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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

है, जिसका उल्लेख 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' पदसे इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें हुआ है।

मनुष्यलोकमें कर्मानुसार बाँधनेवाले तादात्म्य, ममता और कामनारूप मूल नीचे और ऊपर सभी लोकों, योनियोंमें व्याप्त हो रहे हैं। पशु-पक्षियोंका भी अपने शरीरसे 'तादात्म्य' रहता है, अपनी सन्तानमें 'ममता' होती है और भूख लगनेपर खानेके लिये अच्छे पदार्थोंकी 'कामना' होती है। ऐसे ही देवताओंमें भी अपने दिव्य शरीरसे 'तादात्म्य', प्राप्त पदार्थोंमें 'ममता' और अप्राप्त भोगोंकी 'कामना' रहती है। इस प्रकार तादात्म्य, ममता और कामनारूप दोष किसी-न-किसी रूपमें ऊँच-नीच सभी योनियोंमें रहते हैं। परन्तु मनुष्ययोनिके सिवाय दूसरी योनियोंमें ये बाँधनेवाले नहीं होते। यद्यपि मनुष्ययोनिके सिवाय देवादि अन्य योनियोंमें भी

विवेक रहता है, पर भोगोंकी अधिकता होने तथा भोग भोगनेके लिये ही उन योनियोंमें जानेके कारण उनमें विवेकका उपयोग नहीं हो पाता। इसलिये उन योनियोंमें उपर्युक्त दोषोंसे 'स्वयं' को (विवेकके द्वारा) अलग देखना सम्भव नहीं है। मनुष्ययोनि ही ऐसी है, जिसमें (विवेकके कारण) मनुष्य ऐसा अनुभव कर सकता है कि मैं (स्वरूपसे) तादात्म्य, ममता और कामनारूप दोषोंसे सर्वथा रहित हूँ।

भोगोंके परिणामपर दूष्टि रखनेकी योग्यता भी मनुष्य-शरीरमें ही है। परिणामपर दूष्टि न रखकर भोग भोगनेवाले मनुष्यको पशु कहना भी मानो पशुयोनिकी निन्दा ही करना है; क्योंकि पशु तो अपने कर्मफल भोगकर मनुष्ययोनिकी तरफ आ रहा है, पर यह मनुष्य तो निषिद्ध भोग भोगकर पशुयोनिकी तरफ ही जा रहा है।

सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें संसारवृक्षका जो वर्णन किया गया है, उसका प्रयोजन क्या हैं—इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।

अश्वत्थमेनं सुविरुढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥

अस्य | = इस संसारवृक्षका (जैसा) | न | = न तो | सुविरुढमूलम् | = दृढ़ मूलोंवाले ---|---|---|---|---|--- रूपम् | = रूप (देखनेमें आता है), | आदिः | = आदि है, | अश्वत्थम् | = संसाररूप अश्वत्थ- वृक्षको तथा | = वैसा | न | = न | दृढेन | = दृढ़ इह | = यहाँ (विचार करनेपर) | अन्तः | = अन्त है | असङ्गशस्त्रेण | = असंगतारूप न, उपलभ्यते | = मिलता नहीं; (क्योंकि इसका) | च | = और | शस्त्रके | द्वारा | | न | = न | छित्त्वा | = काटकर— | | सम्प्रतिष्ठा | = स्थिति ही है। | | | | च | = इसलिये | | | | एनम् | = इस | |

व्याख्या—'न रूपमस्येह तथोपलभ्यते'—इसी अध्यायके पहले श्लोकमें संसारवृक्षके विषयमें कहा गया है कि लोग इसको अव्यय (अविनाशी) कहते हैं; और शास्त्रोंमें भी वर्णन आता है कि सकाम-अनुष्ठान करनेसे लोक-परलोकमें विशाल भोग प्राप्त होते हैं। ऐसी बातें सुनकर मनुष्यलोक तथा स्वर्गलोकमें सुख, रमणीयता और स्थायीपन मालूम देता है। इसी कारण अज्ञानी मनुष्य काम और भोगके परायण होते हैं और 'इससे बढ़कर कोई सुख नहीं है'—ऐसा उनका निश्चय हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बयालीसवाँ और सोलहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। जबतक संसारसे तादात्म्य, ममता और कामनाका सम्बन्ध है, तबतक ऐसा ही प्रतीत होता है। परन्तु भगवान्

कहते हैं कि विवेकवती बुद्धिसे संसारसे अलग होकर अर्थात् संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके देखनेसे उसका जैसा रूप हमने अभी मान रखा है, वैसा उपलब्ध नहीं होता अर्थात् यह नाशवान् और दुःखरूप प्रतीत होता है। 'नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा'—किसी वस्तुके आदि, मध्य और अन्तका ज्ञान दो तरहका होता है—देशकृत और कालकृत। इस संसारका कहोंसे आरम्भ है, कहीं मध्य है और कहीं इसका अन्त होता है?—इस प्रकारसे संसारके 'देशकृत' आदि, मध्य, अन्तका पता नहीं; और कबसे इसका आरम्भ हुआ है, कबतक यह रहेगा और कब इसका अन्त होगा?—इस प्रकारसे संसारके 'कालकृत' आदि, मध्य, अन्तका भी पता नहीं।