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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

इसलिये गुणोंके सम्बन्धसे ही संसारकी स्थिति है। गुणोंकी अनुभूति गुणोंसे उत्पन्न वृत्तियों तथा पदार्थोंके द्वारा होती है। अतः वृत्तियों तथा पदार्थोंसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करानेके लिये ही 'गुणप्रवृद्धाः' पद देकर भगवान्ने यहाँ यह बताया है कि जबतक गुणोंसे किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध है, तबतक संसारवृक्षकी शाखाएँ बढ़ती ही रहेंगी। अतः संसारवृक्षका छेदन करनेके लिये गुणोंका संग किंचिन्मात्र भी नहीं रखना चाहिये; क्योंकि गुणोंका संग रहते हुए संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हो सकता।

'विषयप्रवालाः' —जिस प्रकार शाखासे निकलने-वाली नयी कोमल पत्तीके डंठलसे लेकर पत्तीके अग्रभाग-तकको प्रवाल (कॉपल) कहा जाता है, उसी प्रकार गुणोंकी वृत्तियोंसे लेकर दृश्य पदार्थमात्रको यहाँ 'विषयप्रवालाः' कहा गया है।

वृक्षके मूलसे तना (मुख्य शाखा), तनेसे शाखाएँ और शाखाओंसे कॉपलें फूटती हैं और कॉपलोंसे शाखाएँ आगे बढ़ती हैं। इस संसारवृक्षमें विषय-चिन्तन ही कॉपलें हैं। विषय-चिन्तन तीनों गुणोंसे होता है। जिस प्रकार गुणरूप जलसे संसारवृक्षकी शाखाएँ बढ़ती हैं, उसी प्रकार गुणरूप जलसे विषयरूप कॉपलें भी बढ़ती हैं। जैसे कॉपलें दीखती हैं, उनमें व्याप्त जल नहीं दीखता, ऐसे ही शब्दादि विषय तो दीखते हैं, पर उनमें गुण नहीं दीखते। अतः विषयोंसे ही गुण जाने जाते हैं।

'विषयप्रवालाः' पदका भाव यह प्रतीत होता है कि विषय-चिन्तन करते हुए मनुष्यका संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हो सकता१ (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। अन्तकालमें मनुष्य जिस-जिस भावका चिन्तन करते हुए शरीरका त्याग करता है, उस-उस भावको ही प्राप्त होता है (गीता—आठवें अध्यायका छठा श्लोक)—यही विषयरूप कॉपलोंका फूटना है।

कॉपलोंकी तरह विषय भी देखनेमें बहुत सुन्दर प्रतीत होते हैं, जिससे मनुष्य उनमें आकर्षित हो जाता है। साधक

अपने विवेकसे परिणामपर विचार करते हुए इनको क्षणभंगुर, नाशवान् और दुःखरूप जानकर इन विषयोंका सुगमतापूर्वक त्याग कर सकता है (गीता—पाँचवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। विषयोंमें सौन्दर्य और आकर्षण अपने रागके कारण ही दीखता है, वास्तवमें वे सुन्दर और आकर्षक हैं नहीं। इसलिये विषयोंमें रागका त्याग ही वास्तविक त्याग है। जैसे कोमल कॉपलोंको नष्ट करनेमें कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता, ऐसे ही इन विषयोंके त्यागमें भी साधकको कठिनाता नहीं माननी चाहिये। मनसे आदर देनेपर ही ये विषयरूप कॉपलें सुन्दर और आकर्षक दीखती हैं, वास्तवमें तो ये विषयुक्त लड़ड़ूके समान ही हैं२। इसलिये इस संसारवृक्षका छेदन करनेके लिये भोगबुद्धि-पूर्वक विषय-चिन्तन एवं विषयसेवनका सर्वथा त्याग करना आवश्यक है।३

'अधश्चोर्ध्वं प्रसूताः' —यहाँ 'च' पदको मध्यलोक अर्थात् मनुष्यलोक-(इसी श्लोकके 'मनुष्यलोके कर्मानुबन्धीनि' पदों-) का वाचक समझना चाहिये। 'ऊर्ध्वम्' पदका तात्पर्य ब्रह्मलोक आदिसे है, जिसमें जानेके दो मार्ग हैं—देवयान और पितृयान (जिसका वर्णन आठवें अध्यायके चौबीसवें-पचीसवें श्लोकोंमें शुक्ल और कृष्ण-मार्गके नामसे हुआ है)। 'अधः' पदका तात्पर्य नरकोंसे है, जिसके भी दो भेद हैं—योनिविशेष नरक और स्थानविशेष नरक।

इन पदोंसे यह कहा गया है कि ऊर्ध्वमूल परमात्मासे नीचे, संसारवृक्षकी शाखाएँ नीचे, मध्य और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं। इसमें मनुष्ययोनिरूप शाखा ही मूल शाखा है; क्योंकि मनुष्ययोनिमें नवीन कर्मोंको करनेका अधिकार है। अन्य शाखाएँ भोगयोनियाँ हैं, जिनमें केवल पूर्वकृत कर्मोंका फल भोगनेका ही अधिकार है। इस मनुष्ययोनिरूप मूल शाखासे मनुष्य नीचे (अधोलोक) तथा ऊपर (ऊर्ध्व-लोक)—दोनों ओर जा सकता है; और संसारवृक्षका छेदन करके सबसे ऊर्ध्व (परमात्मा) तक भी जा सकता है।

१-सेवत विषय बिबर्धं जिमि नित नित नूतन मार॥ (मानस ६।१२)

२-दोषेण तीव्रो विषयः कृष्णसर्पविषादपि। विषं निहन्ति भोक्तां द्रष्टारं चक्षुषाययम्॥

(विवेकचूडामणि ७९)

'दोषमें विषय काले सर्पके विषसे भी अधिक तीव्र हैं; क्योंकि विष तो खानेवालेको ही मारता है, पर विषय आँखसे देखनेवालेको भी नहीं छोड़ते।'

३-मोक्षस्य काङ्क्ष्या यदि वै तवास्ति त्यजातिदूराद्विषयान् विषं यथा। (विवेक ८४)

'यदि तुझे मोक्षकी इच्छा है तो विषयोंको विषके समान दूरीसे त्याग दे।