श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
१६२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
भगवान्के सिवाय कुछ भी नहीं है।
‘असंगशस्त्रेण दृढेन छिन्त्वा’—इन पदोंमें आये ‘छिन्त्वा’ शब्दका अर्थ काटना अथवा नाश (अभाव) करना नहीं है, प्रत्युत सम्बन्ध-विच्छेद करना है। कारण कि यह संसार-वृक्ष भगवान्की अपरा प्रकृति होनेसे अव्यय है। स्वरूप असंग है—‘असंगो ह्ययं पुरुषः’ (बृहदा० ४।३।१५)। स्वरूपमें गुणसंग नहीं है। गुणसंगसे ही जन्म-मरण होता है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनमसु’ (गीता १३।२१)। अतः स्वरूपकी असंगताका, निर्लिप्तताका, अजरता-अमरताका अनुभव करके उसमें स्थित होना ही संसार-वृक्षका छेदन करना है।
संसार रागके कारण ही दीखता है। जिस वस्तुमें राग होता है, उसी वस्तुकी सत्ता और महत्ता दीखती है। अगर राग न रहे तो संसारकी सत्ता दीखते हुए भी महत्ता नहीं रहती। अतः ‘असंगशस्त्रेण दृढेन छिन्त्वा’ पदोंका तात्पर्य है—संसारके रागको सर्वथा मिटा देना अर्थात् अपने अन्तःकरणमें परमात्माके सिवाय अन्य किसीसे सम्बन्ध न मानना, सृष्टिमात्रकी किसी भी वस्तुको अपनी और अपने लिये न मानना। वास्तवमें संसारकी सत्ता बन्धनकारक नहीं है, प्रत्युत उससे रागपूर्वक माना हुआ सम्बन्ध ही बन्धनकारक है। सत्ता बाधक नहीं है, राग बाधक है। इसलिये अन्य दार्शनिक तो संसारको असत्, सत् आदि अनेक प्रकारसे कहते हैं, पर भगवान् संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी बात कहते हैं। सम्बन्ध-विच्छेद करनेसे संसारका संसाररूपसे अभाव हो जाता है और वह भगवद्रूपसे दीखने लगता है—‘वासुदेवः सर्वम्’।
सम्बन्ध—संसारवृक्षका छेदन करनेके बाद साधकको क्या करना चाहिये—इसका विवेचन आगेके श्लोकमें करते हैं।
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्नाता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥
| ततः | = उसके बाद | भूयः | = फिर | प्रसृता | = विस्तारको प्राप्त |
|---|---|---|---|---|---|
| तत् | = उस | न, निवर्तन्ति | = लौटकर संसारमें | हुई है, | |
| पदम् | = परमपद (परमात्मा)- | ||||
| की | नहीं आते | तम् | = उस | ||
| परिमार्गितव्यम् | = खोज करनी | ||||
| चाहिये। | च | = और | आद्यम् | = आदि | |
| यस्मिन् | = जिसको | यतः | = जिससे | पुरुषम् | = पुरुष परमात्माके |
| गताः | = प्राप्त हुए मनुष्य | पुराणी | = अनादिकालसे चली | ||
| आनेवाली | एव | = ही | |||
| प्रवृत्तिः | = (यह) सृष्टि | प्रपद्ये | = मैं शरण | ||
| हूँ। |
व्याख्या—‘ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्’—भगवान्ने पूर्वश्लोकमें ‘छिन्त्वा’ पदसे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी बात कही है। इससे यह सिद्ध होता है कि परमात्माकी खोज करनेसे पहले संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करना बहुत आवश्यक है। कारण कि परमात्मा तो सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें ज्यों-के-त्यों विद्यमान हैं, केवल संसारसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही नित्यप्राप्त परमात्माके अनुभवमें बाधा लग रही है। संसारसे सम्बन्ध बना रहनेसे परमात्माकी खोज करनेमें ढिलाई आती है और जप, कीर्तन, स्वाध्याय आदि सब कुछ करनेपर भी विशेष लाभ नहीं दीखता। इसलिये साधकको पहले संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेको ही मुख्यता देनी चाहिये।
जीव परमात्माका ही अंश है। संसारसे सम्बन्ध मान लेनेके कारण ही वह अपने अंशी-(परमात्मा-) के नित्य-सम्बन्धको भूल गया है। अतः भूल मिटनेपर ‘मैं भगवान्का ही हूँ’—इस वास्तविकताकी स्मृति प्राप्त हो जाती है। इसी बातपर भगवान् कहते हैं कि उस परमपद-(परमात्मा-) से नित्य-सम्बन्ध पहलेसे ही विद्यमान है।
केवल उसकी खोज करनी है। संसारको अपना माननेसे नित्यप्राप्त परमात्मा अप्राप्त दीखने लग जाता है और अप्राप्त संसार प्राप्त दीखने लग जाता है। इसलिये परमपद-(परमात्मा-) को ‘तत्’ पदसे लक्ष्य करके भगवान् कहते हैं कि जो परमात्मा नित्यप्राप्त है, उसीकी पूरी तरह खोज करनी है। खोज उसीकी होती है, जिसका अस्तित्व पहलेसे ही
श्लोक ४ ]
- साधक-संजीवनी *
१६३
होता है। परमात्मा अनादि और सर्वत्र परिपूर्ण हैं। अतः यहाँ खोज करनेका मतलब यह नहीं है कि किसी साधन-विशेषके द्वारा परमात्माको ढूँढ़ना है। जो संसार (शरीर, परिवार, धनादि) कभी अपना था नहीं, है नहीं, होगा नहीं उसका आश्रय न लेकर, जो परमात्मा सदासे ही अपने हैं, अपनेमें हैं और अभी हैं, उनका आश्रय लेना ही उनकी खोज करना है।
साधकको साधन-भजन करना तो बहुत आवश्यक है; क्योंकि इसके समान कोई उत्तम काम नहीं है; किंतु ‘परमात्मतत्त्वको साधन-भजनके द्वारा प्राप्त कर लेंगे’—ऐसा मानना ठीक नहीं; क्योंकि ऐसा माननेसे अभिमान बढ़ता है, जो परमात्मप्राप्तिमें बाधक है। परमात्मा कृपासे मिलते हैं। उनको किसी साधनसे खरीदा नहीं जा सकता। साधनसे केवल असाधन- (संसारसे तादात्म्य, ममता और कामनाका सम्बन्ध अथवा परमात्मासे विमुखता-) का नाश होता है, जो अपने द्वारा ही किया हुआ है। अतः साधनका महत्त्व असाधनको मिटानेमें ही समझना चाहिये। असाधनको मिटानेकी सच्ची लगन हो, तो असाधनको मिटानेका बल भी परमात्माकी कृपासे मिलता है।
साधकोंके अन्तःकरणमें प्रायः एक दृढ़ धारणा बनी हुई है कि जैसे उद्योग करनेसे संसारके पदार्थ प्राप्त होते हैं, ऐसे ही साधन करते-करते (अन्तःकरण शुद्ध होनेपर) ही परमात्माकी प्राप्ति होती है। परन्तु वास्तवमें यह बात नहीं है; क्योंकि परमात्मप्राप्ति किसी भी कर्म (साधन, तपस्यादि)-का फल नहीं है, चाहे वह कर्म कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो। कारण कि श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ कर्मका भी आरम्भ और अन्त होता है; अतः उस कर्मका फल नित्य कैसे होगा? कर्मका फल भी आदि और अन्तवाला होता है। इसलिए नित्य परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति किसी कर्मसे नहीं होती। वास्तवमें त्याग, तपस्या आदिसे जड़ता-(संसार और शरीर-) से सम्बन्ध-विच्छेद ही होता है, जो भूलसे माना हुआ है। सम्बन्ध-विच्छेद होते ही जो तत्त्व सर्वत्र है, सदा है, नित्यप्राप्त है, उसकी अनुभूति हो जाती है—उसकी स्मृति जाग्रत् हो जाती है।
अर्जुन भी पूरा उपदेश सुननेके बाद अन्तमें कहते हैं—‘स्मृतिर्लब्धा’ (१८।७३) ‘मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है।’ यद्यपि विस्मृति भी अनादि है, तथापि वह अन्त होनेवाली है। संसारकी स्मृति और परमात्माकी स्मृतिमें बहुत अन्तर है। संसारकी स्मृतिके बाद विस्मृतिका होना सम्भव है;
जैसे—पक्षाघात (लकवा) होनेपर पढ़ी हुई विद्याकी विस्मृति होना सम्भव है। इसके विपरीत परमात्माकी स्मृति एक बार हो जानेपर फिर कभी विस्मृति नहीं होती (गीता—दूसरे अध्यायका बहतर्वा और चौथे अध्यायका पैतौसर्वा श्लोक); जैसे—पक्षाघात होनेपर अपनी सत्ता (‘मैं हूँ’)-की विस्मृति नहीं होती। कारण यह है कि संसारके साथ कभी सम्बन्ध होता नहीं और परमात्मासे कभी सम्बन्ध छूटता नहीं।
शरीर, संसारसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है—इस तत्त्वका अनुभव करना ही संसारवृक्षका छेदन करना है और मैं परमात्माका अंश हूँ—इस वास्तविकतामें हरदम स्थित रहना ही परमात्माकी खोज करना है। वास्तवमें संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होते ही नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वकी अनुभूति हो जाती है।
‘यस्मिन्नाता न निवर्तन्ति भूयः’—जिसे पहले श्लोकमें ‘ऊर्ध्वमूलम्’ पदसे तथा इस श्लोकमें ‘आद्यं पुरुषम्’ पदोंसे कहा गया है; और आगे छठे श्लोकमें जिसका विस्तारसे वर्णन हुआ है, उसी परमात्मतत्त्वका निर्देश यहाँ ‘यस्मिन्’ पदसे किया गया है।
जैसे जलकी बूँद समुद्रमें मिल जानेके बाद पुनः समुद्रसे अलग नहीं हो सकती, ऐसे ही परमात्माका अंश (जीवात्मा) परमात्माको प्राप्त हो जानेके बाद फिर परमात्मासे अलग नहीं हो सकता अर्थात् पुनः लौटकर संसारमें नहीं आ सकता। ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण प्रकृति अथवा उसके कार्य गुणोंका संग ही है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। अतः जब साधक असंगशस्त्रके द्वारा गुणोंके संगका सर्वथा छेदन (असत्के सम्बन्धका सर्वथा त्याग) कर देता है, तब उसका पुनः कहीं जन्म लेनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता।
‘यतः प्रवृत्तिः प्रमुता पुराणी’—सम्पूर्ण सृष्टिके रचयिता एक परमात्मा ही हैं। वे ही इस संसारके आश्रय और प्रकाशक हैं। मनुष्य भ्रमवश सांसारिक पदार्थोंमें सुखोंको देखकर संसारकी तरफ आकर्षित हो जाता है और संसारके रचयिता-(परमात्मा-)को भूल जाता है। परमात्माका रचा हुआ संसार भी जब इतना प्रिय लगता है, तब (संसारके रचयिता) परमात्मा कितने प्रिय लगने चाहिये! यद्यपि रची हुई वस्तुमें आकर्षणका होना एक प्रकारसे रचयिताका ही आकर्षण है (गीता—दसवें अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक), तथापि मनुष्य अज्ञानवश
९६४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
उस आकर्षणमें परमात्माको कारण न मानकर संसारको ही कारण मान लेता है और उसीमें फँस जाता है।
प्राणिमात्रका यह स्वभाव है कि वह उसीका आश्रय लेना चाहता है और उसीकी प्राप्तिमें जीवन लगा देना चाहता है, जिसको वह सबसे बढ़कर मानता है अथवा जिससे उसे कुछ प्राप्त होनेकी आशा रहती है। जैसे संसारमें लोग रुपयोंको प्राप्त करनेमें और उनका संग्रह करनेमें बड़ी तत्परतासे लगते हैं, क्योंकि उनको रुपयोंसे सम्पूर्ण मनचाही वस्तुओंके मिलनेकी आशा रहती है। वे सोचते हैं—‘शरीरके निर्वाहकी वस्तुएँ तो रुपयोंसे मिलती ही हैं, अनेक तरहके भोग, ऐश-आरामके साधन भी रुपयोंसे प्राप्त होते हैं। इसलिये रुपये मिलनेपर मैं सुखी हो जाऊँगा तथा लोग मुझे धनी मानकर मेरा बहुत मान-आदर करेंगे।’ इस प्रकार रुपयोंको सर्वोपरि मान लेनेपर वे लोभके कारण अन्याय, पापकी भी परवाह नहीं करते। यहाँतक कि वे शरीरके आरामकी भी उपेक्षा करके रुपये कमाने तथा संग्रह करनेमें ही तत्पर रहते हैं। उनकी दृष्टिमें रुपयोंसे बढ़कर कुछ नहीं रहता। इसी प्रकार जब साधकको यह ज्ञात हो जाता है कि परमात्मासे बढ़कर कुछ भी नहीं है और उनकी प्राप्तिमें ऐसा आनन्द है, जहाँ संसारके सब सुख फीके पड़ जाते हैं (गीता—छठे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक), तब वह परमात्माको ही प्राप्त करनेके लिये तत्परतासे लग जाता है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।
‘तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये’—जिसका कोई आदि नहीं है; किन्तु जो सबका आदि है (गीता—दसवें अध्यायका दूसरा श्लोक), उस आदिपुरुष परमात्माका ही आश्रय (सहारा) लेना चाहिये। परमात्माके सिवाय अन्य कोई भी आश्रय टिकनेवाला नहीं है। अन्यका आश्रय वास्तवमें आश्रय ही नहीं है, प्रत्युत वह आश्रय लेनेवालेका ही नाश (पतन) करनेवाला है; जैसे—समुद्रमें डूबते हुए व्यक्तिके लिये मगरमच्छका आश्रय! इस मृत्यु-संसार-सागरके सभी आश्रय मगरमच्छके आश्रयकी तरह ही हैं। अतः मनुष्यको विनाशी संसारका आश्रय न लेकर अविनाशी परमात्माका ही आश्रय लेना चाहिये।
जब साधक अपना पूरा बल लगानेपर भी दोषोंको दूर
करनेमें सफल नहीं होता, तब वह अपने बलसे स्वतः निराश हो जाता है। ठीक ऐसे समयपर यदि वह (अपने बलसे सर्वथा निराश होकर) एकमात्र भगवान्का आश्रय ले लेता है, तो भगवान्की कृपाशक्तिसे उसके दोष निश्चितरूपसे नष्ट हो जाते हैं और भगवत्प्राप्ति हो जाती है*। इसलिये साधकको भगवत्प्राप्तिसे कभी निराश नहीं होना चाहिये। भगवान्की शरण लेकर निर्भय और निश्चिन्त हो जाना चाहिये। भगवान्के शरण होनेपर उनकी कृपासे विघ्नोंका नाश और भगवत्प्राप्ति—दोनोंकी सिद्धि हो जाती है (गीता—अठारहवें अध्यायका अठ्ठावनवाँ और बासठवाँ श्लोक)।
साधकको जैसे संसारके संगका त्याग करना है, ऐसे ही ‘असंगता’ के संगका भी त्याग करना है। कारण कि असंग होनेके बाद भी साधकमें ‘मैं असंग हूँ’—ऐसा सूक्ष्म अहंभाव (परिच्छिन्ना) रह सकता है, जो परमात्माके शरण होनेपर ही सुगमतापूर्वक मिट सकता है। परमात्माके शरण होनेका तात्पर्य है—अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहम् (मैं-पन), धन, परिवार, मकान आदि सब-के-सब पदार्थोंको परमात्माके अर्पण कर देना अर्थात् उन पदार्थोंसे अपनापन सर्वथा हटा लेना!
शरणागत भक्तमें दो भाव रहते हैं—‘मैं भगवान्का हूँ’ और ‘भगवान् मेरे हैं।’ इन दोनोंमें भी ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान्के लिये हूँ’—यह भाव ज्यादा उत्तम है। कारण कि ‘भगवान् मेरे हैं और मेरे लिये हैं’—इस भावमें अपने लिये भगवान्से कुछ चाह रहती है; अतः साधक भगवान्से अपनी मनचाही कराना चाहेगा। परन्तु ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान्के लिये हूँ’—इस भावमें केवल भगवान्की मनचाही होगी। इस प्रकार साधकमें अपने लिये कुछ भी करने और पानेका भाव न रहना ही वास्तवमें अनन्य शरणागति है। इस अनन्य शरणागतिसे उसका भगवान्के प्रति वह अनिवर्चनीय और अलौकिक प्रेम जाग्रत् हो जाता है जो क्षति, पूर्ति और निवृत्तिसे रहित है, जिसमें अपने प्रियके मिलनेपर भी तृप्ति नहीं होती और वियोगमें भी अभाव नहीं होता; जो प्रतिक्रियन बढ़ता रहता है; जिसमें असीम-अपार आनन्द है, जिससे आनन्ददाता भगवान्को भी आनन्द मिलता है। तत्त्वज्ञान होनेके बाद जो प्रेम प्राप्त होता है, वही प्रेम अनन्य शरणागतिसे भी प्राप्त हो जाता है।
- जब लिंग गज बल अपने बरत्यो, नेक सरयो नहिं काम॥
निरबल है बलराम पुकार्यो आये आधे नाम।
सुने री मैंने निरबल के बल राम॥
श्लोक ४ ]
- साधक-संजीवनी *
९६५
'एव' पदका तात्पर्य है कि दूसरे सब आश्रयोंका त्याग
करके एकमात्र भगवान्का ही आश्रय ले। यही भाव गीतामें
'मामेव ये प्रपद्यन्ते' (७। १४), 'तमेव शरणं गच्छ'
(१८। ६२) और 'मामेकं शरणं व्रज' (१८। ६६)
पदोंमें भी आया है।
'प्रपद्ये' कहनेका अर्थ है - 'मैं शरण हूँ।' यहाँ शंका
हो सकती है कि भगवान् कैसे कहते हैं कि 'मैं शरण हूँ'?
क्या भगवान् भी किसीके शरण होते हैं? यदि शरण होते
हैं तो किसके शरण होते हैं? इसका समाधान यह है कि
भगवान् किसीके शरण नहीं होते; क्योंकि वे सर्वोपरि हैं।
केवल लोकशिक्षाके लिये भगवान् साधककी भाषामें
बोलकर साधकको यह बताते हैं कि वह 'मैं शरण हूँ'
ऐसी भावना करे।
'परमात्मा है' और 'मैं (स्वयं) हूँ' - इन दोनोंमें 'है'
के रूपमें एक ही परमात्मसत्ता विद्यमान है। 'मैं' के साथ
होनेसे ही 'है' का 'हूँ' में परिवर्तन हुआ है। यदि 'मैं'-
रूप एकदेशीय स्थितिको सर्वदेशीय 'है' में विलीन कर
दें, तो 'है' ही रह जायगा, 'हूँ' नहीं रहेगा। जबतक
'स्वयं' के साथ बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ, शरीर आदिका सम्बन्ध
मानते हुए 'हूँ' बना हुआ है, तबतक व्यभिचार-दोष होनेके
कारण अनन्य शरणागति नहीं है।
परमात्माका अंश होनेके कारण जीव वास्तवमें सदा
परमात्माके ही आश्रित रहता है; परन्तु परमात्मासे विमुख
होनेके बाद (आश्रय लेनेका स्वभाव न छूटनेके कारण)
वह भूलसे नाशवान् संसारका आश्रय लेने लगता है, जो
कभी टिकता नहीं। अतः वह दुःख पाता रहता है। इसलिये
साधकको चाहिये कि वह परमात्मासे अपने वास्तविक
सम्बन्धको पहचानकर एकमात्र परमात्माके शरण हो जाय।
परिशिष्ट भाव - संसार नित्यनिवृत्त है, इसलिये उसका त्याग होता है - 'असंगशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा' और
परमात्मा नित्यप्राप्त हैं, इसलिये उनकी खोज होती है - 'ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्'। निर्माण और खोज - दोनोंमें
बहुत अन्तर है। निर्माण उस वस्तुका होता है, जिसका पहलेसे अभाव होता है और खोज उस वस्तुकी होती है, जो
पहलेसे ही विद्यमान होती है। परमात्मा नित्यप्राप्त और स्वतःसिद्ध हैं, इसलिये उनकी खोज होती है, निर्माण नहीं
होता। जब साधक परमात्माकी सत्ताको स्वीकार करता है, तब खोज होती है। खोज करनेके दो प्रकार हैं - एक
तो कण्ठी कहीं रखकर भूल जायँ तो हम जगह-जगह उसकी खोज करते हैं और दूसरा, कण्ठी गलेमें ही हो, पर
वहम हो जाय कि कण्ठी खो गयी तो हम जगह-जगह उसकी खोज करते हैं। परमात्माकी खोज गलेमें पड़ी कण्ठीकी
खोजके समान है। वास्तवमें परमात्मा खोया नहीं है। संसारमें अपने रागके कारण परमात्माकी तरफ दृष्टि नहीं जाती।
उधर दृष्टि न जाना ही उसका खोना है। तात्पर्य है कि जिस परमात्माको हम चाहते हैं और जिसकी हम खोज करते
हैं, वह परमात्मा नित्य-निरन्तर अपनेमें ही मौजूद है! परन्तु संसार अपनेमें नहीं है। जो अपनेमें है, उसकी खोज
करनेसे परिणाममें वह मिल जाता है। परन्तु जो अपनेमें नहीं है, उसकी खोज करनेसे परिणाममें वह मिलता नहीं;
क्योंकि वास्तवमें उसकी सत्ता ही नहीं है।
परमात्मा कभी अप्राप्त हुए ही नहीं, अप्राप्त हैं ही नहीं, अप्राप्त होना सम्भव ही नहीं। उनकी अप्राप्ति नहीं हुई है,
प्रत्युत विस्मृति हुई है। यह विस्मृति अनादि और सान्त (अन्त होनेवाली) है। जैसे दो व्यक्ति आपसमें एक-दूसरेको पहचानते
नहीं तो यह अपरिचय कबसे है - इसको कोई बता नहीं सकता। हम संस्कृत भाषाको नहीं जानते तो यह अनजानपना कबसे
है - इसको हम बता नहीं सकते। तात्पर्य है कि व्यक्तियोंकी सत्ता, हमारी सत्ता, संस्कृत भाषाकी सत्ता तो पहलेसे ही है,
पर उनका परिचय पहलेसे नहीं है। ऐसे ही विस्मृतिके समय भी परमात्माकी सत्ता ज्यों-की-त्यों है। परमात्मा तो नित्यप्राप्त
हैं, पर उनकी विस्मृति है अर्थात् उधर दृष्टि नहीं है, उनसे विमुखता है, उनसे अपरिचय है, उनकी अप्राप्तिका वहम है!
परमात्माकी खोज करनेपर यह विस्मृति मिट जाती है और उनकी प्राप्ति हो जाती है। परमात्माकी खोज करनेका उपाय
है - जो मौजूद नहीं है, उसको छोड़ते जाना - 'असंगशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।' छोड़नेका तात्पर्य है - उसकी सत्ता और महत्ता
न मानकर उससे सम्बन्ध न जोड़ना, उसको अस्वीकार करना। अतः संसारके त्यागमें ही परमात्माकी खोज निहित है।
श्रीमद्भागवतमें आया है - 'अतस्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्तः' (१०। १४। २८)।
'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' - संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर भावरूप स्वरूपमें स्थिति हो जाती है और साधक
मुक्त हो जाता है। मुक्त होनेपर संसारकी कामना तो मिट जाती है, पर प्रेमकी भूख नहीं मिटती। ब्रह्मसूत्रमें आया है -
'मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्' (१। ३। २)। 'उस प्रेमस्वरूप भगवान्को मुक्त पुरुषोंके लिये भी प्राप्तव्य बताया गया है।'
तात्पर्य है कि स्वरूप जिसका अंश है, उस अंशी (परमात्मा)-के प्रेमकी प्राप्तिमें ही मानव-जीवनकी पूर्णता है। स्वरूपमें
१६६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
निजानन्द (अखण्ड आनन्द) है और अंशोंमें परमानन्द (अनन्त आनन्द) है। जो मुक्तिकमें नहीं अटकता, उसमें सन्तोष नहीं करता, उसको प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी प्राप्ति होती है—‘मद्वृत्तिं लभते पराम् ’ (गीता १८।५४)। इसीलिये भगवान्ने संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करने अर्थात् मुक्त होनेके बाद परमात्माकी खोज करके उनकी शरण ग्रहण करनेकी बात कही है।
सम्बन्ध—जो महापुरुष आदिपुरुष परमात्माके शरण होकर परमपदको प्राप्त होते हैं, उनके लक्षणोंका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्जैर्गच्छन्त्यमूहाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥
| निर्मानमोहाः = जो मान और मोहसे रहित हो गये हैं, | विनिवृत्तकामाः = जो (अपनी दृष्टिसे) सम्पूर्ण कामनाओंसे रहित हो गये हैं, | अमूहाः = (ऊँची स्थितिवाले) मोहरहित साधक |
|---|---|---|
| जितसङ्गदोषाः = जिन्होंने आसक्तिसे होनेवाले दोषोंको जीत लिया है, | सुखदुःखसञ्जैः = जो सुख-दुःख नामवाले | भक्त |
| अध्यात्मनित्याः = जो नित्य- निरन्तर परमात्मामें ही लगे हुए हैं, | द्वन्द्वैः = द्वन्द्वोंसे | तत् = उस |
| विमुक्ताः = मुक्त हो गये हैं, (ऐसे) | अव्ययम् = अविनाशी | |
| पदम् = परमपद (परमात्मा)- को | ||
| गच्छन्ति = प्राप्त होते हैं। |
व्याख्या—‘निर्मानमोहाः’ —शरीरमें मैं-मेरापन होनेसे ही मान, आदर-सत्कारकी इच्छा होती है। शरीरसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही मनुष्य शरीरके मान-आदरको भूलसे स्वयंका मान-आदर मान लेता है और फँस जाता है। जिन भक्तोंका केवल भगवान्में ही अपनापन होता है, उनका शरीरमें मैं-मेरापन नहीं रहता; अतः वे शरीरके मान-आदरसे प्रसन्न नहीं होते। एकमात्र भगवान्के शरण होनेपर उनका शरीरसे मोह नहीं रहता, फिर मान-आदरकी इच्छा उनमें हो ही कैसे सकती है?
केवल भगवान्का ही उद्देश्य, ध्येय होनेसे और केवल भगवान्के ही शरण, परायण रहनेसे वे भक्त संसारसे विमुख हो जाते हैं। अतः उनमें संसारका मोह नहीं रहता।
‘जितसंगदोषाः’ —‘भगवान्में आकर्षण होना ‘प्रेम’ और संसारमें आकर्षण होना ‘आसक्ति’ कहलाती है। ममता, स्मृहा, वासना, आशा आदि दोष आसक्तिके कारण ही होते हैं। केवल भगवान्के ही परायण होनेके कारण भक्तोंकी सांसारिक भोगोंमें आसक्ति नहीं रहती। आसक्ति न रहनेके कारण भक्त आसक्तिसे होनेवाले ममता आदि
दोषोंको जीत लेते हैं।
आसक्ति प्राप्त और अप्राप्त—दोनोंकी होती है; किन्तु कामना अप्राप्तकी ही होती है। इसलिये इस श्लोकमें ‘विनिवृत्तकामाः ’ पद अलगसे आया है।
‘अध्यात्मनित्याः’ —केवल भगवान्के ही शरण रहनेसे भक्तोंकी अहंता बदल जाती है। मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं, मैं संसारका नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है—इस प्रकार अहंता बदलनेसे उनकी स्थिति निरन्तर भगवान्में ही रहती है*। कारण कि मनुष्यकी जैसी अहंता होती है, उसकी स्थिति वहाँ ही होती है। जैसे मनुष्य जन्मके अनुसार अपनेको ब्राह्मण मानता है, तो उसकी ब्राह्मणपनकी मान्यता नित्य-निरन्तर रहती है अर्थात् वह नित्य-निरन्तर ब्राह्मणपनमें स्थित रहता है, चाहे याद करे या न करे। ऐसे ही जो भक्त अपना सम्बन्ध केवल भगवान्के साथ ही मानते हैं, वे नित्य-निरन्तर भगवान्में ही स्थित रहते हैं।
‘विनिवृत्तकामाः’ —संसारका ध्येय, लक्ष्य रहनेसे ही संसारकी वस्तु, परिस्थिति आदिकी कामना होती है अर्थात् ‘अमुक वस्तु, व्यक्ति आदि मुझे मिल जाय’—इस तरह
- यद्यपि मात्र प्राणियोंकी स्थिति निरन्तर उसी सर्वव्यापक, सर्वप्रकाशक, सर्वेश्वर भगवान्में ही रहती है, तथापि वे भूलसे अपनी स्थिति भगवान्में न मानकर संसारमें मान लेते हैं; जैसे—मैं अमुक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय, नाम, जाति आदिका हूँ। अपनी इस विपरीत मान्यताके कारण ही वे बँध जाते हैं और बार-बार जन्मते-मरते हैं।
श्लोक ५ ]
- साधक-संजीवनी *
१६७
अप्राप्तकी कामना होती है। परन्तु जिन भक्तोंका सांसारिक वस्तु आदिको प्राप्त करनेका उद्देश्य है ही नहीं, वे कामनाओंसे सर्वथा रहित हो जाते हैं।
शरीरमें ममता होनेसे कामना पैदा हो जाती है कि मेरा शरीर स्वस्थ रहे, बीमार न हो जाय; शरीर हृष्टपुष्ट रहे, कमजोर न हो जाय। इसीसे सांसारिक धन, पदार्थ, मकान आदिकी अनेक कामनाएँ पैदा होती हैं। शरीर आदिमें ममता न रहनेसे भक्तोंकी कामनाएँ मिट जाती हैं।
भक्तोंका यह अनुभव होता है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहम् (मैं-पन)—ये सभी भगवान्के ही हैं। भगवान्के सिवाय उनका अपना कुछ होता ही नहीं। ऐसे भक्तोंकी सम्पूर्ण कामनाएँ विशेष और निःशेषरूपसे नष्ट हो जाती हैं। इसलिये उन्हें यहाँ ‘विनिवृत्तकामाः’ कहा गया है।
विशेष बात
वास्तवमें शरीर आदिका वियोग तो प्रतिक्षण हो ही रहा है। साधकको प्रतिक्षण होनेवाले इस वियोगको स्वीकारमात्र करना है। इन वियुक्त होनेवाले पदार्थोंसे संयोग माननेसे ही कामनाएँ पैदा होती हैं। जन्मसे लेकर आजतक निरन्तर हमारी प्राणशक्ति नष्ट हो रही है और शरीरसे प्रतिक्षण वियोग हो रहा है। जब एक दिन शरीर मर जायगा, तब लोग कहेंगे कि आज यह मर गया। वास्तवमें देखा जाय तो शरीर आज नहीं मरा है, प्रत्युत प्रतिक्षण मरनेवाले शरीरका मरना आज समाप्त हुआ है! अतः कामनाओंसे निवृत्त होनेके लिये साधकको चाहिये कि वह प्रतिक्षण वियुक्त होनेवाले शरीरादि पदार्थोंको स्थिर मानकर उनसे कभी अपना सम्बन्ध न माने।
वास्तवमें कामनाओंकी पूर्ति कभी होती ही नहीं। जबतक एक कामना पूरी होती हुई दीखती है, तबतक दूसरी अनेक कामनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। उन कामनाओंमेंसे जब किसी एक कामनाकी पूर्ति होनेपर मनुष्यको सुख प्रतीत होता है, तब वह दूसरी कामनाओंकी पूर्तिके लिये चेष्टा करने लग जाता है। परन्तु यह नियम है कि चाहे कितने ही भोग-पदार्थ मिल जायँ, पर कामनाओंकी पूर्ति कभी हो ही नहीं सकती। कामनाओंकी पूर्तिके सुखभोगसे नयी-नयी कामनाएँ पैदा होती रहती हैं—‘जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई’। संसारके सम्पूर्ण व्यक्ति, पदार्थ एक साथ मिलकर एक व्यक्तिकी भी कामनाओंकी पूर्ति नहीं कर सकते, फिर सीमित पदार्थोंकी
कामना करके सुखकी आशा रखना महान् भूल ही है। कामनाओंके रहते हुए कभी शान्ति नहीं मिल सकती—‘स शान्तिमाप्नोति न कामकामी’ (गीता २।७०)। अतः कामनाओंकी निवृत्ति ही परम-शान्तिका उपाय है। इसलिये कामनाओंकी निवृत्ति ही करनी चाहिये, न कि पूर्तिकी चेष्टा।
सांसारिक भोग-पदार्थोंके मिलनेसे सुख होता है—यह मान्यता कर लेनेसे ही कामना पैदा होती है। यह कामना जितनी तेज होगी, उस पदार्थके मिलनेमें उतना ही सुख होगा। वास्तवमें कामनाकी पूर्तिसे सुख नहीं होता। जब मनुष्य किसी पदार्थके अभावका दुःख मानकर कामना करके उस पदार्थका मनसे सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब उस पदार्थके मिलनेपर अर्थात् उस पदार्थका मनसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर (अभावकी मान्यताका दुःख मिट जानेपर) सुख प्रतीत होता है। यदि वह पहलेसे ही कामना न करे तो पदार्थके मिलनेपर सुख और न मिलनेपर दुःख होगा ही नहीं।
मूलमें कामनाकी सत्ता है ही नहीं क्योंकि जब काम्यपदार्थकी ही स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, तब उसकी कामना कैसे रह सकती है? इसलिये सभी साधक निष्काम होनेमें समर्थ हैं।
‘द्रन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसज्ज्ञैः’—वे भक्त सुख-दुःख, हर्ष-शोक, राग-द्वेष आदि द्रन्द्वोंसे रहित हो जाते हैं। कारण कि उनके सामने अनुकूल-प्रतिकूल जो भी परिस्थिति आती है, उसको वे भगवान्का ही दिया हुआ प्रसाद मानते हैं। उनकी दृष्टि केवल भगवत्कृपापर ही रहती है, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिपर नहीं। अतः ‘जो कुछ होता है, वह हमारे प्यारे प्रभुका ही मंगलमय विधान है’—ऐसा भाव होनेसे उनके द्रन्द्व सुगमतापूर्वक मिट जाते हैं।
भगवान् सबके सुहृद् हैं—‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ (गीता ५।२९)। उनके द्वारा अपने अंश-(जीवात्मा-) का कभी अहित हो ही नहीं सकता। उनके मंगलमय विधानसे जो भी परिस्थिति हमारे सामने आती है, वह हमारे परमहितके लिये ही होती है। इसलिये भक्त भगवान्के विधानमें परम प्रसन्न रहते हैं। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिको अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिका ज्ञान होनेपर भी ‘ऐसी परिस्थिति क्यों आ गयी? ऐसी परिस्थिति आती रहे’ आदि विकार, द्रन्द्व उनमें नहीं होते।
१६८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
विशेष बात
द्रन्द् (राग-द्वेषादि) ही विषमता है, जिनसे सब प्रकारके पाप पैदा होते हैं। अतः विषमताका त्याग करनेके लिये साधकको नाशवान् पदार्थोंके माने हुए महत्त्वको अन्तःकरणसे निकाल देना चाहिये। द्रन्द्को दो भेद हैं—
(१) स्थूल (व्यावहारिक) द्रन्द्—सुख-दुःख, अनुकूलता-प्रतिकूलता आदि स्थूल द्रन्द् हैं। प्राणी सुख, अनुकूलता आदिकी इच्छा तो करते हैं, पर दुःख, प्रतिकूलता आदिकी इच्छा नहीं करते। यह स्थूल द्रन्द् मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष आदि सभीमें देखनेमें आता है।
(२) सूक्ष्म (आध्यात्मिक) द्रन्द्—यद्यपि अपनी उपासना और उपास्यको सर्वश्रेष्ठ मानकर उसको आदर (महत्त्व) देना आवश्यक एवं लाभप्रद है, तथापि दूसरोंकी उपासना और उपास्यको नीचा बताकर उसका खण्डन, निन्दा आदि करना 'सूक्ष्म द्रन्द्' है जो साधकके लिये हानिकारक है।
वास्तवमें सभी उपासनाओंका एकमात्र उद्देश्य संसार-(जडता- ) से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करना है। साधकोंकी रुचि, श्रद्धा-विश्वास और योग्यताके अनुसार उपासनाओंमें भिन्नता होती है, जिसका होना उचित भी है। अतः साधकको उपासनाओंकी भिन्नतापर दृष्टि न रखकर 'उद्देश्य'की अभिन्नतापर ही दृष्टि रखनी चाहिये। दूसरोंकी उपासनाको न देखकर अपनी उपासनामें तत्परतापूर्वक लगे रहनेसे उपासना-सम्बन्धी 'सूक्ष्म द्रन्द्' स्वतः मिट जाता है।
गीतामें 'स्थूल द्रन्द्' को 'मोहकलिलम्' (२।५२) और 'सूक्ष्म द्रन्द्' को 'श्रुतिविवप्रतिपन्ना'* (२।५३) पदोंसे कहा गया है। साधकके अन्तःकरणमें जबतक संसार-(जडता- ) का सम्बन्ध या महत्त्व रहता है, तभीतक ये द्रन्द् रहते हैं। 'स्थूल द्रन्द्' संसारको विशेषरूपसे सत्ता और महत्ता देता है। अतः 'स्थूल द्रन्द्' को मिटाना बहुत जरूरी है।
जबतक मूढ़ता रहती है, तभीतक द्रन्द् रहते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो अपनेमें द्रन्द् मानना ही मूढ़ता है। राग-द्वेष, सुख-दुःख, हर्ष-शोक आदि द्रन्द् अन्तःकरणमें होते हैं, स्वयं-(अपने स्वरूप- ) में नहीं। अन्तःकरण जड है और 'स्वयं' चेतन एवं जडका प्रकाशक है। अतः
अन्तःकरणसे 'स्वयं' का सम्बन्ध है ही नहीं। केवल मान्यतासे ही यह सम्बन्ध प्रतीत होता है।
यह सभीका अनुभव है कि सुख-दुःखादि द्रन्द्ोंके आनेपर हम तो वही रहते हैं। ऐसा नहीं होता कि सुख आनेपर हम और होते हैं तथा दुःख आनेपर और। परन्तु मूढ़तावश इन सुख-दुःखादिसे मिलकर सुखी और दुःखी होने लगते हैं। यदि हम इन आने-जानेवालोंसे न मिलकर अपने स्वरूपमें स्थित (स्वस्थ) रहें, तो सुख-दुःखादि द्रन्द्ोंसे स्वतः रहित हो जायेंगे। इसलिये साधकको बदलनेवाली अर्थात् आने-जानेवाली अवस्थाओं-(सुख-दुःख, हर्ष-शोकादि-) पर दृष्टि न रखकर कभी न बदलनेवाले अपने स्वरूपपर ही दृष्टि रखनी चाहिये, जो सब अवस्थाओंसे अतीत है।
गीतामें भगवान्ने राग-द्वेष आदि द्रन्द्ोंसे मुक्त होनेका बड़ा सुगम उपाय बताया है कि अनुकूलता-प्रतिकूलतामें राग-द्वेष छिपे हुए हैं। उनसे बचनेके लिये साधकको केवल इतनी सावधानी रखनी है कि वह इनके वशमें न हो (गीता—तीसरे अध्यायका चौंतीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि राग-द्वेष दीखनेपर भी साधक इनके वशीभूत होकर तदनुसार क्रिया न करे; क्योंकि क्रिया करनेसे ही ये पुष्ट होते हैं।
'गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्'—आने-जानेवाले पदार्थोंको प्राप्त करनेकी इच्छा या चेष्टा करना तथा उनसे सुखी-दुःखी होना 'मूढ़ता' है। वास्तवमें संसार निरन्तर परिवर्तनशील है और परमात्मा नित्य रहनेवाला है। परमात्माकी सत्तासे ही संसारकी सत्ता दीखती है। परन्तु अविनाशी परमात्मा और विनाशी संसारकी सत्ताको मिलाकर 'संसार है' ऐसा मान लेना 'मूढ़ता' है।
जिस प्रकार मूढ़ (अज्ञानी) मनुष्योंको 'संसार है' ऐसा स्पष्ट दिखायी देता है, उसी प्रकार अमूढ़ (मोहरहित) भक्तोंको 'परमात्मा है' ऐसा स्पष्ट अनुभव होता है। संसार जैसा दिखायी देता है, वैसा ही है—इस प्रकार संसारको स्थायी मान लेना 'मूढ़ता' (मोह) है। जिनकी यह मूढ़ता चली गयी, उन भक्तोंको यहाँ 'अमूढ़ाः' कहा गया है। मूढ़ता चले जानेके बाद सुख-दुःखका असर नहीं पड़ता। जिसपर सुख-दुःख आदि द्रन्द्ोंका असर नहीं पड़ता, वह
- 'श्रुतिविवप्रतिपन्ना' का अर्थ है—शास्त्रोंमें ज्ञान, कर्म और भक्ति; द्वैत, अद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत आदि सिद्धान्त; विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, शक्ति, गणेश आदि उपास्यदेव; सकाम और निष्कामभाव इत्यादि भिन्न-भिन्न विचारोंको देखकर किसी एक विचारपर अपना निश्चय या निर्णय नहीं कर सकना अर्थात् किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाना।
श्लोक ६ ]
- साधक-संजीवनी *
१६९
मुक्तिका पात्र होता है (गीता—दूसरे अध्यायका पन्द्रहवों श्लोक)। इसीलिये इस श्लोकमें भगवान्ने दो बार मूढ़ताके त्यागकी बात (‘निर्मानमोहाः’ और ‘अमूहाः’) कहकर मूढ़ताके त्यागपर विशेष जोर दिया है।
मूढ़ता अर्थात् मोह दो प्रकारका होता है—(१) परमात्माकी ओर न लगकर संसारमें ही लग जाना और (२) परमात्माको ठीक तरहसे न जानना। इस श्लोकमें पहले ‘निर्मानमोहाः’ पदसे संसारका मोह चले जानेकी बात कही है और यहाँ ‘अमूहाः’* पदसे परमात्माको ठीक तरहसे जान लेनेकी बात कही है।
जिस परमात्माको इसी अध्यायके पहले श्लोकमें ‘ऊर्ध्वमूलम्’ पदसे कहा गया तथा जिस परमपदरूप परमात्माकी खोज करनेके लिये चौथे श्लोकमें प्रेरणा की गयी और आगे छठे श्लोकमें जिसकी महिमाका वर्णन किया गया है, उसी परमात्मरूप परमपदको यहाँ ‘अव्ययम् पदम्’ कहा है। जो ऊँची स्थितिके साधक भक्त मान, मोह, ममता आदि दोषोंसे सर्वथा रहित हो जाते हैं, वे उस
अविनाशी परमपदको अवश्य प्राप्त होते हैं, जिसको प्राप्त कर लेनेपर मनुष्य लौटकर नाशवान् संसारमें नहीं आता।
वास्तवमें तो मनुष्यमात्र उस पदको स्वतः प्राप्त है, पर उधर दृष्टि न रहनेसे उसको वैसा अनुभव नहीं होता। इसे एक उदाहरणसे समझना चाहिये। हम रेलगाडीसे यात्रा कर रहे हैं। हमारी गाड़ी एक स्टेशनपर रुक जाती है। हमारी गाड़ीके पास (दूसरी पटरीपर) खड़ी हुई दूसरी गाड़ी सहसा चलने लगती है। उस समय (उस चलती हुई गाड़ीपर दृष्टि रहनेसे) भ्रमसे हमें अपनी गाड़ी चलती हुई देखने लगती है। परन्तु जब हम वहाँसे अपनी दृष्टि हटाकर स्टेशनकी तरफ देखते हैं, तब पता लगता है कि हमारी गाड़ी तो ज्यों-की-त्यों (अपने स्थानपर) खड़ी हुई है। इसी प्रकार संसारसे सम्बन्ध होनेपर मनुष्य अपनेको संसारकी तरह क्रियाशील (आने-जानेवाला) देखने लगता है। पर जब वह संसारसे दृष्टि हटाकर अपने स्वरूपको देखता है, तो उसको पता लगता है कि मैं स्वयं तो ज्यों-का-त्यों ही हूँ।
परिशिष्ट भाव —ज्ञानयोग और कर्मयोगके अन्तर्गत भक्ति नहीं आती, पर भक्तिके अन्तर्गत ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनों आ जाते हैं (गीता—दसवें अध्यायका दसवाँ-ग्यारहवाँ श्लोक)। इसीलिये यहाँ ‘अध्यात्मनित्याः’ पदसे ज्ञानयोग और ‘विनिवृत्तकामाः’ पदसे कर्मयोग ले सकते हैं।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित जिस अविनाशी पदको भक्तलोग प्राप्त होते हैं, वह अविनाशी पद कैसा है—इसका भगवान् विवेचन करते हैं।
न तद्वासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यदगत्वा न निवर्तन्ते तद्भ्राम परमं मम ॥६॥
| तत् | = उस (परमपद)-को | पावकः | = अग्नि ही | न, निवर्तन्ते | = लौटकर (संसारमें) |
|---|---|---|---|---|---|
| न | = न | भासयते | = प्रकाशित कर सकती है (और) | नहीं आते, | |
| सूर्यः | = सूर्य, | यत् | = जिसको | तत् | = वही |
| न | = न | गत्वा | = प्राप्त होकर | मम | = मेरा |
| शशाङ्कः | = चन्द्र (और) | (जीव) | परमम् | = परम | |
| न | = न | धाम | = धाम है। |
व्याख्या —[छठा श्लोक पाँचवें और सातवें श्लोकोंको जोड़नेवाला है। इन श्लोकोंमें भगवान् यह बताते हैं कि वह अविनाशी पद मेरा ही धाम है, जो मेरेसे अभिन्न है और जीव भी मेरा अंश होनेके कारण मेरेसे अभिन्न है। अतः जीवकी भी उस धाम-(अविनाशी पद-) से अभिन्नता है अर्थात् वह उस धामको नित्यप्राप्त है।
- जैसे निर्गुण तत्त्वको जाननेवाला अमूह (मोहरहित) हो जाता है (पाँचवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक), ऐसे ही सगुण-साकारको दृढ़तापूर्वक माननेवाला भी अमूह हो जाता है (दसवें अध्यायका तीसरा और पन्द्रहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।
१७०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
यद्यपि इस छठे श्लोकका बारहवें श्लोकसे घनिष्ठ सम्बन्ध है, तथापि पाँचवें और सातवें श्लोकोंको जोड़नेके लिये इसको यहाँ दिया गया है। इस श्लोकमें भगवान्ने दो खास बातें बतायी हैं—(१) उस धामको सूर्यादि प्रकाशित नहीं कर सकते (जिसका कारणरूपसे विवेचन भगवान्ने इसी अध्यायके बारहवें श्लोकमें किया है) और (२) उस धामको प्राप्त हुए जीव पुनः लौटकर संसारमें नहीं आते (जिसका कारणरूपसे विवेचन भगवान्ने इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें किया है)।]
‘न तद्द्रासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः’—दृश्य जगत्में सूर्यके समान तेजस्वी, प्रकाशस्वरूप कोई चीज नहीं है। वह सूर्य भी उस परमधामको प्रकाशित करनेमें असमर्थ है; फिर सूर्यसे प्रकाशित होनेवाले चन्द्र और अग्नि उसे प्रकाशित कर ही कैसे सकते हैं! इसी अध्यायके बारहवें श्लोकमें भगवान् स्पष्ट कहेंगे कि सूर्य, चन्द्र और अग्निमें मेरा ही तेज है। मेरेसे ही प्रकाश पाकर ये भौतिक जगत्को प्रकाशित करते हैं। अतः जो उस परमात्मतत्त्वे प्रकाश पाते हैं, उनके द्वारा परमात्मस्वरूप परमधाम कैसे प्रकाशित हो सकता है? * तात्पर्य यह है कि परमात्मतत्त्व चेतन है और सूर्य, चन्द्र तथा अग्नि जड़ (प्राकृत) हैं। ये सूर्य, चन्द्र और अग्नि क्रमशः नेत्र, मन और वाणीको प्रकाशित करते हैं। ये तीनों (नेत्र, मन और वाणी) भी जड़ ही हैं। इसलिये नेत्रोंसे उस परमात्मतत्त्वको देखा नहीं जा सकता, मनसे उसका चिन्तन नहीं किया जा सकता और वाणीसे उसका वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि जड़ तत्त्वेसे चेतन परमात्मतत्त्वको अनुभूति नहीं हो सकती। वह चेतन (प्रकाशक) तत्त्व इन सभी प्रकाशित पदार्थोंमें सदा परिपूर्ण है। उस तत्त्वमें अपनी प्रकाशकताका अभिमान नहीं है।
चेतन जीवात्मा भी परमात्माका ही अंश होनेके कारण ‘स्वयं प्रकाशस्वरूप’ है; अतः उसको भी जड़ पदार्थ (मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि) प्रकाशित नहीं कर सकते। मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि जड़-पदार्थीका उपयोग (भगवान्के
नाते दूसरोंकी सेवा करके) केवल जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेमें ही है।
एक बात ध्यान देनेकी है कि यहाँ सूर्यको ‘भगवान्’ या ‘देव’ की दृष्टिसे न देखकर केवल प्रकाश करनेवाले पदार्थीकी दृष्टिसे देखा गया है। तात्पर्य है कि सूर्य तैजस-तत्त्वोंमें श्रेष्ठ है; अतः यहाँ केवल सूर्यकी बात नहीं, प्रत्युत चन्द्र आदि सभी तैजस-तत्त्वोंकी बात चल रही है। जैसे, दसवें अध्यायके सौतीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि ‘वृष्णिवंशियोंमें मैं वासुदेव हूँ’, तो वहाँ ‘वासुदेव’का भगवान्के रूपसे वर्णन नहीं, प्रत्युत वृष्णिवंशके श्रेष्ठ पुरुषके रूपसे ही वर्णन है।
‘यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्भ्राम परमं मम’—जीव परमात्माका अंश है। वह जबतक अपने अंशी परमात्माको प्राप्त नहीं कर लेता, तबतक उसका आवागमन नहीं मिट सकता। जैसे नदियोंके जलको अपने अंशी समुद्रसे मिलनेपर ही स्थिरता मिलती है, ऐसे ही जीवको अपने अंशी परमात्मासे मिलनेपर ही वास्तविक, स्थायी शान्ति मिलती है। वास्तवमें जीव परमात्मासे अभिन्न ही है, पर संसारके (माने हुए) संगके कारण उसको ऊँच-नीच योनियोंमें जाना पड़ता है।
यहाँ ‘परमधाम’ शब्द परमात्माका धाम और परमात्मा—दोनोंका ही वाचक है। यह परमधाम प्रकाशस्वरूप है। जैसे सूर्य अपने स्थान-विशेषपर भी स्थित है और प्रकाशरूपसे सब जगह भी स्थित है अर्थात् सूर्य और उसका प्रकाश परस्पर अभिन्न हैं, ऐसे ही परमधाम और सर्वव्यापी परमात्मा भी परस्पर अभिन्न हैं।
भक्तोंकी भिन्न-भिन्न मान्यताओंके कारण ब्रह्मलोक, साकेत धाम, गोलीक धाम, देवीद्वीप, शिवलोक आदि सब एक ही परमधामके भिन्न-भिन्न नाम हैं। यह परमधाम चेतन, ज्ञानस्वरूप, प्रकाशस्वरूप और परमात्मस्वरूप है।
यह अविनाशी परमपद आत्मरूपसे सबमें समानरूपसे अनुस्यूत (व्याप्त) है। अतः स्वरूपसे हम उस परमपदमें
- (१) न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥
(कठेपनिषद् २।२।१५; मुण्डकोपनिषद् २।२।१०; श्वेताश्वतरोपनिषद् ६।१४)
‘उस परमात्माको सूर्य प्रकाशित नहीं करता, चन्द्र और तारे प्रकाशित नहीं करते, विद्युत् भी प्रकाशित नहीं करती, फिर यह अग्नि उसे कैसे प्रकाशित करेगी? यह सम्पूर्ण जगत् उस परमात्माके प्रकाशसे ही प्रकाशित होता है।’
(२) ‘जगत प्रकास्य प्रकासक राम्।’ (मानस १।११७।४)
श्लोक ६ ]
- साधक-संजीवनी *
१७१
स्थित हैं ही; परन्तु जड़ता-(शरीर आदि-) से तादात्म्य, | उसमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव नहीं हो सकता और कामनाके कारण हमें उसकी प्राप्ति अथवा | रहा है।
परिशिष्ट भाव— हम भगवान्के अंश हैं—‘ममैवांशो जीवलोकै ’ (गीता १५।७)। इसलिये भगवान्का जो धाम है, वही हमारा धाम है। इसी कारण उस धामकी प्राप्ति होनेपर फिर लौटकर संसारमें नहीं आना पड़ता। जबतक हम अपने उस धाममें नहीं जायेंगे, तबतक हम मुसाफिरकी तरह अनेक योनियोंमें और अनेक लोकोंमें घूमते ही रहेंगे, कहीं भी ठहर नहीं सकेंगे। अगर हम ऊँचे-से-ऊँचे ब्रह्मलोकमें भी चले जायें तो वहाँसे भी लौटकर आना पड़ेगा—‘आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ’ (गीता ८।१६)। कारण कि यह सम्पूर्ण संसार (मात्र ब्रह्माण्ड) परदेश है, स्वदेश नहीं। यह पराया घर है, अपना घर नहीं। विभिन्न योनियोंमें और लोकोंमें हमारा घूमना, भटकना तभी बन्द होगा, जब हम अपने असली घरमें पहुँच जायेंगे।
परमपदको प्राप्त होकर फिर लौटकर संसारमें न आनेकी बात गीतामें तीन जगह कही गयी है—
१-यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्द्वाम परमं मम। (८।२१)
२-ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्नाता न निवर्तन्ति भूयः। (१५।४)
३-यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्द्वाम परमं मम। (१५।६)
भगवान्ने ज्ञानमार्गमें तो अपुनरावृत्तिकी प्राप्ति बतायी है—‘गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्पसाः ’ (गीता ५।१७), पर भक्तिमार्गमें अपने धामकी प्राप्ति बतायी है—यह भक्तिकी विशेषता है! भगवान्के धाममें प्रेमका विशेष आस्वादन होता है।
परमपदको न तो आधिभौतिक प्रकाश (सूर्य, चन्द्र आदि) प्रकाशित कर सकता है और न आधिदैविक प्रकाश (नेत्र, मन, बुद्धि, वाणी आदि) ही प्रकाशित कर सकता है। कारण कि यह स्वयंप्रकाश है। इसमें प्रकाश्य-प्रकाशकका भेद नहीं है।
‘गत्वा ’ में गति है, प्रवृत्ति नहीं; क्योंकि अंशकी अंशीकी ओर गति होती है, प्रवृत्ति नहीं। प्रवृत्ति तो परतः होती है, पर गति स्वतः होती है।
गति और प्रवृत्ति— गति स्वतः-स्वाभाविक होती है और उसमें परिश्रम (प्रयत्न), उद्योग तथा कर्तृत्व नहीं होता। परन्तु प्रवृत्ति अस्वाभाविक और श्रमसाध्य, उद्योगसाध्य तथा कर्तृत्वसहित होती है। प्रवृत्ति तो अहंकारयुक्त होनेपर होती है, पर गति अहंकाररहित होनेपर होती है। इसलिये गति ‘स्व’ की तरफ होती है और प्रवृत्ति ‘पर’ की तरफ होती है। गति परमात्माकी तरफ होती है और प्रवृत्ति संसारकी तरफ होती है। गति चिन्मयताकी तरफ होती है और प्रवृत्ति जड़ताकी तरफ होती है। गति असौमकी तरफ ले जाती है और प्रवृत्ति सौमितकी तरफ ले जाती है। गति स्वाधीन करती है और प्रवृत्ति पराधीन करती है। भोग तथा संग्रहका सुख चाहनेपर प्रवृत्ति होती है और दूसरेको सुख देनेपर गति होती है।
गतिका उदगम-स्थान ‘सत्’ है और प्रवृत्तिका उदगम-स्थान ‘असत्’ है। जैसे, गंगाका उदगम-स्थान गंगोत्री है। अगर गंगाको रोककर एक ऐसा बाँध बना दिया जाय, जो गंगोत्रीसे भी ऊँचा हो तो गंगाका जल स्वतः अपने उदगम-स्थान गंगोत्रीकी तरफ जायगा। इस प्रकार गंगाका अपने उदगम-स्थानकी ओर जाना ‘गति’ है। अतः गति दो तरहसे होती है—संसार (भोग और संग्रह)-की तरफ जाना बन्द करनेसे अर्थात् उससे विमुख होनेसे अथवा अपने उद्देश्य परमात्माकी तरफ जानेसे अर्थात् उनके सम्मुख होनेसे। नित्यप्राप्त परमात्माकी जो अप्राप्ति मानी है, उसका मिटना ही परमात्माकी तरफ गति होना है। गतियों परमात्मासे मानी हुई दूरी मिटती है और वास्तविक एकता प्रकट होती है।
साधकको ऐसा अनुभव होता है कि कई वर्ष पहले जैसे भाव तथा आचरण थे, वैसे अब नहीं रहे, प्रत्युत पहलेसे अधिक श्रेष्ठ हो गये तो यह साधककी गति हुई है। साधनावस्थामें जो गति होती है, उसमें अहम्का सूक्ष्म संस्कार रह सकता है, पर मुक्त होनेके बाद प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी तरफ जो गति होती है, उसमें अहम्का सूक्ष्म संस्कार भी नहीं रहता अर्थात् अहम्का अत्यन्त अभाव हो जाता है। इसका कारण यह है कि जीव परमात्मासे जितना दूर होता है, उतना ही उसमें अहंकार रहता है। स्वरूपमें स्थित होनेपर भी सूक्ष्म अहंकार रहता है, जो मुक्तियों तो बाधक नहीं होता, पर अन्य दार्शनिकोंसे मतभेद करनेवाला होता है। परमात्मासे अभिन्नता होनेपर अहंकार सर्वथा मिट जाता है।
१७२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपने परमधामका वर्णन करते हुए यह बताया कि उसको प्राप्त होकर जीव लौटकर संसारमें नहीं आते। उसके विवेचनके रूपमें अपने अंश जीवात्माको भी (परमधामकी ही तरह) अपनेसे अभिन्न बताते हुए, जीवसे क्या भूल हो रही है कि जिससे उसको नित्यप्राप्त परमात्मस्वरूप परमधामका अनुभव नहीं हो रहा है—इसका हेतुसहित वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
ममैवांशो जीवलोकं जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥
| जीवलोकं | = इस संसारमें | एव | = ही | मनःषष्ठीनि | = मन और पाँचों |
|---|---|---|---|---|---|
| जीवभूतः | = जीव बना हुआ | सनातनः | = सनातन | इन्द्रियाणि | = इन्द्रियोंको |
| आत्मा (स्वयं) | अंशः | = अंश है; (परन्तु वह) | कर्षति | = आकर्षित करता है | |
| मम | = मेरा | प्रकृतिस्थानि | = प्रकृतिमें स्थित | (अपना मान लेता है)। |
व्याख्या—‘ममैवांशो जीवलोकं जीवभूतः सनातनः’— जिनके साथ जीवकी तात्त्विक अथवा स्वरूपकी एकता नहीं है, ऐसे प्रकृति और प्रकृतिके कार्यमात्रका नाम ‘लोक’ है। तीन लोक, चौदह भुवनोंमें जीव जितनी योनियोंमें शरीर धारण करता है, उन सम्पूर्ण लोकों तथा योनियोंको ‘जीवलोक’ पदके अन्तर्गत समझना चाहिये। आत्मा परमात्माका अंश है; परन्तु प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन आदिके साथ अपनी एकता मानकर वह ‘जीव’ हो गया है—‘जीवभूतः।’ उसका यह जीवपना बनावटी है, वास्तविक नहीं। नाटकमें कोई पात्र बननेकी तरह ही यह आत्मा जीवलोकमें ‘जीव’ बनता है।
सातवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि इस सम्पूर्ण जगत्को मेरी ‘जीवभूता’ परा प्रकृतिने धारण कर रखा है अर्थात् अपरा प्रकृति-(संसार-) से वास्तविक सम्बन्ध न होनेपर भी जीवने उससे अपना सम्बन्ध मान रखा है।
भगवान् जीवके प्रति कितनी आत्मीयता रखते हैं कि उसको अपना ही मानते हैं—‘ममैवांशः।’ मानते ही नहीं, प्रत्युत जानते भी हैं। उनकी यह आत्मीयता महान् हितकारी, अखण्ड रहनेवाली और स्वतःसिद्ध है।
यहाँ भगवान् यह वास्तविकता प्रकट करते हैं कि जीव केवल मेरा ही अंश है; इसमें प्रकृतिका किंचिन्मात्र भी अंश नहीं है। जैसे सिंहका बच्चा भेड़ोंमें मिलकर अपनेको भेड़ मान ले, ऐसे ही जीव शरीरादि जड़ पदार्थोंके साथ मिलकर अपने असली चेतनस्वरूपको भूल जाता है। अतः इस भूलको मिटाकर उसे अपनेको सदा सर्वथा चेतनस्वरूप ही अनुभव करना चाहिये। सिंहका बच्चा भेड़ोंके साथ
मिलकर भी भेड़ नहीं हो जाता। जैसे कोई दूसरा सिंह आकर उसे बोध करा दे कि ‘देख! तेरी और मेरी आकृति, स्वभाव, जाति, गर्जना आदि सब एक समान हैं; अतः निश्चितरूपसे तू भेड़ नहीं, प्रत्युत मेरे—जैसा ही सिंह है।’ ऐसे ही भगवान् यहाँ ‘मम एव’ पदोंसे जीवको बोध कराते हैं कि हे जीव! तू मेरा ही अंश है। प्रकृतिके साथ तेरा सम्बन्ध कभी हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं।
भगवत्प्राप्तिके सभी साधनोंमें ‘अहंता’ (मैं-पन) और ‘ममता’-(मेरा-पन-) का परिवर्तन-रूप साधन बहुत सुगम और श्रेष्ठ है। अहंता और ममता—दोनोंमें साधककी जैसी मान्यता होती है, उसके अनुसार उसका भाव तथा क्रिया भी स्वतः होती है। साधककी ‘अहंता’ यह होनी चाहिये कि ‘मैं भगवान्का ही हूँ’ और ‘ममता’ यह होनी चाहिये कि ‘भगवान् ही मेरे हैं।’
यह सबका अनुभव है कि हम अपनेको जिस वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका मानते हैं, उसीके अनुसार हमारा जीवन बनता है। पर यह मान्यता (जैसे-मैं ब्राह्मण हूँ; मैं साधु हूँ आदि) केवल (नाटकके स्वोंगकी तरह) कर्तव्य-पालनके लिये है; क्योंकि यह सदा रहनेवाली नहीं है। परन्तु ‘मैं भगवान्का हूँ’ यह वास्तविकता सदा रहनेवाली है। ‘मैं ब्राह्मण हूँ; मैं साधु हूँ’ आदि भाव कभी हमसे ऐसा नहीं कहते कि ‘तुम ब्राह्मण हो’ या ‘तुम साधु हो।’ इसी प्रकार मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर, धन, जमीन, मकान आदि जिन पदार्थोंको हम भूलसे अपना मान रहे हैं, वे हमें कभी भी ऐसा नहीं कहते कि तुम हमारे हो, पर सम्पूर्ण सृष्टिके रचयिता परमात्मा स्पष्ट घोषणा करते हैं कि जीव मेरा ही है!
श्लोक ७ ]
- साधक-संजीवनी *
१७३
विचार करना चाहिये कि शरीरादि पदार्थोंको हम अपने साथ लाये नहीं, इच्छानुसार उनमें परिवर्तन कर सकते नहीं, इच्छानुसार उनको अपने पास स्थिर रख सकते नहीं, हम भी उनके साथ सदा रह सकते नहीं, उनको अपने साथ ले जा सकते नहीं, फिर भी उनको अपना मानते हैं—यह हमारी कितनी बड़ी भूल है!
बचपनमें हमारे मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर जैसे थे, वैसे अब नहीं हैं, सब-के-सब बदल गये हैं, फिर भी हम 'मैं जो बचपनमें था, वही अब हूँ' ऐसा मानते हैं। कारण यही है कि शरीरादिमें परिवर्तन होनेपर भी हमारेमें परिवर्तन नहीं हुआ। इस प्रकार शरीरादिमें हमें स्पष्ट परिवर्तन दीखता है। जिसको परिवर्तन दीखता है, वह स्वयं परिवर्तनरहित होता ही है। अतः संसारके पदार्थ, व्यक्ति हमारे साथी नहीं हैं।
'मैं भगवान्का हूँ'—ऐसा भाव रखना अपने-आपको भगवान्में लगाना है। साधकोंसे भूल यही होती है कि वे अपने-आपको भगवान्में न लगाकर मन-बुद्धिको भगवान्में लगानेकी कोशिश करते हैं। 'मैं भगवान्का हूँ'—इस वास्तविकताको भूलकर 'मैं ब्राह्मण हूँ; मैं साधु हूँ' आदि भी मानते रहें और मन-बुद्धिको भगवान्में लगाते रहें तो यह दुविधा कभी मिटेगी नहीं और बहुत प्रयत्न करनेपर भी मन-बुद्धि जैसे भगवान्में लगने चाहिये, वैसे लगेंगे नहीं। भगवान्ने भी इस अध्यायके चौथे श्लोकमें 'मैं उस परमात्मके शरण हूँ' पदोंसे अपने-आपको परमात्मामें लगानेकी बात ही कही है। गोस्वामी तुलसीदासजी भी कहते हैं कि पहले भगवान्का होकर फिर नाम-जप आदि साधन करें तो अनेक जन्मोंकी बिगड़ी हुई स्थिति आज अभी सुधर सकती है—
बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु। होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु॥
(दोहावली २२)
तात्पर्य यह है कि भगवान्में केवल मन-बुद्धि लगानेकी अपेक्षा अपने-आपको भगवान्में लगाना श्रेष्ठ है। अपने-आपको भगवान्में लगानेसे मन-बुद्धि स्वतः सुगमतापूर्वक भगवान्में लग जाते हैं। नाटकका पात्र हजारों दर्शकोंके सामने यह कहता है कि 'मैं रावणका बेटा मेघनाद हूँ' और मेघनादकी तरह ही वह बाहरी सब क्रियाएँ करता है। परन्तु उसके भीतर यह भाव हरदम रहता है कि यह तो स्वॉंग है; वास्तवमें मैं मेघनाद हूँ ही नहीं। इसी तरह साधकोंको भी
नाटकके स्वॉंगकी तरह इस संसाररूपी नाट्यशालामें अपने-अपने कर्तव्यका पालन करते हुए भीतरसे 'मैं तो भगवान्का हूँ' ऐसा भाव हरदम जाग्रत् रखना चाहिये।
जीव सदासे ही भगवान्का है—'सनातनः।' भगवान्ने न तो कभी जीवका त्याग ही किया, न कभी उससे विमुख हो हुए। जीव भी भगवान्का त्याग नहीं कर सकता। भगवान्के द्वारा मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके वह भगवान्से विमुख हुआ है। जिस प्रकार सोनेका गहना तत्त्वतः सोनेसे अलग नहीं हो सकता, उसी प्रकार जीव भी तत्त्वतः परमात्मासे कभी अलग नहीं हो सकता।
बुद्धिमान् कहलानेवाले मनुष्यकी यह बहुत बड़ी भूल है कि वह अपने अंशी भगवान्से विमुख हो रहा है। वह इधर खयाल ही नहीं करता कि भगवान् इतने सुहृद (दयालु और प्रेमी) हैं कि हमारे न चाहनेपर भी हमें चाहते हैं, न जाननेपर भी हमें जानते हैं। वे कितने उदार, दयालु और प्रेमी हैं—इसका वर्णन भाषा, भाव, बुद्धि आदिके द्वारा हो ही नहीं सकता। ऐसे सुहृद भगवान्को छोड़कर अन्य नाशवान् जड़ पदार्थोंको अपना मानना बुद्धिमानी नहीं, प्रत्युत महान् मूर्खता है।
जब मनुष्य भगवान्के आज्ञानुसार अपने कर्तव्यका पालन करता है, तब वे उसकी इतनी उन्नति कर देते हैं कि जीवन सफल हो जाता है और जन्म-मरणरूप बन्धन सदाके लिये मिट जाता है। जब मनुष्य भूलसे कोई निषिद्ध आचरण (पाप) कर बैठता है, तब वे दुःखोंको भेजकर उसको चेताते हैं, पुराने पापोंको भुगताकर उसको शुद्ध करते हैं और नये पापोंमें प्रवृत्तिसे रोकते हैं।
जीव कहीं भी क्यों न हो, नरकमें हो अथवा स्वर्गमें, मनुष्ययोनियें हो अथवा पशुयोनियें, भगवान् उसको अपना ही अंश मानते हैं। यह उनकी कितनी अहेतुकी कृपा, उदारता और महत्ता है! जीवके पतनको देखकर भगवान् दुःखी होकर कहते हैं कि मेरे पास आनेका उसका पूरा अधिकार था, पर वह मेरेको प्राप्त किये बिना ('माम् अप्राप्य ') नरकोंमें जा रहा है (गीता—सोलहवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक)।
मनुष्य चाहे किसी भी स्थितिमें क्यों न हो, भगवान् उसे वहाँ स्थिर नहीं रहने देते; उसे अपनी ओर खींचते ही रहते हैं। जब हमारी सामान्य स्थितिमें कुछ भी परिवर्तन (सुख-दुःख, आदर-निरादर आदि) हो, तब यह मानना चाहिये कि भगवान् हमें विशेषरूपसे याद करके नयी
१७४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
परिस्थिति पैदा कर रहे हैं; हमें अपनी ओर खींच रहे हैं। ऐसा मानकर साधक प्रत्येक परिस्थितिमें विशेष भगवत्-कृपाको देखकर मस्त रहे और भगवान्को कभी भूलें नहीं।
अंशीको प्राप्त करनेमें अंशको कठिनाई और देरी नहीं लगती। कठिनाई और देरी इसलिये लगती है कि अंशने अपने अंशीसे विमुखा मानकर उन शरीरादिको अपना मान रखा है, जो अपने नहीं हैं। अतः भगवान्के सम्मुख होते ही उनकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है। सम्मुख होना जीवका काम है; क्योंकि जीव ही भगवान्से विमुख हुआ है। भगवान् तो जीवको अपना मानते ही हैं; जीव भगवान्को अपना मान ले—यही सम्मुखता है।
मनुष्यसे यह बड़ी भारी भूल हो रही है कि जो व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति अभी नहीं है अथवा जिसका मिलना निश्चित भी नहीं है और जो मिलनेपर भी सदा नहीं रहेगी—उसकी प्राप्तिमें वह अपना पूर्ण पुरुषार्थ और उन्नति मानता है। यह मनुष्यका अपने साथ बड़ा भारी धोखा है! वास्तवमें जो नित्यप्राप्त और अपना है, उस परमात्माको प्राप्त करना ही मनुष्यका परम पुरुषार्थ है, शूरवीरता है। हम धन, सम्पत्ति आदि सांसारिक पदार्थ कितने ही क्यों न प्राप्त कर लें, पर अन्तमें या तो वे नहीं रहेंगे अथवा हम नहीं रहेंगे। अन्तमें ‘नहीं’ ही शेष रहेगा। वास्तवमें जो सदा ‘है’, उस—(अविनाशी परमात्मा—)को प्राप्त कर लेनेमें ही शूरवीरता है। जो ‘नहीं’ है, उसको प्राप्त करनेमें कोई शूरवीरता नहीं है।
जीव जितना ही नाशवान् पदार्थोंको महत्त्व देता है, उतना ही वह पतनकी तरफ जाता है और जितना ही अविनाशी परमात्माको महत्त्व देता है, उतना ही वह ऊँचा उठता है। कारण कि जीव परमात्माका ही अंश है।
नाशवान् सांसारिक पदार्थोंको प्राप्त करके मनुष्य कभी भी बड़ा नहीं हो सकता। केवल बड़े होनेका वहम या धोखा हो जाता है और वास्तवमें असली बड़पन—(परमात्मप्राप्ति)—से वंचित हो जाता है। नाशवान् पदार्थोंके कारण माना गया बड़पन कभी टिकता नहीं और परमात्माके कारण होनेवाला बड़पन कभी मिटता नहीं! इसलिये जीव जिसका अंश है, उस सर्वोपरि परमात्माको प्राप्त करनेसे ही वह बड़ा होता है। इतना बड़ा होता है कि देवतालोग भी उसका आदर करते हैं और कामना करते हैं कि वह हमारे लोकमें आये। इतना ही नहीं, स्वयं
भगवान् भी उसके अधीन हो जाते हैं!
‘मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’—
भगवान्ने जिस प्रकार इसी श्लोकके पूर्वार्धमें जीवको अपनेमें स्थित न कहकर उसको अपना अंश बताया है, उसी प्रकार श्लोकके उत्तरार्धमें मन तथा इन्द्रियोंको प्रकृतिका अंश न कहकर उनको प्रकृतिमें स्थित बताया है। तात्पर्य है कि भगवान्का अंश जीव सदा भगवान्में ही स्थित है और प्रकृतिमें स्थित मन तथा इन्द्रियाँ प्रकृतिके ही अंश हैं। मन और इन्द्रियोंको अपना मानना, उनसे अपना सम्बन्ध मानना ही उनको आकर्षित करना है।
यहाँ बुद्धिका अन्तर्भाव ‘मन’ शब्दमें (जो अन्तः—करणका उपलक्षण है) और पाँच कर्मैन्द्रियों तथा पाँच प्राणोंका अन्तर्भाव ‘इन्द्रिय’ शब्दमें मान लेना चाहिये। उपर्युक्त पदोंमें भगवान् कहते हैं कि मेरा अंश जीव मेरेमें स्थित रहता हुआ भी भूलसे अपनी स्थिति शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिमें मान लेता है। जैसे शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि प्रकृतिका अंश होनेसे कभी प्रकृतिसे पृथक् नहीं होते, ऐसे ही जीव भी मेरा अंश होनेसे कभी मेरेसे पृथक् होता नहीं, हो सकता नहीं। परन्तु यह जीव मेरेसे विमुख होकर मुझे भूल गया है।
यहाँ मन और पाँच ज्ञानैन्द्रियोंका नाम लेनेका तात्पर्य यह है कि इन छहोंसे सम्बन्ध जोड़कर ही जीव बँधता है। अतः साधकको चाहिये कि वह शरीर-इन्द्रियाँ—मन—बुद्धिको संसारके अर्पण कर दे अर्थात् संसारकी सेवामें लगा दे और अपने—आपको भगवान्के अर्पण कर दे।
विशेष बात
(१)
मनुष्य भूलसे शरीर, स्त्री, पुत्र, धन, मकान, मान, बड़ाई आदि नाशवान् वस्तुओंको अपनी और अपने लिये मानकर दुःखी होता है। इससे भी नीची बात यह है कि इस सामग्रीके भोग और संग्रहको लेकर वह अपनेको बड़ा मानने लगता है; जबकि वास्तवमें इनको अपना मानते ही इनका गुलाम हो जाता है। हमें पता लगे या न लगे, हम जिन पदार्थोंकी आवश्यकता समझते हैं, जिनमें कोई विशेषता या महत्त्व देखते हैं या जिनकी हम गरज रखते हैं, वे (धन, विद्या आदि) पदार्थ हमसे बड़े और हम उनसे तुच्छ हो ही गये। पदार्थोंके मिलनेमें जो अपना महत्त्व समझता है, वह वास्तवमें तुच्छ ही है, चाहे उसे पदार्थ मिलें या न मिलें।
श्लोक ७ ]
- साधक-संजीवनी *
१७५
भगवान्का दास होनेपर भगवान् कहते हैं—‘मैं तो हूँ भगतनका दास, भगत मेरे मुकुटमणि’! परंतु जिनके हम दास बने हुए हैं, वे धनादि जड़ पदार्थ कभी नहीं कहते—‘लोभी मेरे मुकुटमणि’! वे तो केवल हमें अपना दास ही बनाते हैं। वास्तवमें भगवान्को अपना जानकर उनके शरण हो जानेसे ही मनुष्य बड़ा बनता है, ऊँचा उठता है। इतना ही नहीं; भगवान् ऐसे भक्तको अपनेसे भी बड़ा मान लेते हैं और कहते हैं—
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज। साधुभिर्गस्तह्वयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः ॥
(श्रीमद्भागवत १।४।६३)
हे द्विज! मैं भक्तोंके पराधीन हूँ, स्वतन्त्र नहीं। भक्तजन मेरेको अत्यन्त प्यारे हैं। मेरे हृदयपर उनका पूर्ण अधिकार है। कोई भी सांसारिक व्यक्ति, पदार्थ क्या हमें इतनी बड़ाई दे सकता है?
यह जीव परमात्माका अंश होते हुए भी प्रकृतिके अंश शरीरादिको अपना मानकर स्वयं अपना अपमान करता है और अपनेको नीचे गिराता है। अगर मनुष्य इन शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि सांसारिक पदार्थोंका दास न बने, तो वह भगवान्का भी इष्ट हो जाय—‘इष्टोऽसि मे दृढमिति’ (गीता १८।६४)। जिन्होंने भगवान्को प्राप्त कर लिया है, उनको भगवान् अपना प्रिय कहते हैं (गीता—बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक)। परंतु जिन्होंने भगवान्को प्राप्त नहीं किया है; किंतु जो भगवान्को प्राप्त करना चाहते हैं, उन साधकोंको तो वे अपना ‘अत्यन्त प्रिय’ कहते हैं—‘भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः’ (गीता १२।२०)। ऐसे परम दयालु भगवान्को, जो साधकोंको ‘अत्यन्त प्रिय’ और सिद्ध भक्तोंको केवल ‘प्रिय’ कहते हैं, मनुष्य अपना नहीं मानता—यह उसका कितना प्रमाद है!
(२)
संसारका एक छोटा-सा अंश शरीर है और परमात्माका अंश स्वयं (जीवात्मा) है। भूल यह होती है कि परमात्माका अंश संसारके अंशके साथ मिलकर संसार और परमात्मा—दोनोंको अपने अनुकूल बनाना चाहता है! साधकका काम है—इस भूलको मिटाना। इसके लिये वह शरीरको तो संसारके अनुकूल बना दे और स्वयं परमात्माके अनुकूल बन जाय। तात्पर्य है कि शरीरको संसारपर छोड़ दे कि जैसी संसारकी मरजी हो, वैसे रखे;
और अपनेको परमात्मापर छोड़ दे कि जैसी परमात्माकी मरजी हो, वैसे रखे।
संसारकी चीज संसारको दे दे और परमात्माकी चीज परमात्माको दे दे—यह ईमानदारी है। इस ईमानदारीका नाम ही ‘मुक्ति’ है। जिसकी चीज है, उसको न दे; संसारकी चीज भी ले ले और परमात्माकी चीज भी ले ले—यह बेईमानी है। इस बेईमानीका नाम ही ‘बन्धन’ है।
संसारकी चीज संसारपर और परमात्माकी चीज परमात्मापर छोड़कर निश्चिन्त हो जाय। अपनी कोई कामना न रखे। न जीनेकी कामना रखे, न मरनेकी। भगवान् ऐसा कर देते तो ठीक रहता; भगवान् वर्षा कर देते तो ठीक रहता; गरमी ज्यादा पड़ रही है, थोड़ी कम कर देते तो अच्छा था; बाढ़ आ गयी, वर्षा कम करते तो ठीक रहता—इस तरह मनुष्य परमात्माको भी अपने अनुकूल बनाना चाहता है और संसारको भी। इस बातको छोड़कर अपने-आपको सर्वथा भगवान्के अर्पित कर दे और भगवान्से कह दे कि हे नाथ! आप मेरेको पृथ्वीपर रखें या स्वर्गमें रखें अथवा नरकोंमें रखें; बालक रखें या जवान रखें अथवा बूढ़ा रखें; अपमानित रखें या सम्मानित रखें; सुखी रखें या दुःखी रखें; जैसी परिस्थितिमें रखना चाहें, वैसे रखें, पर मैं आपको भूलूँ नहीं।
मनुष्य जिस घरको अपना मानता है, जिस कुटुम्बको अपना मानता है, जिन रूपयोंको अपना मानता है, उनकी ही चिन्ता उसको होती है। संसारमें लाखों-करोड़ों घर हैं, अरबों आदमी हैं, अनगिनत रूपये हैं, पर उनकी चिन्ता नहीं होती; क्योंकि उनको वह अपना नहीं मानता। जिनको अपना नहीं मानता, उनसे तो मुक्त है ही। अतः ज्यादा मुक्ति तो हो चुकी है, थोड़ी-सी ही मुक्ति बाकी है!
विचार करना चाहिये कि जिन थोड़ी-सी चीजोंको हम अपनी मानते हैं, वे कौन-सी सदा साथ रहनेवाली हैं! चीजें तो रहेंगी नहीं, पर बन्धन (उनका सम्बन्ध) रह जायगा, जो जन्म-जन्मान्तरतक साथ रहेगा। इसलिये साधकको चाहिये कि वह या तो शरीरको संसारके अर्पण कर दे, जो कर्मयोग है; चाहे अपनेको शरीर-संसारसे सर्वथा अलग कर ले, जो ज्ञानयोग है; और चाहे अपनेको भगवान्के अर्पण कर दे, जो भक्तियोग है। इन तीनोंमेंसे कोई भी साधन अपना ले, तीनोंका फल एक ही होगा।
१७६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
परिशिष्ट भाव —यहाँ भगवान्ने जिसको अपना अंश कहा है, उसीको सातवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें अपनी 'परा प्रकृति' कहा है। इसलिये दोनों ही जगह 'जीवभूत' (जीव बना हुआ) शब्द आया है—'जीवभूतः', 'जीवभूताम्'। परा और अपरा—दोनों भगवान्की शक्तियाँ हैं (गीता—सातवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)। जबसे पराकी दृष्टि भगवान्से हटकर अपराकी तरफ चली गयी, तबसे परा जन्म-मरणके चक्रमें पड़ गयी। इसी बातको सातवें अध्यायमें 'यथेदं धार्यते जगत्' पदोंसे और यहाँ 'मनःषष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥' पदोंसे कहा गया है।
यद्यपि अपरा भी भगवान्की है, तथापि उसका स्वभाव अलग (परिवर्तनशील) है। इसलिये भगवान्ने अपनेको अपरासे अतीत बताया है—'यस्मात्क्षरमतीतोऽहम्' (गीता १५।१८)। परन्तु परा और भगवान् एक स्वभाववाले (अपरिवर्तनशील) हैं। इसलिये 'ममैवांशः' पदमें 'एव' कहनेका तात्पर्य है कि जीव केवल मेरा (भगवान्का) अंश है, इसमें प्रकृतिका अंश किंचिन्मात्र भी नहीं है। जैसे शरीरमें माता और पिता—दोनोंके अंशका मिश्रण होता है, ऐसे जीवमें मेरा और प्रकृतिके अंशका मिश्रण (संयोग) नहीं है, प्रत्युत यह केवल मेरा अंश है। अतः इसका सम्बन्ध केवल मेरे साथ है, प्रकृतिके साथ नहीं। प्रकृतिके साथ सम्बन्ध तो यह खुद जोड़ता है—'मनःषष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥'
अपरा प्रकृति परमात्माकी है, पर जीवने उसको अपना मान लिया और उससे सुख लेने लग गया, तभी वह बन्धनमें पड़ा है। अपनी न होनेके कारण ही न वस्तुएँ ठहरती हैं, न सुख ठहरता है।
स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मानना ही अनर्थका कारण है। जीव शरीरको अपनी तरफ खींचता है (कर्षति) अर्थात् अपना मानता है, पर जो वास्तवमें अपना है, उस परमात्माको अपना मानता ही नहीं। यही जीवकी मूल भूल है।
जीव ब्रह्म (निर्गुण)-का अंश नहीं है, प्रत्युत ईश्वर (सगुण)-का अंश है—'ईस्वर अंस जीव अबिनासी' (मानस ७।११७।१)। कारण कि ब्रह्म चिन्मय सत्तामात्र है; अतः उसमें अंश-अंशीभाव हो सकता ही नहीं। जीवकी ब्रह्मसे एकता (साधर्म्य) है अर्थात् अनेक रूपसे जो जीव है, वही एक रूपसे ब्रह्म है। शरीरके साथ सम्बन्ध होनेसे वह जीव है और शरीरके साथ सम्बन्ध न होनेसे वह ब्रह्म है। अतः वास्तवमें जीव और ब्रह्म—दोनों ही समग्र भगवान्के अंश हैं। इसलिये भगवान्ने अपनेको ब्रह्मकी प्रतिष्ठा (आधार) बताया है—'ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्' (१४।२७) और ब्रह्मको अपने ही समग्र रूपका एक अंग बताया है—'ते ब्रह्म तद्विदुः……' (७।२९-३०)।
मन और इन्द्रियाँ जिसके अंश हैं, उसीमें रहते हैं—'प्रकृतिस्थानि'। इससे जीवको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि मैं भी जिसका अंश हूँ, उसीमें निरन्तर रहना चाहिये, उसीके साथ सम्बन्ध जोड़ना चाहिये। यह सम्बन्ध स्वयंको ही जोड़ना पड़ेगा, दूसरा नहीं जोड़ेगा। कारण कि स्वयंने ही जगत्से सम्बन्ध जोड़ा है और स्वयं ही परमात्मासे विमुख हुआ है। जगत्के सम्मुख होने (सम्बन्ध जोड़ने)—में जगत् कारण नहीं है और परमात्मासे विमुख होनेमें परमात्मा कारण नहीं है, प्रत्युत दोनोंमें स्वयं ही कारण है। परमात्माका अंश होनेसे जीव स्वतन्त्र है और इसी स्वतन्त्रताका उसने दुरुपयोग किया है। इसलिये इसका सदुपयोग स्वयंको ही करना पड़ेगा—'उद्धरेदात्मनात्मानम्' (गीता ६।५)।
प्रकृतिके साथ मन और इन्द्रियाँका नित्य और वास्तविक सम्बन्ध है, पर मन और इन्द्रियोंके साथ स्वयं (आत्मा)-का अनित्य और माना हुआ सम्बन्ध है। अनित्य सम्बन्ध कभी स्थायी नहीं रहता, प्रत्युत बदलता और मिटता रहता है। स्वयंका नित्य सम्बन्ध परमात्माके साथ है, जो कभी बदलता और मिटता नहीं। परन्तु अनित्य सम्बन्धको स्वीकार कर लेनेसे उस नित्य सम्बन्धसे विमुखता हो जाती है, जिससे उसका अनुभव नहीं होता।
'ममैवांशो जीवलोकै' पदोंसे यह भाव निकलता है कि हम तो प्रभुको अपना मानते हैं, पर प्रभु हमें अपना जानते हैं! जब जीव भगवान्के शरण हो जाता है, तब वह भी प्रभुको अपना जान लेता है—'मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते' (गीता ७।१४)।
जीव भगवान्का सनातन अंश है; अतः भगवान्के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ना अर्थात् उनको अपना मानना ही इसका वास्तविक पुरुषार्थ है। शरीरसे होनेवाले पुरुषार्थमें तो क्रिया मुख्य है, जो केवल संसारके लिये ही होती है; क्योंकि शरीर संसारका अंश है। परन्तु स्वयंसे होनेवाले पुरुषार्थमें भाव मुख्य है। इसलिये बुराईरहित होना, असंग होना, भगवान्को अपना मानना—ये स्वयंके पुरुषार्थ हैं। बुराईरहित होनेसे मनुष्य संसारके लिये उपयोगी हो जाता है।
श्लोक ७ ]
- साधक-संजीवनी *
१७७
शरीर-संसारसे असंग होनेसे अपने लिये उपयोगी हो जाता है। भगवान्को अपना माननेसे भगवान्के लिये उपयोगी हो जाता है। बुराईरहित हुए बिना मनुष्य संसारके लिये उपयोगी नहीं हो सकता। शरीर-संसारसे असंग हुए बिना मनुष्य अपने लिये उपयोगी नहीं हो सकता। भगवान्के साथ अपनेपनका सम्बन्ध जोड़े बिना मनुष्य भगवान्के लिये उपयोगी नहीं हो सकता।
मैं बुराईरहित हो जाऊँ, मैं असंग हो जाऊँ, मैं भगवत्प्रेमी हो जाऊँ—ऐसी आवश्यकताका अनुभव करना भी पुरुषार्थ है। परन्तु सबसे पहले साधकको यह स्वीकार कर लेना चाहिये कि मैं बुराईरहित हो सकता हूँ, असंग हो सकता हूँ, प्रेमी हो सकता हूँ। इसके लिये साधकको यह जानना चाहिये कि संसारके नाते भी हम सब एक हैं, आत्माके नाते भी हम सब एक हैं और परमात्माके नाते भी हम सब एक हैं। इसलिये जैसे अपने शरीरके हितका भाव रहता है, ऐसे ही सम्पूर्ण शरीरोंके हितका भाव रहना चाहिये अथवा जैसे सम्पूर्ण शरीरोंसे हम निर्लिप्त रहते हैं, ऐसे ही इस शरीरसे भी निर्लिप्त रहना चाहिये। सम्पूर्ण शरीरोंके साथ अपने शरीरकी एकता मानकर हम बुराई-रहित हो सकते हैं। अपने शरीरसहित सम्पूर्ण शरीरोंको छोड़कर हम असंग (अपने स्वरूपमें स्थित) हो सकते हैं। सम्पूर्ण शरीर-संसारको छोड़कर हम भगवत्प्रेमी हो सकते हैं।
हमारा सम्बन्ध परमात्माके साथ है—‘ममैवांशो जीवलोकै ’, इसलिये हम परमात्मामें ही स्थित हैं। परन्तु शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिका सम्बन्ध अपरा प्रकृतिके साथ है, इसलिये वे प्रकृतिमें ही स्थित हैं—‘प्रकृतिस्थानि ’। ‘विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ’ (गीता १३।१९)। शरीरके साथ हमारा मिलन कभी हुआ ही नहीं, है ही नहीं, होगा ही नहीं, हो सकता ही नहीं और परमात्मासे अलग हम कभी हुए ही नहीं, हैं ही नहीं, होंगे ही नहीं, हो सकते ही नहीं। हमारेसे दूर-से-दूर कोई चीज है तो वह शरीर है और नजदीक-से-नजदीक कोई चीज है तो वह परमात्मा है। परन्तु कामना-ममता-तादात्म्यके कारण मनुष्यको उलटा दीखता है अर्थात् शरीर तो नजदीक दीखता है और परमात्मा दूर! शरीर तो प्राप्त दीखता है और परमात्मा अप्राप्त!
शरीरसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेके लिये साधकको तीन बातें मान लेनी चाहिये—१-शरीर मेरा नहीं है; क्योंकि इसपर मेरा वश नहीं चलता। २-मेरेको कुछ नहीं चाहिये और ३-मेरेको अपने लिये कुछ नहीं करना है। जबतक साधक स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों शरीरोंसे अपना सम्बन्ध मानता रहता है, तबतक स्थूलशरीरसे होनेवाला ‘कर्म’, सूक्ष्मशरीरसे होनेवाला ‘चिन्तन’ और कारणशरीरसे होनेवाली ‘स्थिरता’ (निर्विकल्प अवस्था)—तीनों ही उसको बाँधनेवाले होते हैं। परन्तु तीनों शरीरोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर वह कर्म, चिन्तन और स्थिरता—तीनोंसे बँधता नहीं अर्थात् तीनोंसे असंग हो जाता है।
भगवान्के नित्य-सम्बन्धकी जागृतिके लिये साधकको तीन बातें मान लेनी चाहिये—१-प्रभु मेरे हैं, २-मैं प्रभुका हूँ और ३-सब कुछ प्रभुका है। भगवान्से नित्य-सम्बन्धकी जागृति होनेपर साधकको भगवत्प्रेमकी प्राप्ति हो जाती है। भगवत्प्रेमकी प्राप्तिमें ही मनुष्य-जीवनकी पूर्णता है।
मनुष्यमें तीन इच्छाएँ होती हैं—भोगकी इच्छा, तत्त्वकी इच्छा और प्रेमकी इच्छा। भोगकी इच्छा ‘कामना’, तत्त्वकी इच्छा ‘जिज्ञासा’ और प्रेमकी इच्छा ‘पिपासा’ (अभिलाषा) कहलाती है। भोगकी कामना शरीरको लेकर, तत्त्वकी जिज्ञासा स्वरूपको लेकर और प्रेमकी पिपासा परमात्माको लेकर होती है। शरीरको अपना मानना भूल है; क्योंकि शरीर प्रकृतिका अंश है। अतः शरीरको लेकर होनेवाली भोगकी इच्छा प्राकृत (असत्) होनेसे अपनी नहीं है, प्रत्युत भूलसे है। परन्तु तत्त्वकी और प्रेमकी इच्छा अपनी है, भूलसे नहीं है। इसलिये शरीरको निष्कामभावपूर्वक परिवारकी, समाजकी और संसारकी सेवामें लगानेसे अथवा तत्त्वकी जिज्ञासा तेज होनेसे भूल मिट जाती है। भूल मिटनेसे भोगकी इच्छा मिट जाती है। भोगकी इच्छा मिटनेसे तत्त्वकी जिज्ञासा पूर्ण हो जाती है और साधकको स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जाता है अर्थात् उसको तत्त्वज्ञान हो जाता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है। फिर स्वरूप जिसका अंश है, उस परमात्माके प्रेमकी पिपासा जाग्रत् होती है। मात्र जीव परमात्माके अंश हैं, इसलिये मात्र जीवोंकी अन्तिम इच्छा प्रेमकी ही है। प्रेमकी इच्छा सार्वभौम इच्छा है। प्रेमकी प्राप्ति होनेपर मनुष्यजन्म पूर्ण हो जाता है, फिर कुछ बाकी नहीं रहता।
सम्बन्ध—मनसहित इन्द्रियोंको अपना माननेके कारण जीव किस प्रकार उनको साथ लेकर अनेक योनियोंमें घूमता है—इसका भगवान् दृष्टान्तसहित वर्णन करते हैं।
९७८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
शरीरं यदवाप्नोति यच्छाष्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धान्वाशयात् ॥ ८ ॥
जैसे—
| वायुः | = वायु | अपि | = भी | गृहीत्वा | = ग्रहण करके |
|---|---|---|---|---|---|
| आशयात् | = गन्धके स्थानसे | यत् | = जिस | च | = फिर |
| गन्धान् | = गन्धको (ग्रहण करके | ||||
| ले जाती है), | शरीरम् | = शरीरको | यत् | = जिस (शरीर)-को | |
| इव | = ऐसे ही | उत्क्रामति | = छोड़ता है, | ||
| (वहाँसे) | अवाप्नोति | = प्राप्त होता है | |||
| (उसमें) | |||||
| ईश्वरः | = शरीरादिका स्वामी | ||||
| बना हुआ जीवात्मा | एतानि | = इन (मनसहित | |||
| इन्द्रियों)-को | संयाति | = चला | |||
| जाता है। |
व्याख्या —‘वायुर्गन्धान्वाशयात्’—जिस प्रकार वायु इत्रके फोहेसे गन्ध ले जाती है; किन्तु वह गन्ध स्थायीरूपसे वायुमें नहीं रहती; क्योंकि वायु और गन्धका सम्बन्ध नित्य नहीं है, इसी प्रकार इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, स्वभाव आदि—(सूक्ष्म और कारण—दोनों शरीरों—) को अपना माननेके कारण जीवात्मा उनको साथ लेकर दूसरी योनियें जाता है।
जैसे वायु तत्त्वतः गन्धसे निर्लिप्त है, ऐसे ही जीवात्मा भी तत्त्वतः मन, इन्द्रियाँ, शरीरादिसे निर्लिप्त है; परन्तु इन मन, इन्द्रियाँ, शरीरादिमें मैं-मेरेपनकी मान्यता होनेके कारण वह (जीवात्मा) इनका आकर्षण करता है।
जैसे वायु आकाशका कार्य होते हुए भी पृथ्वीके अंश गन्धको साथ लिये घूमती है, ऐसे ही जीवात्मा परमात्माका सनातन अंश होते हुए भी प्रकृतिके कार्य (प्रतिक्षण बदलनेवाले) शरीरोंको साथ लिये भिन्न-भिन्न योनियोंमें घूमता है। जड़ होनेके कारण वायुमें यह विवेक नहीं है कि वह गन्धको ग्रहण न करे; परन्तु जीवात्माको तो यह विवेक और सामर्थ्य मिला हुआ है कि वह जब चाहे, तब शरीरसे सम्बन्ध मिटा सकता है। भगवान्ने मनुष्यमात्रको यह स्वतन्त्रता दे रखी है कि वह चाहे जिससे सम्बन्ध जोड़ सकता है और चाहे जिससे सम्बन्ध तोड़ सकता है। अपनी भूल मिटानेके लिये केवल अपनी मान्यता बदलनेकी आवश्यकता है कि प्रकृतिके अंश इन स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरोंसे मेरा (जीवात्माका) कोई सम्बन्ध नहीं है।
फिर जन्म-मरणके बन्धनसे सहज ही मुक्ति है।
भगवान्ने यहाँ तीन शब्द दृष्टान्तके रूपमें दिये हैं—(१) वायु, (२) गन्ध और (३) आशय। ‘आशय’ कहते हैं स्थानको; जैसे—जलाशय (जल+आशय) अर्थात् जलका
स्थान। यहाँ आशय नाम स्थूलशरीरका है। जिस प्रकार गन्धके स्थान (आशय) इत्रके फोहेसे वायु गन्ध ले जाती है और फोहा पीछे पड़ा रहता है, इसी प्रकार वायुरूप जीवात्मा गन्धरूप सूक्ष्म और कारण-शरीरोंको साथ लेकर जाता है, तब गन्धका आशय-रूप स्थूलशरीर पीछे रह जाता है।
‘शरीरं यदवाप्नोति’...‘गृहीत्वैतानि संयाति’— यहाँ ‘ईश्वरः’ पद जीवात्माका वाचक है। इस जीवात्मासे तीन खास भूलें हो रही हैं—
(१) अपनेको मन, बुद्धि, शरीरादि जड़ पदार्थोंका स्वामी मानता है, पर वास्तवमें बन जाता है स्वयं उनका दास।
(२) अपनेको उन जड़ पदार्थोंका स्वामी मान लेनेके कारण अपने वास्तविक स्वामी परमात्माको भूल जाता है।
(३) जड़ पदार्थोंसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेमें स्वाधीन होनेपर भी उनका त्याग नहीं करता।
परमात्माने जीवात्माको शरीरादि सामग्रीका सदुपयोग करनेकी स्वाधीनता दी है। उनका सदुपयोग करके अपना उद्धार करनेके लिये वे वस्तुएँ दी हैं, उनका स्वामी बननेके लिये नहीं। परन्तु जीवसे यह बहुत बड़ी भूल होती है कि वह उस सामग्रीका सदुपयोग नहीं करता; प्रत्युत अपनेको उनका मालिक मान लेता है, पर वास्तवमें उनका गुलाम बन जाता है।
जीवात्मा जड़ पदार्थोंसे माने हुए सम्बन्धका त्याग तभी कर सकता है, जब उसे यह मालूम हो जाय कि इनका मालिक बननेसे मैं सर्वथा पराधीन हो गया हूँ और मेरा पतन हो गया है। यह जिनका मालिक बनता है, उनकी गुलामी इसमें आ ही जाती है। इसे केवल वहम होता है कि मैं इनका मालिक हूँ। जड़ पदार्थोंका मालिक बन
श्लोक ८ ]
- साधक-संजीवनी *
१७९
जानेसे एक तो इसे उन पदार्थोंकी 'कमी' का अनुभव होता है और दूसरा यह अपनेको 'अनाथ' मान लेता है।
जिसे मालिकपना या अधिकार प्यारा लगता है, वह परमात्माको प्राप्त नहीं कर सकता; क्योंकि जो किसी व्यक्ति, वस्तु, पद आदिका स्वामी बनता है, वह अपने स्वामीको भूल जाता है—यह नियम है। उदाहरणार्थ, जिस समय बालक केवल माँको अपना मानकर उसे ही चाहता है, उस समय वह माँके बिना रह ही नहीं सकता। किन्तु वही बालक जब बड़ा होकर गृहस्थ बन जाता है और अपनेको स्त्री, पुत्र आदिका स्वामी मानने लगता है, तब उसी माँका पास रहना उसे सुहाता नहीं। यह स्वामी बननेका ही परिणाम है! इसी प्रकार यह जीवात्मा भी शरीरादि जड़ पदार्थोंका स्वामी (ईश्वर) बनकर अपने वास्तविक स्वामी परमात्माको भूल जाता है—उन्से विमुख हो जाता है। जबतक यह भूल या विमुखता रहेगी, तबतक जीवात्मा दुःख पाता ही रहेगा।
'ईश्वरः' पदके साथ 'अपि' पद एक विशेष अर्थ रखता है कि यह ईश्वर बना जीवात्मा वायुके समान असमर्थ, जड़ और पराधीन नहीं है। इस जीवात्मामें ऐसी सामर्थ्य और विवेक है कि यह जब चाहे, तब माने हुए सम्बन्धको छोड़ सकता है और परमात्माके साथ नित्य सम्बन्धका अनुभव कर सकता है। परन्तु संयोगजन्य सुखकी लोलुपताके कारण यह संसारसे माने हुए सम्बन्धको छोड़ता नहीं और छोड़ना चाहता भी नहीं। जड़ता-(शरीरादि-) से तादात्म्य छूटनेपर जीवात्मा (गन्धकी तरह) शरीरोंको साथ ले जा सकता ही नहीं।
जीवको दो शक्तियाँ प्राप्त हैं—(१) प्राणशक्ति, जिससे श्वासोंका आवागमन होता है और (२) इच्छाशक्ति, जिससे भोगोंको पानेकी इच्छा करता है। प्राणशक्ति हरदम (श्वासोच्छ्वासके द्वारा) क्षीण होती रहती है। प्राणशक्तिका खत्म होना ही मृत्यु कहलाती है। जड़का संग करनेसे कुछ करने और पानेकी इच्छा बनी रहती है। प्राणशक्तिके रहते हुए इच्छाशक्ति अर्थात् कुछ करने और पानेकी इच्छा मिट जाय, तो मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। प्राणशक्ति नष्ट हो जाय और इच्छाएँ बनी रहें, तो दूसरा जन्म लेना ही पड़ता है। नया शरीर मिलनेपर इच्छाशक्ति तो वही (पूर्वजन्मको) रहती है, प्राणशक्ति नयी मिल जाती है। प्राणशक्तिका व्यय इच्छाओंको मिटानेमें होना चाहिये। निःस्वार्थभावसे सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहनेसे इच्छाएँ सुगमतापूर्वक मिट जाती हैं।
यहाँ 'गृहीत्वा' पदका तात्पर्य है—जो अपने नहीं हैं, उनसे राग, ममता, प्रियता करना। जिन मन, इन्द्रियोंके साथ अपनापन करके जीवात्मा उनको साथ लिये फिरता है, वे मन, इन्द्रियाँ कभी नहीं कहतीं कि हम तुम्हारी हैं और तुम हमारे हो। इनपर जीवात्माका शासन भी चलता नहीं; जैसा चाहे वैसा रख सकता नहीं, परिवर्तन कर सकता नहीं; फिर भी इनके साथ अपनापन रखता है, जो कि भूल ही है। वास्तवमें यह अपनेपनका (राग, ममतायुक्त) सम्बन्ध ही बाँधनेवाला होता है।
वस्तु हमें प्राप्त हो या न हो, बढ़िया हो या घटिया हो, हमारे काममें आये या न आये, दूर हो या पास हो, यदि उस वस्तुको हम अपनी मानते हैं तो उससे हमारा सम्बन्ध बना हुआ ही है।
अपनी तरफसे छोड़े बिना शरीरादिमें ममताका सम्बन्ध मरनेपर भी नहीं छूटता। इसलिये मृत शरीरकी हड्डियोंको गंगाजीमें डालनेसे उस जीवकी आगे गति होती है। इस माने हुए सम्बन्धको छोड़नेमें हम सर्वथा स्वतन्त्र तथा सबल हैं। यदि शरीरके रहते हुए ही हम उससे अपनापन हटा दें, तो जीते-जी ही मुक्त हो जायँ!
जो अपना नहीं है, उसको अपना मानना और जो अपना है, उसको अपना न मानना—यह बहुत बड़ा दोष है, जिसके कारण ही पारमार्थिक मार्गमें उन्मति नहीं होती।
इस श्लोकमें आया 'एतानि' पद सातवें श्लोकके 'मनःषष्ठीनीन्द्रियाणि' (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन-) का वाचक है। यहाँ 'एतानि' पदको सत्रह तत्त्वोंके समुदायरूप सूक्ष्मशरीर एवं कारणशरीर-(स्वभाव-) का भी छोटक मानना चाहिये। इन सबको ग्रहण करके जीवात्मा दूसरे शरीरमें जाता है। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंका त्याग करके नये वस्त्र धारण करता है, ऐसे ही जीवात्मा पुराने शरीरका त्याग करके नये शरीरको प्राप्त होता है(गीता—दूसरे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।
वास्तवमें शुद्ध चेतन-(आत्मा-)का किसी शरीरको प्राप्त करना और उसका त्याग करके दूसरे शरीरमें जाना हो नहीं सकता; क्योंकि आत्मा अचल और समानरूपसे सर्वत्र व्याप्त है (गीता—दूसरे अध्यायका सत्रहवाँ और चौबीसवाँ श्लोक)। शरीरोंका ग्रहण और त्याग परिच्छिन्न (एकदेशीय) तत्त्वके द्वारा ही होना सम्भव है, जबकि आत्मा कभी किसी भी देश-कालादिमें परिच्छिन्न नहीं हो सकता। परन्तु जब यह आत्मा प्रकृतिके कार्य शरीरसे तादात्म्य कर लेता है अर्थात् प्रकृतिस्थ हो जाता है, तब
१८०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
(स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों शरीरोंमें अपनेको तथा अपनेमें तीनों शरीरोंको धारण करने अर्थात् उनमें अपनापन करनेसे) वह प्रकृतिके कार्य शरीरोंका ग्रहण-त्याग करने लगता है। तात्पर्य यह है कि शरीरको 'मैं' और 'मेरा' मान लेनेके कारण आत्मा सूक्ष्मशरीरके आने-जानेको अपना आना-जाना
परिशिष्ट भाव— पूर्वश्लोकमें 'कर्षति' पद और इस श्लोकमें 'गृहीत्वा' पद आया है। 'कर्षति' का अर्थ है—अपनी तरफ खींचना और 'गृहीत्वा' का अर्थ है—पकड़ना अर्थात् तादात्म्य करना। वायुका दृष्टान्त देनेका तात्पर्य है कि जीव वायुकी तरह निलिप्त रहता है। शरीरसे लिप्त होनेपर भी वास्तवमें इसकी निलिप्तता कभी मिटती नहीं—'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते' (गीता १३।३१)। वायुमें गन्ध हरदम नहीं रहती, स्वतः छूट जाती है; परन्तु जीव जबतक मन-बुद्धि-इन्द्रियोंको छोड़ता नहीं, तबतक वे छूटते नहीं। इसका कारण यह है कि मन-बुद्धि-इन्द्रियोंको जीव खुद पकड़ता है—'गृहीत्वैतानि'; अतः खुद छोड़नेपर ही वे छूटते हैं।
प्रत्येक भोगसे स्वाभाविक उपरति होती है—यह सबका अनुभव है। भोगोंमें प्रवृत्ति तो कृत्रिम होती है, पर निवृत्ति स्वाभाविक होती है। रुचि तो जीव करता है, पर अरुचि स्वतः होती है। जैसे, तम्बाकू पीनेवाले धुआँ भीतर खींचते हैं, पर वह बाहर स्वतः निकलता है! मुँह बन्द करें तो नाकसे निकल जायगा! धुआँ तो टिकता नहीं, पर आदत बिगड़ जाती है, व्यसन लग जाता है। ऐसे ही भोग तो टिकते नहीं, पर आदत बिगड़ जाती है। भोग तो स्वतः छूटते हैं, उनसे अरुचि स्वतः होती है, पर आदत बिगड़नेसे जीव उनको बार-बार पकड़ता रहता है और 'ईश्वर' अर्थात् स्वतन्त्र होते हुए भी परवशताका अनुभव करता रहता है। भोगोंमें लिप्त होते हुए भी वास्तवमें इसकी निलिप्तता मिटती नहीं, पर इसकी तरफ यह ध्यान नहीं देता और इसको महत्त्व नहीं देता। शरीरसे सम्बन्ध न होते हुए भी यह उससे सम्बन्ध मानकर सुख लेता रहता है। सम्बन्ध तो अनित्य होता है, पर सम्बन्ध-विच्छेद नित्य होता है। कारण कि संसारकी जातिका (जड़ तथा परिवर्तनशील) होनेसे शरीर विजातीय है। विजातीय वस्तुसे सम्बन्ध होना सम्भव ही नहीं है। परमात्माका अंश होनेसे जीवकी परमात्माके साथ सजातीयता है। अतः इसका स्वतः सम्बन्ध परमात्माके साथ ही है। अगर जीव सन्तोषी, भगवान्की, शास्त्रोंकी वाणीपर विश्वास करके परमात्मासे सम्बन्ध जोड़ ले तो फिर इसको अनुभव हो जायगा। परन्तु यह पदार्थके सम्बन्धको मुख्यता दे देता है। जबतक यह भगवान्के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ता, तबतक भगवान् कोई भी सम्बन्ध टिकने नहीं देते, तोड़ते ही रहते हैं। जीव कितना ही जोर लगा ले, वह संसारका सम्बन्ध स्थायी रख सकता ही नहीं।
सम्बन्ध—अब भगवान् सातवें श्लोकमें आये हुए 'मनःषष्ठीनीन्द्रियाणि' पदका खुलासा करते हैं।
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च। अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ १ ॥
| अयम् | = यह (जीवात्मा) | च | = और | च | = और |
|---|---|---|---|---|---|
| मनः | = मनका | चक्षुः | = नेत्र | घ्राणम् | = घ्राण (—इन पाँचों इन्द्रियोंके द्वारा) |
| अधिष्ठाय | = आश्रय लेकर | च | = तथा | विषयान् | = विषयोंका |
| एव | = ही | स्पर्शनम् | = त्वचा, | उपसेवते | = सेवन करता है। |
| श्रोत्रम् | = श्रोत्र | रसनम् | = रसना |
व्याख्या— 'अधिष्ठाय मनश्चायम्'—मनमें अनेक प्रकारके (अच्छे-बुरे) संकल्प-विकल्प होते रहते हैं*। इनसे 'स्वयं' की स्थितिमें कोई अन्तर नहीं आता; क्योंकि 'स्वयं' (चेतन-तत्त्व, आत्मा) जड़ शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिसे अत्यन्त परे
- मनुष्य अपने मनमें निरन्तर कुछ-न-कुछ सोचता रहता है, जिसे संकल्प-विकल्प, मनोरथ या मनोराज्य कहते हैं। निद्राके समय यही 'स्वप्न' होकर दीखने लगता है। मनपर बुद्धिका परदा (प्रभाव) रहनेके कारण हम मनमें आयी हुई प्रत्येक बातको प्रकट नहीं करते। परंतु बुद्धिका परदा हटनेपर मनमें आयी हुई प्रत्येक बातको कहना या उसके अनुसार आचरण करना 'पागलपन' कहलाता है। इस प्रकार मनोराज्य, स्वप्न तथा पागलपन—ये तीनों एक ही हैं।
श्लोक १ ]
- साधक-संजीवनी *
१८१
और उनका आश्रय तथा प्रकाशक है। संकल्प-विकल्प आते-जाते हैं और 'स्वयं' सदा ज्यों-का-त्यों रहता है।
मनका संयोग होनेपर ही सुनने, देखने, स्पर्श करने, स्वाद लेने तथा सृष्टिके ज्ञान होता है। जीवात्माको मनके बिना इन्द्रियोंसे सुख-दुःख नहीं मिल सकता। इसलिये यहाँ मनको अधिष्ठित करनेकी बात कही गयी है। तात्पर्य यह है कि जीवात्मा मनको अधिष्ठित करके अर्थात् उसका आश्रय लेकर ही इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता है।
'श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं प्राणमेव च' —श्रवणेन्द्रिय अर्थात् कानोंमें सुननेकी शक्ति* 'श्रोत्रम्' है। आजतक हमने अनेक प्रकारके अनुकूल (स्तुति, मान, बड़ाई, आशीर्वाद, मधुर गान, वाद्य आदि) और प्रतिकूल (निन्दा, अपमान, शाप, गाली आदि) शब्द सुने हैं; पर उनसे 'स्वयं' में क्या फरक पड़ा?
किसीको पौत्रके जन्म तथा पुत्रकी मृत्युका समाचार एक साथ मिला। दोनों समाचार सुननेसे एकके 'जन्म' तथा दूसरेकी 'मृत्यु' का जो ज्ञान हुआ, उस 'ज्ञान' में कोई अन्तर नहीं आया। जब ज्ञानमें भी कोई अन्तर नहीं आया, तो फिर 'ज्ञाता' में अन्तर आयेगा ही कैसे! अतः जन्म और मृत्युका समाचार सुननेसे अन्तःकरणमें (माने हुए सम्बन्धके कारण) जो असर होता है, उसकी तरफ दृष्टि न रखकर इस 'ज्ञान' पर ही दृष्टि रखनी चाहिये। इसी तरह अन्य इन्द्रियोंके विषयमें भी समझ लेना चाहिये।
नेत्रेन्द्रिय अर्थात् नेत्रोंमें देखनेकी शक्ति 'चक्षुः' है। आजतक हमने अनेक सुन्दर, असुन्दर, मनोहर, भयानक
रूप या दृश्य देखे हैं, पर उनसे अपने 'स्वरूप' में क्या फरक पड़ा?
स्पर्शेन्द्रिय अर्थात् त्वचामें स्पर्श करनेकी शक्ति 'स्पर्शनम्' है। जीवनमें हमारेको अनेक कोमल, कठोर, चिपचिपे, ठण्डे, गरम आदि स्पर्श प्राप्त हुए हैं, पर उनसे 'स्वयं' की स्थितिमें क्या अन्तर आया?
रसनेन्द्रिय अर्थात् जीभमें स्वाद लेनेकी शक्ति 'रसनम्' है। कड़ुआ, तीखा, मीठा, कसैला, खट्टा और नमकीन—ये छः प्रकारके भोजनके रस हैं। आजतक हमने तरह-तरहके रसयुक्त भोजन किये हैं; पर विचार करना चाहिये कि उनसे 'स्वयं'को क्या प्राप्त हुआ?
प्राणेन्द्रिय अर्थात् नासिकामें सृष्टिके शक्ति 'प्राणम्' है। जीवनमें हमारी नासिकाने तरह-तरहकी सुगन्ध और दुर्गन्ध ग्रहण की है; पर उनसे 'स्वयं' में क्या फरक पड़ा?
विशेष बात
श्रोत्रका वाणीसे, नेत्रका पैरसे, त्वचाका हाथसे, रसनाका उपस्थसे और प्राणका गुदासे (पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंका पाँचों कर्मेन्द्रियोंसे) घनिष्ठ सम्बन्ध है। जैसे, जो जन्मसे बहरा होता है, वह गूँगा भी होता है। पैरके तलवेमें तेलकी मालिश करनेसे नेत्रोंपर तेलका असर पड़ता है। त्वचाके होनेसे ही हाथ स्पर्शका काम करते हैं। रसनेन्द्रियके वशमें होनेसे उपस्थेन्द्रिय भी वशमें हो जाती है। प्राणसे गन्धका ग्रहण तथा उससे सम्बन्धित गुदासे गन्धका त्याग होता है।
पंचमहाभूतोंमें एक-एक महाभूतके सत्त्वगुण-अंशसे ज्ञानेन्द्रियाँ, रजोगुण-अंशसे कर्मेन्द्रियाँ और तमोगुण-अंशसे शब्दादि पाँचों विषय बने हैं।
| पंचमहाभूत | सत्त्वगुण-अंश | रजोगुण-अंश | तमोगुण-अंश |
|---|---|---|---|
| आकाश | श्रोत्र | वाक् | शब्द |
| वायु | त्वचा | हस्त | स्पर्श |
| अग्नि | नेत्र | पाद | रूप |
| जल | रसना | उपस्थ | रस |
| पृथ्वी | प्राण | गुदा | गन्ध |
- श्रवणेन्द्रियसे दो प्रकारका ज्ञान होता है—(१) अपरोक्ष शब्दका ज्ञान और (२) परोक्ष विषयका ज्ञान। इसलिये श्रवणकी बहुत महिमा है। ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्ग—दोनों ही मार्गोंमें 'श्रवण' का मुख्य स्थान है। यद्यपि नेत्रोंसे शास्त्रोंका अवलोकन, अध्ययन करनेसे भी परोक्ष विषयका ज्ञान होता है, तथापि वास्तवमें वह भी (शब्दका ही लिखितरूप होनेसे) प्रकाशान्तरसे शब्दकी शक्ति ही है। शास्त्रज्ञान भी जैसा (गुरुमुखसे) श्रवणसे होता है, वैसा पढ़नेसे नहीं। विद्याध्ययनमें भी पहले सुननेसे ही बोध होता है। शब्दमें अचिन्त्य शक्ति है, जिसे श्रवणेन्द्रिय ही ग्रहण कर सकती है, अन्य इन्द्रियाँ नहीं।