सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 941, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 941

१४०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।

जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते

॥ २० ॥

देही | = देहधारी (विवेकी मनुष्य) | त्रीन् | = तीनों | दुःखोसे | ---|---|---|---|---|--- देहसमुद्भवान् | = देहको उत्पन्न करनेवाले | गुणान् | = गुणोंका | विमुक्तः | = रहित हुआ एतान् | = इन | अतीत्य | = अतिक्रमण करके | अमृतम् | = अमरताका | | जन्ममृत्युजरादुःखैः | = जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूप | अश्नुते | = अनुभव करता है।

व्याख्या— ‘गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्’—यद्यपि विचार-कुशल मनुष्यका देहेके साथ सम्बन्ध नहीं होता, तथापि लोगोंकी दृष्टिमें देहवाला होनेसे उसको यहाँ ‘देही’ कहा गया है।

देहको उत्पन्न करनेवाले गुण ही हैं। जिस गुणके साथ मनुष्य अपना सम्बन्ध मान लेता है, उसके अनुसार उसको ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेना ही पड़ता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।

अभी इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकसे अठारहवें श्लोकतक जिनका वर्णन हुआ है, उन्हीं तीनों गुणोंके लिये यहाँ ‘एतान् त्रीन् गुणान्’ पद आये हैं। विचार-कुशल मनुष्य इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है अर्थात् इनके साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता, इनके साथ माने हुए सम्बन्धका त्याग कर देता है। कारण कि उसको यह स्पष्ट विवेक हो जाता है कि सभी गुण परिवर्तनशील हैं, उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं और अपना स्वरूप गुणोंसे कभी लिप्त हुआ नहीं, हो सकता भी नहीं। ध्यान देनेकी बात है कि जिस प्रकृतिसे ये गुण उत्पन्न होते हैं, उस प्रकृतिके साथ भी स्वयंका किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है, फिर गुणोंके साथ तो उसका सम्बन्ध हो ही कैसे सकता है?

‘जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते’ —जब साधक इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है, तो फिर उसको जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाका दुःख नहीं होता। वह जन्म-मृत्यु आदिके दुःखोंसे छूट जाता है; क्योंकि जन्म आदिके होनेमें गुणोंका संग ही कारण है। ये गुण आते-जाते रहते हैं; इनमें परिवर्तन होता रहता है। गुणोंकी वृत्तियाँ कभी सात्त्विकी, कभी राजसी और कभी तामसी हो जाती हैं; परन्तु स्वयंमें कभी सात्त्विकपना, राजसपना और तामसपना आता ही नहीं। स्वयं (स्वरूप) तो स्वतः असंग रहता है। इस असंग स्वरूपका कभी जन्म नहीं होता। जब जन्म

नहीं होता, तो मृत्यु भी नहीं होती। कारण कि जिसका जन्म होता है, उसीकी मृत्यु होती है तथा उसीकी वृद्धावस्था भी होती है। गुणोंका संग रहनेसे ही जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाके दुःखोंका अनुभव होता है। जो गुणोंसे सर्वथा निलिप्तताका अनुभव कर लेता है, उसको स्वतःसिद्ध अमरताका अनुभव हो जाता है।

देहसे तादात्म्य (एकता) माननेसे ही मनुष्य अपनेको मरनेवाला समझता है। देहेके सम्बन्धसे होनेवाले सम्पूर्ण दुःखोंमें सबसे बड़ा दुःख मृत्यु ही माना गया है। मनुष्य स्वरूपसे है तो अमर ही; किन्तु भोग और संग्रहमें आसक्त होनेसे और प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले शरीरको अमर रखनेकी इच्छासे ही इसको अमरताका अनुभव नहीं होता। विवेकी मनुष्य देहसे तादात्म्य नष्ट होनेपर अमरताका अनुभव करता है।

पूर्वश्लोकमें ‘मद्भ्रान्तं सोऽधिगच्छति’ पदोंसे भगवद्भावकी प्राप्ति कही गयी एवं यहाँ ‘अमृतमश्नुते’ पदोंसे अमरताका अनुभव करनेको कहा गया—वस्तुतः दोनों एक ही बात है।

गीतामें ‘जरामरणमोक्षाय’ (७।२९), ‘जन्ममृत्यु-जराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्’ (१३।८) और यहाँ ‘जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तः’ (१४।२०)—इन तीनों जगह बाल्य और युवा-अवस्थाका नाम न लेकर ‘जरा’ (वृद्धावस्था) का ही नाम लिया गया है, जबकि शरीरमें बाल्य, युवा और वृद्ध—ये तीनों ही अवस्थाएँ होती हैं। इसका कारण यह है कि बाल्य और युवा-अवस्थाओंमें मनुष्य अधिक दुःखका अनुभव नहीं करता; क्योंकि इन दोनों ही अवस्थाओंमें शरीरमें बल रहता है। परन्तु वृद्धावस्थामें शरीरमें बल न रहनेसे मनुष्य अधिक दुःखका अनुभव करता है। ऐसे ही जब मनुष्यके प्राण छूटते हैं, तब वह भयंकर दुःखका अनुभव करता है। परन्तु जो तीनों गुणोंका