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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

१३०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

भरतर्षभ | = हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन! | लोभः | = लोभ, | अशमः | = अशान्ति (और) ---|---|---|---|---|--- रजसि | = रजोगुणके | प्रवृत्तिः | = प्रवृत्ति, | स्पृहा | = स्पृहा— विवृद्धे | = बढ़नेपर | कर्मणाम् | = कर्मोंका | एतानि | = ये वृत्तियाँ | | आरम्भः | = आरम्भ, | जायन्ते | = पैदा होती हैं।

व्याख्या—‘लोभः’ —निर्वाहकी चीजें पासमें होनेपर भी उनको अधिक बढ़ानेकी इच्छाका नाम ‘लोभ’ है। परन्तु उन चीजोंके स्वाभाविक बढ़नेका नाम लोभ नहीं है। जैसे, कोई खेती करता है और अनाज ज्यादा पैदा हो गया, व्यापार करता है और मुनाफा ज्यादा हो गया, तो इस तरह पदार्थ, धन आदिके स्वाभाविक बढ़नेका नाम लोभ नहीं है और यह बढ़ना दोषी भी नहीं है।

‘प्रवृत्तिः’ —कार्यमात्रमें लग जानेका नाम ‘प्रवृत्ति’ है। परन्तु राग-द्वेषरहित होकर कार्यमें लग जाना दोषी नहीं है; क्योंकि ऐसी प्रवृत्ति तो गुणातीत महापुरुषमें भी होती है (गीता—चौदहवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। रागपूर्वक अर्थात् सुख, आराम, धन आदिकी इच्छाको लेकर क्रियामें प्रवृत्त हो जाना ही दोषी है।

‘आरम्भः कर्मणाम्’ —संसारमें धनी और बड़ा कहलानेके लिये; मान, आदर, प्रशंसा आदि पानेके लिये नये-नये कर्म करना, नये-नये व्यापार शुरू करना, नयी-नयी फैक्टरियाँ खोलना, नयी-नयी दूकानें खोलना आदि ‘कर्मोंका आरम्भ’ है। प्रवृत्ति और आरम्भ—इन दोनोंमें अन्तर है। परिस्थितिके आनेपर किसी कार्यमें प्रवृत्ति होती है और किसी कार्यसे निवृत्ति होती है। परन्तु भोग और संग्रहके उद्देश्यसे नये-नये कर्मोंको शुरू करना ‘आरम्भ’ है।

मनुष्यजन प्राप्त होनेपर केवल परमात्मत्वकी प्राप्तिका ही उद्देश्य रहे, भोग और संग्रहका उद्देश्य बिल्कुल न रहे—इसी दृष्टिसे भक्तियोग और ज्ञानयोगमें ‘सर्वारम्भपरित्यागी ’ (बारहवें अध्यायका सोलहवाँ और चौदहवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक) पदसे सम्पूर्ण आरम्भोंका त्याग करनेके लिये कहा गया है। कर्मयोगमें कर्मिक आरम्भ तो होते हैं, पर

परिशिष्ट भाव —रजोगुणके बढ़नेपर सत्त्वगुणके प्रकाश और ज्ञान दब जाते हैं। रजोगुण असंगताका विरोधी है—‘रजो रागात्मकं विद्धि ’ (गीता १४।७)। क्रिया और पदार्थका संग करनेके कारण यह मनुष्यको योगारूढ़ नहीं होने देता। कारण कि मनुष्य क्रिया और पदार्थसे असंग होनेपर ही योगारूढ़ होता है (गीता—छठे अध्यायका चौथा श्लोक)।

सम्बन्ध—बढ़े हुए तमोगुणके क्या लक्षण होते हैं—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥

वे सभी आरम्भ कामना और संकल्पसे रहित होते हैं (गीता—चौथे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। कर्मयोगमें ऐसे आरम्भ दोषी भी नहीं हैं; क्योंकि कर्मयोगमें कर्म करनेका विधान है और बिना कर्म किये कर्मयोगी योग-(समता-) पर आरूढ़ नहीं हो सकता (गीता—छठे अध्यायका तीसरा श्लोक)। अतः आसक्तिरहित होकर प्राप्त परिस्थितिके अनुसार कर्मिक आरम्भ किये जायें, तो वे आरम्भ-आरम्भ नहीं हैं, प्रत्युत प्रवृत्तिमात्र ही हैं; क्योंकि उनसे कर्म करनेका राग मिटता है। वे आरम्भ निवृत्ति देनेवाले होनेसे दोषी नहीं हैं।

‘अशमः’ —अन्तःकरणमें अशान्ति, हलचल रहनेका नाम ‘अशम’ है। जैसी इच्छा करते हैं, वैसी चीजें (धन, सम्पत्ति, यश, प्रतिष्ठा आदि) जब नहीं मिलतीं, तब अन्तःकरणमें अशान्ति, हलचल होती है। कामनाका त्याग करनेपर यह अशान्ति नहीं रहती।

‘स्पृहा’ —स्पृहा नाम परवाहका है; जैसे—भूख लगनेपर अन्नकी, प्यास लगनेपर जलकी, जाड़ा लगनेपर कपड़ेकी परवाह, आवश्यकता होती है। वास्तवमें भूख, प्यास और जाड़ा—इनका ज्ञान होना दोषी नहीं है, प्रत्युत अन्न, जल आदि मिल जाय—ऐसी इच्छा करना ही दोषी है। साधकको इस इच्छाका त्याग करना चाहिये; क्योंकि कोई भी वस्तु इच्छाके अधीन नहीं है।

‘रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ’ —जब भीतरमें रजोगुण बढ़ता है, तब उपर्युक्त लोभ, प्रवृत्ति आदि वृत्तियाँ बढ़ती हैं। ऐसे समयमें साधकको यह विचार करना चाहिये कि अपना जीवन-निर्वाह तो हो ही रहा है, फिर अपने लिये और क्या चाहिये? ऐसा विचार करके रजोगुणकी वृत्तियोंको मिटा दे, उनसे उदासीन हो जाय।

श्लोक १३ ] * साधक-संजीवनी * १३१

कुरुनन्दन = हे कुरुनन्दन ! अप्रवृत्ति: = अप्रवृत्ति, मोह: = मोह

तमसि = तमोगुणके च = तथा एतानि = -ये वृत्तियाँ

विवृद्धे = बढ़नेपर प्रमाद: = प्रमाद एव = भी

अप्रकाश: = अप्रकाश, च = और जायन्ते = पैदा होती हैं ।

व्याख्या - 'अप्रकाश:' - सत्त्वगुणकी प्रकाश पहचान तो वृत्तियोंसे ही होती है; क्योंकि वृत्तियाँ स्थूल

(स्वच्छता-) वृत्तिको दबाकर जब तमोगुण बढ़ जाता है, होनेसे वे इन्द्रियाँ और अन्तःकरणका विषय हो जाती हैं।

तब इन्द्रियाँ और अन्तःकरणमें स्वच्छता नहीं रहती। इन्द्रियाँ इसलिये भगवान्ने ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें

और अन्तःकरणमें जो समझनेकी शक्ति है, वह तमोगुणके श्लोकमें क्रमशः तीनों गुणोंकी वृत्तियोंका ही वर्णन किया

बढ़नेपर लुप्त हो जाती है अर्थात् पहली बात तो याद रहती है, जिससे अतीन्द्रिय गुणोंकी पहचान हो जाय और साधक

नहीं और नया विवेक पैदा होता नहीं। इस वृत्तिको यहाँ सावधानीपूर्वक रजोगुण-तमोगुणका त्याग करके सत्त्वगुणकी

'अप्रकाश' कहकर इसका सत्त्वगुणकी वृत्ति 'प्रकाश' के वृद्धि कर सके।

साथ विरोध बताया गया है। मार्मिक बात

'अप्रवृत्ति:' - रजोगुणकी वृत्ति 'प्रवृत्ति' को दबाकर सत्त्व, रज और तम - तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ स्वाभाविक

जब तमोगुण बढ़ जाता है, तब कार्य करनेका मन नहीं ही उत्पन्न, नष्ट तथा कम-अधिक होती रहती हैं। ये सभी

करता। निरर्थक बैठे रहने अथवा पड़े रहनेका मन करता परिवर्तनशील हैं। साधक अपने जीवनमें इन वृत्तियोंके

है। आवश्यक कार्यको करनेकी भी रुचि नहीं होती। यह परिवर्तनका अनुभव भी करता है। इससे सिद्ध होता है कि

सब 'अप्रवृत्ति' वृत्तिका काम है। तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ बदलनेवाली हैं और इनके परिवर्तनको

'प्रमाद:' - न करनेलायक काममें लग जाना और जाननेवाले पुरुषमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। तीनों

करनेलायक कामको न करना, तथा जिन कामोंको करनेसे गुणोंकी वृत्तियाँ दृश्य हैं और पुरुष इनको देखनेवाला होनेसे

न पारमार्थिक उन्नति होती है, न सांसारिक उन्नति होती है, द्रष्टा है। द्रष्टा दृश्यसे सर्वथा भिन्न होता है - यह नियम

न समाजका कोई काम होता है और जो शरीरके लिये भी है। दृश्यकी तरफ दृष्टि होनेसे ही द्रष्टा संज्ञा होती है।

आवश्यक नहीं है - ऐसे बीड़ी-सिगरेट, ताश-चौपड़, खेल- दृश्यपर दृष्टि न रहनेपर द्रष्टा संज्ञारहित रहता है। भूल यह

तमाशे आदि कार्योंमें लग जाना 'प्रमाद' वृत्तिका काम है। होती है कि दृश्यको अपनेमें आरोपित करके वह 'मैं कामी

'मोह:' - तमोगुणके बढ़नेपर जब 'मोह' वृत्ति आ हूँ', 'मैं क्रोधी हूँ' आदि मान लेता है।

जाती है, तब भीतरमें विवेक-विरोधी भाव पैदा होने लगते काम-क्रोधादि विकारोंसे सम्बन्ध जोड़कर उन्हें अपनेमें

हैं। क्रियाके करने और न करनेमें विवेक काम नहीं करता, मान लेना उन विकारोंको निमन्त्रण देना है और उन्हें स्थायी

प्रत्युत मूढ़ता छायी रहती है, जिससे पारमार्थिक और बनाना है। मनुष्य भूलसे क्रोध आनेके समय क्रोधको

व्यावहारिक काम करनेकी सामर्थ्य नहीं रहती। उचित समझता है और कहता है कि यह तो सभीको आता

'एव च' - इन पदोंसे अधिक निद्रा लेना, अपने जीवनका है और अन्य समय 'मेरा क्रोधी स्वभाव है' - ऐसा भाव

समय निरर्थक नष्ट करना, धन निरर्थक नष्ट करना आदि रखता है। इस प्रकार 'मैं क्रोधी हूँ' ऐसा मान लेनेसे वह

जितने भी निरर्थक कार्य हैं, उन सबको ले लेना चाहिये। क्रोध अहंतामें बैठ जाता है। फिर क्रोधरूप विकारसे छूटना

'तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन' - ये सब कठिन हो जाता है। यही कारण है कि साधक प्रयत्न

बढ़े हुए तमोगुणके लक्षण हैं अर्थात् जब ये अप्रकाश, करनेपर भी क्रोधादि विकारोंको दूर नहीं कर पाता और

अप्रवृत्ति आदि दिखायी दें, तब समझना चाहिये कि उनसे अपनी हार मान लेता है।

सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ा है। काम-क्रोधादि विकारोंको दूर करनेका मुख्य और

सत्त्व, रज और तम - ये तीनों ही गुण सूक्ष्म होनेसे सुगम उपाय यह है कि साधक इनको अपनेमें कभी माने

अतीन्द्रिय हैं अर्थात् इन्द्रियाँ और अन्तःकरणके विषय नहीं ही नहीं। वास्तवमें विकार निरन्तर नहीं रहते, प्रत्युत विकाररहित

हैं। इसलिये ये तीनों गुण साक्षात् दीखनेमें नहीं आते, इनके अवस्था निरन्तर रहती है। कारण कि विकार तो आते और

स्वरूपका साक्षात् ज्ञान नहीं होता। इन गुणोंका ज्ञान, इनकी चले जाते हैं, पर स्वयं निरन्तर निर्विकार रहता है। क्रोधादि

१३२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

विकार भी अपनेमें नहीं, प्रत्युत मन-बुद्धिमें आते हैं। परन्तु साधक मन-बुद्धिसे मिलकर उन विकारोंको भूलसे अपनेमें मान लेता है। अगर वह विकारोंको अपनेमें न माने, तो उनसे माना हुआ सम्बन्ध मिट जाता है। फिर विकारोंको दूर करना नहीं पड़ता, प्रत्युत वे अपने-आप दूर हो जाते हैं। जैसे, क्रोधके आनेपर साधक ऐसा विचार करे कि 'मैं तो वही हूँ; मैं आने-जानेवाले क्रोधसे कभी मिल सकता ही नहीं।' ऐसा विचार दृढ़ होनेपर क्रोधका वेग कम हो जायगा और वह पहलेकी अपेक्षा कम बार आयेगा। फिर अन्तमें वह सर्वथा दूर हो जायगा।

भगवान् पूर्वीक तीन श्लोकोंमें क्रमशः सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी बुद्धिके लक्षणोंका वर्णन करके साधकको सावधान करते हैं कि गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही गुणोंमें होनेवाली वृत्तियाँ उसको अपनेमें प्रतीत होती हैं, वास्तवमें साधकका इनके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। गुण एवं गुणोंकी वृत्तियाँ प्रकृतिका

कार्य होनेसे परिवर्तनशील हैं और स्वयं पुरुष परमात्माका अंश होनेसे अपरिवर्तनशील है। प्रकृति और पुरुष—दोनों विजातीय हैं। बदलनेवालेके साथ न बदलनेवालेका एकात्मभाव हो ही कैसे सकता है? इस वास्तविकताकी तरफ दृष्टि रखनेसे तमोगुण और रजोगुण दब जाते हैं तथा साधकमें सत्त्वगुणकी बुद्धि स्वतः हो जाती है। सत्त्वगुणमें भोग-बुद्धि होनेसे अर्थात् उससे होनेवाले सुखमें राग होनेसे यह सत्त्वगुण भी गुणातीत होनेमें बाधा उत्पन्न कर देता है। अतः साधकको सत्त्वगुणसे उत्पन्न सुखका भी उपभोग नहीं करना चाहिये। सात्त्विक सुखका उपभोग करना रजोगुण-अंश है। रजोगुणमें राग बढ़नेपर रागमें बाधा देनेवालेके प्रति क्रोध पैदा होकर सम्मोह हो जाता है और रागके अनुसार पदार्थ मिलनेपर लोभ पैदा होकर सम्मोह हो जाता है। इस प्रकार सम्मोह पैदा होनेसे वह रजोगुणसे तमोगुणमें चला जाता है और उसका पतन हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)।

परिशिष्ट भाव —अप्रकाश और अप्रवृत्ति तो सत्त्वगुण और रजोगुणके विरोधी हैं तथा प्रमाद और मोह तमोगुणके अपने हैं।

सम्बन्ध—तात्कालिक बदे हुए गुणोंकी वृत्तियोंका फल क्या होता है—इसे आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभूत्।

तदोत्तमविदां

लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥

यदा= जिस समयतु= यदि
सत्त्वे= सत्त्वगुणदेहभूत्= देहधारी मनुष्य
प्रवृद्धे= बढ़ाप्रलयम्= मर जाता है
हो,याति(तो वह)
तदा= उस समय

व्याख्या —'यदा सत्त्वे प्रवृद्धे' 'प्रतिपद्यते'—जिस कालमें जिस-किसी भी देहधारी मनुष्यमें, चाहे वह सत्त्वगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी ही क्यों न हो, जिस-किसी कारणसे सत्त्वगुण तात्कालिक बढ़ जाता है अर्थात् सत्त्व-गुणके कार्य स्वच्छता, निर्मलता आदि वृत्तियाँ तात्कालिक बढ़ जाती हैं, उस समय अगर उस मनुष्यके प्राण छूट जाते हैं, तो वह उत्तम (शुभ) कर्म करनेवालोंके निर्मल लोकोंमें चला जाता है।

'उत्तमविदाम्' कहनेका तात्पर्य है कि जो मनुष्य उत्तम (शुभ) कर्म ही करते हैं, अशुभ-कर्म कभी करते

ही नहीं अर्थात् उत्तम ही उनके भाव हैं, उत्तम ही उनके कर्म हैं और उत्तम ही उनका ज्ञान है, ऐसे पुण्यकर्म लोगोंका जिन लोकोंपर अधिकार हो जाता है, उन्हीं निर्मल लोकोंमें वह मनुष्य चला जाता है, जिसका शरीर सत्त्वगुणके बढ़नेपर छूटा है। तात्पर्य है कि उग्रभर शुभ-कर्म करनेवालोंको जिन ऊँचे-ऊँचे लोकोंकी प्राप्ति होती है, उन्हीं लोकोंमें तात्कालिक बदे हुए सत्त्वगुणकी वृत्तियोंमें प्राण छूटनेवाला जाता है।

सत्त्वगुणकी बुद्धिमें शरीर छोड़नेवाले मनुष्य पुण्यात्माओंके प्राप्त्य ऊँचे लोकोंमें जाते हैं—इससे

श्लोक १५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१३३

सिद्ध होता है कि गुणोंसे उत्पन्न होनेवाली वृत्तियाँ कर्मोंकी अपेक्षा कमजोर नहीं हैं। अतः सात्त्विक वृत्ति भी पुण्यकर्मके समान ही श्रेष्ठ है। इस दृष्टिसे शास्त्रविहित पुण्यकर्मोंमें भी भावका ही महत्त्व है, पुण्यकर्मविशेषका नहीं। इसलिये सात्त्विक भावका स्थान बहुत ऊँचा है। पदार्थ, क्रिया, भाव और उद्देश्य—ये चारों क्रमशः एक-दूसरेसे ऊँचे होते हैं।

रजोगुण और तमोगुणकी अपेक्षा सत्त्वगुणकी वृत्ति सूक्ष्म और व्यापक होती है। लोकमें भी स्थूलकी अपेक्षा सूक्ष्मका आहार कम होता है; जैसे—देवतालोग सूक्ष्म होनेसे केवल सुगन्धिसे ही तृप्त हो जाते हैं। हाँ, स्थूलकी अपेक्षा सूक्ष्ममें शक्ति अवश्य अधिक होती है। यही कारण है कि सूक्ष्मभावकी प्रधानतासे अन्तसमयमें सत्त्वगुणकी वृद्धि

परिशिष्ट भाव—‘तदोत्तमविदां लोकानमलान्’ —विवेकवान् पुरुष उत्तमवेत्ता हैं। यदि सत्त्वगुणको अपना मानकर उसमें रमण न करे और भगवान्की सममुखता रहे तो सात्त्विक मनुष्य सत्त्वगुणसे भी असंग (गुणातीत) होकर भगवान्के परमधामको चला जायगा, अन्यथा सत्त्वगुणका सम्बन्ध रहनेपर वह ब्रह्मलोकतकके ऊँचे लोकोंको चला जायगा।

‘अमलान्’ —ब्रह्मलोकतकके लोकोंमें तो सापेक्ष निर्मलता है, पर भगवान्के परमधाममें निरपेक्ष निर्मलता है।

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्धिषु जायते।

तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥

रजसि= रजोगुणके बढ़नेपरजायते= जन्म लेता है
प्रलयम्, गत्वा=मरनेवाला प्राणीतथा= तथा
कर्मसङ्धिषु= कर्मसंगीतमसि= तमोगुणके
मनुष्योनिमेंबढ़नेपर
प्रलीनः = मरनेवाला
मूढयोनिषु = मूढ़ योनियोंमें
जायते = जन्म
लेता है।

व्याख्या—‘रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते’ —अन्तसमयमें जिस-किसी भी मनुष्यमें जिस-किसी कारणसे रजोगुणकी लोभ, प्रवृत्ति, अशान्ति, सृष्टा आदि वृत्तियाँ बढ़ जाती हैं और उसी वृत्तिके चिन्तनमें उसका शरीर छूट जाता है, तो वह मृतात्मा प्राणी कर्मोंमें आसक्ति रखनेवाले मनुष्योंमें जन्म लेता है।

जिसने उभ्रभर अच्छे काम, आचरण किये हैं, जिसके अच्छे भाव रहे हैं, वह यदि अन्तकालमें रजोगुणके बढ़नेपर मर जाता है, तो मरनेके बाद मनुष्योनिमें जन्म लेनेपर भी उसके आचरण, भाव अच्छे ही रहेंगे, वह शुभ-कर्म करने-वाला ही होगा। जिसका साधारण जीवन रहा है, वह यदि अन्तसमयमें रजोगुणकी लोभ आदि वृत्तियोंके बढ़नेपर मर जाता है, तो वह मनुष्योनिमें आकर पदार्थ, व्यक्ति, क्रिया

मनुष्यको ऊँचे लोकोंमें ले जाती है।

‘अमलान्’ कहनेका तात्पर्य है कि सत्त्वगुणका स्वरूप निर्मल है; अतः सत्त्वगुणके बढ़नेपर जो मरता है, उसको निर्मल लोकोंकी ही प्राप्ति होती है।

यहाँ यह शंका होती है कि उभ्रभर शुभ-कर्म करनेवालोंको जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है, उन लोकोंमें सत्त्वगुणकी वृत्ति बढ़नेपर मरनेवाला कैसे चला जायगा? भगवान्की यह एक विशेष छूट है कि अन्तकालमें मनुष्यकी जैसी मति होती है, वैसी ही उसकी गति होती है (गीता—आठवें अध्यायका छठों श्लोक)। अतः सत्त्वगुणकी वृत्तिके बढ़नेपर शरीर छोड़नेवाला मनुष्य उत्तम लोकोंमें चला जाय—इसमें शंकाकी कोई बात ही नहीं है।

आदिमें आसक्तिवाला ही होगा। जिसके जीवनमें काम, क्रोध आदिकी ही मुख्यता रही है, वह यदि रजोगुणके बढ़नेपर मरता है, तो वह मनुष्योनिमें जन्म लेनेपर भी विशेषरूपसे आसुरी सम्पत्तिवाला ही होगा। तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यलोकमें जन्म लेनेपर भी गुणोंके तारतम्यसे मनुष्योंके तीन प्रकार हो जाते हैं अर्थात् तीन प्रकारके स्वभाववाले मनुष्य हो जाते हैं। परन्तु इसमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि रजोगुणकी वृद्धिपर मरकर मनुष्य बननेवाले प्राणी कैसे ही आचरणोंवाले क्यों न हों, उन सबमें भगवत्प्रदत्त विवेक रहता ही है। अतः प्रत्येक मनुष्य इस विवेकको महत्त्व देकर; सत्संग, स्वाध्याय आदिसे इस विवेकको स्वच्छ करके ऊँचे उठ सकते हैं, परमात्माको प्राप्त कर सकते हैं। इस भगवत्प्रदत्त विवेकके कारण सब-के-

१३४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

सब मनुष्य भगवत्प्राप्तिके अधिकारी हो जाते हैं।

‘तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते’—अन्त-कालमें, जिस-किसी भी मनुष्यमें, जिस-किसी कारणसे तात्कालिक तमोगुण बढ़ जाता है अर्थात् तमोगुणकी प्रमाद, मोह, अप्रकाश आदि वृत्तियाँ बढ़ जाती हैं और उन वृत्तियोंका चिन्तन करते हुए ही वह मरता है, तो वह मनुष्य पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष, लता आदि मूढयोनियोंमें जन्म लेता है। इन मूढयोनियोंमें मूढ़ता तो सबमें रहती है, पर वह न्यूनाधिकरूपसे रहती है; जैसे—वृक्ष, लता आदि योनियोंमें जितनी अधिक मूढ़ता होती है, उतनी मूढ़ता पशु, पक्षी आदि योनियोंमें नहीं होती।

परिशिष्ट भाव —रजोगुणमें ‘राग’-अंश ही बाँधनेवाला, जन्म-मरण देनेवाला है, ‘क्रिया’-अंश नहीं। राग होनेके कारण ही ‘कर्मसंगिषु जायते’ कहा है। क्रियारूपसे रजोगुण तो गुणातीतमें भी होता है—‘प्रकाशं च प्रवृत्तिं च’ (गीता १४।२२)। पदार्थ, क्रिया अथवा व्यक्ति—किसीमें भी राग हो जायगा तो वह कर्मसंगी मनुष्ययोनियें जन्म लेगा। मनुष्य स्वाभाविक कर्मसंगी है; क्योंकि कर्म करनेका अधिकार मनुष्ययोनियें ही है—‘कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके’ (गीता १५।२)।

सम्बन्ध—अन्तकालमें गुणोंके तात्कालिक बढ़नेपर मरनेवाले मनुष्योंकी ऐसी गतियाँ क्यों होती हैं—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।

रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥

विवेकी पुरुषोंने—

सुकृतस्य = शुभ कर्मणः = कर्मका तु = तो सात्त्विकम् = सात्त्विक निर्मलम् = निर्मल

फलम् = फल आहुः = कहा है, रजसः = राजस कर्मका फलम् = फल दुःखम् = दुःख (कहा है और)

तमसः = तामस कर्मका फलम् = फल अज्ञानम् = अज्ञान (मूढ़ता) (कहा है)।

व्याख्या —[वास्तवमें कर्म न सात्त्विक होते हैं, न राजस होते हैं और न तामस ही होते हैं। सभी कर्म क्रियामात्र ही होते हैं। वास्तवमें उन कर्मोंको करनेवाला कर्ता ही सात्त्विक, राजस और तामस होता है। सात्त्विक कर्ताके द्वारा किया हुआ कर्म ‘सात्त्विक’, राजस कर्ताके द्वारा किया हुआ कर्म ‘राजस’ और तामस कर्ताके द्वारा किया हुआ कर्म ‘तामस’ कहा जाता है।]

‘कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्’ —सत्त्वगुणका स्वरूप निर्मल, स्वच्छ, निर्विकार है। अतः सत्त्वगुणवाला कर्ता जो कर्म करेगा, वह कर्म सात्त्विक ही होगा; क्योंकि कर्म कर्ताका ही रूप होता है। इस सात्त्विक कर्मके फलरूपमें जो परिस्थिति बनेगी, वह भी वैसे ही शुद्ध, निर्मल, सुखदायी होगी।

अच्छे काम करनेवाला मनुष्य यदि अन्तसमयमें तमोगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरकर मूढयोनियोंमें भी चला जाय, तो वहाँ भी उसके गुण, आचरण अच्छे ही होंगे, उसका स्वभाव अच्छे काम करनेका ही होगा। जैसे, भरत मुनिका अन्तसमयमें तमोगुणकी वृत्तिमें अर्थात् हरिणके चिन्तनमें शरीर छूटा, तो वे मूढयोनिवाले हरिण बन गये। परन्तु उनका मनुष्यजन्ममें किया हुआ त्याग, तप हरिणके जन्ममें भी वैसा ही बना रहा। वे हरिणयोनियें भी अपनी माताके साथ नहीं रहे, हरे पते न खाकर सूखे पते ही खाते रहे, आदि। ऐसी सावधानी मनुष्योंमें भी बहुत कम होती है, जो कि भरत मुनिकी हरिणजन्ममें थी।

फलेच्छरहित होकर कर्म करनेपर भी जबतक सत्त्व-गुणके साथ कर्ताका सम्बन्ध रहता है, तबतक उसकी ‘सात्त्विक कर्ता’ संज्ञा होती है और तभीतक उसके कर्मोंका फल बनता है। परन्तु जब गुणोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब उसकी ‘सात्त्विक कर्ता’ संज्ञा नहीं होती और उसके द्वारा किये हुए कर्मोंका फल भी नहीं बनता, प्रत्युत उसके द्वारा किये हुए कर्म अकर्म हो जाते हैं।

‘रजसस्तु फलं दुःखम्’ —रजोगुणका स्वरूप रागात्मक है। अतः रागवाले कर्ताके द्वारा जो कर्म होगा, वह कर्म भी राजस ही होगा और उस राजस कर्मका फल भोग होगा। तात्पर्य है कि उस राजस कर्मसे पदार्थोंका भोग होगा, शरीरमें सुख-आराम आदिका भोग होगा, संसारमें

श्लोक १७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१३५

आदर-सत्कार आदिका भोग होगा, और मरनेके बाद स्वर्गादि लोकोंके भोगोंकी प्राप्ति होगी। परन्तु ये जितने भी सम्बन्धजन्य भोग हैं, वे सब-के-सब दुःखोंके ही कारण हैं—'ये हि संसर्पजा भोगा दुःखयोनय एव ते' (गीता ५।२२) अर्थात् जन्म-मरण देनेवाले हैं। इसी दृष्टिसे भगवान्ने यहाँ राजस कर्मका फल दुःख कहा है।

रजोगुणसे दो चीजें पैदा होती हैं—पाप और दुःख। रजोगुणी मनुष्य वर्तमानमें पाप करता है और परिणाममें उन पापोंका फल दुःख भोगता है। तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें अर्जुनके द्वारा 'मनुष्य न चाहता हुआ भी पाप क्यों करता है?' ऐसा पूछनेपर उत्तरमें भगवान्ने रजोगुणसे उत्पन्न होनेवाली कामनाको ही पाप करनेमें हेतु बताया है!

'अज्ञानं तमसः फलम्'— तमोगुणका स्वरूप मोहान्तक है। अतः मोहवाला तामस कर्ता परिणाम, हिंसा, हानि और सामर्थ्यको न देखकर मूढ़तापूर्वक जो कुछ कर्म करेगा, वह कर्म तामस ही होगा और उस तामस कर्मका फल अज्ञान अर्थात् अज्ञानबहुल योनियोंकी प्राप्ति ही होगा। उस कर्मके अनुसार उसका पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष, लता, पहाड़ आदि मूढ़योनियोंमें जन्म होगा, जिनमें अज्ञान-(मूढ़ता-) की मुख्यता रहती है।

इस श्लोकका निष्कर्ष यह निकला कि सात्त्विक

परिशिष्ट भाव—रजोगुणका स्वरूप राग है और उस रागके कारण ही दुःख होता है—'रजसस्तु फलं दुःखम्'। संसारके सभी दुःख और पाप रागके कारण ही होते हैं। रागके कारण ही काम पैदा होता है—'काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः' (गीता ३।३७)।

'अज्ञानं तमसः फलम्'—तमोगुण ज्ञान, प्रकाश, विवेक नहीं होने देता; क्योंकि तमोगुण अज्ञानको उत्पन्न करनेवाला और अज्ञानसे ही उत्पन्न होनेवाला है (इसी अध्यायका आठवाँ और सत्रहवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने गुणोंकी तात्कालिक वृत्तियोंके बढ़नेपर जो गतियाँ होती हैं, उनके मूलमें सात्त्विक, राजस और तामस कर्म बताये। अब सात्त्विक, राजस और तामस कर्मोंके मूलमें गुणोंको बतानेके लिये भगवान् आगेका श्लोक कहते हैं।

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥

सत्त्वात्= सत्त्वगुणसेएव= हीअज्ञानम्= अज्ञान
ज्ञानम्= ज्ञानसञ्जायते= उत्पन्न होते हैं।एव= भी
= औरतमसः= तमोगुणसेभवतः= उत्पन्न होते हैं।
रजसः= रजोगुणसेप्रमादमोहौ= प्रमाद, मोह
लोभः= लोभ (आदि)= एवं

व्याख्या—'सत्त्वात्संजायते ज्ञानम्'—सत्त्वगुणसे ज्ञान होता है अर्थात् सुकृत-दुष्कृत कर्मोंका विवेक जाग्रत् होता है। उस विवेकसे मनुष्य सुकृत, सत्कर्म ही करता है। उन सुकृत कर्मोंका फल सात्त्विक, निर्मल होता है।

१३६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

‘रजसो लोभ एव च’—रजोगुणसे लोभ आदि पैदा होते हैं। लोभको लेकर मनुष्य जो कर्म करता है, उन कर्मोंका फल दुःख होता है।

जितना मिला है, उसकी वृद्धि चाहनेका नाम लोभ है। लोभके दो रूप हैं—उचित खर्च न करना और अनुचित रीतिसे संग्रह करना। उचित कामोंमें धन खर्च न करनेसे, उससे जी चुरानेसे मनुष्यके मनमें अशान्ति, हलचल रहती है और अनुचित रीतिसे अर्थात् झूठ, कपट आदिसे धनका संग्रह करनेसे पाप बनते हैं, जिससे नरकोंमें तथा चौरासी लाख योनियोंमें दुःख भोगना पड़ता है। इस दृष्टिसे राजस कर्मोंका फल दुःख होता है।

‘प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च’— तमोगुणसे प्रमाद, मोह और अज्ञान पैदा होता है। इन तीनोंके बुद्धिमें आनेसे विवेक-विरुद्ध काम होते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक), जिससे अज्ञान ही बढ़ता है, दृढ़ होता है।

यहाँ तो तमोगुणसे अज्ञानका पैदा होना बताया है और इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें अज्ञानसे तमोगुणका पैदा होना बताया है। इसका तात्पर्य यह है कि जैसे वृक्षसे बीज पैदा होते हैं और उन बीजोंसे आगे बहुत-से वृक्ष पैदा होते हैं, ऐसे ही तमोगुणसे अज्ञान पैदा होता है और अज्ञानसे तमोगुण बढ़ता है, पुष्ट होता है।

पहले आठवें श्लोकमें भगवान्ने प्रमाद, आलस्य और निद्रा—ये तीन बताये। परन्तु तेरहवें श्लोकमें और यहाँ प्रमाद तो बताया, पर निद्रा नहीं बतायी। इससे यह सिद्ध होता है कि आवश्यक निद्रा तमोगुणी नहीं है और निषिद्ध भी नहीं है तथा बाँधनेवाली भी नहीं है। कारण कि शरीरके लिये आवश्यक निद्रा तो सात्त्विक पुरुषको भी आती है और गुणातीत पुरुषको भी! वास्तवमें अधिक निद्रा ही बाँधनेवाली, निषिद्ध और तमोगुणी है; क्योंकि अधिक निद्रासे शरीरमें आलस्य बढ़ता है, पड़े रहनेका ही मन करता है, बहुत समय बरबाद हो जाता है।

परिशिष्ट भाव —ज्ञान (विवेक) सत्त्वगुणसे प्रकट होता है और संग न करनेपर बढ़ते-बढ़ते तत्त्वबोधतक चला जाता है अर्थात् तत्त्वबोधमें परिणत हो जाता है। परन्तु लोभ, प्रमाद, मोह, अज्ञान बढ़ते हैं तो कोई नुकसान बाकी नहीं रहता, कोई दुःख बाकी नहीं रहता, कोई मूढ़यौनि बाकी नहीं रहती, कोई नरक बाकी नहीं रहता।

सम्बन्ध—तात्कालिक गुणोंके बढ़नेपर मरनेवालोंकी गतिका वर्णन तो चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें कर दिया; परन्तु जिनके जीवनमें सत्त्वगुण, रजोगुण अथवा तमोगुणकी प्रधानता रहती है, उनकी (मरनेपर) क्या गति होती है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

विशेष बात

यह जीव साक्षात् परमात्माका अंश होते हुए भी जब प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब इसका प्रकृतिजन्म गुणोंके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है। फिर गुणोंके अनुसार उसके अन्तःकरणमें वृत्तियाँ पैदा होती हैं। उन वृत्तियोंके अनुसार कर्म होते हैं और इन्हीं कर्मोंका फल ऊँच-नीच गतियाँ होती हैं। तात्पर्य है कि जीवित-अवस्थामें अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती हैं और मरनेके बाद ऊँच-नीच गतियाँ होती हैं। वास्तवमें उन कर्मोंके मूलमें भी गुणोंकी वृत्तियाँ ही होती हैं, जो कि पुनर्जन्मके होनेमें खास कारण हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि गुणोंका संग कर्मोंसे कमजोर नहीं है। जैसे कर्म शुभ-अशुभ फल देते हैं, ऐसे ही गुणोंका संग भी शुभ-अशुभ फल देता है (गीता—आठवें अध्यायका छठा श्लोक)। इसीलिये पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतकके इस प्रकरणमें पहले चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें गुणोंकी तात्कालिक वृत्तियोंके बढ़नेका फल बताया और जीवित-अवस्थामें जो परिस्थितियाँ आती हैं, उनको सोलहवें श्लोकमें बताया तथा आगे अठारहवें श्लोकमें गुणोंकी स्थायी वृत्तियोंका फल बताये। अतः वृत्तियों और कर्मोंके होनेमें गुण ही मुख्य हैं। इस पूरे प्रकरणमें गुणोंकी मुख्य बात इसी (सत्रहवें) श्लोकमें कही गयी है।

जिसका उद्देश्य संसार नहीं है, प्रत्युत परमात्मा है, वह साधारण मनुष्योंकी तरह प्रकृतिमें स्थित नहीं है। अतः उसमें प्रकृतिजन्म गुणोंकी परवशता नहीं रहती और साधन करते-करते आगे चलकर जब अहंता परिवर्तित होकर लक्ष्यकी दृढ़ता हो जाती है, तब उसको अपने स्वतःसिद्ध गुणातीत स्वरूपका अनुभव हो जाता है। इसीका नाम बोध है। इस बोधके विषयमें भगवान्ने इस अध्यायका पहला-दूसरा श्लोक कहा और गुणातीतके विषयमें बाईसवेंसे छब्बीसवेंतकके पाँच श्लोक कहे। इस तरह यह पूरा अध्याय गुणोंसे अतीत स्वतःसिद्ध स्वरूपका अनुभव करनेके लिये ही कहा गया है।

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

१३७

ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।

जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥

सत्त्वस्थाः | = सत्त्वगुणमें स्थित | मध्ये | = मृत्युलोकमें | वृत्तिमें | ---|---|---|---|---|--- | मनुष्य | तिष्ठन्ति | = जन्म लेते हैं | स्थित | ऊर्ध्वम् | = ऊर्ध्वलोकोंमें | | (और) | तामसाः | = तामस गच्छन्ति | = जाते हैं, | जघन्यगुण- | | मनुष्य | राजसाः | = रजोगुणमें स्थित | वृत्तिस्थाः | = निन्दनीय | अधः | = अधोगतिमें मनुष्य | | | तमोगुणकी | गच्छन्ति | = जाते हैं ।

व्याख्या— 'ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्थाः'—जिनके जीवनमें सत्त्वगुणकी प्रधानता रही है और उसके कारण जिन्होंने भोगोंसे संयम किया है; तीर्थ, व्रत, दान आदि शुभ-कर्म किये हैं; दूसरोंके सुख-आरामके लिये प्याऊ, अन्नक्षेत्र आदि चलाये हैं; सड़के बनवायी हैं; पशु-पक्षियोंकी सुख-सुविधाके लिये पेड़-पौधे लगाये हैं; गौशालाएँ बनवायी हैं, उन मनुष्योंको यहाँ 'सत्त्वस्थाः' कहा गया है। जब सत्त्वगुणकी प्रधानतामें ही ऐसे मनुष्योंका शरीर छूट जाता है, तब वे सत्त्वगुणका संग होनेसे, सत्त्वगुणमें आसक्ति होनेसे स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें चले जाते हैं। उन लोकोंका वर्णन इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें 'उत्तमविदां अमलान् लोकान्' पदोंसे किया गया है। ऊर्ध्वलोकोंमें जानेवाले मनुष्योंको तेजस्तत्त्वप्रधान शरीरकी प्राप्ति होती है।

'मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः' —जिन मनुष्योंके जीवनमें रजोगुणकी प्रधानता होती है और उसके कारण जो शास्त्रकी मर्यादामें रहते हुए ही संग्रह करना और भोग भोगना; ऐश-आराम करना; पदार्थमें ममता, आसक्ति रखना आदिमें लगे रहते हैं, उनको यहाँ 'राजसाः' कहा गया है। जब रजोगुणकी प्रधानतामें ही अर्थात् रजोगुणके कार्याके चिन्तनमें ही ऐसे मनुष्योंका शरीर छूट जाता है, तब वे पुनः इस मृत्युलोकमें ही जन्म लेते हैं। यहाँ उनको पृथ्वीतत्त्वप्रधान मनुष्यशरीरकी प्राप्ति होती है।

यहाँ 'तिष्ठन्ति' पद देनेका तात्पर्य है कि वे राजस मनुष्य अभी जैसे इस मृत्युलोकमें हैं, मरनेके बाद वे पुनः मृत्युलोकमें आकर ऐसे ही बन जाते हैं अर्थात् जैसे पहले थे, वैसे ही बन जाते हैं। वे अशुद्ध आचरण नहीं करते, शास्त्रकी मर्यादा भंग नहीं करते, प्रत्युत शास्त्रकी मर्यादामें ही रहते हैं और शुद्ध आचरण करते हैं; परन्तु पदार्थ, व्यक्तियों आदिमें राग, आसक्ति, ममता रहनेके कारण वे पुनः मृत्युलोकमें ही जन्म लेते हैं।

'जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः' —जिन मनुष्योंके जीवनमें तमोगुणकी प्रधानता रहती है और उसके कारण जिन्होंने प्रमाद आदिके वशमें होकर निरर्थक पैसा और समय बरबाद किया है; जो आलस्य तथा नींदमें ही पड़े रहे हैं; आवश्यक कार्योंको भी जिन्होंने समयपर नहीं किया है; जो दूसरोंका अहित ही सोचते आये हैं; जिन्होंने दूसरोंका अहित किया है, दूसरोंको दुःख दिया है; जिन्होंने झूठ, कपट, चोरी, डकैती आदि निन्दनीय कर्म किये हैं, ऐसे मनुष्योंको यहाँ 'जघन्यगुणवृत्तिस्थाः' कहा गया है। जब तमोगुणकी प्रधानतामें ही अर्थात् तमोगुणके कार्याके चिन्तनमें ही ऐसे मनुष्य मर जाते हैं, तब वे अधोगतिमें चले जाते हैं।

अधोगतिके दो भेद हैं—योनिविशेष और स्थान-विशेष। पशु, पक्षी, कीट, पतंग, साँप, बिच्छू, भूत-प्रेत आदि 'योनिविशेष' अधोगति है और वैतरिणी, असिपत्र, लालाभक्ष, कुम्भीपाक, रौरव, महारौरव आदि नरकके कुण्ड 'स्थानविशेष' अधोगति है। जिनके जीवनमें सत्त्वगुण अथवा रजोगुण रहते हुए भी अन्तसमयमें तात्कालिक तमोगुण बढ़ जाता है, वे मनुष्य मरनेके बाद 'योनिविशेष' अधोगतिमें अर्थात् मूढ़योनियोंमें चले जाते हैं (गीता—चौदहवें अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक)। जिनके जीवनमें तमोगुणकी प्रधानता रही है और उसी तमोगुणकी प्रधानतामें जिनका शरीर छूट जाता है, वे मनुष्य मरनेके बाद 'स्थानविशेष' अधोगतिमें अर्थात् नरकोंमें चले जाते हैं (गीता—सोलहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि सात्त्विक, राजस अथवा तामस मनुष्यका अन्तिम चिन्तन और हो जानेसे उनकी गति तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार ही होगी, पर सुख-दुःखका भोग उनके कर्मोंके अनुसार ही होगा। जैसे—कर्म तो अच्छे हैं, पर अन्तिम चिन्तन कुत्तेका हो गया, तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार वह कुत्ता बन जायगा; परन्तु उस योनिमें भी उसको

१३८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

कर्मके अनुसार बहुत सुख-आराम मिलेगा। कर्म तो बुरे हैं, पर अन्तिम चिन्तन मनुष्य आदिका हो गया, तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार वह मनुष्य बन जायगा; परन्तु उसको कर्मके फलरूपमें भयंकर परिस्थिति मिलेगी। उसके शरीरमें रोग-ही-रोग रहेंगे। खानेके लिये अन्न, पीनेके लिये जल और पहननेके लिये कपड़ा भी कठिनाईसे मिलेगा।

सात्त्विक गुणको बढ़ानेके लिये साधक सत्-शास्त्रोंके पढ़नेमें लगा रहे। खाना-पीना भी सात्त्विक करे, राजस-तामस खान-पान न करे। सात्त्विक श्रेष्ठ मनुष्योंका ही संग करे, उन्हींके सान्निध्यमें रहे, उनके कहे अनुसार साधन करे। शुद्ध, पवित्र तीर्थ आदि स्थानोंका सेवन करे; जहाँ कोलाहल होता हो, ऐसे राजस स्थानोंका और जहाँ अण्डा, माँस, मदिरा बिकती हो, ऐसे तामस स्थानोंका सेवन न करे। प्रातःकाल और सार्यकालका समय सात्त्विक माना जाता है; अतः इस सात्त्विक समयका विशेषतासे सदुपयोग करे अर्थात् इसे भजन, ध्यान आदिमें लगाये। शास्त्रविहित शुभ-कर्म ही करे, निषिद्ध कर्म कभी न करे; राजस-तामस कर्म कभी न करे। जो जिस वर्ण, आश्रममें स्थित है, उसीमें अपने-अपने कर्तव्यका ठीक तरहसे पालन करे। ध्यान भगवान्का ही करे। मन्त्र भी सात्त्विक ही जपे। इस प्रकार सब कुछ सात्त्विक करनेसे पुराने संस्कार मिट जाते हैं और सात्त्विक संस्कार (सत्त्वगुण) बढ़ जाते हैं। श्रीमद्भगवतमें गुणोंको बढ़ानेवाले दस हेतु बताये गये हैं—

आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च।

ध्यानं मनोऽथ संस्कारो दशते गुणहेतवः॥

(११।१३।४)

‘शास्त्र, जल (खान-पान), प्रजा (संग), स्थान, समय, कर्म, जन्म, ध्यान, मन्त्र और संस्कार—ये दस वस्तुएँ यदि सात्त्विक हों तो सत्त्वगुणकी, राजसी हों तो रजोगुणकी और तामसी हों तो तमोगुणकी वृद्धि करती हैं।’

विशेष बात

अन्तसमयमें रजोगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरनेवाला मनुष्य मनुष्यलोकमें जन्म लेता है (इसी अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक) और रजोगुणकी प्रधानतावाला मनुष्य मरकर फिर इस मनुष्यलोकमें ही आता है (इसी अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)—इन दोनों बातोंसे यही सिद्ध होता है कि इस मनुष्यलोकके सभी मनुष्य रजोगुणवाले ही होते हैं; सत्त्वगुण और तमोगुण इनमें नहीं होता। अगर

वास्तवमें ऐसी ही बात है, तो फिर सत्त्वगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरनेवाला (इसी अध्यायका चौदहवाँ श्लोक) और सत्त्वगुणमें स्थित रहनेवाला मनुष्य ऊँचे लोकोंमें जाता है (इसी अध्यायका अठारहवाँ श्लोक), तथा तमोगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरनेवाला (इसी अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक) और तमोगुणमें स्थित रहनेवाला मनुष्य अधोगतिमें जाता है (इसी अध्यायका अठारहवाँ श्लोक); सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं (इसी अध्यायका पाँचवाँ श्लोक); यह सारा संसार तीनों गुणोंसे मोहित है (सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक); सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीन प्रकारके कर्ता कहे जाते हैं (अठारहवें अध्यायके छब्बीसवेंसे अठ्ठाईसवें श्लोक तक); यह सम्पूर्ण त्रिलोकी त्रिगुणात्मक है (अठारहवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक), आदि बातें भगवान्ने कैसे कही हैं?

इस शंकाका समाधान यह है कि ऊर्ध्वगतिमें सत्त्वगुणकी प्रधानता तो है, पर साथमें रजोगुण-तमोगुण भी रहते हैं। इसलिये देवताओंके भी सात्त्विक, राजस और तामस स्वभाव होते हैं। अतः सत्त्वगुणकी प्रधानता होनेपर भी उसमें अवान्तर भेद रहते हैं। ऐसे ही मध्यगतिमें रजोगुणकी प्रधानता होनेपर भी साथमें सत्त्वगुण-तमोगुण रहते हैं। इसलिये मनुष्योंके भी सात्त्विक, राजस और तामस स्वभाव होते हैं। अधोगतिमें तमोगुणकी प्रधानता है, पर साथमें सत्त्वगुण-रजोगुण भी रहते हैं। इसलिये पशु, पक्षी आदिमें तथा भूत, प्रेत, गृह्यक आदिमें और नरकोंके प्राणियोंमें भी भिन्न-भिन्न स्वभाव होता है। कई सौम्य स्वभावके होते हैं, कई मध्यम स्वभावके होते हैं और कई क्रूर स्वभावके होते हैं। तात्पर्य है कि जहाँ किसी भी गुणके साथ सम्बन्ध है, वहाँ तीनों गुण रहेंगे ही। इसलिये भगवान्ने (अठारहवें अध्यायके चालीसवें श्लोकमें) कहा है कि त्रिलोकीमें ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो तीनों गुणोंसे रहित हो।

ऊर्ध्वगतिमें सत्त्वगुणकी प्रधानता, रजोगुणकी गौणता और तमोगुणकी अत्यन्त गौणता रहती है। मध्यगतिमें रजोगुणकी प्रधानता, सत्त्वगुणकी गौणता और तमोगुणकी अत्यन्त गौणता रहती है। अधोगतिमें तमोगुणकी प्रधानता, रजोगुणकी गौणता और सत्त्वगुणकी अत्यन्त गौणता रहती है। तात्पर्य है कि सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणोंकी प्रधानतावालोंमें भी अधिक, मध्यम और कनिष्ठमात्रोंमें प्रत्येक गुण रहता है। इस तरह गुणोंके सैकड़ों-हजारों

श्लोक १९ ]

  • साधक-संजीवनी *

९३९

सूक्ष्म भेद हो जाते हैं। अतः गुणोंके तारतम्यसे प्रत्येक प्राणीका अलग-अलग स्वभाव होता है।

अपने कहलानेवाले अन्तःकरणमें सात्त्विक, राजस और तामस वृत्तियोंके आनेपर भी वह गुणातीत ही रहता है (चौदहवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। अतः भगवान्‌की उपासना करना और गुणातीत महापुरुषका संग करना—ये दोनों ही निर्गुण होनेसे साधकको गुणातीत करनेवाले हैं।

जैसे भगवान्‌के द्वारा सात्त्विक, राजस और तामस कार्य होते हुए भी वे गुणातीत ही रहते हैं (सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक), ऐसे ही गुणातीत महापुरुषके

परिशिष्ट भाव—तमोगुण थोड़ा बढ़नेपर मनुष्य मूढ़ योनियोंमें जाता है और ज्यादा बढ़नेपर नरकोंमें जाता है।

सम्बन्ध—पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतक प्रकृतिके कार्य गुणोंका परिचय देकर अब आगेके दो श्लोकोंमें स्वयंको तीनों गुणोंसे अतीत अनुभव करनेका वर्णन करते हैं।

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥

यदा = जब द्रष्टा = विवेकी (विचार-कुशल) मनुष्य गुणेभ्यः = तीनों गुणोंके (सिवाय) अन्यम् = अन्य किसीको कर्तारम् = कर्ता न = नहीं अनुपश्यति = देखता च = और (अपनेको) गुणेभ्यः = गुणोंसे परम् = पर वेत्ति = अनुभव करता है, (तब) सः = वह मद्भावम् = मेरे सत्स्वरूपको अधिगच्छति = प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—'नान्यं गुणेभ्यः .................... मद्भावं सोऽधिगच्छति'—गुणोंके सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं अर्थात् सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंसे ही हो रही हैं, सम्पूर्ण परिवर्तन गुणोंमें ही हो रहा है। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण क्रियाओं और परिवर्तनोंमें गुण ही कारण हैं और कोई कारण नहीं है। वे गुण जिससे प्रकाशित होते हैं, वह तत्त्व गुणोंसे पर है। गुणोंसे पर होनेसे वह कभी गुणोंसे लिप्त नहीं होता अर्थात् गुणों और क्रियाओंका उसपर कोई असर नहीं पड़ता। ऐसे उस तत्त्वको जो विचार-कुशल साधक

जान लेता है अर्थात् विवेकके द्वारा अपने-आपको गुणोंसे पर, असम्बद्ध, निर्लिप्त अनुभव कर लेता है कि गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध न कभी हुआ है, न है, न होगा और न हो ही सकता है। कारण कि गुण परिवर्तनशील हैं और स्वयंमें कभी परिवर्तन होता ही नहीं। वह फिर मेरे भावको, मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य है कि वह जो भूलसे गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मानता था, वह मान्यता मिट जाती है और मेरे साथ उसका जो स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है, वह ज्यों-का-त्यों रह जाता है।

परिशिष्ट भाव—'गुणेभ्यश्च परं वेत्ति' का तात्पर्य है कि जिससे गुण प्रकाशित होते हैं, उस प्रकाशकमें अपनी स्थितिका अनुभव करना (गीता-तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।

'मद्भावं सोऽधिगच्छति' पदोंका अर्थ है कि वह मेरे भावको अर्थात् ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। इसी बातको दूसरे श्लोकमें 'मम साधर्म्यमागताः' पदोंसे कहा गया है।

विवेकी साधक गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे अर्थात् क्रिया और पदार्थसे असंग अनुभव करता है। क्रिया और पदार्थसे असंग अनुभव करनेपर वह योगारूढ़ हो जाता है—'यदा हि नेन्द्रियार्थेषु........' (गीता ६।४)। योगारूढ़ होनेसे शान्तिकी प्राप्ति होती है और उस शान्तिमें न अटकनेसे परमात्माकी प्राप्ति होती है।

१४०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।

जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते

॥ २० ॥

देही | = देहधारी (विवेकी मनुष्य) | त्रीन् | = तीनों | दुःखोसे | ---|---|---|---|---|--- देहसमुद्भवान् | = देहको उत्पन्न करनेवाले | गुणान् | = गुणोंका | विमुक्तः | = रहित हुआ एतान् | = इन | अतीत्य | = अतिक्रमण करके | अमृतम् | = अमरताका | | जन्ममृत्युजरादुःखैः | = जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूप | अश्नुते | = अनुभव करता है।

व्याख्या— ‘गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्’—यद्यपि विचार-कुशल मनुष्यका देहेके साथ सम्बन्ध नहीं होता, तथापि लोगोंकी दृष्टिमें देहवाला होनेसे उसको यहाँ ‘देही’ कहा गया है।

देहको उत्पन्न करनेवाले गुण ही हैं। जिस गुणके साथ मनुष्य अपना सम्बन्ध मान लेता है, उसके अनुसार उसको ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेना ही पड़ता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।

अभी इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकसे अठारहवें श्लोकतक जिनका वर्णन हुआ है, उन्हीं तीनों गुणोंके लिये यहाँ ‘एतान् त्रीन् गुणान्’ पद आये हैं। विचार-कुशल मनुष्य इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है अर्थात् इनके साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता, इनके साथ माने हुए सम्बन्धका त्याग कर देता है। कारण कि उसको यह स्पष्ट विवेक हो जाता है कि सभी गुण परिवर्तनशील हैं, उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं और अपना स्वरूप गुणोंसे कभी लिप्त हुआ नहीं, हो सकता भी नहीं। ध्यान देनेकी बात है कि जिस प्रकृतिसे ये गुण उत्पन्न होते हैं, उस प्रकृतिके साथ भी स्वयंका किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है, फिर गुणोंके साथ तो उसका सम्बन्ध हो ही कैसे सकता है?

‘जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते’ —जब साधक इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है, तो फिर उसको जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाका दुःख नहीं होता। वह जन्म-मृत्यु आदिके दुःखोंसे छूट जाता है; क्योंकि जन्म आदिके होनेमें गुणोंका संग ही कारण है। ये गुण आते-जाते रहते हैं; इनमें परिवर्तन होता रहता है। गुणोंकी वृत्तियाँ कभी सात्त्विकी, कभी राजसी और कभी तामसी हो जाती हैं; परन्तु स्वयंमें कभी सात्त्विकपना, राजसपना और तामसपना आता ही नहीं। स्वयं (स्वरूप) तो स्वतः असंग रहता है। इस असंग स्वरूपका कभी जन्म नहीं होता। जब जन्म

नहीं होता, तो मृत्यु भी नहीं होती। कारण कि जिसका जन्म होता है, उसीकी मृत्यु होती है तथा उसीकी वृद्धावस्था भी होती है। गुणोंका संग रहनेसे ही जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाके दुःखोंका अनुभव होता है। जो गुणोंसे सर्वथा निलिप्तताका अनुभव कर लेता है, उसको स्वतःसिद्ध अमरताका अनुभव हो जाता है।

देहसे तादात्म्य (एकता) माननेसे ही मनुष्य अपनेको मरनेवाला समझता है। देहेके सम्बन्धसे होनेवाले सम्पूर्ण दुःखोंमें सबसे बड़ा दुःख मृत्यु ही माना गया है। मनुष्य स्वरूपसे है तो अमर ही; किन्तु भोग और संग्रहमें आसक्त होनेसे और प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले शरीरको अमर रखनेकी इच्छासे ही इसको अमरताका अनुभव नहीं होता। विवेकी मनुष्य देहसे तादात्म्य नष्ट होनेपर अमरताका अनुभव करता है।

पूर्वश्लोकमें ‘मद्भ्रान्तं सोऽधिगच्छति’ पदोंसे भगवद्भावकी प्राप्ति कही गयी एवं यहाँ ‘अमृतमश्नुते’ पदोंसे अमरताका अनुभव करनेको कहा गया—वस्तुतः दोनों एक ही बात है।

गीतामें ‘जरामरणमोक्षाय’ (७।२९), ‘जन्ममृत्यु-जराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्’ (१३।८) और यहाँ ‘जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तः’ (१४।२०)—इन तीनों जगह बाल्य और युवा-अवस्थाका नाम न लेकर ‘जरा’ (वृद्धावस्था) का ही नाम लिया गया है, जबकि शरीरमें बाल्य, युवा और वृद्ध—ये तीनों ही अवस्थाएँ होती हैं। इसका कारण यह है कि बाल्य और युवा-अवस्थाओंमें मनुष्य अधिक दुःखका अनुभव नहीं करता; क्योंकि इन दोनों ही अवस्थाओंमें शरीरमें बल रहता है। परन्तु वृद्धावस्थामें शरीरमें बल न रहनेसे मनुष्य अधिक दुःखका अनुभव करता है। ऐसे ही जब मनुष्यके प्राण छूटते हैं, तब वह भयंकर दुःखका अनुभव करता है। परन्तु जो तीनों गुणोंका

श्लोक २१ ]

  • साधक-संजीवनी *

१४१

अतिक्रमण कर जाता है, वह सदाके लिये जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाके दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।

इस मनुष्यशरीरमें रहते हुए जिसको बोध हो जाता है, उसका फिर जन्म होनेका तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता। हाँ, उसके अपने कहलानेवाले शरीरके रहते हुए वृद्धावस्था और मृत्यु तो आयेगी ही, पर उसको वृद्धावस्था और मृत्युका दुःख नहीं होगा।

वर्तमानमें शरीरके साथ स्वयंकी एकता माननेसे ही पुनर्जन्म होता है और शरीरमें होनेवाले जरा व्याधि आदिके

दुःखोंको जीव अपनेमें मान लेता है। शरीर गुणोंके संगसे उत्पन्न होता है। देहके उत्पादक गुणोंसे रहित होनेके कारण गुणातीत महापुरुष देहके सम्बन्धसे होनेवाले सभी दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।

अतः प्रत्येक मनुष्यको मृत्युसे पहले-पहले अपने गुणातीत स्वरूपका अनुभव कर लेना चाहिये। गुणातीत होनेसे जरा,व्याधि, मृत्यु आदि सब प्रकारके दुःखोंसे मुक्ति हो जाती है और मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है। फिर उसका पुनर्जन्म होता ही नहीं।

परिशिष्ट भाव —मनुष्यमात्रके भीतर यह भाव रहता है कि मैं बना रहूँ, कभी मरूँ नहीं। वह अमर रहना चाहता है। अमरताकी इस इच्छासे सिद्ध होता है कि वास्तवमें वह अमर है। अगर वह अमर न होता तो उसमें अमरताकी इच्छा भी नहीं होती। उदाहरणार्थ, भूख और प्यास लगती है तो इससे सिद्ध होता है कि ऐसी वस्तु (अन्न और जल) है, जिससे वह भूख-प्यास बुझ जाय। अगर अन्न-जल न होता तो भूख-प्यास भी नहीं लगती। अतः अमरता स्वतःसिद्ध है—‘भूतग्रामः स एवायं ’……’ (गीता ८।१९)। परन्तु स्वरूपसे अमर होते हुए भी जब मनुष्य अपने विवेकका तिरस्कार करके मरणधर्मा शरीरके साथ तादात्म्य मान लेता है अर्थात् ‘मैं शरीर हूँ’ ऐसा मान लेता है, तब उसमें मृत्युका भय और अमरताकी इच्छा पैदा हो जाती है। जब वह अपने विवेकको महत्त्व देता है कि ‘मैं शरीर नहीं हूँ; शरीर तो निरन्तर मृत्युमें रहता है और मैं स्वयं निरन्तर अमरतामें रहता हूँ’, तब उसको अपनी स्वतःसिद्ध अमरताका अनुभव हो जाता है। शरीरके विकारोंका, परिवर्तनका अनुभव स्वयं सदा एक रहते हुए ही करता है। अतः साधकको चाहिये कि वह विकारोंको, परिवर्तनको मुख्यता न देकर अपने होनेपनको, अपनी अमरताको मुख्यता दे। यह श्लोक चौदहवें अध्यायका सार, निचोड़ है।

सम्बन्ध—गुणातीत पुरुष दुःखोंसे मुक्त होकर अमरताको प्राप्त कर लेता है—ऐसा सुनकर अर्जुनके मनमें गुणातीत मनुष्यके लक्षण जाननेकी जिज्ञासा हुई। अतः वे आगेके श्लोकमें भगवान्से प्रश्न करते हैं।

अर्जुन उवाच

कैलिङ्गैस्त्रीनुणानेतानतीतो भवति प्रभो। किमाचारः कथं चैतांस्त्रीनुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥

अर्जुन बोले—

प्रभो= हे प्रभो !लिङ्गैः= लक्षणोंसेएतान्= इन
एतान्= इन(युक्त)त्रीन्= तीनों
त्रीन्= तीनोंभवति= होता है ?गुणान्= गुणोंका
गुणान्= गुणोंसेकिमाचारः= उसके आचरणकथम्,
अतीतः= अतीत हुआ मनुष्यकैसे होते हैं ?अतिवर्तते= अतिक्रमण कैसे किया
कैः= किन= औरजा सकता है ?

व्याख्या—‘कैलिङ्गैस्त्रीनुणानेतानतीतो भवति प्रभो’—हे प्रभो ! मैं यह जानना चाहता हूँ कि जो गुणोंका अतिक्रमण कर चुका है, ऐसे मनुष्यके क्या लक्षण होते हैं? तात्पर्य है कि संसारी मनुष्यकी अपेक्षा गुणातीत मनुष्यमें ऐसी कौन-सी विलक्षणता आ जाती है, जिससे साधारण व्यक्ति समझ ले कि यह गुणातीत पुरुष है ?

‘किमाचारः’—उस गुणातीत मनुष्यके आचरण कैसे होते हैं ? अर्थात् साधारण आदमीकी जैसी दिनचर्या और

१४२ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १४

रात्रिचर्या होती है, गुणातीत मनुष्यकी वैसी ही दिनचर्या-

रात्रिचर्या होती है या उससे विलक्षण होती है? साधारण

आदमीके जैसे आचरण होते हैं; जैसा खान-पान, रहन-

सहन, सोना-जागना होता है, गुणातीत मनुष्यके आचरण, खान-

पान आदि भी वैसे ही होते हैं या कुछ विलक्षण होते हैं?

‘कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतितर्तते’—इन तीनों गुणोंका

अतिक्रमण करनेका क्या उपाय है? अर्थात् कौन-सा साधन

करनेसे मनुष्य गुणातीत हो सकता है?

सम्बन्ध—अर्जुनके प्रश्नोंमेंसे पहले प्रश्नके उत्तरमें भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें गुणातीत मनुष्यके लक्षणोंका वर्णन करते हैं।

श्रीभगवानुवाच

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।

न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥

श्रीभगवान् बोले—

पाण्डव = हे पाण्डव! सम्प्रवृत्तानि = (ये सभी) अच्छी नहीं करता

प्रकाशम् = प्रकाश तरहसे प्रवृत्त च = और

च = और हो जायँ निवृत्तानि = (ये सभी) निवृत्त

प्रवृत्तिम् = प्रवृत्ति एव = तो भी (गुणातीत हो जायँ तो

च = तथा मनुष्य) (इनकी)

मोहम् = मोह— न, द्वेष्टि = इनसे द्वेष न, काङ्क्षति = इच्छा नहीं करता।

व्याख्या—‘प्रकाशं च’—इन्द्रियों और अन्तःकरणकी 'प्रवृत्ति' को ही लिया है।

स्वच्छता, निर्मलताका नाम प्रकाश है। तात्पर्य है कि जिससे रजोणके दो रूप हैं—राग और क्रिया। इनमेंसे राग

इन्द्रियोंके द्वारा शब्दादि पाँचों विषयोंका स्पष्टतया ज्ञान तो दुःखोंका कारण है। यह राग गुणातीतमें नहीं रहता।

होता है, मनसे मनन होता है और बुद्धिसे निर्णय होता है, परन्तु जबतक गुणातीत मनुष्यका दीखनेवाला शरीर रहता

उसका नाम ‘प्रकाश’ है। है, तबतक उसके द्वारा निष्कामभावपूर्वक स्वतः क्रियाएँ

भगवान्ने पहले (ग्यारहवें श्लोकमें) सत्वगुणकी दो होती रहती हैं। इसी क्रियाशीलताको भगवान्ने यहाँ

वृत्तियाँ बतायी थीं—प्रकाश और ज्ञान। उनमेंसे यहाँ केवल ‘प्रवृत्ति’ नामसे कहा है।

प्रकाश-वृत्ति लेनेका तात्पर्य है कि सत्वगुणमें प्रकाश-वृत्ति ‘मोहमेव च पाण्डव’—मोह दो प्रकारका है—(१)

ही मुख्य है; क्योंकि जबतक इन्द्रियाँ और अन्तःकरणमें नित्य-अनित्य, सत्-असत्, कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक न

प्रकाश नहीं आता, स्वच्छता-निर्मलता नहीं आती, तबतक होना और (२) व्यवहारमें भूल होना। गुणातीत महापुरुषमें

ज्ञान (विवेक) जाग्रत् नहीं होता। प्रकाशके आनेपर ही ज्ञान पहले प्रकारका मोह (सत्-असत् आदिका विवेक न होना)

जाग्रत् होता है। अतः यहाँ ज्ञान-वृत्तिको प्रकाशके ही तो होता ही नहीं (गीता—चौथे अध्यायका पैंतीसवाँ श्लोक)।

अन्तर्गत ले लेना चाहिये। परन्तु व्यवहारमें भूल होना अर्थात् किसीके कहनेसे किसी

‘प्रवृत्ति च’—जबतक गुणोंके साथ सम्बन्ध रहता है, निर्दोष व्यक्तिको दोषी मान लेना और दोषी व्यक्तिको निर्दोष

तबतक रजोणकी लोभ, प्रवृत्ति, रागपूर्वक कर्मोंका मान लेना आदि तथा रस्सीमें साँप दीख जाना, मृगतृष्णामें

आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा—ये वृत्तियाँ पैदा होती रहती जल दीख जाना, सीपी और अभ्रकमें चाँदीका भ्रम हो जाना

हैं। परन्तु जब मनुष्य गुणातीत हो जाता है, तब रजोणके आदि मोह तो गुणातीत मनुष्यमें भी होता है।

साथ तादात्म्य रखनेवाली वृत्तियाँ तो पैदा हो ही नहीं ‘न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति’—

सकतीं, पर आसक्ति, कामनासे रहित प्रवृत्ति (क्रियाशीलता) सत्वगुणका कार्य ‘प्रकाश’, रजोणका कार्य ‘प्रवृत्ति’ और

रहती है। यह प्रवृत्ति दोषी नहीं है। गुणातीत मनुष्यके द्वारा तमोगुणका कार्य ‘मोह’—इन तीनोंके अच्छी तरह प्रवृत्त

भी क्रियाएँ होती हैं। इसलिये भगवान्ने यहाँ केवल होनेपर भी गुणातीत महापुरुष इनसे द्वेष नहीं करता और

श्लोक २२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१४३

इनके निवृत्त होनेपर भी इनकी इच्छा नहीं करता। तात्पर्य है कि ऐसी वृत्तियाँ क्यों उत्पन्न हो रही हैं, इनमेंसे कोई-सी भी वृत्ति न रहे'—ऐसा द्वेष नहीं करता और 'ये वृत्तियाँ पुनः आ जायँ; ये वृत्तियाँ बनी रहें'—ऐसा राग नहीं करता। गुणातीत होनेके कारण गुणोंकी वृत्तियोंके आने-जानेसे उसमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता। वह इन वृत्तियोंसे स्वाभाविक ही निलिप्त रहता है।

विशेष बात

एक तो वृत्तियोंका 'होना' होता है और एक वृत्तियोंको 'करना' (उनसे सम्बन्ध जोड़ना अर्थात् राग-द्वेष करना) होता है। होने और करनेमें बड़ा अन्तर है। 'होना' समष्टिगत होता है और 'करना' व्यक्तिगत होता है। संसारमें जो 'होता' है, उसकी जिम्मेवारी हमारेपर नहीं होती। जो हम 'करते' हैं, उसीकी जिम्मेवारी हमारेपर होती है।

जिस समष्टि शक्तिसे संसारमात्रका संचालन होता है, उसी शक्तिसे हमारे शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि-(जो कि संसारके ही अंश हैं-) का भी संचालन होता है। जब संसारमें होनेवाली क्रियाओंके गुण-दोष हमें नहीं लगते, तब शरीरादिमें होनेवाली क्रियाओंके गुण-दोष हमें लग ही कैसे सकते हैं? परन्तु जब स्वतः होनेवाली क्रियाओंमेंसे कुछ क्रियाओंके साथ मनुष्य राग-द्वेषपूर्वक अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है अर्थात् उनका कर्ता बन जाता है, तब उनका फल उसको ही भोगना पड़ता है। इसलिये अन्तःकरणमें सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे होनेवाली अच्छी-बुरी वृत्तियोंसे साधकको राग-द्वेष नहीं करना चाहिये अर्थात् उनसे अपना सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिये।

वृत्तियाँ एक समान किसीकी भी नहीं रहतीं। तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ तो गुणातीत महापुरुषके अन्तःकरणमें भी होती हैं, पर उसका उन वृत्तियोंसे राग-द्वेष नहीं होता। वृत्तियाँ आप-से-आप आती और चली जाती हैं। गुणातीत

परिशिष्ट भाव —गुणातीत मनुष्यमें 'अनुकूलता बनी रहे, प्रतिकूलता चली जाय' ऐसी इच्छा नहीं होती। निर्विकारताका अनुभव होनेपर उसको अनुकूलता-प्रतिकूलताका ज्ञान तो होता है, पर स्वयंपर उनका असर नहीं पड़ता। अन्तःकरणमें वृत्तियाँ बदलती हैं, पर स्वयं उनसे निलिप्त रहता है। साधकपर भी वृत्तियोंका असर नहीं पड़ना चाहिये; क्योंकि गुणातीत मनुष्य साधकका आदर्श होता है, साधक उसका अनुयायी होता है।

साधकमात्रके लिये यह आवश्यक है कि वह देहका धर्म अपनेमें न माने। वृत्तियाँ अन्तःकरणमें हैं, अपनेमें नहीं हैं। अतः साधक वृत्तियोंको न अच्छा माने, न बुरा माने और न अपनेमें माने। कारण कि वृत्तियाँ तो आने-जानेवाली हैं, पर स्वयं निरन्तर रहनेवाला है। अगर वृत्तियाँ हमारेमें होतीं तो जबतक हम रहते, तबतक वृत्तियाँ भी रहतीं। परन्तु यह सबका अनुभव है कि हम तो निरन्तर रहते हैं, पर वृत्तियाँ आती-जाती रहती हैं। वृत्तियोंका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ है और हमारा (स्वयंका) सम्बन्ध परमात्माके साथ है। इसलिये वृत्तियोंके परिवर्तनका अनुभव करनेवाला स्वयं एक ही रहता है।

महापुरुषकी दृष्टि उधर जाती ही नहीं; क्योंकि उसकी दृष्टिमें एक परमात्मत्त्वके सिवाय और कुछ रहता ही नहीं।

देखना और दीखना—दोनोंमें बड़ा फरक है। देखना 'करने' के अन्तर्गत होता है और दीखना 'होने' के अन्तर्गत होता है। दोष देखनेमें होता है, दीखनेमें नहीं। अतः साधकको यदि अन्तःकरणमें खराब-से-खराब वृत्ति भी दीख जाय, तो भी उसको घबराना नहीं चाहिये। अपने-आप दीखनेवाली (होनेवाली) वृत्तियोंसे राग-द्वेष करना अर्थात् उनके अनुसार अपनी स्थिति मानना ही उनको देखना है। साधकसे भूल यही होती है कि वह दीखनेवाली वस्तुको देखने लग जाता है और फँस जाता है। भगवान् राम कहते हैं—

सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक।

गुन यह उभय न देखिअहि देखिअ सो अबिबेक॥

(मानस ७। ४१)

साधकको गहराईसे विचार करना चाहिये कि वृत्तियाँ तो उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं, पर स्वयं (अपना स्वरूप) सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। वृत्तियोंमें होनेवाले परिवर्तनको देखनेवाला स्वरूप परिवर्तनरहित है। कारण कि परिवर्तनशीलको परिवर्तनशील नहीं देख सकता, प्रत्युत परिवर्तनरहित ही परिवर्तनशीलको देख सकता है। इससे सिद्ध होता है कि स्वरूप वृत्तियोंसे अलग है। परिवर्तनशील गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मान लेनेसे ही गुणोंमें होनेवाली वृत्तियाँ अपनेमें प्रतीत होती हैं। अतः साधकको आने-जानेवाली वृत्तियोंके साथ मिलकर अपने वास्तविक स्वरूपसे विचलित नहीं होना चाहिये। चाहे जैसी वृत्तियाँ आयें, उनसे राजी-नाराज नहीं होना चाहिये; उनके साथ अपनी एकता नहीं माननी चाहिये। सदा एकरस रहनेवाले गुणोंसे सर्वथा निलिप्त, निर्विकार एवं अविनाशी अपने स्वरूपको न देखकर परिवर्तनशील, विकारी एवं विनाशी वृत्तियोंको देखना साधकके लिये महान् बाधक है।

१४४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।

गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३ ॥

यः= जो(तथा)यः= जो (अपने स्वरूपमें)
उदासीनवत्= उदासीनकी तरहगुणाः= गुणही)
आसीनः= स्थित है (और)एव= हीअवतिष्ठति
गुणैः= (जो) गुणोंके द्वारा(गुणोंमें)= स्थित रहता है
न, विचाल्यते= विचलित नहींवर्तन्ते= बरत रहे हैं—(और स्वयं कोई भी)
किया जा सकताइति= इस भावसेन, इङ्गते
= चेष्टा नहीं करता।

व्याख्या—‘उदासीनवदासीनः’ —दो व्यक्ति परस्पर विवाद करते हों, तो उन दोनोंमेंसे किसी एकका पक्ष लेनेवाला ‘पक्षपाती’ कहलाता है और दोनोंका न्याय करनेवाला ‘मध्यस्थ’ कहलाता है। परन्तु जो उन दोनोंको देखता तो है, पर न तो किसीका पक्ष लेता है और न किसीसे कुछ कहता ही है, वह ‘उदासीन’ कहलाता है। ऐसे ही संसार और परमात्मा—दोनोंको देखनेसे गुणाती मनुष्य उदासीनकी तरह दीखता है।

वास्तवमें देखा जाय तो संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। सत्-स्वरूप परमात्माकी सत्तासे ही संसार सत्तावाला दीख रहा है। अतः जब गुणातीत मनुष्यकी दृष्टिमें संसारकी सत्ता है ही नहीं, केवल एक परमात्माकी सत्ता ही है, तो फिर वह उदासीन किससे हो? परन्तु जिनकी दृष्टिमें संसार और परमात्माकी सत्ता है, ऐसे लोगोंकी दृष्टिमें वह गुणातीत मनुष्य उदासीनकी तरह दीखता है।

‘गुणैर्यो न विचाल्यते’ —उसके कहलानेवाले अन्तःकरणमें सत्त्व, रज, और तम—इन गुणोंकी वृत्तियाँ तो आती हैं, पर वह इनसे विचलित नहीं होता। तात्पर्य है कि जैसे अपने सिवाय दूसरोंके अन्तःकरणमें गुणोंकी वृत्तियाँ आनेपर अपनेमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता, ऐसे

ही उसके कहलानेवाले अन्तःकरणमें गुणोंकी वृत्तियाँ आनेपर उसमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता अर्थात् वह उन वृत्तियोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता। कारण कि उसके कहे जानेवाले अन्तःकरणमें अन्तःकरणसहित सम्पूर्ण संसारका अत्यन्त अभाव एवं परमात्मतत्त्वका भाव निरन्तर स्वतः—स्वाभाविक जाग्रत् रहता है।

‘गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति’ —गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (गीता—तीसरे अध्यायका अष्टाईसवाँ श्लोक) अर्थात् गुणोंमें ही सम्पूर्ण क्रियाएँ हो रही हैं—ऐसा समझकर वह अपने स्वरूपमें निर्विकाररूपसे स्थित रहता है।

‘न इंगते’ —पहले ‘गुणा वर्तन्त इत्येव’ पदोंसे उसका गुणोंके साथ सम्बन्धका निषेध किया, अब ‘न इंगते’ पदोंसे उसमें क्रियाओंका अभाव बताते हैं। तात्पर्य है कि गुणातीत पुरुष खुद कुछ भी चेष्टा नहीं करता। कारण कि अविनाशी शुद्ध स्वरूपमें कभी कोई क्रिया होती ही नहीं।

[बाईसवें और तेईसवें—इन दो श्लोकोंमें भगवान्ने गुणातीत महापुरुषकी तटस्थता, निलिप्तताका वर्णन किया है।]

परिशिष्ट भाव—‘न विचाल्यते’, ‘अवतिष्ठति’ और ‘नेङ्गते’—ये तीनों पद वास्तवमें एक ही अर्थ रखते हैं। फिर भी ये तीनों पद देनेका तात्पर्य है कि गुणातीत महापुरुष स्वतः—स्वाभाविक अचल (स्थिरतामें) रहता है। वह न तो स्वयं विचलित होता है और न किसीसे विचलित किया जा सकता है।

‘करना’, ‘होना’ और ‘है’—ये तीन विभाग हैं। ‘करना’ होनेमें और ‘होना’ ‘है’ में बदल जाय तो अहंकार सर्वथा नष्ट हो जाता है। जिसके अन्तःकरणमें क्रिया और पदार्थका महत्त्व है, ऐसा असाधक (संसारी मनुष्य) मानता है कि ‘मैं क्रिया कर रहा हूँ’—‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३।२७)। जो कर्ता बनता है, उसको भीका बनना ही पड़ता है। जिसमें विवेककी प्रधानता है, ऐसा साधक अनुभव करता है कि ‘क्रिया हो रही है’—‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ (गीता ३।२८) अर्थात् ‘मैं कुछ भी नहीं करता हूँ’—‘नैव किंचित्करोमीति’ (गीता ५।८)। परन्तु जिसको तत्त्वज्ञान हो गया है, ऐसा सिद्ध महापुरुष केवल सत्ता तथा ज्ञप्तिमात्र (‘है’) का ही अनुभव करता है—‘योऽवतिष्ठति नेङ्गते’। वह चिन्मय सत्ता सम्पूर्ण क्रियाओंमें ज्यों-की-त्यों परिपूर्ण है। क्रियाओंका तो अन्त हो जाता है, पर चिन्मय सत्ता

श्लोक २४-२५ ]

  • साधक-संजीवनी *

९४५

ज्यों-की-त्यों रहती है। महापुरुषकी दृष्टि क्रियाओंपर न रहकर स्वतः एकमात्र चिन्मय सत्ता ('है') पर ही रहती है।

सम्बन्ध-इक्कीसवें श्लोकमें अर्जुनने दूसरे प्रश्नके रूपमें गुणातीत मनुष्यके आचरण पूछे थे। उसका उत्तर अब आगेके दो श्लोकोंमें देते हैं।

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।

तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।

सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥

धीर: = जो धीर मनुष्य

समदुःख-

सुख: = दुःख-सुखमें

सम (तथा)

स्वस्थ: = अपने स्वरूपमें

स्थित रहता है;

समलोष्टाश्म-

काञ्चन: = जो मिट्टीके

ढेले, पत्थर और

सोनेमें सम रहता है;

तुल्यप्रियाप्रिय: = जो प्रिय-अप्रियमें

सम रहता है,

तुल्यनिन्दात्म-

संस्तुति: = जो अपनी

निन्दा-स्तुतिमें

सम रहता है;

मानापमानयो: = जो मान-अपमानमें

तुल्य: = सम रहता है;

मित्रारिपक्षयो: = जो मित्र-शत्रुके

पक्षमें

तुल्य: = सम रहता है (और)

सर्वारम्भपरित्यागी = जो सम्पूर्ण

कर्मोंके आरम्भका

त्यागी है,

स: = वह मनुष्य

गुणातीतः = गुणातीत

उच्यते = कहा जाता है।

व्याख्या-'धीरः, समदुःखसुखः' - नित्य-अनित्य, सार-असार आदिके तत्त्वको जानकर स्वतःसिद्ध स्वरूपमें स्थित होनेसे गुणातीत मनुष्य धैर्यवान् कहलाता है।

पूर्वकर्मोंके अनुसार आनेवाली अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिका नाम सुख-दुःख है अर्थात् प्रारब्धके अनुसार शरीर, इन्द्रियों आदिके अनुकूल परिस्थितिको 'सुख' कहते हैं और शरीर, इन्द्रियों आदिके प्रतिकूल परिस्थितिको 'दुःख' कहते हैं। गुणातीत मनुष्य इन दोनोंमें सम रहता है। तात्पर्य है कि सुख-दुःखरूप बाह्य परिस्थितियाँ उसके कहे जानेवाले अन्तःकरणमें विकार पैदा नहीं कर सकतीं, उसको सुखी-दुःखी नहीं कर सकतीं।

ढेलेकी जगह रखता है, पत्थरको पत्थरकी जगह रखता है और स्वर्णको स्वर्णकी जगह (तिजोरी आदिमें) रखता है। तात्पर्य है कि यद्यपि उनकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें उसको हर्ष-शोक नहीं होते, वह सम रहता है, तथापि उनसे व्यवहार तो यथायोग्य ही करता है।

ढेले, पत्थर और स्वर्णका ज्ञान न होना समता नहीं कहलाती। समता वही है कि इन तीनोंका ज्ञान होते हुए भी इनमें राग-द्वेष न हों। ज्ञान कभी दोषी नहीं होता, विकार ही दोषी होते हैं।

'स्वस्थः' - स्वरूपमें सुख-दुःख है ही नहीं। स्वरूपसे तो सुख-दुःख प्रकाशित होते हैं। अतः गुणातीत मनुष्य आने-जानेवाले सुख-दुःखका भोक्ता नहीं बनता, प्रत्युत अपने नित्य-निरन्तर रहनेवाले स्वरूपमें स्थिर रहता है।

'तुल्यप्रियाप्रियः' - क्रियमाण कर्मोंकी सिद्धि-असिद्धिमें अर्थात् उनके तात्कालिक फलकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें भी वह सम रहता है।

'समलोष्टाश्मकाञ्चनः' - उसका मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णमें न तो आकर्षण (राग) होता है और न विकर्षण (द्वेष) होता है। परन्तु व्यवहारमें वह ढेलेको

'तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः' - निन्दा और स्तुतिमें नामकी मुख्यता होती है। गुणातीत मनुष्यका नामके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता; अतः कोई निन्दा करे तो उसके चित्तमें खिन्नता नहीं होती और कोई स्तुति करे तो उसके चित्तमें प्रसन्नता नहीं होती। इसी प्रकार निन्दा करनेवालोंके प्रति उसका द्वेष नहीं होता और स्तुति करनेवालोंके प्रति उसका राग नहीं होता।

१४६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

साधारण मनुष्योंकी यह एक आदत बन जाती है कि उनको अपनी निन्दा बुरी लगती है और स्तुति अच्छी लगती है। परन्तु जो गुणोंसे ऊँचे उठ जाते हैं, उनको निन्दा-स्तुतिका ज्ञान तो होता है और वे बर्ताव भी सबके साथ यथोचित ही करते हैं, पर उनमें निन्दा-स्तुतिको लेकर खिन्नता-प्रसन्नता नहीं होती। कारण कि वे जिस तत्त्वमें स्थित हैं, वहाँ गुणोंवाली परकृत निन्दा-स्तुति पहुँचती ही नहीं।

निन्दा और स्तुति—ये दोनों ही परकृत क्रियाएँ हैं। उन क्रियाओंसे राजी-नाराज होना गलती है। कारण कि जिसका जैसा स्वभाव है, जैसी धारणा है, वह उसके अनुसार ही बोलता है। वह हमारे अनुकूल ही बोले, हमारी निन्दा न करे—यह न्याय नहीं है अर्थात् उसको बोलनेमें बाध्य करनेका भाव न्याय नहीं है, अन्याय है। दूसरोंपर हमारा क्या अधिकार है कि तुम हमारी निन्दा मत करो ? हमारी स्तुति ही करो ? दूसरी बात, कोई निन्दा करता है तो उसमें साधकको प्रसन्न होना चाहिये कि इससे मेरे पाप कट रहे हैं, मैं शुद्ध हो रहा हूँ। अगर कोई हमारी प्रशंसा करता है, तो उससे हमारे पुण्य नष्ट होते हैं। अतः प्रशंसामें राजी नहीं होना चाहिये; क्योंकि राजी होनेमें खतरा है !

‘मानापमानयोस्तुल्यः’ —मान और अपमान होनेमें शरीरकी मुख्यता होती है। गुणातीत मनुष्यका शरीरके साथ तादात्म्य नहीं रहता। अतः कोई उसका आदर करे या निरादर करे, मान करे या अपमान करे, इन परकृत क्रियाओंका उसपर कोई असर नहीं पड़ता।

निन्दा-स्तुति और मान-अपमान—इन दोनों ही परकृत क्रियाओंमें गुणातीत मनुष्य सम रहता है। इन दोनों परकृत क्रियाओंका ज्ञान होना दोषी नहीं है, प्रत्युत निन्दा और अपमानमें दुःखी होना तथा स्तुति और मानमें हर्षित होना दोषी है; क्योंकि ये दोनों ही प्रकृतिके विकार हैं। गुणातीत पुरुषको निन्दा-स्तुति और मान-अपमानका ज्ञान तो होता है, पर गुणोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे, नाम और शरीरके साथ तादात्म्य न रहनेसे वह सुखी-दुःखी नहीं होता। कारण कि वह जिस तत्त्वमें स्थित है, वहाँ ये विकार नहीं हैं। वह तत्त्व गुणरहित है, निर्विकार है।

‘तुल्यो मित्रारिपक्षयोः’ —वह मित्र और शत्रुके पक्षमें सम रहता है। यद्यपि गुणातीत मनुष्यकी दृष्टिमें कोई मित्र और शत्रु नहीं होता, तथापि दूसरे लोग अपनी भावनाके अनुसार उसे अपना मित्र अथवा शत्रु भी मान

सकते हैं। साधारण मनुष्यको भी दूसरे लोग अपनी भावनाके अनुसार मित्र या शत्रु मान सकते हैं; किन्तु इस बातका पता लगनेपर उस मनुष्यपर इसका असर पड़ता है, जिससे उसमें राग-द्वेष उत्पन्न हो सकते हैं। परन्तु गुणातीत मनुष्यपर इस बातका पता लगनेपर भी कोई असर नहीं पड़ता। वस्तुतः मित्र और शत्रुकी भावनाके कारण ही व्यवहारमें पक्षपात होता है। गुणातीत मनुष्यके कहलानेवाले अन्तःकरणमें मित्र-शत्रुकी भावना ही नहीं होती; अतः उसके व्यवहारमें पक्षपात नहीं होता।

एक व्यक्ति उस महापुरुषके साथ मित्रता रखता है और दूसरा व्यक्ति अपने स्वभाववश उस महापुरुषके साथ शत्रुता रखता है। जब उन दोनों व्यक्तियोंकी किसी बातको लेकर न्याय करनेका अवसर आ जाय, तब (व्यवहारमें) वह मित्रता रखनेवालेकी अपेक्षा शत्रुता रखनेवालेका कुछ अधिक पक्ष लेता है। जैसे—पदार्थादिका बँटवारा करते समय वह मित्रता रखनेवालेको कम (उतना ही, जितना वह प्रसन्नतापूर्वक सहन कर सकता हो) और शत्रुता रखने-वालोंको कुछ ज्यादा पदार्थ देता है। यह भी समता ही कहलाती है; क्योंकि अपने पक्षवालोंके साथ न्याय और विपक्षवालोंके साथ उदारता होनी चाहिये।

‘सर्वारम्भपरित्यागी’ —वह महापुरुष सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी होता है। तात्पर्य है कि धन-सम्पत्तिके संग्रह और भोगोंके लिये वह किसी तरहका कोई नया कर्म आरम्भ नहीं करता। स्वतः प्राप्त परिस्थितिके अनुसार ही उसकी प्रवृत्ति और निवृत्ति होती है अर्थात् क्रियाओंमें उसकी प्रवृत्ति कामना, वासना, ममतासे रहित होती है और निवृत्ति भी मान-बड़ाई आदिकी इच्छासे रहित होती है।

‘गुणातीतः स उच्यते’ —यहाँ ‘उच्यते’ पदसे यही ध्वनि निकलती है कि उस महापुरुषकी ‘गुणातीत’ संज्ञा नहीं है; किन्तु उसके कहे जानेवाले शरीर, अन्तःकरणके लक्षणोंको लेकर ही उसको गुणातीत कहा जाता है।

वास्तवमें देखा जाय तो जो गुणातीत है, उसके लक्षण नहीं हो सकते। लक्षण तो गुणोंसे ही होते हैं; अतः जिसके लक्षण होते हैं, वह गुणातीत कैसे हो सकता है ? परन्तु अर्जुनने भी गुणातीतके ही लक्षण पूछे हैं और भगवान्ने भी गुणातीतके ही लक्षण कहे हैं। इसका तात्पर्य यह है कि लोग पहले उस गुणातीतकी जिस शरीर और अन्तःकरणमें स्थिति मानते थे, उसी शरीर और अन्तःकरणके लक्षणोंको लेकर वे उसमें आरोप करते हैं कि यह गुणातीत मनुष्य है।

श्लोक २६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१४७

अतः ये लक्षण गुणातीत मनुष्यको पहचाननेके संकेत-मात्र हैं।

प्रकृतिके कार्य गुण हैं और गुणोंके कार्य शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि हैं। अतः मन-बुद्धि आदिके द्वारा अपने कारण गुणोंका भी पूरा वर्णन नहीं हो सकता, फिर गुणोंके भी कारण प्रकृतिका वर्णन हो ही कैसे सकता है? जो प्रकृतिसे भी सर्वथा अतीत (गुणातीत) है, उसका वर्णन करना तो उन मन-बुद्धि आदिके द्वारा सम्भव ही नहीं है। वास्तवमें गुणातीतके ये लक्षण स्वरूपमें तो होते ही नहीं; किन्तु अन्तःकरणमें मानी हुई अहंता-ममताके नष्ट हो जानेपर उसके कहे जानेवाले अन्तःकरणके माध्यमसे ही ये लक्षण—गुणातीतके लक्षण कहे जाते हैं।

यहाँ भगवान्ने सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय, निन्दा-स्तुति और मान-अपमान—ये आठ परस्पर विरुद्ध नाम लिये हैं,

परिशिष्ट भाव —राग-द्वेषादि विकार न जड़में रहते हैं, न चेतनमें रहते हैं और न ये अन्तःकरणके धर्म हैं, प्रत्युत ये देहाभिमानमें रहते हैं। देहाभिमान भी वास्तवमें है नहीं, प्रत्युत अविवेक-अविचारपूर्वक माना हुआ है। तात्पर्य है कि वास्तवमें विकार अपनेमें नहीं हैं, पर मनुष्य अविवेकके कारण अपनेमें मान लेता है। वह विकारोंके भाव और अभावका तथा स्वयंके भावका अनुभव तो करता है, पर इस अनुभवको महत्व नहीं देता। अगर वह विवेक-विचारपूर्वक अपनेमें विकारोंके अभावका अनुभव कर ले तो वह उनका भोक्ता (सुखी-दुःखी) नहीं बनेगा।

सम्बन्ध—अर्जुनने तीसरे प्रश्नके रूपमें गुणातीत होनेका उपाय पूछा था। उसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।

स गुणात्ममतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥

च = और यः = जो मनुष्य अव्यभिचारेण = अव्यभिचारी भक्तियोगेन = भक्तियोगके द्वारा

माम् = मेरा सेवते = सेवन करता है, सः = वह एतान् = इन

गुणान् = गुणोंका समतीत्य = अतिक्रमण करके ब्रह्मभूयाय = ब्रह्मप्राप्तिका कल्पते = पात्र हो जाता है।

व्याख्या —[यद्यपि भगवान्ने इसी अध्यायके उन्नीसवें-बीसवें श्लोकोंमें गुणोंका अतिक्रमण करनेका उपाय बता दिया था, तथापि अर्जुनने इक्कीसवें श्लोकमें गुणातीत होनेका उपाय पूछ लिया। इससे यह मालूम होता है कि अर्जुन उस उपायके सिवाय गुणातीत होनेके लिये दूसरा कोई उपाय जानना चाहते हैं। अतः अर्जुनको भक्तिका अधिकारी समझकर भगवान् उनको गुणातीत होनेका उपाय भक्ति बताते हैं।]

‘मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते’ —इन

जिनमें साधारण आदमियोंको तो विषमता हो ही जाती है, साधकोंकी भी कभी-कभी विषमता हो जाती है। ऐसे इन आठ कठिन स्थलोंमें जिसकी समता हो जाती है, उसके लिये अन्य सभी अवस्थाओंमें समता रखना सुगम हो जाता है। अतः यहाँ उन्हीं आठ कठिन स्थलोंका नाम लेकर भगवान् यह बताते हैं कि गुणातीत महापुरुषकी इन आठों स्थलोंमें स्वतः-स्वाभाविक समता होती है।

गुणातीत मनुष्यकी जो स्वतःसिद्ध निर्विकारता है, उसकी जो स्वाभाविक स्थिति है, उसमें अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंके आने-जानेका कुछ भी फरक नहीं पड़ता। उसकी निर्विकारता, समता ज्यों-की-त्यों अटल रहती है। उसकी शान्ति कभी भंग नहीं होती।

[चौबीसवें और पचीसवें—इन दो श्लोकोंमें भगवान्ने गुणातीत महापुरुषकी समताका वर्णन किया है।]

पदोंमें उपासक, उपास्य और उपासना—ये तीनों आ गये हैं अर्थात् ‘यः’ पदसे उपासक, ‘माम्’ पदसे उपास्य और ‘अव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते’ पदोंसे उपासना आ गयी है।

‘अव्यभिचारेण’ पदका तात्पर्य है कि दूसरे किसीका भी सहारा न हो। सांसारिक सहारा तो दूर रहा, ज्ञानयोग, कर्मयोग आदि योगों-(साधनों-) का भी सहारा न हो! और ‘भक्तियोगेन’ पदका तात्पर्य है कि केवल भगवान्का ही सहारा हो, आश्रय हो, आशा हो, बल हो, विश्वास हो।

श्रीमद्भगवद्गीता

इस तरह 'अव्यभिचारेण' पदसे दूसरोंका आश्रय लेनेका निषेध करके 'भक्तियोगेन' पदसे केवल भगवान्‌का ही आश्रय लेनेकी बात कही गयी है।

'सेवते' पदका तात्पर्य है कि अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा भगवान्‌का भजन करे, उनकी उपासना करे, उनके शरण हो जाय, उनके अनुकूल चले।

'स गुणान्समतीत्यैतान्'—जो अनन्यभावसे केवल भगवान्‌के ही शरण हो जाता है, उसको गुणोंका अतिक्रमण करना नहीं पड़ता, प्रत्युत भगवान्‌की कृपासे उसके द्वारा स्वतः गुणोंका अतिक्रमण हो जाता है (गीता—बारहवें अध्यायका छठाँ-सातवाँ श्लोक)।

'ब्रह्मभूयाय कल्पते'—वह गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र (अधिकारी) हो जाता है। भगवान्‌ने जब यहाँ भक्तिकी बात बतायी है, तो फिर भगवान्‌ने यहाँ ब्रह्मप्राप्तिकी बात न कहकर अपनी प्राप्तिकी बात बतानी चाहिये थी। परन्तु यहाँ ब्रह्मप्राप्तिकी बात बतानेका तात्पर्य यह है कि अर्जुनने गुणातीत होने-(निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्ति-) का उपाय पूछा था। इसलिये भगवान्‌ने अपनी भक्तिको ब्रह्मप्राप्तिका उपाय बताया।

दूसरी बात, शास्त्रोंमें कहा गया है कि भगवान्‌की उपासना करनेवालेको ज्ञानकी भूमिकाओंकी सिद्धिके लिये दूसरा कोई साधन, प्रयत्न नहीं करना पड़ता, प्रत्युत उसके लिये ज्ञानकी भूमिकाएँ अपने-आप सिद्ध हो जाती हैं। उसी बातको लक्ष्य करके भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि अव्यभिचारी भक्तियोगसे मेरा सेवन करनेवालेको ब्रह्मप्राप्तिका पात्र बननेके लिये दूसरा कोई साधन नहीं करना पड़ता, प्रत्युत वह अपने-आप ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। परन्तु वह भक्त ब्रह्मप्राप्तिमें सन्तोष नहीं करता। उसका तो यही भाव रहता है कि भगवान् कैसे प्रसन्न हों? भगवान्‌की प्रसन्नतामें ही उसकी प्रसन्नता होती है। तात्पर्य यह निकला कि जो केवल भगवान्‌के ही परायण है, भगवान्‌में ही आकृष्ट है, उसके लिये ब्रह्मप्राप्ति स्वतःसिद्ध है। हाँ, वह ब्रह्मप्राप्तिको महत्त्व दे अथवा न दे—यह बात दूसरी है, पर वह ब्रह्मप्राप्तिका अधिकारी स्वतः हो जाता है।

तीसरी बात, जिस तत्त्वकी प्राप्ति ज्ञानयोग, कर्मयोग आदि साधनोंसे होती है, उसी तत्त्वकी प्राप्ति भक्तिसे भी होती है। साधनोंमें भेद होनेपर भी उस तत्त्वकी प्राप्तिमें कोई भेद नहीं होता।

परिशिष्ट भाव—भक्तिसे साधक जो भी चाहता है, उसीकी प्राप्ति हो जाती है। जो साधक मुख्यरूपसे ब्रह्मकी प्राप्ति अर्थात् मुक्ति, तत्त्वज्ञान चाहता है, उसको भक्ति करनेसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है; क्योंकि ब्रह्मकी प्रतिष्ठा भगवान् ही हैं (इसी अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक), ब्रह्म समग्र भगवान्‌का ही एक अंग है, स्वरूप है (गीता—सातवें अध्यायके उनतीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)। तेरहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें भी भक्तिको ज्ञानप्राप्तिका साधन बताया गया है।

श्रीमद्भागवतमें सगुणकी उपासनाको निर्गुण (गुणोंसे अतीत) बताया है; जैसे—'मन्निकेतं तु निर्गुणम्' (११। २५। २५), 'मत्सेवां तु निर्गुणा' (११। २५। २७) आदि। इसलिये सगुणकी उपासना करनेवाला तीनों गुणोंसे अतीत हो जाता है। सगुण भगवान् भी गुणोंके आश्रित नहीं हैं, प्रत्युत गुण उनके आश्रित हैं। जो सत्त्व-रज-तम गुणोंके वशमें है, उसका नाम 'सगुण' नहीं है, प्रत्युत जिसमें असीम ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, औदार्य आदि अनन्त दिव्य गुण नित्य विद्यमान रहते हैं, उसका नाम 'सगुण' है। भगवान्‌के द्वारा सात्त्विक, राजस अथवा तामस क्रियाएँ हो सकती हैं, पर वे उन गुणोंके वशमें नहीं होते।

भगवान्‌की तरफ चलनेसे भक्त स्वतः और सुगमतासे गुणातीत हो जाता है। इतना ही नहीं, उसको भगवान्‌के समग्ररूपका भी ज्ञान हो जाता है।

सम्बन्ध—उपासना तो करे भगवान्‌की और पात्र बन जाय ब्रह्मप्राप्तिका—यह कैसे? इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥ २७॥

श्लोक २७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१४९

हि= क्यौंक= तथासुखस्य= सुखका
ब्रह्मणः= ब्रह्मकाशाश्वतस्य= शाश्वतप्रतिष्ठा= आश्रय
= औरधर्मस्य= धर्मकाअहम्= मैं
अव्ययस्य= अविनाशी= और(ही हूँ)।
अमृतस्य= अमृतकाऐकान्तिकस्य= ऐकान्तिक

व्याख्या—‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्’ —मैं ब्रह्मकी प्रतिष्ठा, आश्रय हूँ—ऐसा कहनेका तात्पर्य ब्रह्मसे अपनी अभिन्नता बतानेमें है। जैसे जलती हुई अग्नि साकार है और काष्ठ आदिमें रहनेवाली अग्नि निराकार है—ये अग्निके दो रूप हैं, पर तत्त्वतः अग्नि एक ही है। ऐसे ही भगवान् साकार-रूपसे हैं और ब्रह्म निराकार-रूपसे हैं—ये दो रूप साधकोंकी उपासनाकी दृष्टिसे हैं, पर तत्त्वतः भगवान् और ब्रह्म एक ही हैं, दो नहीं। जैसे भोजनमें एक सुगन्ध होती है और एक स्वाद होता है; नासिकाकी दृष्टिसे सुगन्ध होती है और रसनाकी दृष्टिसे स्वाद होता है, पर भोजन तो एक ही है। ऐसे ही ज्ञानकी दृष्टिसे ब्रह्म है और भक्तिकी दृष्टिसे भगवान् हैं, पर तत्त्वतः भगवान् और ब्रह्म एक ही हैं। भगवान् कृष्ण अलग हैं और ब्रह्म अलग है—यह भेद नहीं है; किन्तु भगवान् कृष्ण ही ब्रह्म हैं और ब्रह्म ही भगवान् कृष्ण हैं। गीतामें भगवान्ने अपने लिये ‘ब्रह्म’ शब्दका भी प्रयोग किया है—‘ब्रह्मण्याधाय कर्माणि ’ (५।१०) और अपनेको ‘अव्यक्तमूर्ति ’ भी कहा है—‘मया तत्तमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ’ (९।४)। तात्पर्य है कि साकार और निराकार एक ही हैं, दो नहीं।

‘अमृतस्याव्ययस्य च’ —अविनाशी अमृतका अधिष्ठान मैं ही हूँ और मेरा ही अधिष्ठान अविनाशी अमृत है। तात्पर्य है कि अविनाशी अमृत और मैं—ये दो तत्त्व नहीं हैं, प्रत्युत

एक ही हैं। इसी अविनाशी अमृतकी प्राप्तिको भगवान्ने ‘अमृतमश्नुते ’ (१३।१२; १४।२०) पदसे कहा है।

‘शाश्वतस्य च धर्मस्य’ —सनातन धर्मका आधार मैं हूँ और मेरा आधार सनातन धर्म है। तात्पर्य है कि सनातन धर्म और मैं—ये दो नहीं हैं, प्रत्युत एक ही हैं। सनातन धर्म मेरा ही स्वरूप है*। गीतामें अर्जुनने भगवान्को शाश्वतधर्मका गोप्ता (रक्षक) बताया है (ग्यारहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। भगवान् भी अवतार लेकर सनातन धर्मकी रक्षा किया करते हैं (चौथे अध्यायका आठवाँ श्लोक)।

‘सुखस्यैकान्तिकस्य च’ —ऐकान्तिक सुखका आधार मैं हूँ और मेरा आधार ऐकान्तिक सुख है अर्थात् मेरा ही स्वरूप ऐकान्तिक सुख है। भगवान्ने इसी ऐकान्तिक सुखको ‘अक्षय सुख’ (५।२१), ‘आत्यन्तिक सुख’ (६।२१) और ‘अत्यन्त सुख’ (६।२८) नामसे कहा है।

इस श्लोकमें ‘ब्रह्मणः ’, ‘अमृतस्य ’ आदि पदोंमें ‘राहोः शिरः ’ की तरह अभिन्नतामें षष्ठी विभक्तिका प्रयोग किया गया है। तात्पर्य है कि ‘राहुका सिर’—ऐसा जो प्रयोग होता है, उसमें राहु अलग है और सिर अलग है—ऐसी बात नहीं है, प्रत्युत राहुका नाम ही सिर है और सिरका नाम ही राहु है। ऐसे ही यहाँ ब्रह्म, अविनाशी अमृत आदि ही भगवान् कृष्ण हैं और भगवान् कृष्ण ही ब्रह्म, अविनाशी अमृत आदि हैं।

  • हिन्दू (सनातन), बौद्ध, ईसाई और मुस्लिम—ये चार धर्म वर्तमान समयमें संसारमें मुख्य माने जाते हैं। इन चारोंमेंसे एक-एक धर्मको माननेवालोंकी संख्या करोड़ोंकी है। इनमें बौद्ध, ईसाई और मुस्लिम-धर्मको चलानेवाले क्रमशः बुद्ध, ईसा और मोहम्मद माने जाते हैं। ये तीनों ही धर्म अर्वाचीन हैं। परन्तु हिन्दूधर्म किसी मनुष्यके द्वारा चलाया हुआ नहीं है अर्थात् यह किसी मानवीय बुद्धिकी उपज नहीं है। यह तो विभिन्न ऋषियोंद्वारा किया गया अन्वेषण है, खोज है। खोज उसीकी होती है, जो पहलेसे ही मौजूद हो। हिन्दूधर्म अनादि, अनन्त एवं शाश्वत है। जैसे भगवान् शाश्वत (सनातन) हैं, ऐसे ही हिन्दूधर्म भी शाश्वत है। इसीलिये भगवान्ने यहाँ (गीता १४।२७ में) सनातन हिन्दूधर्मको अपना स्वरूप बताया है। जब-जब हिन्दूधर्मका ह्रास होता है, तब-तब भगवान् अवतार लेकर इसकी संस्थापना करते हैं (गीता—चौथे अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि भगवान् भी इसकी संस्थापना, रक्षा करनेके लिये ही अवतार लेते हैं, इसको बनानेके लिये, उत्पन्न करनेके लिये नहीं। वास्तवमें अन्य सभी धर्म तथा मत-मतान्तर भी इसी सनातन धर्मसे उत्पन्न हुए हैं। इसलिये उन धर्मोंमें मनुष्योंके कल्याणके लिये जो साधन बताये गये हैं, उनको भी हिन्दूधर्मकी ही देन मानना चाहिये। अतः उन धर्मोंमें बताये गये अनुष्ठानोंका भी निष्काषभावसे कर्तव्य समझकर पालन किया जाय, तो कल्याण होनेमें सन्देह नहीं मानना चाहिये। प्राणिमात्रके कल्याणके लिये जितना गहरा विचार हिन्दूधर्ममें किया गया है, उतना दूसरे धर्मोंमें नहीं मिलता। हिन्दूधर्मके सभी सिद्धान्त पूर्णतः वैज्ञानिक और कल्याण करनेवाले हैं।