श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 943, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें१४२ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १४
रात्रिचर्या होती है, गुणातीत मनुष्यकी वैसी ही दिनचर्या-
रात्रिचर्या होती है या उससे विलक्षण होती है? साधारण
आदमीके जैसे आचरण होते हैं; जैसा खान-पान, रहन-
सहन, सोना-जागना होता है, गुणातीत मनुष्यके आचरण, खान-
पान आदि भी वैसे ही होते हैं या कुछ विलक्षण होते हैं?
‘कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतितर्तते’—इन तीनों गुणोंका
अतिक्रमण करनेका क्या उपाय है? अर्थात् कौन-सा साधन
करनेसे मनुष्य गुणातीत हो सकता है?
सम्बन्ध—अर्जुनके प्रश्नोंमेंसे पहले प्रश्नके उत्तरमें भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें गुणातीत मनुष्यके लक्षणोंका वर्णन करते हैं।
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥
श्रीभगवान् बोले—
पाण्डव = हे पाण्डव! सम्प्रवृत्तानि = (ये सभी) अच्छी नहीं करता
प्रकाशम् = प्रकाश तरहसे प्रवृत्त च = और
च = और हो जायँ निवृत्तानि = (ये सभी) निवृत्त
प्रवृत्तिम् = प्रवृत्ति एव = तो भी (गुणातीत हो जायँ तो
च = तथा मनुष्य) (इनकी)
मोहम् = मोह— न, द्वेष्टि = इनसे द्वेष न, काङ्क्षति = इच्छा नहीं करता।
व्याख्या—‘प्रकाशं च’—इन्द्रियों और अन्तःकरणकी 'प्रवृत्ति' को ही लिया है।
स्वच्छता, निर्मलताका नाम प्रकाश है। तात्पर्य है कि जिससे रजोणके दो रूप हैं—राग और क्रिया। इनमेंसे राग
इन्द्रियोंके द्वारा शब्दादि पाँचों विषयोंका स्पष्टतया ज्ञान तो दुःखोंका कारण है। यह राग गुणातीतमें नहीं रहता।
होता है, मनसे मनन होता है और बुद्धिसे निर्णय होता है, परन्तु जबतक गुणातीत मनुष्यका दीखनेवाला शरीर रहता
उसका नाम ‘प्रकाश’ है। है, तबतक उसके द्वारा निष्कामभावपूर्वक स्वतः क्रियाएँ
भगवान्ने पहले (ग्यारहवें श्लोकमें) सत्वगुणकी दो होती रहती हैं। इसी क्रियाशीलताको भगवान्ने यहाँ
वृत्तियाँ बतायी थीं—प्रकाश और ज्ञान। उनमेंसे यहाँ केवल ‘प्रवृत्ति’ नामसे कहा है।
प्रकाश-वृत्ति लेनेका तात्पर्य है कि सत्वगुणमें प्रकाश-वृत्ति ‘मोहमेव च पाण्डव’—मोह दो प्रकारका है—(१)
ही मुख्य है; क्योंकि जबतक इन्द्रियाँ और अन्तःकरणमें नित्य-अनित्य, सत्-असत्, कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक न
प्रकाश नहीं आता, स्वच्छता-निर्मलता नहीं आती, तबतक होना और (२) व्यवहारमें भूल होना। गुणातीत महापुरुषमें
ज्ञान (विवेक) जाग्रत् नहीं होता। प्रकाशके आनेपर ही ज्ञान पहले प्रकारका मोह (सत्-असत् आदिका विवेक न होना)
जाग्रत् होता है। अतः यहाँ ज्ञान-वृत्तिको प्रकाशके ही तो होता ही नहीं (गीता—चौथे अध्यायका पैंतीसवाँ श्लोक)।
अन्तर्गत ले लेना चाहिये। परन्तु व्यवहारमें भूल होना अर्थात् किसीके कहनेसे किसी
‘प्रवृत्ति च’—जबतक गुणोंके साथ सम्बन्ध रहता है, निर्दोष व्यक्तिको दोषी मान लेना और दोषी व्यक्तिको निर्दोष
तबतक रजोणकी लोभ, प्रवृत्ति, रागपूर्वक कर्मोंका मान लेना आदि तथा रस्सीमें साँप दीख जाना, मृगतृष्णामें
आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा—ये वृत्तियाँ पैदा होती रहती जल दीख जाना, सीपी और अभ्रकमें चाँदीका भ्रम हो जाना
हैं। परन्तु जब मनुष्य गुणातीत हो जाता है, तब रजोणके आदि मोह तो गुणातीत मनुष्यमें भी होता है।
साथ तादात्म्य रखनेवाली वृत्तियाँ तो पैदा हो ही नहीं ‘न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति’—
सकतीं, पर आसक्ति, कामनासे रहित प्रवृत्ति (क्रियाशीलता) सत्वगुणका कार्य ‘प्रकाश’, रजोणका कार्य ‘प्रवृत्ति’ और
रहती है। यह प्रवृत्ति दोषी नहीं है। गुणातीत मनुष्यके द्वारा तमोगुणका कार्य ‘मोह’—इन तीनोंके अच्छी तरह प्रवृत्त
भी क्रियाएँ होती हैं। इसलिये भगवान्ने यहाँ केवल होनेपर भी गुणातीत महापुरुष इनसे द्वेष नहीं करता और