श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 940, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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सूक्ष्म भेद हो जाते हैं। अतः गुणोंके तारतम्यसे प्रत्येक प्राणीका अलग-अलग स्वभाव होता है।
अपने कहलानेवाले अन्तःकरणमें सात्त्विक, राजस और तामस वृत्तियोंके आनेपर भी वह गुणातीत ही रहता है (चौदहवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। अतः भगवान्की उपासना करना और गुणातीत महापुरुषका संग करना—ये दोनों ही निर्गुण होनेसे साधकको गुणातीत करनेवाले हैं।
जैसे भगवान्के द्वारा सात्त्विक, राजस और तामस कार्य होते हुए भी वे गुणातीत ही रहते हैं (सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक), ऐसे ही गुणातीत महापुरुषके
परिशिष्ट भाव—तमोगुण थोड़ा बढ़नेपर मनुष्य मूढ़ योनियोंमें जाता है और ज्यादा बढ़नेपर नरकोंमें जाता है।
सम्बन्ध—पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतक प्रकृतिके कार्य गुणोंका परिचय देकर अब आगेके दो श्लोकोंमें स्वयंको तीनों गुणोंसे अतीत अनुभव करनेका वर्णन करते हैं।
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥
यदा = जब द्रष्टा = विवेकी (विचार-कुशल) मनुष्य गुणेभ्यः = तीनों गुणोंके (सिवाय) अन्यम् = अन्य किसीको कर्तारम् = कर्ता न = नहीं अनुपश्यति = देखता च = और (अपनेको) गुणेभ्यः = गुणोंसे परम् = पर वेत्ति = अनुभव करता है, (तब) सः = वह मद्भावम् = मेरे सत्स्वरूपको अधिगच्छति = प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या—'नान्यं गुणेभ्यः .................... मद्भावं सोऽधिगच्छति'—गुणोंके सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं अर्थात् सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंसे ही हो रही हैं, सम्पूर्ण परिवर्तन गुणोंमें ही हो रहा है। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण क्रियाओं और परिवर्तनोंमें गुण ही कारण हैं और कोई कारण नहीं है। वे गुण जिससे प्रकाशित होते हैं, वह तत्त्व गुणोंसे पर है। गुणोंसे पर होनेसे वह कभी गुणोंसे लिप्त नहीं होता अर्थात् गुणों और क्रियाओंका उसपर कोई असर नहीं पड़ता। ऐसे उस तत्त्वको जो विचार-कुशल साधक
जान लेता है अर्थात् विवेकके द्वारा अपने-आपको गुणोंसे पर, असम्बद्ध, निर्लिप्त अनुभव कर लेता है कि गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध न कभी हुआ है, न है, न होगा और न हो ही सकता है। कारण कि गुण परिवर्तनशील हैं और स्वयंमें कभी परिवर्तन होता ही नहीं। वह फिर मेरे भावको, मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य है कि वह जो भूलसे गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मानता था, वह मान्यता मिट जाती है और मेरे साथ उसका जो स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है, वह ज्यों-का-त्यों रह जाता है।
परिशिष्ट भाव—'गुणेभ्यश्च परं वेत्ति' का तात्पर्य है कि जिससे गुण प्रकाशित होते हैं, उस प्रकाशकमें अपनी स्थितिका अनुभव करना (गीता-तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।
'मद्भावं सोऽधिगच्छति' पदोंका अर्थ है कि वह मेरे भावको अर्थात् ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। इसी बातको दूसरे श्लोकमें 'मम साधर्म्यमागताः' पदोंसे कहा गया है।
विवेकी साधक गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे अर्थात् क्रिया और पदार्थसे असंग अनुभव करता है। क्रिया और पदार्थसे असंग अनुभव करनेपर वह योगारूढ़ हो जाता है—'यदा हि नेन्द्रियार्थेषु........' (गीता ६।४)। योगारूढ़ होनेसे शान्तिकी प्राप्ति होती है और उस शान्तिमें न अटकनेसे परमात्माकी प्राप्ति होती है।