श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १४ ]
विकार भी अपनेमें नहीं, प्रत्युत मन-बुद्धिमें आते हैं। परन्तु साधक मन-बुद्धिसे मिलकर उन विकारोंको भूलसे अपनेमें मान लेता है। अगर वह विकारोंको अपनेमें न माने, तो उनसे माना हुआ सम्बन्ध मिट जाता है। फिर विकारोंको दूर करना नहीं पड़ता, प्रत्युत वे अपने-आप दूर हो जाते हैं। जैसे, क्रोधके आनेपर साधक ऐसा विचार करे कि 'मैं तो वही हूँ; मैं आने-जानेवाले क्रोधसे कभी मिल सकता ही नहीं।' ऐसा विचार दृढ़ होनेपर क्रोधका वेग कम हो जायगा और वह पहलेकी अपेक्षा कम बार आयेगा। फिर अन्तमें वह सर्वथा दूर हो जायगा।
भगवान् पूर्वीक तीन श्लोकोंमें क्रमशः सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी बुद्धिके लक्षणोंका वर्णन करके साधकको सावधान करते हैं कि गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही गुणोंमें होनेवाली वृत्तियाँ उसको अपनेमें प्रतीत होती हैं, वास्तवमें साधकका इनके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। गुण एवं गुणोंकी वृत्तियाँ प्रकृतिका
कार्य होनेसे परिवर्तनशील हैं और स्वयं पुरुष परमात्माका अंश होनेसे अपरिवर्तनशील है। प्रकृति और पुरुष—दोनों विजातीय हैं। बदलनेवालेके साथ न बदलनेवालेका एकात्मभाव हो ही कैसे सकता है? इस वास्तविकताकी तरफ दृष्टि रखनेसे तमोगुण और रजोगुण दब जाते हैं तथा साधकमें सत्त्वगुणकी बुद्धि स्वतः हो जाती है। सत्त्वगुणमें भोग-बुद्धि होनेसे अर्थात् उससे होनेवाले सुखमें राग होनेसे यह सत्त्वगुण भी गुणातीत होनेमें बाधा उत्पन्न कर देता है। अतः साधकको सत्त्वगुणसे उत्पन्न सुखका भी उपभोग नहीं करना चाहिये। सात्त्विक सुखका उपभोग करना रजोगुण-अंश है। रजोगुणमें राग बढ़नेपर रागमें बाधा देनेवालेके प्रति क्रोध पैदा होकर सम्मोह हो जाता है और रागके अनुसार पदार्थ मिलनेपर लोभ पैदा होकर सम्मोह हो जाता है। इस प्रकार सम्मोह पैदा होनेसे वह रजोगुणसे तमोगुणमें चला जाता है और उसका पतन हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)।
परिशिष्ट भाव —अप्रकाश और अप्रवृत्ति तो सत्त्वगुण और रजोगुणके विरोधी हैं तथा प्रमाद और मोह तमोगुणके अपने हैं।
सम्बन्ध—तात्कालिक बदे हुए गुणोंकी वृत्तियोंका फल क्या होता है—इसे आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभूत्।
तदोत्तमविदां
लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥
| यदा | = जिस समय | तु | = यदि |
|---|---|---|---|
| सत्त्वे | = सत्त्वगुण | देहभूत् | = देहधारी मनुष्य |
| प्रवृद्धे | = बढ़ा | प्रलयम् | = मर जाता है |
| हो, | याति | (तो वह) | |
| तदा | = उस समय |
व्याख्या —'यदा सत्त्वे प्रवृद्धे' 'प्रतिपद्यते'—जिस कालमें जिस-किसी भी देहधारी मनुष्यमें, चाहे वह सत्त्वगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी ही क्यों न हो, जिस-किसी कारणसे सत्त्वगुण तात्कालिक बढ़ जाता है अर्थात् सत्त्व-गुणके कार्य स्वच्छता, निर्मलता आदि वृत्तियाँ तात्कालिक बढ़ जाती हैं, उस समय अगर उस मनुष्यके प्राण छूट जाते हैं, तो वह उत्तम (शुभ) कर्म करनेवालोंके निर्मल लोकोंमें चला जाता है।
'उत्तमविदाम्' कहनेका तात्पर्य है कि जो मनुष्य उत्तम (शुभ) कर्म ही करते हैं, अशुभ-कर्म कभी करते
ही नहीं अर्थात् उत्तम ही उनके भाव हैं, उत्तम ही उनके कर्म हैं और उत्तम ही उनका ज्ञान है, ऐसे पुण्यकर्म लोगोंका जिन लोकोंपर अधिकार हो जाता है, उन्हीं निर्मल लोकोंमें वह मनुष्य चला जाता है, जिसका शरीर सत्त्वगुणके बढ़नेपर छूटा है। तात्पर्य है कि उग्रभर शुभ-कर्म करनेवालोंको जिन ऊँचे-ऊँचे लोकोंकी प्राप्ति होती है, उन्हीं लोकोंमें तात्कालिक बदे हुए सत्त्वगुणकी वृत्तियोंमें प्राण छूटनेवाला जाता है।
सत्त्वगुणकी बुद्धिमें शरीर छोड़नेवाले मनुष्य पुण्यात्माओंके प्राप्त्य ऊँचे लोकोंमें जाते हैं—इससे