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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 956

श्लोक २ ]

  • साधक-संजीवनी *

१५५

परिशिष्ट भाव —जगत्, जीव और परमात्मा—तीनों वासुदेवरूप ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्।’ इसीका यहाँ वृक्षरूपसे वर्णन किया गया है।

परिवर्तनशील होनेपर भी संसारको ‘अव्यय’ कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें निरन्तर परिवर्तन होनेपर भी कुछ अव्यय (खर्चा) नहीं होता अर्थात् अन्त नहीं होता। जैसे समुद्रके ऊपर कितनी लहरें उठती दीखती हैं, ज्वार-भाटा आता है, पर उसका जल उतना ही रहता है, घटता-बढ़ता नहीं। ऐसे ही निरन्तर परिवर्तन दीखनेपर भी संसार अव्यय ही रहता है। कारण कि परिवर्तनरूप संसार भी परमात्माकी शक्ति ‘अपरा प्रकृति’ का कार्य होनेसे परमात्माका ही स्वरूप है—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९)। परिवर्तनरूप अपरा प्रकृति भी परमात्माका स्वरूप है और अपरिवर्तनरूप परा प्रकृति भी परमात्माका स्वरूप है। यह संसार उस परमात्माकी ही लहरें हैं। जैसे ऊपरसे लहरें दीखनेपर भी समुद्रके भीतर कोई लहर नहीं है, एक सम, शान्त समुद्र है, ऐसे ही ऊपरसे परिवर्तनशील संसार दीखते हुए भी भीतरसे एक सम, शान्त परमात्मा है! (गीता—तेरहवें अध्यायका सताईसवाँ श्लोक) तात्पर्य है कि संसार संसाररूपसे अव्यय नहीं है, प्रत्युत भगवदरूपसे अव्यय है। संसाररूपसे भगवान्की ही झलक दीखती है। साधककी दृष्टि उस झलककी ओर न होकर भगवान्की ओर ही होनी चाहिये। झलककी ओर दृष्टि होना अर्थात् उसीको स्वतन्त्र सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़ना ही बन्धन है।

संसारको ‘अव्यय’ कहनेका एक आशय यह भी है कि जो इस संसारके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ेगा, उसका वह सम्बन्ध अर्थात् जन्म-मरण भी अव्यय हो जायगा, कभी मिटेगा नहीं, उसका कभी अन्त आयेगा नहीं। लम्बे रास्तेका तो अन्त आ सकता है, पर गोल रास्तेका अन्त कैसे आये? कोल्हूके बैलकी तरह जन्मनेके बाद मरना और मरनेके बाद जन्मना—यह गोल रास्ता है।

संसार ‘अव्यय’ है; क्योंकि संसारका बीज भी ‘अव्यय’ है—‘बीजमव्ययम्’ (गीता ९।१८)।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जिस संसारवृक्षका दिग्दर्शन कराया, उसी संसारवृक्षका अब आगेके श्लोकमें अवयवोंसहित विस्तारसे वर्णन करते हैं।

अधश्चोर्ध्वं प्रसूतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।

अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥

तस्य= उस संसार-शाखाः= शाखाएँकर्मानुबन्धीनि= कर्मोंके अनुसार
वृक्षकीवृक्षकीअधः= नीचे,बाँधनेवाले
गुणप्रवृद्धाः= गुणों (सत्त्व, रज और तम) के द्वारा= (मध्यमें) औरमूलानि= मूल (भी)
बढ़ी हुई(तथा)ऊर्ध्वम्= ऊपरअधः= नीचे
विषयप्रवालाः= विषयरूपप्रसूताः= फैली हुई हैं।= और (ऊपर)
कोपलोंवालीमनुष्यलोके= मनुष्यलोकमेंअनुसन्ततानि= (सभी लोकोंमें)
व्याप्त हो रहे हैं।

व्याख्या —‘तस्य शाखा गुणप्रवृद्धाः’—संसारवृक्षकी मुख्य शाखा ब्रह्मा है। ब्रह्मासे सम्पूर्ण देव, मनुष्य, तिर्यक् आदि योनियोंकी उत्पत्ति और विस्तार हुआ है। इसलिये ब्रह्मलोकसे पातालतक जितने भी लोक तथा उनमें रहनेवाले देव, मनुष्य, कीट आदि प्राणी हैं, वे सभी संसारवृक्षकी शाखाएँ हैं। जिस प्रकार जल सींचनेसे वृक्षकी शाखाएँ बढ़ती हैं, उसी प्रकार गुणरूप जलके संगसे इस

संसारवृक्षकी शाखाएँ बढ़ती हैं। इसीलिये भगवान्ने जीवात्माके ऊँच, मध्य और नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण गुणोंका संग ही बताया है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ और चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। सम्पूर्ण सृष्टिमें ऐसा कोई देश, वस्तु, व्यक्ति नहीं, जो प्रकृतिसे उत्पन्न तीनों गुणोंसे रहित हो (गीता—अठारहवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक)।