श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 942, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
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अतिक्रमण कर जाता है, वह सदाके लिये जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाके दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।
इस मनुष्यशरीरमें रहते हुए जिसको बोध हो जाता है, उसका फिर जन्म होनेका तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता। हाँ, उसके अपने कहलानेवाले शरीरके रहते हुए वृद्धावस्था और मृत्यु तो आयेगी ही, पर उसको वृद्धावस्था और मृत्युका दुःख नहीं होगा।
वर्तमानमें शरीरके साथ स्वयंकी एकता माननेसे ही पुनर्जन्म होता है और शरीरमें होनेवाले जरा व्याधि आदिके
दुःखोंको जीव अपनेमें मान लेता है। शरीर गुणोंके संगसे उत्पन्न होता है। देहके उत्पादक गुणोंसे रहित होनेके कारण गुणातीत महापुरुष देहके सम्बन्धसे होनेवाले सभी दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।
अतः प्रत्येक मनुष्यको मृत्युसे पहले-पहले अपने गुणातीत स्वरूपका अनुभव कर लेना चाहिये। गुणातीत होनेसे जरा,व्याधि, मृत्यु आदि सब प्रकारके दुःखोंसे मुक्ति हो जाती है और मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है। फिर उसका पुनर्जन्म होता ही नहीं।
परिशिष्ट भाव —मनुष्यमात्रके भीतर यह भाव रहता है कि मैं बना रहूँ, कभी मरूँ नहीं। वह अमर रहना चाहता है। अमरताकी इस इच्छासे सिद्ध होता है कि वास्तवमें वह अमर है। अगर वह अमर न होता तो उसमें अमरताकी इच्छा भी नहीं होती। उदाहरणार्थ, भूख और प्यास लगती है तो इससे सिद्ध होता है कि ऐसी वस्तु (अन्न और जल) है, जिससे वह भूख-प्यास बुझ जाय। अगर अन्न-जल न होता तो भूख-प्यास भी नहीं लगती। अतः अमरता स्वतःसिद्ध है—‘भूतग्रामः स एवायं ’……’ (गीता ८।१९)। परन्तु स्वरूपसे अमर होते हुए भी जब मनुष्य अपने विवेकका तिरस्कार करके मरणधर्मा शरीरके साथ तादात्म्य मान लेता है अर्थात् ‘मैं शरीर हूँ’ ऐसा मान लेता है, तब उसमें मृत्युका भय और अमरताकी इच्छा पैदा हो जाती है। जब वह अपने विवेकको महत्त्व देता है कि ‘मैं शरीर नहीं हूँ; शरीर तो निरन्तर मृत्युमें रहता है और मैं स्वयं निरन्तर अमरतामें रहता हूँ’, तब उसको अपनी स्वतःसिद्ध अमरताका अनुभव हो जाता है। शरीरके विकारोंका, परिवर्तनका अनुभव स्वयं सदा एक रहते हुए ही करता है। अतः साधकको चाहिये कि वह विकारोंको, परिवर्तनको मुख्यता न देकर अपने होनेपनको, अपनी अमरताको मुख्यता दे। यह श्लोक चौदहवें अध्यायका सार, निचोड़ है।
सम्बन्ध—गुणातीत पुरुष दुःखोंसे मुक्त होकर अमरताको प्राप्त कर लेता है—ऐसा सुनकर अर्जुनके मनमें गुणातीत मनुष्यके लक्षण जाननेकी जिज्ञासा हुई। अतः वे आगेके श्लोकमें भगवान्से प्रश्न करते हैं।
अर्जुन उवाच
कैलिङ्गैस्त्रीनुणानेतानतीतो भवति प्रभो। किमाचारः कथं चैतांस्त्रीनुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥
अर्जुन बोले—
| प्रभो | = हे प्रभो ! | लिङ्गैः | = लक्षणोंसे | एतान् | = इन |
|---|---|---|---|---|---|
| एतान् | = इन | (युक्त) | त्रीन् | = तीनों | |
| त्रीन् | = तीनों | भवति | = होता है ? | गुणान् | = गुणोंका |
| गुणान् | = गुणोंसे | किमाचारः | = उसके आचरण | कथम्, | |
| अतीतः | = अतीत हुआ मनुष्य | कैसे होते हैं ? | अतिवर्तते | = अतिक्रमण कैसे किया | |
| कैः | = किन | च | = और | जा सकता है ? |
व्याख्या—‘कैलिङ्गैस्त्रीनुणानेतानतीतो भवति प्रभो’—हे प्रभो ! मैं यह जानना चाहता हूँ कि जो गुणोंका अतिक्रमण कर चुका है, ऐसे मनुष्यके क्या लक्षण होते हैं? तात्पर्य है कि संसारी मनुष्यकी अपेक्षा गुणातीत मनुष्यमें ऐसी कौन-सी विलक्षणता आ जाती है, जिससे साधारण व्यक्ति समझ ले कि यह गुणातीत पुरुष है ?
‘किमाचारः’—उस गुणातीत मनुष्यके आचरण कैसे होते हैं ? अर्थात् साधारण आदमीकी जैसी दिनचर्या और