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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

१२०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

महाबाहो= हे महाबाहो!रजः= रज (और)अव्ययम्= अविनाशी
प्रकृतिसम्भवाः= प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवालेतमः= तमदेहिनम्= देही (जीवात्मा)-को
सत्त्वम्= सत्त्व,इति= —ये (तीनों)देहे= देहमें
गुणाः= गुणनिबध्नन्ति= बाँध देते हैं।

व्याख्या—‘सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृति-सम्भवाः’ —तीसरे और चौथे श्लोकमें जिस मूल प्रकृतिको ‘महद् ब्रह्म’ नामसे कहा है, उसी मूल प्रकृतिसे सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण पैदा होते हैं।

यहाँ ‘इति’ पदका तात्पर्य है कि इन तीनों गुणोंसे अनन्त सृष्टियाँ पैदा होती हैं तथा तीनों गुणोंके तारतम्यसे प्राणियोंके अनेक भेद हो जाते हैं, पर गुण न दो होते हैं, न चार होते हैं, प्रत्युत तीन ही होते हैं।

‘निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्’ —ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो ये तीनों गुण अपनी तरफसे किसीको भी नहीं बाँधते, प्रत्युत यह पुरुष ही इन गुणोंके साथ सम्बन्ध जोड़कर बाँध जाता है। तात्पर्य है कि गुणोंके कार्य पदार्थ, धन, परिवार, शरीर, स्वभाव, वृत्तियाँ, परिस्थितियाँ, क्रियाएँ आदिको अपना मान लेनेसे यह जीव स्वयं अविनाशी होता हुआ भी बाँध जाता है, विनाशी पदार्थ, धन आदिके वशमें हो जाता है; सर्वथा स्वतन्त्र होता हुआ भी पराधीन हो जाता है। जैसे, मनुष्य जिस धनको अपना मानता है, उस धनके घटने-बढ़नेसे स्वयंपर असर पड़ता है; जिन व्यक्तियोंको अपना मानता है, उनके जन्मने-मरनेसे स्वयंपर असर पड़ता है; जिस शरीरको अपना मानता है, उसके घटने-बढ़नेसे स्वयंपर असर पड़ता है। यही गुणोंका अविनाशी देहीको बाँधना है।

यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि यह देही स्वयं अविनाशीरूपसे ज्यों-का-त्यों रहता हुआ भी गुणोंके, गुणोंकी वृत्तियोंके अधीन होकर स्वयं सात्त्विक, राजस और तामस बन जाता है। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—

ईश्वर अंस जीव अविनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी ॥ (मानस ७।११७।१)

जीवका यह अविनाशी स्वरूप वास्तवमें कभी भी गुणोंसे नहीं बाँधता; परन्तु जब वह विनाशी देहको ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरे लिये’ मान लेता है, तब वह अपनी मान्यताके कारण गुणोंसे बाँध जाता है और उसको

परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें कठिनता प्रतीत होती है (गीता—बारहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। देहाभिमानके कारण गुणोंके द्वारा देहमें बाँध जानेसे वह तीनों गुणोंसे परे अपने अविनाशी स्वरूपको नहीं जान सकता। गुणोंसे देहमें बाँध जानेपर भी जीवका जो वास्तविक अविनाशी स्वरूप है, वह ज्यों-का-त्यों ही रहता है, जिसका लक्ष्य भगवान्ने यहाँ ‘अव्ययम्’ पदसे कराया है।

यहाँ ‘देहिनम्’ पदका तात्पर्य है कि देहमें तादात्म्य, ममता और कामना होनेसे ही तीनों गुण इस पुरुषको देहमें बाँधते हैं। यदि देहमें तादात्म्य, ममता और कामना न हो, तो फिर यह परमात्मस्वरूप ही है।

विशेष बात

शरीरके साथ जीव दो तरहसे अपना सम्बन्ध जोड़ता है—(१) अभेदभावसे —अपनेको शरीरमें बैठाना, जिससे ‘मैं शरीर हूँ’ ऐसा दीखने लगता है, और (२) भेदभावसे —शरीरको अपनेमें बैठाना, जिससे ‘शरीर मेरा है’ ऐसा दीखने लगता है। अभेदभावसे सम्बन्ध जोड़नेसे जीव अपनेको शरीर मान लेता है, जिसको ‘अहंता’ कहते हैं; और भेदभावसे सम्बन्ध जोड़नेसे जीव शरीरको अपना मान लेता है, जिसको ‘ममता’ कहते हैं। इस प्रकार शरीरसे अपना सम्बन्ध जोड़नेपर सत्त्व, रज और तम—तीनों गुण अपनी वृत्तियोंके द्वारा शरीरमें अहंता-ममता दृढ़ करके जीवको बाँध देते हैं।

जैसे विवाह हो जानेपर पत्नीके पूरे परिवार-(ससुराल-) के साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है, पत्नीके वस्त्राभूषण आदिकी आवश्यकता अपनी आवश्यकता प्रतीत होने लगती है, ऐसे ही शरीरके साथ मैं-मेरेका सम्बन्ध हो जानेपर जीवका पूरे संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है और शरीर-निर्वाहकी वस्तुओंको वह अपनी आवश्यकता मानने लग जाता है। अनित्य शरीरसे सम्बन्ध (एकात्मता) माननेके कारण वह अनित्य शरीरको नित्य रखनेकी इच्छा करने लगता है; क्योंकि वह स्वयं नित्य है। शरीरके साथ सम्बन्ध माननेके कारण ही उसको मरनेका भय लगने लगता है; क्योंकि शरीर मरनेवाला है। यदि शरीरसे सम्बन्ध न रहे, तो

श्लोक ६ ]

  • साधक-संजीवनी *

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फिर न तो नित्य बने रहनेकी इच्छा होगी और न मरनेका भय ही होगा। अतः जबतक नित्य बने रहनेकी इच्छा और मरनेका भय है, तबतक वह गुणोंसे बँधा हुआ है।

जीव स्वयं अविनाशी है और शरीर विनाशी है। शरीरका प्रतिक्षण अपने-आप वियोग हो रहा है। जिसका अपने-

परिशिष्ट भाव —प्रकृतिसे पैदा होनेके कारण सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृति-विभागमें ही हैं। परन्तु प्रकृतिके कार्य शरीरसे अपना सम्बन्ध ('मैं' और 'मेरा') मान लेनेके कारण ये गुण अविनाशी चेतनको नाशवान् जड़ शरीरमें बाँध देते हैं अर्थात् 'मैं शरीर हूँ और शरीर मेरा है'—ऐसा देहाभिमान पैदा कर देते हैं। तात्पर्य है कि सभी विकार प्रकृतिके सम्बन्धसे पैदा होते हैं। सत्तामात्र स्वरूपमें कोई भी विकार नहीं है—'असंगो ह्ययं पुरुषः' (बृहदारण्यक ४।३।१५), 'देहेऽस्मिन्पुरुषः परः' (गीता १३।२२)। विकारोंके कारण ही जन्म-मरण होता है।

वास्तवमें गुण जीवको नहीं बाँधते, प्रत्युत जीव ही उनका संग करके बँध जाता है (इसी अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। अगर गुण बाँधनेवाले होते तो गुणोंके रहते हुए कोई उनसे छूट सकता ही नहीं, जीवन्मुक्त हो सकता ही नहीं!

सम्बन्ध —पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंके द्वारा देहीके बाँधे जानेकी बात कही। उन तीनों गुणोंमेंसे सत्त्वगुणका स्वरूप और उसके बाँधनेका प्रकार आगेके श्लोकमें बताते हैं।

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।

सुखसङ्घेन बध्नाति ज्ञानसङ्घेन चानघ ॥ ६ ॥

अनघ= हे पापरहित अर्जुन!होनेके कारणआसक्तिसे
तत्र= उन गुणोंमेंप्रकाशकम्= प्रकाशक (और)
सत्त्वम्= सत्त्वगुणअनामयम्= निर्विकार है।
निर्मलत्वात्= निर्मल (स्वच्छ)सुखसङ्घेन= (वह) सुखकी
बध्नाति
= (देहीको) बाँधता है।

व्याख्या —'तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्'—पूर्वश्लोकमें सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंकी बात कही। इन तीनों गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल (मलरहित) है। तात्पर्य है कि रजोगुण और तमोगुणकी तरह सत्त्वगुणमें मलिनता नहीं है, प्रत्युत यह रजोगुण और तमोगुणकी अपेक्षा निर्मल, स्वच्छ है। निर्मल होनेके कारण यह परमात्मतत्त्वका ज्ञान करानेमें सहायक है।

'प्रकाशकम्'—सत्त्वगुण निर्मल, स्वच्छ होनेके कारण प्रकाश करनेवाला है। जैसे प्रकाशके अन्तर्गत वस्तुएँ साफ-साफ दीखती हैं, ऐसे ही सत्त्वगुणकी अधिकता होनेसे रजोगुण और तमोगुणकी वृत्तियाँ साफ-साफ दीखती हैं। रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न होनेवाले काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्स्य आदि दोष भी साफ-साफ दीखते हैं अर्थात् इन सब विकारोंका साफ-साफ ज्ञान होता है।

आप वियोग हो रहा है, उससे सम्बन्ध-विच्छेद करनेमें क्या कठिनता और क्या उद्योग? उद्योग है तो केवल इतना ही है कि स्वतः विमुक्त होनेवाली वस्तुको पकड़ना नहीं है। उसको न पकड़नेसे अपने अविनाशी, गुणातीत स्वरूपका अपने आप अनुभव हो जायगा।

सत्त्वगुणकी बुद्धि होनेपर इन्द्रियोंमें प्रकाश, चेतना और हलकापन विशेषतासे प्रतीत होता है, जिससे प्रत्येक पारमार्थिक अथवा लौकिक विषयको अच्छी तरह समझनेमें बुद्धि पूरी तरह कार्य करती है और कार्य करनेमें बड़ा उत्साह रहता है।

सत्त्वगुणके दो रूप हैं—(१) शुद्ध सत्त्व, जिसमें उद्देश्य परमात्माका होता है, और (२) मलिन सत्त्व, जिसमें उद्देश्य सांसारिक भोग और संग्रहका होता है*।

शुद्ध सत्त्वगुणमें परमात्माका उद्देश्य होनेसे परमात्माकी तरफ चलनेमें स्वाभाविक रुचि होती है। मलिन सत्त्वगुणमें पदार्थोंके संग्रह और सुखभोगका उद्देश्य होनेसे सांसारिक प्रवृत्तियोंमें रुचि होती है, जिससे मनुष्य बँध जाता है।

मलिन सत्त्वगुणमें भी बुद्धि सांसारिक विषयको अच्छी

  • परमात्माका उद्देश्य न रहनेके कारण इसको 'मलिन सत्त्व' कहा गया है। मलिन सत्त्वमें रजोगुण साथ रहता है।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

तरह समझनेमें समर्थ होती है। जैसे, सत्त्वगुणकी वृद्धिमें ही वैज्ञानिक नये-नये आविष्कार करता है; किन्तु उसका उद्देश्य परमात्माकी प्राप्ति न होनेसे वह अहंकार, मान-बड़ाई, धन आदिसे संसारमें बँधा रहता है।

‘अनामयम्’—सत्त्वगुण रज और तमकी अपेक्षा विकाररहित है। वास्तवमें प्रकृतिका कार्य होनेसे यह सर्वथा निर्विकार नहीं है। सर्वथा निर्विकार तो अपना स्वरूप अथवा परमात्मत्व ही है, जो कि गुणातीत है। परमात्मत्वकी प्राप्तिमें सहायक होनेसे भगवान्ने सत्त्वगुणको भी विकाररहित कह दिया है।

‘सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ’—जब अन्तःकरणमें सात्त्विक वृत्ति होती है, कोई विकार नहीं होता है, तब एक सुख मिलता है, शान्ति मिलती है। उस समय साधकके मनमें यह विचार आता है कि ऐसा सुख हरदम बना रहे, ऐसी शान्ति हरदम बनी रहे, ऐसी निर्विकारता हरदम बनी रहे। परन्तु जब ऐसा सुख, शान्ति, निर्विकारता नहीं रहती, तब साधकको अच्छा नहीं लगता। यह अच्छा लगना और अच्छा न लगना ही सत्त्वगुणके सुखमें आसक्ति है, जो बाँधनेवाली है।

जब सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंका, इनकी वृत्तियोंका, विकारोंका साफ-साफ ज्ञान होता है और साधकको ऐसी बहुत-सी आश्चर्यजनक बातोंकी जानकारी होती है, जो पहले कभी जानी हुई नहीं होती, तब साधकके मनमें आता है कि यह ज्ञान हरदम बना रहे। यह ज्ञानमें आसक्ति है, जो बाँधनेवाली है। ‘मैं दूसरोंकी अपेक्षा अधिक (विशेष) जानता हूँ’—यह अभिमान भी बाँधनेवाला होता है।

परिशिष्ट भाव — यहाँ भगवान्ने सत्त्वगुणको अनामय (निर्विकार) बताया है—यह सत्त्वगुणकी विलक्षणता है। कारण कि सत्त्वगुण गुणातीत होनेके बहुत नजदीक है। यद्यपि सत्त्वगुण निर्विकार है, पर संगके कारण वह विकारी हो जाता है—‘सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ’; क्योंकि संग रजोगुणका स्वरूप है—‘रजो रागात्मकं विद्धि’ (गीता १४।७)। सुख और ज्ञान बाधक नहीं हैं, प्रत्युत उनका संग बाधक है। संग है—उनको अपना मान लेना। वास्तवमें सत्त्वगुण अपना है ही नहीं, वह तो प्रकृतिका है।

मनुष्यमें रजोगुणकी मुख्यता रहती है—‘रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते’ (१४।१५), ‘मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः’ (१४।१८)। अतः जबतक संग रहता है, तबतक मुक्ति नहीं होती; क्योंकि स्वरूप असंग है।

भगवान्ने सत्त्वगुणको भी अनामय कहा है और परमपदको भी अनामय कहा है—‘पदं गच्छन्त्यानामयम्’ (२।५१)। इससे यह समझना चाहिये कि सत्त्वगुण तो सापेक्ष अनामय है और परमपद निरपेक्ष अनामय है।

तीनों गुण प्रकृतिजन्य होते हुए भी रजोगुण तृष्णा तथा आसक्तिसे पैदा होनेवाला और तमोगुण अज्ञानसे पैदा होनेवाला है (इसी अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक); परन्तु सत्त्वगुण केवल प्रकृतिजन्य है। तात्पर्य है कि सत्त्वगुण प्रकृतिजन्य तो है, पर किसी विकारसे जन्य नहीं है। इसलिये इसको ‘अनामय’ कहा गया है।

सात्त्विक सुख और सात्त्विक ज्ञान भी स्वयंके नहीं हैं, प्रत्युत प्रकृतिजन्य होनेसे ‘पर’ के हैं अर्थात् पराधीन-

इस तरह सत्त्वगुण सुख और ज्ञानके संग- (आसक्ति-) से साधकको बाँध देता है अर्थात् उसको गुणातीत नहीं होने देता। यह संग ही रजोगुण है, जो बाँधनेवाला है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।

यदि साधक सुख और ज्ञानका संग न करे तो सत्त्वगुण उसको बाँधता नहीं, प्रत्युत उसको गुणातीत कर देता है। तात्पर्य है कि यदि संग न हो तो साधक सत्त्वगुणसे भी ऊँचा उठ जाता है और अपने गुणातीत स्वरूपका अनुभव कर लेता है।

सत्त्वगुणसे सुख और ज्ञान होनेपर साधकको यह सावधानी रखनी चाहिये कि यह सुख और ज्ञान मेरा लक्ष्य नहीं है। ये मेरे भोग्य नहीं हैं। ये तो लक्ष्यकी प्राप्तिमें कारण हैं। मेरेको तो उस लक्ष्यको प्राप्त करना है, जो इस सुख और ज्ञानको भी प्रकाशित करनेवाला है।

सुख, ज्ञान आदि सभी सत्त्वगुणकी वृत्तियाँ हैं। ये कभी घटती हैं, कभी बढ़ती हैं; कभी आती हैं, कभी जाती हैं। परन्तु अपना स्वरूप निरन्तर एकरस रहता है। उसमें कभी घट-बढ़ नहीं होती। अतः साधकको सत्त्वगुणकी वृत्तियोंसे सदा तटस्थ, उदासीन रहना चाहिये। उनका उपभोग नहीं करना चाहिये। इससे वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिमें फँसेगा नहीं।

अगर साधक सत्त्वगुणसे होनेवाले सुख और ज्ञानका संग न करे, तो उसको शीघ्र ही परमात्मप्राप्ति हो जाती है। परन्तु अगर वह इनके संगका त्याग न करे तो (परमात्मप्राप्तिका लक्ष्य होनेसे) समय पाकर उसकी इस सुख और ज्ञानसे स्वतः अरुचि हो जाती है और वह परमात्मप्राप्ति कर लेता है।

श्लोक ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

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हैं। इनमें पराधीनताका सुख है, अपने स्वरूपका सुख नहीं है।

सात्त्विक ज्ञान और तत्त्वज्ञानमें अन्तर —सात्त्विक ज्ञानमें तो ‘मैं ज्ञानी हूँ’ यह संग है, पर तत्त्वज्ञान सर्वथा असंग है अर्थात् तत्त्वज्ञान होनेपर ज्ञान रहता है, पर ‘मैं ज्ञानी हूँ’—यह (ज्ञानी) नहीं रहता। सात्त्विक ज्ञानमें द्रष्टा रहता है और अपनेमें विशेषताका भान होता है; परन्तु तत्त्वज्ञानमें कोई द्रष्टा नहीं रहता और अपनेमें कोई कमी भी नहीं रहती तथा विशेषताका भान भी नहीं होता; क्योंकि व्यक्तित्व नहीं रहता। अपनेमें विशेषताका अनुभव होना ही संग है। विशेषताका अनुभव ‘मैं ज्ञानी हूँ’—ऐसा स्वीकार करनेसे होता है। तत्त्वज्ञान होनेपर निजानन्दका अनुभव होता है। तेरहवें अध्यायके सताईसवें श्लोकमें सात्त्विक ज्ञानका और अष्टाईसवें श्लोकमें तत्त्वज्ञानका वर्णन हुआ है।

सम्बन्ध—रजोगुणका स्वरूप और उसके बाँधनेका प्रकार क्या है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।

तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥७॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन!रजः= रजोगुणको (तुम)कर्मसङ्गेन= कर्मोंकी आसक्तिसे
तृष्णासङ्गसमुद्भवम्= तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवालेरागात्मकम्= रागस्वरूपदेहिनम्= देही (जीवात्मा)–को
विद्धि= समझो।
तत्= वहनिबध्नाति= बाँधता है।

व्याख्या —‘रजो रागात्मकं विद्धि’—यह रजोगुण रागस्वरूप है अर्थात् किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना, क्रिया आदिमें जो प्रियता पैदा होती है, वह प्रियता रजोगुणका स्वरूप है।

‘रागात्मकम्’ कहनेका तात्पर्य है कि जैसे स्वर्णके आभूषण स्वर्णमय होते हैं, ऐसे ही रजोगुण रागमय है। पातंजलयोगदर्शनमें ‘क्रिया’ को रजोगुणका स्वरूप कहा गया है। परन्तु श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् (क्रियामात्रको गौणरूपसे रजोगुण मानते हुए भी) मुख्यतः रागको ही रजोगुणका स्वरूप मानते हैं। इसीलिये ‘योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गेन त्यक्त्वा’ (२।४८) पदोंमें आसक्तिका

त्याग करके कर्तव्यकर्मोंको करनेकी आज्ञा दी गयी है। निष्कामभावसे किये गये कर्म मुक्त करनेवाले होते हैं (तीसरे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। इसी अध्यायके बाईसवें श्लोकमें भगवान् कहते हैं कि ‘प्रवृत्ति’ अर्थात् क्रिया करनेका भाव उत्पन्न होनेपर भी गुणातीत पुरुषका उसमें राग नहीं होता। तात्पर्य यह हुआ कि गुणातीत पुरुषमें भी रजोगुणके प्रभावसे प्रवृत्ति तो होती है, पर वह रागपूर्वक नहीं होती। गुणातीत होनेमें सहायक होनेपर भी सत्त्वगुणको सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे बाँधनेवाला कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि आसक्ति ही बन्धनकारक है, सत्त्वगुण स्वयं नहीं। अतः भगवान् यहाँ रागको ही

१-प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्। (योगदर्शन २।१८) २-श्रीमद्भगवद्गीताकी एक बहुत बड़ी विलक्षणता यह है कि वह किसी मतका खण्डन किये बिना ही उस विषयमें अपनी मान्यता प्रकट कर देती है। गीतामें भगवान्ने क्रियाको भी रजोगुण माना है—‘लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्माणाम्’ (१४।१२), और क्रियाको सात्त्विक भी बताया है (अठारहवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। इसलिये दोष क्रियाओंमें नहीं है, प्रत्युत राग या आसक्तिमें है। रागपूर्वक किये हुए कर्म ही बाँधते हैं। तात्पर्य है कि मनुष्य कर्मोंकी आसक्ति और फलेच्छासे ही बँधता है, कर्मोंको करनेमात्रसे नहीं। राग न रहनेपर सम्पूर्ण कर्म करते हुए भी मनुष्य नहीं बँधता (चौथे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। अगर क्रियामात्र ही बन्धनकारक होती तो जीवन्मुक्त महापुरुषोंको भी बाँध देती; क्योंकि क्रियाएँ तो उनके द्वारा भी होती ही हैं (चौदहवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। भगवान्के द्वारा सृष्टिकी रचना करना भी ‘कर्म’ है तथा अवतार लेकर वे भी क्रियाएँ (लीलाएँ) करते हैं, पर कर्मोंमें आसक्ति न रहनेसे उनको कर्म बाँधते नहीं (नवें अध्यायका नवाँ श्लोक)। अठारहवें अध्यायके तेईसवें, चौबीसवें और पचीसवें श्लोकमें भगवान्ने सात्त्विक, राजस और तामस—तीन प्रकारके कर्मोंका वर्णन किया है। अगर मात्र कर्म रजोगुण ही होते, तो फिर उनके सात्त्विक और तामस भेद कैसे होते? इससे सिद्ध होता है कि गीता मुख्यतः रागको ही रजोगुण कहती है।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

रजोगुणका मुख्य स्वरूप जाननेके लिये कह रहे हैं।

महासर्गके आदिमें परमात्माका 'बहु स्यां प्रजायेय'—यह संकल्प होता है। यह संकल्प रजोगुणी है। इसको गीताने 'कर्म' नामसे कहा है (आठवें अध्यायका तीसरा श्लोक)। जिस प्रकार दहीको बिलोनेसे मक्खन और छाछ अलग-अलग हो जाते हैं, ऐसे ही सृष्टिरचनाके इस रजोगुणी संकल्पसे प्रकृतिमें श्लेष पैदा होता है, जिससे सत्त्वगुणरूपी मक्खन और तमोगुणरूपी छाछ अलग-अलग हो जाती है। सत्त्वगुणसे अन्तःकरण और ज्ञानेन्द्रियाँ, रजोगुणसे प्राण और कर्मेन्द्रियाँ तथा तमोगुणसे स्थूल पदार्थ, शरीर आदिका निर्माण होता है। तीनों गुणोंसे संसारके अन्य पदार्थोंकी उत्पत्ति होती है। इस प्रकार महासर्गके आदिमें भगवान्का सृष्टिरचनारूप कर्म भी सर्वथा रागरहित होता है (गीता—चौथे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)।

'तृष्णासंगसमुद्भवम्'—प्राप्त वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, परिस्थिति, घटना आदि बने रहें तथा वे और भी मिलते रहें—ऐसी 'जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई' की तरह तृष्णा पैदा हो जाती है। इस तृष्णासे फिर वस्तु आदिमें आसक्ति पैदा हो जाती है।

व्याकरणके अनुसार इस 'तृष्णासंगसमुद्भवम्' पदके दो अर्थ होते हैं—(१) जिससे तृष्णा और आसक्ति पैदा होती है* अर्थात् तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवाला और (२) जो तृष्णा और आसक्तिसे पैदा होता है अर्थात् तृष्णा और आसक्तिसे पैदा होनेवाला। जैसे बीज और वृक्ष अन्योन्य कारण हैं, अर्थात् बीजसे वृक्ष पैदा होता है और वृक्षसे फिर बहुत-से बीज पैदा हो जाते हैं, ऐसे ही रागस्वरूप रजोगुणसे तृष्णा और आसक्ति बढ़ती है तथा तृष्णा और आसक्तिसे रजोगुण बहुत बढ़ जाता है। तात्पर्य है कि ये दोनों ही एक-दूसरेको पुष्ट करनेवाले हैं। अतः उपर्युक्त दोनों ही अर्थ ठीक हैं।

'तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिन्म्'—रजोगुण कर्मोंकी आसक्तिसे शरीरधारीको बाँधता है अर्थात् रजोगुणके बढ़नेपर ज्यों-ज्यों तृष्णा और आसक्ति बढ़ती है, त्यों-ही-त्यों मनुष्यकी कर्म करनेकी प्रवृत्ति बढ़ती है। कर्म करनेकी प्रवृत्ति बढ़नेसे मनुष्य नये-नये कर्म करना शुरू कर देता है। फिर वह रात-दिन इस प्रवृत्तिमें ही फँसा रहता है अर्थात् मनुष्यकी मनोवृत्तियाँ रात-दिन नये-नये कर्म आरम्भ करनेके चिन्तनमें लगी रहती हैं। ऐसी अवस्थामें

उसको अपना कल्याण, उद्धार करनेका अवसर ही प्राप्त नहीं होता। इस तरह रजोगुण कर्मोंकी सुखासक्तिसे शरीरधारीको बाँध देता है अर्थात् जन्म-मरणमें ले जाता है। अतः साधकको प्राप्त परिस्थितिके अनुसार निष्कामभावसे कर्तव्य-कर्म तो कर देना चाहिये, पर संग्रह और सुखभोगके लिये नये-नये कर्मोंका आरम्भ नहीं करना चाहिये।

'देहिन्म्' पदका तात्पर्य है कि देहसे अपना सम्बन्ध माननेवाले देहीको ही यह रजोगुण कर्मोंकी आसक्तिसे बाँधता है।

सकामभावसे कर्मोंको करनेमें भी एक सुख होता है और 'कर्मोंका अमुक फल भोगेंगे' इस फलासक्तिमें भी एक सुख होता है। इस कर्म और फलकी सुखासक्तिसे मनुष्य बाँध जाता है।

कर्मोंकी सुखासक्तिसे छूटनेके लिये साधक यह विचार करे कि ये पदार्थ, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना आदि कितने दिन हमारे साथ रहेंगे। कारण कि सब दृश्य प्रतिक्षण अदृश्यतामें जा रहा है; जीवन प्रतिक्षण मृत्युमें जा रहा है; सर्ग प्रतिक्षण प्रलयमें जा रहा है; महासर्ग प्रतिक्षण महाप्रलयमें जा रहा है। आज दिनतक जो बाल्य, युवा आदि अवस्थाएँ चली गयीं, वे फिर नहीं मिल सकतीं। जो समय चला गया, वह फिर नहीं मिल सकता। बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं और धनियोंकी अन्तिम दशाको याद करनेसे तथा बड़े-बड़े राजमहलों और मकानोंके खण्डहरोंको देखनेसे साधकको यह विचार आना चाहिये कि उनकी जो दशा हुई है, वही दशा इस शरीर, धन-सम्पत्ति, मकान आदिकी भी होगी। परन्तु मैंने इनके प्रलोभनमें पड़कर अपनी शक्ति, बुद्धि, समयको बरबाद कर दिया है। यह तो बड़ी भारी हानि हो गयी! ऐसे विचारोंसे साधकके अन्तःकरणमें सात्त्विक वृत्तियाँ आयेंगी और वह कर्मसंगसे ऊँचा उठ जायगा।

अगर मैं रात-दिन नये-नये कर्मोंके करनेमें ही लगा रहूँगा, तो मेरा मनुष्यजन्म निरर्थक चला जायगा और उन कर्मोंकी आसक्तिसे मेरेको न जाने किन-किन योनियोंमें जाना पड़ेगा और कितनी बार जन्मना-मरना पड़ेगा! इसलिये मुझे संग्रह और सुख-भोगके लिये नये-नये कर्मोंका आरम्भ नहीं करना है, प्रत्युत प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अनासक्तभावसे कर्तव्य-कर्म करना है! ऐसे विचारोंसे भी साधक कर्मोंकी आसक्तिसे ऊँचा उठ जाता है।

१-तृष्णायाः संगस्य च समुद्भवो यस्मात्।

२-तृष्णायाः संगच्च समुद्भवो यस्य।

श्लोक ८ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२५

परिशिष्ट भाव —रजोगुण कर्माके संगसे मनुष्यको बाँधता है। अतः सात्त्विक कर्म भी संग होनेसे बाँधनेवाले हो जाते हैं। अगर संग न हो तो कर्म बन्धनकारक नहीं होते (गीता—अठारहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)। इसलिये कर्मयोगसे मुक्ति हो जाती है; क्योंकि कर्माका और उनके फलका संग न होनेसे ही कर्मयोग होता है (गीता—छठे अध्यायका चौथा श्लोक)।

सम्बन्ध—तमोगुणका स्वरूप और उसके बाँधनेका प्रकार क्या है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।

प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति

भारत ॥ ८ ॥

तु= औरतमः= तमोगुणकोप्रमादालस्यनिद्राभिः=प्रमाद, आलस्य
भारत= हे भरतवंशी(तुम)और निद्राके द्वारा
अर्जुन!अज्ञानजम्= अज्ञानसे उत्पन्ननिबध्नाति = (देहेके साथ
सर्वदेहिनाम्= सम्पूर्णहोनेवालाअपना सम्बन्ध
देहधारियोंकोविद्धि= समझो।माननेवालों-
मोहनम्= मोहित करनेवालेतत्= वहको) बाँधता है।

व्याख्या —‘तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्’—सत्त्वगुण और रजोगुण—इन दोनोंसे तमोगुणको अत्यन्त निकृष्ट बतानेके लिये यहाँ ‘तु’ पदका प्रयोग हुआ है।

यह तमोगुण अज्ञानसे अर्थात् बेसमझीसे, मूर्खतासे पैदा होता है और सम्पूर्ण देहधारियोंको मोहित कर देता है अर्थात् सत्-असत्, कर्तव्य-अकर्तव्यका ज्ञान (विवेक) नहीं होने देता। इतना ही नहीं, यह सांसारिक सुख-भोग और संग्रहमें भी नहीं लगने देता अर्थात् राजस सुखमें भी नहीं जाने देता, फिर सात्त्विक सुखकी तो बात ही क्या है!

वास्तवमें तमोगुणके द्वारा मोहित होनेकी बात केवल मनुष्योंके लिये ही है; क्योंकि दूसरे प्राणी तो स्वाभाविक ही तमोगुणसे मोहित हैं। फिर भी यहाँ ‘सर्वदेहिनाम्’ पद देनेका तात्पर्य है कि जिन मनुष्योंमें सत्-असत्, कर्तव्य-अकर्तव्यका ज्ञान (विवेक) नहीं है, वे मनुष्य होते हुए भी चौरासी लाख योनियोंवाले प्राणियोंके समान ही हैं अर्थात् जैसे पशु-पक्षी आदि प्राणी खा-पी लेते हैं और सो जाते हैं, ऐसे ही वे मनुष्य भी हैं।

‘प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत’—यह तमोगुण प्रमाद, आलस्य और निद्राके द्वारा सम्पूर्ण देहधारियोंको बाँध देता है।

‘प्रमाद’ दो तरहका होता है—(१) करनेलायक

कामको न करना अर्थात् जिस कामसे अपना और दुनियाका, अभी और परिणाममें हित होता है, ऐसे कर्तव्य-कर्माको प्रमादके कारण न करना; और (२) न करनेलायक कामको करना अर्थात् जिस कामसे अपना और दुनियाका अभी और परिणाममें अहित होता है, ऐसे कर्माको करना।

न करनेलायक काम भी दो तरहके होते हैं—१—व्यर्थ खर्च करना अर्थात् बीड़ी-सिगरेट, भाँग-गाँजा आदि पीनेमें और नाटक-सिनेमा, खेल आदि देखनेमें धन खर्च करना; और २—व्यर्थ क्रिया करना अर्थात् ताश-चौपड़ खेलना, खेल-कूद करना, बिना किसी कारणके पशु-पक्षी आदिको कष्ट देना, तंग करना, बिना किसी स्वार्थके छोटे-छोटे पेड़-पौधोंको नष्ट कर देना आदि व्यर्थ क्रियाएँ करना।

‘आलस्य’ भी दो प्रकारका होता है—(१) सोते रहना, निकम्मे बैठे रहना, आवश्यक काम न करना और ऐसा विचार रखना कि फिर कर लेंगे, अभी तो बैठे हैं—इस तरहका आलस्य मनुष्यको बाँधता है; और (२) निद्राके पहले शरीर भारी हो जाना, वृत्तियोंका भारी हो जाना, समझनेकी शक्ति न रहना—इस तरहका आलस्य दोषी नहीं है; क्योंकि यह आलस्य आता है, मनुष्य करता नहीं।

‘निद्रा’ भी दो तरहकी होती है—(१) आवश्यक निद्रा—जो निद्रा शरीरके स्वास्थ्यके लिये नियमितरूपसे ली जाती है और जिससे शरीरमें हलकापन आता है, वृत्तियाँ

१२६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

स्वच्छ होती है, बुद्धिको विश्राम मिलता है, ऐसी आवश्यक निद्रा त्याज्य और दोषी नहीं है। भगवान्ने भी ऐसी नियमित निद्राको दोषी नहीं माना है, प्रत्युत योग-साधनमें सहायक माना है—‘युक्तस्वप्नावबोधस्थ ’ (६।१७) और (२) अनावश्यक निद्रा—जो निद्रा निद्राके लिये ली जाती है, जिससे बेहोशी ज्यादा आती है, नींदसे उठनेपर भी शरीर भारी रहता है, वृत्तियाँ भारी रहती हैं, पुरानी स्मृति नहीं होती, ऐसी अनावश्यक निद्रा त्याज्य और दोषी है। इस अनावश्यक निद्राको भगवान्ने भी त्याज्य बताया है—‘न चाति स्वप्नशीलस्य ’ (६।१६)।

इस तरह तमोगुण प्रमाद, आलस्य और निद्राके द्वारा मनुष्यको बाँध देता है अर्थात् उसकी सांसारिक और पारमार्थिक उन्नति नहीं होने देता।

विशेष बात

सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण मनुष्यको बाँधते हैं, पर इन तीनोंके बाँधनेके प्रकारमें फरक है। सत्त्वगुण और रजोगुण ‘संग’ से बाँधते हैं अर्थात् सत्त्वगुण सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे तथा रजोगुण कर्मोंकी आसक्तिसे बाँधता

है। अतः सत्त्वगुणमें ‘सुखसंग और ज्ञानसंग’ बताया तथा रजोगुणमें ‘कर्मसंग’ बताया। परन्तु तमोगुणमें ‘संग’ नहीं बताया; क्योंकि तमोगुण मोहनात्मक है। इसमें किसीका संग करनेकी जरूरत नहीं पड़ती। यह तो स्वरूपसे ही बाँधनेवाला है। तात्पर्य यह हुआ कि सत्त्वगुण और रजोगुण तो संग—(सुखासक्ति-) से बाँधते हैं, पर तमोगुण स्वरूपसे ही बाँधनेवाला है।

अगर सुखकी आसक्ति न हो और ज्ञानका अभिमान न हो तो सुख और ज्ञान बाँधनेवाले नहीं होते, प्रत्युत गुणातीत करनेवाले होते हैं। ऐसे ही कर्म और कर्मफलमें आसक्ति न हो, तो वह कर्म परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करनेवाला होता है (गीता—तीसरे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।

उपर्युक्त तीनों गुण प्रकृतिके कार्य हैं और जीव स्वयं प्रकृति और उसके कार्य गुणोंसे सर्वथा रहित है। गुणोंके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण ही वह स्वयं निलिप्त, गुणातीत होता हुआ भी गुणोंके द्वारा बँध जाता है। अतः अपने वास्तविक स्वरूपका लक्ष्य रखनेसे ही साधक गुणोंके बन्धनसे छूट सकता है।

सम्बन्ध—बाँधनेसे पहले तीनों गुण क्या करते हैं—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

सत्त्वं सुखे सज्जयति रजः कर्मणि भारत।

ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सज्जयत्युत ॥ १ ॥

भारत= हे भरतवंशोद्भव(मनुष्यपर)आवृत्य= ढककर
अर्जुन!सज्जयति= विजयउत
सत्त्वम्= सत्त्वगुणकरता है।प्रमादे
सुखे= सुखमें (और)तु= परन्तु
रजः= रजोगुणतमः= तमोगुणसज्जयति
कर्मणि= कर्ममें लगाकरज्ञानम्= ज्ञानको

व्याख्या —‘सत्त्वं सुखे सज्जयति ’—सत्त्वगुण साधकको सुखमें लगाकर अपनी विजय करता है, साधकको अपने वशमें करता है। तात्पर्य है कि जब सात्त्विक सुख आता है, तब साधककी उस सुखमें आसक्ति हो जाती है। सुखमें आसक्ति होनेसे वह सुख साधकको बाँध देता है अर्थात् उसके साधनको आगे नहीं बढ़ने देता, जिससे साधक सत्त्वगुणसे ऊँचा नहीं उठ सकता, गुणातीत नहीं हो सकता।

यद्यपि भगवान्ने पहले छठे श्लोकमें सत्त्वगुणके

द्वारा सुख और ज्ञानके संगसे बाँधनेकी बात बतायी है, तथापि यहाँ सत्त्वगुणकी विजय केवल सुखमें ही बतायी है, ज्ञानमें नहीं। इसका तात्पर्य यह है कि वास्तवमें साधक सुखकी आसक्तिसे ही बँधता है। ज्ञान होनेपर साधकमें एक अभिमान आ जाता है कि ‘मैं कितना जानकार हूँ!’ इस अभिमानमें भी एक सुख मिलता है, जिससे साधक बँध जाता है। इसलिये यहाँ सत्त्वगुणकी केवल सुखमें ही विजय बतायी है।

श्लोक १० ]

  • साधक-संजीवनी *

१२७

‘रजः कर्मणि भारत’—रजोगुण मनुष्यको कर्ममें लगाकर अपनी विजय करता है। तात्पर्य है कि मनुष्यको क्रिया करना अच्छा लगता है, प्रिय लगता है। जैसे छोटा बालक पड़े-पड़े हाथ-पैर हिलाता है तो उसको अच्छा लगता है और उसका हाथ-पैर हिलाना बंद कर दिया जाय तो वह रोने लगता है। ऐसे ही मनुष्य कोई क्रिया करता है तो उसको अच्छा लगता है और उसकी उस क्रियाको बीचमें कोई छुड़ा दे तो उसको बुरा लगता है। यही क्रियाके प्रति आसक्ति है, प्रियता है, जिससे रजोगुण मनुष्यपर विजय करता है।

‘कर्मके फलमें तेरा अधिकार नहीं है’ (गीता—दूसरे अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक) आदि वचनोंसे फलमें आसक्ति न रखनेकी तरफ तो साधकका खयाल जाता है, पर कर्मोंमें आसक्ति न रखनेकी तरफ साधकका खयाल नहीं जाता। वह ‘तेरा कर्म करनेमें ही अधिकार है; कर्म न करनेमें तेरी आसक्ति न हो’ (गीता—दूसरे अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक), ‘जो योगारूढ़ होना चाहता है, उसके लिये निष्कामभावसे कर्म करना कारण है’ (गीता—छठे अध्यायका तीसरा श्लोक) आदि वचनोंसे यही समझ लेता है कि कर्म तो करने ही चाहिये। अतः वह कर्म करता है, तो कर्मोंको करते-करते उसकी उन कर्मोंमें आसक्ति,

परिशिष्ट भाव—सत्त्वगुण केवल सुख होनेपर विजय नहीं करता, प्रत्युत सुखका संग होनेपर विजय करता है—‘सुखसंगेन बध्नाति’ (गीता १४।६)। इसी तरह रजोगुण भी कर्मका संग होनेपर विजय करता है—‘तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिन्म’ (१४।७)। परन्तु तमोगुण स्वरूपसे ही विजय करता है। इसलिये तमोगुणमें ‘संग’ शब्द नहीं आया है।

‘मैं सुखी हूँ’—यह सुखका संग है और ‘मैं अच्छे कर्म करनेवाला हूँ, मेरे कर्म बड़े अच्छे हैं’—यह कर्मका संग है। संग करनेसे अर्थात् अपना सम्बन्ध जोड़नेसे ही मनुष्य बँधता है।

सम्बन्ध—एक-एक गुण मनुष्यपर कैसे विजय करता है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।

रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १० ॥

भारत= हे भरतवंशोद्भवसत्त्वम्= सत्त्वगुणरजः= रजोगुण (बद्धता है)
अर्जुन!भवति= बद्धता है,तथा, एव= वैसे ही
रजः= रजोगुणसत्त्वम्= सत्त्वगुणसत्त्वम्= सत्त्वगुण (और)
= और= औररजः= रजोगुणको
तमः= तमोगुणकोतमः= तमोगुणको(दबाकर)
अभिभूय= दबाकर(दबाकर)तमः= तमोगुण (बद्धता है)।

१२८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

व्याख्या—‘रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत’— रजोगुणकी और तमोगुणकी वृत्तियोंको दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है अर्थात् रजोगुणकी लोभ, प्रवृत्ति, नये-नये कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति, स्मृहा, सांसारिक भोग और संग्रहमें प्रियता आदि वृत्तियाँ और तमोगुणकी प्रमाद, आलस्य, अनावश्यक निद्रा, मूढ़ता आदि वृत्तियाँ—इन सबको ‘सत्त्वगुण’ दबा देता है और अन्तःकरणमें स्वच्छता, निर्मलता, वैराग्य, निःस्मृहता, उदारता, निवृत्ति आदि वृत्तियोंको उत्पन्न कर देता है।

‘रजः सत्त्वं तमश्चैव’— सत्त्वगुणकी और तमोगुणकी वृत्तियोंको दबाकर रजोगुण बढ़ता है अर्थात् सत्त्वगुणकी ज्ञान, प्रकाश, वैराग्य, उदारता आदि वृत्तियाँ और तमोगुणकी प्रमाद, आलस्य, अनावश्यक निद्रा, मूढ़ता आदि वृत्तियाँ—इन सबको ‘रजोगुण’ दबा देता है और अन्तःकरणमें लोभ, प्रवृत्ति, आरम्भ, अशान्ति, स्मृहा आदि वृत्तियोंको उत्पन्न कर देता है।

‘तमः सत्त्वं रजस्तथा’— वैैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ता है अर्थात् सत्त्वगुणकी स्वच्छता, निर्मलता, प्रकाश, उदारता आदि वृत्तियाँ और रजोगुणकी चंचलता, अशान्ति, लोभ आदि वृत्तियाँ—इन सबको ‘तमोगुण’ दबा देता है और अन्तःकरणमें प्रमाद, आलस्य, अतिनिद्रा, मूढ़ता आदि वृत्तियोंको उत्पन्न कर देता है।

दो गुणोंको दबाकर एक गुण बढ़ता है, बढ़ा हुआ गुण मनुष्यपर विजय करता है और विजय करके मनुष्यको

परिशिष्ट भाव— जो गुण बढ़ता है, उसकी मुख्यता हो जाती है और दूसरे गुणोंकी गौणता हो जाती है। यह गुणोंका स्वभाव है।

सम्बन्ध— जब दो गुणोंको दबाकर एक गुण बढ़ता है, तब उस बढ़े हुए गुणके क्या लक्षण होते हैं—इसको बतानेके लिये पहले बढ़े हुए सत्त्वगुणके लक्षणोंका वर्णन करते हैं।

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते। ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥

यदा= जबप्रकाशः= प्रकाश (स्वच्छता)इति= यह
अस्मिन्= इसउत= औरविद्यात्= जानना चाहिये
देहे= मनुष्य-शरीरमेंज्ञानम्= विवेक(कि)
सर्वद्वारेषु= सब द्वारों (इन्द्रियों और अन्तःकरण)मेंउपजायते= प्रकट हो जाता है,सत्त्वम्= सत्त्वगुण
तदा= तबविवृद्धम्= बढ़ा हुआ है।

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२१

व्याख्या —‘सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्’—‘ज्ञानं यदा’—जिस समय रजोगुणी और तमोगुणी वृत्तियोंको दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है, उस समय सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें तथा अन्तःकरणमें स्वच्छता, निर्मलता प्रकट हो जाती है। जैसे सूर्यके प्रकाशमें सब वस्तुएँ साफ-साफ दीखती हैं, ऐसे ही स्वच्छ बहिःकरण और अन्तःकरणसे शब्दादि पाँचों विषयोंका यथार्थरूपसे ज्ञान होता है। मनसे किसी भी विषयका ठीक-ठीक मनन-चिन्तन होता है।

इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता, निर्मलता होनेसे ‘सत् क्या है और असत् क्या है? कर्तव्य क्या है और अकर्तव्य क्या है? लाभ किसमें है और हानि किसमें है? हित किसमें है और अहित किसमें है?’ आदि बातोंका स्पष्टतया ज्ञान (विवेक) हो जाता है।

यहाँ ‘देहेऽस्मिन्’ कहनेका तात्पर्य है कि सत्त्वगुणके बढ़नेका अर्थात् बहिःकरण और अन्तःकरणमें स्वच्छता, निर्मलता और विवेकशक्ति प्रकट होनेका अवसर इस मनुष्य-शरीरमें ही है, अन्य शरीरोंमें नहीं। भगवान्ने तमोगुणसे बँधनेवालोंके लिये ‘सर्वदेहिनाम्’ (१४।८) पदका प्रयोग किया है, जिसका तात्पर्य है कि रजोगुण-तमोगुण तो अन्य शरीरोंमें भी बढ़ते हैं, पर सत्त्वगुण मनुष्यशरीरमें ही बढ़ सकता है। अतः मनुष्यको चाहिये कि वह रजोगुण और तमोगुणपर विजय प्राप्त करके सत्त्वगुणसे भी ऊँचा उठे। इसीमें मनुष्यजीवनकी सफलता है। भगवान्ने कृपापूर्वक मनुष्यशरीर देकर इन तीनों गुणोंपर विजय प्राप्त करनेका पूरा अवसर, अधिकार, योग्यता, सामर्थ्य, स्वतन्त्रता दी है।

‘तदा विद्याद् विवृद्धं सत्त्वमित्युत’—इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता और विवेकशक्ति आनेपर साधकको यह जानना चाहिये कि अभी सत्त्वगुणकी वृत्तियाँ बढ़ी हुई हैं और रजोगुण-तमोगुणकी वृत्तियाँ दबी हुई हैं। अतः साधक कभी भी अपनेमें यह अभिमान न करे कि ‘मैं जानकार हो गया हूँ, ज्ञानी हो गया हूँ’ अर्थात् वह सत्त्वगुणके कार्य प्रकाश और ज्ञानको अपना गुण न माने,

परिशिष्ट भाव —‘प्रकाश’ और ‘ज्ञान’ दोनोंमें भेद है। ‘प्रकाश’का अर्थ है—इन्द्रियों और अन्तःकरणमें जागृति अर्थात् रजोगुणसे होनेवाले मनोराज्यका तथा तमोगुणसे होनेवाले निद्रा, आलस्य और प्रमादका न होकर स्वच्छता होना। ‘ज्ञान’ का अर्थ है—विवेक अर्थात् सत्-असत्, कर्तव्य-अकर्तव्य, नित्य-अनित्य, ग्राह्य-त्याज्य आदिका ज्ञान होना।

सम्बन्ध—बढ़े हुए रजोगुणके क्या लक्षण होते हैं—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥

प्रत्युत सत्त्वगुणका ही कार्य, लक्षण माने।

यहाँ ‘इति विद्यात्’ पदोंका तात्पर्य है कि तीनों गुणोंकी वृत्तियोंका पैदा होना, बढ़ना और एक गुणकी प्रधानता होनेपर दूसरे दो गुणोंका दबना आदि-आदि परिवर्तन गुणोंमें ही होते हैं, स्वरूपमें नहीं—इस बातको मनुष्यशरीरमें ही ठीक तरहसे समझा जा सकता है। परन्तु मनुष्य भगवान्के दिये विवेकको महत्त्व न देकर गुणोंके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है और अपनेको सात्त्विक, राजस या तामस मानने लगता है। मनुष्यको चाहिये कि अपनेको ऐसा न मानकर सर्वथा निर्विकार, अपरिवर्तनशील जाने।

तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ अलग-अलग बनती-बिगड़ती हैं—इसका सबको अनुभव है। स्वयं परिवर्तनरहित और इन सब वृत्तियोंको देखनेवाला है। यदि स्वयं भी बदलनेवाला होता तो इन वृत्तियोंके बनने-बिगड़नेको कौन देखता? परिवर्तनको परिवर्तनरहित ही जान सकता है।

जब सात्त्विक वृत्तियोंके बढ़नेसे इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता, निर्मलता आ जाती है और विवेक जाग्रत् हो जाता है, तब संसारसे राग हट जाता है और वैराग्य हो जाता है। अशान्ति मिट जाती है और शान्ति आ जाती है। लोभ मिट जाता है और उदारता आ जाती है। प्रवृत्ति निष्क्रामभावपूर्वक होने लगती है (गीता—अठारहवें अध्यायका नवों श्लोक)। भोग और संग्रहके लिये नये-नये कर्मोंका आरम्भ नहीं होता। मनमें पदार्थों, भोगोंकी आवश्यकता पैदा नहीं होती, प्रत्युत निर्वहमात्रकी दृष्टि रहती है। हरेक विषयको समझनेके लिये बुद्धिका विकास होता है। हरेक कार्य सावधानीपूर्वक और सुचारुरूपसे होता है। कार्योंमें भूल कम होती है। कभी भूल हो भी जाती है तो उसका सुधार होता है, लापरवाही नहीं होती। सत्-असत्, कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक स्पष्टतया जाग्रत् रहता है। अतः जिस समय सात्त्विक वृत्तियाँ बढ़ी हों, उस समय साधकको विशेषरूपसे भजन-ध्यान आदिमें लग जाना चाहिये। ऐसे समयमें किये गये थोड़े-से साधनसे भी शीघ्र ही बहुत लाभ हो सकता है।

१३०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

भरतर्षभ | = हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन! | लोभः | = लोभ, | अशमः | = अशान्ति (और) ---|---|---|---|---|--- रजसि | = रजोगुणके | प्रवृत्तिः | = प्रवृत्ति, | स्पृहा | = स्पृहा— विवृद्धे | = बढ़नेपर | कर्मणाम् | = कर्मोंका | एतानि | = ये वृत्तियाँ | | आरम्भः | = आरम्भ, | जायन्ते | = पैदा होती हैं।

व्याख्या—‘लोभः’ —निर्वाहकी चीजें पासमें होनेपर भी उनको अधिक बढ़ानेकी इच्छाका नाम ‘लोभ’ है। परन्तु उन चीजोंके स्वाभाविक बढ़नेका नाम लोभ नहीं है। जैसे, कोई खेती करता है और अनाज ज्यादा पैदा हो गया, व्यापार करता है और मुनाफा ज्यादा हो गया, तो इस तरह पदार्थ, धन आदिके स्वाभाविक बढ़नेका नाम लोभ नहीं है और यह बढ़ना दोषी भी नहीं है।

‘प्रवृत्तिः’ —कार्यमात्रमें लग जानेका नाम ‘प्रवृत्ति’ है। परन्तु राग-द्वेषरहित होकर कार्यमें लग जाना दोषी नहीं है; क्योंकि ऐसी प्रवृत्ति तो गुणातीत महापुरुषमें भी होती है (गीता—चौदहवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। रागपूर्वक अर्थात् सुख, आराम, धन आदिकी इच्छाको लेकर क्रियामें प्रवृत्त हो जाना ही दोषी है।

‘आरम्भः कर्मणाम्’ —संसारमें धनी और बड़ा कहलानेके लिये; मान, आदर, प्रशंसा आदि पानेके लिये नये-नये कर्म करना, नये-नये व्यापार शुरू करना, नयी-नयी फैक्टरियाँ खोलना, नयी-नयी दूकानें खोलना आदि ‘कर्मोंका आरम्भ’ है। प्रवृत्ति और आरम्भ—इन दोनोंमें अन्तर है। परिस्थितिके आनेपर किसी कार्यमें प्रवृत्ति होती है और किसी कार्यसे निवृत्ति होती है। परन्तु भोग और संग्रहके उद्देश्यसे नये-नये कर्मोंको शुरू करना ‘आरम्भ’ है।

मनुष्यजन प्राप्त होनेपर केवल परमात्मत्वकी प्राप्तिका ही उद्देश्य रहे, भोग और संग्रहका उद्देश्य बिल्कुल न रहे—इसी दृष्टिसे भक्तियोग और ज्ञानयोगमें ‘सर्वारम्भपरित्यागी ’ (बारहवें अध्यायका सोलहवाँ और चौदहवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक) पदसे सम्पूर्ण आरम्भोंका त्याग करनेके लिये कहा गया है। कर्मयोगमें कर्मिक आरम्भ तो होते हैं, पर

परिशिष्ट भाव —रजोगुणके बढ़नेपर सत्त्वगुणके प्रकाश और ज्ञान दब जाते हैं। रजोगुण असंगताका विरोधी है—‘रजो रागात्मकं विद्धि ’ (गीता १४।७)। क्रिया और पदार्थका संग करनेके कारण यह मनुष्यको योगारूढ़ नहीं होने देता। कारण कि मनुष्य क्रिया और पदार्थसे असंग होनेपर ही योगारूढ़ होता है (गीता—छठे अध्यायका चौथा श्लोक)।

सम्बन्ध—बढ़े हुए तमोगुणके क्या लक्षण होते हैं—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥

वे सभी आरम्भ कामना और संकल्पसे रहित होते हैं (गीता—चौथे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। कर्मयोगमें ऐसे आरम्भ दोषी भी नहीं हैं; क्योंकि कर्मयोगमें कर्म करनेका विधान है और बिना कर्म किये कर्मयोगी योग-(समता-) पर आरूढ़ नहीं हो सकता (गीता—छठे अध्यायका तीसरा श्लोक)। अतः आसक्तिरहित होकर प्राप्त परिस्थितिके अनुसार कर्मिक आरम्भ किये जायें, तो वे आरम्भ-आरम्भ नहीं हैं, प्रत्युत प्रवृत्तिमात्र ही हैं; क्योंकि उनसे कर्म करनेका राग मिटता है। वे आरम्भ निवृत्ति देनेवाले होनेसे दोषी नहीं हैं।

‘अशमः’ —अन्तःकरणमें अशान्ति, हलचल रहनेका नाम ‘अशम’ है। जैसी इच्छा करते हैं, वैसी चीजें (धन, सम्पत्ति, यश, प्रतिष्ठा आदि) जब नहीं मिलतीं, तब अन्तःकरणमें अशान्ति, हलचल होती है। कामनाका त्याग करनेपर यह अशान्ति नहीं रहती।

‘स्पृहा’ —स्पृहा नाम परवाहका है; जैसे—भूख लगनेपर अन्नकी, प्यास लगनेपर जलकी, जाड़ा लगनेपर कपड़ेकी परवाह, आवश्यकता होती है। वास्तवमें भूख, प्यास और जाड़ा—इनका ज्ञान होना दोषी नहीं है, प्रत्युत अन्न, जल आदि मिल जाय—ऐसी इच्छा करना ही दोषी है। साधकको इस इच्छाका त्याग करना चाहिये; क्योंकि कोई भी वस्तु इच्छाके अधीन नहीं है।

‘रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ’ —जब भीतरमें रजोगुण बढ़ता है, तब उपर्युक्त लोभ, प्रवृत्ति आदि वृत्तियाँ बढ़ती हैं। ऐसे समयमें साधकको यह विचार करना चाहिये कि अपना जीवन-निर्वाह तो हो ही रहा है, फिर अपने लिये और क्या चाहिये? ऐसा विचार करके रजोगुणकी वृत्तियोंको मिटा दे, उनसे उदासीन हो जाय।

श्लोक १३ ] * साधक-संजीवनी * १३१

कुरुनन्दन = हे कुरुनन्दन ! अप्रवृत्ति: = अप्रवृत्ति, मोह: = मोह

तमसि = तमोगुणके च = तथा एतानि = -ये वृत्तियाँ

विवृद्धे = बढ़नेपर प्रमाद: = प्रमाद एव = भी

अप्रकाश: = अप्रकाश, च = और जायन्ते = पैदा होती हैं ।

व्याख्या - 'अप्रकाश:' - सत्त्वगुणकी प्रकाश पहचान तो वृत्तियोंसे ही होती है; क्योंकि वृत्तियाँ स्थूल

(स्वच्छता-) वृत्तिको दबाकर जब तमोगुण बढ़ जाता है, होनेसे वे इन्द्रियाँ और अन्तःकरणका विषय हो जाती हैं।

तब इन्द्रियाँ और अन्तःकरणमें स्वच्छता नहीं रहती। इन्द्रियाँ इसलिये भगवान्ने ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें

और अन्तःकरणमें जो समझनेकी शक्ति है, वह तमोगुणके श्लोकमें क्रमशः तीनों गुणोंकी वृत्तियोंका ही वर्णन किया

बढ़नेपर लुप्त हो जाती है अर्थात् पहली बात तो याद रहती है, जिससे अतीन्द्रिय गुणोंकी पहचान हो जाय और साधक

नहीं और नया विवेक पैदा होता नहीं। इस वृत्तिको यहाँ सावधानीपूर्वक रजोगुण-तमोगुणका त्याग करके सत्त्वगुणकी

'अप्रकाश' कहकर इसका सत्त्वगुणकी वृत्ति 'प्रकाश' के वृद्धि कर सके।

साथ विरोध बताया गया है। मार्मिक बात

'अप्रवृत्ति:' - रजोगुणकी वृत्ति 'प्रवृत्ति' को दबाकर सत्त्व, रज और तम - तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ स्वाभाविक

जब तमोगुण बढ़ जाता है, तब कार्य करनेका मन नहीं ही उत्पन्न, नष्ट तथा कम-अधिक होती रहती हैं। ये सभी

करता। निरर्थक बैठे रहने अथवा पड़े रहनेका मन करता परिवर्तनशील हैं। साधक अपने जीवनमें इन वृत्तियोंके

है। आवश्यक कार्यको करनेकी भी रुचि नहीं होती। यह परिवर्तनका अनुभव भी करता है। इससे सिद्ध होता है कि

सब 'अप्रवृत्ति' वृत्तिका काम है। तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ बदलनेवाली हैं और इनके परिवर्तनको

'प्रमाद:' - न करनेलायक काममें लग जाना और जाननेवाले पुरुषमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। तीनों

करनेलायक कामको न करना, तथा जिन कामोंको करनेसे गुणोंकी वृत्तियाँ दृश्य हैं और पुरुष इनको देखनेवाला होनेसे

न पारमार्थिक उन्नति होती है, न सांसारिक उन्नति होती है, द्रष्टा है। द्रष्टा दृश्यसे सर्वथा भिन्न होता है - यह नियम

न समाजका कोई काम होता है और जो शरीरके लिये भी है। दृश्यकी तरफ दृष्टि होनेसे ही द्रष्टा संज्ञा होती है।

आवश्यक नहीं है - ऐसे बीड़ी-सिगरेट, ताश-चौपड़, खेल- दृश्यपर दृष्टि न रहनेपर द्रष्टा संज्ञारहित रहता है। भूल यह

तमाशे आदि कार्योंमें लग जाना 'प्रमाद' वृत्तिका काम है। होती है कि दृश्यको अपनेमें आरोपित करके वह 'मैं कामी

'मोह:' - तमोगुणके बढ़नेपर जब 'मोह' वृत्ति आ हूँ', 'मैं क्रोधी हूँ' आदि मान लेता है।

जाती है, तब भीतरमें विवेक-विरोधी भाव पैदा होने लगते काम-क्रोधादि विकारोंसे सम्बन्ध जोड़कर उन्हें अपनेमें

हैं। क्रियाके करने और न करनेमें विवेक काम नहीं करता, मान लेना उन विकारोंको निमन्त्रण देना है और उन्हें स्थायी

प्रत्युत मूढ़ता छायी रहती है, जिससे पारमार्थिक और बनाना है। मनुष्य भूलसे क्रोध आनेके समय क्रोधको

व्यावहारिक काम करनेकी सामर्थ्य नहीं रहती। उचित समझता है और कहता है कि यह तो सभीको आता

'एव च' - इन पदोंसे अधिक निद्रा लेना, अपने जीवनका है और अन्य समय 'मेरा क्रोधी स्वभाव है' - ऐसा भाव

समय निरर्थक नष्ट करना, धन निरर्थक नष्ट करना आदि रखता है। इस प्रकार 'मैं क्रोधी हूँ' ऐसा मान लेनेसे वह

जितने भी निरर्थक कार्य हैं, उन सबको ले लेना चाहिये। क्रोध अहंतामें बैठ जाता है। फिर क्रोधरूप विकारसे छूटना

'तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन' - ये सब कठिन हो जाता है। यही कारण है कि साधक प्रयत्न

बढ़े हुए तमोगुणके लक्षण हैं अर्थात् जब ये अप्रकाश, करनेपर भी क्रोधादि विकारोंको दूर नहीं कर पाता और

अप्रवृत्ति आदि दिखायी दें, तब समझना चाहिये कि उनसे अपनी हार मान लेता है।

सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ा है। काम-क्रोधादि विकारोंको दूर करनेका मुख्य और

सत्त्व, रज और तम - ये तीनों ही गुण सूक्ष्म होनेसे सुगम उपाय यह है कि साधक इनको अपनेमें कभी माने

अतीन्द्रिय हैं अर्थात् इन्द्रियाँ और अन्तःकरणके विषय नहीं ही नहीं। वास्तवमें विकार निरन्तर नहीं रहते, प्रत्युत विकाररहित

हैं। इसलिये ये तीनों गुण साक्षात् दीखनेमें नहीं आते, इनके अवस्था निरन्तर रहती है। कारण कि विकार तो आते और

स्वरूपका साक्षात् ज्ञान नहीं होता। इन गुणोंका ज्ञान, इनकी चले जाते हैं, पर स्वयं निरन्तर निर्विकार रहता है। क्रोधादि

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

विकार भी अपनेमें नहीं, प्रत्युत मन-बुद्धिमें आते हैं। परन्तु साधक मन-बुद्धिसे मिलकर उन विकारोंको भूलसे अपनेमें मान लेता है। अगर वह विकारोंको अपनेमें न माने, तो उनसे माना हुआ सम्बन्ध मिट जाता है। फिर विकारोंको दूर करना नहीं पड़ता, प्रत्युत वे अपने-आप दूर हो जाते हैं। जैसे, क्रोधके आनेपर साधक ऐसा विचार करे कि 'मैं तो वही हूँ; मैं आने-जानेवाले क्रोधसे कभी मिल सकता ही नहीं।' ऐसा विचार दृढ़ होनेपर क्रोधका वेग कम हो जायगा और वह पहलेकी अपेक्षा कम बार आयेगा। फिर अन्तमें वह सर्वथा दूर हो जायगा।

भगवान् पूर्वीक तीन श्लोकोंमें क्रमशः सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी बुद्धिके लक्षणोंका वर्णन करके साधकको सावधान करते हैं कि गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही गुणोंमें होनेवाली वृत्तियाँ उसको अपनेमें प्रतीत होती हैं, वास्तवमें साधकका इनके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। गुण एवं गुणोंकी वृत्तियाँ प्रकृतिका

कार्य होनेसे परिवर्तनशील हैं और स्वयं पुरुष परमात्माका अंश होनेसे अपरिवर्तनशील है। प्रकृति और पुरुष—दोनों विजातीय हैं। बदलनेवालेके साथ न बदलनेवालेका एकात्मभाव हो ही कैसे सकता है? इस वास्तविकताकी तरफ दृष्टि रखनेसे तमोगुण और रजोगुण दब जाते हैं तथा साधकमें सत्त्वगुणकी बुद्धि स्वतः हो जाती है। सत्त्वगुणमें भोग-बुद्धि होनेसे अर्थात् उससे होनेवाले सुखमें राग होनेसे यह सत्त्वगुण भी गुणातीत होनेमें बाधा उत्पन्न कर देता है। अतः साधकको सत्त्वगुणसे उत्पन्न सुखका भी उपभोग नहीं करना चाहिये। सात्त्विक सुखका उपभोग करना रजोगुण-अंश है। रजोगुणमें राग बढ़नेपर रागमें बाधा देनेवालेके प्रति क्रोध पैदा होकर सम्मोह हो जाता है और रागके अनुसार पदार्थ मिलनेपर लोभ पैदा होकर सम्मोह हो जाता है। इस प्रकार सम्मोह पैदा होनेसे वह रजोगुणसे तमोगुणमें चला जाता है और उसका पतन हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)।

परिशिष्ट भाव —अप्रकाश और अप्रवृत्ति तो सत्त्वगुण और रजोगुणके विरोधी हैं तथा प्रमाद और मोह तमोगुणके अपने हैं।

सम्बन्ध—तात्कालिक बदे हुए गुणोंकी वृत्तियोंका फल क्या होता है—इसे आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभूत्।

तदोत्तमविदां

लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥

यदा= जिस समयतु= यदि
सत्त्वे= सत्त्वगुणदेहभूत्= देहधारी मनुष्य
प्रवृद्धे= बढ़ाप्रलयम्= मर जाता है
हो,याति(तो वह)
तदा= उस समय

व्याख्या —'यदा सत्त्वे प्रवृद्धे' 'प्रतिपद्यते'—जिस कालमें जिस-किसी भी देहधारी मनुष्यमें, चाहे वह सत्त्वगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी ही क्यों न हो, जिस-किसी कारणसे सत्त्वगुण तात्कालिक बढ़ जाता है अर्थात् सत्त्व-गुणके कार्य स्वच्छता, निर्मलता आदि वृत्तियाँ तात्कालिक बढ़ जाती हैं, उस समय अगर उस मनुष्यके प्राण छूट जाते हैं, तो वह उत्तम (शुभ) कर्म करनेवालोंके निर्मल लोकोंमें चला जाता है।

'उत्तमविदाम्' कहनेका तात्पर्य है कि जो मनुष्य उत्तम (शुभ) कर्म ही करते हैं, अशुभ-कर्म कभी करते

ही नहीं अर्थात् उत्तम ही उनके भाव हैं, उत्तम ही उनके कर्म हैं और उत्तम ही उनका ज्ञान है, ऐसे पुण्यकर्म लोगोंका जिन लोकोंपर अधिकार हो जाता है, उन्हीं निर्मल लोकोंमें वह मनुष्य चला जाता है, जिसका शरीर सत्त्वगुणके बढ़नेपर छूटा है। तात्पर्य है कि उग्रभर शुभ-कर्म करनेवालोंको जिन ऊँचे-ऊँचे लोकोंकी प्राप्ति होती है, उन्हीं लोकोंमें तात्कालिक बदे हुए सत्त्वगुणकी वृत्तियोंमें प्राण छूटनेवाला जाता है।

सत्त्वगुणकी बुद्धिमें शरीर छोड़नेवाले मनुष्य पुण्यात्माओंके प्राप्त्य ऊँचे लोकोंमें जाते हैं—इससे

श्लोक १५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१३३

सिद्ध होता है कि गुणोंसे उत्पन्न होनेवाली वृत्तियाँ कर्मोंकी अपेक्षा कमजोर नहीं हैं। अतः सात्त्विक वृत्ति भी पुण्यकर्मके समान ही श्रेष्ठ है। इस दृष्टिसे शास्त्रविहित पुण्यकर्मोंमें भी भावका ही महत्त्व है, पुण्यकर्मविशेषका नहीं। इसलिये सात्त्विक भावका स्थान बहुत ऊँचा है। पदार्थ, क्रिया, भाव और उद्देश्य—ये चारों क्रमशः एक-दूसरेसे ऊँचे होते हैं।

रजोगुण और तमोगुणकी अपेक्षा सत्त्वगुणकी वृत्ति सूक्ष्म और व्यापक होती है। लोकमें भी स्थूलकी अपेक्षा सूक्ष्मका आहार कम होता है; जैसे—देवतालोग सूक्ष्म होनेसे केवल सुगन्धिसे ही तृप्त हो जाते हैं। हाँ, स्थूलकी अपेक्षा सूक्ष्ममें शक्ति अवश्य अधिक होती है। यही कारण है कि सूक्ष्मभावकी प्रधानतासे अन्तसमयमें सत्त्वगुणकी वृद्धि

परिशिष्ट भाव—‘तदोत्तमविदां लोकानमलान्’ —विवेकवान् पुरुष उत्तमवेत्ता हैं। यदि सत्त्वगुणको अपना मानकर उसमें रमण न करे और भगवान्की सममुखता रहे तो सात्त्विक मनुष्य सत्त्वगुणसे भी असंग (गुणातीत) होकर भगवान्के परमधामको चला जायगा, अन्यथा सत्त्वगुणका सम्बन्ध रहनेपर वह ब्रह्मलोकतकके ऊँचे लोकोंको चला जायगा।

‘अमलान्’ —ब्रह्मलोकतकके लोकोंमें तो सापेक्ष निर्मलता है, पर भगवान्के परमधाममें निरपेक्ष निर्मलता है।

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्धिषु जायते।

तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥

रजसि= रजोगुणके बढ़नेपरजायते= जन्म लेता है
प्रलयम्, गत्वा=मरनेवाला प्राणीतथा= तथा
कर्मसङ्धिषु= कर्मसंगीतमसि= तमोगुणके
मनुष्योनिमेंबढ़नेपर
प्रलीनः = मरनेवाला
मूढयोनिषु = मूढ़ योनियोंमें
जायते = जन्म
लेता है।

व्याख्या—‘रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते’ —अन्तसमयमें जिस-किसी भी मनुष्यमें जिस-किसी कारणसे रजोगुणकी लोभ, प्रवृत्ति, अशान्ति, सृष्टा आदि वृत्तियाँ बढ़ जाती हैं और उसी वृत्तिके चिन्तनमें उसका शरीर छूट जाता है, तो वह मृतात्मा प्राणी कर्मोंमें आसक्ति रखनेवाले मनुष्योंमें जन्म लेता है।

जिसने उभ्रभर अच्छे काम, आचरण किये हैं, जिसके अच्छे भाव रहे हैं, वह यदि अन्तकालमें रजोगुणके बढ़नेपर मर जाता है, तो मरनेके बाद मनुष्योनिमें जन्म लेनेपर भी उसके आचरण, भाव अच्छे ही रहेंगे, वह शुभ-कर्म करने-वाला ही होगा। जिसका साधारण जीवन रहा है, वह यदि अन्तसमयमें रजोगुणकी लोभ आदि वृत्तियोंके बढ़नेपर मर जाता है, तो वह मनुष्योनिमें आकर पदार्थ, व्यक्ति, क्रिया

मनुष्यको ऊँचे लोकोंमें ले जाती है।

‘अमलान्’ कहनेका तात्पर्य है कि सत्त्वगुणका स्वरूप निर्मल है; अतः सत्त्वगुणके बढ़नेपर जो मरता है, उसको निर्मल लोकोंकी ही प्राप्ति होती है।

यहाँ यह शंका होती है कि उभ्रभर शुभ-कर्म करनेवालोंको जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है, उन लोकोंमें सत्त्वगुणकी वृत्ति बढ़नेपर मरनेवाला कैसे चला जायगा? भगवान्की यह एक विशेष छूट है कि अन्तकालमें मनुष्यकी जैसी मति होती है, वैसी ही उसकी गति होती है (गीता—आठवें अध्यायका छठों श्लोक)। अतः सत्त्वगुणकी वृत्तिके बढ़नेपर शरीर छोड़नेवाला मनुष्य उत्तम लोकोंमें चला जाय—इसमें शंकाकी कोई बात ही नहीं है।

आदिमें आसक्तिवाला ही होगा। जिसके जीवनमें काम, क्रोध आदिकी ही मुख्यता रही है, वह यदि रजोगुणके बढ़नेपर मरता है, तो वह मनुष्योनिमें जन्म लेनेपर भी विशेषरूपसे आसुरी सम्पत्तिवाला ही होगा। तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यलोकमें जन्म लेनेपर भी गुणोंके तारतम्यसे मनुष्योंके तीन प्रकार हो जाते हैं अर्थात् तीन प्रकारके स्वभाववाले मनुष्य हो जाते हैं। परन्तु इसमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि रजोगुणकी वृद्धिपर मरकर मनुष्य बननेवाले प्राणी कैसे ही आचरणोंवाले क्यों न हों, उन सबमें भगवत्प्रदत्त विवेक रहता ही है। अतः प्रत्येक मनुष्य इस विवेकको महत्त्व देकर; सत्संग, स्वाध्याय आदिसे इस विवेकको स्वच्छ करके ऊँचे उठ सकते हैं, परमात्माको प्राप्त कर सकते हैं। इस भगवत्प्रदत्त विवेकके कारण सब-के-

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

सब मनुष्य भगवत्प्राप्तिके अधिकारी हो जाते हैं।

‘तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते’—अन्त-कालमें, जिस-किसी भी मनुष्यमें, जिस-किसी कारणसे तात्कालिक तमोगुण बढ़ जाता है अर्थात् तमोगुणकी प्रमाद, मोह, अप्रकाश आदि वृत्तियाँ बढ़ जाती हैं और उन वृत्तियोंका चिन्तन करते हुए ही वह मरता है, तो वह मनुष्य पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष, लता आदि मूढयोनियोंमें जन्म लेता है। इन मूढयोनियोंमें मूढ़ता तो सबमें रहती है, पर वह न्यूनाधिकरूपसे रहती है; जैसे—वृक्ष, लता आदि योनियोंमें जितनी अधिक मूढ़ता होती है, उतनी मूढ़ता पशु, पक्षी आदि योनियोंमें नहीं होती।

परिशिष्ट भाव —रजोगुणमें ‘राग’-अंश ही बाँधनेवाला, जन्म-मरण देनेवाला है, ‘क्रिया’-अंश नहीं। राग होनेके कारण ही ‘कर्मसंगिषु जायते’ कहा है। क्रियारूपसे रजोगुण तो गुणातीतमें भी होता है—‘प्रकाशं च प्रवृत्तिं च’ (गीता १४।२२)। पदार्थ, क्रिया अथवा व्यक्ति—किसीमें भी राग हो जायगा तो वह कर्मसंगी मनुष्ययोनियें जन्म लेगा। मनुष्य स्वाभाविक कर्मसंगी है; क्योंकि कर्म करनेका अधिकार मनुष्ययोनियें ही है—‘कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके’ (गीता १५।२)।

सम्बन्ध—अन्तकालमें गुणोंके तात्कालिक बढ़नेपर मरनेवाले मनुष्योंकी ऐसी गतियाँ क्यों होती हैं—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।

रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥

विवेकी पुरुषोंने—

सुकृतस्य = शुभ कर्मणः = कर्मका तु = तो सात्त्विकम् = सात्त्विक निर्मलम् = निर्मल

फलम् = फल आहुः = कहा है, रजसः = राजस कर्मका फलम् = फल दुःखम् = दुःख (कहा है और)

तमसः = तामस कर्मका फलम् = फल अज्ञानम् = अज्ञान (मूढ़ता) (कहा है)।

व्याख्या —[वास्तवमें कर्म न सात्त्विक होते हैं, न राजस होते हैं और न तामस ही होते हैं। सभी कर्म क्रियामात्र ही होते हैं। वास्तवमें उन कर्मोंको करनेवाला कर्ता ही सात्त्विक, राजस और तामस होता है। सात्त्विक कर्ताके द्वारा किया हुआ कर्म ‘सात्त्विक’, राजस कर्ताके द्वारा किया हुआ कर्म ‘राजस’ और तामस कर्ताके द्वारा किया हुआ कर्म ‘तामस’ कहा जाता है।]

‘कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्’ —सत्त्वगुणका स्वरूप निर्मल, स्वच्छ, निर्विकार है। अतः सत्त्वगुणवाला कर्ता जो कर्म करेगा, वह कर्म सात्त्विक ही होगा; क्योंकि कर्म कर्ताका ही रूप होता है। इस सात्त्विक कर्मके फलरूपमें जो परिस्थिति बनेगी, वह भी वैसे ही शुद्ध, निर्मल, सुखदायी होगी।

अच्छे काम करनेवाला मनुष्य यदि अन्तसमयमें तमोगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरकर मूढयोनियोंमें भी चला जाय, तो वहाँ भी उसके गुण, आचरण अच्छे ही होंगे, उसका स्वभाव अच्छे काम करनेका ही होगा। जैसे, भरत मुनिका अन्तसमयमें तमोगुणकी वृत्तिमें अर्थात् हरिणके चिन्तनमें शरीर छूटा, तो वे मूढयोनिवाले हरिण बन गये। परन्तु उनका मनुष्यजन्ममें किया हुआ त्याग, तप हरिणके जन्ममें भी वैसा ही बना रहा। वे हरिणयोनियें भी अपनी माताके साथ नहीं रहे, हरे पते न खाकर सूखे पते ही खाते रहे, आदि। ऐसी सावधानी मनुष्योंमें भी बहुत कम होती है, जो कि भरत मुनिकी हरिणजन्ममें थी।

फलेच्छरहित होकर कर्म करनेपर भी जबतक सत्त्व-गुणके साथ कर्ताका सम्बन्ध रहता है, तबतक उसकी ‘सात्त्विक कर्ता’ संज्ञा होती है और तभीतक उसके कर्मोंका फल बनता है। परन्तु जब गुणोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब उसकी ‘सात्त्विक कर्ता’ संज्ञा नहीं होती और उसके द्वारा किये हुए कर्मोंका फल भी नहीं बनता, प्रत्युत उसके द्वारा किये हुए कर्म अकर्म हो जाते हैं।

‘रजसस्तु फलं दुःखम्’ —रजोगुणका स्वरूप रागात्मक है। अतः रागवाले कर्ताके द्वारा जो कर्म होगा, वह कर्म भी राजस ही होगा और उस राजस कर्मका फल भोग होगा। तात्पर्य है कि उस राजस कर्मसे पदार्थोंका भोग होगा, शरीरमें सुख-आराम आदिका भोग होगा, संसारमें

श्लोक १७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१३५

आदर-सत्कार आदिका भोग होगा, और मरनेके बाद स्वर्गादि लोकोंके भोगोंकी प्राप्ति होगी। परन्तु ये जितने भी सम्बन्धजन्य भोग हैं, वे सब-के-सब दुःखोंके ही कारण हैं—'ये हि संसर्पजा भोगा दुःखयोनय एव ते' (गीता ५।२२) अर्थात् जन्म-मरण देनेवाले हैं। इसी दृष्टिसे भगवान्ने यहाँ राजस कर्मका फल दुःख कहा है।

रजोगुणसे दो चीजें पैदा होती हैं—पाप और दुःख। रजोगुणी मनुष्य वर्तमानमें पाप करता है और परिणाममें उन पापोंका फल दुःख भोगता है। तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें अर्जुनके द्वारा 'मनुष्य न चाहता हुआ भी पाप क्यों करता है?' ऐसा पूछनेपर उत्तरमें भगवान्ने रजोगुणसे उत्पन्न होनेवाली कामनाको ही पाप करनेमें हेतु बताया है!

'अज्ञानं तमसः फलम्'— तमोगुणका स्वरूप मोहान्तक है। अतः मोहवाला तामस कर्ता परिणाम, हिंसा, हानि और सामर्थ्यको न देखकर मूढ़तापूर्वक जो कुछ कर्म करेगा, वह कर्म तामस ही होगा और उस तामस कर्मका फल अज्ञान अर्थात् अज्ञानबहुल योनियोंकी प्राप्ति ही होगा। उस कर्मके अनुसार उसका पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष, लता, पहाड़ आदि मूढ़योनियोंमें जन्म होगा, जिनमें अज्ञान-(मूढ़ता-) की मुख्यता रहती है।

इस श्लोकका निष्कर्ष यह निकला कि सात्त्विक

परिशिष्ट भाव—रजोगुणका स्वरूप राग है और उस रागके कारण ही दुःख होता है—'रजसस्तु फलं दुःखम्'। संसारके सभी दुःख और पाप रागके कारण ही होते हैं। रागके कारण ही काम पैदा होता है—'काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः' (गीता ३।३७)।

'अज्ञानं तमसः फलम्'—तमोगुण ज्ञान, प्रकाश, विवेक नहीं होने देता; क्योंकि तमोगुण अज्ञानको उत्पन्न करनेवाला और अज्ञानसे ही उत्पन्न होनेवाला है (इसी अध्यायका आठवाँ और सत्रहवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने गुणोंकी तात्कालिक वृत्तियोंके बढ़नेपर जो गतियाँ होती हैं, उनके मूलमें सात्त्विक, राजस और तामस कर्म बताये। अब सात्त्विक, राजस और तामस कर्मोंके मूलमें गुणोंको बतानेके लिये भगवान् आगेका श्लोक कहते हैं।

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥

सत्त्वात्= सत्त्वगुणसेएव= हीअज्ञानम्= अज्ञान
ज्ञानम्= ज्ञानसञ्जायते= उत्पन्न होते हैं।एव= भी
= औरतमसः= तमोगुणसेभवतः= उत्पन्न होते हैं।
रजसः= रजोगुणसेप्रमादमोहौ= प्रमाद, मोह
लोभः= लोभ (आदि)= एवं

व्याख्या—'सत्त्वात्संजायते ज्ञानम्'—सत्त्वगुणसे ज्ञान होता है अर्थात् सुकृत-दुष्कृत कर्मोंका विवेक जाग्रत् होता है। उस विवेकसे मनुष्य सुकृत, सत्कर्म ही करता है। उन सुकृत कर्मोंका फल सात्त्विक, निर्मल होता है।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

‘रजसो लोभ एव च’—रजोगुणसे लोभ आदि पैदा होते हैं। लोभको लेकर मनुष्य जो कर्म करता है, उन कर्मोंका फल दुःख होता है।

जितना मिला है, उसकी वृद्धि चाहनेका नाम लोभ है। लोभके दो रूप हैं—उचित खर्च न करना और अनुचित रीतिसे संग्रह करना। उचित कामोंमें धन खर्च न करनेसे, उससे जी चुरानेसे मनुष्यके मनमें अशान्ति, हलचल रहती है और अनुचित रीतिसे अर्थात् झूठ, कपट आदिसे धनका संग्रह करनेसे पाप बनते हैं, जिससे नरकोंमें तथा चौरासी लाख योनियोंमें दुःख भोगना पड़ता है। इस दृष्टिसे राजस कर्मोंका फल दुःख होता है।

‘प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च’— तमोगुणसे प्रमाद, मोह और अज्ञान पैदा होता है। इन तीनोंके बुद्धिमें आनेसे विवेक-विरुद्ध काम होते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक), जिससे अज्ञान ही बढ़ता है, दृढ़ होता है।

यहाँ तो तमोगुणसे अज्ञानका पैदा होना बताया है और इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें अज्ञानसे तमोगुणका पैदा होना बताया है। इसका तात्पर्य यह है कि जैसे वृक्षसे बीज पैदा होते हैं और उन बीजोंसे आगे बहुत-से वृक्ष पैदा होते हैं, ऐसे ही तमोगुणसे अज्ञान पैदा होता है और अज्ञानसे तमोगुण बढ़ता है, पुष्ट होता है।

पहले आठवें श्लोकमें भगवान्ने प्रमाद, आलस्य और निद्रा—ये तीन बताये। परन्तु तेरहवें श्लोकमें और यहाँ प्रमाद तो बताया, पर निद्रा नहीं बतायी। इससे यह सिद्ध होता है कि आवश्यक निद्रा तमोगुणी नहीं है और निषिद्ध भी नहीं है तथा बाँधनेवाली भी नहीं है। कारण कि शरीरके लिये आवश्यक निद्रा तो सात्त्विक पुरुषको भी आती है और गुणातीत पुरुषको भी! वास्तवमें अधिक निद्रा ही बाँधनेवाली, निषिद्ध और तमोगुणी है; क्योंकि अधिक निद्रासे शरीरमें आलस्य बढ़ता है, पड़े रहनेका ही मन करता है, बहुत समय बरबाद हो जाता है।

परिशिष्ट भाव —ज्ञान (विवेक) सत्त्वगुणसे प्रकट होता है और संग न करनेपर बढ़ते-बढ़ते तत्त्वबोधतक चला जाता है अर्थात् तत्त्वबोधमें परिणत हो जाता है। परन्तु लोभ, प्रमाद, मोह, अज्ञान बढ़ते हैं तो कोई नुकसान बाकी नहीं रहता, कोई दुःख बाकी नहीं रहता, कोई मूढ़यौनि बाकी नहीं रहती, कोई नरक बाकी नहीं रहता।

सम्बन्ध—तात्कालिक गुणोंके बढ़नेपर मरनेवालोंकी गतिका वर्णन तो चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें कर दिया; परन्तु जिनके जीवनमें सत्त्वगुण, रजोगुण अथवा तमोगुणकी प्रधानता रहती है, उनकी (मरनेपर) क्या गति होती है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

विशेष बात

यह जीव साक्षात् परमात्माका अंश होते हुए भी जब प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब इसका प्रकृतिजन्म गुणोंके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है। फिर गुणोंके अनुसार उसके अन्तःकरणमें वृत्तियाँ पैदा होती हैं। उन वृत्तियोंके अनुसार कर्म होते हैं और इन्हीं कर्मोंका फल ऊँच-नीच गतियाँ होती हैं। तात्पर्य है कि जीवित-अवस्थामें अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती हैं और मरनेके बाद ऊँच-नीच गतियाँ होती हैं। वास्तवमें उन कर्मोंके मूलमें भी गुणोंकी वृत्तियाँ ही होती हैं, जो कि पुनर्जन्मके होनेमें खास कारण हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि गुणोंका संग कर्मोंसे कमजोर नहीं है। जैसे कर्म शुभ-अशुभ फल देते हैं, ऐसे ही गुणोंका संग भी शुभ-अशुभ फल देता है (गीता—आठवें अध्यायका छठा श्लोक)। इसीलिये पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतकके इस प्रकरणमें पहले चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें गुणोंकी तात्कालिक वृत्तियोंके बढ़नेका फल बताया और जीवित-अवस्थामें जो परिस्थितियाँ आती हैं, उनको सोलहवें श्लोकमें बताया तथा आगे अठारहवें श्लोकमें गुणोंकी स्थायी वृत्तियोंका फल बताये। अतः वृत्तियों और कर्मोंके होनेमें गुण ही मुख्य हैं। इस पूरे प्रकरणमें गुणोंकी मुख्य बात इसी (सत्रहवें) श्लोकमें कही गयी है।

जिसका उद्देश्य संसार नहीं है, प्रत्युत परमात्मा है, वह साधारण मनुष्योंकी तरह प्रकृतिमें स्थित नहीं है। अतः उसमें प्रकृतिजन्म गुणोंकी परवशता नहीं रहती और साधन करते-करते आगे चलकर जब अहंता परिवर्तित होकर लक्ष्यकी दृढ़ता हो जाती है, तब उसको अपने स्वतःसिद्ध गुणातीत स्वरूपका अनुभव हो जाता है। इसीका नाम बोध है। इस बोधके विषयमें भगवान्ने इस अध्यायका पहला-दूसरा श्लोक कहा और गुणातीतके विषयमें बाईसवेंसे छब्बीसवेंतकके पाँच श्लोक कहे। इस तरह यह पूरा अध्याय गुणोंसे अतीत स्वतःसिद्ध स्वरूपका अनुभव करनेके लिये ही कहा गया है।

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

१३७

ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।

जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥

सत्त्वस्थाः | = सत्त्वगुणमें स्थित | मध्ये | = मृत्युलोकमें | वृत्तिमें | ---|---|---|---|---|--- | मनुष्य | तिष्ठन्ति | = जन्म लेते हैं | स्थित | ऊर्ध्वम् | = ऊर्ध्वलोकोंमें | | (और) | तामसाः | = तामस गच्छन्ति | = जाते हैं, | जघन्यगुण- | | मनुष्य | राजसाः | = रजोगुणमें स्थित | वृत्तिस्थाः | = निन्दनीय | अधः | = अधोगतिमें मनुष्य | | | तमोगुणकी | गच्छन्ति | = जाते हैं ।

व्याख्या— 'ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्थाः'—जिनके जीवनमें सत्त्वगुणकी प्रधानता रही है और उसके कारण जिन्होंने भोगोंसे संयम किया है; तीर्थ, व्रत, दान आदि शुभ-कर्म किये हैं; दूसरोंके सुख-आरामके लिये प्याऊ, अन्नक्षेत्र आदि चलाये हैं; सड़के बनवायी हैं; पशु-पक्षियोंकी सुख-सुविधाके लिये पेड़-पौधे लगाये हैं; गौशालाएँ बनवायी हैं, उन मनुष्योंको यहाँ 'सत्त्वस्थाः' कहा गया है। जब सत्त्वगुणकी प्रधानतामें ही ऐसे मनुष्योंका शरीर छूट जाता है, तब वे सत्त्वगुणका संग होनेसे, सत्त्वगुणमें आसक्ति होनेसे स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें चले जाते हैं। उन लोकोंका वर्णन इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें 'उत्तमविदां अमलान् लोकान्' पदोंसे किया गया है। ऊर्ध्वलोकोंमें जानेवाले मनुष्योंको तेजस्तत्त्वप्रधान शरीरकी प्राप्ति होती है।

'मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः' —जिन मनुष्योंके जीवनमें रजोगुणकी प्रधानता होती है और उसके कारण जो शास्त्रकी मर्यादामें रहते हुए ही संग्रह करना और भोग भोगना; ऐश-आराम करना; पदार्थमें ममता, आसक्ति रखना आदिमें लगे रहते हैं, उनको यहाँ 'राजसाः' कहा गया है। जब रजोगुणकी प्रधानतामें ही अर्थात् रजोगुणके कार्याके चिन्तनमें ही ऐसे मनुष्योंका शरीर छूट जाता है, तब वे पुनः इस मृत्युलोकमें ही जन्म लेते हैं। यहाँ उनको पृथ्वीतत्त्वप्रधान मनुष्यशरीरकी प्राप्ति होती है।

यहाँ 'तिष्ठन्ति' पद देनेका तात्पर्य है कि वे राजस मनुष्य अभी जैसे इस मृत्युलोकमें हैं, मरनेके बाद वे पुनः मृत्युलोकमें आकर ऐसे ही बन जाते हैं अर्थात् जैसे पहले थे, वैसे ही बन जाते हैं। वे अशुद्ध आचरण नहीं करते, शास्त्रकी मर्यादा भंग नहीं करते, प्रत्युत शास्त्रकी मर्यादामें ही रहते हैं और शुद्ध आचरण करते हैं; परन्तु पदार्थ, व्यक्तियों आदिमें राग, आसक्ति, ममता रहनेके कारण वे पुनः मृत्युलोकमें ही जन्म लेते हैं।

'जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः' —जिन मनुष्योंके जीवनमें तमोगुणकी प्रधानता रहती है और उसके कारण जिन्होंने प्रमाद आदिके वशमें होकर निरर्थक पैसा और समय बरबाद किया है; जो आलस्य तथा नींदमें ही पड़े रहे हैं; आवश्यक कार्योंको भी जिन्होंने समयपर नहीं किया है; जो दूसरोंका अहित ही सोचते आये हैं; जिन्होंने दूसरोंका अहित किया है, दूसरोंको दुःख दिया है; जिन्होंने झूठ, कपट, चोरी, डकैती आदि निन्दनीय कर्म किये हैं, ऐसे मनुष्योंको यहाँ 'जघन्यगुणवृत्तिस्थाः' कहा गया है। जब तमोगुणकी प्रधानतामें ही अर्थात् तमोगुणके कार्याके चिन्तनमें ही ऐसे मनुष्य मर जाते हैं, तब वे अधोगतिमें चले जाते हैं।

अधोगतिके दो भेद हैं—योनिविशेष और स्थान-विशेष। पशु, पक्षी, कीट, पतंग, साँप, बिच्छू, भूत-प्रेत आदि 'योनिविशेष' अधोगति है और वैतरिणी, असिपत्र, लालाभक्ष, कुम्भीपाक, रौरव, महारौरव आदि नरकके कुण्ड 'स्थानविशेष' अधोगति है। जिनके जीवनमें सत्त्वगुण अथवा रजोगुण रहते हुए भी अन्तसमयमें तात्कालिक तमोगुण बढ़ जाता है, वे मनुष्य मरनेके बाद 'योनिविशेष' अधोगतिमें अर्थात् मूढ़योनियोंमें चले जाते हैं (गीता—चौदहवें अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक)। जिनके जीवनमें तमोगुणकी प्रधानता रही है और उसी तमोगुणकी प्रधानतामें जिनका शरीर छूट जाता है, वे मनुष्य मरनेके बाद 'स्थानविशेष' अधोगतिमें अर्थात् नरकोंमें चले जाते हैं (गीता—सोलहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि सात्त्विक, राजस अथवा तामस मनुष्यका अन्तिम चिन्तन और हो जानेसे उनकी गति तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार ही होगी, पर सुख-दुःखका भोग उनके कर्मोंके अनुसार ही होगा। जैसे—कर्म तो अच्छे हैं, पर अन्तिम चिन्तन कुत्तेका हो गया, तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार वह कुत्ता बन जायगा; परन्तु उस योनिमें भी उसको

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

कर्मके अनुसार बहुत सुख-आराम मिलेगा। कर्म तो बुरे हैं, पर अन्तिम चिन्तन मनुष्य आदिका हो गया, तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार वह मनुष्य बन जायगा; परन्तु उसको कर्मके फलरूपमें भयंकर परिस्थिति मिलेगी। उसके शरीरमें रोग-ही-रोग रहेंगे। खानेके लिये अन्न, पीनेके लिये जल और पहननेके लिये कपड़ा भी कठिनाईसे मिलेगा।

सात्त्विक गुणको बढ़ानेके लिये साधक सत्-शास्त्रोंके पढ़नेमें लगा रहे। खाना-पीना भी सात्त्विक करे, राजस-तामस खान-पान न करे। सात्त्विक श्रेष्ठ मनुष्योंका ही संग करे, उन्हींके सान्निध्यमें रहे, उनके कहे अनुसार साधन करे। शुद्ध, पवित्र तीर्थ आदि स्थानोंका सेवन करे; जहाँ कोलाहल होता हो, ऐसे राजस स्थानोंका और जहाँ अण्डा, माँस, मदिरा बिकती हो, ऐसे तामस स्थानोंका सेवन न करे। प्रातःकाल और सार्यकालका समय सात्त्विक माना जाता है; अतः इस सात्त्विक समयका विशेषतासे सदुपयोग करे अर्थात् इसे भजन, ध्यान आदिमें लगाये। शास्त्रविहित शुभ-कर्म ही करे, निषिद्ध कर्म कभी न करे; राजस-तामस कर्म कभी न करे। जो जिस वर्ण, आश्रममें स्थित है, उसीमें अपने-अपने कर्तव्यका ठीक तरहसे पालन करे। ध्यान भगवान्का ही करे। मन्त्र भी सात्त्विक ही जपे। इस प्रकार सब कुछ सात्त्विक करनेसे पुराने संस्कार मिट जाते हैं और सात्त्विक संस्कार (सत्त्वगुण) बढ़ जाते हैं। श्रीमद्भगवतमें गुणोंको बढ़ानेवाले दस हेतु बताये गये हैं—

आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च।

ध्यानं मनोऽथ संस्कारो दशते गुणहेतवः॥

(११।१३।४)

‘शास्त्र, जल (खान-पान), प्रजा (संग), स्थान, समय, कर्म, जन्म, ध्यान, मन्त्र और संस्कार—ये दस वस्तुएँ यदि सात्त्विक हों तो सत्त्वगुणकी, राजसी हों तो रजोगुणकी और तामसी हों तो तमोगुणकी वृद्धि करती हैं।’

विशेष बात

अन्तसमयमें रजोगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरनेवाला मनुष्य मनुष्यलोकमें जन्म लेता है (इसी अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक) और रजोगुणकी प्रधानतावाला मनुष्य मरकर फिर इस मनुष्यलोकमें ही आता है (इसी अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)—इन दोनों बातोंसे यही सिद्ध होता है कि इस मनुष्यलोकके सभी मनुष्य रजोगुणवाले ही होते हैं; सत्त्वगुण और तमोगुण इनमें नहीं होता। अगर

वास्तवमें ऐसी ही बात है, तो फिर सत्त्वगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरनेवाला (इसी अध्यायका चौदहवाँ श्लोक) और सत्त्वगुणमें स्थित रहनेवाला मनुष्य ऊँचे लोकोंमें जाता है (इसी अध्यायका अठारहवाँ श्लोक), तथा तमोगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरनेवाला (इसी अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक) और तमोगुणमें स्थित रहनेवाला मनुष्य अधोगतिमें जाता है (इसी अध्यायका अठारहवाँ श्लोक); सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं (इसी अध्यायका पाँचवाँ श्लोक); यह सारा संसार तीनों गुणोंसे मोहित है (सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक); सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीन प्रकारके कर्ता कहे जाते हैं (अठारहवें अध्यायके छब्बीसवेंसे अठ्ठाईसवें श्लोक तक); यह सम्पूर्ण त्रिलोकी त्रिगुणात्मक है (अठारहवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक), आदि बातें भगवान्ने कैसे कही हैं?

इस शंकाका समाधान यह है कि ऊर्ध्वगतिमें सत्त्वगुणकी प्रधानता तो है, पर साथमें रजोगुण-तमोगुण भी रहते हैं। इसलिये देवताओंके भी सात्त्विक, राजस और तामस स्वभाव होते हैं। अतः सत्त्वगुणकी प्रधानता होनेपर भी उसमें अवान्तर भेद रहते हैं। ऐसे ही मध्यगतिमें रजोगुणकी प्रधानता होनेपर भी साथमें सत्त्वगुण-तमोगुण रहते हैं। इसलिये मनुष्योंके भी सात्त्विक, राजस और तामस स्वभाव होते हैं। अधोगतिमें तमोगुणकी प्रधानता है, पर साथमें सत्त्वगुण-रजोगुण भी रहते हैं। इसलिये पशु, पक्षी आदिमें तथा भूत, प्रेत, गृह्यक आदिमें और नरकोंके प्राणियोंमें भी भिन्न-भिन्न स्वभाव होता है। कई सौम्य स्वभावके होते हैं, कई मध्यम स्वभावके होते हैं और कई क्रूर स्वभावके होते हैं। तात्पर्य है कि जहाँ किसी भी गुणके साथ सम्बन्ध है, वहाँ तीनों गुण रहेंगे ही। इसलिये भगवान्ने (अठारहवें अध्यायके चालीसवें श्लोकमें) कहा है कि त्रिलोकीमें ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो तीनों गुणोंसे रहित हो।

ऊर्ध्वगतिमें सत्त्वगुणकी प्रधानता, रजोगुणकी गौणता और तमोगुणकी अत्यन्त गौणता रहती है। मध्यगतिमें रजोगुणकी प्रधानता, सत्त्वगुणकी गौणता और तमोगुणकी अत्यन्त गौणता रहती है। अधोगतिमें तमोगुणकी प्रधानता, रजोगुणकी गौणता और सत्त्वगुणकी अत्यन्त गौणता रहती है। तात्पर्य है कि सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणोंकी प्रधानतावालोंमें भी अधिक, मध्यम और कनिष्ठमात्रोंमें प्रत्येक गुण रहता है। इस तरह गुणोंके सैकड़ों-हजारों

श्लोक १९ ]

  • साधक-संजीवनी *

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सूक्ष्म भेद हो जाते हैं। अतः गुणोंके तारतम्यसे प्रत्येक प्राणीका अलग-अलग स्वभाव होता है।

अपने कहलानेवाले अन्तःकरणमें सात्त्विक, राजस और तामस वृत्तियोंके आनेपर भी वह गुणातीत ही रहता है (चौदहवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। अतः भगवान्‌की उपासना करना और गुणातीत महापुरुषका संग करना—ये दोनों ही निर्गुण होनेसे साधकको गुणातीत करनेवाले हैं।

जैसे भगवान्‌के द्वारा सात्त्विक, राजस और तामस कार्य होते हुए भी वे गुणातीत ही रहते हैं (सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक), ऐसे ही गुणातीत महापुरुषके

परिशिष्ट भाव—तमोगुण थोड़ा बढ़नेपर मनुष्य मूढ़ योनियोंमें जाता है और ज्यादा बढ़नेपर नरकोंमें जाता है।

सम्बन्ध—पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतक प्रकृतिके कार्य गुणोंका परिचय देकर अब आगेके दो श्लोकोंमें स्वयंको तीनों गुणोंसे अतीत अनुभव करनेका वर्णन करते हैं।

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥

यदा = जब द्रष्टा = विवेकी (विचार-कुशल) मनुष्य गुणेभ्यः = तीनों गुणोंके (सिवाय) अन्यम् = अन्य किसीको कर्तारम् = कर्ता न = नहीं अनुपश्यति = देखता च = और (अपनेको) गुणेभ्यः = गुणोंसे परम् = पर वेत्ति = अनुभव करता है, (तब) सः = वह मद्भावम् = मेरे सत्स्वरूपको अधिगच्छति = प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—'नान्यं गुणेभ्यः .................... मद्भावं सोऽधिगच्छति'—गुणोंके सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं अर्थात् सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंसे ही हो रही हैं, सम्पूर्ण परिवर्तन गुणोंमें ही हो रहा है। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण क्रियाओं और परिवर्तनोंमें गुण ही कारण हैं और कोई कारण नहीं है। वे गुण जिससे प्रकाशित होते हैं, वह तत्त्व गुणोंसे पर है। गुणोंसे पर होनेसे वह कभी गुणोंसे लिप्त नहीं होता अर्थात् गुणों और क्रियाओंका उसपर कोई असर नहीं पड़ता। ऐसे उस तत्त्वको जो विचार-कुशल साधक

जान लेता है अर्थात् विवेकके द्वारा अपने-आपको गुणोंसे पर, असम्बद्ध, निर्लिप्त अनुभव कर लेता है कि गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध न कभी हुआ है, न है, न होगा और न हो ही सकता है। कारण कि गुण परिवर्तनशील हैं और स्वयंमें कभी परिवर्तन होता ही नहीं। वह फिर मेरे भावको, मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य है कि वह जो भूलसे गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मानता था, वह मान्यता मिट जाती है और मेरे साथ उसका जो स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है, वह ज्यों-का-त्यों रह जाता है।

परिशिष्ट भाव—'गुणेभ्यश्च परं वेत्ति' का तात्पर्य है कि जिससे गुण प्रकाशित होते हैं, उस प्रकाशकमें अपनी स्थितिका अनुभव करना (गीता-तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।

'मद्भावं सोऽधिगच्छति' पदोंका अर्थ है कि वह मेरे भावको अर्थात् ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। इसी बातको दूसरे श्लोकमें 'मम साधर्म्यमागताः' पदोंसे कहा गया है।

विवेकी साधक गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे अर्थात् क्रिया और पदार्थसे असंग अनुभव करता है। क्रिया और पदार्थसे असंग अनुभव करनेपर वह योगारूढ़ हो जाता है—'यदा हि नेन्द्रियार्थेषु........' (गीता ६।४)। योगारूढ़ होनेसे शान्तिकी प्राप्ति होती है और उस शान्तिमें न अटकनेसे परमात्माकी प्राप्ति होती है।