श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १४ ]
भरतर्षभ | = हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन! | लोभः | = लोभ, | अशमः | = अशान्ति (और) ---|---|---|---|---|--- रजसि | = रजोगुणके | प्रवृत्तिः | = प्रवृत्ति, | स्पृहा | = स्पृहा— विवृद्धे | = बढ़नेपर | कर्मणाम् | = कर्मोंका | एतानि | = ये वृत्तियाँ | | आरम्भः | = आरम्भ, | जायन्ते | = पैदा होती हैं।
व्याख्या—‘लोभः’ —निर्वाहकी चीजें पासमें होनेपर भी उनको अधिक बढ़ानेकी इच्छाका नाम ‘लोभ’ है। परन्तु उन चीजोंके स्वाभाविक बढ़नेका नाम लोभ नहीं है। जैसे, कोई खेती करता है और अनाज ज्यादा पैदा हो गया, व्यापार करता है और मुनाफा ज्यादा हो गया, तो इस तरह पदार्थ, धन आदिके स्वाभाविक बढ़नेका नाम लोभ नहीं है और यह बढ़ना दोषी भी नहीं है।
‘प्रवृत्तिः’ —कार्यमात्रमें लग जानेका नाम ‘प्रवृत्ति’ है। परन्तु राग-द्वेषरहित होकर कार्यमें लग जाना दोषी नहीं है; क्योंकि ऐसी प्रवृत्ति तो गुणातीत महापुरुषमें भी होती है (गीता—चौदहवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। रागपूर्वक अर्थात् सुख, आराम, धन आदिकी इच्छाको लेकर क्रियामें प्रवृत्त हो जाना ही दोषी है।
‘आरम्भः कर्मणाम्’ —संसारमें धनी और बड़ा कहलानेके लिये; मान, आदर, प्रशंसा आदि पानेके लिये नये-नये कर्म करना, नये-नये व्यापार शुरू करना, नयी-नयी फैक्टरियाँ खोलना, नयी-नयी दूकानें खोलना आदि ‘कर्मोंका आरम्भ’ है। प्रवृत्ति और आरम्भ—इन दोनोंमें अन्तर है। परिस्थितिके आनेपर किसी कार्यमें प्रवृत्ति होती है और किसी कार्यसे निवृत्ति होती है। परन्तु भोग और संग्रहके उद्देश्यसे नये-नये कर्मोंको शुरू करना ‘आरम्भ’ है।
मनुष्यजन प्राप्त होनेपर केवल परमात्मत्वकी प्राप्तिका ही उद्देश्य रहे, भोग और संग्रहका उद्देश्य बिल्कुल न रहे—इसी दृष्टिसे भक्तियोग और ज्ञानयोगमें ‘सर्वारम्भपरित्यागी ’ (बारहवें अध्यायका सोलहवाँ और चौदहवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक) पदसे सम्पूर्ण आरम्भोंका त्याग करनेके लिये कहा गया है। कर्मयोगमें कर्मिक आरम्भ तो होते हैं, पर
परिशिष्ट भाव —रजोगुणके बढ़नेपर सत्त्वगुणके प्रकाश और ज्ञान दब जाते हैं। रजोगुण असंगताका विरोधी है—‘रजो रागात्मकं विद्धि ’ (गीता १४।७)। क्रिया और पदार्थका संग करनेके कारण यह मनुष्यको योगारूढ़ नहीं होने देता। कारण कि मनुष्य क्रिया और पदार्थसे असंग होनेपर ही योगारूढ़ होता है (गीता—छठे अध्यायका चौथा श्लोक)।
सम्बन्ध—बढ़े हुए तमोगुणके क्या लक्षण होते हैं—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥
वे सभी आरम्भ कामना और संकल्पसे रहित होते हैं (गीता—चौथे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। कर्मयोगमें ऐसे आरम्भ दोषी भी नहीं हैं; क्योंकि कर्मयोगमें कर्म करनेका विधान है और बिना कर्म किये कर्मयोगी योग-(समता-) पर आरूढ़ नहीं हो सकता (गीता—छठे अध्यायका तीसरा श्लोक)। अतः आसक्तिरहित होकर प्राप्त परिस्थितिके अनुसार कर्मिक आरम्भ किये जायें, तो वे आरम्भ-आरम्भ नहीं हैं, प्रत्युत प्रवृत्तिमात्र ही हैं; क्योंकि उनसे कर्म करनेका राग मिटता है। वे आरम्भ निवृत्ति देनेवाले होनेसे दोषी नहीं हैं।
‘अशमः’ —अन्तःकरणमें अशान्ति, हलचल रहनेका नाम ‘अशम’ है। जैसी इच्छा करते हैं, वैसी चीजें (धन, सम्पत्ति, यश, प्रतिष्ठा आदि) जब नहीं मिलतीं, तब अन्तःकरणमें अशान्ति, हलचल होती है। कामनाका त्याग करनेपर यह अशान्ति नहीं रहती।
‘स्पृहा’ —स्पृहा नाम परवाहका है; जैसे—भूख लगनेपर अन्नकी, प्यास लगनेपर जलकी, जाड़ा लगनेपर कपड़ेकी परवाह, आवश्यकता होती है। वास्तवमें भूख, प्यास और जाड़ा—इनका ज्ञान होना दोषी नहीं है, प्रत्युत अन्न, जल आदि मिल जाय—ऐसी इच्छा करना ही दोषी है। साधकको इस इच्छाका त्याग करना चाहिये; क्योंकि कोई भी वस्तु इच्छाके अधीन नहीं है।
‘रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ’ —जब भीतरमें रजोगुण बढ़ता है, तब उपर्युक्त लोभ, प्रवृत्ति आदि वृत्तियाँ बढ़ती हैं। ऐसे समयमें साधकको यह विचार करना चाहिये कि अपना जीवन-निर्वाह तो हो ही रहा है, फिर अपने लिये और क्या चाहिये? ऐसा विचार करके रजोगुणकी वृत्तियोंको मिटा दे, उनसे उदासीन हो जाय।