेसे ही तीनों गुण इस पुरुषको देहमें बाँधते हैं। यदि देहमें तादात्म्य, ममता और कामना न हो, तो फिर यह परमात्मस्वरूप ही है।
विशेष बात
शरीरके साथ जीव दो तरहसे अपना सम्बन्ध जोड़ता है—(१) अभेदभावसे —अपनेको शरीरमें बैठाना, जिससे ‘मैं शरीर हूँ’ ऐसा दीखने लगता है, और (२) भेदभावसे —शरीरको अपनेमें बैठाना, जिससे ‘शरीर मेरा है’ ऐसा दीखने लगता है। अभेदभावसे सम्बन्ध जोड़नेसे जीव अपनेको शरीर मान लेता है, जिसको ‘अहंता’ कहते हैं; और भेदभावसे सम्बन्ध जोड़नेसे जीव शरीरको अपना मान लेता है, जिसको ‘ममता’ कहते हैं। इस प्रकार शरीरसे अपना सम्बन्ध जोड़नेपर सत्त्व, रज और तम—तीनों गुण अपनी वृत्तियोंके द्वारा शरीरमें अहंता-ममता दृढ़ करके जीवको बाँध देते हैं।
जैसे विवाह हो जानेपर पत्नीके पूरे परिवार-(ससुराल-) के साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है, पत्नीके वस्त्राभूषण आदिकी आवश्यकता अपनी आवश्यकता प्रतीत होने लगती है, ऐसे ही शरीरके साथ मैं-मेरेका सम्बन्ध हो जानेपर जीवका पूरे संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है और शरीर-निर्वाहकी वस्तुओंको वह अपनी आवश्यकता मानने लग जाता है। अनित्य शरीरसे सम्बन्ध (एकात्मता) माननेके कारण वह अनित्य शरीरको नित्य रखनेकी इच्छा करने लगता है; क्योंकि वह स्वयं नित्य है। शरीरके साथ सम्बन्ध माननेके कारण ही उसको मरनेका भय लगने लगता है; क्योंकि शरीर मरनेवाला है। यदि शरीरसे सम्बन्ध न रहे, तो