श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक १९ ]
- साधक-संजीवनी *
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सूक्ष्म भेद हो जाते हैं। अतः गुणोंके तारतम्यसे प्रत्येक प्राणीका अलग-अलग स्वभाव होता है।
अपने कहलानेवाले अन्तःकरणमें सात्त्विक, राजस और तामस वृत्तियोंके आनेपर भी वह गुणातीत ही रहता है (चौदहवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। अतः भगवान्की उपासना करना और गुणातीत महापुरुषका संग करना—ये दोनों ही निर्गुण होनेसे साधकको गुणातीत करनेवाले हैं।
जैसे भगवान्के द्वारा सात्त्विक, राजस और तामस कार्य होते हुए भी वे गुणातीत ही रहते हैं (सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक), ऐसे ही गुणातीत महापुरुषके
परिशिष्ट भाव—तमोगुण थोड़ा बढ़नेपर मनुष्य मूढ़ योनियोंमें जाता है और ज्यादा बढ़नेपर नरकोंमें जाता है।
सम्बन्ध—पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतक प्रकृतिके कार्य गुणोंका परिचय देकर अब आगेके दो श्लोकोंमें स्वयंको तीनों गुणोंसे अतीत अनुभव करनेका वर्णन करते हैं।
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥
यदा = जब द्रष्टा = विवेकी (विचार-कुशल) मनुष्य गुणेभ्यः = तीनों गुणोंके (सिवाय) अन्यम् = अन्य किसीको कर्तारम् = कर्ता न = नहीं अनुपश्यति = देखता च = और (अपनेको) गुणेभ्यः = गुणोंसे परम् = पर वेत्ति = अनुभव करता है, (तब) सः = वह मद्भावम् = मेरे सत्स्वरूपको अधिगच्छति = प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या—'नान्यं गुणेभ्यः .................... मद्भावं सोऽधिगच्छति'—गुणोंके सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं अर्थात् सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंसे ही हो रही हैं, सम्पूर्ण परिवर्तन गुणोंमें ही हो रहा है। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण क्रियाओं और परिवर्तनोंमें गुण ही कारण हैं और कोई कारण नहीं है। वे गुण जिससे प्रकाशित होते हैं, वह तत्त्व गुणोंसे पर है। गुणोंसे पर होनेसे वह कभी गुणोंसे लिप्त नहीं होता अर्थात् गुणों और क्रियाओंका उसपर कोई असर नहीं पड़ता। ऐसे उस तत्त्वको जो विचार-कुशल साधक
जान लेता है अर्थात् विवेकके द्वारा अपने-आपको गुणोंसे पर, असम्बद्ध, निर्लिप्त अनुभव कर लेता है कि गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध न कभी हुआ है, न है, न होगा और न हो ही सकता है। कारण कि गुण परिवर्तनशील हैं और स्वयंमें कभी परिवर्तन होता ही नहीं। वह फिर मेरे भावको, मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य है कि वह जो भूलसे गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मानता था, वह मान्यता मिट जाती है और मेरे साथ उसका जो स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है, वह ज्यों-का-त्यों रह जाता है।
परिशिष्ट भाव—'गुणेभ्यश्च परं वेत्ति' का तात्पर्य है कि जिससे गुण प्रकाशित होते हैं, उस प्रकाशकमें अपनी स्थितिका अनुभव करना (गीता-तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।
'मद्भावं सोऽधिगच्छति' पदोंका अर्थ है कि वह मेरे भावको अर्थात् ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। इसी बातको दूसरे श्लोकमें 'मम साधर्म्यमागताः' पदोंसे कहा गया है।
विवेकी साधक गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे अर्थात् क्रिया और पदार्थसे असंग अनुभव करता है। क्रिया और पदार्थसे असंग अनुभव करनेपर वह योगारूढ़ हो जाता है—'यदा हि नेन्द्रियार्थेषु........' (गीता ६।४)। योगारूढ़ होनेसे शान्तिकी प्राप्ति होती है और उस शान्तिमें न अटकनेसे परमात्माकी प्राप्ति होती है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १४ ]
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते
॥ २० ॥
देही | = देहधारी (विवेकी मनुष्य) | त्रीन् | = तीनों | दुःखोसे | ---|---|---|---|---|--- देहसमुद्भवान् | = देहको उत्पन्न करनेवाले | गुणान् | = गुणोंका | विमुक्तः | = रहित हुआ एतान् | = इन | अतीत्य | = अतिक्रमण करके | अमृतम् | = अमरताका | | जन्ममृत्युजरादुःखैः | = जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूप | अश्नुते | = अनुभव करता है।
व्याख्या— ‘गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्’—यद्यपि विचार-कुशल मनुष्यका देहेके साथ सम्बन्ध नहीं होता, तथापि लोगोंकी दृष्टिमें देहवाला होनेसे उसको यहाँ ‘देही’ कहा गया है।
देहको उत्पन्न करनेवाले गुण ही हैं। जिस गुणके साथ मनुष्य अपना सम्बन्ध मान लेता है, उसके अनुसार उसको ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेना ही पड़ता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।
अभी इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकसे अठारहवें श्लोकतक जिनका वर्णन हुआ है, उन्हीं तीनों गुणोंके लिये यहाँ ‘एतान् त्रीन् गुणान्’ पद आये हैं। विचार-कुशल मनुष्य इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है अर्थात् इनके साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता, इनके साथ माने हुए सम्बन्धका त्याग कर देता है। कारण कि उसको यह स्पष्ट विवेक हो जाता है कि सभी गुण परिवर्तनशील हैं, उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं और अपना स्वरूप गुणोंसे कभी लिप्त हुआ नहीं, हो सकता भी नहीं। ध्यान देनेकी बात है कि जिस प्रकृतिसे ये गुण उत्पन्न होते हैं, उस प्रकृतिके साथ भी स्वयंका किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है, फिर गुणोंके साथ तो उसका सम्बन्ध हो ही कैसे सकता है?
‘जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते’ —जब साधक इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है, तो फिर उसको जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाका दुःख नहीं होता। वह जन्म-मृत्यु आदिके दुःखोंसे छूट जाता है; क्योंकि जन्म आदिके होनेमें गुणोंका संग ही कारण है। ये गुण आते-जाते रहते हैं; इनमें परिवर्तन होता रहता है। गुणोंकी वृत्तियाँ कभी सात्त्विकी, कभी राजसी और कभी तामसी हो जाती हैं; परन्तु स्वयंमें कभी सात्त्विकपना, राजसपना और तामसपना आता ही नहीं। स्वयं (स्वरूप) तो स्वतः असंग रहता है। इस असंग स्वरूपका कभी जन्म नहीं होता। जब जन्म
नहीं होता, तो मृत्यु भी नहीं होती। कारण कि जिसका जन्म होता है, उसीकी मृत्यु होती है तथा उसीकी वृद्धावस्था भी होती है। गुणोंका संग रहनेसे ही जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाके दुःखोंका अनुभव होता है। जो गुणोंसे सर्वथा निलिप्तताका अनुभव कर लेता है, उसको स्वतःसिद्ध अमरताका अनुभव हो जाता है।
देहसे तादात्म्य (एकता) माननेसे ही मनुष्य अपनेको मरनेवाला समझता है। देहेके सम्बन्धसे होनेवाले सम्पूर्ण दुःखोंमें सबसे बड़ा दुःख मृत्यु ही माना गया है। मनुष्य स्वरूपसे है तो अमर ही; किन्तु भोग और संग्रहमें आसक्त होनेसे और प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले शरीरको अमर रखनेकी इच्छासे ही इसको अमरताका अनुभव नहीं होता। विवेकी मनुष्य देहसे तादात्म्य नष्ट होनेपर अमरताका अनुभव करता है।
पूर्वश्लोकमें ‘मद्भ्रान्तं सोऽधिगच्छति’ पदोंसे भगवद्भावकी प्राप्ति कही गयी एवं यहाँ ‘अमृतमश्नुते’ पदोंसे अमरताका अनुभव करनेको कहा गया—वस्तुतः दोनों एक ही बात है।
गीतामें ‘जरामरणमोक्षाय’ (७।२९), ‘जन्ममृत्यु-जराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्’ (१३।८) और यहाँ ‘जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तः’ (१४।२०)—इन तीनों जगह बाल्य और युवा-अवस्थाका नाम न लेकर ‘जरा’ (वृद्धावस्था) का ही नाम लिया गया है, जबकि शरीरमें बाल्य, युवा और वृद्ध—ये तीनों ही अवस्थाएँ होती हैं। इसका कारण यह है कि बाल्य और युवा-अवस्थाओंमें मनुष्य अधिक दुःखका अनुभव नहीं करता; क्योंकि इन दोनों ही अवस्थाओंमें शरीरमें बल रहता है। परन्तु वृद्धावस्थामें शरीरमें बल न रहनेसे मनुष्य अधिक दुःखका अनुभव करता है। ऐसे ही जब मनुष्यके प्राण छूटते हैं, तब वह भयंकर दुःखका अनुभव करता है। परन्तु जो तीनों गुणोंका
श्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
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अतिक्रमण कर जाता है, वह सदाके लिये जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाके दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।
इस मनुष्यशरीरमें रहते हुए जिसको बोध हो जाता है, उसका फिर जन्म होनेका तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता। हाँ, उसके अपने कहलानेवाले शरीरके रहते हुए वृद्धावस्था और मृत्यु तो आयेगी ही, पर उसको वृद्धावस्था और मृत्युका दुःख नहीं होगा।
वर्तमानमें शरीरके साथ स्वयंकी एकता माननेसे ही पुनर्जन्म होता है और शरीरमें होनेवाले जरा व्याधि आदिके
दुःखोंको जीव अपनेमें मान लेता है। शरीर गुणोंके संगसे उत्पन्न होता है। देहके उत्पादक गुणोंसे रहित होनेके कारण गुणातीत महापुरुष देहके सम्बन्धसे होनेवाले सभी दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।
अतः प्रत्येक मनुष्यको मृत्युसे पहले-पहले अपने गुणातीत स्वरूपका अनुभव कर लेना चाहिये। गुणातीत होनेसे जरा,व्याधि, मृत्यु आदि सब प्रकारके दुःखोंसे मुक्ति हो जाती है और मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है। फिर उसका पुनर्जन्म होता ही नहीं।
परिशिष्ट भाव —मनुष्यमात्रके भीतर यह भाव रहता है कि मैं बना रहूँ, कभी मरूँ नहीं। वह अमर रहना चाहता है। अमरताकी इस इच्छासे सिद्ध होता है कि वास्तवमें वह अमर है। अगर वह अमर न होता तो उसमें अमरताकी इच्छा भी नहीं होती। उदाहरणार्थ, भूख और प्यास लगती है तो इससे सिद्ध होता है कि ऐसी वस्तु (अन्न और जल) है, जिससे वह भूख-प्यास बुझ जाय। अगर अन्न-जल न होता तो भूख-प्यास भी नहीं लगती। अतः अमरता स्वतःसिद्ध है—‘भूतग्रामः स एवायं ’……’ (गीता ८।१९)। परन्तु स्वरूपसे अमर होते हुए भी जब मनुष्य अपने विवेकका तिरस्कार करके मरणधर्मा शरीरके साथ तादात्म्य मान लेता है अर्थात् ‘मैं शरीर हूँ’ ऐसा मान लेता है, तब उसमें मृत्युका भय और अमरताकी इच्छा पैदा हो जाती है। जब वह अपने विवेकको महत्त्व देता है कि ‘मैं शरीर नहीं हूँ; शरीर तो निरन्तर मृत्युमें रहता है और मैं स्वयं निरन्तर अमरतामें रहता हूँ’, तब उसको अपनी स्वतःसिद्ध अमरताका अनुभव हो जाता है। शरीरके विकारोंका, परिवर्तनका अनुभव स्वयं सदा एक रहते हुए ही करता है। अतः साधकको चाहिये कि वह विकारोंको, परिवर्तनको मुख्यता न देकर अपने होनेपनको, अपनी अमरताको मुख्यता दे। यह श्लोक चौदहवें अध्यायका सार, निचोड़ है।
सम्बन्ध—गुणातीत पुरुष दुःखोंसे मुक्त होकर अमरताको प्राप्त कर लेता है—ऐसा सुनकर अर्जुनके मनमें गुणातीत मनुष्यके लक्षण जाननेकी जिज्ञासा हुई। अतः वे आगेके श्लोकमें भगवान्से प्रश्न करते हैं।
अर्जुन उवाच
कैलिङ्गैस्त्रीनुणानेतानतीतो भवति प्रभो। किमाचारः कथं चैतांस्त्रीनुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥
अर्जुन बोले—
| प्रभो | = हे प्रभो ! | लिङ्गैः | = लक्षणोंसे | एतान् | = इन |
|---|---|---|---|---|---|
| एतान् | = इन | (युक्त) | त्रीन् | = तीनों | |
| त्रीन् | = तीनों | भवति | = होता है ? | गुणान् | = गुणोंका |
| गुणान् | = गुणोंसे | किमाचारः | = उसके आचरण | कथम्, | |
| अतीतः | = अतीत हुआ मनुष्य | कैसे होते हैं ? | अतिवर्तते | = अतिक्रमण कैसे किया | |
| कैः | = किन | च | = और | जा सकता है ? |
व्याख्या—‘कैलिङ्गैस्त्रीनुणानेतानतीतो भवति प्रभो’—हे प्रभो ! मैं यह जानना चाहता हूँ कि जो गुणोंका अतिक्रमण कर चुका है, ऐसे मनुष्यके क्या लक्षण होते हैं? तात्पर्य है कि संसारी मनुष्यकी अपेक्षा गुणातीत मनुष्यमें ऐसी कौन-सी विलक्षणता आ जाती है, जिससे साधारण व्यक्ति समझ ले कि यह गुणातीत पुरुष है ?
‘किमाचारः’—उस गुणातीत मनुष्यके आचरण कैसे होते हैं ? अर्थात् साधारण आदमीकी जैसी दिनचर्या और
१४२ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १४
रात्रिचर्या होती है, गुणातीत मनुष्यकी वैसी ही दिनचर्या-
रात्रिचर्या होती है या उससे विलक्षण होती है? साधारण
आदमीके जैसे आचरण होते हैं; जैसा खान-पान, रहन-
सहन, सोना-जागना होता है, गुणातीत मनुष्यके आचरण, खान-
पान आदि भी वैसे ही होते हैं या कुछ विलक्षण होते हैं?
‘कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतितर्तते’—इन तीनों गुणोंका
अतिक्रमण करनेका क्या उपाय है? अर्थात् कौन-सा साधन
करनेसे मनुष्य गुणातीत हो सकता है?
सम्बन्ध—अर्जुनके प्रश्नोंमेंसे पहले प्रश्नके उत्तरमें भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें गुणातीत मनुष्यके लक्षणोंका वर्णन करते हैं।
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥
श्रीभगवान् बोले—
पाण्डव = हे पाण्डव! सम्प्रवृत्तानि = (ये सभी) अच्छी नहीं करता
प्रकाशम् = प्रकाश तरहसे प्रवृत्त च = और
च = और हो जायँ निवृत्तानि = (ये सभी) निवृत्त
प्रवृत्तिम् = प्रवृत्ति एव = तो भी (गुणातीत हो जायँ तो
च = तथा मनुष्य) (इनकी)
मोहम् = मोह— न, द्वेष्टि = इनसे द्वेष न, काङ्क्षति = इच्छा नहीं करता।
व्याख्या—‘प्रकाशं च’—इन्द्रियों और अन्तःकरणकी 'प्रवृत्ति' को ही लिया है।
स्वच्छता, निर्मलताका नाम प्रकाश है। तात्पर्य है कि जिससे रजोणके दो रूप हैं—राग और क्रिया। इनमेंसे राग
इन्द्रियोंके द्वारा शब्दादि पाँचों विषयोंका स्पष्टतया ज्ञान तो दुःखोंका कारण है। यह राग गुणातीतमें नहीं रहता।
होता है, मनसे मनन होता है और बुद्धिसे निर्णय होता है, परन्तु जबतक गुणातीत मनुष्यका दीखनेवाला शरीर रहता
उसका नाम ‘प्रकाश’ है। है, तबतक उसके द्वारा निष्कामभावपूर्वक स्वतः क्रियाएँ
भगवान्ने पहले (ग्यारहवें श्लोकमें) सत्वगुणकी दो होती रहती हैं। इसी क्रियाशीलताको भगवान्ने यहाँ
वृत्तियाँ बतायी थीं—प्रकाश और ज्ञान। उनमेंसे यहाँ केवल ‘प्रवृत्ति’ नामसे कहा है।
प्रकाश-वृत्ति लेनेका तात्पर्य है कि सत्वगुणमें प्रकाश-वृत्ति ‘मोहमेव च पाण्डव’—मोह दो प्रकारका है—(१)
ही मुख्य है; क्योंकि जबतक इन्द्रियाँ और अन्तःकरणमें नित्य-अनित्य, सत्-असत्, कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक न
प्रकाश नहीं आता, स्वच्छता-निर्मलता नहीं आती, तबतक होना और (२) व्यवहारमें भूल होना। गुणातीत महापुरुषमें
ज्ञान (विवेक) जाग्रत् नहीं होता। प्रकाशके आनेपर ही ज्ञान पहले प्रकारका मोह (सत्-असत् आदिका विवेक न होना)
जाग्रत् होता है। अतः यहाँ ज्ञान-वृत्तिको प्रकाशके ही तो होता ही नहीं (गीता—चौथे अध्यायका पैंतीसवाँ श्लोक)।
अन्तर्गत ले लेना चाहिये। परन्तु व्यवहारमें भूल होना अर्थात् किसीके कहनेसे किसी
‘प्रवृत्ति च’—जबतक गुणोंके साथ सम्बन्ध रहता है, निर्दोष व्यक्तिको दोषी मान लेना और दोषी व्यक्तिको निर्दोष
तबतक रजोणकी लोभ, प्रवृत्ति, रागपूर्वक कर्मोंका मान लेना आदि तथा रस्सीमें साँप दीख जाना, मृगतृष्णामें
आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा—ये वृत्तियाँ पैदा होती रहती जल दीख जाना, सीपी और अभ्रकमें चाँदीका भ्रम हो जाना
हैं। परन्तु जब मनुष्य गुणातीत हो जाता है, तब रजोणके आदि मोह तो गुणातीत मनुष्यमें भी होता है।
साथ तादात्म्य रखनेवाली वृत्तियाँ तो पैदा हो ही नहीं ‘न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति’—
सकतीं, पर आसक्ति, कामनासे रहित प्रवृत्ति (क्रियाशीलता) सत्वगुणका कार्य ‘प्रकाश’, रजोणका कार्य ‘प्रवृत्ति’ और
रहती है। यह प्रवृत्ति दोषी नहीं है। गुणातीत मनुष्यके द्वारा तमोगुणका कार्य ‘मोह’—इन तीनोंके अच्छी तरह प्रवृत्त
भी क्रियाएँ होती हैं। इसलिये भगवान्ने यहाँ केवल होनेपर भी गुणातीत महापुरुष इनसे द्वेष नहीं करता और
श्लोक २२ ]
- साधक-संजीवनी *
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इनके निवृत्त होनेपर भी इनकी इच्छा नहीं करता। तात्पर्य है कि ऐसी वृत्तियाँ क्यों उत्पन्न हो रही हैं, इनमेंसे कोई-सी भी वृत्ति न रहे'—ऐसा द्वेष नहीं करता और 'ये वृत्तियाँ पुनः आ जायँ; ये वृत्तियाँ बनी रहें'—ऐसा राग नहीं करता। गुणातीत होनेके कारण गुणोंकी वृत्तियोंके आने-जानेसे उसमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता। वह इन वृत्तियोंसे स्वाभाविक ही निलिप्त रहता है।
विशेष बात
एक तो वृत्तियोंका 'होना' होता है और एक वृत्तियोंको 'करना' (उनसे सम्बन्ध जोड़ना अर्थात् राग-द्वेष करना) होता है। होने और करनेमें बड़ा अन्तर है। 'होना' समष्टिगत होता है और 'करना' व्यक्तिगत होता है। संसारमें जो 'होता' है, उसकी जिम्मेवारी हमारेपर नहीं होती। जो हम 'करते' हैं, उसीकी जिम्मेवारी हमारेपर होती है।
जिस समष्टि शक्तिसे संसारमात्रका संचालन होता है, उसी शक्तिसे हमारे शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि-(जो कि संसारके ही अंश हैं-) का भी संचालन होता है। जब संसारमें होनेवाली क्रियाओंके गुण-दोष हमें नहीं लगते, तब शरीरादिमें होनेवाली क्रियाओंके गुण-दोष हमें लग ही कैसे सकते हैं? परन्तु जब स्वतः होनेवाली क्रियाओंमेंसे कुछ क्रियाओंके साथ मनुष्य राग-द्वेषपूर्वक अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है अर्थात् उनका कर्ता बन जाता है, तब उनका फल उसको ही भोगना पड़ता है। इसलिये अन्तःकरणमें सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे होनेवाली अच्छी-बुरी वृत्तियोंसे साधकको राग-द्वेष नहीं करना चाहिये अर्थात् उनसे अपना सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिये।
वृत्तियाँ एक समान किसीकी भी नहीं रहतीं। तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ तो गुणातीत महापुरुषके अन्तःकरणमें भी होती हैं, पर उसका उन वृत्तियोंसे राग-द्वेष नहीं होता। वृत्तियाँ आप-से-आप आती और चली जाती हैं। गुणातीत
परिशिष्ट भाव —गुणातीत मनुष्यमें 'अनुकूलता बनी रहे, प्रतिकूलता चली जाय' ऐसी इच्छा नहीं होती। निर्विकारताका अनुभव होनेपर उसको अनुकूलता-प्रतिकूलताका ज्ञान तो होता है, पर स्वयंपर उनका असर नहीं पड़ता। अन्तःकरणमें वृत्तियाँ बदलती हैं, पर स्वयं उनसे निलिप्त रहता है। साधकपर भी वृत्तियोंका असर नहीं पड़ना चाहिये; क्योंकि गुणातीत मनुष्य साधकका आदर्श होता है, साधक उसका अनुयायी होता है।
साधकमात्रके लिये यह आवश्यक है कि वह देहका धर्म अपनेमें न माने। वृत्तियाँ अन्तःकरणमें हैं, अपनेमें नहीं हैं। अतः साधक वृत्तियोंको न अच्छा माने, न बुरा माने और न अपनेमें माने। कारण कि वृत्तियाँ तो आने-जानेवाली हैं, पर स्वयं निरन्तर रहनेवाला है। अगर वृत्तियाँ हमारेमें होतीं तो जबतक हम रहते, तबतक वृत्तियाँ भी रहतीं। परन्तु यह सबका अनुभव है कि हम तो निरन्तर रहते हैं, पर वृत्तियाँ आती-जाती रहती हैं। वृत्तियोंका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ है और हमारा (स्वयंका) सम्बन्ध परमात्माके साथ है। इसलिये वृत्तियोंके परिवर्तनका अनुभव करनेवाला स्वयं एक ही रहता है।
महापुरुषकी दृष्टि उधर जाती ही नहीं; क्योंकि उसकी दृष्टिमें एक परमात्मत्त्वके सिवाय और कुछ रहता ही नहीं।
देखना और दीखना—दोनोंमें बड़ा फरक है। देखना 'करने' के अन्तर्गत होता है और दीखना 'होने' के अन्तर्गत होता है। दोष देखनेमें होता है, दीखनेमें नहीं। अतः साधकको यदि अन्तःकरणमें खराब-से-खराब वृत्ति भी दीख जाय, तो भी उसको घबराना नहीं चाहिये। अपने-आप दीखनेवाली (होनेवाली) वृत्तियोंसे राग-द्वेष करना अर्थात् उनके अनुसार अपनी स्थिति मानना ही उनको देखना है। साधकसे भूल यही होती है कि वह दीखनेवाली वस्तुको देखने लग जाता है और फँस जाता है। भगवान् राम कहते हैं—
सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक।
गुन यह उभय न देखिअहि देखिअ सो अबिबेक॥
(मानस ७। ४१)
साधकको गहराईसे विचार करना चाहिये कि वृत्तियाँ तो उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं, पर स्वयं (अपना स्वरूप) सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। वृत्तियोंमें होनेवाले परिवर्तनको देखनेवाला स्वरूप परिवर्तनरहित है। कारण कि परिवर्तनशीलको परिवर्तनशील नहीं देख सकता, प्रत्युत परिवर्तनरहित ही परिवर्तनशीलको देख सकता है। इससे सिद्ध होता है कि स्वरूप वृत्तियोंसे अलग है। परिवर्तनशील गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मान लेनेसे ही गुणोंमें होनेवाली वृत्तियाँ अपनेमें प्रतीत होती हैं। अतः साधकको आने-जानेवाली वृत्तियोंके साथ मिलकर अपने वास्तविक स्वरूपसे विचलित नहीं होना चाहिये। चाहे जैसी वृत्तियाँ आयें, उनसे राजी-नाराज नहीं होना चाहिये; उनके साथ अपनी एकता नहीं माननी चाहिये। सदा एकरस रहनेवाले गुणोंसे सर्वथा निलिप्त, निर्विकार एवं अविनाशी अपने स्वरूपको न देखकर परिवर्तनशील, विकारी एवं विनाशी वृत्तियोंको देखना साधकके लिये महान् बाधक है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १४ ]
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३ ॥
| यः | = जो | (तथा) | यः | = जो (अपने स्वरूपमें) |
|---|---|---|---|---|
| उदासीनवत् | = उदासीनकी तरह | गुणाः | = गुण | ही) |
| आसीनः | = स्थित है (और) | एव | = ही | अवतिष्ठति |
| गुणैः | = (जो) गुणोंके द्वारा | (गुणोंमें) | = स्थित रहता है | |
| न, विचाल्यते | = विचलित नहीं | वर्तन्ते | = बरत रहे हैं— | (और स्वयं कोई भी) |
| किया जा सकता | इति | = इस भावसे | न, इङ्गते | |
| = चेष्टा नहीं करता। |
व्याख्या—‘उदासीनवदासीनः’ —दो व्यक्ति परस्पर विवाद करते हों, तो उन दोनोंमेंसे किसी एकका पक्ष लेनेवाला ‘पक्षपाती’ कहलाता है और दोनोंका न्याय करनेवाला ‘मध्यस्थ’ कहलाता है। परन्तु जो उन दोनोंको देखता तो है, पर न तो किसीका पक्ष लेता है और न किसीसे कुछ कहता ही है, वह ‘उदासीन’ कहलाता है। ऐसे ही संसार और परमात्मा—दोनोंको देखनेसे गुणाती मनुष्य उदासीनकी तरह दीखता है।
वास्तवमें देखा जाय तो संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। सत्-स्वरूप परमात्माकी सत्तासे ही संसार सत्तावाला दीख रहा है। अतः जब गुणातीत मनुष्यकी दृष्टिमें संसारकी सत्ता है ही नहीं, केवल एक परमात्माकी सत्ता ही है, तो फिर वह उदासीन किससे हो? परन्तु जिनकी दृष्टिमें संसार और परमात्माकी सत्ता है, ऐसे लोगोंकी दृष्टिमें वह गुणातीत मनुष्य उदासीनकी तरह दीखता है।
‘गुणैर्यो न विचाल्यते’ —उसके कहलानेवाले अन्तःकरणमें सत्त्व, रज, और तम—इन गुणोंकी वृत्तियाँ तो आती हैं, पर वह इनसे विचलित नहीं होता। तात्पर्य है कि जैसे अपने सिवाय दूसरोंके अन्तःकरणमें गुणोंकी वृत्तियाँ आनेपर अपनेमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता, ऐसे
ही उसके कहलानेवाले अन्तःकरणमें गुणोंकी वृत्तियाँ आनेपर उसमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता अर्थात् वह उन वृत्तियोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता। कारण कि उसके कहे जानेवाले अन्तःकरणमें अन्तःकरणसहित सम्पूर्ण संसारका अत्यन्त अभाव एवं परमात्मतत्त्वका भाव निरन्तर स्वतः—स्वाभाविक जाग्रत् रहता है।
‘गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति’ —गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (गीता—तीसरे अध्यायका अष्टाईसवाँ श्लोक) अर्थात् गुणोंमें ही सम्पूर्ण क्रियाएँ हो रही हैं—ऐसा समझकर वह अपने स्वरूपमें निर्विकाररूपसे स्थित रहता है।
‘न इंगते’ —पहले ‘गुणा वर्तन्त इत्येव’ पदोंसे उसका गुणोंके साथ सम्बन्धका निषेध किया, अब ‘न इंगते’ पदोंसे उसमें क्रियाओंका अभाव बताते हैं। तात्पर्य है कि गुणातीत पुरुष खुद कुछ भी चेष्टा नहीं करता। कारण कि अविनाशी शुद्ध स्वरूपमें कभी कोई क्रिया होती ही नहीं।
[बाईसवें और तेईसवें—इन दो श्लोकोंमें भगवान्ने गुणातीत महापुरुषकी तटस्थता, निलिप्तताका वर्णन किया है।]
परिशिष्ट भाव—‘न विचाल्यते’, ‘अवतिष्ठति’ और ‘नेङ्गते’—ये तीनों पद वास्तवमें एक ही अर्थ रखते हैं। फिर भी ये तीनों पद देनेका तात्पर्य है कि गुणातीत महापुरुष स्वतः—स्वाभाविक अचल (स्थिरतामें) रहता है। वह न तो स्वयं विचलित होता है और न किसीसे विचलित किया जा सकता है।
‘करना’, ‘होना’ और ‘है’—ये तीन विभाग हैं। ‘करना’ होनेमें और ‘होना’ ‘है’ में बदल जाय तो अहंकार सर्वथा नष्ट हो जाता है। जिसके अन्तःकरणमें क्रिया और पदार्थका महत्त्व है, ऐसा असाधक (संसारी मनुष्य) मानता है कि ‘मैं क्रिया कर रहा हूँ’—‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३।२७)। जो कर्ता बनता है, उसको भीका बनना ही पड़ता है। जिसमें विवेककी प्रधानता है, ऐसा साधक अनुभव करता है कि ‘क्रिया हो रही है’—‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ (गीता ३।२८) अर्थात् ‘मैं कुछ भी नहीं करता हूँ’—‘नैव किंचित्करोमीति’ (गीता ५।८)। परन्तु जिसको तत्त्वज्ञान हो गया है, ऐसा सिद्ध महापुरुष केवल सत्ता तथा ज्ञप्तिमात्र (‘है’) का ही अनुभव करता है—‘योऽवतिष्ठति नेङ्गते’। वह चिन्मय सत्ता सम्पूर्ण क्रियाओंमें ज्यों-की-त्यों परिपूर्ण है। क्रियाओंका तो अन्त हो जाता है, पर चिन्मय सत्ता
श्लोक २४-२५ ]
- साधक-संजीवनी *
९४५
ज्यों-की-त्यों रहती है। महापुरुषकी दृष्टि क्रियाओंपर न रहकर स्वतः एकमात्र चिन्मय सत्ता ('है') पर ही रहती है।
सम्बन्ध-इक्कीसवें श्लोकमें अर्जुनने दूसरे प्रश्नके रूपमें गुणातीत मनुष्यके आचरण पूछे थे। उसका उत्तर अब आगेके दो श्लोकोंमें देते हैं।
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥
धीर: = जो धीर मनुष्य
समदुःख-
सुख: = दुःख-सुखमें
सम (तथा)
स्वस्थ: = अपने स्वरूपमें
स्थित रहता है;
समलोष्टाश्म-
काञ्चन: = जो मिट्टीके
ढेले, पत्थर और
सोनेमें सम रहता है;
तुल्यप्रियाप्रिय: = जो प्रिय-अप्रियमें
सम रहता है,
तुल्यनिन्दात्म-
संस्तुति: = जो अपनी
निन्दा-स्तुतिमें
सम रहता है;
मानापमानयो: = जो मान-अपमानमें
तुल्य: = सम रहता है;
मित्रारिपक्षयो: = जो मित्र-शत्रुके
पक्षमें
तुल्य: = सम रहता है (और)
सर्वारम्भपरित्यागी = जो सम्पूर्ण
कर्मोंके आरम्भका
त्यागी है,
स: = वह मनुष्य
गुणातीतः = गुणातीत
उच्यते = कहा जाता है।
व्याख्या-'धीरः, समदुःखसुखः' - नित्य-अनित्य, सार-असार आदिके तत्त्वको जानकर स्वतःसिद्ध स्वरूपमें स्थित होनेसे गुणातीत मनुष्य धैर्यवान् कहलाता है।
पूर्वकर्मोंके अनुसार आनेवाली अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिका नाम सुख-दुःख है अर्थात् प्रारब्धके अनुसार शरीर, इन्द्रियों आदिके अनुकूल परिस्थितिको 'सुख' कहते हैं और शरीर, इन्द्रियों आदिके प्रतिकूल परिस्थितिको 'दुःख' कहते हैं। गुणातीत मनुष्य इन दोनोंमें सम रहता है। तात्पर्य है कि सुख-दुःखरूप बाह्य परिस्थितियाँ उसके कहे जानेवाले अन्तःकरणमें विकार पैदा नहीं कर सकतीं, उसको सुखी-दुःखी नहीं कर सकतीं।
ढेलेकी जगह रखता है, पत्थरको पत्थरकी जगह रखता है और स्वर्णको स्वर्णकी जगह (तिजोरी आदिमें) रखता है। तात्पर्य है कि यद्यपि उनकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें उसको हर्ष-शोक नहीं होते, वह सम रहता है, तथापि उनसे व्यवहार तो यथायोग्य ही करता है।
ढेले, पत्थर और स्वर्णका ज्ञान न होना समता नहीं कहलाती। समता वही है कि इन तीनोंका ज्ञान होते हुए भी इनमें राग-द्वेष न हों। ज्ञान कभी दोषी नहीं होता, विकार ही दोषी होते हैं।
'स्वस्थः' - स्वरूपमें सुख-दुःख है ही नहीं। स्वरूपसे तो सुख-दुःख प्रकाशित होते हैं। अतः गुणातीत मनुष्य आने-जानेवाले सुख-दुःखका भोक्ता नहीं बनता, प्रत्युत अपने नित्य-निरन्तर रहनेवाले स्वरूपमें स्थिर रहता है।
'तुल्यप्रियाप्रियः' - क्रियमाण कर्मोंकी सिद्धि-असिद्धिमें अर्थात् उनके तात्कालिक फलकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें भी वह सम रहता है।
'समलोष्टाश्मकाञ्चनः' - उसका मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णमें न तो आकर्षण (राग) होता है और न विकर्षण (द्वेष) होता है। परन्तु व्यवहारमें वह ढेलेको
'तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः' - निन्दा और स्तुतिमें नामकी मुख्यता होती है। गुणातीत मनुष्यका नामके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता; अतः कोई निन्दा करे तो उसके चित्तमें खिन्नता नहीं होती और कोई स्तुति करे तो उसके चित्तमें प्रसन्नता नहीं होती। इसी प्रकार निन्दा करनेवालोंके प्रति उसका द्वेष नहीं होता और स्तुति करनेवालोंके प्रति उसका राग नहीं होता।
१४६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १४ ]
साधारण मनुष्योंकी यह एक आदत बन जाती है कि उनको अपनी निन्दा बुरी लगती है और स्तुति अच्छी लगती है। परन्तु जो गुणोंसे ऊँचे उठ जाते हैं, उनको निन्दा-स्तुतिका ज्ञान तो होता है और वे बर्ताव भी सबके साथ यथोचित ही करते हैं, पर उनमें निन्दा-स्तुतिको लेकर खिन्नता-प्रसन्नता नहीं होती। कारण कि वे जिस तत्त्वमें स्थित हैं, वहाँ गुणोंवाली परकृत निन्दा-स्तुति पहुँचती ही नहीं।
निन्दा और स्तुति—ये दोनों ही परकृत क्रियाएँ हैं। उन क्रियाओंसे राजी-नाराज होना गलती है। कारण कि जिसका जैसा स्वभाव है, जैसी धारणा है, वह उसके अनुसार ही बोलता है। वह हमारे अनुकूल ही बोले, हमारी निन्दा न करे—यह न्याय नहीं है अर्थात् उसको बोलनेमें बाध्य करनेका भाव न्याय नहीं है, अन्याय है। दूसरोंपर हमारा क्या अधिकार है कि तुम हमारी निन्दा मत करो ? हमारी स्तुति ही करो ? दूसरी बात, कोई निन्दा करता है तो उसमें साधकको प्रसन्न होना चाहिये कि इससे मेरे पाप कट रहे हैं, मैं शुद्ध हो रहा हूँ। अगर कोई हमारी प्रशंसा करता है, तो उससे हमारे पुण्य नष्ट होते हैं। अतः प्रशंसामें राजी नहीं होना चाहिये; क्योंकि राजी होनेमें खतरा है !
‘मानापमानयोस्तुल्यः’ —मान और अपमान होनेमें शरीरकी मुख्यता होती है। गुणातीत मनुष्यका शरीरके साथ तादात्म्य नहीं रहता। अतः कोई उसका आदर करे या निरादर करे, मान करे या अपमान करे, इन परकृत क्रियाओंका उसपर कोई असर नहीं पड़ता।
निन्दा-स्तुति और मान-अपमान—इन दोनों ही परकृत क्रियाओंमें गुणातीत मनुष्य सम रहता है। इन दोनों परकृत क्रियाओंका ज्ञान होना दोषी नहीं है, प्रत्युत निन्दा और अपमानमें दुःखी होना तथा स्तुति और मानमें हर्षित होना दोषी है; क्योंकि ये दोनों ही प्रकृतिके विकार हैं। गुणातीत पुरुषको निन्दा-स्तुति और मान-अपमानका ज्ञान तो होता है, पर गुणोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे, नाम और शरीरके साथ तादात्म्य न रहनेसे वह सुखी-दुःखी नहीं होता। कारण कि वह जिस तत्त्वमें स्थित है, वहाँ ये विकार नहीं हैं। वह तत्त्व गुणरहित है, निर्विकार है।
‘तुल्यो मित्रारिपक्षयोः’ —वह मित्र और शत्रुके पक्षमें सम रहता है। यद्यपि गुणातीत मनुष्यकी दृष्टिमें कोई मित्र और शत्रु नहीं होता, तथापि दूसरे लोग अपनी भावनाके अनुसार उसे अपना मित्र अथवा शत्रु भी मान
सकते हैं। साधारण मनुष्यको भी दूसरे लोग अपनी भावनाके अनुसार मित्र या शत्रु मान सकते हैं; किन्तु इस बातका पता लगनेपर उस मनुष्यपर इसका असर पड़ता है, जिससे उसमें राग-द्वेष उत्पन्न हो सकते हैं। परन्तु गुणातीत मनुष्यपर इस बातका पता लगनेपर भी कोई असर नहीं पड़ता। वस्तुतः मित्र और शत्रुकी भावनाके कारण ही व्यवहारमें पक्षपात होता है। गुणातीत मनुष्यके कहलानेवाले अन्तःकरणमें मित्र-शत्रुकी भावना ही नहीं होती; अतः उसके व्यवहारमें पक्षपात नहीं होता।
एक व्यक्ति उस महापुरुषके साथ मित्रता रखता है और दूसरा व्यक्ति अपने स्वभाववश उस महापुरुषके साथ शत्रुता रखता है। जब उन दोनों व्यक्तियोंकी किसी बातको लेकर न्याय करनेका अवसर आ जाय, तब (व्यवहारमें) वह मित्रता रखनेवालेकी अपेक्षा शत्रुता रखनेवालेका कुछ अधिक पक्ष लेता है। जैसे—पदार्थादिका बँटवारा करते समय वह मित्रता रखनेवालेको कम (उतना ही, जितना वह प्रसन्नतापूर्वक सहन कर सकता हो) और शत्रुता रखने-वालोंको कुछ ज्यादा पदार्थ देता है। यह भी समता ही कहलाती है; क्योंकि अपने पक्षवालोंके साथ न्याय और विपक्षवालोंके साथ उदारता होनी चाहिये।
‘सर्वारम्भपरित्यागी’ —वह महापुरुष सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी होता है। तात्पर्य है कि धन-सम्पत्तिके संग्रह और भोगोंके लिये वह किसी तरहका कोई नया कर्म आरम्भ नहीं करता। स्वतः प्राप्त परिस्थितिके अनुसार ही उसकी प्रवृत्ति और निवृत्ति होती है अर्थात् क्रियाओंमें उसकी प्रवृत्ति कामना, वासना, ममतासे रहित होती है और निवृत्ति भी मान-बड़ाई आदिकी इच्छासे रहित होती है।
‘गुणातीतः स उच्यते’ —यहाँ ‘उच्यते’ पदसे यही ध्वनि निकलती है कि उस महापुरुषकी ‘गुणातीत’ संज्ञा नहीं है; किन्तु उसके कहे जानेवाले शरीर, अन्तःकरणके लक्षणोंको लेकर ही उसको गुणातीत कहा जाता है।
वास्तवमें देखा जाय तो जो गुणातीत है, उसके लक्षण नहीं हो सकते। लक्षण तो गुणोंसे ही होते हैं; अतः जिसके लक्षण होते हैं, वह गुणातीत कैसे हो सकता है ? परन्तु अर्जुनने भी गुणातीतके ही लक्षण पूछे हैं और भगवान्ने भी गुणातीतके ही लक्षण कहे हैं। इसका तात्पर्य यह है कि लोग पहले उस गुणातीतकी जिस शरीर और अन्तःकरणमें स्थिति मानते थे, उसी शरीर और अन्तःकरणके लक्षणोंको लेकर वे उसमें आरोप करते हैं कि यह गुणातीत मनुष्य है।
श्लोक २६ ]
- साधक-संजीवनी *
१४७
अतः ये लक्षण गुणातीत मनुष्यको पहचाननेके संकेत-मात्र हैं।
प्रकृतिके कार्य गुण हैं और गुणोंके कार्य शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि हैं। अतः मन-बुद्धि आदिके द्वारा अपने कारण गुणोंका भी पूरा वर्णन नहीं हो सकता, फिर गुणोंके भी कारण प्रकृतिका वर्णन हो ही कैसे सकता है? जो प्रकृतिसे भी सर्वथा अतीत (गुणातीत) है, उसका वर्णन करना तो उन मन-बुद्धि आदिके द्वारा सम्भव ही नहीं है। वास्तवमें गुणातीतके ये लक्षण स्वरूपमें तो होते ही नहीं; किन्तु अन्तःकरणमें मानी हुई अहंता-ममताके नष्ट हो जानेपर उसके कहे जानेवाले अन्तःकरणके माध्यमसे ही ये लक्षण—गुणातीतके लक्षण कहे जाते हैं।
यहाँ भगवान्ने सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय, निन्दा-स्तुति और मान-अपमान—ये आठ परस्पर विरुद्ध नाम लिये हैं,
परिशिष्ट भाव —राग-द्वेषादि विकार न जड़में रहते हैं, न चेतनमें रहते हैं और न ये अन्तःकरणके धर्म हैं, प्रत्युत ये देहाभिमानमें रहते हैं। देहाभिमान भी वास्तवमें है नहीं, प्रत्युत अविवेक-अविचारपूर्वक माना हुआ है। तात्पर्य है कि वास्तवमें विकार अपनेमें नहीं हैं, पर मनुष्य अविवेकके कारण अपनेमें मान लेता है। वह विकारोंके भाव और अभावका तथा स्वयंके भावका अनुभव तो करता है, पर इस अनुभवको महत्व नहीं देता। अगर वह विवेक-विचारपूर्वक अपनेमें विकारोंके अभावका अनुभव कर ले तो वह उनका भोक्ता (सुखी-दुःखी) नहीं बनेगा।
सम्बन्ध—अर्जुनने तीसरे प्रश्नके रूपमें गुणातीत होनेका उपाय पूछा था। उसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणात्ममतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥
च = और यः = जो मनुष्य अव्यभिचारेण = अव्यभिचारी भक्तियोगेन = भक्तियोगके द्वारा
माम् = मेरा सेवते = सेवन करता है, सः = वह एतान् = इन
गुणान् = गुणोंका समतीत्य = अतिक्रमण करके ब्रह्मभूयाय = ब्रह्मप्राप्तिका कल्पते = पात्र हो जाता है।
व्याख्या —[यद्यपि भगवान्ने इसी अध्यायके उन्नीसवें-बीसवें श्लोकोंमें गुणोंका अतिक्रमण करनेका उपाय बता दिया था, तथापि अर्जुनने इक्कीसवें श्लोकमें गुणातीत होनेका उपाय पूछ लिया। इससे यह मालूम होता है कि अर्जुन उस उपायके सिवाय गुणातीत होनेके लिये दूसरा कोई उपाय जानना चाहते हैं। अतः अर्जुनको भक्तिका अधिकारी समझकर भगवान् उनको गुणातीत होनेका उपाय भक्ति बताते हैं।]
‘मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते’ —इन
जिनमें साधारण आदमियोंको तो विषमता हो ही जाती है, साधकोंकी भी कभी-कभी विषमता हो जाती है। ऐसे इन आठ कठिन स्थलोंमें जिसकी समता हो जाती है, उसके लिये अन्य सभी अवस्थाओंमें समता रखना सुगम हो जाता है। अतः यहाँ उन्हीं आठ कठिन स्थलोंका नाम लेकर भगवान् यह बताते हैं कि गुणातीत महापुरुषकी इन आठों स्थलोंमें स्वतः-स्वाभाविक समता होती है।
गुणातीत मनुष्यकी जो स्वतःसिद्ध निर्विकारता है, उसकी जो स्वाभाविक स्थिति है, उसमें अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंके आने-जानेका कुछ भी फरक नहीं पड़ता। उसकी निर्विकारता, समता ज्यों-की-त्यों अटल रहती है। उसकी शान्ति कभी भंग नहीं होती।
[चौबीसवें और पचीसवें—इन दो श्लोकोंमें भगवान्ने गुणातीत महापुरुषकी समताका वर्णन किया है।]
पदोंमें उपासक, उपास्य और उपासना—ये तीनों आ गये हैं अर्थात् ‘यः’ पदसे उपासक, ‘माम्’ पदसे उपास्य और ‘अव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते’ पदोंसे उपासना आ गयी है।
‘अव्यभिचारेण’ पदका तात्पर्य है कि दूसरे किसीका भी सहारा न हो। सांसारिक सहारा तो दूर रहा, ज्ञानयोग, कर्मयोग आदि योगों-(साधनों-) का भी सहारा न हो! और ‘भक्तियोगेन’ पदका तात्पर्य है कि केवल भगवान्का ही सहारा हो, आश्रय हो, आशा हो, बल हो, विश्वास हो।
श्रीमद्भगवद्गीता
इस तरह 'अव्यभिचारेण' पदसे दूसरोंका आश्रय लेनेका निषेध करके 'भक्तियोगेन' पदसे केवल भगवान्का ही आश्रय लेनेकी बात कही गयी है।
'सेवते' पदका तात्पर्य है कि अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा भगवान्का भजन करे, उनकी उपासना करे, उनके शरण हो जाय, उनके अनुकूल चले।
'स गुणान्समतीत्यैतान्'—जो अनन्यभावसे केवल भगवान्के ही शरण हो जाता है, उसको गुणोंका अतिक्रमण करना नहीं पड़ता, प्रत्युत भगवान्की कृपासे उसके द्वारा स्वतः गुणोंका अतिक्रमण हो जाता है (गीता—बारहवें अध्यायका छठाँ-सातवाँ श्लोक)।
'ब्रह्मभूयाय कल्पते'—वह गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र (अधिकारी) हो जाता है। भगवान्ने जब यहाँ भक्तिकी बात बतायी है, तो फिर भगवान्ने यहाँ ब्रह्मप्राप्तिकी बात न कहकर अपनी प्राप्तिकी बात बतानी चाहिये थी। परन्तु यहाँ ब्रह्मप्राप्तिकी बात बतानेका तात्पर्य यह है कि अर्जुनने गुणातीत होने-(निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्ति-) का उपाय पूछा था। इसलिये भगवान्ने अपनी भक्तिको ब्रह्मप्राप्तिका उपाय बताया।
दूसरी बात, शास्त्रोंमें कहा गया है कि भगवान्की उपासना करनेवालेको ज्ञानकी भूमिकाओंकी सिद्धिके लिये दूसरा कोई साधन, प्रयत्न नहीं करना पड़ता, प्रत्युत उसके लिये ज्ञानकी भूमिकाएँ अपने-आप सिद्ध हो जाती हैं। उसी बातको लक्ष्य करके भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि अव्यभिचारी भक्तियोगसे मेरा सेवन करनेवालेको ब्रह्मप्राप्तिका पात्र बननेके लिये दूसरा कोई साधन नहीं करना पड़ता, प्रत्युत वह अपने-आप ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। परन्तु वह भक्त ब्रह्मप्राप्तिमें सन्तोष नहीं करता। उसका तो यही भाव रहता है कि भगवान् कैसे प्रसन्न हों? भगवान्की प्रसन्नतामें ही उसकी प्रसन्नता होती है। तात्पर्य यह निकला कि जो केवल भगवान्के ही परायण है, भगवान्में ही आकृष्ट है, उसके लिये ब्रह्मप्राप्ति स्वतःसिद्ध है। हाँ, वह ब्रह्मप्राप्तिको महत्त्व दे अथवा न दे—यह बात दूसरी है, पर वह ब्रह्मप्राप्तिका अधिकारी स्वतः हो जाता है।
तीसरी बात, जिस तत्त्वकी प्राप्ति ज्ञानयोग, कर्मयोग आदि साधनोंसे होती है, उसी तत्त्वकी प्राप्ति भक्तिसे भी होती है। साधनोंमें भेद होनेपर भी उस तत्त्वकी प्राप्तिमें कोई भेद नहीं होता।
परिशिष्ट भाव—भक्तिसे साधक जो भी चाहता है, उसीकी प्राप्ति हो जाती है। जो साधक मुख्यरूपसे ब्रह्मकी प्राप्ति अर्थात् मुक्ति, तत्त्वज्ञान चाहता है, उसको भक्ति करनेसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है; क्योंकि ब्रह्मकी प्रतिष्ठा भगवान् ही हैं (इसी अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक), ब्रह्म समग्र भगवान्का ही एक अंग है, स्वरूप है (गीता—सातवें अध्यायके उनतीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)। तेरहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें भी भक्तिको ज्ञानप्राप्तिका साधन बताया गया है।
श्रीमद्भागवतमें सगुणकी उपासनाको निर्गुण (गुणोंसे अतीत) बताया है; जैसे—'मन्निकेतं तु निर्गुणम्' (११। २५। २५), 'मत्सेवां तु निर्गुणा' (११। २५। २७) आदि। इसलिये सगुणकी उपासना करनेवाला तीनों गुणोंसे अतीत हो जाता है। सगुण भगवान् भी गुणोंके आश्रित नहीं हैं, प्रत्युत गुण उनके आश्रित हैं। जो सत्त्व-रज-तम गुणोंके वशमें है, उसका नाम 'सगुण' नहीं है, प्रत्युत जिसमें असीम ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, औदार्य आदि अनन्त दिव्य गुण नित्य विद्यमान रहते हैं, उसका नाम 'सगुण' है। भगवान्के द्वारा सात्त्विक, राजस अथवा तामस क्रियाएँ हो सकती हैं, पर वे उन गुणोंके वशमें नहीं होते।
भगवान्की तरफ चलनेसे भक्त स्वतः और सुगमतासे गुणातीत हो जाता है। इतना ही नहीं, उसको भगवान्के समग्ररूपका भी ज्ञान हो जाता है।
सम्बन्ध—उपासना तो करे भगवान्की और पात्र बन जाय ब्रह्मप्राप्तिका—यह कैसे? इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥ २७॥
श्लोक २७ ]
- साधक-संजीवनी *
१४९
| हि | = क्यौंक | च | = तथा | सुखस्य | = सुखका |
|---|---|---|---|---|---|
| ब्रह्मणः | = ब्रह्मका | शाश्वतस्य | = शाश्वत | प्रतिष्ठा | = आश्रय |
| च | = और | धर्मस्य | = धर्मका | अहम् | = मैं |
| अव्ययस्य | = अविनाशी | च | = और | (ही हूँ)। | |
| अमृतस्य | = अमृतका | ऐकान्तिकस्य | = ऐकान्तिक |
व्याख्या—‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्’ —मैं ब्रह्मकी प्रतिष्ठा, आश्रय हूँ—ऐसा कहनेका तात्पर्य ब्रह्मसे अपनी अभिन्नता बतानेमें है। जैसे जलती हुई अग्नि साकार है और काष्ठ आदिमें रहनेवाली अग्नि निराकार है—ये अग्निके दो रूप हैं, पर तत्त्वतः अग्नि एक ही है। ऐसे ही भगवान् साकार-रूपसे हैं और ब्रह्म निराकार-रूपसे हैं—ये दो रूप साधकोंकी उपासनाकी दृष्टिसे हैं, पर तत्त्वतः भगवान् और ब्रह्म एक ही हैं, दो नहीं। जैसे भोजनमें एक सुगन्ध होती है और एक स्वाद होता है; नासिकाकी दृष्टिसे सुगन्ध होती है और रसनाकी दृष्टिसे स्वाद होता है, पर भोजन तो एक ही है। ऐसे ही ज्ञानकी दृष्टिसे ब्रह्म है और भक्तिकी दृष्टिसे भगवान् हैं, पर तत्त्वतः भगवान् और ब्रह्म एक ही हैं। भगवान् कृष्ण अलग हैं और ब्रह्म अलग है—यह भेद नहीं है; किन्तु भगवान् कृष्ण ही ब्रह्म हैं और ब्रह्म ही भगवान् कृष्ण हैं। गीतामें भगवान्ने अपने लिये ‘ब्रह्म’ शब्दका भी प्रयोग किया है—‘ब्रह्मण्याधाय कर्माणि ’ (५।१०) और अपनेको ‘अव्यक्तमूर्ति ’ भी कहा है—‘मया तत्तमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ’ (९।४)। तात्पर्य है कि साकार और निराकार एक ही हैं, दो नहीं।
‘अमृतस्याव्ययस्य च’ —अविनाशी अमृतका अधिष्ठान मैं ही हूँ और मेरा ही अधिष्ठान अविनाशी अमृत है। तात्पर्य है कि अविनाशी अमृत और मैं—ये दो तत्त्व नहीं हैं, प्रत्युत
एक ही हैं। इसी अविनाशी अमृतकी प्राप्तिको भगवान्ने ‘अमृतमश्नुते ’ (१३।१२; १४।२०) पदसे कहा है।
‘शाश्वतस्य च धर्मस्य’ —सनातन धर्मका आधार मैं हूँ और मेरा आधार सनातन धर्म है। तात्पर्य है कि सनातन धर्म और मैं—ये दो नहीं हैं, प्रत्युत एक ही हैं। सनातन धर्म मेरा ही स्वरूप है*। गीतामें अर्जुनने भगवान्को शाश्वतधर्मका गोप्ता (रक्षक) बताया है (ग्यारहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। भगवान् भी अवतार लेकर सनातन धर्मकी रक्षा किया करते हैं (चौथे अध्यायका आठवाँ श्लोक)।
‘सुखस्यैकान्तिकस्य च’ —ऐकान्तिक सुखका आधार मैं हूँ और मेरा आधार ऐकान्तिक सुख है अर्थात् मेरा ही स्वरूप ऐकान्तिक सुख है। भगवान्ने इसी ऐकान्तिक सुखको ‘अक्षय सुख’ (५।२१), ‘आत्यन्तिक सुख’ (६।२१) और ‘अत्यन्त सुख’ (६।२८) नामसे कहा है।
इस श्लोकमें ‘ब्रह्मणः ’, ‘अमृतस्य ’ आदि पदोंमें ‘राहोः शिरः ’ की तरह अभिन्नतामें षष्ठी विभक्तिका प्रयोग किया गया है। तात्पर्य है कि ‘राहुका सिर’—ऐसा जो प्रयोग होता है, उसमें राहु अलग है और सिर अलग है—ऐसी बात नहीं है, प्रत्युत राहुका नाम ही सिर है और सिरका नाम ही राहु है। ऐसे ही यहाँ ब्रह्म, अविनाशी अमृत आदि ही भगवान् कृष्ण हैं और भगवान् कृष्ण ही ब्रह्म, अविनाशी अमृत आदि हैं।
- हिन्दू (सनातन), बौद्ध, ईसाई और मुस्लिम—ये चार धर्म वर्तमान समयमें संसारमें मुख्य माने जाते हैं। इन चारोंमेंसे एक-एक धर्मको माननेवालोंकी संख्या करोड़ोंकी है। इनमें बौद्ध, ईसाई और मुस्लिम-धर्मको चलानेवाले क्रमशः बुद्ध, ईसा और मोहम्मद माने जाते हैं। ये तीनों ही धर्म अर्वाचीन हैं। परन्तु हिन्दूधर्म किसी मनुष्यके द्वारा चलाया हुआ नहीं है अर्थात् यह किसी मानवीय बुद्धिकी उपज नहीं है। यह तो विभिन्न ऋषियोंद्वारा किया गया अन्वेषण है, खोज है। खोज उसीकी होती है, जो पहलेसे ही मौजूद हो। हिन्दूधर्म अनादि, अनन्त एवं शाश्वत है। जैसे भगवान् शाश्वत (सनातन) हैं, ऐसे ही हिन्दूधर्म भी शाश्वत है। इसीलिये भगवान्ने यहाँ (गीता १४।२७ में) सनातन हिन्दूधर्मको अपना स्वरूप बताया है। जब-जब हिन्दूधर्मका ह्रास होता है, तब-तब भगवान् अवतार लेकर इसकी संस्थापना करते हैं (गीता—चौथे अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि भगवान् भी इसकी संस्थापना, रक्षा करनेके लिये ही अवतार लेते हैं, इसको बनानेके लिये, उत्पन्न करनेके लिये नहीं। वास्तवमें अन्य सभी धर्म तथा मत-मतान्तर भी इसी सनातन धर्मसे उत्पन्न हुए हैं। इसलिये उन धर्मोंमें मनुष्योंके कल्याणके लिये जो साधन बताये गये हैं, उनको भी हिन्दूधर्मकी ही देन मानना चाहिये। अतः उन धर्मोंमें बताये गये अनुष्ठानोंका भी निष्काषभावसे कर्तव्य समझकर पालन किया जाय, तो कल्याण होनेमें सन्देह नहीं मानना चाहिये। प्राणिमात्रके कल्याणके लिये जितना गहरा विचार हिन्दूधर्ममें किया गया है, उतना दूसरे धर्मोंमें नहीं मिलता। हिन्दूधर्मके सभी सिद्धान्त पूर्णतः वैज्ञानिक और कल्याण करनेवाले हैं।
१५० * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १४
ब्रह्म कहो, चाहे कृष्ण कहो, और कृष्ण कहो, चाहे ब्रह्म
कहो; अविनाशी अमृत कहो, चाहे कृष्ण कहो, और कृष्ण
कहो चाहे अविनाशी अमृत कहो; शाश्वत धर्म कहो, चाहे
कृष्ण कहो और कृष्ण कहो चाहे शाश्वत धर्म कहो;
ऐकान्तिक सुख कहो चाहे कृष्ण कहो; और कृष्ण कहो चाहे
ऐकान्तिक सुख कहो; एक ही बात है। इसमें कोई आधार-
आधेय भाव नहीं है, एक ही तत्त्व है। इसलिये भगवान्की
उपासना करनेसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है—यह बात ठीक ही है।
परिशिष्ट भाव—'ब्रह्म तथा अविनाशी अमृतका आश्रय मैं हूँ'—यह निर्गुण-निराकारकी तथा ज्ञानयोगकी बात
है, 'शाश्वतधर्मका आश्रय मैं हूँ'—यह सगुण-साकारकी तथा कर्मयोगकी बात है और 'ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं
हूँ'—यह सगुण-निराकारकी तथा ध्यानयोगकी बात है। तात्पर्य यह हुआ कि मेरी (सगुण-साकारकी) उपासना करनेसे,
मेरा आश्रय लेनेसे ज्ञानयोग, कर्मयोग और ध्यानयोग—तीनों सिद्ध हो जाते हैं। तीनोंसे एक ही तत्त्वकी प्राप्ति होती
है, जिसको 'समग्र' कहते हैं।
जितनी भी विभूतियाँ हैं, वे सब भगवान्के ऐश्वर्य हैं। ब्रह्म भी भगवान्की एक विभूति है, ऐश्वर्य है। इसलिये
यहाँ भगवान्ने कहा है—'ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहम्'। पद्मपुराणमें आया है कि भगवान् श्रीकृष्णके ही नखकी एक किरण
'ब्रह्म' है—
यन्नखेनदुरुचिर्ब्रह्म ध्येयं ब्रह्मादिभिः सुरैः। गुणत्रयमतीतं तं वन्दे वृन्दावनेश्वरम्॥
(पाताल० ७७। ६०)
'( भगवान् शंकर कहते हैं—) जिनके नखचन्द्रकी कान्तिरूप ब्रह्मका देवतागण ध्यान करते हैं, उन त्रिगुणातीत
वृन्दावनेश्वर भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ।'
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवान्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप
श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'गुणत्रयविभागयोग' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥
इस अध्यायमें सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंका
विभागपूर्वक वर्णन किया गया है। इन तीनों गुणोंसे अतीत
होनेपर, इनका सम्बन्ध छूटनेपर परमात्माके साथ नित्ययोगका
अनुभव हो जाता है। इसलिये इस अध्यायका नाम
'गुणत्रयविभागयोग' रखा गया है।
चौदहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें 'अथ चतुर्दशोऽध्यायः' के तीन,
'श्रीभगवानुवाच' आदि पदोंके छः, श्लोकोंके तीन सौ
बाईस और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण
पदोंका योग तीन सौ चौवालीस है।
(२) इस अध्यायमें 'अथ चतुर्दशोऽध्यायः' के
आठ, 'श्रीभगवानुवाच' आदि पदोंके बीस, श्लोकोंके
आठ सौ चौंसठ और पुष्पिकाके इक्यावन अक्षर हैं। इस
प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग नौ सौ तैंतालीस है। इस
अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें तीन उवाच हैं—दो 'श्रीभगवानुवाच'
और एक 'अर्जुन उवाच'।
चौदहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके सत्ताईस श्लोकोंमेंसे—पाँचवें श्लोकके
प्रथम चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; छठे
और दसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'रगण' प्रयुक्त होनेसे
'र-विपुला'; पन्द्रहवें और सत्रहवें श्लोकके तृतीय चरणमें
'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला'; उन्नीसवें श्लोकके
प्रथम चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; और
नवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'भगण' तथा तीसरे चरणमें
'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'संकीर्ण-विपुला' संज्ञावाले छन्द
हैं। शेष बीस श्लोक ठीक 'पथ्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके
लक्षणोंसे युक्त हैं।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीमद्भगवद्गीताके बारहवें अध्यायके पहले श्लोकमें ‘सगुण और निर्गुण-उपासकोंमें कौन श्रेष्ठ है?’—इस प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने सगुण-उपासकोंको सर्वश्रेष्ठ योगी बताया। पाँचवें श्लोकमें सगुण और निर्गुण-उपासनाकी तुलना करते हुए भगवान्ने कहा कि देहाभिमानियोंके लिये अत्यन्त अर्थात् निर्गुण-तत्त्वकी उपासना कठिन है। यह देहाभिमान-रूपी बाधा दूर कैसे हो—इस विषयका तथा निर्गुण-तत्त्वका विवेचन भगवान्ने तेरहवें और चौदहवें अध्यायमें किया।
चौदहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें अर्जुनने गुणातीत पुरुषोंके लक्षणों और आचरणोंके साथ-ही-साथ गुणातीत होनेका उपाय पूछा। इसके उत्तरमें भगवान्ने बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक गुणातीत पुरुषके लक्षणों और आचरणोंका वर्णन करके छब्बीसवें श्लोकमें सगुण-उपासकोंके लिये ‘अव्यभिचारी भक्तियोग’ को गुणातीत होनेका उपाय बताया। तात्पर्य यह है कि भगवान्का अनन्य भक्त (भगवान्पर ही आश्रित और भगवान्को ही अपना माननेके कारण) सुगमतापूर्वक गुणातीत भी हो जाता है। इस (छब्बीसवें) श्लोकमें भगवान्ने ‘अव्यभिचारेण भक्तियोगेन’ पदोंसे व्यभिचारदोष-(संसारके आश्रय-) से रहित भक्तियोगका, ‘यः’ पदसे जीवका और ‘माम्’ पदसे अपना (परमात्माका) सूक्ष्मरूपसे वर्णन किया। इसलिये इन्हीं तीनों विषयोंका अर्थात् संसार, जीव और परमात्माका विस्तृत विवेचन भगवान् इस (पन्द्रहवें) अध्यायमें करते हैं।
जीव स्वरूपतः (परमात्माका अंश होनेसे) गुणातीत होनेपर भी अनादि अज्ञानके कारण गुणोंके प्रभावसे प्रभावित होकर गुणोंके कार्यभूत शरीर-(संसार-) में तादात्म्य, ममता और कामना करके आबद्ध हुआ है। जबतक वह गुणोंसे अतीत (विलक्षण) तत्त्व परमात्माके प्रभावको नहीं जानता, तबतक वह प्रकृतिजन्य गुणोंके प्रभावसे सर्वथा मुक्त नहीं हो सकता। इसलिये भगवान् (अपनी प्राप्तिके प्रिय साधन ‘अव्यभिचारिणी भक्ति’ को प्राप्त कराने हेतु) अपना अत्यन्त गोपनीय और विशेष प्रभाव बतानेके लिये इस (पन्द्रहवें) अध्यायका आरम्भ करते हैं।
जीव परमात्माका अंश है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। अतः इसका एकमात्र सम्बन्ध अपने अंशी परमात्मासे ही है। परन्तु भूलसे यह अपना सम्बन्ध प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे मान लेता है, जिनसे उसका सम्बन्ध वास्तवमें कभी था नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता ही नहीं। परमात्मासे अपने वास्तविक सम्बन्धको भूलकर शरीरादि विजातीय पदार्थोंको ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरे लिये’ मानना ही व्यभिचार-दोष है। यह व्यभिचार-दोष ही अनन्य भक्तियोगमें खास बाधक है। इस बाधाको दूर करनेके लिये पन्द्रहवें अध्यायके पहले पाँच श्लोकोंके प्रकरणमें भगवान् संसार-वृक्षका वर्णन करके उसका छेदन करनेकी आज्ञा देते हैं।
श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥ *
- ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः। तदेव शुक्तं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते।
तस्मिन्म्लोकाः श्रिताः सर्वे तद्वा नाल्येति कश्चन। एतद्वैतत् ॥ (कठेपनिषद् २।३।१)
१५२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
श्रीभगवान् बोले—
ऊर्ध्वमूलम् | = ऊपरकी ओर मूलवाले (तथा) | प्राहुः | = कहते हैं (और) | वृक्षको | यः | = जो ---|---|---|---|---|---|--- अधःशाखम् | = नीचेकी ओर शाखावाले | छन्दांसि | = वेद | | वेद | = जानता है, अश्वत्थम् | = (जिस) संसाररूप अश्वत्थवृक्षको | यस्य | = जिसके | | सः | = वह अव्ययम् | = (प्रवाहरूपसे) | पणीनि | = पते हैं, | | वेदवित् | = सम्पूर्ण वेदोंको | | तम् | = उस संसार— | | | जाननेवाला है।
व्याख्या —‘ऊर्ध्वमूलमधःशाखम्’— [तेरहवें अध्यायके आरम्भके दो श्लोकोंकी तरह यहाँ पन्द्रहवें अध्यायके पहले श्लोकमें भी भगवान्ने अध्यायके सम्पूर्ण विषयोंका दिर्दर्शन कराया है और ‘ऊर्ध्वमूलम्’ पदसे परमात्माका, ‘अधःशाखम्’ पदसे सम्पूर्ण जीवोंके प्रतिनिधि ब्रह्माजीका तथा ‘अश्वत्थम्’ पदसे संसारका संकेत करके (संसाररूप अश्वत्थवृक्षके मूल) सर्वशक्तिमान् परमात्माको यथार्थरूपसे जाननेवालेको ‘वेदवित्’ कहा है। ]
साधारणतया वृक्षोंका मूल नीचे और शाखाएँ ऊपरकी ओर होती हैं; परन्तु यह संसारवृक्ष ऐसा विचित्र वृक्ष है कि इसका मूल ऊपर तथा शाखाएँ नीचेकी ओर हैं!
जहाँ जानेपर मनुष्य लौटकर संसारमें नहीं आता, ऐसा भगवान्का परमधाम ही सम्पूर्ण भौतिक संसारसे ऊपर (सर्वोपरि) है। संसारवृक्षकी प्रधान शाखा (तना) ब्रह्माजी हैं; क्योंकि संसारवृक्षकी उत्पत्तिके समय सबसे पहले ब्रह्माजीका उद्भव होता है। इस कारण ब्रह्माजी ही इसकी प्रधान शाखा हैं। ब्रह्मलोक भगवद्भामकी अपेक्षा नीचे है। स्थान, गुण, पद, आयु आदि सभी दृष्टियोंसे परमधामकी अपेक्षा निम्न श्रेणीमें होनेके कारण ही इन्हें ‘अधः’ (नीचेकी ओर) कहा गया है।
यह संसाररूपी वृक्ष ऊपरकी ओर मूलवाला है। वृक्षमें मूल ही प्रधान होता है। ऐसे ही इस संसाररूपी वृक्षमें परमात्मा ही प्रधान हैं। उनसे ब्रह्माजी प्रकट होते हैं, जिनका वर्णन ‘अधःशाखम्’ पदसे हुआ है।
सबके मूल प्रकाशक और आश्रय परमात्मा ही हैं। देश, काल, भाव, सिद्धान्त, गुण, रूप, विद्या आदि सभी दृष्टियोंसे परमात्मा ही सबसे श्रेष्ठ हैं। उनसे ऊपर अथवा श्रेष्ठकी तो बात ही क्या है, उनके समान भी दूसरा कोई नहीं है’ (गीता—न्यारहवें अध्यायका तैतालसीसर्वो श्लोक)। संसारवृक्षके मूल सर्वोपरि परमात्मा हैं। जैसे ‘मूल’ वृक्षका आधार होता है, ऐसे ही ‘परमात्मा’ सम्पूर्ण जगत्के आधार हैं। इसीलिये उस वृक्षको ‘ऊर्ध्वमूलम्’ कहा गया है।
‘मूल’ शब्द कारणका वाचक है। इस संसारवृक्षकी उत्पत्ति और इसका विस्तार परमात्मासे ही हुआ है। वे परमात्मा नित्य, अनन्त और सबके आधार हैं तथा सगुणरूपसे सबसे ऊपर नित्य-धाममें निवास करते हैं, इसलिये वे ‘ऊर्ध्व’ नामसे कहे जाते हैं। यह संसारवृक्ष उन्हीं परमात्मासे उत्पन्न हुआ है, इसलिये इसको ऊपरकी ओर मूलवाला (ऊर्ध्वमूल) कहते हैं।
वृक्षके मूलसे ही तने, शाखाएँ, कोंपलें निकलती हैं। इसी प्रकार परमात्मासे ही सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है, उन्हींसे विस्तृत होता है और उन्हींमें स्थित रहता है। उन्हींसे शक्ति पाकर सम्पूर्ण जगत् चेष्टा करता है। ऐसे सर्वोपरि परमात्माकी शरण लेनेसे मनुष्य सदाके लिये कृतार्थ हो जाता है। (शरण लेनेकी बात आगे चौथे श्लोकमें ‘तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये’ पदोंमें कही गयी है)।
सृष्टि-रचनाके लिये ब्रह्माजी प्रकृतिको स्वीकार करते हैं। परन्तु वास्तवमें वे (प्रकृतिसे सम्बन्धरहित होनेके कारण)
१-यहाँ ‘अधःशाखम्’ पदमें ब्रह्माजीसे लेकर कीटपर्यन्त सभी जीवोंका समावेश है।
२-‘न तत्समशचाभ्यधिकश्च दुश्यते।’ (श्वेताश्वतरोपनिषद् ६।८)
उस-(परमात्मा-) से बड़ा और उसके समान भी दूसरा नहीं दीखता।
३-जैसे गीतामें कहा है—‘अहं कृतनस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा’ (७।६), ‘प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्’ (१।१८); ‘अहं सर्वस्य प्रभवो मतः सर्वं प्रवर्तते’ (१०।८); ‘यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी’ (१५।४) और ‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानाम्’ (१८।४६)।
श्लोक १ ]
- साधक-संजीवनी *
१५३
मुक्त हैं। ब्रह्माजीके सिवाय दूसरे सम्पूर्ण जीव प्रकृति और उसके कार्य शरीरादिके साथ अहंता-ममतापूर्वक जितना-जितना अपना सम्बन्ध मानते हैं, उतने-उतने ही वे बन्धनमें पड़े हुए हैं और उनका बार-बार पतन (जन्म-मरण) होता रहता है अर्थात् उतनी ही शाखाएँ नीचेकी ओर फैलती रहती हैं। सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीनों गतियाँ ‘अधःशाखम्’ के ही अन्तर्गत हैं (गीता—चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)।
‘अश्वत्थम्’—‘अश्वत्थम्’ शब्दके दो अर्थ हैं—(१) जो कल दिनतक भी न रह सके और (२) पीपलका वृक्ष। पहले अर्थके अनुसार—‘अश्वत्थ’ पदका तात्पर्य यह है कि संसार एक क्षण’ भी स्थिर रहनेवाला नहीं है। केवल परिवर्तनके समूहका नाम ही संसार है। परिवर्तनका जो नया रूप सामने आता है, उसको उत्पत्ति कहते हैं; थोड़ा और परिवर्तन होनेपर उसको स्थितिरूपसे मान लेते हैं और जब उस स्थितिका स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है, तब उसको समाप्ति (प्रलय) कह देते हैं। वास्तवमें इसकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते ही नहीं। इसलिये इसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होनेके कारण यह (संसार) एक क्षण भी स्थिर नहीं है। दृश्यमात्र प्रतिक्षण अदर्शनमें जा रहा है। इसी भावसे इस संसारको ‘अश्वत्थम्’ कहा गया है।
दूसरे अर्थके अनुसार—यह संसार पीपलका वृक्ष है। शास्त्रोंमें अश्वत्थ अर्थात् पीपलके वृक्षकी बहुत महिमा गायी गयी है। स्वयं भगवान् भी सब वृक्षोंमें ‘अश्वत्थ’ को अपनी विभूति कहकर उसको श्रेष्ठ एवं पूज्य बताते हैं—‘अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्’ (गीता १०।२६)। पीपल, आँवला और तुलसी—इनकी भगवद्वाचपूर्वक पूजा करनेसे वह भगवान्की पूजा हो जाती है।
परमात्मासे संसार उत्पन्न होता है। वे ही संसारके अभिन्ननिमित्तोपादान कारण हैं। अतः संसाररूपी पीपलका वृक्ष भी तत्त्वतः परमात्मस्वरूप होनेसे पूजनीय है। इस संसाररूप पीपलवृक्षकी पूजा यही है कि इससे सुख लेनेकी इच्छाका त्याग करके केवल इसकी सेवा करना।
१-‘श्वः’ पर्यन्तं न तिष्ठतीति अश्वत्थः’—‘श्वम्’ अव्यय आनेवाले कलका वाचक है। जो कलतक स्थिर रहे, उसे ‘श्वत्थ’ तथा जो कलतक स्थिर न रहे, उसे ‘अश्वत्थ’ कहते हैं।
२-‘क्षण’ का विवेचन दार्शनिकोंने इस प्रकार किया है—कमलके पत्तेपर सूई मारी जाय तो सूईके दूसरी तरफ निकलनेमें तीन क्षण लगते हैं—पहले क्षणमें स्पर्श, दूसरे क्षणमें छेदन और तीसरे क्षणमें पार निकलना।
३-वेदोंमें सकाम मन्त्रोंकी संख्या तो अस्सी हजार है, पर मुक्त करनेवाले मन्त्रोंकी संख्या बीस हजार ही है, जिसमें चार हजार मन्त्र ज्ञानकाण्डके एवं सोलह हजार मन्त्र उपासनाकाण्डके हैं।
सुखकी इच्छा न रखनेवालेके लिये यह संसार साक्षात् भगवत्स्वरूप है—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)। परन्तु संसारसे सुखकी इच्छा रखनेवालोंके लिये यह संसार दुःखोंका घर ही है। कारण कि स्वयं अविनाशी है और यह संसारवृक्ष प्रतिक्षण परिवर्तनशील होनेके कारण नाशवान्, अनित्य और क्षणभंगुर है। अतः स्वयंकी कभी इससे तृप्ति हो ही नहीं सकती; किंतु इससे सुखकी इच्छा करके यह बार-बार जन्मता-मरता रहता है। इसलिये संसारसे यत्किंचित् भी स्वार्थका सम्बन्ध न रखकर केवल उसकी सेवा करनेका भाव ही रखना चाहिये।
‘प्राहुरव्ययम्’—संसारवृक्षको अव्यय कहा जाता है। क्षणभंगुर अनित्य संसारका आदि और अन्त न जान सकेनेके कारण, प्रवाहकी निरन्तरता-(नित्यता)-के कारण तथा इसका मूल सर्वशक्तिमान् परमेश्वर नित्य अविनाशी होनेके कारण ही इसे अव्यय कहते हैं। जिस प्रकार समुद्रका जल सूर्यके तापसे भाप बनकर बादल बनता है। फिर आकाशमें ठण्डक पाकर वही जल बादलसे पुनः जलरूपसे पृथ्वीपर आ जाता है। फिर वही जल नदी-नालेका रूप धारण करके समुद्रमें चला जाता है, पुनः समुद्रका जल बादल बनकर बरसता है—ऐसे घूमते हुए जलके चक्रका कभी भी अन्त नहीं आता। इसी प्रकार इस संसार-चक्रका भी कभी अन्त नहीं आता। यह संसार-चक्र इतनी तेजीसे घूमता (बदलता) है कि चलचित्र-(सिनेमा)-के समान अस्थिर (प्रतिक्षण परिवर्तनशील) होते हुए भी स्थिरकी तरह प्रतीत होता है।
यह संसारवृक्ष अव्यय कहा जाता है। (प्राहुः), वास्तवमें यह अव्यय (अविनाशी) है नहीं। अगर यह अव्यय होता तो न तो इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें यह कहा जाता कि इस-(संसार)-का जैसा स्वरूप कहा जाता है, वैसा उपलब्ध नहीं होता; और न इस-(संसारवृक्ष)-को वैराग्यरूप दृढ़ शस्त्रके द्वारा छेदन करनेके लिये ही भगवान् प्रेरणा करते।
‘छन्दांसि यस्य पर्णानि’—वेद इस संसारवृक्षके पत्ते हैं। यहाँ वेदोंसे तात्पर्य वेदोंके उस अंशसे है, जिसमें सकामकर्मके अनुष्ठानोंका वर्णन है। तात्पर्य यह है कि
१५४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
जिस वृक्षमें सुन्दर फूल-पत्ते तो हों, पर फल नहीं हों तो वह वृक्ष अनुपयोगी है; क्योंकि वास्तवमें तृप्ति तो फलसे ही होती है, फूल-पत्तोंकी सजावटसे नहीं। इसी प्रकार सुख-भोग चाहनेवाले सकाम पुरुषको भोग-ऐश्वर्यरूप फूल-पत्तोंसे सम्पन्न यह संसारवृक्ष बाहरसे तो सुन्दर प्रतीत होता है, पर इससे सुख चाहनेके कारण उसको अक्षय सुखरूप तृप्ति अर्थात् महान् आनन्दकी प्राप्ति नहीं होती। वेदविहित पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान स्वर्गादि लोकोंकी कामनासे किया जाय तो वह निषिद्ध कर्मोंको करनेकी अपेक्षा श्रेष्ठ तो है, पर उन कर्मोंसे मुक्ति नहीं हो सकती; क्योंकि फलभोगके बाद पुण्यकर्म नष्ट हो जाते हैं और उसे पुनः संसारमें आना पड़ता है (गीता—नवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार सकाम-कर्म और उसका फल—दोनों ही उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं। अतः साधकको इन (दोनों) से सर्वथा असंग होकर एकमात्र परमात्मतत्त्वको ही प्राप्त करना चाहिये।
पते वृक्षकी शाखासे उत्पन्न होनेवाले तथा वृक्षकी रक्षा और वृद्धि करनेवाले होते हैं। पत्तोंसे वृक्ष सुन्दर दीखता है तथा दृढ़ होता है (पत्तोंके हिलनेसे वृक्षका मूल, तना एवं शाखाएँ दृढ़ होती हैं)। वेद भी इस संसारवृक्षकी मुख्य शाखारूप ब्रह्माजीसे प्रकट हुए हैं और वेदविहित कर्मोंसे ही संसारकी वृद्धि और रक्षा होती है। इसलिये वेदोंको पत्तोंका स्थान दिया गया है। संसारमें सकाम (काम्य) कर्मोंसे स्वर्गादिमें देव-योनियों प्राप्त होती हैं—यह संसारवृक्षका बड़ना है। स्वर्गादिमें नन्दनवन, सुन्दर विमान, रमणीय अप्सराएँ आदि हैं—यह संसारवृक्षके सौन्दर्यकी प्रतीति है। सकाम-कर्मोंको करते रहनेसे बारम्बार जन्म-मरण होता रहता है—यह संसारवृक्षका दृढ़ होना है।
इन पदोंसे भगवान् यह कहना चाहते हैं कि साधकको सकामभाव, वैदिक सकाम-कर्मानुष्ठानरूप पत्तोंमें न फँसकर संसारवृक्षके मूल—परमात्माका ही आश्रय लेना चाहिये। परमात्माका आश्रय लेनेसे वेदोंका वास्तविक तत्त्व भी जाननेमें आ जाता है। वेदोंका वास्तविक तत्त्व संसार या स्वर्ग नहीं, प्रत्युत परमात्मा ही हैं (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक)।१)
‘यस्तं वेद स वेदवित्’—उस संसारवृक्षको जो
मनुष्य जानता है, वह सम्पूर्ण वेदोंके यथार्थ तात्पर्यको जाननेवाला है। संसारको क्षणभंगुर (अनित्य) जानकर इससे कभी किंचिन्मात्र भी सुखकी आशा न रखना—यही संसारको यथार्थरूपसे जानना है। वास्तवमें संसारको क्षणभंगुर जान लेनेपर सुखभोग हो ही नहीं सकता। सुखभोगके समय संसार क्षणभंगुर नहीं दीखता। जबतक संसारके प्राणी-पदार्थोंको स्थायी मानते रहते हैं, तभीतक सुखभोग, सुखकी आशा और कामना तथा संसारका आश्रय, महत्त्व, विश्वास बना रहता है। जिस समय यह अनुभव हो जाता है कि संसार प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है, उसी समय उससे सुख लेनेकी इच्छा मिट जाती है और साधक उसके वास्तविक स्वरूपको जानकर (संसारसे विमुख और परमात्माके सम्मुख होकर) परमात्मासे अपनी अभिन्नताका अनुभव कर लेता है। परमात्मासे अभिन्नताका अनुभव होनेमें ही वेदोंका वास्तविक तात्पर्य है। जो मनुष्य संसारसे विमुख होकर परमात्मतत्त्वसे अपनी अभिन्नता (जो कि वास्तवमें है)—का अनुभव कर लेता है, वही वास्तवमें ‘वेदवित्’ है। वेदोंके अध्ययनमात्रसे मनुष्य वेदोंका विद्वान् तो हो सकता है, पर यथार्थ वेदवेत्ता नहीं। वेदोंका अध्ययन न होनेपर भी जिसको (संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक) परमात्मतत्त्वकी अनुभूति हो गयी है, वही वास्तवमें वेदवेत्ता (वेदोंके तात्पर्यको अनुभवमें लानेवाला) है।
भगवान्ने इसी अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें अपनेको ‘वेदवित्’ कहा है। यहाँ वे संसारके तत्त्वको जाननेवाले पुरुषको ‘वेदवित्’ कहकर उससे अपनी एकता प्रकट करते हैं। तात्पर्य यह है कि मनुष्य-शरीरमें मिले विवेककी इतनी महिमा है कि उससे जीव संसारके यथार्थ तत्त्वको जानकर भगवान्के सद्गुण वेदवेत्ता बन सकता है१)।
परमात्माका ही अंश होनेके कारण जीवका एकमात्र वास्तविक सम्बन्ध परमात्मासे है। संसारसे तो इसने भूलसे अपना सम्बन्ध माना है, वास्तवमें है नहीं। विवेकके द्वारा इस भूलको मिटाकर अर्थात् संसारसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करके एकमात्र अपने अंशी परमात्मासे अपनी स्वतःसिद्ध अभिन्नताका अनुभव करनेवाला ही संसारवृक्षके यथार्थ तत्त्वको जाननेवाला है; और उसीको भगवान् यहाँ ‘वेदवित्’ कहते हैं।
१-‘सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति’ (कठोपनिषद् १।२।१५)
‘सम्पूर्ण वेद जिस परमपद परमात्माका बारम्बार प्रतिपादन करते हैं।’
२-‘मम साधर्म्यमागताः’ (गीता १४।२) में भी यही बात कही गयी है।
श्लोक २ ]
- साधक-संजीवनी *
१५५
परिशिष्ट भाव —जगत्, जीव और परमात्मा—तीनों वासुदेवरूप ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्।’ इसीका यहाँ वृक्षरूपसे वर्णन किया गया है।
परिवर्तनशील होनेपर भी संसारको ‘अव्यय’ कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें निरन्तर परिवर्तन होनेपर भी कुछ अव्यय (खर्चा) नहीं होता अर्थात् अन्त नहीं होता। जैसे समुद्रके ऊपर कितनी लहरें उठती दीखती हैं, ज्वार-भाटा आता है, पर उसका जल उतना ही रहता है, घटता-बढ़ता नहीं। ऐसे ही निरन्तर परिवर्तन दीखनेपर भी संसार अव्यय ही रहता है। कारण कि परिवर्तनरूप संसार भी परमात्माकी शक्ति ‘अपरा प्रकृति’ का कार्य होनेसे परमात्माका ही स्वरूप है—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९)। परिवर्तनरूप अपरा प्रकृति भी परमात्माका स्वरूप है और अपरिवर्तनरूप परा प्रकृति भी परमात्माका स्वरूप है। यह संसार उस परमात्माकी ही लहरें हैं। जैसे ऊपरसे लहरें दीखनेपर भी समुद्रके भीतर कोई लहर नहीं है, एक सम, शान्त समुद्र है, ऐसे ही ऊपरसे परिवर्तनशील संसार दीखते हुए भी भीतरसे एक सम, शान्त परमात्मा है! (गीता—तेरहवें अध्यायका सताईसवाँ श्लोक) तात्पर्य है कि संसार संसाररूपसे अव्यय नहीं है, प्रत्युत भगवदरूपसे अव्यय है। संसाररूपसे भगवान्की ही झलक दीखती है। साधककी दृष्टि उस झलककी ओर न होकर भगवान्की ओर ही होनी चाहिये। झलककी ओर दृष्टि होना अर्थात् उसीको स्वतन्त्र सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़ना ही बन्धन है।
संसारको ‘अव्यय’ कहनेका एक आशय यह भी है कि जो इस संसारके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ेगा, उसका वह सम्बन्ध अर्थात् जन्म-मरण भी अव्यय हो जायगा, कभी मिटेगा नहीं, उसका कभी अन्त आयेगा नहीं। लम्बे रास्तेका तो अन्त आ सकता है, पर गोल रास्तेका अन्त कैसे आये? कोल्हूके बैलकी तरह जन्मनेके बाद मरना और मरनेके बाद जन्मना—यह गोल रास्ता है।
संसार ‘अव्यय’ है; क्योंकि संसारका बीज भी ‘अव्यय’ है—‘बीजमव्ययम्’ (गीता ९।१८)।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जिस संसारवृक्षका दिग्दर्शन कराया, उसी संसारवृक्षका अब आगेके श्लोकमें अवयवोंसहित विस्तारसे वर्णन करते हैं।
अधश्चोर्ध्वं प्रसूतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥
| तस्य | = उस संसार- | शाखाः | = शाखाएँ | कर्मानुबन्धीनि | = कर्मोंके अनुसार |
|---|---|---|---|---|---|
| वृक्षकी | वृक्षकी | अधः | = नीचे, | बाँधनेवाले | |
| गुणप्रवृद्धाः | = गुणों (सत्त्व, रज और तम) के द्वारा | च | = (मध्यमें) और | मूलानि | = मूल (भी) |
| बढ़ी हुई | (तथा) | ऊर्ध्वम् | = ऊपर | अधः | = नीचे |
| विषयप्रवालाः | = विषयरूप | प्रसूताः | = फैली हुई हैं। | च | = और (ऊपर) |
| कोपलोंवाली | मनुष्यलोके | = मनुष्यलोकमें | अनुसन्ततानि | = (सभी लोकोंमें) | |
| व्याप्त हो रहे हैं। |
व्याख्या —‘तस्य शाखा गुणप्रवृद्धाः’—संसारवृक्षकी मुख्य शाखा ब्रह्मा है। ब्रह्मासे सम्पूर्ण देव, मनुष्य, तिर्यक् आदि योनियोंकी उत्पत्ति और विस्तार हुआ है। इसलिये ब्रह्मलोकसे पातालतक जितने भी लोक तथा उनमें रहनेवाले देव, मनुष्य, कीट आदि प्राणी हैं, वे सभी संसारवृक्षकी शाखाएँ हैं। जिस प्रकार जल सींचनेसे वृक्षकी शाखाएँ बढ़ती हैं, उसी प्रकार गुणरूप जलके संगसे इस
संसारवृक्षकी शाखाएँ बढ़ती हैं। इसीलिये भगवान्ने जीवात्माके ऊँच, मध्य और नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण गुणोंका संग ही बताया है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ और चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। सम्पूर्ण सृष्टिमें ऐसा कोई देश, वस्तु, व्यक्ति नहीं, जो प्रकृतिसे उत्पन्न तीनों गुणोंसे रहित हो (गीता—अठारहवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक)।
१५६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
इसलिये गुणोंके सम्बन्धसे ही संसारकी स्थिति है। गुणोंकी अनुभूति गुणोंसे उत्पन्न वृत्तियों तथा पदार्थोंके द्वारा होती है। अतः वृत्तियों तथा पदार्थोंसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करानेके लिये ही 'गुणप्रवृद्धाः' पद देकर भगवान्ने यहाँ यह बताया है कि जबतक गुणोंसे किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध है, तबतक संसारवृक्षकी शाखाएँ बढ़ती ही रहेंगी। अतः संसारवृक्षका छेदन करनेके लिये गुणोंका संग किंचिन्मात्र भी नहीं रखना चाहिये; क्योंकि गुणोंका संग रहते हुए संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हो सकता।
'विषयप्रवालाः' —जिस प्रकार शाखासे निकलने-वाली नयी कोमल पत्तीके डंठलसे लेकर पत्तीके अग्रभाग-तकको प्रवाल (कॉपल) कहा जाता है, उसी प्रकार गुणोंकी वृत्तियोंसे लेकर दृश्य पदार्थमात्रको यहाँ 'विषयप्रवालाः' कहा गया है।
वृक्षके मूलसे तना (मुख्य शाखा), तनेसे शाखाएँ और शाखाओंसे कॉपलें फूटती हैं और कॉपलोंसे शाखाएँ आगे बढ़ती हैं। इस संसारवृक्षमें विषय-चिन्तन ही कॉपलें हैं। विषय-चिन्तन तीनों गुणोंसे होता है। जिस प्रकार गुणरूप जलसे संसारवृक्षकी शाखाएँ बढ़ती हैं, उसी प्रकार गुणरूप जलसे विषयरूप कॉपलें भी बढ़ती हैं। जैसे कॉपलें दीखती हैं, उनमें व्याप्त जल नहीं दीखता, ऐसे ही शब्दादि विषय तो दीखते हैं, पर उनमें गुण नहीं दीखते। अतः विषयोंसे ही गुण जाने जाते हैं।
'विषयप्रवालाः' पदका भाव यह प्रतीत होता है कि विषय-चिन्तन करते हुए मनुष्यका संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हो सकता१ (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। अन्तकालमें मनुष्य जिस-जिस भावका चिन्तन करते हुए शरीरका त्याग करता है, उस-उस भावको ही प्राप्त होता है (गीता—आठवें अध्यायका छठा श्लोक)—यही विषयरूप कॉपलोंका फूटना है।
कॉपलोंकी तरह विषय भी देखनेमें बहुत सुन्दर प्रतीत होते हैं, जिससे मनुष्य उनमें आकर्षित हो जाता है। साधक
अपने विवेकसे परिणामपर विचार करते हुए इनको क्षणभंगुर, नाशवान् और दुःखरूप जानकर इन विषयोंका सुगमतापूर्वक त्याग कर सकता है (गीता—पाँचवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। विषयोंमें सौन्दर्य और आकर्षण अपने रागके कारण ही दीखता है, वास्तवमें वे सुन्दर और आकर्षक हैं नहीं। इसलिये विषयोंमें रागका त्याग ही वास्तविक त्याग है। जैसे कोमल कॉपलोंको नष्ट करनेमें कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता, ऐसे ही इन विषयोंके त्यागमें भी साधकको कठिनाता नहीं माननी चाहिये। मनसे आदर देनेपर ही ये विषयरूप कॉपलें सुन्दर और आकर्षक दीखती हैं, वास्तवमें तो ये विषयुक्त लड़ड़ूके समान ही हैं२। इसलिये इस संसारवृक्षका छेदन करनेके लिये भोगबुद्धि-पूर्वक विषय-चिन्तन एवं विषयसेवनका सर्वथा त्याग करना आवश्यक है।३
'अधश्चोर्ध्वं प्रसूताः' —यहाँ 'च' पदको मध्यलोक अर्थात् मनुष्यलोक-(इसी श्लोकके 'मनुष्यलोके कर्मानुबन्धीनि' पदों-) का वाचक समझना चाहिये। 'ऊर्ध्वम्' पदका तात्पर्य ब्रह्मलोक आदिसे है, जिसमें जानेके दो मार्ग हैं—देवयान और पितृयान (जिसका वर्णन आठवें अध्यायके चौबीसवें-पचीसवें श्लोकोंमें शुक्ल और कृष्ण-मार्गके नामसे हुआ है)। 'अधः' पदका तात्पर्य नरकोंसे है, जिसके भी दो भेद हैं—योनिविशेष नरक और स्थानविशेष नरक।
इन पदोंसे यह कहा गया है कि ऊर्ध्वमूल परमात्मासे नीचे, संसारवृक्षकी शाखाएँ नीचे, मध्य और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं। इसमें मनुष्ययोनिरूप शाखा ही मूल शाखा है; क्योंकि मनुष्ययोनिमें नवीन कर्मोंको करनेका अधिकार है। अन्य शाखाएँ भोगयोनियाँ हैं, जिनमें केवल पूर्वकृत कर्मोंका फल भोगनेका ही अधिकार है। इस मनुष्ययोनिरूप मूल शाखासे मनुष्य नीचे (अधोलोक) तथा ऊपर (ऊर्ध्व-लोक)—दोनों ओर जा सकता है; और संसारवृक्षका छेदन करके सबसे ऊर्ध्व (परमात्मा) तक भी जा सकता है।
१-सेवत विषय बिबर्धं जिमि नित नित नूतन मार॥ (मानस ६।१२)
२-दोषेण तीव्रो विषयः कृष्णसर्पविषादपि। विषं निहन्ति भोक्तां द्रष्टारं चक्षुषाययम्॥
(विवेकचूडामणि ७९)
'दोषमें विषय काले सर्पके विषसे भी अधिक तीव्र हैं; क्योंकि विष तो खानेवालेको ही मारता है, पर विषय आँखसे देखनेवालेको भी नहीं छोड़ते।'
३-मोक्षस्य काङ्क्ष्या यदि वै तवास्ति त्यजातिदूराद्विषयान् विषं यथा। (विवेक ८४)
'यदि तुझे मोक्षकी इच्छा है तो विषयोंको विषके समान दूरीसे त्याग दे।
श्लोक २ ]
- साधक-संजीवनी *
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मनुष्य-शरीरमें ऐसा विवेक है, जिसको महत्त्व देकर जीव परमधामतक पहुँच सकता है और अविवेकपूर्वक विषयोंका सेवन करके नरकोंमें भी जा सकता है। इसीलिये गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है—
नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥
(मानस ७।१२१।५)
‘अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्य-लोके’—मनुष्यके अतिरिक्त दूसरी सब भोगयोनियों हैं। मनुष्ययोनिमें किये हुए पाप-पुण्योंका फल भोगनेके लिये ही मनुष्यको दूसरी योनियोंमें जाना पड़ता है। नये पाप-पुण्य करनेका अथवा पाप-पुण्यसे रहित होकर मुक्त होनेका अधिकार और अवसर मनुष्य-शरीरमें ही है।
यहाँ ‘मूलानि’ पदका तात्पर्य तादात्म्य, ममता और कामनारूप मूलसे है, वास्तविक ऊर्ध्वमूल परमात्मासे नहीं। ‘मैं शरीर हूँ’—ऐसा मानना ‘तादात्म्य’ है। शरीरादि पदार्थोंको अपना मानना ‘ममता’ है। पुत्रैषणा, वितैषणा और लोकेषणा—ये तीन प्रकारकी मुख्य कामनाएँ हैं। पुत्र-परिवारकी कामना ‘पुत्रैषणा’ और धन-सम्पत्तिकी कामना ‘वितैषणा’ है। ‘संसारमें मेरा मान-आदर हो जाय’, ‘मैं बना रहूँ’, ‘शरीर नौरोग रहे’, ‘मैं शास्त्रोंका पण्डित बन जाऊँ’ आदि अनेक कामनाएँ ‘लोकेषणा’ के अन्तर्गत
- ये तीन इच्छाएँ (बाँधनेवाली न होनेके कारण) ‘कामना’ नहीं कहलाती—(१) भगवदर्शन या भगवत्प्रेमकी कामना, (२) स्वरूपबोधकी कामना और (३) सेवा करनेकी कामना। स्वरूपबोध या परमात्मा (भगवदर्शन या भगवत्प्रेम)-की इच्छा ‘कामना’ नहीं है; क्योंकि स्वरूप और परमात्मा दोनों ही ‘नित्यप्राप्त’ तथा ‘अपने’ हैं। जैसे अपनी जेबसे पैसे निकालना चोरी नहीं कहलाती, ऐसे ही स्वरूप या परमात्मा-(जो अपने तथा अपनेमें हैं)-की इच्छा करना ‘कामना’ नहीं कहलाती। संसारकी वस्तुको संसारकी ही सेवामें लगा देनेकी इच्छा भी ‘कामना’ नहीं, प्रत्युत त्याग है; क्योंकि ‘कामना’ लेनेकी होती है, देनेकी नहीं। तात्पर्य है कि जो वस्तु अपनी तथा अविनाशी है, उसकी इच्छा करना आवश्यकता है (भूख) है; और जो वस्तु दूसरेकी तथा नाशवान् है, उसे दूसरेको देनेकी इच्छा करना ‘त्याग’ है। जैसे शरीरकी भूख मिटानेके लिये भोजनकी इच्छा करना एक प्रकारसे ‘कामना’ नहीं होती, ऐसे ही ‘स्वयं’ की भूख मिटानेके लिये परमात्मतत्त्वकी इच्छा करना ‘कामना’ नहीं होती। कामना नाशवान् जड़-वस्तुकी होती है, और आवश्यकता चिन्मय-तत्त्वकी होती है। कामनाकी पूर्ति नहीं होती, प्रत्युत वह बढ़ती ही रहती है, इसलिये उसका त्याग करना है; परन्तु आवश्यकताकी पूर्ति होती है। उस आवश्यकताकी पूर्तिके लिये तीन उपाय हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। मनुष्यने सांसारिक नाशवान् चीजोंको अपनी माना है, जिससे वह संसारका गुलाम हुआ है। अतः वह सबके हितके उद्देश्यसे उन नाशवान् चीजोंको संसारकी समझकर संसारकी सेवा, हितमें लगा दे, तो उसकी गुलामी (पराधीनता) छूट जायगी और वह स्वतन्त्र हो जायगा—यह कर्मयोग है। परमात्मा तो अपना स्वरूप है। जीव उससे अलग नहीं है। केवल नाशवान् चीजोंसे अपना सम्बन्ध माननेसे वह अपने स्वरूपसे च्युत हुआ है। अतः नाशवान्के सम्बन्धका त्याग कर दें, तो अपने स्वरूपका बोध हो जायगा—यह ज्ञानयोग है। भगवान् अंशी हैं और जीव अंश हैं। नाशवान् इनका परस्पर नित्य-सम्बन्ध है। केवल नाशवान् चीजको अपनी माना है, जिससे वह भगवान्से विमुख हुआ है। नाशवान्को अपना न मानकर एकमात्र भगवान्को ही अपना माननेसे वह स्वतः भगवान्के सम्मुख हो जायगा और उसे भगवत्प्रेम प्राप्त हो जायगा—यह भक्तियोग है। तात्पर्य यह है कि नाशवान् चीजको अपनी माननेसे ही यह जीव संसारका गुलाम, अपने स्वरूपसे च्युत और भगवान्से विमुख हुआ है। यदि वह नाशवान् चीजको अपनी न माने (जो कि अपनी नहीं है), तो संसारकी गुलामी छूट जायगी, अपने स्वरूपका बोध हो जायगा और भगवत्प्रेमकी प्राप्ति हो जायगी।
हैं। इतना ही नहीं कीर्तिकी कामना मरनेके बाद भी इस रूपमें रहती है कि लोग मेरी प्रशंसा करते रहें; मेरा स्मारक बन जाय; मेरी स्मृतिमें पुस्तकें बन जायें; लोग मुझे याद करें, आदि। यद्यपि कामनाएँ प्रायः सभी योनियोंमें न्यूनाधिकरूपसे रहती हैं, तथापि वे मनुष्ययोनिमें ही बाँधनेवाली होती हैं*। जब कामनाओंसे प्रेरित होकर मनुष्य कर्म करता है, तब उन कर्मोंके संस्कार उसके अन्तःकरणमें संचित होकर भावी जन्म-मरणके कारण बन जाते हैं। मनुष्ययोनिमें किये हुए कर्मोंका फल इस जन्ममें तथा मरनेके बाद भी अवश्य भोगना पड़ता है (गीता—अठारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। अतः तादात्म्य, ममता और कामनाके रहते हुए कर्मोंसे सम्बन्ध नहीं छूट सकता।
यह नियम है कि जहाँसे बन्धन होता है, वहाँसे छूटकारा होता है; जैसे—रस्सीकी गाँठ जहाँ लगी है, वहाँसे वह खुलती है। मनुष्ययोनिमें ही जीव शुभाशुभ कर्मोंसे बँधता है; अतः मनुष्ययोनिमें ही वह मुक्त हो सकता है।
पहले श्लोकमें आये ‘ऊर्ध्वमूलम्’ पदका तात्पर्य है—परमात्मा, जो संसारके रचयिता तथा उसके मूल आधार हैं; और यहाँ ‘मूलानि’ पदका तात्पर्य है—तादात्म्य, ममता और कामनारूप मूल, जो संसारमें मनुष्यको बाँधते हैं। साधकको इन (तादात्म्य, ममता और कामनारूप) मूलोंका तो छेदन करना है और ऊर्ध्वमूल परमात्माका आश्रय लेना
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
है, जिसका उल्लेख 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' पदसे इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें हुआ है।
मनुष्यलोकमें कर्मानुसार बाँधनेवाले तादात्म्य, ममता और कामनारूप मूल नीचे और ऊपर सभी लोकों, योनियोंमें व्याप्त हो रहे हैं। पशु-पक्षियोंका भी अपने शरीरसे 'तादात्म्य' रहता है, अपनी सन्तानमें 'ममता' होती है और भूख लगनेपर खानेके लिये अच्छे पदार्थोंकी 'कामना' होती है। ऐसे ही देवताओंमें भी अपने दिव्य शरीरसे 'तादात्म्य', प्राप्त पदार्थोंमें 'ममता' और अप्राप्त भोगोंकी 'कामना' रहती है। इस प्रकार तादात्म्य, ममता और कामनारूप दोष किसी-न-किसी रूपमें ऊँच-नीच सभी योनियोंमें रहते हैं। परन्तु मनुष्ययोनिके सिवाय दूसरी योनियोंमें ये बाँधनेवाले नहीं होते। यद्यपि मनुष्ययोनिके सिवाय देवादि अन्य योनियोंमें भी
विवेक रहता है, पर भोगोंकी अधिकता होने तथा भोग भोगनेके लिये ही उन योनियोंमें जानेके कारण उनमें विवेकका उपयोग नहीं हो पाता। इसलिये उन योनियोंमें उपर्युक्त दोषोंसे 'स्वयं' को (विवेकके द्वारा) अलग देखना सम्भव नहीं है। मनुष्ययोनि ही ऐसी है, जिसमें (विवेकके कारण) मनुष्य ऐसा अनुभव कर सकता है कि मैं (स्वरूपसे) तादात्म्य, ममता और कामनारूप दोषोंसे सर्वथा रहित हूँ।
भोगोंके परिणामपर दूष्टि रखनेकी योग्यता भी मनुष्य-शरीरमें ही है। परिणामपर दूष्टि न रखकर भोग भोगनेवाले मनुष्यको पशु कहना भी मानो पशुयोनिकी निन्दा ही करना है; क्योंकि पशु तो अपने कर्मफल भोगकर मनुष्ययोनिकी तरफ आ रहा है, पर यह मनुष्य तो निषिद्ध भोग भोगकर पशुयोनिकी तरफ ही जा रहा है।
सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें संसारवृक्षका जो वर्णन किया गया है, उसका प्रयोजन क्या हैं—इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरुढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥
अस्य | = इस संसारवृक्षका (जैसा) | न | = न तो | सुविरुढमूलम् | = दृढ़ मूलोंवाले ---|---|---|---|---|--- रूपम् | = रूप (देखनेमें आता है), | आदिः | = आदि है, | अश्वत्थम् | = संसाररूप अश्वत्थ- वृक्षको तथा | = वैसा | न | = न | दृढेन | = दृढ़ इह | = यहाँ (विचार करनेपर) | अन्तः | = अन्त है | असङ्गशस्त्रेण | = असंगतारूप न, उपलभ्यते | = मिलता नहीं; (क्योंकि इसका) | च | = और | शस्त्रके | द्वारा | | न | = न | छित्त्वा | = काटकर— | | सम्प्रतिष्ठा | = स्थिति ही है। | | | | च | = इसलिये | | | | एनम् | = इस | |
व्याख्या—'न रूपमस्येह तथोपलभ्यते'—इसी अध्यायके पहले श्लोकमें संसारवृक्षके विषयमें कहा गया है कि लोग इसको अव्यय (अविनाशी) कहते हैं; और शास्त्रोंमें भी वर्णन आता है कि सकाम-अनुष्ठान करनेसे लोक-परलोकमें विशाल भोग प्राप्त होते हैं। ऐसी बातें सुनकर मनुष्यलोक तथा स्वर्गलोकमें सुख, रमणीयता और स्थायीपन मालूम देता है। इसी कारण अज्ञानी मनुष्य काम और भोगके परायण होते हैं और 'इससे बढ़कर कोई सुख नहीं है'—ऐसा उनका निश्चय हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बयालीसवाँ और सोलहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। जबतक संसारसे तादात्म्य, ममता और कामनाका सम्बन्ध है, तबतक ऐसा ही प्रतीत होता है। परन्तु भगवान्
कहते हैं कि विवेकवती बुद्धिसे संसारसे अलग होकर अर्थात् संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके देखनेसे उसका जैसा रूप हमने अभी मान रखा है, वैसा उपलब्ध नहीं होता अर्थात् यह नाशवान् और दुःखरूप प्रतीत होता है। 'नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा'—किसी वस्तुके आदि, मध्य और अन्तका ज्ञान दो तरहका होता है—देशकृत और कालकृत। इस संसारका कहोंसे आरम्भ है, कहीं मध्य है और कहीं इसका अन्त होता है?—इस प्रकारसे संसारके 'देशकृत' आदि, मध्य, अन्तका पता नहीं; और कबसे इसका आरम्भ हुआ है, कबतक यह रहेगा और कब इसका अन्त होगा?—इस प्रकारसे संसारके 'कालकृत' आदि, मध्य, अन्तका भी पता नहीं।