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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 958

श्लोक २ ]

  • साधक-संजीवनी *

१५७

मनुष्य-शरीरमें ऐसा विवेक है, जिसको महत्त्व देकर जीव परमधामतक पहुँच सकता है और अविवेकपूर्वक विषयोंका सेवन करके नरकोंमें भी जा सकता है। इसीलिये गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है—

नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥

(मानस ७।१२१।५)

‘अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्य-लोके’—मनुष्यके अतिरिक्त दूसरी सब भोगयोनियों हैं। मनुष्ययोनिमें किये हुए पाप-पुण्योंका फल भोगनेके लिये ही मनुष्यको दूसरी योनियोंमें जाना पड़ता है। नये पाप-पुण्य करनेका अथवा पाप-पुण्यसे रहित होकर मुक्त होनेका अधिकार और अवसर मनुष्य-शरीरमें ही है।

यहाँ ‘मूलानि’ पदका तात्पर्य तादात्म्य, ममता और कामनारूप मूलसे है, वास्तविक ऊर्ध्वमूल परमात्मासे नहीं। ‘मैं शरीर हूँ’—ऐसा मानना ‘तादात्म्य’ है। शरीरादि पदार्थोंको अपना मानना ‘ममता’ है। पुत्रैषणा, वितैषणा और लोकेषणा—ये तीन प्रकारकी मुख्य कामनाएँ हैं। पुत्र-परिवारकी कामना ‘पुत्रैषणा’ और धन-सम्पत्तिकी कामना ‘वितैषणा’ है। ‘संसारमें मेरा मान-आदर हो जाय’, ‘मैं बना रहूँ’, ‘शरीर नौरोग रहे’, ‘मैं शास्त्रोंका पण्डित बन जाऊँ’ आदि अनेक कामनाएँ ‘लोकेषणा’ के अन्तर्गत

  • ये तीन इच्छाएँ (बाँधनेवाली न होनेके कारण) ‘कामना’ नहीं कहलाती—(१) भगवदर्शन या भगवत्प्रेमकी कामना, (२) स्वरूपबोधकी कामना और (३) सेवा करनेकी कामना। स्वरूपबोध या परमात्मा (भगवदर्शन या भगवत्प्रेम)-की इच्छा ‘कामना’ नहीं है; क्योंकि स्वरूप और परमात्मा दोनों ही ‘नित्यप्राप्त’ तथा ‘अपने’ हैं। जैसे अपनी जेबसे पैसे निकालना चोरी नहीं कहलाती, ऐसे ही स्वरूप या परमात्मा-(जो अपने तथा अपनेमें हैं)-की इच्छा करना ‘कामना’ नहीं कहलाती। संसारकी वस्तुको संसारकी ही सेवामें लगा देनेकी इच्छा भी ‘कामना’ नहीं, प्रत्युत त्याग है; क्योंकि ‘कामना’ लेनेकी होती है, देनेकी नहीं। तात्पर्य है कि जो वस्तु अपनी तथा अविनाशी है, उसकी इच्छा करना आवश्यकता है (भूख) है; और जो वस्तु दूसरेकी तथा नाशवान् है, उसे दूसरेको देनेकी इच्छा करना ‘त्याग’ है। जैसे शरीरकी भूख मिटानेके लिये भोजनकी इच्छा करना एक प्रकारसे ‘कामना’ नहीं होती, ऐसे ही ‘स्वयं’ की भूख मिटानेके लिये परमात्मतत्त्वकी इच्छा करना ‘कामना’ नहीं होती। कामना नाशवान् जड़-वस्तुकी होती है, और आवश्यकता चिन्मय-तत्त्वकी होती है। कामनाकी पूर्ति नहीं होती, प्रत्युत वह बढ़ती ही रहती है, इसलिये उसका त्याग करना है; परन्तु आवश्यकताकी पूर्ति होती है। उस आवश्यकताकी पूर्तिके लिये तीन उपाय हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। मनुष्यने सांसारिक नाशवान् चीजोंको अपनी माना है, जिससे वह संसारका गुलाम हुआ है। अतः वह सबके हितके उद्देश्यसे उन नाशवान् चीजोंको संसारकी समझकर संसारकी सेवा, हितमें लगा दे, तो उसकी गुलामी (पराधीनता) छूट जायगी और वह स्वतन्त्र हो जायगा—यह कर्मयोग है। परमात्मा तो अपना स्वरूप है। जीव उससे अलग नहीं है। केवल नाशवान् चीजोंसे अपना सम्बन्ध माननेसे वह अपने स्वरूपसे च्युत हुआ है। अतः नाशवान्के सम्बन्धका त्याग कर दें, तो अपने स्वरूपका बोध हो जायगा—यह ज्ञानयोग है। भगवान् अंशी हैं और जीव अंश हैं। नाशवान् इनका परस्पर नित्य-सम्बन्ध है। केवल नाशवान् चीजको अपनी माना है, जिससे वह भगवान्से विमुख हुआ है। नाशवान्को अपना न मानकर एकमात्र भगवान्को ही अपना माननेसे वह स्वतः भगवान्के सम्मुख हो जायगा और उसे भगवत्प्रेम प्राप्त हो जायगा—यह भक्तियोग है। तात्पर्य यह है कि नाशवान् चीजको अपनी माननेसे ही यह जीव संसारका गुलाम, अपने स्वरूपसे च्युत और भगवान्से विमुख हुआ है। यदि वह नाशवान् चीजको अपनी न माने (जो कि अपनी नहीं है), तो संसारकी गुलामी छूट जायगी, अपने स्वरूपका बोध हो जायगा और भगवत्प्रेमकी प्राप्ति हो जायगी।

हैं। इतना ही नहीं कीर्तिकी कामना मरनेके बाद भी इस रूपमें रहती है कि लोग मेरी प्रशंसा करते रहें; मेरा स्मारक बन जाय; मेरी स्मृतिमें पुस्तकें बन जायें; लोग मुझे याद करें, आदि। यद्यपि कामनाएँ प्रायः सभी योनियोंमें न्यूनाधिकरूपसे रहती हैं, तथापि वे मनुष्ययोनिमें ही बाँधनेवाली होती हैं*। जब कामनाओंसे प्रेरित होकर मनुष्य कर्म करता है, तब उन कर्मोंके संस्कार उसके अन्तःकरणमें संचित होकर भावी जन्म-मरणके कारण बन जाते हैं। मनुष्ययोनिमें किये हुए कर्मोंका फल इस जन्ममें तथा मरनेके बाद भी अवश्य भोगना पड़ता है (गीता—अठारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। अतः तादात्म्य, ममता और कामनाके रहते हुए कर्मोंसे सम्बन्ध नहीं छूट सकता।

यह नियम है कि जहाँसे बन्धन होता है, वहाँसे छूटकारा होता है; जैसे—रस्सीकी गाँठ जहाँ लगी है, वहाँसे वह खुलती है। मनुष्ययोनिमें ही जीव शुभाशुभ कर्मोंसे बँधता है; अतः मनुष्ययोनिमें ही वह मुक्त हो सकता है।

पहले श्लोकमें आये ‘ऊर्ध्वमूलम्’ पदका तात्पर्य है—परमात्मा, जो संसारके रचयिता तथा उसके मूल आधार हैं; और यहाँ ‘मूलानि’ पदका तात्पर्य है—तादात्म्य, ममता और कामनारूप मूल, जो संसारमें मनुष्यको बाँधते हैं। साधकको इन (तादात्म्य, ममता और कामनारूप) मूलोंका तो छेदन करना है और ऊर्ध्वमूल परमात्माका आश्रय लेना

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