श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 963, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
भगवान्के सिवाय कुछ भी नहीं है।
‘असंगशस्त्रेण दृढेन छिन्त्वा’—इन पदोंमें आये ‘छिन्त्वा’ शब्दका अर्थ काटना अथवा नाश (अभाव) करना नहीं है, प्रत्युत सम्बन्ध-विच्छेद करना है। कारण कि यह संसार-वृक्ष भगवान्की अपरा प्रकृति होनेसे अव्यय है। स्वरूप असंग है—‘असंगो ह्ययं पुरुषः’ (बृहदा० ४।३।१५)। स्वरूपमें गुणसंग नहीं है। गुणसंगसे ही जन्म-मरण होता है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनमसु’ (गीता १३।२१)। अतः स्वरूपकी असंगताका, निर्लिप्तताका, अजरता-अमरताका अनुभव करके उसमें स्थित होना ही संसार-वृक्षका छेदन करना है।
संसार रागके कारण ही दीखता है। जिस वस्तुमें राग होता है, उसी वस्तुकी सत्ता और महत्ता दीखती है। अगर राग न रहे तो संसारकी सत्ता दीखते हुए भी महत्ता नहीं रहती। अतः ‘असंगशस्त्रेण दृढेन छिन्त्वा’ पदोंका तात्पर्य है—संसारके रागको सर्वथा मिटा देना अर्थात् अपने अन्तःकरणमें परमात्माके सिवाय अन्य किसीसे सम्बन्ध न मानना, सृष्टिमात्रकी किसी भी वस्तुको अपनी और अपने लिये न मानना। वास्तवमें संसारकी सत्ता बन्धनकारक नहीं है, प्रत्युत उससे रागपूर्वक माना हुआ सम्बन्ध ही बन्धनकारक है। सत्ता बाधक नहीं है, राग बाधक है। इसलिये अन्य दार्शनिक तो संसारको असत्, सत् आदि अनेक प्रकारसे कहते हैं, पर भगवान् संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी बात कहते हैं। सम्बन्ध-विच्छेद करनेसे संसारका संसाररूपसे अभाव हो जाता है और वह भगवद्रूपसे दीखने लगता है—‘वासुदेवः सर्वम्’।
सम्बन्ध—संसारवृक्षका छेदन करनेके बाद साधकको क्या करना चाहिये—इसका विवेचन आगेके श्लोकमें करते हैं।
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्नाता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥
| ततः | = उसके बाद | भूयः | = फिर | प्रसृता | = विस्तारको प्राप्त |
|---|---|---|---|---|---|
| तत् | = उस | न, निवर्तन्ति | = लौटकर संसारमें | हुई है, | |
| पदम् | = परमपद (परमात्मा)- | ||||
| की | नहीं आते | तम् | = उस | ||
| परिमार्गितव्यम् | = खोज करनी | ||||
| चाहिये। | च | = और | आद्यम् | = आदि | |
| यस्मिन् | = जिसको | यतः | = जिससे | पुरुषम् | = पुरुष परमात्माके |
| गताः | = प्राप्त हुए मनुष्य | पुराणी | = अनादिकालसे चली | ||
| आनेवाली | एव | = ही | |||
| प्रवृत्तिः | = (यह) सृष्टि | प्रपद्ये | = मैं शरण | ||
| हूँ। |
व्याख्या—‘ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्’—भगवान्ने पूर्वश्लोकमें ‘छिन्त्वा’ पदसे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी बात कही है। इससे यह सिद्ध होता है कि परमात्माकी खोज करनेसे पहले संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करना बहुत आवश्यक है। कारण कि परमात्मा तो सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें ज्यों-के-त्यों विद्यमान हैं, केवल संसारसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही नित्यप्राप्त परमात्माके अनुभवमें बाधा लग रही है। संसारसे सम्बन्ध बना रहनेसे परमात्माकी खोज करनेमें ढिलाई आती है और जप, कीर्तन, स्वाध्याय आदि सब कुछ करनेपर भी विशेष लाभ नहीं दीखता। इसलिये साधकको पहले संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेको ही मुख्यता देनी चाहिये।
जीव परमात्माका ही अंश है। संसारसे सम्बन्ध मान लेनेके कारण ही वह अपने अंशी-(परमात्मा-) के नित्य-सम्बन्धको भूल गया है। अतः भूल मिटनेपर ‘मैं भगवान्का ही हूँ’—इस वास्तविकताकी स्मृति प्राप्त हो जाती है। इसी बातपर भगवान् कहते हैं कि उस परमपद-(परमात्मा-) से नित्य-सम्बन्ध पहलेसे ही विद्यमान है।
केवल उसकी खोज करनी है। संसारको अपना माननेसे नित्यप्राप्त परमात्मा अप्राप्त दीखने लग जाता है और अप्राप्त संसार प्राप्त दीखने लग जाता है। इसलिये परमपद-(परमात्मा-) को ‘तत्’ पदसे लक्ष्य करके भगवान् कहते हैं कि जो परमात्मा नित्यप्राप्त है, उसीकी पूरी तरह खोज करनी है। खोज उसीकी होती है, जिसका अस्तित्व पहलेसे ही