श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 934, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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सिद्ध होता है कि गुणोंसे उत्पन्न होनेवाली वृत्तियाँ कर्मोंकी अपेक्षा कमजोर नहीं हैं। अतः सात्त्विक वृत्ति भी पुण्यकर्मके समान ही श्रेष्ठ है। इस दृष्टिसे शास्त्रविहित पुण्यकर्मोंमें भी भावका ही महत्त्व है, पुण्यकर्मविशेषका नहीं। इसलिये सात्त्विक भावका स्थान बहुत ऊँचा है। पदार्थ, क्रिया, भाव और उद्देश्य—ये चारों क्रमशः एक-दूसरेसे ऊँचे होते हैं।
रजोगुण और तमोगुणकी अपेक्षा सत्त्वगुणकी वृत्ति सूक्ष्म और व्यापक होती है। लोकमें भी स्थूलकी अपेक्षा सूक्ष्मका आहार कम होता है; जैसे—देवतालोग सूक्ष्म होनेसे केवल सुगन्धिसे ही तृप्त हो जाते हैं। हाँ, स्थूलकी अपेक्षा सूक्ष्ममें शक्ति अवश्य अधिक होती है। यही कारण है कि सूक्ष्मभावकी प्रधानतासे अन्तसमयमें सत्त्वगुणकी वृद्धि
परिशिष्ट भाव—‘तदोत्तमविदां लोकानमलान्’ —विवेकवान् पुरुष उत्तमवेत्ता हैं। यदि सत्त्वगुणको अपना मानकर उसमें रमण न करे और भगवान्की सममुखता रहे तो सात्त्विक मनुष्य सत्त्वगुणसे भी असंग (गुणातीत) होकर भगवान्के परमधामको चला जायगा, अन्यथा सत्त्वगुणका सम्बन्ध रहनेपर वह ब्रह्मलोकतकके ऊँचे लोकोंको चला जायगा।
‘अमलान्’ —ब्रह्मलोकतकके लोकोंमें तो सापेक्ष निर्मलता है, पर भगवान्के परमधाममें निरपेक्ष निर्मलता है।
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्धिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥
| रजसि | = रजोगुणके बढ़नेपर | जायते | = जन्म लेता है |
|---|---|---|---|
| प्रलयम्, गत्वा= | मरनेवाला प्राणी | तथा | = तथा |
| कर्मसङ्धिषु | = कर्मसंगी | तमसि | = तमोगुणके |
| मनुष्योनिमें | बढ़नेपर | ||
| प्रलीनः = मरनेवाला | |||
| मूढयोनिषु = मूढ़ योनियोंमें | |||
| जायते = जन्म | |||
| लेता है। |
व्याख्या—‘रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते’ —अन्तसमयमें जिस-किसी भी मनुष्यमें जिस-किसी कारणसे रजोगुणकी लोभ, प्रवृत्ति, अशान्ति, सृष्टा आदि वृत्तियाँ बढ़ जाती हैं और उसी वृत्तिके चिन्तनमें उसका शरीर छूट जाता है, तो वह मृतात्मा प्राणी कर्मोंमें आसक्ति रखनेवाले मनुष्योंमें जन्म लेता है।
जिसने उभ्रभर अच्छे काम, आचरण किये हैं, जिसके अच्छे भाव रहे हैं, वह यदि अन्तकालमें रजोगुणके बढ़नेपर मर जाता है, तो मरनेके बाद मनुष्योनिमें जन्म लेनेपर भी उसके आचरण, भाव अच्छे ही रहेंगे, वह शुभ-कर्म करने-वाला ही होगा। जिसका साधारण जीवन रहा है, वह यदि अन्तसमयमें रजोगुणकी लोभ आदि वृत्तियोंके बढ़नेपर मर जाता है, तो वह मनुष्योनिमें आकर पदार्थ, व्यक्ति, क्रिया
मनुष्यको ऊँचे लोकोंमें ले जाती है।
‘अमलान्’ कहनेका तात्पर्य है कि सत्त्वगुणका स्वरूप निर्मल है; अतः सत्त्वगुणके बढ़नेपर जो मरता है, उसको निर्मल लोकोंकी ही प्राप्ति होती है।
यहाँ यह शंका होती है कि उभ्रभर शुभ-कर्म करनेवालोंको जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है, उन लोकोंमें सत्त्वगुणकी वृत्ति बढ़नेपर मरनेवाला कैसे चला जायगा? भगवान्की यह एक विशेष छूट है कि अन्तकालमें मनुष्यकी जैसी मति होती है, वैसी ही उसकी गति होती है (गीता—आठवें अध्यायका छठों श्लोक)। अतः सत्त्वगुणकी वृत्तिके बढ़नेपर शरीर छोड़नेवाला मनुष्य उत्तम लोकोंमें चला जाय—इसमें शंकाकी कोई बात ही नहीं है।
आदिमें आसक्तिवाला ही होगा। जिसके जीवनमें काम, क्रोध आदिकी ही मुख्यता रही है, वह यदि रजोगुणके बढ़नेपर मरता है, तो वह मनुष्योनिमें जन्म लेनेपर भी विशेषरूपसे आसुरी सम्पत्तिवाला ही होगा। तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यलोकमें जन्म लेनेपर भी गुणोंके तारतम्यसे मनुष्योंके तीन प्रकार हो जाते हैं अर्थात् तीन प्रकारके स्वभाववाले मनुष्य हो जाते हैं। परन्तु इसमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि रजोगुणकी वृद्धिपर मरकर मनुष्य बननेवाले प्राणी कैसे ही आचरणोंवाले क्यों न हों, उन सबमें भगवत्प्रदत्त विवेक रहता ही है। अतः प्रत्येक मनुष्य इस विवेकको महत्त्व देकर; सत्संग, स्वाध्याय आदिसे इस विवेकको स्वच्छ करके ऊँचे उठ सकते हैं, परमात्माको प्राप्त कर सकते हैं। इस भगवत्प्रदत्त विवेकके कारण सब-के-