श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 982, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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और उनका आश्रय तथा प्रकाशक है। संकल्प-विकल्प आते-जाते हैं और 'स्वयं' सदा ज्यों-का-त्यों रहता है।
मनका संयोग होनेपर ही सुनने, देखने, स्पर्श करने, स्वाद लेने तथा सृष्टिके ज्ञान होता है। जीवात्माको मनके बिना इन्द्रियोंसे सुख-दुःख नहीं मिल सकता। इसलिये यहाँ मनको अधिष्ठित करनेकी बात कही गयी है। तात्पर्य यह है कि जीवात्मा मनको अधिष्ठित करके अर्थात् उसका आश्रय लेकर ही इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता है।
'श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं प्राणमेव च' —श्रवणेन्द्रिय अर्थात् कानोंमें सुननेकी शक्ति* 'श्रोत्रम्' है। आजतक हमने अनेक प्रकारके अनुकूल (स्तुति, मान, बड़ाई, आशीर्वाद, मधुर गान, वाद्य आदि) और प्रतिकूल (निन्दा, अपमान, शाप, गाली आदि) शब्द सुने हैं; पर उनसे 'स्वयं' में क्या फरक पड़ा?
किसीको पौत्रके जन्म तथा पुत्रकी मृत्युका समाचार एक साथ मिला। दोनों समाचार सुननेसे एकके 'जन्म' तथा दूसरेकी 'मृत्यु' का जो ज्ञान हुआ, उस 'ज्ञान' में कोई अन्तर नहीं आया। जब ज्ञानमें भी कोई अन्तर नहीं आया, तो फिर 'ज्ञाता' में अन्तर आयेगा ही कैसे! अतः जन्म और मृत्युका समाचार सुननेसे अन्तःकरणमें (माने हुए सम्बन्धके कारण) जो असर होता है, उसकी तरफ दृष्टि न रखकर इस 'ज्ञान' पर ही दृष्टि रखनी चाहिये। इसी तरह अन्य इन्द्रियोंके विषयमें भी समझ लेना चाहिये।
नेत्रेन्द्रिय अर्थात् नेत्रोंमें देखनेकी शक्ति 'चक्षुः' है। आजतक हमने अनेक सुन्दर, असुन्दर, मनोहर, भयानक
रूप या दृश्य देखे हैं, पर उनसे अपने 'स्वरूप' में क्या फरक पड़ा?
स्पर्शेन्द्रिय अर्थात् त्वचामें स्पर्श करनेकी शक्ति 'स्पर्शनम्' है। जीवनमें हमारेको अनेक कोमल, कठोर, चिपचिपे, ठण्डे, गरम आदि स्पर्श प्राप्त हुए हैं, पर उनसे 'स्वयं' की स्थितिमें क्या अन्तर आया?
रसनेन्द्रिय अर्थात् जीभमें स्वाद लेनेकी शक्ति 'रसनम्' है। कड़ुआ, तीखा, मीठा, कसैला, खट्टा और नमकीन—ये छः प्रकारके भोजनके रस हैं। आजतक हमने तरह-तरहके रसयुक्त भोजन किये हैं; पर विचार करना चाहिये कि उनसे 'स्वयं'को क्या प्राप्त हुआ?
प्राणेन्द्रिय अर्थात् नासिकामें सृष्टिके शक्ति 'प्राणम्' है। जीवनमें हमारी नासिकाने तरह-तरहकी सुगन्ध और दुर्गन्ध ग्रहण की है; पर उनसे 'स्वयं' में क्या फरक पड़ा?
विशेष बात
श्रोत्रका वाणीसे, नेत्रका पैरसे, त्वचाका हाथसे, रसनाका उपस्थसे और प्राणका गुदासे (पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंका पाँचों कर्मेन्द्रियोंसे) घनिष्ठ सम्बन्ध है। जैसे, जो जन्मसे बहरा होता है, वह गूँगा भी होता है। पैरके तलवेमें तेलकी मालिश करनेसे नेत्रोंपर तेलका असर पड़ता है। त्वचाके होनेसे ही हाथ स्पर्शका काम करते हैं। रसनेन्द्रियके वशमें होनेसे उपस्थेन्द्रिय भी वशमें हो जाती है। प्राणसे गन्धका ग्रहण तथा उससे सम्बन्धित गुदासे गन्धका त्याग होता है।
पंचमहाभूतोंमें एक-एक महाभूतके सत्त्वगुण-अंशसे ज्ञानेन्द्रियाँ, रजोगुण-अंशसे कर्मेन्द्रियाँ और तमोगुण-अंशसे शब्दादि पाँचों विषय बने हैं।
| पंचमहाभूत | सत्त्वगुण-अंश | रजोगुण-अंश | तमोगुण-अंश |
|---|---|---|---|
| आकाश | श्रोत्र | वाक् | शब्द |
| वायु | त्वचा | हस्त | स्पर्श |
| अग्नि | नेत्र | पाद | रूप |
| जल | रसना | उपस्थ | रस |
| पृथ्वी | प्राण | गुदा | गन्ध |
- श्रवणेन्द्रियसे दो प्रकारका ज्ञान होता है—(१) अपरोक्ष शब्दका ज्ञान और (२) परोक्ष विषयका ज्ञान। इसलिये श्रवणकी बहुत महिमा है। ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्ग—दोनों ही मार्गोंमें 'श्रवण' का मुख्य स्थान है। यद्यपि नेत्रोंसे शास्त्रोंका अवलोकन, अध्ययन करनेसे भी परोक्ष विषयका ज्ञान होता है, तथापि वास्तवमें वह भी (शब्दका ही लिखितरूप होनेसे) प्रकाशान्तरसे शब्दकी शक्ति ही है। शास्त्रज्ञान भी जैसा (गुरुमुखसे) श्रवणसे होता है, वैसा पढ़नेसे नहीं। विद्याध्ययनमें भी पहले सुननेसे ही बोध होता है। शब्दमें अचिन्त्य शक्ति है, जिसे श्रवणेन्द्रिय ही ग्रहण कर सकती है, अन्य इन्द्रियाँ नहीं।