श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 932, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १३ ] * साधक-संजीवनी * १३१
कुरुनन्दन = हे कुरुनन्दन ! अप्रवृत्ति: = अप्रवृत्ति, मोह: = मोह
तमसि = तमोगुणके च = तथा एतानि = -ये वृत्तियाँ
विवृद्धे = बढ़नेपर प्रमाद: = प्रमाद एव = भी
अप्रकाश: = अप्रकाश, च = और जायन्ते = पैदा होती हैं ।
व्याख्या - 'अप्रकाश:' - सत्त्वगुणकी प्रकाश पहचान तो वृत्तियोंसे ही होती है; क्योंकि वृत्तियाँ स्थूल
(स्वच्छता-) वृत्तिको दबाकर जब तमोगुण बढ़ जाता है, होनेसे वे इन्द्रियाँ और अन्तःकरणका विषय हो जाती हैं।
तब इन्द्रियाँ और अन्तःकरणमें स्वच्छता नहीं रहती। इन्द्रियाँ इसलिये भगवान्ने ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें
और अन्तःकरणमें जो समझनेकी शक्ति है, वह तमोगुणके श्लोकमें क्रमशः तीनों गुणोंकी वृत्तियोंका ही वर्णन किया
बढ़नेपर लुप्त हो जाती है अर्थात् पहली बात तो याद रहती है, जिससे अतीन्द्रिय गुणोंकी पहचान हो जाय और साधक
नहीं और नया विवेक पैदा होता नहीं। इस वृत्तिको यहाँ सावधानीपूर्वक रजोगुण-तमोगुणका त्याग करके सत्त्वगुणकी
'अप्रकाश' कहकर इसका सत्त्वगुणकी वृत्ति 'प्रकाश' के वृद्धि कर सके।
साथ विरोध बताया गया है। मार्मिक बात
'अप्रवृत्ति:' - रजोगुणकी वृत्ति 'प्रवृत्ति' को दबाकर सत्त्व, रज और तम - तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ स्वाभाविक
जब तमोगुण बढ़ जाता है, तब कार्य करनेका मन नहीं ही उत्पन्न, नष्ट तथा कम-अधिक होती रहती हैं। ये सभी
करता। निरर्थक बैठे रहने अथवा पड़े रहनेका मन करता परिवर्तनशील हैं। साधक अपने जीवनमें इन वृत्तियोंके
है। आवश्यक कार्यको करनेकी भी रुचि नहीं होती। यह परिवर्तनका अनुभव भी करता है। इससे सिद्ध होता है कि
सब 'अप्रवृत्ति' वृत्तिका काम है। तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ बदलनेवाली हैं और इनके परिवर्तनको
'प्रमाद:' - न करनेलायक काममें लग जाना और जाननेवाले पुरुषमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। तीनों
करनेलायक कामको न करना, तथा जिन कामोंको करनेसे गुणोंकी वृत्तियाँ दृश्य हैं और पुरुष इनको देखनेवाला होनेसे
न पारमार्थिक उन्नति होती है, न सांसारिक उन्नति होती है, द्रष्टा है। द्रष्टा दृश्यसे सर्वथा भिन्न होता है - यह नियम
न समाजका कोई काम होता है और जो शरीरके लिये भी है। दृश्यकी तरफ दृष्टि होनेसे ही द्रष्टा संज्ञा होती है।
आवश्यक नहीं है - ऐसे बीड़ी-सिगरेट, ताश-चौपड़, खेल- दृश्यपर दृष्टि न रहनेपर द्रष्टा संज्ञारहित रहता है। भूल यह
तमाशे आदि कार्योंमें लग जाना 'प्रमाद' वृत्तिका काम है। होती है कि दृश्यको अपनेमें आरोपित करके वह 'मैं कामी
'मोह:' - तमोगुणके बढ़नेपर जब 'मोह' वृत्ति आ हूँ', 'मैं क्रोधी हूँ' आदि मान लेता है।
जाती है, तब भीतरमें विवेक-विरोधी भाव पैदा होने लगते काम-क्रोधादि विकारोंसे सम्बन्ध जोड़कर उन्हें अपनेमें
हैं। क्रियाके करने और न करनेमें विवेक काम नहीं करता, मान लेना उन विकारोंको निमन्त्रण देना है और उन्हें स्थायी
प्रत्युत मूढ़ता छायी रहती है, जिससे पारमार्थिक और बनाना है। मनुष्य भूलसे क्रोध आनेके समय क्रोधको
व्यावहारिक काम करनेकी सामर्थ्य नहीं रहती। उचित समझता है और कहता है कि यह तो सभीको आता
'एव च' - इन पदोंसे अधिक निद्रा लेना, अपने जीवनका है और अन्य समय 'मेरा क्रोधी स्वभाव है' - ऐसा भाव
समय निरर्थक नष्ट करना, धन निरर्थक नष्ट करना आदि रखता है। इस प्रकार 'मैं क्रोधी हूँ' ऐसा मान लेनेसे वह
जितने भी निरर्थक कार्य हैं, उन सबको ले लेना चाहिये। क्रोध अहंतामें बैठ जाता है। फिर क्रोधरूप विकारसे छूटना
'तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन' - ये सब कठिन हो जाता है। यही कारण है कि साधक प्रयत्न
बढ़े हुए तमोगुणके लक्षण हैं अर्थात् जब ये अप्रकाश, करनेपर भी क्रोधादि विकारोंको दूर नहीं कर पाता और
अप्रवृत्ति आदि दिखायी दें, तब समझना चाहिये कि उनसे अपनी हार मान लेता है।
सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ा है। काम-क्रोधादि विकारोंको दूर करनेका मुख्य और
सत्त्व, रज और तम - ये तीनों ही गुण सूक्ष्म होनेसे सुगम उपाय यह है कि साधक इनको अपनेमें कभी माने
अतीन्द्रिय हैं अर्थात् इन्द्रियाँ और अन्तःकरणके विषय नहीं ही नहीं। वास्तवमें विकार निरन्तर नहीं रहते, प्रत्युत विकाररहित
हैं। इसलिये ये तीनों गुण साक्षात् दीखनेमें नहीं आते, इनके अवस्था निरन्तर रहती है। कारण कि विकार तो आते और
स्वरूपका साक्षात् ज्ञान नहीं होता। इन गुणोंका ज्ञान, इनकी चले जाते हैं, पर स्वयं निरन्तर निर्विकार रहता है। क्रोधादि