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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 964

श्लोक ४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१६३

होता है। परमात्मा अनादि और सर्वत्र परिपूर्ण हैं। अतः यहाँ खोज करनेका मतलब यह नहीं है कि किसी साधन-विशेषके द्वारा परमात्माको ढूँढ़ना है। जो संसार (शरीर, परिवार, धनादि) कभी अपना था नहीं, है नहीं, होगा नहीं उसका आश्रय न लेकर, जो परमात्मा सदासे ही अपने हैं, अपनेमें हैं और अभी हैं, उनका आश्रय लेना ही उनकी खोज करना है।

साधकको साधन-भजन करना तो बहुत आवश्यक है; क्योंकि इसके समान कोई उत्तम काम नहीं है; किंतु ‘परमात्मतत्त्वको साधन-भजनके द्वारा प्राप्त कर लेंगे’—ऐसा मानना ठीक नहीं; क्योंकि ऐसा माननेसे अभिमान बढ़ता है, जो परमात्मप्राप्तिमें बाधक है। परमात्मा कृपासे मिलते हैं। उनको किसी साधनसे खरीदा नहीं जा सकता। साधनसे केवल असाधन- (संसारसे तादात्म्य, ममता और कामनाका सम्बन्ध अथवा परमात्मासे विमुखता-) का नाश होता है, जो अपने द्वारा ही किया हुआ है। अतः साधनका महत्त्व असाधनको मिटानेमें ही समझना चाहिये। असाधनको मिटानेकी सच्ची लगन हो, तो असाधनको मिटानेका बल भी परमात्माकी कृपासे मिलता है।

साधकोंके अन्तःकरणमें प्रायः एक दृढ़ धारणा बनी हुई है कि जैसे उद्योग करनेसे संसारके पदार्थ प्राप्त होते हैं, ऐसे ही साधन करते-करते (अन्तःकरण शुद्ध होनेपर) ही परमात्माकी प्राप्ति होती है। परन्तु वास्तवमें यह बात नहीं है; क्योंकि परमात्मप्राप्ति किसी भी कर्म (साधन, तपस्यादि)-का फल नहीं है, चाहे वह कर्म कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो। कारण कि श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ कर्मका भी आरम्भ और अन्त होता है; अतः उस कर्मका फल नित्य कैसे होगा? कर्मका फल भी आदि और अन्तवाला होता है। इसलिए नित्य परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति किसी कर्मसे नहीं होती। वास्तवमें त्याग, तपस्या आदिसे जड़ता-(संसार और शरीर-) से सम्बन्ध-विच्छेद ही होता है, जो भूलसे माना हुआ है। सम्बन्ध-विच्छेद होते ही जो तत्त्व सर्वत्र है, सदा है, नित्यप्राप्त है, उसकी अनुभूति हो जाती है—उसकी स्मृति जाग्रत् हो जाती है।

अर्जुन भी पूरा उपदेश सुननेके बाद अन्तमें कहते हैं—‘स्मृतिर्लब्धा’ (१८।७३) ‘मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है।’ यद्यपि विस्मृति भी अनादि है, तथापि वह अन्त होनेवाली है। संसारकी स्मृति और परमात्माकी स्मृतिमें बहुत अन्तर है। संसारकी स्मृतिके बाद विस्मृतिका होना सम्भव है;

जैसे—पक्षाघात (लकवा) होनेपर पढ़ी हुई विद्याकी विस्मृति होना सम्भव है। इसके विपरीत परमात्माकी स्मृति एक बार हो जानेपर फिर कभी विस्मृति नहीं होती (गीता—दूसरे अध्यायका बहतर्वा और चौथे अध्यायका पैतौसर्वा श्लोक); जैसे—पक्षाघात होनेपर अपनी सत्ता (‘मैं हूँ’)-की विस्मृति नहीं होती। कारण यह है कि संसारके साथ कभी सम्बन्ध होता नहीं और परमात्मासे कभी सम्बन्ध छूटता नहीं।

शरीर, संसारसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है—इस तत्त्वका अनुभव करना ही संसारवृक्षका छेदन करना है और मैं परमात्माका अंश हूँ—इस वास्तविकतामें हरदम स्थित रहना ही परमात्माकी खोज करना है। वास्तवमें संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होते ही नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वकी अनुभूति हो जाती है।

‘यस्मिन्नाता न निवर्तन्ति भूयः’—जिसे पहले श्लोकमें ‘ऊर्ध्वमूलम्’ पदसे तथा इस श्लोकमें ‘आद्यं पुरुषम्’ पदोंसे कहा गया है; और आगे छठे श्लोकमें जिसका विस्तारसे वर्णन हुआ है, उसी परमात्मतत्त्वका निर्देश यहाँ ‘यस्मिन्’ पदसे किया गया है।

जैसे जलकी बूँद समुद्रमें मिल जानेके बाद पुनः समुद्रसे अलग नहीं हो सकती, ऐसे ही परमात्माका अंश (जीवात्मा) परमात्माको प्राप्त हो जानेके बाद फिर परमात्मासे अलग नहीं हो सकता अर्थात् पुनः लौटकर संसारमें नहीं आ सकता। ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण प्रकृति अथवा उसके कार्य गुणोंका संग ही है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। अतः जब साधक असंगशस्त्रके द्वारा गुणोंके संगका सर्वथा छेदन (असत्के सम्बन्धका सर्वथा त्याग) कर देता है, तब उसका पुनः कहीं जन्म लेनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता।

‘यतः प्रवृत्तिः प्रमुता पुराणी’—सम्पूर्ण सृष्टिके रचयिता एक परमात्मा ही हैं। वे ही इस संसारके आश्रय और प्रकाशक हैं। मनुष्य भ्रमवश सांसारिक पदार्थोंमें सुखोंको देखकर संसारकी तरफ आकर्षित हो जाता है और संसारके रचयिता-(परमात्मा-)को भूल जाता है। परमात्माका रचा हुआ संसार भी जब इतना प्रिय लगता है, तब (संसारके रचयिता) परमात्मा कितने प्रिय लगने चाहिये! यद्यपि रची हुई वस्तुमें आकर्षणका होना एक प्रकारसे रचयिताका ही आकर्षण है (गीता—दसवें अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक), तथापि मनुष्य अज्ञानवश