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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक २ ]

  • साधक-संजीवनी *

१५५

परिशिष्ट भाव —जगत्, जीव और परमात्मा—तीनों वासुदेवरूप ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्।’ इसीका यहाँ वृक्षरूपसे वर्णन किया गया है।

परिवर्तनशील होनेपर भी संसारको ‘अव्यय’ कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें निरन्तर परिवर्तन होनेपर भी कुछ अव्यय (खर्चा) नहीं होता अर्थात् अन्त नहीं होता। जैसे समुद्रके ऊपर कितनी लहरें उठती दीखती हैं, ज्वार-भाटा आता है, पर उसका जल उतना ही रहता है, घटता-बढ़ता नहीं। ऐसे ही निरन्तर परिवर्तन दीखनेपर भी संसार अव्यय ही रहता है। कारण कि परिवर्तनरूप संसार भी परमात्माकी शक्ति ‘अपरा प्रकृति’ का कार्य होनेसे परमात्माका ही स्वरूप है—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९)। परिवर्तनरूप अपरा प्रकृति भी परमात्माका स्वरूप है और अपरिवर्तनरूप परा प्रकृति भी परमात्माका स्वरूप है। यह संसार उस परमात्माकी ही लहरें हैं। जैसे ऊपरसे लहरें दीखनेपर भी समुद्रके भीतर कोई लहर नहीं है, एक सम, शान्त समुद्र है, ऐसे ही ऊपरसे परिवर्तनशील संसार दीखते हुए भी भीतरसे एक सम, शान्त परमात्मा है! (गीता—तेरहवें अध्यायका सताईसवाँ श्लोक) तात्पर्य है कि संसार संसाररूपसे अव्यय नहीं है, प्रत्युत भगवदरूपसे अव्यय है। संसाररूपसे भगवान्की ही झलक दीखती है। साधककी दृष्टि उस झलककी ओर न होकर भगवान्की ओर ही होनी चाहिये। झलककी ओर दृष्टि होना अर्थात् उसीको स्वतन्त्र सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़ना ही बन्धन है।

संसारको ‘अव्यय’ कहनेका एक आशय यह भी है कि जो इस संसारके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ेगा, उसका वह सम्बन्ध अर्थात् जन्म-मरण भी अव्यय हो जायगा, कभी मिटेगा नहीं, उसका कभी अन्त आयेगा नहीं। लम्बे रास्तेका तो अन्त आ सकता है, पर गोल रास्तेका अन्त कैसे आये? कोल्हूके बैलकी तरह जन्मनेके बाद मरना और मरनेके बाद जन्मना—यह गोल रास्ता है।

संसार ‘अव्यय’ है; क्योंकि संसारका बीज भी ‘अव्यय’ है—‘बीजमव्ययम्’ (गीता ९।१८)।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जिस संसारवृक्षका दिग्दर्शन कराया, उसी संसारवृक्षका अब आगेके श्लोकमें अवयवोंसहित विस्तारसे वर्णन करते हैं।

अधश्चोर्ध्वं प्रसूतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।

अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥

तस्य= उस संसार-शाखाः= शाखाएँकर्मानुबन्धीनि= कर्मोंके अनुसार
वृक्षकीवृक्षकीअधः= नीचे,बाँधनेवाले
गुणप्रवृद्धाः= गुणों (सत्त्व, रज और तम) के द्वारा= (मध्यमें) औरमूलानि= मूल (भी)
बढ़ी हुई(तथा)ऊर्ध्वम्= ऊपरअधः= नीचे
विषयप्रवालाः= विषयरूपप्रसूताः= फैली हुई हैं।= और (ऊपर)
कोपलोंवालीमनुष्यलोके= मनुष्यलोकमेंअनुसन्ततानि= (सभी लोकोंमें)
व्याप्त हो रहे हैं।

व्याख्या —‘तस्य शाखा गुणप्रवृद्धाः’—संसारवृक्षकी मुख्य शाखा ब्रह्मा है। ब्रह्मासे सम्पूर्ण देव, मनुष्य, तिर्यक् आदि योनियोंकी उत्पत्ति और विस्तार हुआ है। इसलिये ब्रह्मलोकसे पातालतक जितने भी लोक तथा उनमें रहनेवाले देव, मनुष्य, कीट आदि प्राणी हैं, वे सभी संसारवृक्षकी शाखाएँ हैं। जिस प्रकार जल सींचनेसे वृक्षकी शाखाएँ बढ़ती हैं, उसी प्रकार गुणरूप जलके संगसे इस

संसारवृक्षकी शाखाएँ बढ़ती हैं। इसीलिये भगवान्ने जीवात्माके ऊँच, मध्य और नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण गुणोंका संग ही बताया है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ और चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। सम्पूर्ण सृष्टिमें ऐसा कोई देश, वस्तु, व्यक्ति नहीं, जो प्रकृतिसे उत्पन्न तीनों गुणोंसे रहित हो (गीता—अठारहवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक)।

१५६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

इसलिये गुणोंके सम्बन्धसे ही संसारकी स्थिति है। गुणोंकी अनुभूति गुणोंसे उत्पन्न वृत्तियों तथा पदार्थोंके द्वारा होती है। अतः वृत्तियों तथा पदार्थोंसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करानेके लिये ही 'गुणप्रवृद्धाः' पद देकर भगवान्ने यहाँ यह बताया है कि जबतक गुणोंसे किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध है, तबतक संसारवृक्षकी शाखाएँ बढ़ती ही रहेंगी। अतः संसारवृक्षका छेदन करनेके लिये गुणोंका संग किंचिन्मात्र भी नहीं रखना चाहिये; क्योंकि गुणोंका संग रहते हुए संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हो सकता।

'विषयप्रवालाः' —जिस प्रकार शाखासे निकलने-वाली नयी कोमल पत्तीके डंठलसे लेकर पत्तीके अग्रभाग-तकको प्रवाल (कॉपल) कहा जाता है, उसी प्रकार गुणोंकी वृत्तियोंसे लेकर दृश्य पदार्थमात्रको यहाँ 'विषयप्रवालाः' कहा गया है।

वृक्षके मूलसे तना (मुख्य शाखा), तनेसे शाखाएँ और शाखाओंसे कॉपलें फूटती हैं और कॉपलोंसे शाखाएँ आगे बढ़ती हैं। इस संसारवृक्षमें विषय-चिन्तन ही कॉपलें हैं। विषय-चिन्तन तीनों गुणोंसे होता है। जिस प्रकार गुणरूप जलसे संसारवृक्षकी शाखाएँ बढ़ती हैं, उसी प्रकार गुणरूप जलसे विषयरूप कॉपलें भी बढ़ती हैं। जैसे कॉपलें दीखती हैं, उनमें व्याप्त जल नहीं दीखता, ऐसे ही शब्दादि विषय तो दीखते हैं, पर उनमें गुण नहीं दीखते। अतः विषयोंसे ही गुण जाने जाते हैं।

'विषयप्रवालाः' पदका भाव यह प्रतीत होता है कि विषय-चिन्तन करते हुए मनुष्यका संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हो सकता१ (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। अन्तकालमें मनुष्य जिस-जिस भावका चिन्तन करते हुए शरीरका त्याग करता है, उस-उस भावको ही प्राप्त होता है (गीता—आठवें अध्यायका छठा श्लोक)—यही विषयरूप कॉपलोंका फूटना है।

कॉपलोंकी तरह विषय भी देखनेमें बहुत सुन्दर प्रतीत होते हैं, जिससे मनुष्य उनमें आकर्षित हो जाता है। साधक

अपने विवेकसे परिणामपर विचार करते हुए इनको क्षणभंगुर, नाशवान् और दुःखरूप जानकर इन विषयोंका सुगमतापूर्वक त्याग कर सकता है (गीता—पाँचवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। विषयोंमें सौन्दर्य और आकर्षण अपने रागके कारण ही दीखता है, वास्तवमें वे सुन्दर और आकर्षक हैं नहीं। इसलिये विषयोंमें रागका त्याग ही वास्तविक त्याग है। जैसे कोमल कॉपलोंको नष्ट करनेमें कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता, ऐसे ही इन विषयोंके त्यागमें भी साधकको कठिनाता नहीं माननी चाहिये। मनसे आदर देनेपर ही ये विषयरूप कॉपलें सुन्दर और आकर्षक दीखती हैं, वास्तवमें तो ये विषयुक्त लड़ड़ूके समान ही हैं२। इसलिये इस संसारवृक्षका छेदन करनेके लिये भोगबुद्धि-पूर्वक विषय-चिन्तन एवं विषयसेवनका सर्वथा त्याग करना आवश्यक है।३

'अधश्चोर्ध्वं प्रसूताः' —यहाँ 'च' पदको मध्यलोक अर्थात् मनुष्यलोक-(इसी श्लोकके 'मनुष्यलोके कर्मानुबन्धीनि' पदों-) का वाचक समझना चाहिये। 'ऊर्ध्वम्' पदका तात्पर्य ब्रह्मलोक आदिसे है, जिसमें जानेके दो मार्ग हैं—देवयान और पितृयान (जिसका वर्णन आठवें अध्यायके चौबीसवें-पचीसवें श्लोकोंमें शुक्ल और कृष्ण-मार्गके नामसे हुआ है)। 'अधः' पदका तात्पर्य नरकोंसे है, जिसके भी दो भेद हैं—योनिविशेष नरक और स्थानविशेष नरक।

इन पदोंसे यह कहा गया है कि ऊर्ध्वमूल परमात्मासे नीचे, संसारवृक्षकी शाखाएँ नीचे, मध्य और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं। इसमें मनुष्ययोनिरूप शाखा ही मूल शाखा है; क्योंकि मनुष्ययोनिमें नवीन कर्मोंको करनेका अधिकार है। अन्य शाखाएँ भोगयोनियाँ हैं, जिनमें केवल पूर्वकृत कर्मोंका फल भोगनेका ही अधिकार है। इस मनुष्ययोनिरूप मूल शाखासे मनुष्य नीचे (अधोलोक) तथा ऊपर (ऊर्ध्व-लोक)—दोनों ओर जा सकता है; और संसारवृक्षका छेदन करके सबसे ऊर्ध्व (परमात्मा) तक भी जा सकता है।

१-सेवत विषय बिबर्धं जिमि नित नित नूतन मार॥ (मानस ६।१२)

२-दोषेण तीव्रो विषयः कृष्णसर्पविषादपि। विषं निहन्ति भोक्तां द्रष्टारं चक्षुषाययम्॥

(विवेकचूडामणि ७९)

'दोषमें विषय काले सर्पके विषसे भी अधिक तीव्र हैं; क्योंकि विष तो खानेवालेको ही मारता है, पर विषय आँखसे देखनेवालेको भी नहीं छोड़ते।'

३-मोक्षस्य काङ्क्ष्या यदि वै तवास्ति त्यजातिदूराद्विषयान् विषं यथा। (विवेक ८४)

'यदि तुझे मोक्षकी इच्छा है तो विषयोंको विषके समान दूरीसे त्याग दे।

श्लोक २ ]

  • साधक-संजीवनी *

१५७

मनुष्य-शरीरमें ऐसा विवेक है, जिसको महत्त्व देकर जीव परमधामतक पहुँच सकता है और अविवेकपूर्वक विषयोंका सेवन करके नरकोंमें भी जा सकता है। इसीलिये गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है—

नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥

(मानस ७।१२१।५)

‘अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्य-लोके’—मनुष्यके अतिरिक्त दूसरी सब भोगयोनियों हैं। मनुष्ययोनिमें किये हुए पाप-पुण्योंका फल भोगनेके लिये ही मनुष्यको दूसरी योनियोंमें जाना पड़ता है। नये पाप-पुण्य करनेका अथवा पाप-पुण्यसे रहित होकर मुक्त होनेका अधिकार और अवसर मनुष्य-शरीरमें ही है।

यहाँ ‘मूलानि’ पदका तात्पर्य तादात्म्य, ममता और कामनारूप मूलसे है, वास्तविक ऊर्ध्वमूल परमात्मासे नहीं। ‘मैं शरीर हूँ’—ऐसा मानना ‘तादात्म्य’ है। शरीरादि पदार्थोंको अपना मानना ‘ममता’ है। पुत्रैषणा, वितैषणा और लोकेषणा—ये तीन प्रकारकी मुख्य कामनाएँ हैं। पुत्र-परिवारकी कामना ‘पुत्रैषणा’ और धन-सम्पत्तिकी कामना ‘वितैषणा’ है। ‘संसारमें मेरा मान-आदर हो जाय’, ‘मैं बना रहूँ’, ‘शरीर नौरोग रहे’, ‘मैं शास्त्रोंका पण्डित बन जाऊँ’ आदि अनेक कामनाएँ ‘लोकेषणा’ के अन्तर्गत

  • ये तीन इच्छाएँ (बाँधनेवाली न होनेके कारण) ‘कामना’ नहीं कहलाती—(१) भगवदर्शन या भगवत्प्रेमकी कामना, (२) स्वरूपबोधकी कामना और (३) सेवा करनेकी कामना। स्वरूपबोध या परमात्मा (भगवदर्शन या भगवत्प्रेम)-की इच्छा ‘कामना’ नहीं है; क्योंकि स्वरूप और परमात्मा दोनों ही ‘नित्यप्राप्त’ तथा ‘अपने’ हैं। जैसे अपनी जेबसे पैसे निकालना चोरी नहीं कहलाती, ऐसे ही स्वरूप या परमात्मा-(जो अपने तथा अपनेमें हैं)-की इच्छा करना ‘कामना’ नहीं कहलाती। संसारकी वस्तुको संसारकी ही सेवामें लगा देनेकी इच्छा भी ‘कामना’ नहीं, प्रत्युत त्याग है; क्योंकि ‘कामना’ लेनेकी होती है, देनेकी नहीं। तात्पर्य है कि जो वस्तु अपनी तथा अविनाशी है, उसकी इच्छा करना आवश्यकता है (भूख) है; और जो वस्तु दूसरेकी तथा नाशवान् है, उसे दूसरेको देनेकी इच्छा करना ‘त्याग’ है। जैसे शरीरकी भूख मिटानेके लिये भोजनकी इच्छा करना एक प्रकारसे ‘कामना’ नहीं होती, ऐसे ही ‘स्वयं’ की भूख मिटानेके लिये परमात्मतत्त्वकी इच्छा करना ‘कामना’ नहीं होती। कामना नाशवान् जड़-वस्तुकी होती है, और आवश्यकता चिन्मय-तत्त्वकी होती है। कामनाकी पूर्ति नहीं होती, प्रत्युत वह बढ़ती ही रहती है, इसलिये उसका त्याग करना है; परन्तु आवश्यकताकी पूर्ति होती है। उस आवश्यकताकी पूर्तिके लिये तीन उपाय हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। मनुष्यने सांसारिक नाशवान् चीजोंको अपनी माना है, जिससे वह संसारका गुलाम हुआ है। अतः वह सबके हितके उद्देश्यसे उन नाशवान् चीजोंको संसारकी समझकर संसारकी सेवा, हितमें लगा दे, तो उसकी गुलामी (पराधीनता) छूट जायगी और वह स्वतन्त्र हो जायगा—यह कर्मयोग है। परमात्मा तो अपना स्वरूप है। जीव उससे अलग नहीं है। केवल नाशवान् चीजोंसे अपना सम्बन्ध माननेसे वह अपने स्वरूपसे च्युत हुआ है। अतः नाशवान्के सम्बन्धका त्याग कर दें, तो अपने स्वरूपका बोध हो जायगा—यह ज्ञानयोग है। भगवान् अंशी हैं और जीव अंश हैं। नाशवान् इनका परस्पर नित्य-सम्बन्ध है। केवल नाशवान् चीजको अपनी माना है, जिससे वह भगवान्से विमुख हुआ है। नाशवान्को अपना न मानकर एकमात्र भगवान्को ही अपना माननेसे वह स्वतः भगवान्के सम्मुख हो जायगा और उसे भगवत्प्रेम प्राप्त हो जायगा—यह भक्तियोग है। तात्पर्य यह है कि नाशवान् चीजको अपनी माननेसे ही यह जीव संसारका गुलाम, अपने स्वरूपसे च्युत और भगवान्से विमुख हुआ है। यदि वह नाशवान् चीजको अपनी न माने (जो कि अपनी नहीं है), तो संसारकी गुलामी छूट जायगी, अपने स्वरूपका बोध हो जायगा और भगवत्प्रेमकी प्राप्ति हो जायगी।

हैं। इतना ही नहीं कीर्तिकी कामना मरनेके बाद भी इस रूपमें रहती है कि लोग मेरी प्रशंसा करते रहें; मेरा स्मारक बन जाय; मेरी स्मृतिमें पुस्तकें बन जायें; लोग मुझे याद करें, आदि। यद्यपि कामनाएँ प्रायः सभी योनियोंमें न्यूनाधिकरूपसे रहती हैं, तथापि वे मनुष्ययोनिमें ही बाँधनेवाली होती हैं*। जब कामनाओंसे प्रेरित होकर मनुष्य कर्म करता है, तब उन कर्मोंके संस्कार उसके अन्तःकरणमें संचित होकर भावी जन्म-मरणके कारण बन जाते हैं। मनुष्ययोनिमें किये हुए कर्मोंका फल इस जन्ममें तथा मरनेके बाद भी अवश्य भोगना पड़ता है (गीता—अठारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। अतः तादात्म्य, ममता और कामनाके रहते हुए कर्मोंसे सम्बन्ध नहीं छूट सकता।

यह नियम है कि जहाँसे बन्धन होता है, वहाँसे छूटकारा होता है; जैसे—रस्सीकी गाँठ जहाँ लगी है, वहाँसे वह खुलती है। मनुष्ययोनिमें ही जीव शुभाशुभ कर्मोंसे बँधता है; अतः मनुष्ययोनिमें ही वह मुक्त हो सकता है।

पहले श्लोकमें आये ‘ऊर्ध्वमूलम्’ पदका तात्पर्य है—परमात्मा, जो संसारके रचयिता तथा उसके मूल आधार हैं; और यहाँ ‘मूलानि’ पदका तात्पर्य है—तादात्म्य, ममता और कामनारूप मूल, जो संसारमें मनुष्यको बाँधते हैं। साधकको इन (तादात्म्य, ममता और कामनारूप) मूलोंका तो छेदन करना है और ऊर्ध्वमूल परमात्माका आश्रय लेना

१५८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

है, जिसका उल्लेख 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' पदसे इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें हुआ है।

मनुष्यलोकमें कर्मानुसार बाँधनेवाले तादात्म्य, ममता और कामनारूप मूल नीचे और ऊपर सभी लोकों, योनियोंमें व्याप्त हो रहे हैं। पशु-पक्षियोंका भी अपने शरीरसे 'तादात्म्य' रहता है, अपनी सन्तानमें 'ममता' होती है और भूख लगनेपर खानेके लिये अच्छे पदार्थोंकी 'कामना' होती है। ऐसे ही देवताओंमें भी अपने दिव्य शरीरसे 'तादात्म्य', प्राप्त पदार्थोंमें 'ममता' और अप्राप्त भोगोंकी 'कामना' रहती है। इस प्रकार तादात्म्य, ममता और कामनारूप दोष किसी-न-किसी रूपमें ऊँच-नीच सभी योनियोंमें रहते हैं। परन्तु मनुष्ययोनिके सिवाय दूसरी योनियोंमें ये बाँधनेवाले नहीं होते। यद्यपि मनुष्ययोनिके सिवाय देवादि अन्य योनियोंमें भी

विवेक रहता है, पर भोगोंकी अधिकता होने तथा भोग भोगनेके लिये ही उन योनियोंमें जानेके कारण उनमें विवेकका उपयोग नहीं हो पाता। इसलिये उन योनियोंमें उपर्युक्त दोषोंसे 'स्वयं' को (विवेकके द्वारा) अलग देखना सम्भव नहीं है। मनुष्ययोनि ही ऐसी है, जिसमें (विवेकके कारण) मनुष्य ऐसा अनुभव कर सकता है कि मैं (स्वरूपसे) तादात्म्य, ममता और कामनारूप दोषोंसे सर्वथा रहित हूँ।

भोगोंके परिणामपर दूष्टि रखनेकी योग्यता भी मनुष्य-शरीरमें ही है। परिणामपर दूष्टि न रखकर भोग भोगनेवाले मनुष्यको पशु कहना भी मानो पशुयोनिकी निन्दा ही करना है; क्योंकि पशु तो अपने कर्मफल भोगकर मनुष्ययोनिकी तरफ आ रहा है, पर यह मनुष्य तो निषिद्ध भोग भोगकर पशुयोनिकी तरफ ही जा रहा है।

सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें संसारवृक्षका जो वर्णन किया गया है, उसका प्रयोजन क्या हैं—इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।

अश्वत्थमेनं सुविरुढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥

अस्य | = इस संसारवृक्षका (जैसा) | न | = न तो | सुविरुढमूलम् | = दृढ़ मूलोंवाले ---|---|---|---|---|--- रूपम् | = रूप (देखनेमें आता है), | आदिः | = आदि है, | अश्वत्थम् | = संसाररूप अश्वत्थ- वृक्षको तथा | = वैसा | न | = न | दृढेन | = दृढ़ इह | = यहाँ (विचार करनेपर) | अन्तः | = अन्त है | असङ्गशस्त्रेण | = असंगतारूप न, उपलभ्यते | = मिलता नहीं; (क्योंकि इसका) | च | = और | शस्त्रके | द्वारा | | न | = न | छित्त्वा | = काटकर— | | सम्प्रतिष्ठा | = स्थिति ही है। | | | | च | = इसलिये | | | | एनम् | = इस | |

व्याख्या—'न रूपमस्येह तथोपलभ्यते'—इसी अध्यायके पहले श्लोकमें संसारवृक्षके विषयमें कहा गया है कि लोग इसको अव्यय (अविनाशी) कहते हैं; और शास्त्रोंमें भी वर्णन आता है कि सकाम-अनुष्ठान करनेसे लोक-परलोकमें विशाल भोग प्राप्त होते हैं। ऐसी बातें सुनकर मनुष्यलोक तथा स्वर्गलोकमें सुख, रमणीयता और स्थायीपन मालूम देता है। इसी कारण अज्ञानी मनुष्य काम और भोगके परायण होते हैं और 'इससे बढ़कर कोई सुख नहीं है'—ऐसा उनका निश्चय हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बयालीसवाँ और सोलहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। जबतक संसारसे तादात्म्य, ममता और कामनाका सम्बन्ध है, तबतक ऐसा ही प्रतीत होता है। परन्तु भगवान्

कहते हैं कि विवेकवती बुद्धिसे संसारसे अलग होकर अर्थात् संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके देखनेसे उसका जैसा रूप हमने अभी मान रखा है, वैसा उपलब्ध नहीं होता अर्थात् यह नाशवान् और दुःखरूप प्रतीत होता है। 'नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा'—किसी वस्तुके आदि, मध्य और अन्तका ज्ञान दो तरहका होता है—देशकृत और कालकृत। इस संसारका कहोंसे आरम्भ है, कहीं मध्य है और कहीं इसका अन्त होता है?—इस प्रकारसे संसारके 'देशकृत' आदि, मध्य, अन्तका पता नहीं; और कबसे इसका आरम्भ हुआ है, कबतक यह रहेगा और कब इसका अन्त होगा?—इस प्रकारसे संसारके 'कालकृत' आदि, मध्य, अन्तका भी पता नहीं।

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१५९

मनुष्य किसी विशाल प्रदर्शनीमें तरह-तरहकी वस्तुओंको देखकर मुग्ध हुआ घूमता रहे, तो वह उस प्रदर्शनीका आदि-अन्त नहीं जान सकता। उस प्रदर्शनीसे बाहर निकलनेपर ही वह उसके आदि-अन्तको जान सकता है। इसी तरह संसारसे सम्बन्ध मानकर भोगोंकी तरफ वृत्ति रखते हुए इस संसारका आदि-अन्त कभी जाननेमें नहीं आ सकता।

मनुष्यके पास संसारके आदि-अन्तका पता लगानेके लिये जो साधन (इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि) हैं, वे सब संसारके ही अंश हैं। यह नियम है कि कार्य अपने कारणमें विलीन तो हो सकता है, पर उसको जान नहीं सकता। जैसे मिट्टीका घड़ा पृथ्वीको अपने भीतर नहीं ला सकता, ऐसे ही व्यक्ति इन्द्रियों-मन-बुद्धि समष्टि संसार और उसके कार्यको अपनी जानकारीमें नहीं ला सकते। अतः संसारसे (मन, बुद्धि, इन्द्रियोंसे भी) अलग होनेपर ही संसारका स्वरूप ('स्वयं' के द्वारा) ठीक-ठीक जाना जा सकता है।

वास्तवमें संसारकी स्वतन्त्र सत्ता (स्थिति) है ही नहीं। केवल उत्पत्ति और विनाशका क्रममात्र है। संसारका यह उत्पत्ति-विनाशका प्रवाह ही 'स्थिति' रूपसे प्रतीत होता है। वास्तवमें देखा जाय तो उत्पत्ति भी नहीं है, केवल नाश-ही-नाश है। जिसका स्वरूप एक क्षण भी स्थायी न रहता हो, ऐसे संसारकी प्रतिष्ठा (स्थिति) कैसी? संसारसे अपना माना हुआ सम्बन्ध छोड़ते ही उसका अपने लिये अन्त हो जाता है और अपने वास्तविक स्वरूप अथवा परमात्मामें स्थिति हो जाती है।

विशेष बात

इस संसारके आदि, मध्य और अन्तका पता आजतक कोई वैज्ञानिक नहीं लगा सका और न ही लगा सकता है। संसारसे सम्बन्ध रखते हुए अथवा सांसारिक भोगोंको भोगते हुए संसारके आदि, मध्य और अन्तको ढूँढ़ना चाहें, तो कोल्हूके बैलकी तरह उग्रभर घूमते रहनेपर भी कुछ हाथ आनेका नहीं।

वास्तवमें इस संसारके आदि, मध्य और अन्तका पता लगानेकी जरूरत भी नहीं है। जरूरत संसारसे अपने माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करनेकी ही है।

संसार अनादि-सान्त है या अनादि-अनन्त है अथवा

प्रतीतिमात्र है, इत्यादि विषयोंपर दार्शनिकोंमें अनेक मतभेद हैं; परन्तु संसारके साथ हमारा सम्बन्ध असत् है, जिसका विच्छेद करना आवश्यक है—इस विषयपर सभी दार्शनिक एकमत हैं।

संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेका सुगम उपाय है—संसारसे प्राप्त (मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर, धन, सम्पत्ति आदि) सम्पूर्ण सामग्रीको 'अपनी' और 'अपने लिये' न मानते हुए उसको संसारकी ही सेवामें लगा देना।

सांसारिक स्त्री, पुत्र, मान, बड़ाई, धन, सम्पत्ति, आयु, नीरोगता आदि कितने ही प्राप्त हो जायें; यहाँतक कि संसारके समस्त भोग एक ही मनुष्यको मिल जायें, तो भी उनसे मनुष्यको तृप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि जीव स्वयं अविनाशी है और सांसारिक भोग नाशवान् हैं। नाशवान्से अविनाशी कैसे तृप्त हो सकता है?

'अश्वत्थमेन सुविरूढमूलम्' —संसारको 'सुविरूढ-मूलम्' कहनेका तात्पर्य यह है कि तादात्म्य, ममता और कामनाके कारण यह संसार (प्रतिष्ठा रहित होनेपर भी) दृढ़ मूलोंवाला प्रतीत हो रहा है।

व्यक्ति, पदार्थ, क्रिया आदिमें राग, ममता होनेसे सांसारिक बन्धन अधिक-से-अधिक दृढ़ होता चला जाता है। जिन पदार्थों, व्यक्तियोंमें राग, ममताका घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है, उनको मनुष्य अपना स्वरूप ही मानने लग जाता है। जैसे, धनमें ममता होनेसे उसकी प्राप्तिमें मनुष्यको बड़ी प्रसन्नता होती है और 'मैं बड़ा धनवान् हूँ'—ऐसा अभिमान हो जाता है। धनके नाशसे वह अपना नाश मानने लग जाता है। लोभ बढ़नेसे धनकी प्राप्तिके लिये वह अन्याय, पाप आदि न करनेलायक काम भी कर बैठता है। फिर इतना लोभ बढ़ जाता है कि उसके भीतर यह दृढ़ निश्चय हो जाता है कि झूठ, कपट, बेईमानी आदिके बिना धन कमाया ही नहीं जा सकता। उसे यह विचार ही नहीं होता कि 'पापसे धन कमाकर मैं यहाँ कितने दिन ठहरूँगा? पापसे कमाया धन तो शरीरके साथ यहाँ छूट जायगा; किंतु धनके लिये किये झूठ, कपट, बेईमानी, चोरी आदि पाप तो मेरे साथ जायेंगे*', जिससे परलोकमें मेरी कितनी दुर्गति होगी!' आदि। इतना ही नहीं, वह दूसरोंको भी प्रेरणा करने लग जाता है कि 'धन कमानेके

  • धनानि भूमौ पशवश्च गोष्ठे नारी गृहद्वारि सुताः श्मशाने। देहिश्रुततायां परलोकमार्गं धर्मानुगो गच्छति जीव एकः ॥

'शरीरको छोड़ते समय धन तिजोरीमें पड़ा रह जाता है; पशु जहाँ-तहाँ बँधे रह जाते हैं; स्त्री घरके दरवाजेतक ही साथ देती है; पुत्र श्मशानतक साथ देते हैं तथा शरीर चितातक ही साथ रहता है। उसके बाद परलोकके मार्गमें केवल धर्म ही जीवके साथ जाता है।'

१६०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

लिये पाप करनेमें कोई खराबी नहीं; यह तो व्यापार है, इसमें झूठ बोलना, ठगना आदि सब उचित है' इत्यादि। इस दुर्भावका होना ही तादात्म्य, ममता और कामनारूप मूलोंका दृढ़ होना है। इस प्रकारके दूषित भावोंके दृढ़मूल होनेसे मनुष्य वैसा ही बन जाता है (गीता—सत्रहवें अध्यायका तीसरा श्लोक)।

ये तादात्म्य, ममता और कामनारूप मूल अन्तःकरणमें इतनी दृढ़तासे जमे हुए हैं कि पढ़ने, सुनने तथा विचार-विवेचन करनेपर भी सर्वथा नष्ट नहीं होते। साधक प्रायः कहा करते हैं कि सत्संग-चर्चा सुनते समय तो इन दोषोंके त्यागकी बात अच्छी और सुगम लगती है; परन्तु व्यवहारमें आनेपर ऐसा होता नहीं। इनको छोड़ना तो चाहते हैं, पर ये छूटते नहीं। इन दोषोंके न छूटनेमें खास कारण है—सांसारिक सुख लेनेकी इच्छा। साधकसे भूल यह होती है कि वह सांसारिक सुख भी लेना चाहता है और साथ ही दोषोंसे भी बचना चाहता है। जैसे लोभी व्यक्ति विषयुक लड़्डुओंकी मिठासको भी लेना चाहे और साथ ही विषसे भी बचना चाहे! ऐसा कभी सम्भव नहीं है। संसारसे कभी किंचिन्मात्र भी सुखकी आशा न रखनेपर इसका दृढ़मूल स्वतः नष्ट हो जाता है।

दूसरी बात यह है कि 'तादात्म्य, ममता और कामनाका मिटना बहुत कठिन है'—साधककी यह मान्यता ही इन दोषोंको मिटने नहीं देती। वास्तवमें तो ये स्वतः मिट रहे हैं। किसी भी मनुष्यमें ये दोष सदा नहीं रहते; उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं; किंतु अपनी मान्यताके कारण ये स्थायी दीखते हैं। अतः साधकको चाहिये कि वह इन दोषोंके मिटनेको कभी कठिन न माने।

'असंगशस्त्रेण दृढेन छिन्त्वा' —भगवान् कहते हैं कि यद्यपि इस संसारवृक्षके अवान्तर मूल बहुत दृढ़ हैं, फिर भी इनको दृढ़ असंगतारूप शस्त्रके द्वारा काटा जा सकता है। किसी भी स्थान, व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति आदिके प्रति मनमें आकर्षण, सुख-बुद्धिका होना और उनके सम्बन्धसे अपने-आपको बड़ा तथा सुखी मानना; पदार्थोंके प्राप्त होने अथवा संग्रह होनेपर प्रसन्न होना—यही 'संग' कहलाता है। इसका न होना ही असंगता अर्थात् वैराग्य है। वैराग्यके दो प्रकार हैं—(१) साधारण वैराग्य और (२) दृढ़ वैराग्य। दृढ़ वैराग्यको उपरति अथवा 'पर वैराग्य' भी कहते हैं।

वैराग्य-सम्बन्धी विशेष बात

वैराग्यके अनेक रूप हैं, जो इस प्रकार हैं—

पहला वैराग्य धन, मकान, जमीन आदि पदार्थोंसे होता है। इन पदार्थोंका स्वरूपसे त्याग कर देनेपर भी अगर मनमें उनका महत्त्व बना हुआ है और 'मैं त्यागी हूँ'—ऐसा अभिमान है, तो वास्तवमें यह वैराग्य नहीं है। अन्तःकरणमें जड़-पदार्थोंका किंचिन्मात्र भी महत्त्व और आकर्षण न रहे—यही वैराग्य है।

दूसरा वैराग्य अपने कहलानेवाले माता, पिता, स्त्री, पुत्र, भाई, भौजाई आदि-(परिवार-से) होता है। उनकी सेवा करने या उनको सुख पहुँचानेके लिये ही उनसे अपना सम्बन्ध मानना चाहिये। अपने सुखके लिये उनसे किंचिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध न मानना ही बन्धु-बान्धवोंसे वैराग्य है।

तीसरा और वास्तविक वैराग्य अपने शरीरसे होता है। अगर शरीरसे सम्बन्ध बना हुआ है तो सम्पूर्ण संसारसे सम्बन्ध बना हुआ है; क्योंकि शरीर संसारका ही बीज अथवा अंश है। शरीरसे तादात्म्य न रहना ही शरीरसे वैराग्य है।

तादात्म्य (शरीरके साथ मानी हुई एकता अर्थात् अहंता)-का नाश करनेके लिये साधकको पहले मान, प्रतिष्ठा, पूजा, धन आदिकी कामनाका त्याग करना चाहिये। इनकी कामनाका त्याग करनेपर भी (शरीरके) 'नाम' में ममता रहनेके कारण यश, कीर्ति, बड़ाई आदिकी कामना रह जाती है। इसके कारण मरनेके बाद भी अपने नामकी कीर्ति, अपना स्मारक बननेकी चाह आदि सूक्ष्म कामनाएँ रह जाती हैं। इन सब कामनाओंका नाश करना आवश्यक है। कहीं-कहीं साधकके भीतर दूसरोंकी प्रशंसा सुनकर, दूसरोंकी बड़ाई देखकर ईर्ष्याका भाव जाग्रत् हो जाता है। अतः इसका भी नाश करना आवश्यक है।

उपर्युक्त कामनाओंका नाश करनेके बाद शरीरमें ममता रह जाती है। यह ममताका सम्बन्ध मृत्युके बाद भी बना रहता है। इसी कारण मृत शरीरको जला देनेके बाद भी हडिडयोंको गंगाजीमें डालनेसे जीव-(जिसने शरीरमें ममता की है)-की आगे गति होती है। 'विवेक' (जड़-चेतन, प्रकृति-पुरुष अथवा शरीर-शरीरीकी भिन्नताका ज्ञान) जाग्रत् होनेपर ममताका नाश हो जाता है। कामना और ममता—दोनोंका नाश होनेके बाद तादात्म्य (अहंता) नष्टप्राय हो जाता है अर्थात् बहुत सूक्ष्म रह जाता है। तादात्म्यका अत्यन्ताभाव भगवत्प्रेमकी प्राप्ति होनेपर होता है।

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१६१

जब मनुष्य स्वयं यह अनुभव कर लेता है कि 'मैं शरीर नहीं हूँ; शरीर मेरा नहीं है', तब कामना, ममता और तादात्म्य—तीनों मिट जाते हैं। यही वास्तविक वैराग्य है।

जिसके भीतर दृढ़ वैराग्य है उसके अन्तःकरणमें सम्पूर्ण वासनाओंका नाश हो जाता है। अपने स्वरूपसे विजातीय (जड़) पदार्थ—शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे किंचिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध न मानकर—'सबका कल्याण हो, सब सुखी हों, सब नीरोग हों, कभी किसीको किंचिन्मात्र भी दुःख न हो'—इस भावका रहना ही दृढ़ वैराग्यका लक्षण है।

'यह'-(इदम्-) रूपसे जाननेमें आनेवाले स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरसहित सम्पूर्ण संसारको जाननेवाला 'मैं' (अहम्) कहलाता है। 'यह' (जाननेमें आनेवाला दृश्य) और 'मैं' (जाननेवाला द्रष्टा) कभी एक नहीं हो सकते—यह नियम है। इस प्रकार संसार और शरीर नष्ट होनेवाले हैं और मैं (स्वयं) अविनाशी हैं—इस विवेकका आदर करते हुए अपने-आपको संसार और शरीरसे सर्वथा अलग अनुभव करना ही असंग-शस्त्रके द्वारा संसारवृक्षका छेदन करना है। इस विवेकको महत्त्व न देनेके कारण ही संसार दृढ़ मूलोंवाला प्रतीत होता है।

सांसारिक वस्तुओंका अत्यन्ताभाव अर्थात् सर्वथा नाश तो नहीं हो सकता, पर उनमें रागका सर्वथा अभाव हो सकता है। अतः 'छेदन' का तात्पर्य सांसारिक वस्तुओंका नाश करना नहीं, प्रत्युत उनसे अपना राग हटा लेना है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर संसारका अपने लिये सर्वथा अभाव हो जाता है, जिसे 'आत्यन्तिक प्रलय' भी कहते हैं। जो हमारा स्वरूप नहीं है तथा जिसके साथ हमारा वास्तविक सम्बन्ध नहीं है, उसीका त्याग (छेदन) होता है। हम स्वरूपतः चेतन और अविनाशी हैं एवं संसार जड़ और विनाशी है; अतः संसारसे हमारा सम्बन्ध अवास्तविक और भूलसे माना हुआ है। स्वरूपसे हम संसारसे असंग ही हैं। पहलेसे ही जो असंग है, वही असंग होता है—यह नियम है।

परिशिष्ट भाव —भगवान्ने अपने विषयमें कहा है—'अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च' (गीता १०।२०), 'सर्गाणामादिन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन' (गीता १०।३२) और यहाँ संसारके विषयमें कहते हैं—'नान्तो न चादिनं च सम्प्रतिष्ठता।' तात्पर्य है कि भगवान् आदिमें भी हैं, अन्तमें भी हैं और मध्यमें भी हैं; परन्तु संसार न आदिमें है, न अन्तमें है और न मध्यमें ही है; अर्थात् संसार है ही नहीं—'नासतो विद्यते भावः' (गीता २।१६)। अतः एक

अतः संसारसे हमारी असंगता स्वतःसिद्ध है—इस वास्तविकताको दृढ़तासे मान लेना चाहिये। संसार कितना ही सुविरुद्धमूल क्यों न हो, उसके साथ अपना सम्बन्ध न माननेसे वह स्वतः कट जाता है; क्योंकि संसारके साथ अपना सम्बन्ध है नहीं, केवल माना हुआ है। अतः संसारके साथ अपना सम्बन्ध न माननेसे उसका छेदन हो जाता है—इसमें साधकको सन्देह नहीं करना चाहिये; चाहे (आरम्भमें) व्यवहारमें ऐसा दिखायी दे या न दे।

जीवने अपनी भूलसे शरीर-संसारसे सम्बन्ध माना था। इसलिये इसका छेदन करनेकी जिम्मेवारी भी जीवपर ही है। अतः भगवान् इसे ही छेदन करनेके लिये कह रहे हैं।

संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदके कुछ सुगम उपाय

(१) कुछ भी लेनेकी इच्छा न रखकर संसारसे प्राप्त सामग्रीको संसारकी सेवामें ही लगा देना।

(२) सांसारिक सुख-(भोग और संग्रह-) की कामनाका सर्वथा त्याग करना।

(३) संसारके आश्रयका सर्वथा त्याग करना।

(४) शरीर-संसारसे 'मैं' और 'मेरा'-पनको बिलकुल हटा लेना।

(५) मैं भगवान्का हूँ; भगवान् मेरे हैं—इस वास्तविकतापर दृढ़तासे डटे रहना।

(६) मुझे एक परमात्माकी तरफ ही चलना है—ऐसे दृढ़ निश्चय-(व्यवसायात्मिका बुद्धि-) का होना।

(७) शास्त्रविहित अपने-अपने कर्तव्य-कर्मो-(स्वधर्म-) का तत्परतापूर्वक पालन करना१ (गीता १८।४५)।

(८) बचपनमें शरीर, पदार्थ, परिस्थिति, विद्या, सामर्थ्य आदि जैसे थे, वैसे अब नहीं हैं अर्थात् वे सब-के-सब बदल गये, पर मैं 'स्वयं' वही हूँ, बदला नहीं—अपने इस अनुभवको महत्त्व देना।

(९) संसारसे माने हुए सम्बन्धका सदभाव (सत्ताभाव) मिटाना।

१-सर्वं भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्॥

२-धर्मं ते बिरति जोगं ते ग्याना। ग्यान मोच्छप्रदं वेदं बखाना॥ (मानस ३।१६।१)

१६२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

भगवान्के सिवाय कुछ भी नहीं है।

‘असंगशस्त्रेण दृढेन छिन्त्वा’—इन पदोंमें आये ‘छिन्त्वा’ शब्दका अर्थ काटना अथवा नाश (अभाव) करना नहीं है, प्रत्युत सम्बन्ध-विच्छेद करना है। कारण कि यह संसार-वृक्ष भगवान्की अपरा प्रकृति होनेसे अव्यय है। स्वरूप असंग है—‘असंगो ह्ययं पुरुषः’ (बृहदा० ४।३।१५)। स्वरूपमें गुणसंग नहीं है। गुणसंगसे ही जन्म-मरण होता है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनमसु’ (गीता १३।२१)। अतः स्वरूपकी असंगताका, निर्लिप्तताका, अजरता-अमरताका अनुभव करके उसमें स्थित होना ही संसार-वृक्षका छेदन करना है।

संसार रागके कारण ही दीखता है। जिस वस्तुमें राग होता है, उसी वस्तुकी सत्ता और महत्ता दीखती है। अगर राग न रहे तो संसारकी सत्ता दीखते हुए भी महत्ता नहीं रहती। अतः ‘असंगशस्त्रेण दृढेन छिन्त्वा’ पदोंका तात्पर्य है—संसारके रागको सर्वथा मिटा देना अर्थात् अपने अन्तःकरणमें परमात्माके सिवाय अन्य किसीसे सम्बन्ध न मानना, सृष्टिमात्रकी किसी भी वस्तुको अपनी और अपने लिये न मानना। वास्तवमें संसारकी सत्ता बन्धनकारक नहीं है, प्रत्युत उससे रागपूर्वक माना हुआ सम्बन्ध ही बन्धनकारक है। सत्ता बाधक नहीं है, राग बाधक है। इसलिये अन्य दार्शनिक तो संसारको असत्, सत् आदि अनेक प्रकारसे कहते हैं, पर भगवान् संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी बात कहते हैं। सम्बन्ध-विच्छेद करनेसे संसारका संसाररूपसे अभाव हो जाता है और वह भगवद्रूपसे दीखने लगता है—‘वासुदेवः सर्वम्’।

सम्बन्ध—संसारवृक्षका छेदन करनेके बाद साधकको क्या करना चाहिये—इसका विवेचन आगेके श्लोकमें करते हैं।

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्नाता न निवर्तन्ति भूयः ।

तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥

ततः= उसके बादभूयः= फिरप्रसृता= विस्तारको प्राप्त
तत्= उसन, निवर्तन्ति= लौटकर संसारमेंहुई है,
पदम्= परमपद (परमात्मा)-
कीनहीं आतेतम्= उस
परिमार्गितव्यम्= खोज करनी
चाहिये।= औरआद्यम्= आदि
यस्मिन्= जिसकोयतः= जिससेपुरुषम्= पुरुष परमात्माके
गताः= प्राप्त हुए मनुष्यपुराणी= अनादिकालसे चली
आनेवालीएव= ही
प्रवृत्तिः= (यह) सृष्टिप्रपद्ये= मैं शरण
हूँ।

व्याख्या—‘ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्’—भगवान्ने पूर्वश्लोकमें ‘छिन्त्वा’ पदसे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी बात कही है। इससे यह सिद्ध होता है कि परमात्माकी खोज करनेसे पहले संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करना बहुत आवश्यक है। कारण कि परमात्मा तो सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें ज्यों-के-त्यों विद्यमान हैं, केवल संसारसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही नित्यप्राप्त परमात्माके अनुभवमें बाधा लग रही है। संसारसे सम्बन्ध बना रहनेसे परमात्माकी खोज करनेमें ढिलाई आती है और जप, कीर्तन, स्वाध्याय आदि सब कुछ करनेपर भी विशेष लाभ नहीं दीखता। इसलिये साधकको पहले संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेको ही मुख्यता देनी चाहिये।

जीव परमात्माका ही अंश है। संसारसे सम्बन्ध मान लेनेके कारण ही वह अपने अंशी-(परमात्मा-) के नित्य-सम्बन्धको भूल गया है। अतः भूल मिटनेपर ‘मैं भगवान्का ही हूँ’—इस वास्तविकताकी स्मृति प्राप्त हो जाती है। इसी बातपर भगवान् कहते हैं कि उस परमपद-(परमात्मा-) से नित्य-सम्बन्ध पहलेसे ही विद्यमान है।

केवल उसकी खोज करनी है। संसारको अपना माननेसे नित्यप्राप्त परमात्मा अप्राप्त दीखने लग जाता है और अप्राप्त संसार प्राप्त दीखने लग जाता है। इसलिये परमपद-(परमात्मा-) को ‘तत्’ पदसे लक्ष्य करके भगवान् कहते हैं कि जो परमात्मा नित्यप्राप्त है, उसीकी पूरी तरह खोज करनी है। खोज उसीकी होती है, जिसका अस्तित्व पहलेसे ही

श्लोक ४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१६३

होता है। परमात्मा अनादि और सर्वत्र परिपूर्ण हैं। अतः यहाँ खोज करनेका मतलब यह नहीं है कि किसी साधन-विशेषके द्वारा परमात्माको ढूँढ़ना है। जो संसार (शरीर, परिवार, धनादि) कभी अपना था नहीं, है नहीं, होगा नहीं उसका आश्रय न लेकर, जो परमात्मा सदासे ही अपने हैं, अपनेमें हैं और अभी हैं, उनका आश्रय लेना ही उनकी खोज करना है।

साधकको साधन-भजन करना तो बहुत आवश्यक है; क्योंकि इसके समान कोई उत्तम काम नहीं है; किंतु ‘परमात्मतत्त्वको साधन-भजनके द्वारा प्राप्त कर लेंगे’—ऐसा मानना ठीक नहीं; क्योंकि ऐसा माननेसे अभिमान बढ़ता है, जो परमात्मप्राप्तिमें बाधक है। परमात्मा कृपासे मिलते हैं। उनको किसी साधनसे खरीदा नहीं जा सकता। साधनसे केवल असाधन- (संसारसे तादात्म्य, ममता और कामनाका सम्बन्ध अथवा परमात्मासे विमुखता-) का नाश होता है, जो अपने द्वारा ही किया हुआ है। अतः साधनका महत्त्व असाधनको मिटानेमें ही समझना चाहिये। असाधनको मिटानेकी सच्ची लगन हो, तो असाधनको मिटानेका बल भी परमात्माकी कृपासे मिलता है।

साधकोंके अन्तःकरणमें प्रायः एक दृढ़ धारणा बनी हुई है कि जैसे उद्योग करनेसे संसारके पदार्थ प्राप्त होते हैं, ऐसे ही साधन करते-करते (अन्तःकरण शुद्ध होनेपर) ही परमात्माकी प्राप्ति होती है। परन्तु वास्तवमें यह बात नहीं है; क्योंकि परमात्मप्राप्ति किसी भी कर्म (साधन, तपस्यादि)-का फल नहीं है, चाहे वह कर्म कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो। कारण कि श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ कर्मका भी आरम्भ और अन्त होता है; अतः उस कर्मका फल नित्य कैसे होगा? कर्मका फल भी आदि और अन्तवाला होता है। इसलिए नित्य परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति किसी कर्मसे नहीं होती। वास्तवमें त्याग, तपस्या आदिसे जड़ता-(संसार और शरीर-) से सम्बन्ध-विच्छेद ही होता है, जो भूलसे माना हुआ है। सम्बन्ध-विच्छेद होते ही जो तत्त्व सर्वत्र है, सदा है, नित्यप्राप्त है, उसकी अनुभूति हो जाती है—उसकी स्मृति जाग्रत् हो जाती है।

अर्जुन भी पूरा उपदेश सुननेके बाद अन्तमें कहते हैं—‘स्मृतिर्लब्धा’ (१८।७३) ‘मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है।’ यद्यपि विस्मृति भी अनादि है, तथापि वह अन्त होनेवाली है। संसारकी स्मृति और परमात्माकी स्मृतिमें बहुत अन्तर है। संसारकी स्मृतिके बाद विस्मृतिका होना सम्भव है;

जैसे—पक्षाघात (लकवा) होनेपर पढ़ी हुई विद्याकी विस्मृति होना सम्भव है। इसके विपरीत परमात्माकी स्मृति एक बार हो जानेपर फिर कभी विस्मृति नहीं होती (गीता—दूसरे अध्यायका बहतर्वा और चौथे अध्यायका पैतौसर्वा श्लोक); जैसे—पक्षाघात होनेपर अपनी सत्ता (‘मैं हूँ’)-की विस्मृति नहीं होती। कारण यह है कि संसारके साथ कभी सम्बन्ध होता नहीं और परमात्मासे कभी सम्बन्ध छूटता नहीं।

शरीर, संसारसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है—इस तत्त्वका अनुभव करना ही संसारवृक्षका छेदन करना है और मैं परमात्माका अंश हूँ—इस वास्तविकतामें हरदम स्थित रहना ही परमात्माकी खोज करना है। वास्तवमें संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होते ही नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वकी अनुभूति हो जाती है।

‘यस्मिन्नाता न निवर्तन्ति भूयः’—जिसे पहले श्लोकमें ‘ऊर्ध्वमूलम्’ पदसे तथा इस श्लोकमें ‘आद्यं पुरुषम्’ पदोंसे कहा गया है; और आगे छठे श्लोकमें जिसका विस्तारसे वर्णन हुआ है, उसी परमात्मतत्त्वका निर्देश यहाँ ‘यस्मिन्’ पदसे किया गया है।

जैसे जलकी बूँद समुद्रमें मिल जानेके बाद पुनः समुद्रसे अलग नहीं हो सकती, ऐसे ही परमात्माका अंश (जीवात्मा) परमात्माको प्राप्त हो जानेके बाद फिर परमात्मासे अलग नहीं हो सकता अर्थात् पुनः लौटकर संसारमें नहीं आ सकता। ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण प्रकृति अथवा उसके कार्य गुणोंका संग ही है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। अतः जब साधक असंगशस्त्रके द्वारा गुणोंके संगका सर्वथा छेदन (असत्के सम्बन्धका सर्वथा त्याग) कर देता है, तब उसका पुनः कहीं जन्म लेनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता।

‘यतः प्रवृत्तिः प्रमुता पुराणी’—सम्पूर्ण सृष्टिके रचयिता एक परमात्मा ही हैं। वे ही इस संसारके आश्रय और प्रकाशक हैं। मनुष्य भ्रमवश सांसारिक पदार्थोंमें सुखोंको देखकर संसारकी तरफ आकर्षित हो जाता है और संसारके रचयिता-(परमात्मा-)को भूल जाता है। परमात्माका रचा हुआ संसार भी जब इतना प्रिय लगता है, तब (संसारके रचयिता) परमात्मा कितने प्रिय लगने चाहिये! यद्यपि रची हुई वस्तुमें आकर्षणका होना एक प्रकारसे रचयिताका ही आकर्षण है (गीता—दसवें अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक), तथापि मनुष्य अज्ञानवश

९६४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

उस आकर्षणमें परमात्माको कारण न मानकर संसारको ही कारण मान लेता है और उसीमें फँस जाता है।

प्राणिमात्रका यह स्वभाव है कि वह उसीका आश्रय लेना चाहता है और उसीकी प्राप्तिमें जीवन लगा देना चाहता है, जिसको वह सबसे बढ़कर मानता है अथवा जिससे उसे कुछ प्राप्त होनेकी आशा रहती है। जैसे संसारमें लोग रुपयोंको प्राप्त करनेमें और उनका संग्रह करनेमें बड़ी तत्परतासे लगते हैं, क्योंकि उनको रुपयोंसे सम्पूर्ण मनचाही वस्तुओंके मिलनेकी आशा रहती है। वे सोचते हैं—‘शरीरके निर्वाहकी वस्तुएँ तो रुपयोंसे मिलती ही हैं, अनेक तरहके भोग, ऐश-आरामके साधन भी रुपयोंसे प्राप्त होते हैं। इसलिये रुपये मिलनेपर मैं सुखी हो जाऊँगा तथा लोग मुझे धनी मानकर मेरा बहुत मान-आदर करेंगे।’ इस प्रकार रुपयोंको सर्वोपरि मान लेनेपर वे लोभके कारण अन्याय, पापकी भी परवाह नहीं करते। यहाँतक कि वे शरीरके आरामकी भी उपेक्षा करके रुपये कमाने तथा संग्रह करनेमें ही तत्पर रहते हैं। उनकी दृष्टिमें रुपयोंसे बढ़कर कुछ नहीं रहता। इसी प्रकार जब साधकको यह ज्ञात हो जाता है कि परमात्मासे बढ़कर कुछ भी नहीं है और उनकी प्राप्तिमें ऐसा आनन्द है, जहाँ संसारके सब सुख फीके पड़ जाते हैं (गीता—छठे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक), तब वह परमात्माको ही प्राप्त करनेके लिये तत्परतासे लग जाता है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।

‘तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये’—जिसका कोई आदि नहीं है; किन्तु जो सबका आदि है (गीता—दसवें अध्यायका दूसरा श्लोक), उस आदिपुरुष परमात्माका ही आश्रय (सहारा) लेना चाहिये। परमात्माके सिवाय अन्य कोई भी आश्रय टिकनेवाला नहीं है। अन्यका आश्रय वास्तवमें आश्रय ही नहीं है, प्रत्युत वह आश्रय लेनेवालेका ही नाश (पतन) करनेवाला है; जैसे—समुद्रमें डूबते हुए व्यक्तिके लिये मगरमच्छका आश्रय! इस मृत्यु-संसार-सागरके सभी आश्रय मगरमच्छके आश्रयकी तरह ही हैं। अतः मनुष्यको विनाशी संसारका आश्रय न लेकर अविनाशी परमात्माका ही आश्रय लेना चाहिये।

जब साधक अपना पूरा बल लगानेपर भी दोषोंको दूर

करनेमें सफल नहीं होता, तब वह अपने बलसे स्वतः निराश हो जाता है। ठीक ऐसे समयपर यदि वह (अपने बलसे सर्वथा निराश होकर) एकमात्र भगवान्का आश्रय ले लेता है, तो भगवान्की कृपाशक्तिसे उसके दोष निश्चितरूपसे नष्ट हो जाते हैं और भगवत्प्राप्ति हो जाती है*। इसलिये साधकको भगवत्प्राप्तिसे कभी निराश नहीं होना चाहिये। भगवान्की शरण लेकर निर्भय और निश्चिन्त हो जाना चाहिये। भगवान्के शरण होनेपर उनकी कृपासे विघ्नोंका नाश और भगवत्प्राप्ति—दोनोंकी सिद्धि हो जाती है (गीता—अठारहवें अध्यायका अठ्ठावनवाँ और बासठवाँ श्लोक)।

साधकको जैसे संसारके संगका त्याग करना है, ऐसे ही ‘असंगता’ के संगका भी त्याग करना है। कारण कि असंग होनेके बाद भी साधकमें ‘मैं असंग हूँ’—ऐसा सूक्ष्म अहंभाव (परिच्छिन्ना) रह सकता है, जो परमात्माके शरण होनेपर ही सुगमतापूर्वक मिट सकता है। परमात्माके शरण होनेका तात्पर्य है—अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहम् (मैं-पन), धन, परिवार, मकान आदि सब-के-सब पदार्थोंको परमात्माके अर्पण कर देना अर्थात् उन पदार्थोंसे अपनापन सर्वथा हटा लेना!

शरणागत भक्तमें दो भाव रहते हैं—‘मैं भगवान्का हूँ’ और ‘भगवान् मेरे हैं।’ इन दोनोंमें भी ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान्के लिये हूँ’—यह भाव ज्यादा उत्तम है। कारण कि ‘भगवान् मेरे हैं और मेरे लिये हैं’—इस भावमें अपने लिये भगवान्से कुछ चाह रहती है; अतः साधक भगवान्से अपनी मनचाही कराना चाहेगा। परन्तु ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान्के लिये हूँ’—इस भावमें केवल भगवान्की मनचाही होगी। इस प्रकार साधकमें अपने लिये कुछ भी करने और पानेका भाव न रहना ही वास्तवमें अनन्य शरणागति है। इस अनन्य शरणागतिसे उसका भगवान्के प्रति वह अनिवर्चनीय और अलौकिक प्रेम जाग्रत् हो जाता है जो क्षति, पूर्ति और निवृत्तिसे रहित है, जिसमें अपने प्रियके मिलनेपर भी तृप्ति नहीं होती और वियोगमें भी अभाव नहीं होता; जो प्रतिक्रियन बढ़ता रहता है; जिसमें असीम-अपार आनन्द है, जिससे आनन्ददाता भगवान्को भी आनन्द मिलता है। तत्त्वज्ञान होनेके बाद जो प्रेम प्राप्त होता है, वही प्रेम अनन्य शरणागतिसे भी प्राप्त हो जाता है।

  • जब लिंग गज बल अपने बरत्यो, नेक सरयो नहिं काम॥

निरबल है बलराम पुकार्यो आये आधे नाम।

सुने री मैंने निरबल के बल राम॥

श्लोक ४ ]

  • साधक-संजीवनी *

९६५

'एव' पदका तात्पर्य है कि दूसरे सब आश्रयोंका त्याग

करके एकमात्र भगवान्का ही आश्रय ले। यही भाव गीतामें

'मामेव ये प्रपद्यन्ते' (७। १४), 'तमेव शरणं गच्छ'

(१८। ६२) और 'मामेकं शरणं व्रज' (१८। ६६)

पदोंमें भी आया है।

'प्रपद्ये' कहनेका अर्थ है - 'मैं शरण हूँ।' यहाँ शंका

हो सकती है कि भगवान् कैसे कहते हैं कि 'मैं शरण हूँ'?

क्या भगवान् भी किसीके शरण होते हैं? यदि शरण होते

हैं तो किसके शरण होते हैं? इसका समाधान यह है कि

भगवान् किसीके शरण नहीं होते; क्योंकि वे सर्वोपरि हैं।

केवल लोकशिक्षाके लिये भगवान् साधककी भाषामें

बोलकर साधकको यह बताते हैं कि वह 'मैं शरण हूँ'

ऐसी भावना करे।

'परमात्मा है' और 'मैं (स्वयं) हूँ' - इन दोनोंमें 'है'

के रूपमें एक ही परमात्मसत्ता विद्यमान है। 'मैं' के साथ

होनेसे ही 'है' का 'हूँ' में परिवर्तन हुआ है। यदि 'मैं'-

रूप एकदेशीय स्थितिको सर्वदेशीय 'है' में विलीन कर

दें, तो 'है' ही रह जायगा, 'हूँ' नहीं रहेगा। जबतक

'स्वयं' के साथ बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ, शरीर आदिका सम्बन्ध

मानते हुए 'हूँ' बना हुआ है, तबतक व्यभिचार-दोष होनेके

कारण अनन्य शरणागति नहीं है।

परमात्माका अंश होनेके कारण जीव वास्तवमें सदा

परमात्माके ही आश्रित रहता है; परन्तु परमात्मासे विमुख

होनेके बाद (आश्रय लेनेका स्वभाव न छूटनेके कारण)

वह भूलसे नाशवान् संसारका आश्रय लेने लगता है, जो

कभी टिकता नहीं। अतः वह दुःख पाता रहता है। इसलिये

साधकको चाहिये कि वह परमात्मासे अपने वास्तविक

सम्बन्धको पहचानकर एकमात्र परमात्माके शरण हो जाय।

परिशिष्ट भाव - संसार नित्यनिवृत्त है, इसलिये उसका त्याग होता है - 'असंगशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा' और

परमात्मा नित्यप्राप्त हैं, इसलिये उनकी खोज होती है - 'ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्'। निर्माण और खोज - दोनोंमें

बहुत अन्तर है। निर्माण उस वस्तुका होता है, जिसका पहलेसे अभाव होता है और खोज उस वस्तुकी होती है, जो

पहलेसे ही विद्यमान होती है। परमात्मा नित्यप्राप्त और स्वतःसिद्ध हैं, इसलिये उनकी खोज होती है, निर्माण नहीं

होता। जब साधक परमात्माकी सत्ताको स्वीकार करता है, तब खोज होती है। खोज करनेके दो प्रकार हैं - एक

तो कण्ठी कहीं रखकर भूल जायँ तो हम जगह-जगह उसकी खोज करते हैं और दूसरा, कण्ठी गलेमें ही हो, पर

वहम हो जाय कि कण्ठी खो गयी तो हम जगह-जगह उसकी खोज करते हैं। परमात्माकी खोज गलेमें पड़ी कण्ठीकी

खोजके समान है। वास्तवमें परमात्मा खोया नहीं है। संसारमें अपने रागके कारण परमात्माकी तरफ दृष्टि नहीं जाती।

उधर दृष्टि न जाना ही उसका खोना है। तात्पर्य है कि जिस परमात्माको हम चाहते हैं और जिसकी हम खोज करते

हैं, वह परमात्मा नित्य-निरन्तर अपनेमें ही मौजूद है! परन्तु संसार अपनेमें नहीं है। जो अपनेमें है, उसकी खोज

करनेसे परिणाममें वह मिल जाता है। परन्तु जो अपनेमें नहीं है, उसकी खोज करनेसे परिणाममें वह मिलता नहीं;

क्योंकि वास्तवमें उसकी सत्ता ही नहीं है।

परमात्मा कभी अप्राप्त हुए ही नहीं, अप्राप्त हैं ही नहीं, अप्राप्त होना सम्भव ही नहीं। उनकी अप्राप्ति नहीं हुई है,

प्रत्युत विस्मृति हुई है। यह विस्मृति अनादि और सान्त (अन्त होनेवाली) है। जैसे दो व्यक्ति आपसमें एक-दूसरेको पहचानते

नहीं तो यह अपरिचय कबसे है - इसको कोई बता नहीं सकता। हम संस्कृत भाषाको नहीं जानते तो यह अनजानपना कबसे

है - इसको हम बता नहीं सकते। तात्पर्य है कि व्यक्तियोंकी सत्ता, हमारी सत्ता, संस्कृत भाषाकी सत्ता तो पहलेसे ही है,

पर उनका परिचय पहलेसे नहीं है। ऐसे ही विस्मृतिके समय भी परमात्माकी सत्ता ज्यों-की-त्यों है। परमात्मा तो नित्यप्राप्त

हैं, पर उनकी विस्मृति है अर्थात् उधर दृष्टि नहीं है, उनसे विमुखता है, उनसे अपरिचय है, उनकी अप्राप्तिका वहम है!

परमात्माकी खोज करनेपर यह विस्मृति मिट जाती है और उनकी प्राप्ति हो जाती है। परमात्माकी खोज करनेका उपाय

है - जो मौजूद नहीं है, उसको छोड़ते जाना - 'असंगशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।' छोड़नेका तात्पर्य है - उसकी सत्ता और महत्ता

न मानकर उससे सम्बन्ध न जोड़ना, उसको अस्वीकार करना। अतः संसारके त्यागमें ही परमात्माकी खोज निहित है।

श्रीमद्भागवतमें आया है - 'अतस्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्तः' (१०। १४। २८)।

'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' - संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर भावरूप स्वरूपमें स्थिति हो जाती है और साधक

मुक्त हो जाता है। मुक्त होनेपर संसारकी कामना तो मिट जाती है, पर प्रेमकी भूख नहीं मिटती। ब्रह्मसूत्रमें आया है -

'मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्' (१। ३। २)। 'उस प्रेमस्वरूप भगवान्को मुक्त पुरुषोंके लिये भी प्राप्तव्य बताया गया है।'

तात्पर्य है कि स्वरूप जिसका अंश है, उस अंशी (परमात्मा)-के प्रेमकी प्राप्तिमें ही मानव-जीवनकी पूर्णता है। स्वरूपमें

१६६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

निजानन्द (अखण्ड आनन्द) है और अंशोंमें परमानन्द (अनन्त आनन्द) है। जो मुक्तिकमें नहीं अटकता, उसमें सन्तोष नहीं करता, उसको प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी प्राप्ति होती है—‘मद्वृत्तिं लभते पराम् ’ (गीता १८।५४)। इसीलिये भगवान्ने संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करने अर्थात् मुक्त होनेके बाद परमात्माकी खोज करके उनकी शरण ग्रहण करनेकी बात कही है।

सम्बन्ध—जो महापुरुष आदिपुरुष परमात्माके शरण होकर परमपदको प्राप्त होते हैं, उनके लक्षणोंका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।

द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्जैर्गच्छन्त्यमूहाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥

निर्मानमोहाः = जो मान और मोहसे रहित हो गये हैं,विनिवृत्तकामाः = जो (अपनी दृष्टिसे) सम्पूर्ण कामनाओंसे रहित हो गये हैं,अमूहाः = (ऊँची स्थितिवाले) मोहरहित साधक
जितसङ्गदोषाः = जिन्होंने आसक्तिसे होनेवाले दोषोंको जीत लिया है,सुखदुःखसञ्जैः = जो सुख-दुःख नामवालेभक्त
अध्यात्मनित्याः = जो नित्य- निरन्तर परमात्मामें ही लगे हुए हैं,द्वन्द्वैः = द्वन्द्वोंसेतत् = उस
विमुक्ताः = मुक्त हो गये हैं, (ऐसे)अव्ययम् = अविनाशी
पदम् = परमपद (परमात्मा)- को
गच्छन्ति = प्राप्त होते हैं।

व्याख्या—‘निर्मानमोहाः’ —शरीरमें मैं-मेरापन होनेसे ही मान, आदर-सत्कारकी इच्छा होती है। शरीरसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही मनुष्य शरीरके मान-आदरको भूलसे स्वयंका मान-आदर मान लेता है और फँस जाता है। जिन भक्तोंका केवल भगवान्में ही अपनापन होता है, उनका शरीरमें मैं-मेरापन नहीं रहता; अतः वे शरीरके मान-आदरसे प्रसन्न नहीं होते। एकमात्र भगवान्के शरण होनेपर उनका शरीरसे मोह नहीं रहता, फिर मान-आदरकी इच्छा उनमें हो ही कैसे सकती है?

केवल भगवान्का ही उद्देश्य, ध्येय होनेसे और केवल भगवान्के ही शरण, परायण रहनेसे वे भक्त संसारसे विमुख हो जाते हैं। अतः उनमें संसारका मोह नहीं रहता।

‘जितसंगदोषाः’ —‘भगवान्में आकर्षण होना ‘प्रेम’ और संसारमें आकर्षण होना ‘आसक्ति’ कहलाती है। ममता, स्मृहा, वासना, आशा आदि दोष आसक्तिके कारण ही होते हैं। केवल भगवान्के ही परायण होनेके कारण भक्तोंकी सांसारिक भोगोंमें आसक्ति नहीं रहती। आसक्ति न रहनेके कारण भक्त आसक्तिसे होनेवाले ममता आदि

दोषोंको जीत लेते हैं।

आसक्ति प्राप्त और अप्राप्त—दोनोंकी होती है; किन्तु कामना अप्राप्तकी ही होती है। इसलिये इस श्लोकमें ‘विनिवृत्तकामाः ’ पद अलगसे आया है।

‘अध्यात्मनित्याः’ —केवल भगवान्के ही शरण रहनेसे भक्तोंकी अहंता बदल जाती है। मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं, मैं संसारका नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है—इस प्रकार अहंता बदलनेसे उनकी स्थिति निरन्तर भगवान्में ही रहती है*। कारण कि मनुष्यकी जैसी अहंता होती है, उसकी स्थिति वहाँ ही होती है। जैसे मनुष्य जन्मके अनुसार अपनेको ब्राह्मण मानता है, तो उसकी ब्राह्मणपनकी मान्यता नित्य-निरन्तर रहती है अर्थात् वह नित्य-निरन्तर ब्राह्मणपनमें स्थित रहता है, चाहे याद करे या न करे। ऐसे ही जो भक्त अपना सम्बन्ध केवल भगवान्के साथ ही मानते हैं, वे नित्य-निरन्तर भगवान्में ही स्थित रहते हैं।

‘विनिवृत्तकामाः’ —संसारका ध्येय, लक्ष्य रहनेसे ही संसारकी वस्तु, परिस्थिति आदिकी कामना होती है अर्थात् ‘अमुक वस्तु, व्यक्ति आदि मुझे मिल जाय’—इस तरह

  • यद्यपि मात्र प्राणियोंकी स्थिति निरन्तर उसी सर्वव्यापक, सर्वप्रकाशक, सर्वेश्वर भगवान्में ही रहती है, तथापि वे भूलसे अपनी स्थिति भगवान्में न मानकर संसारमें मान लेते हैं; जैसे—मैं अमुक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय, नाम, जाति आदिका हूँ। अपनी इस विपरीत मान्यताके कारण ही वे बँध जाते हैं और बार-बार जन्मते-मरते हैं।

श्लोक ५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१६७

अप्राप्तकी कामना होती है। परन्तु जिन भक्तोंका सांसारिक वस्तु आदिको प्राप्त करनेका उद्देश्य है ही नहीं, वे कामनाओंसे सर्वथा रहित हो जाते हैं।

शरीरमें ममता होनेसे कामना पैदा हो जाती है कि मेरा शरीर स्वस्थ रहे, बीमार न हो जाय; शरीर हृष्टपुष्ट रहे, कमजोर न हो जाय। इसीसे सांसारिक धन, पदार्थ, मकान आदिकी अनेक कामनाएँ पैदा होती हैं। शरीर आदिमें ममता न रहनेसे भक्तोंकी कामनाएँ मिट जाती हैं।

भक्तोंका यह अनुभव होता है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहम् (मैं-पन)—ये सभी भगवान्के ही हैं। भगवान्के सिवाय उनका अपना कुछ होता ही नहीं। ऐसे भक्तोंकी सम्पूर्ण कामनाएँ विशेष और निःशेषरूपसे नष्ट हो जाती हैं। इसलिये उन्हें यहाँ ‘विनिवृत्तकामाः’ कहा गया है।

विशेष बात

वास्तवमें शरीर आदिका वियोग तो प्रतिक्षण हो ही रहा है। साधकको प्रतिक्षण होनेवाले इस वियोगको स्वीकारमात्र करना है। इन वियुक्त होनेवाले पदार्थोंसे संयोग माननेसे ही कामनाएँ पैदा होती हैं। जन्मसे लेकर आजतक निरन्तर हमारी प्राणशक्ति नष्ट हो रही है और शरीरसे प्रतिक्षण वियोग हो रहा है। जब एक दिन शरीर मर जायगा, तब लोग कहेंगे कि आज यह मर गया। वास्तवमें देखा जाय तो शरीर आज नहीं मरा है, प्रत्युत प्रतिक्षण मरनेवाले शरीरका मरना आज समाप्त हुआ है! अतः कामनाओंसे निवृत्त होनेके लिये साधकको चाहिये कि वह प्रतिक्षण वियुक्त होनेवाले शरीरादि पदार्थोंको स्थिर मानकर उनसे कभी अपना सम्बन्ध न माने।

वास्तवमें कामनाओंकी पूर्ति कभी होती ही नहीं। जबतक एक कामना पूरी होती हुई दीखती है, तबतक दूसरी अनेक कामनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। उन कामनाओंमेंसे जब किसी एक कामनाकी पूर्ति होनेपर मनुष्यको सुख प्रतीत होता है, तब वह दूसरी कामनाओंकी पूर्तिके लिये चेष्टा करने लग जाता है। परन्तु यह नियम है कि चाहे कितने ही भोग-पदार्थ मिल जायँ, पर कामनाओंकी पूर्ति कभी हो ही नहीं सकती। कामनाओंकी पूर्तिके सुखभोगसे नयी-नयी कामनाएँ पैदा होती रहती हैं—‘जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई’। संसारके सम्पूर्ण व्यक्ति, पदार्थ एक साथ मिलकर एक व्यक्तिकी भी कामनाओंकी पूर्ति नहीं कर सकते, फिर सीमित पदार्थोंकी

कामना करके सुखकी आशा रखना महान् भूल ही है। कामनाओंके रहते हुए कभी शान्ति नहीं मिल सकती—‘स शान्तिमाप्नोति न कामकामी’ (गीता २।७०)। अतः कामनाओंकी निवृत्ति ही परम-शान्तिका उपाय है। इसलिये कामनाओंकी निवृत्ति ही करनी चाहिये, न कि पूर्तिकी चेष्टा।

सांसारिक भोग-पदार्थोंके मिलनेसे सुख होता है—यह मान्यता कर लेनेसे ही कामना पैदा होती है। यह कामना जितनी तेज होगी, उस पदार्थके मिलनेमें उतना ही सुख होगा। वास्तवमें कामनाकी पूर्तिसे सुख नहीं होता। जब मनुष्य किसी पदार्थके अभावका दुःख मानकर कामना करके उस पदार्थका मनसे सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब उस पदार्थके मिलनेपर अर्थात् उस पदार्थका मनसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर (अभावकी मान्यताका दुःख मिट जानेपर) सुख प्रतीत होता है। यदि वह पहलेसे ही कामना न करे तो पदार्थके मिलनेपर सुख और न मिलनेपर दुःख होगा ही नहीं।

मूलमें कामनाकी सत्ता है ही नहीं क्योंकि जब काम्यपदार्थकी ही स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, तब उसकी कामना कैसे रह सकती है? इसलिये सभी साधक निष्काम होनेमें समर्थ हैं।

‘द्रन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसज्ज्ञैः’—वे भक्त सुख-दुःख, हर्ष-शोक, राग-द्वेष आदि द्रन्द्वोंसे रहित हो जाते हैं। कारण कि उनके सामने अनुकूल-प्रतिकूल जो भी परिस्थिति आती है, उसको वे भगवान्का ही दिया हुआ प्रसाद मानते हैं। उनकी दृष्टि केवल भगवत्कृपापर ही रहती है, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिपर नहीं। अतः ‘जो कुछ होता है, वह हमारे प्यारे प्रभुका ही मंगलमय विधान है’—ऐसा भाव होनेसे उनके द्रन्द्व सुगमतापूर्वक मिट जाते हैं।

भगवान् सबके सुहृद् हैं—‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ (गीता ५।२९)। उनके द्वारा अपने अंश-(जीवात्मा-) का कभी अहित हो ही नहीं सकता। उनके मंगलमय विधानसे जो भी परिस्थिति हमारे सामने आती है, वह हमारे परमहितके लिये ही होती है। इसलिये भक्त भगवान्के विधानमें परम प्रसन्न रहते हैं। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिको अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिका ज्ञान होनेपर भी ‘ऐसी परिस्थिति क्यों आ गयी? ऐसी परिस्थिति आती रहे’ आदि विकार, द्रन्द्व उनमें नहीं होते।

१६८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

विशेष बात

द्रन्द् (राग-द्वेषादि) ही विषमता है, जिनसे सब प्रकारके पाप पैदा होते हैं। अतः विषमताका त्याग करनेके लिये साधकको नाशवान् पदार्थोंके माने हुए महत्त्वको अन्तःकरणसे निकाल देना चाहिये। द्रन्द्को दो भेद हैं—

(१) स्थूल (व्यावहारिक) द्रन्द्—सुख-दुःख, अनुकूलता-प्रतिकूलता आदि स्थूल द्रन्द् हैं। प्राणी सुख, अनुकूलता आदिकी इच्छा तो करते हैं, पर दुःख, प्रतिकूलता आदिकी इच्छा नहीं करते। यह स्थूल द्रन्द् मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष आदि सभीमें देखनेमें आता है।

(२) सूक्ष्म (आध्यात्मिक) द्रन्द्—यद्यपि अपनी उपासना और उपास्यको सर्वश्रेष्ठ मानकर उसको आदर (महत्त्व) देना आवश्यक एवं लाभप्रद है, तथापि दूसरोंकी उपासना और उपास्यको नीचा बताकर उसका खण्डन, निन्दा आदि करना 'सूक्ष्म द्रन्द्' है जो साधकके लिये हानिकारक है।

वास्तवमें सभी उपासनाओंका एकमात्र उद्देश्य संसार-(जडता- ) से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करना है। साधकोंकी रुचि, श्रद्धा-विश्वास और योग्यताके अनुसार उपासनाओंमें भिन्नता होती है, जिसका होना उचित भी है। अतः साधकको उपासनाओंकी भिन्नतापर दृष्टि न रखकर 'उद्देश्य'की अभिन्नतापर ही दृष्टि रखनी चाहिये। दूसरोंकी उपासनाको न देखकर अपनी उपासनामें तत्परतापूर्वक लगे रहनेसे उपासना-सम्बन्धी 'सूक्ष्म द्रन्द्' स्वतः मिट जाता है।

गीतामें 'स्थूल द्रन्द्' को 'मोहकलिलम्' (२।५२) और 'सूक्ष्म द्रन्द्' को 'श्रुतिविवप्रतिपन्ना'* (२।५३) पदोंसे कहा गया है। साधकके अन्तःकरणमें जबतक संसार-(जडता- ) का सम्बन्ध या महत्त्व रहता है, तभीतक ये द्रन्द् रहते हैं। 'स्थूल द्रन्द्' संसारको विशेषरूपसे सत्ता और महत्ता देता है। अतः 'स्थूल द्रन्द्' को मिटाना बहुत जरूरी है।

जबतक मूढ़ता रहती है, तभीतक द्रन्द् रहते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो अपनेमें द्रन्द् मानना ही मूढ़ता है। राग-द्वेष, सुख-दुःख, हर्ष-शोक आदि द्रन्द् अन्तःकरणमें होते हैं, स्वयं-(अपने स्वरूप- ) में नहीं। अन्तःकरण जड है और 'स्वयं' चेतन एवं जडका प्रकाशक है। अतः

अन्तःकरणसे 'स्वयं' का सम्बन्ध है ही नहीं। केवल मान्यतासे ही यह सम्बन्ध प्रतीत होता है।

यह सभीका अनुभव है कि सुख-दुःखादि द्रन्द्ोंके आनेपर हम तो वही रहते हैं। ऐसा नहीं होता कि सुख आनेपर हम और होते हैं तथा दुःख आनेपर और। परन्तु मूढ़तावश इन सुख-दुःखादिसे मिलकर सुखी और दुःखी होने लगते हैं। यदि हम इन आने-जानेवालोंसे न मिलकर अपने स्वरूपमें स्थित (स्वस्थ) रहें, तो सुख-दुःखादि द्रन्द्ोंसे स्वतः रहित हो जायेंगे। इसलिये साधकको बदलनेवाली अर्थात् आने-जानेवाली अवस्थाओं-(सुख-दुःख, हर्ष-शोकादि-) पर दृष्टि न रखकर कभी न बदलनेवाले अपने स्वरूपपर ही दृष्टि रखनी चाहिये, जो सब अवस्थाओंसे अतीत है।

गीतामें भगवान्ने राग-द्वेष आदि द्रन्द्ोंसे मुक्त होनेका बड़ा सुगम उपाय बताया है कि अनुकूलता-प्रतिकूलतामें राग-द्वेष छिपे हुए हैं। उनसे बचनेके लिये साधकको केवल इतनी सावधानी रखनी है कि वह इनके वशमें न हो (गीता—तीसरे अध्यायका चौंतीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि राग-द्वेष दीखनेपर भी साधक इनके वशीभूत होकर तदनुसार क्रिया न करे; क्योंकि क्रिया करनेसे ही ये पुष्ट होते हैं।

'गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्'—आने-जानेवाले पदार्थोंको प्राप्त करनेकी इच्छा या चेष्टा करना तथा उनसे सुखी-दुःखी होना 'मूढ़ता' है। वास्तवमें संसार निरन्तर परिवर्तनशील है और परमात्मा नित्य रहनेवाला है। परमात्माकी सत्तासे ही संसारकी सत्ता दीखती है। परन्तु अविनाशी परमात्मा और विनाशी संसारकी सत्ताको मिलाकर 'संसार है' ऐसा मान लेना 'मूढ़ता' है।

जिस प्रकार मूढ़ (अज्ञानी) मनुष्योंको 'संसार है' ऐसा स्पष्ट दिखायी देता है, उसी प्रकार अमूढ़ (मोहरहित) भक्तोंको 'परमात्मा है' ऐसा स्पष्ट अनुभव होता है। संसार जैसा दिखायी देता है, वैसा ही है—इस प्रकार संसारको स्थायी मान लेना 'मूढ़ता' (मोह) है। जिनकी यह मूढ़ता चली गयी, उन भक्तोंको यहाँ 'अमूढ़ाः' कहा गया है। मूढ़ता चले जानेके बाद सुख-दुःखका असर नहीं पड़ता। जिसपर सुख-दुःख आदि द्रन्द्ोंका असर नहीं पड़ता, वह

  • 'श्रुतिविवप्रतिपन्ना' का अर्थ है—शास्त्रोंमें ज्ञान, कर्म और भक्ति; द्वैत, अद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत आदि सिद्धान्त; विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, शक्ति, गणेश आदि उपास्यदेव; सकाम और निष्कामभाव इत्यादि भिन्न-भिन्न विचारोंको देखकर किसी एक विचारपर अपना निश्चय या निर्णय नहीं कर सकना अर्थात् किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाना।

श्लोक ६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१६९

मुक्तिका पात्र होता है (गीता—दूसरे अध्यायका पन्द्रहवों श्लोक)। इसीलिये इस श्लोकमें भगवान्ने दो बार मूढ़ताके त्यागकी बात (‘निर्मानमोहाः’ और ‘अमूहाः’) कहकर मूढ़ताके त्यागपर विशेष जोर दिया है।

मूढ़ता अर्थात् मोह दो प्रकारका होता है—(१) परमात्माकी ओर न लगकर संसारमें ही लग जाना और (२) परमात्माको ठीक तरहसे न जानना। इस श्लोकमें पहले ‘निर्मानमोहाः’ पदसे संसारका मोह चले जानेकी बात कही है और यहाँ ‘अमूहाः’* पदसे परमात्माको ठीक तरहसे जान लेनेकी बात कही है।

जिस परमात्माको इसी अध्यायके पहले श्लोकमें ‘ऊर्ध्वमूलम्’ पदसे कहा गया तथा जिस परमपदरूप परमात्माकी खोज करनेके लिये चौथे श्लोकमें प्रेरणा की गयी और आगे छठे श्लोकमें जिसकी महिमाका वर्णन किया गया है, उसी परमात्मरूप परमपदको यहाँ ‘अव्ययम् पदम्’ कहा है। जो ऊँची स्थितिके साधक भक्त मान, मोह, ममता आदि दोषोंसे सर्वथा रहित हो जाते हैं, वे उस

अविनाशी परमपदको अवश्य प्राप्त होते हैं, जिसको प्राप्त कर लेनेपर मनुष्य लौटकर नाशवान् संसारमें नहीं आता।

वास्तवमें तो मनुष्यमात्र उस पदको स्वतः प्राप्त है, पर उधर दृष्टि न रहनेसे उसको वैसा अनुभव नहीं होता। इसे एक उदाहरणसे समझना चाहिये। हम रेलगाडीसे यात्रा कर रहे हैं। हमारी गाड़ी एक स्टेशनपर रुक जाती है। हमारी गाड़ीके पास (दूसरी पटरीपर) खड़ी हुई दूसरी गाड़ी सहसा चलने लगती है। उस समय (उस चलती हुई गाड़ीपर दृष्टि रहनेसे) भ्रमसे हमें अपनी गाड़ी चलती हुई देखने लगती है। परन्तु जब हम वहाँसे अपनी दृष्टि हटाकर स्टेशनकी तरफ देखते हैं, तब पता लगता है कि हमारी गाड़ी तो ज्यों-की-त्यों (अपने स्थानपर) खड़ी हुई है। इसी प्रकार संसारसे सम्बन्ध होनेपर मनुष्य अपनेको संसारकी तरह क्रियाशील (आने-जानेवाला) देखने लगता है। पर जब वह संसारसे दृष्टि हटाकर अपने स्वरूपको देखता है, तो उसको पता लगता है कि मैं स्वयं तो ज्यों-का-त्यों ही हूँ।

परिशिष्ट भाव —ज्ञानयोग और कर्मयोगके अन्तर्गत भक्ति नहीं आती, पर भक्तिके अन्तर्गत ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनों आ जाते हैं (गीता—दसवें अध्यायका दसवाँ-ग्यारहवाँ श्लोक)। इसीलिये यहाँ ‘अध्यात्मनित्याः’ पदसे ज्ञानयोग और ‘विनिवृत्तकामाः’ पदसे कर्मयोग ले सकते हैं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित जिस अविनाशी पदको भक्तलोग प्राप्त होते हैं, वह अविनाशी पद कैसा है—इसका भगवान् विवेचन करते हैं।

न तद्वासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।

यदगत्वा न निवर्तन्ते तद्भ्राम परमं मम ॥६॥

तत्= उस (परमपद)-कोपावकः= अग्नि हीन, निवर्तन्ते= लौटकर (संसारमें)
= नभासयते= प्रकाशित कर सकती है (और)नहीं आते,
सूर्यः= सूर्य,यत्= जिसकोतत्= वही
= नगत्वा= प्राप्त होकरमम= मेरा
शशाङ्कः= चन्द्र (और)(जीव)परमम्= परम
= नधाम= धाम है।

व्याख्या —[छठा श्लोक पाँचवें और सातवें श्लोकोंको जोड़नेवाला है। इन श्लोकोंमें भगवान् यह बताते हैं कि वह अविनाशी पद मेरा ही धाम है, जो मेरेसे अभिन्न है और जीव भी मेरा अंश होनेके कारण मेरेसे अभिन्न है। अतः जीवकी भी उस धाम-(अविनाशी पद-) से अभिन्नता है अर्थात् वह उस धामको नित्यप्राप्त है।

  • जैसे निर्गुण तत्त्वको जाननेवाला अमूह (मोहरहित) हो जाता है (पाँचवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक), ऐसे ही सगुण-साकारको दृढ़तापूर्वक माननेवाला भी अमूह हो जाता है (दसवें अध्यायका तीसरा और पन्द्रहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।

१७०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

यद्यपि इस छठे श्लोकका बारहवें श्लोकसे घनिष्ठ सम्बन्ध है, तथापि पाँचवें और सातवें श्लोकोंको जोड़नेके लिये इसको यहाँ दिया गया है। इस श्लोकमें भगवान्ने दो खास बातें बतायी हैं—(१) उस धामको सूर्यादि प्रकाशित नहीं कर सकते (जिसका कारणरूपसे विवेचन भगवान्ने इसी अध्यायके बारहवें श्लोकमें किया है) और (२) उस धामको प्राप्त हुए जीव पुनः लौटकर संसारमें नहीं आते (जिसका कारणरूपसे विवेचन भगवान्ने इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें किया है)।]

‘न तद्द्रासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः’—दृश्य जगत्में सूर्यके समान तेजस्वी, प्रकाशस्वरूप कोई चीज नहीं है। वह सूर्य भी उस परमधामको प्रकाशित करनेमें असमर्थ है; फिर सूर्यसे प्रकाशित होनेवाले चन्द्र और अग्नि उसे प्रकाशित कर ही कैसे सकते हैं! इसी अध्यायके बारहवें श्लोकमें भगवान् स्पष्ट कहेंगे कि सूर्य, चन्द्र और अग्निमें मेरा ही तेज है। मेरेसे ही प्रकाश पाकर ये भौतिक जगत्को प्रकाशित करते हैं। अतः जो उस परमात्मतत्त्वे प्रकाश पाते हैं, उनके द्वारा परमात्मस्वरूप परमधाम कैसे प्रकाशित हो सकता है? * तात्पर्य यह है कि परमात्मतत्त्व चेतन है और सूर्य, चन्द्र तथा अग्नि जड़ (प्राकृत) हैं। ये सूर्य, चन्द्र और अग्नि क्रमशः नेत्र, मन और वाणीको प्रकाशित करते हैं। ये तीनों (नेत्र, मन और वाणी) भी जड़ ही हैं। इसलिये नेत्रोंसे उस परमात्मतत्त्वको देखा नहीं जा सकता, मनसे उसका चिन्तन नहीं किया जा सकता और वाणीसे उसका वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि जड़ तत्त्वेसे चेतन परमात्मतत्त्वको अनुभूति नहीं हो सकती। वह चेतन (प्रकाशक) तत्त्व इन सभी प्रकाशित पदार्थोंमें सदा परिपूर्ण है। उस तत्त्वमें अपनी प्रकाशकताका अभिमान नहीं है।

चेतन जीवात्मा भी परमात्माका ही अंश होनेके कारण ‘स्वयं प्रकाशस्वरूप’ है; अतः उसको भी जड़ पदार्थ (मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि) प्रकाशित नहीं कर सकते। मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि जड़-पदार्थीका उपयोग (भगवान्के

नाते दूसरोंकी सेवा करके) केवल जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेमें ही है।

एक बात ध्यान देनेकी है कि यहाँ सूर्यको ‘भगवान्’ या ‘देव’ की दृष्टिसे न देखकर केवल प्रकाश करनेवाले पदार्थीकी दृष्टिसे देखा गया है। तात्पर्य है कि सूर्य तैजस-तत्त्वोंमें श्रेष्ठ है; अतः यहाँ केवल सूर्यकी बात नहीं, प्रत्युत चन्द्र आदि सभी तैजस-तत्त्वोंकी बात चल रही है। जैसे, दसवें अध्यायके सौतीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि ‘वृष्णिवंशियोंमें मैं वासुदेव हूँ’, तो वहाँ ‘वासुदेव’का भगवान्के रूपसे वर्णन नहीं, प्रत्युत वृष्णिवंशके श्रेष्ठ पुरुषके रूपसे ही वर्णन है।

‘यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्भ्राम परमं मम’—जीव परमात्माका अंश है। वह जबतक अपने अंशी परमात्माको प्राप्त नहीं कर लेता, तबतक उसका आवागमन नहीं मिट सकता। जैसे नदियोंके जलको अपने अंशी समुद्रसे मिलनेपर ही स्थिरता मिलती है, ऐसे ही जीवको अपने अंशी परमात्मासे मिलनेपर ही वास्तविक, स्थायी शान्ति मिलती है। वास्तवमें जीव परमात्मासे अभिन्न ही है, पर संसारके (माने हुए) संगके कारण उसको ऊँच-नीच योनियोंमें जाना पड़ता है।

यहाँ ‘परमधाम’ शब्द परमात्माका धाम और परमात्मा—दोनोंका ही वाचक है। यह परमधाम प्रकाशस्वरूप है। जैसे सूर्य अपने स्थान-विशेषपर भी स्थित है और प्रकाशरूपसे सब जगह भी स्थित है अर्थात् सूर्य और उसका प्रकाश परस्पर अभिन्न हैं, ऐसे ही परमधाम और सर्वव्यापी परमात्मा भी परस्पर अभिन्न हैं।

भक्तोंकी भिन्न-भिन्न मान्यताओंके कारण ब्रह्मलोक, साकेत धाम, गोलीक धाम, देवीद्वीप, शिवलोक आदि सब एक ही परमधामके भिन्न-भिन्न नाम हैं। यह परमधाम चेतन, ज्ञानस्वरूप, प्रकाशस्वरूप और परमात्मस्वरूप है।

यह अविनाशी परमपद आत्मरूपसे सबमें समानरूपसे अनुस्यूत (व्याप्त) है। अतः स्वरूपसे हम उस परमपदमें

  • (१) न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।

तमेव भान्तमुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥

(कठेपनिषद् २।२।१५; मुण्डकोपनिषद् २।२।१०; श्वेताश्वतरोपनिषद् ६।१४)

‘उस परमात्माको सूर्य प्रकाशित नहीं करता, चन्द्र और तारे प्रकाशित नहीं करते, विद्युत् भी प्रकाशित नहीं करती, फिर यह अग्नि उसे कैसे प्रकाशित करेगी? यह सम्पूर्ण जगत् उस परमात्माके प्रकाशसे ही प्रकाशित होता है।’

(२) ‘जगत प्रकास्य प्रकासक राम्।’ (मानस १।११७।४)

श्लोक ६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१७१

स्थित हैं ही; परन्तु जड़ता-(शरीर आदि-) से तादात्म्य, | उसमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव नहीं हो सकता और कामनाके कारण हमें उसकी प्राप्ति अथवा | रहा है।

परिशिष्ट भाव— हम भगवान्के अंश हैं—‘ममैवांशो जीवलोकै ’ (गीता १५।७)। इसलिये भगवान्का जो धाम है, वही हमारा धाम है। इसी कारण उस धामकी प्राप्ति होनेपर फिर लौटकर संसारमें नहीं आना पड़ता। जबतक हम अपने उस धाममें नहीं जायेंगे, तबतक हम मुसाफिरकी तरह अनेक योनियोंमें और अनेक लोकोंमें घूमते ही रहेंगे, कहीं भी ठहर नहीं सकेंगे। अगर हम ऊँचे-से-ऊँचे ब्रह्मलोकमें भी चले जायें तो वहाँसे भी लौटकर आना पड़ेगा—‘आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ’ (गीता ८।१६)। कारण कि यह सम्पूर्ण संसार (मात्र ब्रह्माण्ड) परदेश है, स्वदेश नहीं। यह पराया घर है, अपना घर नहीं। विभिन्न योनियोंमें और लोकोंमें हमारा घूमना, भटकना तभी बन्द होगा, जब हम अपने असली घरमें पहुँच जायेंगे।

परमपदको प्राप्त होकर फिर लौटकर संसारमें न आनेकी बात गीतामें तीन जगह कही गयी है—

१-यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्द्वाम परमं मम। (८।२१)

२-ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्नाता न निवर्तन्ति भूयः। (१५।४)

३-यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्द्वाम परमं मम। (१५।६)

भगवान्ने ज्ञानमार्गमें तो अपुनरावृत्तिकी प्राप्ति बतायी है—‘गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्पसाः ’ (गीता ५।१७), पर भक्तिमार्गमें अपने धामकी प्राप्ति बतायी है—यह भक्तिकी विशेषता है! भगवान्के धाममें प्रेमका विशेष आस्वादन होता है।

परमपदको न तो आधिभौतिक प्रकाश (सूर्य, चन्द्र आदि) प्रकाशित कर सकता है और न आधिदैविक प्रकाश (नेत्र, मन, बुद्धि, वाणी आदि) ही प्रकाशित कर सकता है। कारण कि यह स्वयंप्रकाश है। इसमें प्रकाश्य-प्रकाशकका भेद नहीं है।

गत्वा ’ में गति है, प्रवृत्ति नहीं; क्योंकि अंशकी अंशीकी ओर गति होती है, प्रवृत्ति नहीं। प्रवृत्ति तो परतः होती है, पर गति स्वतः होती है।

गति और प्रवृत्ति— गति स्वतः-स्वाभाविक होती है और उसमें परिश्रम (प्रयत्न), उद्योग तथा कर्तृत्व नहीं होता। परन्तु प्रवृत्ति अस्वाभाविक और श्रमसाध्य, उद्योगसाध्य तथा कर्तृत्वसहित होती है। प्रवृत्ति तो अहंकारयुक्त होनेपर होती है, पर गति अहंकाररहित होनेपर होती है। इसलिये गति ‘स्व’ की तरफ होती है और प्रवृत्ति ‘पर’ की तरफ होती है। गति परमात्माकी तरफ होती है और प्रवृत्ति संसारकी तरफ होती है। गति चिन्मयताकी तरफ होती है और प्रवृत्ति जड़ताकी तरफ होती है। गति असौमकी तरफ ले जाती है और प्रवृत्ति सौमितकी तरफ ले जाती है। गति स्वाधीन करती है और प्रवृत्ति पराधीन करती है। भोग तथा संग्रहका सुख चाहनेपर प्रवृत्ति होती है और दूसरेको सुख देनेपर गति होती है।

गतिका उदगम-स्थान ‘सत्’ है और प्रवृत्तिका उदगम-स्थान ‘असत्’ है। जैसे, गंगाका उदगम-स्थान गंगोत्री है। अगर गंगाको रोककर एक ऐसा बाँध बना दिया जाय, जो गंगोत्रीसे भी ऊँचा हो तो गंगाका जल स्वतः अपने उदगम-स्थान गंगोत्रीकी तरफ जायगा। इस प्रकार गंगाका अपने उदगम-स्थानकी ओर जाना ‘गति’ है। अतः गति दो तरहसे होती है—संसार (भोग और संग्रह)-की तरफ जाना बन्द करनेसे अर्थात् उससे विमुख होनेसे अथवा अपने उद्देश्य परमात्माकी तरफ जानेसे अर्थात् उनके सम्मुख होनेसे। नित्यप्राप्त परमात्माकी जो अप्राप्ति मानी है, उसका मिटना ही परमात्माकी तरफ गति होना है। गतियों परमात्मासे मानी हुई दूरी मिटती है और वास्तविक एकता प्रकट होती है।

साधकको ऐसा अनुभव होता है कि कई वर्ष पहले जैसे भाव तथा आचरण थे, वैसे अब नहीं रहे, प्रत्युत पहलेसे अधिक श्रेष्ठ हो गये तो यह साधककी गति हुई है। साधनावस्थामें जो गति होती है, उसमें अहम्का सूक्ष्म संस्कार रह सकता है, पर मुक्त होनेके बाद प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी तरफ जो गति होती है, उसमें अहम्का सूक्ष्म संस्कार भी नहीं रहता अर्थात् अहम्का अत्यन्त अभाव हो जाता है। इसका कारण यह है कि जीव परमात्मासे जितना दूर होता है, उतना ही उसमें अहंकार रहता है। स्वरूपमें स्थित होनेपर भी सूक्ष्म अहंकार रहता है, जो मुक्तियों तो बाधक नहीं होता, पर अन्य दार्शनिकोंसे मतभेद करनेवाला होता है। परमात्मासे अभिन्नता होनेपर अहंकार सर्वथा मिट जाता है।

१७२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपने परमधामका वर्णन करते हुए यह बताया कि उसको प्राप्त होकर जीव लौटकर संसारमें नहीं आते। उसके विवेचनके रूपमें अपने अंश जीवात्माको भी (परमधामकी ही तरह) अपनेसे अभिन्न बताते हुए, जीवसे क्या भूल हो रही है कि जिससे उसको नित्यप्राप्त परमात्मस्वरूप परमधामका अनुभव नहीं हो रहा है—इसका हेतुसहित वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

ममैवांशो जीवलोकं जीवभूतः सनातनः।

मनःषष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥

जीवलोकं= इस संसारमेंएव= हीमनःषष्ठीनि= मन और पाँचों
जीवभूतः= जीव बना हुआसनातनः= सनातनइन्द्रियाणि= इन्द्रियोंको
आत्मा (स्वयं)अंशः= अंश है; (परन्तु वह)कर्षति= आकर्षित करता है
मम= मेराप्रकृतिस्थानि= प्रकृतिमें स्थित(अपना मान लेता है)।

व्याख्या—‘ममैवांशो जीवलोकं जीवभूतः सनातनः’— जिनके साथ जीवकी तात्त्विक अथवा स्वरूपकी एकता नहीं है, ऐसे प्रकृति और प्रकृतिके कार्यमात्रका नाम ‘लोक’ है। तीन लोक, चौदह भुवनोंमें जीव जितनी योनियोंमें शरीर धारण करता है, उन सम्पूर्ण लोकों तथा योनियोंको ‘जीवलोक’ पदके अन्तर्गत समझना चाहिये। आत्मा परमात्माका अंश है; परन्तु प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन आदिके साथ अपनी एकता मानकर वह ‘जीव’ हो गया है—‘जीवभूतः।’ उसका यह जीवपना बनावटी है, वास्तविक नहीं। नाटकमें कोई पात्र बननेकी तरह ही यह आत्मा जीवलोकमें ‘जीव’ बनता है।

सातवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि इस सम्पूर्ण जगत्को मेरी ‘जीवभूता’ परा प्रकृतिने धारण कर रखा है अर्थात् अपरा प्रकृति-(संसार-) से वास्तविक सम्बन्ध न होनेपर भी जीवने उससे अपना सम्बन्ध मान रखा है।

भगवान् जीवके प्रति कितनी आत्मीयता रखते हैं कि उसको अपना ही मानते हैं—‘ममैवांशः।’ मानते ही नहीं, प्रत्युत जानते भी हैं। उनकी यह आत्मीयता महान् हितकारी, अखण्ड रहनेवाली और स्वतःसिद्ध है।

यहाँ भगवान् यह वास्तविकता प्रकट करते हैं कि जीव केवल मेरा ही अंश है; इसमें प्रकृतिका किंचिन्मात्र भी अंश नहीं है। जैसे सिंहका बच्चा भेड़ोंमें मिलकर अपनेको भेड़ मान ले, ऐसे ही जीव शरीरादि जड़ पदार्थोंके साथ मिलकर अपने असली चेतनस्वरूपको भूल जाता है। अतः इस भूलको मिटाकर उसे अपनेको सदा सर्वथा चेतनस्वरूप ही अनुभव करना चाहिये। सिंहका बच्चा भेड़ोंके साथ

मिलकर भी भेड़ नहीं हो जाता। जैसे कोई दूसरा सिंह आकर उसे बोध करा दे कि ‘देख! तेरी और मेरी आकृति, स्वभाव, जाति, गर्जना आदि सब एक समान हैं; अतः निश्चितरूपसे तू भेड़ नहीं, प्रत्युत मेरे—जैसा ही सिंह है।’ ऐसे ही भगवान् यहाँ ‘मम एव’ पदोंसे जीवको बोध कराते हैं कि हे जीव! तू मेरा ही अंश है। प्रकृतिके साथ तेरा सम्बन्ध कभी हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं।

भगवत्प्राप्तिके सभी साधनोंमें ‘अहंता’ (मैं-पन) और ‘ममता’-(मेरा-पन-) का परिवर्तन-रूप साधन बहुत सुगम और श्रेष्ठ है। अहंता और ममता—दोनोंमें साधककी जैसी मान्यता होती है, उसके अनुसार उसका भाव तथा क्रिया भी स्वतः होती है। साधककी ‘अहंता’ यह होनी चाहिये कि ‘मैं भगवान्का ही हूँ’ और ‘ममता’ यह होनी चाहिये कि ‘भगवान् ही मेरे हैं।’

यह सबका अनुभव है कि हम अपनेको जिस वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका मानते हैं, उसीके अनुसार हमारा जीवन बनता है। पर यह मान्यता (जैसे-मैं ब्राह्मण हूँ; मैं साधु हूँ आदि) केवल (नाटकके स्वोंगकी तरह) कर्तव्य-पालनके लिये है; क्योंकि यह सदा रहनेवाली नहीं है। परन्तु ‘मैं भगवान्का हूँ’ यह वास्तविकता सदा रहनेवाली है। ‘मैं ब्राह्मण हूँ; मैं साधु हूँ’ आदि भाव कभी हमसे ऐसा नहीं कहते कि ‘तुम ब्राह्मण हो’ या ‘तुम साधु हो।’ इसी प्रकार मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर, धन, जमीन, मकान आदि जिन पदार्थोंको हम भूलसे अपना मान रहे हैं, वे हमें कभी भी ऐसा नहीं कहते कि तुम हमारे हो, पर सम्पूर्ण सृष्टिके रचयिता परमात्मा स्पष्ट घोषणा करते हैं कि जीव मेरा ही है!

श्लोक ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१७३

विचार करना चाहिये कि शरीरादि पदार्थोंको हम अपने साथ लाये नहीं, इच्छानुसार उनमें परिवर्तन कर सकते नहीं, इच्छानुसार उनको अपने पास स्थिर रख सकते नहीं, हम भी उनके साथ सदा रह सकते नहीं, उनको अपने साथ ले जा सकते नहीं, फिर भी उनको अपना मानते हैं—यह हमारी कितनी बड़ी भूल है!

बचपनमें हमारे मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर जैसे थे, वैसे अब नहीं हैं, सब-के-सब बदल गये हैं, फिर भी हम 'मैं जो बचपनमें था, वही अब हूँ' ऐसा मानते हैं। कारण यही है कि शरीरादिमें परिवर्तन होनेपर भी हमारेमें परिवर्तन नहीं हुआ। इस प्रकार शरीरादिमें हमें स्पष्ट परिवर्तन दीखता है। जिसको परिवर्तन दीखता है, वह स्वयं परिवर्तनरहित होता ही है। अतः संसारके पदार्थ, व्यक्ति हमारे साथी नहीं हैं।

'मैं भगवान्का हूँ'—ऐसा भाव रखना अपने-आपको भगवान्में लगाना है। साधकोंसे भूल यही होती है कि वे अपने-आपको भगवान्में न लगाकर मन-बुद्धिको भगवान्में लगानेकी कोशिश करते हैं। 'मैं भगवान्का हूँ'—इस वास्तविकताको भूलकर 'मैं ब्राह्मण हूँ; मैं साधु हूँ' आदि भी मानते रहें और मन-बुद्धिको भगवान्में लगाते रहें तो यह दुविधा कभी मिटेगी नहीं और बहुत प्रयत्न करनेपर भी मन-बुद्धि जैसे भगवान्में लगने चाहिये, वैसे लगेंगे नहीं। भगवान्ने भी इस अध्यायके चौथे श्लोकमें 'मैं उस परमात्मके शरण हूँ' पदोंसे अपने-आपको परमात्मामें लगानेकी बात ही कही है। गोस्वामी तुलसीदासजी भी कहते हैं कि पहले भगवान्का होकर फिर नाम-जप आदि साधन करें तो अनेक जन्मोंकी बिगड़ी हुई स्थिति आज अभी सुधर सकती है—

बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु। होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु॥

(दोहावली २२)

तात्पर्य यह है कि भगवान्में केवल मन-बुद्धि लगानेकी अपेक्षा अपने-आपको भगवान्में लगाना श्रेष्ठ है। अपने-आपको भगवान्में लगानेसे मन-बुद्धि स्वतः सुगमतापूर्वक भगवान्में लग जाते हैं। नाटकका पात्र हजारों दर्शकोंके सामने यह कहता है कि 'मैं रावणका बेटा मेघनाद हूँ' और मेघनादकी तरह ही वह बाहरी सब क्रियाएँ करता है। परन्तु उसके भीतर यह भाव हरदम रहता है कि यह तो स्वॉंग है; वास्तवमें मैं मेघनाद हूँ ही नहीं। इसी तरह साधकोंको भी

नाटकके स्वॉंगकी तरह इस संसाररूपी नाट्यशालामें अपने-अपने कर्तव्यका पालन करते हुए भीतरसे 'मैं तो भगवान्का हूँ' ऐसा भाव हरदम जाग्रत् रखना चाहिये।

जीव सदासे ही भगवान्का है—'सनातनः।' भगवान्ने न तो कभी जीवका त्याग ही किया, न कभी उससे विमुख हो हुए। जीव भी भगवान्का त्याग नहीं कर सकता। भगवान्के द्वारा मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके वह भगवान्से विमुख हुआ है। जिस प्रकार सोनेका गहना तत्त्वतः सोनेसे अलग नहीं हो सकता, उसी प्रकार जीव भी तत्त्वतः परमात्मासे कभी अलग नहीं हो सकता।

बुद्धिमान् कहलानेवाले मनुष्यकी यह बहुत बड़ी भूल है कि वह अपने अंशी भगवान्से विमुख हो रहा है। वह इधर खयाल ही नहीं करता कि भगवान् इतने सुहृद (दयालु और प्रेमी) हैं कि हमारे न चाहनेपर भी हमें चाहते हैं, न जाननेपर भी हमें जानते हैं। वे कितने उदार, दयालु और प्रेमी हैं—इसका वर्णन भाषा, भाव, बुद्धि आदिके द्वारा हो ही नहीं सकता। ऐसे सुहृद भगवान्को छोड़कर अन्य नाशवान् जड़ पदार्थोंको अपना मानना बुद्धिमानी नहीं, प्रत्युत महान् मूर्खता है।

जब मनुष्य भगवान्के आज्ञानुसार अपने कर्तव्यका पालन करता है, तब वे उसकी इतनी उन्नति कर देते हैं कि जीवन सफल हो जाता है और जन्म-मरणरूप बन्धन सदाके लिये मिट जाता है। जब मनुष्य भूलसे कोई निषिद्ध आचरण (पाप) कर बैठता है, तब वे दुःखोंको भेजकर उसको चेताते हैं, पुराने पापोंको भुगताकर उसको शुद्ध करते हैं और नये पापोंमें प्रवृत्तिसे रोकते हैं।

जीव कहीं भी क्यों न हो, नरकमें हो अथवा स्वर्गमें, मनुष्ययोनियें हो अथवा पशुयोनियें, भगवान् उसको अपना ही अंश मानते हैं। यह उनकी कितनी अहेतुकी कृपा, उदारता और महत्ता है! जीवके पतनको देखकर भगवान् दुःखी होकर कहते हैं कि मेरे पास आनेका उसका पूरा अधिकार था, पर वह मेरेको प्राप्त किये बिना ('माम् अप्राप्य ') नरकोंमें जा रहा है (गीता—सोलहवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक)।

मनुष्य चाहे किसी भी स्थितिमें क्यों न हो, भगवान् उसे वहाँ स्थिर नहीं रहने देते; उसे अपनी ओर खींचते ही रहते हैं। जब हमारी सामान्य स्थितिमें कुछ भी परिवर्तन (सुख-दुःख, आदर-निरादर आदि) हो, तब यह मानना चाहिये कि भगवान् हमें विशेषरूपसे याद करके नयी

१७४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १५ ]

परिस्थिति पैदा कर रहे हैं; हमें अपनी ओर खींच रहे हैं। ऐसा मानकर साधक प्रत्येक परिस्थितिमें विशेष भगवत्-कृपाको देखकर मस्त रहे और भगवान्को कभी भूलें नहीं।

अंशीको प्राप्त करनेमें अंशको कठिनाई और देरी नहीं लगती। कठिनाई और देरी इसलिये लगती है कि अंशने अपने अंशीसे विमुखा मानकर उन शरीरादिको अपना मान रखा है, जो अपने नहीं हैं। अतः भगवान्के सम्मुख होते ही उनकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है। सम्मुख होना जीवका काम है; क्योंकि जीव ही भगवान्से विमुख हुआ है। भगवान् तो जीवको अपना मानते ही हैं; जीव भगवान्को अपना मान ले—यही सम्मुखता है।

मनुष्यसे यह बड़ी भारी भूल हो रही है कि जो व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति अभी नहीं है अथवा जिसका मिलना निश्चित भी नहीं है और जो मिलनेपर भी सदा नहीं रहेगी—उसकी प्राप्तिमें वह अपना पूर्ण पुरुषार्थ और उन्नति मानता है। यह मनुष्यका अपने साथ बड़ा भारी धोखा है! वास्तवमें जो नित्यप्राप्त और अपना है, उस परमात्माको प्राप्त करना ही मनुष्यका परम पुरुषार्थ है, शूरवीरता है। हम धन, सम्पत्ति आदि सांसारिक पदार्थ कितने ही क्यों न प्राप्त कर लें, पर अन्तमें या तो वे नहीं रहेंगे अथवा हम नहीं रहेंगे। अन्तमें ‘नहीं’ ही शेष रहेगा। वास्तवमें जो सदा ‘है’, उस—(अविनाशी परमात्मा—)को प्राप्त कर लेनेमें ही शूरवीरता है। जो ‘नहीं’ है, उसको प्राप्त करनेमें कोई शूरवीरता नहीं है।

जीव जितना ही नाशवान् पदार्थोंको महत्त्व देता है, उतना ही वह पतनकी तरफ जाता है और जितना ही अविनाशी परमात्माको महत्त्व देता है, उतना ही वह ऊँचा उठता है। कारण कि जीव परमात्माका ही अंश है।

नाशवान् सांसारिक पदार्थोंको प्राप्त करके मनुष्य कभी भी बड़ा नहीं हो सकता। केवल बड़े होनेका वहम या धोखा हो जाता है और वास्तवमें असली बड़पन—(परमात्मप्राप्ति)—से वंचित हो जाता है। नाशवान् पदार्थोंके कारण माना गया बड़पन कभी टिकता नहीं और परमात्माके कारण होनेवाला बड़पन कभी मिटता नहीं! इसलिये जीव जिसका अंश है, उस सर्वोपरि परमात्माको प्राप्त करनेसे ही वह बड़ा होता है। इतना बड़ा होता है कि देवतालोग भी उसका आदर करते हैं और कामना करते हैं कि वह हमारे लोकमें आये। इतना ही नहीं, स्वयं

भगवान् भी उसके अधीन हो जाते हैं!

‘मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’—

भगवान्ने जिस प्रकार इसी श्लोकके पूर्वार्धमें जीवको अपनेमें स्थित न कहकर उसको अपना अंश बताया है, उसी प्रकार श्लोकके उत्तरार्धमें मन तथा इन्द्रियोंको प्रकृतिका अंश न कहकर उनको प्रकृतिमें स्थित बताया है। तात्पर्य है कि भगवान्का अंश जीव सदा भगवान्में ही स्थित है और प्रकृतिमें स्थित मन तथा इन्द्रियाँ प्रकृतिके ही अंश हैं। मन और इन्द्रियोंको अपना मानना, उनसे अपना सम्बन्ध मानना ही उनको आकर्षित करना है।

यहाँ बुद्धिका अन्तर्भाव ‘मन’ शब्दमें (जो अन्तः—करणका उपलक्षण है) और पाँच कर्मैन्द्रियों तथा पाँच प्राणोंका अन्तर्भाव ‘इन्द्रिय’ शब्दमें मान लेना चाहिये। उपर्युक्त पदोंमें भगवान् कहते हैं कि मेरा अंश जीव मेरेमें स्थित रहता हुआ भी भूलसे अपनी स्थिति शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिमें मान लेता है। जैसे शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि प्रकृतिका अंश होनेसे कभी प्रकृतिसे पृथक् नहीं होते, ऐसे ही जीव भी मेरा अंश होनेसे कभी मेरेसे पृथक् होता नहीं, हो सकता नहीं। परन्तु यह जीव मेरेसे विमुख होकर मुझे भूल गया है।

यहाँ मन और पाँच ज्ञानैन्द्रियोंका नाम लेनेका तात्पर्य यह है कि इन छहोंसे सम्बन्ध जोड़कर ही जीव बँधता है। अतः साधकको चाहिये कि वह शरीर-इन्द्रियाँ—मन—बुद्धिको संसारके अर्पण कर दे अर्थात् संसारकी सेवामें लगा दे और अपने—आपको भगवान्के अर्पण कर दे।

विशेष बात

(१)

मनुष्य भूलसे शरीर, स्त्री, पुत्र, धन, मकान, मान, बड़ाई आदि नाशवान् वस्तुओंको अपनी और अपने लिये मानकर दुःखी होता है। इससे भी नीची बात यह है कि इस सामग्रीके भोग और संग्रहको लेकर वह अपनेको बड़ा मानने लगता है; जबकि वास्तवमें इनको अपना मानते ही इनका गुलाम हो जाता है। हमें पता लगे या न लगे, हम जिन पदार्थोंकी आवश्यकता समझते हैं, जिनमें कोई विशेषता या महत्त्व देखते हैं या जिनकी हम गरज रखते हैं, वे (धन, विद्या आदि) पदार्थ हमसे बड़े और हम उनसे तुच्छ हो ही गये। पदार्थोंके मिलनेमें जो अपना महत्त्व समझता है, वह वास्तवमें तुच्छ ही है, चाहे उसे पदार्थ मिलें या न मिलें।