श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक १ ]
- साधक-संजीवनी *
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और उनका आश्रय तथा प्रकाशक है। संकल्प-विकल्प आते-जाते हैं और 'स्वयं' सदा ज्यों-का-त्यों रहता है।
मनका संयोग होनेपर ही सुनने, देखने, स्पर्श करने, स्वाद लेने तथा सृष्टिके ज्ञान होता है। जीवात्माको मनके बिना इन्द्रियोंसे सुख-दुःख नहीं मिल सकता। इसलिये यहाँ मनको अधिष्ठित करनेकी बात कही गयी है। तात्पर्य यह है कि जीवात्मा मनको अधिष्ठित करके अर्थात् उसका आश्रय लेकर ही इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता है।
'श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं प्राणमेव च' —श्रवणेन्द्रिय अर्थात् कानोंमें सुननेकी शक्ति* 'श्रोत्रम्' है। आजतक हमने अनेक प्रकारके अनुकूल (स्तुति, मान, बड़ाई, आशीर्वाद, मधुर गान, वाद्य आदि) और प्रतिकूल (निन्दा, अपमान, शाप, गाली आदि) शब्द सुने हैं; पर उनसे 'स्वयं' में क्या फरक पड़ा?
किसीको पौत्रके जन्म तथा पुत्रकी मृत्युका समाचार एक साथ मिला। दोनों समाचार सुननेसे एकके 'जन्म' तथा दूसरेकी 'मृत्यु' का जो ज्ञान हुआ, उस 'ज्ञान' में कोई अन्तर नहीं आया। जब ज्ञानमें भी कोई अन्तर नहीं आया, तो फिर 'ज्ञाता' में अन्तर आयेगा ही कैसे! अतः जन्म और मृत्युका समाचार सुननेसे अन्तःकरणमें (माने हुए सम्बन्धके कारण) जो असर होता है, उसकी तरफ दृष्टि न रखकर इस 'ज्ञान' पर ही दृष्टि रखनी चाहिये। इसी तरह अन्य इन्द्रियोंके विषयमें भी समझ लेना चाहिये।
नेत्रेन्द्रिय अर्थात् नेत्रोंमें देखनेकी शक्ति 'चक्षुः' है। आजतक हमने अनेक सुन्दर, असुन्दर, मनोहर, भयानक
रूप या दृश्य देखे हैं, पर उनसे अपने 'स्वरूप' में क्या फरक पड़ा?
स्पर्शेन्द्रिय अर्थात् त्वचामें स्पर्श करनेकी शक्ति 'स्पर्शनम्' है। जीवनमें हमारेको अनेक कोमल, कठोर, चिपचिपे, ठण्डे, गरम आदि स्पर्श प्राप्त हुए हैं, पर उनसे 'स्वयं' की स्थितिमें क्या अन्तर आया?
रसनेन्द्रिय अर्थात् जीभमें स्वाद लेनेकी शक्ति 'रसनम्' है। कड़ुआ, तीखा, मीठा, कसैला, खट्टा और नमकीन—ये छः प्रकारके भोजनके रस हैं। आजतक हमने तरह-तरहके रसयुक्त भोजन किये हैं; पर विचार करना चाहिये कि उनसे 'स्वयं'को क्या प्राप्त हुआ?
प्राणेन्द्रिय अर्थात् नासिकामें सृष्टिके शक्ति 'प्राणम्' है। जीवनमें हमारी नासिकाने तरह-तरहकी सुगन्ध और दुर्गन्ध ग्रहण की है; पर उनसे 'स्वयं' में क्या फरक पड़ा?
विशेष बात
श्रोत्रका वाणीसे, नेत्रका पैरसे, त्वचाका हाथसे, रसनाका उपस्थसे और प्राणका गुदासे (पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंका पाँचों कर्मेन्द्रियोंसे) घनिष्ठ सम्बन्ध है। जैसे, जो जन्मसे बहरा होता है, वह गूँगा भी होता है। पैरके तलवेमें तेलकी मालिश करनेसे नेत्रोंपर तेलका असर पड़ता है। त्वचाके होनेसे ही हाथ स्पर्शका काम करते हैं। रसनेन्द्रियके वशमें होनेसे उपस्थेन्द्रिय भी वशमें हो जाती है। प्राणसे गन्धका ग्रहण तथा उससे सम्बन्धित गुदासे गन्धका त्याग होता है।
पंचमहाभूतोंमें एक-एक महाभूतके सत्त्वगुण-अंशसे ज्ञानेन्द्रियाँ, रजोगुण-अंशसे कर्मेन्द्रियाँ और तमोगुण-अंशसे शब्दादि पाँचों विषय बने हैं।
| पंचमहाभूत | सत्त्वगुण-अंश | रजोगुण-अंश | तमोगुण-अंश |
|---|---|---|---|
| आकाश | श्रोत्र | वाक् | शब्द |
| वायु | त्वचा | हस्त | स्पर्श |
| अग्नि | नेत्र | पाद | रूप |
| जल | रसना | उपस्थ | रस |
| पृथ्वी | प्राण | गुदा | गन्ध |
- श्रवणेन्द्रियसे दो प्रकारका ज्ञान होता है—(१) अपरोक्ष शब्दका ज्ञान और (२) परोक्ष विषयका ज्ञान। इसलिये श्रवणकी बहुत महिमा है। ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्ग—दोनों ही मार्गोंमें 'श्रवण' का मुख्य स्थान है। यद्यपि नेत्रोंसे शास्त्रोंका अवलोकन, अध्ययन करनेसे भी परोक्ष विषयका ज्ञान होता है, तथापि वास्तवमें वह भी (शब्दका ही लिखितरूप होनेसे) प्रकाशान्तरसे शब्दकी शक्ति ही है। शास्त्रज्ञान भी जैसा (गुरुमुखसे) श्रवणसे होता है, वैसा पढ़नेसे नहीं। विद्याध्ययनमें भी पहले सुननेसे ही बोध होता है। शब्दमें अचिन्त्य शक्ति है, जिसे श्रवणेन्द्रिय ही ग्रहण कर सकती है, अन्य इन्द्रियाँ नहीं।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
पाँचों महाभूतोंके मिले हुए सत्त्वगुण-अंशसे मन और बुद्धि, रजोगुण-अंशसे प्राण और तमोगुण-अंशसे शरीर बना है।
‘विषयानुपसेवते’—जैसे व्यापारी किसी कारणवश एक जगहसे दूकान उठाकर दूसरी जगह दूकान लगाता है, ऐसे ही जीवात्मा एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है; और जैसे पहले शरीरमें विषयोंका रागपूर्वक सेवन करता था ऐसे ही दूसरे शरीरमें जानेपर (वही स्वभाव होनेसे) विषयोंका सेवन करने लगता है। इस प्रकार जीवात्मा बार-बार विषयोंमें आसक्ति करनेके कारण ऊँच-नीच योनियोंमें भटकता रहता है।
भगवान्ने यह मनुष्यशरीर अपना उद्धार करनेके लिये दिया है, सुख-दुःख भोगनेके लिये नहीं। जैसे ब्राह्मणको गाय दान करनेपर हम उसको चारा-पानी तो दे सकते हैं, पर दी हुई गायका दूध पीनेका हमें हक नहीं है; ऐसे ही मिले हुए शरीरका सदुपयोग करना हमारा कर्तव्य है, पर इसे अपना मानकर सुख भोगनेका हमें हक नहीं है।
विशेष बात
विषय-सेवन करनेसे परिणाममें विषयोंमें राग-आसक्ति ही बढ़ती है, जो कि पुनर्जन्म तथा सम्पूर्ण दुःखोंका कारण है। विषयोंमें वस्तुतः सुख है भी नहीं। केवल आरम्भमें भ्रमवश सुख प्रतीत होता है (अठारहवें अध्यायका अङ्कीसवॉ श्लोक)। अगर विषयोंमें सुख होता तो जिनके पास प्रचुर भोग-सामग्री है, ऐसे बड़े-बड़े धनी, भोगी और पदाधिकारी तो सुखी हो ही जाते, पर वास्तवमें देखा जाय
तो पता चलता है कि वे भी दुःखी, अशान्त ही हैं। कारण यह है कि भोग-पदार्थोंमें सुख है ही नहीं, हुआ नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं। सुख लेनेकी इच्छासे जो-जो भोग भोगे गये, उन-उन भोगोंसे धैर्य नष्ट हुआ, ध्यान नष्ट हुआ, रोग पैदा हुए, चिन्ता हुई, व्यग्रता हुई, पश्चात्ताप हुआ, बेइज्जती हुई, बल गया, धन गया, शान्ति गयी एवं प्रायः दुःख-शोक-उद्वेग आये—ऐसा यह परिणाम विचारशील व्यक्तिके प्रत्यक्ष देखनेमें आता है।१
जिस प्रकार स्वप्नमें जल पीनेसे प्यास नहीं मिटती, उसी प्रकार भोग-पदार्थोंसे न तो शान्ति मिलती है और न जलन ही मिटती है। मनुष्य सोचता है कि इतना धन हो जाय, इतना संग्रह हो जाय, इतनी (अमुक-अमुक) वस्तुएँ प्राप्त हो जायँ तो शान्ति मिल जायगी; किंतु उतना हो जानेपर भी शान्ति नहीं मिलती, उल्टे वस्तुओंके मिलनेसे उनकी लालसा और बढ़ जाती है२। धन आदि भोग-पदार्थोंके मिलनेपर भी ‘और मिल जाय, और मिल जाय’—यह क्रम चलता ही रहता है। परन्तु संसारमें जितना धन-धान्य है, जितनी सुन्दर स्त्रियाँ हैं, जितनी उत्तम वस्तुएँ हैं, वे सब-की-सब एक साथ किसी एक व्यक्तिको मिल भी जायँ, तो भी उनसे उसे तृप्ति नहीं हो सकती३। इसका कारण यह है कि जीव अविनाशी परमात्माका अंश तथा चेतन है और भोग-पदार्थ नाशवान् प्रकृतिके अंश तथा जड हैं। चेतनकी भूख जड पदार्थोंके द्वारा कैसे मिट सकती है? भूख है पेटमें और हलवा बाँधा जाय पीठपर, तो भूख कैसे मिट सकती है? प्यास लगनेपर बढिया-से-बढिया गरमागरम हलवा खानेपर
१-भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्तास्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः। कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥
(भर्तृहरिवैराग्यशतक)
‘हमने भोगोंको नहीं भोगा, भोगोंने ही हमें भोग लिया; हमने तप नहीं किया, हम ही तप हो गये; काल व्यतीत नहीं हुआ, हम ही व्यतीत हो गये; तृष्णा जीर्ण नहीं हुई, हम ही जीर्ण हो गये।’
२-न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्तैव भूय एवाभिधर्तते॥
(मनु० २।१४; श्रीमद्भा० १।११।१४)
‘भोग-पदार्थोंके उपभोगसे कामना कभी शान्त नहीं होती, प्रत्युत जैसे घीकी आहुति डालनेपर आग और भड़क उठती है, ऐसे ही भोग-वासना भी भोगोंके भोगनेसे प्रबल होती है।’
३-यत् पृथिव्यां ब्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्रियः। एकस्यापि न पर्याप्तं तस्मात्तृष्णां परित्यजेत्॥
(विष्णुपुराण ४।१०।२४; महा०, आदि० ८५।१३)
श्लोक १० ]
- साधक-संजीवनी *
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भी प्यास नहीं मिट सकती। इसी प्रकार जीवको प्यास तो है चिन्मय परमात्माकी, पर वह उस प्यासको मिटाना चाहता है जड़ पदार्थके द्वारा, जिससे तृप्ति होनेकी नहीं। तृप्ति तो दूर रही, ज्यों-ज्यों वह जड़ पदार्थको अपनाता है, त्यों-त्यों उसकी भूख भी बढ़ती ही जाती है। यह उसकी कितनी बड़ी भूल है! साधकको चाहिये कि वह आज ही यह दृढ़ विचार (निश्चय) कर ले कि मेरेको भोगबुद्धिसे विषयोंका सेवन करना ही नहीं है। उसका यह पक्का निर्णय हो जाय कि सम्पूर्ण संसार मिलकर भी मेरेको तृप्त नहीं कर सकता। विषय-सेवन न करनेका दृढ़ विचार होनेसे इन्द्रियाँ निर्विषय हो जाती हैं; और इन्द्रियोंके निर्विषय हो जानेसे मन निर्विकल्प हो जाता है। मनके निर्विकल्प हो जानेसे बुद्धि स्वतः सम हो जाती है; और बुद्धिके सम हो जानेसे परमात्माकी प्राप्तिका स्वतः अनुभव हो जाता है (गीता—पाँचवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक); क्योंकि परमात्मा तो सदा प्राप्त ही हैं। विषयोंमें प्रवृत्ति होनेके कारण ही उनकी प्राप्तिका अनुभव नहीं हो पाता।
सुखभोग और संग्रह—इन दोनों जो आसक्त हो जाते हैं, उनके लिये परमात्मप्राप्ति तो दूर रही, वे परमात्माकी
परिशिष्ट भाव —विषयोंका सेवन करनेसे स्वयंकी गौणता हो जाती है और शरीर-संसारकी मुख्यता हो जाती है। इसलिये स्वयं भी जगतरूप हो जाता है (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—पीछेके तीन श्लोकोंमें जीवात्माके स्वरूपका वर्णन किया गया है। उस विषयका उपसंहार करनेके लिये आगेके श्लोकमें ‘जीवात्माके स्वरूपको कौन जानता है और कौन नहीं जानता’—इसका वर्णन करते हैं।
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥
| उत्क्रामन्तम् | = शरीरको छोड़कर जाते हुए | भुञ्जानम् | = विषयोंको भोगते हुए | न | = नहीं |
|---|---|---|---|---|---|
| वा | = या | अपि | = भी | अनुपश्यन्ति | = जानते, |
| स्थितम् | = दूसरे शरीरमें स्थित हुए | गुणान्वितम् | = गुणोंसे युक्त (जीवात्मा-के स्वरूप)-को | ज्ञानचक्षुषः | = ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले (ज्ञानी मनुष्य ही) |
| वा | = अथवा | विमूढाः | = मूढ़ मनुष्य | पश्यन्ति | = जानते हैं। |
व्याख्या—‘उत्क्रामन्तम्’ —स्थूलशरीरको छोड़ते समय जीव सूक्ष्म और कारणशरीरको साथ लेकर प्रस्थान करता है। इसी क्रियाको यहाँ ‘उत्क्रामन्तम्’ पदसे कहा है। जबतक हृदयमें धड़कन रहती है, तबतक जीवका प्रस्थान नहीं माना जाता। हृदयकी धड़कन बंद हो जानेके बाद भी जीव कुछ समयतक रह सकता है। वास्तवमें अचल
तरफ चलनेका दृढ़ निश्चय भी नहीं कर पाते (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)।
गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी महाराज श्रीरामचरितमानसके अन्तमें प्रार्थना करते हैं—
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतरं प्रिय लागहु मोहि राम॥
(मानस ७। १३०)
‘जैसे कामीको स्त्री (भोग) और लोभीको धन (संग्रह) प्यारा लगता है, ऐसे ही रघुनाथका रूप और राम-नाम मुझे निरन्तर प्यारा लगे।’ तात्पर्य यह है कि जैसे कामी स्त्रीके रूपमें आकृष्ट होता है, ऐसे ही मैं रघुनाथके रूपमें निरन्तर आकृष्ट रहूँ और जैसे लोभी धनका संग्रह करता रहता है, ऐसे ही मैं राम-नामका (जपके द्वारा) निरन्तर संग्रह करता रहूँ। संसारका भोग और संग्रह निरन्तर प्रिय नहीं लगता—यह नियम है; पर भगवान्का रूप और नाम निरन्तर प्रिय लगता है। संतोनें भी अपना अनुभव कहा है—
चाख चाख सब छाड़िया माया-रस खारा हो।
नाम-सुधारस पीजिये छिन्न बारंबारा हो॥
लगे मोहि राम पियारा हो॥
होनेसे शुद्ध चेतन-तत्त्वका आवागमन नहीं होता। प्राणोंका ही आवागमन होता है। परन्तु सूक्ष्म और कारणशरीरसे सम्बन्ध रहनेके कारण जीवका आवागमन कहा जाता है।
आठवें श्लोकमें ईश्वर बने जीवात्माके विषयमें आये ‘उत्क्रामति’ पदको यहाँ ‘उत्क्रामन्तम्’ पदसे कहा गया है।
‘स्थितं वा’—जिस प्रकार कैमरेपर वस्तुका जैसा
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसका वैसा ही चित्र अंकित हो जाता है। इसी प्रकार मृत्युके समय अन्तःकरणमें जिस भावका चिन्तन होता है, उसी आकारका सूक्ष्मशरीर बन जाता है। जैसे कैमरेपर पड़े प्रतिबिम्बके अनुसार चित्रके तैयार होनेमें समय लगता है, ऐसे ही अन्तकालीन चिन्तनके अनुसार भावी स्थूलशरीरके बननेमें (शरीरके अनुसार कम या अधिक) समय लगता है।
आठवें श्लोकमें जिसका ‘यदवाप्नोति ’ पदसे वर्णन हुआ है, उसीको यहाँ ‘स्थितम् ’ पदसे कहा गया है।
‘अपि भुञ्जानं वा ’—मनुष्य जब विषयोंको भोगता है, तब अपनेको बड़ा सावधान मानता है और विषय-सेवनमें सावधान रहता भी है। विषयी मनुष्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इनमेंसे एक-एक विषयको अच्छी तरह जानता है। अपनी जानकारीसे एक-एक विषयको भी बड़ी स्पष्टतासे वर्णन करता है। इतनी सावधानी रखनेपर भी वह ‘मृदु’ (अज्ञानी) ही है; क्योंकि विषयोंके प्रति यह सावधानी किसी कामकी नहीं है, प्रत्युत मरनेपर नरकों और नीच योनियोंमें ले जानेवाली है।
परमात्मा, जीवात्मा और संसार—इन तीनोंके विषयमें शास्त्रों और दार्शनिकोंके अनेक मतभेद हैं; परन्तु जीवात्मा संसारके सम्बन्धसे महान् दुःख पाता है और परमात्माके सम्बन्धसे महान् सुख पाता है—इसमें सभी शास्त्र और दार्शनिक एकमत हैं।
संसार एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता—यह अकाट्य नियम है। संसार क्षणभंगुर है—यह बात कहते, सुनते और पढ़ते हुए भी मृदु मनुष्य संसारको स्थिर मानते हैं। भोग-सामग्री, भोक्ता और भोगरूप क्रिया—इन सबको स्थायी माने बिना भोग हो ही नहीं सकता। भोगी मनुष्यकी बुद्धि इतनी मृदु हो जाती है कि वह ‘इन भोगोंसे बढ़कर कुछ है ही नहीं’—ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेता है (गीता—सोलहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। इसलिये ऐसे मनुष्योंके ज्ञाननेत्र बंद ही रहते हैं। वे मौतको निश्चित जानते हुए भी भोग भोगनेके लिये (मरनेवालोंके लोकमें रहते हुए भी) सदा जीते रहनेकी इच्छा रखते हैं।
‘अपि ’ पदका भाव है कि जीवात्मा जिस समय स्थूल-शरीरसे निकलकर (सूक्ष्म और कारणशरीरसहित) जाता है, दूसरे शरीरको प्राप्त होता है तथा विषयोंका उपभोग करता है—इन तीनों ही अवस्थाओंमें गुणोंसे लिप्त दीखनेपर भी वास्तवमें वह स्वयं निलिप्त ही रहता है। वास्तविक स्वरूपमें न ‘उत्क्रमण’ है, न ‘स्थिति’ है और
न ‘भोक्तापन’ ही है।
पिछले श्लोकके ‘विषयानुपसेवते ’ पदको ही यहाँ ‘भुञ्जानम् ’ पदसे कहा गया है।
‘गुणान्वितम् ’—यहाँ ‘गुणान्वितम् ’ पदका तात्पर्य यह है कि गुणोंसे सम्बन्ध मानते रहनेके कारण ही जीवात्मामें उत्क्रमण, स्थिति और भोग—ये तीनों क्रियाएँ प्रतीत होती हैं।
वास्तवमें आत्माका गुणोंसे सम्बन्ध है ही नहीं। भूलसे ही इसने अपना सम्बन्ध गुणोंसे मान रखा है, जिसके कारण इसे बारम्बार ऊँच-नीच योनियोंमें जाना पड़ता है। गुणोंसे सम्बन्ध जोड़कर जीवात्मा संसारसे सुख चाहता है—यह उसकी भूल है। सुख लेनेके लिये शरीर भी अपना नहीं है, फिर अन्यकी तो बात ही क्या है!
मनुष्य मानो किसी-न-किसी प्रकारसे संसारमें ही फँसना चाहता है! व्याख्यान देनेवाला व्यक्ति श्रोताओंको अपना मानने लग जाता है। किसीका भाई-बहन न हो, तो वह धर्मका भाई-बहन बना लेता है। किसीका पुत्र न हो, तो वह दूसरेका बालक गोद ले लेता है। इस तरह नये-नये सम्बन्ध जोड़कर मनुष्य चाहता तो सुख है, पर पाता दुःख ही है। इसी बातको भगवान् कह रहे हैं कि जीव स्वरूपसे गुणातीत होते हुए भी गुणों—(देश, काल, व्यक्ति, वस्तु—) से सम्बन्ध जोड़कर उनसे बँध जाता है।
इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें आये ‘प्रकृतिस्थानि ’ पदको ही यहाँ ‘गुणान्वितम् ’ पदसे कहा गया है।
मामिक बात
जबतक मनुष्यका प्रकृति अथवा उसके कार्य—गुणोंसे किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध रहता है, तबतक गुणोंके अधीन होकर उसे कर्म करनेके लिये बाध्य होना पड़ता है (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। चेतन होकर गुणोंके अधीन रहना अर्थात् जड़की परतन्त्रता स्वीकार करना व्यभिचार-दोष है। प्रकृति अथवा गुणोंसे सर्वथा मुक्त होनेपर जो स्वाधीनताका अनुभव होता है, उसमें भी साधक जबतक (अहम्की गन्ध रहनेके कारण) रस लेता है, तबतक व्यभिचार-दोष रहता ही है। रस न लेनेसे जब वह व्यभिचार-दोष मिट जाता है, तब अपने प्रेमास्पद भगवान्के प्रति स्वतः प्रियता जाग्रत् होती है। फिर प्रेम-ही-प्रेम रह जाता है, जो उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त होता रहता है। इस प्रेमको प्राप्त करना ही जीवका अन्तिम लक्ष्य है। इस प्रेमकी प्राप्तिमें ही पूर्णता है। भगवान् भी भक्तको अपना अलौकिक प्रेम देकर ही राजी होते हैं और ऐसे प्रेमी
श्लोक १० ]
- साधक-संजीवनी *
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भक्तको योगियोंमें सर्वश्रेष्ठ योगी मानते हैं (गीता—छठे अध्यायका सैतालीसवाँ श्लोक)।
गुणातीत होनेमें तो (स्वयंका विवेक सहायक होनेके कारण) अपने साधनका सम्बन्ध रहता है, पर गुणातीत होनेके बाद प्रेमकी प्राप्ति होनेमें भगवान्की कृपाका ही सम्बन्ध रहता है।
‘विमूढा नानुपश्यन्ति’ —जैसे भिन्न-भिन्न प्रकारके कार्य करनेपर भी हम वही रहते हैं, ऐसे ही गुणोंसे युक्त होकर शरीरको छोड़ते, अन्य शरीरको प्राप्त होते तथा भोग भोगते समय भी ‘स्वयं’ (आत्मा) वही रहता है। तात्पर्य यह है कि परिवर्तन क्रियाओंमें होता है, ‘स्वयं’ में नहीं। परन्तु जो भिन्न-भिन्न क्रियाओंके साथ मिलकर ‘स्वयं’ की भी भिन्न-भिन्न देखने लगता है (तीसरे अध्यायका सताईसवाँ श्लोक), ऐसे अज्ञानी (तत्त्वको न जाननेवाले) मनुष्यके लिये यहाँ ‘विमूढा नानुपश्यन्ति’ पद दिये गये हैं।
मूढ़लोग भोग और संग्रहमें इतने आसक्त रहते हैं कि शरीरादि पदार्थ नित्य रहनेवाले नहीं हैं—यह बात सोचते ही नहीं। भोग भोगनेका क्या परिणाम होगा उस ओर वे देखते ही नहीं। भगवान्ने गीताके सत्रहवें अध्यायमें जहाँ सात्त्विक, राजस और तामस पुरुषोंको प्रिय लगनेवाले आहारोंका वर्णन किया है, वहाँ सात्त्विक आहारके परिणामका वर्णन पहले किया गया है; राजस आहारके परिणामका वर्णन अन्तमें किया गया है और तामस आहारके परिणामका वर्णन ही नहीं किया गया है (गीता—सत्रहवें अध्यायके आठवेंसे दसवें श्लोकतक)। इसका कारण यह है कि सात्त्विक मनुष्य कर्म करनेसे पहले उसके परिणाम-(फल-) पर दृष्टि रखता है; राजस मनुष्य पहले सहसा काम कर बैठता है, फिर परिणाम चाहे जैसा आये; परन्तु तामस मनुष्य तो परिणामकी तरफ दृष्टि ही नहीं डालता। इसी प्रकार यहाँ भी ‘विमूढा नानुपश्यन्ति’ पद
परिशिष्ट भाव —गुणोंके साथ सम्बन्ध माननेसे जीव ‘गुणान्वित’ हो जाता है। अगर सम्बन्ध न माने तो वह निर्गुण (तीनों गुणोंसे रहित) ही है—‘अनादित्वान्निर्गुणत्वात्’ (गीता १३।३१)। इसका आशय यह है कि गुणोंके साथ सम्बन्ध होनेसे ही जन्म-मरण होते हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। यद्यपि अपनी अवनति कोई नहीं चाहता, तथापि सुखासक्तिके कारण जीवको पता ही नहीं लगता कि मेरी उन्नति किसमें है। वह नाशवान् पदार्थोंके द्वारा अपनी उन्नति करना चाहता है, जिसका परिणाम महान् अवनति होता है।
शरीरको छोड़कर जाना, दूसरे शरीरमें स्थित होना और विषयोंको भोगना—तीनों क्रियाएँ अलग-अलग हैं, पर उनमें रहनेवाला जीवात्मा एक ही है—यह बात प्रत्यक्ष होते हुए भी अविवेकी मनुष्य इसको नहीं जानता अर्थात् अपने अनुभवकी तरफ नहीं देखता, उसको महत्त्व नहीं देता। तीनों गुणोंसे मोहित रहनेके कारण बेहोश रहता है (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। जीवात्मा किसी भी अवस्थाके साथ निरन्तर नहीं रहता—यह सबका अनुभव है। इसकी निर्लिप्तता स्वतःसिद्ध है।
देकर भगवान् मानो यह कहते हैं कि मोहग्रस्त मनुष्य तामस ही हैं; क्योंकि मोह तमोगुणका कार्य है। वे विषयोंका सेवन करते समय परिणामपर विचार ही नहीं करते। केवल भोग भोगने और संग्रह करनेमें ही लगे रहते हैं। ऐसे मनुष्योंका ज्ञान तमोगुणसे ढका रहता है। इस कारण वे शरीर और आत्माके भेदको नहीं जान सकते।
‘पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः’ —प्राणी, पदार्थ, घटना, परिस्थिति—कोई भी स्थिर नहीं है अर्थात् दृश्यमात्र निरन्तर अदर्शनमें जा रहा है—ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव होना ही ज्ञानरूप चक्षुओंसे देखना है। परिवर्तनकी ओर दृष्टि होनेसे अपरिवर्तनशील तत्त्वमें स्थिति स्वतः होती है; क्योंकि नित्य परिवर्तनशील पदार्थका अनुभव अपरिवर्तनशील तत्त्वको ही होता है।
यहाँ ऐसा नहीं समझना चाहिये कि ज्ञानी मनुष्यका भी स्थूलशरीरसे निकलकर दूसरे शरीरको प्राप्त होना तथा भोग भोगना होता है। ज्ञानी मनुष्यका स्थूलशरीर तो छूटेगा ही, पर दूसरे शरीरको प्राप्त करना तथा रागबुद्धिसे विषयोंका सेवन करना उसके द्वारा नहीं होते। दूसरे अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि जैसे जीवात्माकी इस देहमें बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, ऐसे ही अन्य शरीरकी प्राप्ति होती है, परन्तु उस विषयमें ज्ञानी मनुष्य मोहित अथवा विकारको प्राप्त नहीं होता। कारण यह है कि वह ज्ञानी मनुष्य ज्ञानरूप नेत्रोंके द्वारा यह देखता है कि जन्म-मृत्यु आदि सब क्रियाएँ या विकार परिवर्तनशील शरीरमें ही हैं, अपरिवर्तनशील स्वरूपमें नहीं। स्वरूप इन विकारोंसे सब समय सर्वथा निर्लिप्त रहता है। शरीरको अपना मानने तथा उससे सुख लेनेकी आशा रखनेसे ही विमूढ़ मनुष्योंको तादात्म्यके कारण ये विकार स्वयंमें होते प्रतीत होते हैं। विमूढ़ मनुष्य आत्माको गुणोंसे युक्त देखते हैं और ज्ञाननेत्रोंवाले मनुष्य आत्माको गुणोंसे रहित—वास्तविक रूपसे देखते हैं।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
भगवान्ने पिछले श्लोकमें पाँच क्रियाएँ बतायी हैं—सुनना, देखना, स्पर्श करना, स्वाद लेना तथा सृंघना और इस श्लोकमें तीन क्रियाएँ बतायी हैं—शरीरको छोड़कर जाना, दूसरे शरीरमें स्थित होना तथा विषयोंको भोगना। इन आठोंमें कोई भी क्रिया निरन्तर नहीं रहती, पर स्वयं निरन्तर रहता है। क्रियाएँ तो आठ हैं, पर इन सबमें स्वयं एक ही रहता है। इसलिये इनके भाव और अभावका, आरम्भ और अन्तका ज्ञान सबको होता है। जिसको आरम्भ और अन्तका ज्ञान होता है, वह स्वयं नित्य होता है।
शरीरका, पदार्थका, हरेक भोगका संयोग और वियोग होता है। अनेक अवस्थाओंमें स्वयं एक रहता है और एक रहते हुए अनेक अवस्थाओंमें जाता है। अगर स्वयं एक न रहता तो सब अवस्थाओंका अलग-अलग अनुभव कौन करता? परन्तु ऐसी बात प्रत्यक्ष होते हुए भी विमूढ़ मनुष्य इस तरफ नहीं देखते, प्रत्युत ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले योगी मनुष्य ही देखते हैं।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित तत्त्वको जो पुरुष यत्न करनेपर जानते हैं, उनमें क्या विशेषता है; और जो यत्न करनेपर भी नहीं जानते, उनमें क्या कमी है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
यतन्तो योगिनश्चैन पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥
| यतन्तः | = यत्न करनेवाले | पश्यन्ति | = अनुभव करते हैं। | अचेतसः | = अविवेकी मनुष्य |
|---|---|---|---|---|---|
| योगिनः | = योगीलोग | च | = परन्तु | यतन्तः | = यत्न करनेपर |
| आत्मनि | = अपने-आपमें | अकृतात्मानः | = जिन्होंने अपना | अपि | = भी |
| अवस्थितम् | = स्थित | अन्तःकरण शुद्ध नहीं | एनम् | = इस तत्त्वका | |
| एनम् | = इस परमात्मतत्त्वका | किया है, (ऐसे) | न, पश्यन्ति | = अनुभव नहीं करते। |
व्याख्या— ‘यतन्तो योगिनश्चैन पश्यन्ति’—यहाँ ‘योगिनः’ पद उन सांख्ययोगी साधकोंका वाचक है, जिनका एकमात्र उद्देश्य परमात्मतत्त्वको प्राप्त करनेका बन चुका है।
यहाँ ‘यतन्तः’ पद साधनपरक है। भीतरकी लगन, जिसे पूर्ण किये बिना चैनसे न रहा जाय, यत्न कहलाती है।
जिन साधकोंका एकमात्र उद्देश्य परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना है, उनमें असंगता, निर्ममता और निष्कामता स्वतः आ जाती है। उद्देश्यकी पूर्तिके लिये अनन्यभावसे जो उत्कण्ठा, तत्परता, व्याकुलता, विरहयुक्त चिन्तन, प्रार्थना एवं विचार साधकके हृदयमें प्रकट होते हैं, उन सबको यहाँ ‘यतन्तः’ पदके अन्तर्गत समझना चाहिये। जिसकी प्राप्तिका उद्देश्य बनाया और जिसकी विमुखताको यत्नके द्वारा दूर किया, उसी तत्त्वका योगिजन अपने-आपमें अनुभव करते हैं। परमात्माके पूर्ण सम्मुख हो जानेके बाद योगीकी परमात्मतत्त्वमें सदा सहज स्थिति रहती है। यही ‘पश्यन्ति’ पदका भाव है।
जो सांख्ययोगी साधक सत्-असत्के विचारद्वारा सत्-तत्त्वकी प्राप्ति और असत् संसारकी निवृत्ति करना चाहते
हैं, विवेककी सर्वथा जागृति होनेपर वे अपने-आपमें स्थित परमात्मतत्त्वका अनुभव कर लेते हैं।
‘आत्मन्यवस्थितम्’ परमात्मतत्त्वसे देश-कालकी दूरी नहीं है। वह समानरूपसे सर्वत्र एवं सदैव विद्यमान है। वही सब भूतोंके हृदयमें स्थित सबका आत्मा है—‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः’ (गीता १०।२०)। इसलिये योगीलोग अपने-आपमें ही इस तत्त्वका अनुभव कर लेते हैं।
सत्ता (अस्तित्व या ‘है’-पन) दो प्रकारकी होती है—(१) विकारी और (२) स्वतःसिद्ध। जो सत्ता उत्पन्न होनेके बाद प्रतीत होती है, वह ‘विकारी’ सत्ता कहलाती है और जो सत्ता कभी उत्पन्न नहीं होती, प्रत्युत सदा (अनादिकालसे) ज्यों-की-त्यों रहती है, वह ‘स्वतःसिद्ध’ सत्ता कहलाती है। इस दृष्टिसे संसार एवं शरीरकी सत्ता ‘विकारी’ और परमात्मा एवं आत्माकी सत्ता ‘स्वतःसिद्ध’ है। विकारी सत्ताको स्वतःसिद्ध सत्तामें मिला देना भूल है।* उत्पन्न हुई विकारी सत्तासे सम्बन्ध-विच्छेद करके अनुत्पन्न स्वतःसिद्ध सत्तामें स्थित होना ही ‘आत्मनि अवस्थितम्’ पदोंका भाव है।
- विकारी सत्ता-(शरीर-) को स्वतःसिद्ध सत्तामें मिलानेका तात्पर्य है—अपनेको शरीर मानना (अहंता) और शरीरको अपना मानना (ममता)। अपनेको शरीर माननेसे शरीर सत्य प्रतीत होता है और शरीरको अपना माननेसे शरीरमें प्रियता होती है।
श्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
१८७
जीव-(चेतन-)ने भगवत्प्रदत्त विवेकका अनादर करके शरीर-(जड-) को 'मैं' और 'मेरा' मान लिया अर्थात् शरीरसे अपना सम्बन्ध मान लिया। जीवके बन्धनका कारण यह माना हुआ सम्बन्ध ही है। यह सम्बन्ध इतना दृढ़ है कि मरनेपर भी छूटता नहीं और कच्चा इतना है कि जब चाहे, तब छोड़ा जा सकता है। किसीसे अपना सम्बन्ध जोड़ने अथवा तोड़नेमें जीव सर्वथा स्वतन्त्र है। इसी स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके जीव शरीरादि विजातीय पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध मान लेता है।
अपने विवेक-(शरीरसे अपनी भिन्नताका ज्ञान-) को महत्त्व न देनेसे विवेक दब जाता है। विवेकके दबनेपर शरीर-(जड-तत्त्व) की प्रधानता हो जाती है और वह सत्य प्रतीत होने लगता है। सत्संग, स्वाध्याय आदिसे जैसे-जैसे विवेक विकसित होता है, वैसे-वैसे शरीरसे माना हुआ सम्बन्ध छूटता चला जाता है। विवेक जाग्रत् होनेपर परमात्मा-(चिन्मय-तत्त्व-) से अपने वास्तविक सम्बन्धका—उसमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। यही 'आत्मनि अवस्थितम्' पदोंका भाव है।
विकारी सत्ता-(संसार-)के सम्बन्धसे अहंता-(‘मैं’-पन) की उत्पत्ति होती है। यह अहंता दो प्रकारसे मानी जाती है—(१) श्रवणसे मानना; जैसे—दूसरोंसे सुनकर 'मैं' अमुक नामवाला हूँ, 'मैं' अमुक वर्णवाला हूँ' आदि अहंता मान लेते हैं (२) क्रियासे मानना; जैसे—व्याख्यान देना, शिक्षा देना, चिकित्सा करना आदि क्रियाओंसे 'मैं' वक्ता हूँ, 'मैं' शिक्षक हूँ, 'मैं' चिकित्सक हूँ' आदि अहंता मान लेते हैं। ये दोनों ही प्रकारकी अहंता सदा रहनेवाली नहीं है, जब कि 'है'-रूप स्वतःसिद्ध सत्ता सदा रहनेवाली है। 'मैं'-रूपमें मानी हुई अहंताका त्याग होनेपर 'हूँ'-रूप विकारी सत्ताका भी स्वतः त्याग हो जाता है और योगीको 'है'-रूप स्वतःसिद्ध सत्तामें अपनी स्थितिका अनुभव हो जाता है। यही अपने-आपमें तत्त्वका अनुभव करना है।
मार्मिक बात
(१)
देश-काल आदिकी अपेक्षासे कहे जानेवाले 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—इन चारोंके मूलमें 'है' के रूपमें एक ही परमात्मतत्त्व समानरूपसे विद्यमान है, जो इन चारोंका प्रकाशक और आधार है। 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—ये चारों निरन्तर परिवर्तनशील हैं और 'है' नित्य
अपरिवर्तनशील है। इनमें 'तू है', 'यह है' और 'वह है'—ऐसा तो कहा जाता है, पर 'मैं है'—ऐसा न कहकर 'मैं हूँ' कहा जाता है। कारण यह है कि 'मैं हूँ' में 'हूँ', 'मैं'-पनके कारण आया है। जबतक 'मैं'-पन है, तभीतक 'हूँ' के रूपमें एकदेशीयता या परिच्छिन्नता है। 'मैं'-पनके मिटनेपर एक 'है' ही शेष रह जाता है।
'आत्मनि अवस्थितम्' का तात्पर्य यह है कि 'हूँ' में 'है' और 'है' में 'हूँ' स्थित है। दूसरे शब्दोंमें व्यष्टिमें समष्टि और समष्टिमें व्यष्टि स्थित है। जिस प्रकार समुद्र और लहरें दोनों एक-दूसरेसे अलग नहीं किये जा सकते, उसी प्रकार 'है' और 'हूँ' दोनों एक-दूसरेसे अलग नहीं किये जा सकते। परन्तु जैसे जल-तत्त्वमें समुद्र और लहरें—ये दोनों ही नहीं हैं (वास्तवमें एक ही जल-तत्त्व है), ऐसे ही परमात्मतत्त्व ('है') में 'हूँ' और 'है'—ये दोनों ही नहीं हैं। ऐसा अनुभव करना ही अपने-आप-(स्वयं-) में स्थित तत्त्वका अनुभव करना है।
'मैं'-पनके कारण (संसारमें सुखासक्ति तथा परमात्मासे विमुखता होनेसे) ही परमात्माका अपने-आपमें अनुभव नहीं होता। इसलिये परमात्माको अपने-आपसे भिन्नमें देखनेके कारण उससे दूरी या वियोगका अनुभव करना पड़ता है और उसकी प्राप्तिके लिये जगह-जगह भटकना पड़ता है। अपने-आपसे भिन्न जितने पदार्थ हैं, उनसे वियोग होना अवश्यम्भावी है। परन्तु अपने-आपमें परमात्माका अनुभव करनेवालेको उससे अपनी दूरी या वियोगका अनुभव नहीं करना पड़ता*।
अपने-आपमें परमात्माको देखना भिन्नता-(द्वैतभाव-) का पोषक नहीं, प्रत्युत भिन्नताका नाशक है। वास्तवमें 'मैं'-पन ही भिन्नताका पोषक है। मनुष्यने भिन्नताके वाचक 'मैं'-पन अथवा परिच्छिन्नता, पराधीनता, अभाव, अज्ञान आदि विकारोंको भूलसे अपने-आपमें ही मान लिया है। इनको दूर करनेके लिये परमात्माको अपने-आपमें देखना है। इन विकारोंका नाश अपने-आपमें परमात्माको देखनेपर ही हो सकता है। ये विकार तभीतक हैं, जबतक साधक 'हूँ' को देखता (मानता) है, 'है' को नहीं। इस 'हूँ' के स्थानपर 'है' को देखनेपर कोई विकार नहीं रहता; क्योंकि 'है' में किंचिन्मात्र भी विकार नहीं है। संसार बदलनेवाला है। संसारका ही अंश होनेके कारण 'मैं' भी बदलनेवाला है, जैसे—'मैं' बालक हूँ, 'मैं' युवा
- तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ (कठ० २।२।१३; श्वेताश्वतर० ६।१२)
'अपने-आपमें स्थित (आत्मस्थ) परमात्माको जो ज्ञानी मनुष्य निरन्तर देखते रहते हैं, उनको ही सदा रहनेवाला सुख प्राप्त होता है, दूसरोंको नहीं।'
१८८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
हूँ, 'मैं बृद्ध हूँ', 'मैं रोगी हूँ', 'मैं नीरोग हूँ' इत्यादि। संसारकी तरह 'मैं' भी उत्पन्न और नष्ट होनेवाला है। जैसे संसार नहीं है, ऐसे ही 'मैं' भी नहीं है।
है सो सुन्दर है सदा, नहीं सो सुन्दर नाहिं।
नहिं सो परगट देखिये, है सो दीखे नाहिं॥
'है' सदा है और 'नहीं' कभी नहीं है। 'है' दीखनेमें नहीं आता, पर 'नहीं' दीखनेमें आता है; क्योंकि जिसके द्वारा हम 'नहीं' को देखते हैं, वे मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि भी 'नहीं' के अंश हैं। त्रिपुटीमें देखना सजातीयतामें ही होता है अर्थात् त्रिपुटीसे होनेवाले (करण-सापेक्ष) ज्ञानमें सजातीयताका होना आवश्यक है। अतः 'नहीं' के द्वारा 'नहीं' को ही देखा जा सकता है, 'है' को नहीं। 'है' का ज्ञान त्रिपुटीसे रहित (करण-निरपेक्ष) है।
'नहीं' की स्वतन्त्र सत्ता न होनेपर भी 'है' की सत्तासे ही उसकी सत्ता दीखती है। 'है' ही 'नहीं' का प्रकाशक और आधार है। जिस प्रकार नेत्रसे संसारको तो देख सकते हैं, पर नेत्रसे नेत्रको नहीं देखते; क्योंकि जिससे देखते हैं, वह नेत्र है। इसी प्रकार जो सबको जाननेवाला है, उस परमात्माको कैसे और किसके द्वारा जाना जा सकता है 'विज्ञातारम्भे केन विजानीयात्।' (बृहदारण्यक० २।४।१४) ? जो 'है' से प्रकाशित होता है, वह ('नहीं') 'है' को कैसे प्रकाशित कर सकता है?
अपने-आपमें स्थित तत्त्व-( 'है'- ) का अनुभव अपने-आप-( 'है'- ) से ही हो सकता है, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि-
('नहीं'- ) से बिलकुल नहीं। अपने-आपसे होनेवाला ज्ञान स्वाधीन और दूसरों-( मन, बुद्धि आदि- ) से होनेवाला ज्ञान पराधीन होता है। अपने-आपमें स्थित तत्त्वका अनुभव करनेके लिये किसी दूसरेकी सहायता लेनेकी जरूरत भी नहीं है।
कानोंसे सुनने, मनसे मनन करने, बुद्धिसे विचार करने आदि उपायोंसे कोई तत्त्वको नहीं जान सकता। कारण कि इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, देश, काल, वस्तु आदि सब प्रकृतिके कार्य हैं। प्रकृतिके कार्यसे उस तत्त्वको कैसे जाना जा सकता है, जो प्रकृतिसे सर्वथा अतीत है? अतः प्रकृतिके कार्यका त्याग (सम्बन्ध-विच्छेद) करनेपर ही तत्त्वकी प्राप्ति होती है और वह अपने-आपमें ही होती है।
साधकसे सबसे बड़ी गलती यह होती है कि वह जिस रीतिसे संसारको जानता है, उसी रीतिसे परमात्माको भी जानना चाहता है। परन्तु संसार और परमात्मा—दोनोंको जाननेकी रीति एक-दूसरेसे विरुद्ध है। संसारको इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिके द्वारा जाना जाता है; क्योंकि उसकी जानकारी करण-सापेक्ष है; परन्तु परमात्माको इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिके द्वारा नहीं जाना जा सकता; क्योंकि उसकी जानकारी करण-निरपेक्ष है।
जड़ताके आश्रयसे चिन्मयतामें स्थितिका अनुभव हो ही नहीं सकता। जड़ता (स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीर)—का आश्रय लेकर जो परमात्मतत्त्वका अनुभव करना चाहते हैं, वे पुरुष समाधि लगाकर भी परमात्मतत्त्वका अनुभव नहीं कर पाते; क्योंकि समाधि भी कारण-शरीरके आश्रित रहती है।
१-यहाँ शंका हो सकती है कि बालक, युवा आदि अवस्थाएँ तो बदल गयीं, पर 'मैं तो वही हूँ' अर्थात् 'मैं' तो नहीं बदला। समाधान यह है कि 'विकारी' सत्ता-(जड़- ) को 'स्वतःसिद्ध' सत्ता-(चेतन- ) में मिला देनेके कारण ही 'मैं' में परिवर्तन नहीं दीखता। वास्तवमें 'मैं' का प्रकाशक ('स्वयं') वही रहता है, 'मैं' वही नहीं रहता। 'मैं बालक हूँ' में जो 'मैं' है, वह 'मैं युवा हूँ' में नहीं है। अवस्थाओंके साथ सूक्ष्मरूपसे 'मैं' भी बदलता है। इसी प्रकार अन्य शरीरकी प्राप्ति (दूसरा जन्म) होनेपर भी पहले शरीरका 'मैं' तो नहीं रहता, पर सत्ता रहती है (गीता—दूसरे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)।
'स्वतःसिद्ध' सत्ताको लेकर 'मैं वही हूँ' कहा जाता है और 'विकारी' सत्ताको लेकर 'मैं बदल गया' कहा जाता है।
२-(१) नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। (कठ० १।२।२३; मुण्डक० ३।२।३)
'यह परमात्मतत्त्व न तो प्रवचनसे, न बुद्धिसे और न बहुत सुननेसे ही प्राप्त हो सकता है।'
(२) नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा। (कठ० २।३।१२)
'यह परमात्मतत्त्व न तो वाणीसे, न मनसे और न नेत्रोंसे ही प्राप्त किया जा सकता है।'
३-स्थूलशरीरसे 'क्रिया', सूक्ष्मशरीरसे 'चिन्तन' तथा कारणशरीरसे 'समाधि' होती है।
कारणशरीर तथा उससे होनेवाली समाधि जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्त अवस्थाकी अपेक्षा विशिष्ट होनेपर भी सूक्ष्मरूपसे निरन्तर क्रियाशील रहती है। इस कारणशरीरसे भी अतीत होनेपर एकमात्र तत्त्व शेष रह जाता है। यही क्रिया और अक्रिया—दोनोंसे अतीत, सदा अखण्ड रहनेवाली 'स्वरूपकी समाधि' है। कारणशरीरसे होनेवाली समाधिमें तो व्युत्थान होता है, पर 'स्वरूपकी समाधि' अर्थात् स्वतःसिद्ध स्वरूपका बोध होनेपर समाधि तथा व्युत्थान दोनों ही नहीं होते। इसको 'निबीज समाधि' भी कहते हैं; क्योंकि इसमें संसारका सम्बन्ध (बीज) सर्वथा नष्ट हो जाता है। इसको 'सहजावस्था' भी कहते हैं। परन्तु वास्तवमें यह अवस्था नहीं है; प्रत्युत अवस्थासे अतीत है। अवस्थातीत कोई अवस्था नहीं होती।
श्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
१८९
जो परमात्माको अपना तथा अपनेको परमात्माका जानते हैं, वे ज्ञानरूप नेत्रोंवाले योगीलोग शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे अपनेको अलग करके अपने-आपमें स्थित परमात्मतत्त्वका अनुभव कर लेते हैं। परन्तु जो शरीरको अपना और अपनेको शरीरका मानते हैं, वे विमूढ़ और अकृतात्मा पुरुष शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिके द्वारा यत्न करनेपर भी अपने-आपमें स्थित परमात्मतत्त्वका अनुभव नहीं कर पाते।
(२)
‘आत्मनि अवस्थितम्’ पदोंमें भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मामें स्थित (सर्वव्यापी) बताया है। इसका अनुभव करनेके लिये साधकको ये चार बातें दृढ़तापूर्वक मान लेनी चाहिये—
- १. परमात्मा यहाँ हैं।
- २. परमात्मा अभी हैं।
- ३. परमात्मा अपनेमें हैं।
- ४. परमात्मा अपने हैं।
परमात्मा सब जगह (सर्वव्यापी) होनेसे यहाँ भी हैं; सब समय (तीनों कालोंमें) होनेसे अभी भी हैं; सबमें होनेसे अपनेमें भी हैं; और सबके होनेसे अपने भी हैं। इस दृष्टिसे परमात्मा यहाँ होनेसे उनको प्राप्त करनेके लिये दूसरी जगह जानेकी आवश्यकता नहीं है; अभी होनेसे उनकी प्राप्तिके लिये भविष्यकी प्रतीक्षा करनेकी आवश्यकता नहीं है; अपनेमें होनेसे उन्हें बाहर दृढ़नेकी आवश्यकता नहीं है; और अपने होनेसे उनके सिवाय किसीको भी अपना माननेकी आवश्यकता नहीं है। अपने होनेसे वे स्वाभाविक ही अत्यन्त प्रिय लगेंगे!
प्रत्येक साधकके लिये उपर्युक्त चारों बातें अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और तत्काल लाभदायक हैं। साधकको ये चारों बातें दृढ़तासे मान लेनी चाहिये। समस्त साधनोंका यह सार साधन है। इसमें किसी योग्यता, अभ्यास, गुण आदिकी भी जरूरत नहीं है। ये बातें स्वतःसिद्ध और वास्तविक हैं, इसलिये इसको माननेके लिये सभी योग्य हैं, सभी पात्र हैं, सभी समर्थ हैं। शर्त यही है कि वे एकमात्र परमात्माको ही चाहते हों।
‘यतन्नोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः’ —जिन्होंने अपना अन्तःकरण शुद्ध नहीं किया है, उन पुरुषोंको यहाँ ‘अकृतात्मानः’ कहा गया है। सत्-असत्के ज्ञान-(विवेक-)को महत्त्व न देनेके कारण ऐसे पुरुषोंको
‘अचेतसः’ कहा गया है।
जिनके अन्तःकरणमें संसारके व्यक्ति, पदार्थ आदिका महत्त्व बना हुआ है और जो शरीरादिको अपना मानते हुए उनसे सुख-भोगकी आशा रखते हैं, ऐसे सभी पुरुष ‘अकृतात्मानः’ और ‘अचेतसः’ हैं। ऐसे पुरुष तत्त्वकी प्राप्ति तो चाहते हैं, पर वे शरीर, मन, बुद्धि आदि जड़ (प्राकृत) पदार्थोंकी सहायतासे चेतन परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहते हैं। परमात्मा जड़ पदार्थोंकी सहायतासे नहीं, प्रत्युत जड़ताके त्याग-(सम्बन्ध-विच्छेद-) से मिलते हैं।
इस श्लोकमें ‘यतन्तः’ पद दो बार आया है। भाव यह है कि यत्न करनेमें समानता होनेपर भी एक (ज्ञानी) पुरुष तो तत्त्वका अनुभव कर लेता है, दूसरा (मूढ़) नहीं कर पाता। इससे यह सिद्ध होता है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिके द्वारा किया गया यत्न तत्त्वप्राप्तिमें सहायक होनेपर भी अन्तःकरण-(जड़ता-)के साथ सम्बन्ध बने रहनेके कारण और अन्तःकरणमें सांसारिक पदार्थोंका महत्त्व रहनेके कारण (यत्न करनेपर भी) तत्त्वको प्राप्त नहीं किया जा सकता। जिनकी दृष्टि असत्-(सांसारिक भोग और संग्रह-) पर ही जमी हुई है, ऐसे पुरुष सत्-(तत्त्व-) को कैसे देख सकते हैं!
अकृतात्मा और अचेतस पुरुष करनेमें तो ध्यान, स्वाध्याय, जप आदि सब कुछ करते हैं, पर अन्तःकरणमें जड़ता-(सांसारिक भोग और संग्रह-) का महत्त्व रहनेके कारण उन्हें तत्त्वका अनुभव नहीं होता। यद्यपि ऐसे पुरुषोंके द्वारा किया गया यत्न भी निष्फल नहीं जाता, तथापि तत्त्वका अनुभव उन्हें वर्तमानमें नहीं होता। वर्तमानमें तत्त्वका अनुभव जड़ताका सर्वथा त्याग होनेपर ही हो सकता है।
जिसका आश्रय लिया जाय, उसका त्याग नहीं हो सकता—यह नियम है। अतः शरीर, मन, बुद्धि आदि जड़ पदार्थोंका आश्रय लेकर साधक जड़ताका त्याग नहीं कर सकता। इसके सिवाय मन, बुद्धि आदि जड़ पदार्थोंको लेकर साधन करनेवालेमें सूक्ष्म अहंकार बना रहता है, जो जड़ताका त्याग होनेपर ही निवृत्त होता है। जड़ताका त्याग करनेका सुगम उपाय है—एकमात्र भगवान्का आश्रय लेना अर्थात् ‘मैं भगवान्का हूँ, भगवान् मेरे हैं’ इस वास्तविकताको स्वीकार कर लेना; इसपर अटल विश्वास कर लेना। इसके लिये यत्न या अभ्यास करनेकी भी जरूरत नहीं है। वास्तविक बातको दृढ़तापूर्वक स्वीकारमात्र कर लेनेकी जरूरत है।
११०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
परिशिष्ट भाव —सदा न भोग साथ रहता है, न संग्रह साथ रहता है—यह विवेक मनुष्यमें स्वतः है। परन्तु जो मनुष्य शास्त्र पढ़ते हुए, सत्संग करते हुए, साधन करते हुए भी अपने विवेककी तरफ ध्यान नहीं देते, भोग और संग्रहसे अलगावका अनुभव नहीं करते, वे मनुष्य 'अकृतात्मा' हैं। ऐसे मनुष्योंको अठारहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें 'अकृतबुद्धि' और 'दुर्मीत' कहा गया है। यद्यपि परमात्मप्राप्ति कठिन नहीं है, तथापि भीतरमें राग, आसक्ति, सुखबुद्धि पड़ी रहनेसे वे साधन करते हुए भी परमात्माको नहीं जानते। कारण कि भोग और संग्रहमें रुचि रखनेवालेका विवेक ठहरता नहीं।
पूर्वश्लोकमें जिनको 'विमूढाः' कहा है, उनको यहाँ 'अचेतसः' कहा है, गुणोंसे मोहित होनेके कारण वे न तो विषयोंके विभागको जानते हैं और न स्वयंके विभागको ही जानते हैं अर्थात् भोगोंका संयोग-वियोग अलग है और स्वयं भी अलग है—यह नहीं जानते।
सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतकके इस प्रकरणमें भगवान् यह बताना चाहते हैं कि मेरा अंश जीवात्मा बिलकुल अलग है और जिस सामग्री (शरीरादि पदार्थ और क्रिया)-को वह भूलसे अपनी मानता है, वह बिलकुल अलग है—'प्रकृतिस्थानि'। सूर्य और अमावास्याकी रात्रिकी तरह दोनोंका विभाग ही अलग-अलग है। उनका परस्पर संयोग होना सम्भव ही नहीं है। जो उपर्युक्त जड़ और चेतन—दोनोंके विभागको सर्वथा अलग-अलग देखता है, वही ज्ञानी और योगी है। परन्तु जो दोनोंको मिला हुआ देखता है, वह अज्ञानी और भोगी है।
सम्बन्ध —पंद्रहवें अध्यायमें पाँच-पाँच श्लोकोंके चार प्रकरण हैं। उनमेंसे यह तीसरा प्रकरण बारहवेंसे पंद्रहवें श्लोकतकका है, जिसमें छठा श्लोक भी लेनेसे पाँच श्लोक पूरे हो जाते हैं। यह तीसरा प्रकरण विशेषरूपसे भगवान्के प्रभाव और महत्त्वको प्रकट करनेवाला है। छठे श्लोकमें जो विषय (परमधामको सूर्य, चन्द्र और अग्नि प्रकाशित नहीं कर सकते) स्पष्ट नहीं हो पाया था, उसीका स्पष्ट विवेचन अब भगवान् आगेके श्लोकमें करते हैं।
यदादित्यगतं तेजो जगद्वासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ ततेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥
| आदित्यगतम् | = सूर्यको | जगत् | = जगत्को | यत् | = जो तेज |
|---|---|---|---|---|---|
| प्राप्त | भासयते | = प्रकाशित करता है | अग्नी | = अग्निमें है, | |
| हुआ | (और) | तत् | = उस | ||
| यत् | = जो | यत् | = जो तेज | तेजः | = तेजको |
| तेजः | = तेज | चन्द्रमसि | = चन्द्रमामें है | मामकम् | = मेरा ही |
| अखिलम् | = सम्पूर्ण | च | = तथा | विद्धि | = जान। |
व्याख्या —[प्रभाव और महत्त्वकी ओर आकर्षित होना जीवका स्वभाव है। प्राकृत पदार्थोंके सम्बन्धसे जीव प्राकृत पदार्थोंके प्रभावसे प्रभावित हो जाता है। कारण यह है कि प्रकृतिमें स्थित होनेके कारण जीवको प्राकृत पदार्थों-(शरीर, स्त्री, पुत्र, धन आदि- ) का महत्त्व दीखने लगता है, भगवान्का नहीं। अतः जीवपर पड़े प्राकृत पदार्थोंका प्रभाव हटानेके लिये भगवान् अपने प्रभावका वर्णन करते हुए यह रहस्य प्रकट करते हैं कि उन प्राकृत पदार्थोंमें जो प्रभाव और महत्त्व देखनेमें आता है, वह वस्तुतः (मूलमें) मेरा ही है, उनका नहीं। सर्वोपरि प्रभावशाली मैं ही हूँ। मेरे ही प्रकाशसे सब प्रकाशित हो रहे हैं।]
'यदादित्यगतं तेजो जगद्वासयतेऽखिलम्'—जैसे भगवान्ने (गीता—दूसरे अध्यायके पचपनवें श्लोकमें)
कामनाओंको 'मनोगतान्' बताया है, ऐसे ही यहाँ तेजको 'आदित्यगतम्' बताते हैं। तात्पर्य यह है कि जैसे मनमें स्थित कामनाएँ मनका धर्म या स्वरूप न होकर आगन्तुक हैं, ऐसे ही सूर्यमें स्थित तेज सूर्यका धर्म या स्वरूप न होकर आगन्तुक है अर्थात् वह तेज सूर्यका अपना न होकर (भगवान्से) आया हुआ है।
सूर्यका तेज (प्रकाश) इतना महान् है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उससे प्रकाशित होता है। ऐसा वह तेज सूर्यका दीखनेपर भी वास्तवमें भगवान्का ही है। इसलिये सूर्य भगवान्को या उनके परमधामको प्रकाशित नहीं कर सकता। मर्हापि पतंजलि कहते हैं—
पूर्वैषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥
(योगदर्शन १। २६)
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
१११
‘ईश्वर सबके पूर्वजोंका भी गुरु है; क्योंकि उसका कालसे अवच्छेद नहीं है।’
सम्पूर्ण भौतिक जगत्में सूर्यके समान प्रत्यक्ष प्रभावशाली पदार्थ कोई नहीं है। चन्द्र, अग्नि, तारे, विद्युत् आदि जितने भी प्रकाशमान पदार्थ हैं, वे सभी सूर्यसे ही प्रकाश पाते हैं। भगवान्से मिले हुए तेजके कारण जब सूर्य इतना विलक्षण और प्रभावशाली है, तब स्वयं भगवान् कितने विलक्षण और प्रभावशाली होंगे! ऐसा विचार करनेपर स्वतः भगवान्को तरफ आकर्षण होता है।
सूर्य ‘नेत्रों’का अधिष्ठातु-देवता है। अतः नेत्रोंमें जो प्रकाश (देखनेकी शक्ति) है वह भी परम्परासे भगवान्से ही आयी हुई समझनी चाहिये।
‘यच्चन्द्रमसि’—जैसे सूर्यमें स्थित प्रकाशिका शक्ति और दाहिका शक्ति—दोनों ही भगवान्से प्राप्त (आगत) हैं, ऐसे ही चन्द्रमाकी प्रकाशिका शक्ति और पोषण शक्ति—दोनों (सूर्यद्वारा प्राप्त होनेपर भी परम्परासे) भगवत्प्रदत्त ही हैं। जैसे भगवान्का तेज ‘आदित्यगत’ है, ऐसे ही उनका तेज ‘चन्द्रगत’ भी समझना चाहिये। चन्द्रमामें प्रकाशके साथ शीतलता, मधुरता, पोषणता आदि जो भी गुण हैं, वह सब भगवान्का ही प्रभाव है।
यहाँ चन्द्रमाको तारे, नक्षत्र आदिका भी उपलक्षण समझना चाहिये।
चन्द्रमा ‘मन’ का अधिष्ठातु-देवता है। अतः मनमें जो प्रकाश (मनन करनेकी शक्ति) है, वह भी परम्परासे भगवान्से ही आयी हुई समझनी चाहिये।
‘यच्चान्नी’—जैसे भगवान्का तेज ‘आदित्यगत’ है, ऐसे ही उनका तेज ‘अग्निगत’ भी समझना चाहिये। तात्पर्य यह है कि अग्निकी प्रकाशिका शक्ति और दाहिका शक्ति—दोनों भगवान्की ही हैं, अग्निकी नहीं।
यहाँ अग्निको विद्युत्, दीपक, जुगन् आदिका भी उपलक्षण समझना चाहिये।
परिशिष्ट भाव —परमात्मा ही सम्पूर्ण शक्तियोंके मूल हैं। इस विषयमें केनोपनिषद्की एक कथा है। एक बार परमात्माने देवताओंके लिये असुरोंपर विजय प्राप्त की। परन्तु इस विजयमें देवताओंने अपनी शक्तिका अभिमान कर लिया। वे समझने लगे हमने ही अपनी शक्तिये असुरोंपर विजय प्राप्त की है। देवताओंके इस अभिमानको नष्ट करनेके लिये परमात्मा यक्षका रूप धारण करके उनके सामने प्रकट हो गये। यक्षको देखकर देवतालोग आश्चर्यचकित होकर विचार करने लगे कि यह यक्ष कौन है? उसका परिचय जाननेके लिये देवताओंने अग्निदेवको उसके पास भेजा। यक्षके पूछनेपर अग्निदेवने कहा कि मैं ‘जातवेदा’ नामसे प्रसिद्ध अग्निदेवता हूँ और मैं चाहूँ तो पृथ्वीमें जो कुछ है, उस सबको जलाकर भस्म कर सकता हूँ। तब यक्षने उसके सामने एक तिनका रख दिया और कहा कि तुम इस तिनकेको जला दो। अग्निदेव अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उस तिनकेको नहीं जला सका। वह लज्जित होकर देवताओंके पास लौट आया और बोला कि वह यक्ष कौन है—यह मैं नहीं जान सका। तब देवताओंने वायुदेवको यक्षके पास भेजा। यक्षके
अग्नि ‘वाणी’का अधिष्ठातु-देवता है। अतः वाणीमें जो प्रकाश (अर्थप्रकाश करनेकी शक्ति) है, वह भी परम्परासे भगवान्से ही आयी हुई समझनी चाहिये।
‘ततेजो विद्विद मामकम्’—जो तेज सूर्य, चन्द्रमा और अग्निमें है और जो तेज इन तीनोंके प्रकाशसे प्रकाशित अन्य पदार्थों (तारे, नक्षत्र, विद्युत्, जुगन् आदि)—में देखने तथा सुननेमें आता है, उसे भगवान्का ही तेज समझना चाहिये।
उपर्युक्त पदोंसे भगवान् यह कह रहे हैं कि मनुष्य जिस-जिस तेजस्वी पदार्थकी तरफ आकर्षित होता है, उस-उस पदार्थमें उसको मेरा ही प्रभाव देखना चाहिये (गीता—दसवें अध्यायका इकतालिसावें श्लोक)। जैसे बूँदीके लड़्डूमें जो मिठास है, वह उसकी अपनी न होकर चीनीकी ही है, ऐसे ही सूर्य, चन्द्रमा और अग्निमें जो तेज है, वह उनका अपना न होकर भगवान्का ही है। भगवान्के प्रकाशसे ही यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है—‘तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’ (कठोपनिषद् २।२।१५)। वह सम्पूर्ण ज्योतियोंकी भी ज्योति है—‘ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः’ (गीता १३।१७)।
सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि क्रमशः नेत्र, मन और वाणीके अधिष्ठाता एवं उनको प्रकाशित करनेवाले हैं। मनुष्य अपने भावोंको प्रकट करने और समझनेके लिये नेत्र, मन (अन्तःकरण) और वाणी—इन तीन इन्द्रियोंका ही उपयोग करता है। ये तीन इन्द्रियाँ जितना प्रकाश करती हैं, उतना प्रकाश अन्य इन्द्रियाँ नहीं करतीं। प्रकाशका तात्पर्य है—अलग-अलग ज्ञान कराना। नेत्र और वाणी बाहरी करण हैं तथा मन भीतरी करण है। करणोंके द्वारा वस्तुका ज्ञान होता है। ये तीनों ही करण (इन्द्रियाँ) भगवान्को प्रकाशित नहीं कर सकते; क्योंकि इनमें जो तेज या प्रकाश है, वह इनका अपना न होकर भगवान्का ही है।
श्री मद्भगवद्गीता
पूछनेपर वायुदेवने कहा कि मैं 'मातरिश्वा' नामसे प्रसिद्ध वायुदेवता हूँ और मैं चाहूँ तो पृथ्वीमें जो कुछ है, उस सबको उड़ा सकता हूँ। तब यक्षने उसके सामने भी एक तिनका रख दिया और कहा कि तुम इस तिनकेको उड़ा दो। वायुदेव अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उस तिनकेको नहीं उड़ा सका। वह लज्जित होकर देवताओंके पास लौट आया और बोला कि मैं उस यक्षको नहीं जान सका। तब देवताओंने इन्द्रको उस यक्षका परिचय जाननेके लिये भेजा। परन्तु इन्द्रके वहाँ पहुँचते ही यक्ष अन्तर्धान हो गया और उस जगह हिमाचलकुमारी उमादेवी प्रकट हो गयीं। इन्द्रके पूछनेपर उमादेवीने कहा कि स्वयं परमात्मा ही तुमलोगोंका अभिमान दूर करनेके लिये यक्षरूपसे प्रकट हुए थे। तात्पर्य यह है कि सृष्टिमें जो भी बलवत्ता, विशेषता, विलक्षणता देखनेमें आती है, वह सब परमात्मासे ही आयी हुई है (गीता- दसवें अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध-दृश्य (दिखनेवाले) पदार्थोंमें अपना प्रभाव बतानेके बाद अब भगवान् आगेके श्लोकमें जिस शक्तिसे समष्टि-जगत्में क्रियाएँ हो रही हैं, उस समष्टि-शक्तिमें अपना प्रभाव प्रकट करते हैं।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा। पुष्पामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक: ॥ १३ ॥
अहम् = मैं, च = ही, गाम् = पृथ्वीमें, आविश्य = प्रविष्ट होकर, ओजसा = अपनी शक्तिसे, भूतानि = समस्त प्राणियोंको, धारयामि = धारण करता हूँ, च = और (मैं ही), रसात्मक: = रसस्वरूप, सोम: = चन्द्रमा, भूत्वा = होकर, सर्वा: = समस्त, औषधी: = ओषधियों (वनस्पतियों)-को, पुष्पामि = पुष्ट करता हूँ।
व्याख्या-'गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा'-भगवान् ही पृथ्वीमें प्रवेश करके उसपर स्थित सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणियोंको धारण करते हैं। तात्पर्य यह है कि पृथ्वीमें जो धारण-शक्ति देखनेमें आती है, वह पृथ्वीकी अपनी न होकर भगवान्की ही हैं। वैज्ञानिक भी इस बातको स्वीकार करते हैं कि पृथ्वीकी अपेक्षा जलका स्तर ऊँचा है और पृथ्वीपर जलका भाग स्थलकी अपेक्षा बहुत अधिक है। ऐसा होनेपर भी पृथ्वी जलमग्न नहीं होती-यह भगवान्की धारण-शक्तिका ही प्रभाव है। पृथ्वीके उपलक्षणसे यह समझना चाहिये कि पृथ्वीके सिवाय जहाँ भी धारण-शक्ति देखनेमें आती है, वह सब भगवान्की ही है। पृथ्वीमें अन्नादि ओषधियोंको उत्पन्न करनेकी (उत्पादिका) शक्ति एवं गुरुत्वाकर्षण-शक्ति भी भगवान्की ही समझनी चाहिये। 'पुष्पामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक:'-चन्द्रमामें दो शक्तियाँ हैं-प्रकाशिका-शक्ति और पोषण-शक्ति। प्रकाशिका शक्तिमें अपने प्रभावका वर्णन
१-(१) द्यौ: सचन्द्रार्कनक्षत्र खं दिशो भूर्महोदधि: । वासुदेवस्य वीर्येण विधुतानि महात्मन: ॥ (महाभारत, अनु० १४९। १३४) 'स्वर्ग, सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रसहित आकाश, दस दिशाएँ, पृथ्वी और महासागर-ये सब भगवान् वासुदेवकी शक्तिसे धारण किये हुए हैं।' (२) पृथिव्यां तिष्ठन् यो यमयति महीं वेद न धरा यमित्यादौ वेदो वदति जगतामीशममलम् । नियन्तारं ध्येयं मुनिसुरनृणां मोक्षदमसौ शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषय: ॥ (शङ्कराचार्यकृत कृष्णाष्टकम्) 'पृथ्वीमें रहकर जो पृथ्वीका नियमन करते हैं, परन्तु पृथ्वी जिनको नहीं जानती; 'य: पृथिव्यां तिष्ठन् पृथ्वीं यमयति यं पृथ्वी न वेद' आदि श्रुतियोंसे वेद जिन अमलस्वरूपको जगत्का स्वामी, नियामक, ध्येय और देवता, मनुष्य तथा मुनिजनोंको मोक्ष देनेवाला बताता है, वे शरणागतवत्सल निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हों।' २-पृथ्वीपर जलका कुल भाग लगभग इकहत्तर प्रतिशत और स्थलका कुल भाग लगभग उनतीस प्रतिशत माना जाता है।
श्लोक १४ ] * साधक-संजीवनी * १९३
पूर्वश्लोकमें करनेके बाद अब भगवान् इस श्लोकमें
चन्द्रमाकी पोषण-शक्तिमें अपना प्रभाव बताते हैं कि
चन्द्रमाके माध्यमसे सम्पूर्ण वनस्पतियोंमें ही पुष्ट
करता हूँ।
है। उपर्युक्त पदोंमें विशेषरूपसे 'सोम:' पद देनेका अभिप्राय
यह है कि चन्द्रमामें प्रकाशके साथ-साथ अमृत-वर्षाकी
शक्ति भी है। वह अमृत पहले चन्द्रलोकसे चन्द्रमण्डलमें
आता है और फिर चन्द्रमण्डलसे भूमण्डलपर आता है।
चन्द्रमा शुक्लपक्षमें पोषक और कृष्णपक्षमें शोषक
होता है। शुक्लपक्षमें रसमय चन्द्रमाकी मधुर किरणोंसे
अमृत-वर्षा होनेके कारण ही लता-वृक्षादि पुष्ट होते हैं
और फलते-फूलते हैं। माताके उदरमें स्थित शिशु भी
शुक्लपक्षमें वृद्धिको प्राप्त होता है।
यहाँ 'औषधी:' पदके अन्तर्गत गेहूँ, चना आदि सब
प्रकारके अन्न समझने चाहिये। चन्द्रमाके द्वारा पुष्ट हुए
अन्नका भोजन करनेसे ही मनुष्य, पशु, पक्षी आदि समस्त
प्राणी पुष्टि प्राप्त करते हैं। ओषधियों, वनस्पतियोंमें
शरीरको पुष्ट करनेकी जो शक्ति है, वह चन्द्रमासे आती
है। चन्द्रमाकी वह पोषण-शक्ति भी उसकी अपनी न
होकर भगवान्की ही है। भगवान् ही चन्द्रमाको निमित्त
बनाकर सबका पोषण करते हैं।
यहाँ 'सोम:' पद चन्द्रलोकका वाचक है, चन्द्रमण्डलका
नहीं। नेत्रोंसे हमें जो दीखता है, वह चन्द्रमण्डल है।
चन्द्रमण्डलसे भी ऊपर (आँखोंसे न दीखनेवाला) चन्द्रलोक
परिशिष्ट भाव - पृथ्वी, चन्द्रमा आदि सब भगवान्की अपरा प्रकृति है (गीता-सातवें अध्यायका चौथा
श्लोक)। अतः इसके धारक, उत्पादक, पालक, संरक्षक, प्रकाशक आदि सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान्की शक्ति
होनेसे अपरा प्रकृति भगवान्से अभिन्न है।
यहाँ 'सोम' शब्द चन्द्रलोकका वाचक है, जो सूर्यसे भी ऊपर हैं।
सम्बन्ध - समष्टि-शक्तिमें अपना प्रभाव बतानेके बाद अब भगवान् जिस शक्तिसे व्यष्टि-जगत्में क्रियाएँ हो रही
हैं, उस व्यष्टि-शक्तिमें अपना प्रभाव बताते हैं।
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥ १४॥
प्राणिनाम् = प्राणियोंके
देहम् = शरीरमें
आश्रितः = रहनेवाला
अहम् = मैं
प्राणापान- = प्राण-अपानसे
समायुक्तः = युक्त
वैश्वानरः = वैश्वानर (जठराग्नि)
भूत्वा = होकर
चतुर्विधम् = चार प्रकारके
अन्नम् = अन्नको
पचामि = पचाता हूँ।
व्याख्या - 'अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देह-
माश्रितः' - बारहवें श्लोकमें अग्निकी प्रकाशन-शक्तिमें
अपने प्रभावका वर्णन करनेके बाद भगवान् इस श्लोकमें
वैश्वानररूप अग्निकी पाचन-शक्तिमें अपने प्रभावका
वर्णन करते हैं। तात्पर्य यह है कि अग्निके दोनों ही
कार्य (प्रकाश करना और पचाना) भगवान्की ही शक्तिसे
होते हैं।
रूपसे उन प्राणियोंके शरीरमें रहते हैं। मनुष्योंकी तरह
लता, वृक्ष आदि स्थावर और पशु, पक्षी आदि जंगम
प्राणियोंमें भी वैश्वानरकी पाचन-शक्ति काम करती है।
लता, वृक्ष आदि जो खाद्य, जल ग्रहण करते हैं, पाचन-
शक्तिके द्वारा उसका पाचन होनेके फलस्वरूप ही उन
लता-वृक्षादिकी वृद्धि होती है।
प्राणियोंके शरीरको पुष्ट करने तथा उनके प्राणोंकी
रक्षा करनेके लिये भगवान् ही वैश्वानर-(जठराग्नि-) के
'प्राणापानसमायुक्तः' - शरीरमें प्राण, अपान, समान,
उदान और व्यान-ये पाँच प्रधान वायु एवं नाग, कूर्म,
कृकर, देवदत्त और धनंजय-ये पाँच उपप्रधान वायु रहती
१-न विदुः सोम ते माया ये च नक्षत्रयोनयः। त्वादित्यपथादूर्ध्वं ज्योतिषां चोपस्थितः॥
(पद्मपुराण, सृष्टि० ४१। १२८)
२-'अयमनिवैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते।' (बृहदारण्यक० ५।९।१)
'जो यह पुरुषके भीतर अग्नि है, यह वैश्वानर है, जिससे यह अन्न जो भक्षण किया जाता है, पचाया जाता है।'
१९४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
है*। इस श्लोकमें भगवान् दो प्रधान वायु—प्राण और अपानका ही वर्णन करते हैं; क्योंकि ये दोनों वायु जटराग्निको प्रदीप्त करती हैं। जटराग्निसे पचे हुए भोजनके सूक्ष्म अंश या रसको शरीरके प्रत्येक अंगमें पहुँचानेका सूक्ष्म कार्य भी मुख्यतः प्राण और अपान वायुका ही है।
‘पचाम्यन्तं चतुर्विधम्’ —प्राणी चार प्रकारके अन्नका भोजन करते हैं—
(१) भोज्य —जो अन्न दाँतोसे चबाकर खाया जाता है; जैसे—रोटी, पुआ आदि।
(२) पेय —जो अन्न निगला जाता है; जैसे खिचड़ी, हलवा, दूध, रस आदि।
(३) चोष्य —दाँतोसे दबाकर जिस खाद्य पदार्थका रस चूसा जाता है और बचे हुए असार भागको थूक दिया जाता है; जैसे—ऊख, आम आदि। वृक्षादि स्थावर योनियों इसी प्रकारसे अन्नको ग्रहण करती हैं।
(४) लेह्य —जो अन्न जिह्वासे चाटा जाता है; जैसे—चटनी, शहद आदि।
अन्नके उपर्युक्त चार प्रकारोंमें भी एक-एकके अनेक भेद हैं। भगवान् कहते हैं कि उन चारों प्रकारके अन्नोंको वैश्वानर-(जटराग्नि-) रूपसे मैं ही पचाता हूँ। अन्नका ऐसा कोई अंश नहीं है, जो मेरी शक्तिके बिना पच सके।
परिशिष्ट भाव —पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करना, चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण वनस्पतियोंका पोषण करना, फिर उनको खानेवाले प्राणियोंके भीतर जटराग्नि होकर खाने हुए अन्नको पचना आदि सम्पूर्ण कार्य भगवान्की ही शक्तिसे होते हैं। परन्तु मनुष्य उन कार्योंको अपने द्वारा किया जानेवाला मानकर मुफ्तमें ही अभिमान कर लेता है—‘अहं करोमीति वृथाभिमानः’; जैसे बैलगाड़ीके नीचे छायामें चलनेवाला कुत्ता समझता है कि बैलगाड़ी मैं ही चलाता हूँ!
सम्बन्ध—पीछेके तीन श्लोकोंमें अपनी प्रभावयुक्त विभूतियोंका वर्णन करके अब उस विषयका उपसंहार करते हुए भगवान् सब प्रकारसे जाननेयोग्य तत्त्व स्वयंको बताते हैं।
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टा मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्देविवेदव चाहम् ॥ १५ ॥
| अहम् | = मैं | ज्ञानम् | = ज्ञान | एव | = ही |
|---|---|---|---|---|---|
| च | = ही | च | = और | वेद्यः | = जाननेयोग्य हूँ। |
| सर्वस्य | = सम्पूर्ण प्राणियोंके | अपोहनम् | = अपोहन ( संशय आदि दोषोंका नाश ) | वेदान्तकृत् | = वेदोंके तत्त्वका निर्णय करनेवाला |
| हृदि | = हृदयमें | होता है। | च | = और | |
| सन्निविष्टः | = स्थित हूँ | सर्वैः | = सम्पूर्ण | वेदवित् | = वेदोंको जाननेवाला |
| च | = तथा | वेदैः | = वेदोंके द्वारा | एव | = भी |
| मत्तः | = मुझसे ( ही ) | अहम् | = मैं | अहम् | = मैं ( ही हूँ )। |
| स्मृतिः | = स्मृति, |
- इन दसों प्राणवायुके भिन्न-भिन्न कार्य इस प्रकार हैं—
( १ ) प्राण—इसका निवास-स्थान हृदय है। इसके कार्य हैं—श्वासको बाहर निकालना, खाने हुए अन्नको पचना इत्यादि।
( २ ) अपान—इसका निवास-स्थान गुदा है। इसके कार्य हैं—श्वासको भीतर ले जाना, मल-मूत्रको बाहर निकालना, गर्भको बाहर निकालना इत्यादि।
( ३ ) समान—इसका निवास-स्थान नाभि है। इसका कार्य है—पचे हुए भोजनके रसको सब अंगोंमें बाँटना।
( ४ ) उदान—इसका निवास-स्थान कण्ठ है। जब भोजन करते हैं, तब उसके गाढ़े भाग और जल-भागको यह अलग-अलग करता है। सूक्ष्मशरीरको स्थूलशरीरसे बाहर निकालना तथा उसे दूसरे शरीर या लोकमें ले जाना भी इसीका कार्य है।
( ५ ) व्यान—इसका निवास-स्थान सम्पूर्ण शरीर है। इसका कार्य है—शरीर तथा उसके अंगोंको सिकोड़ना या फैलाना।
( ६ ) नाग—इसका कार्य है—डकार लेना।
श्लोक १५ ]
- साधक-संजीवनी *
११५
व्याख्या—‘सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः’* —पीछेके श्लोकोंमें अपनी विभूतियोंका वर्णन करनेके बाद अब भगवान् यह रहस्य प्रकट करते हैं कि मैं स्वयं सब प्राणियोंके हृदयमें विद्यमान हूँ। यद्यपि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सभी स्थानोंमें भगवान् विद्यमान हैं, तथापि हृदयमें वे विशेषरूपसे विद्यमान हैं।
हृदय शरीरका प्रधान अंग है। सब प्रकारके भाव हृदयमें ही होते हैं। समस्त कर्मोंमें भाव ही प्रधान होता है। भावकी शुद्धिसे समस्त पदार्थ, क्रिया आदिकी शुद्धि हो जाती है। अतः महत्त्व भावका ही है, वस्तु, व्यक्ति, कर्म आदिका नहीं। वह भाव हृदयमें होनेसे हृदयकी बहुत महत्ता है। हृदय सत्त्वगुणका कार्य है, इसलिये भी भगवान् हृदयमें विशेषरूपसे रहते हैं।
भगवान् कहते हैं कि मैं प्रत्येक मनुष्यके अत्यन्त नजदीक उसके हृदयमें रहता हूँ; अतः किसी भी साधकको (मेरेसे दूरी अथवा वियोगका अनुभव करते हुए भी) मेरी प्राप्तिसे निराश नहीं होना चाहिये। इसलिये पापी-पुण्यात्मा, मूर्ख-पण्डित, निर्धन-धनवान्, रोगी-नौरोग आदि कोई भी स्त्री-पुरुष किसी भी जाति, वर्ण, सम्प्रदाय, आश्रम, देश, काल, परिस्थिति आदिमें क्यों न हो, भगवत्प्राप्तिका वह पूरा अधिकारी है। आवश्यकता केवल भगवत्प्राप्तिकी ऐसी तीव्र अभिलाषा, लगन, व्याकुलताकी है, जिसमें भगवत्प्राप्तिके बिना रहा न जाय।
परमात्मा सर्वव्यापी अर्थात् सब जगह समानरूपसे परिपूर्ण होनेपर भी हृदयमें प्राप्त होते हैं। जैसे गायके सम्पूर्ण शरीरमें दूध व्याप्त होनेपर भी वह उसके स्तनोंसे ही प्राप्त होता है अथवा पृथ्वीमें सर्वत्र जल रहनेपर भी वह कुएँ आदिसे ही प्राप्त होता है, ऐसे ही सूर्य, चन्द्र, अग्नि, पृथ्वी, वैश्वानर आदि सबमें व्याप्त होनेपर भी
परमात्मा ‘हृदय’ में प्राप्त होते हैं। (गीता—तेरहवें अध्यायका सत्रहवाँ और अठारहवें अध्यायका इकसठवाँ श्लोक)।
परमात्मप्राप्ति-सम्बन्धी विशेष बात
हृदयमें निरन्तर स्थित रहनेके कारण परमात्मा वास्तवमें मनुष्यमात्रको प्राप्त है; परन्तु जडता-(संसार-) से माने हुए सम्बन्धके कारण जडताकी तरफ ही दृष्टि रहनेसे नित्यप्राप्त परमात्मा अप्राप्त प्रतीत हो रहे हैं अर्थात् उनकी प्राप्तिका अनुभव नहीं हो रहा है। जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होते ही सर्वत्र विद्यमान (नित्यप्राप्त) परमात्मतत्त्व स्वतः अनुभवमें आ जाता है।
परमात्मप्राप्तिके लिये जो सत्-कर्म, सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन किया जाता है, उसमें जडता-(असत्-)का आश्रय रहता ही है। कारण है कि जडता-(स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीर-) का आश्रय लिये बिना इनका होना सम्भव ही नहीं है। वास्तवमें इनकी सार्थकता जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद करानेमें ही है। जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद तभी होगा, जब ये (सत्-कर्म, सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन) केवल संसारके हितके लिये ही किये जायँ, अपने लिये नहीं।
किसी विशेष साधन, गुण, योग्यता, लक्षण आदिके बदलेमें परमात्मप्राप्ति होगी—यह बिलकुल गलत धारणा है। किसी मूल्यके बदलेमें जो वस्तु प्राप्त होती है, वह उस मूल्यसे कम मूल्यकी ही होती है—यह सिद्धान्त है। अतः यदि किसी विशेष साधन, योग्यता आदिके द्वारा ही परमात्म-प्राप्तिका होना माना जाय, तो परमात्मा उस साधन, योग्यता आदिसे कम मूल्यके (कमजोर) ही सिद्ध होते हैं, जबकि परमात्मा किसीसे कम मूल्यके नहीं हैं (गीता—ग्यारहवें अध्यायका तैंतालीसवाँ श्लोक)। इसलिये वे किसी साधन आदिसे खरीदे नहीं जा सकते। इसके सिवाय अगर किसी
(७) कूर्म—इसका कार्य है—नेत्रोंको खोलना और बंद करना।
(८) कूकर—इसका कार्य है—छँकना।
(९) देवदत्त—इसका कार्य है—जम्हाई लेना।
(१०) धनंजय—यह मृत्युके बाद भी शरीरमें रहता है, जिससे मृतशरीर फूल जाया करता है। वास्तवमें एक ही प्राणवायुके भिन्न-भिन्न कार्योंके अनुसार उपर्युक्त भेद माने गये हैं।
- द्वा सुपुर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्व्यन्मनश्चनन्यो अभिचाकशीति॥
(मुण्डक० ३।१।१; श्वेताश्वतर० ४।६)
‘सदा साथ रहनेवाले तथा परस्पर सख्यभाव रखनेवाले दो पक्षी—जीवात्मा एवं परमात्मा एक ही वृक्ष—शरीरका आश्रय लेकर रहते हैं। उन दोनोंमेंसे एक (जीवात्मा) तो उस वृक्षके कर्मफलोंका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है; किन्तु दूसरा (परमात्मा) उनका उपभोग न करता हुआ केवल देखता रहता है।’
१९६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
मूल्य-(साधन, योग्यता आदि-) के बदलेमें परमात्माकी प्राप्ति मानी जाय, तो उनसे हमें लाभ भी क्या होगा? क्योंकि उनसे अधिक मूल्यकी वस्तु (साधन आदि) तो हमारे पास पहलेसे है ही!
जैसे सांसारिक पदार्थ कर्मोंसे मिलते हैं, ऐसे परमात्माकी प्राप्ति कर्मोंसे नहीं होती; क्योंकि परमात्मप्राप्ति किसी कर्मका फल नहीं है। प्रत्येक कर्मकी उत्पत्ति अहंभावसे होती है और परमात्मप्राप्ति अहंभावके मिटनेपर होती है। कारण कि अहंभाव कृति (कर्म) है और परमात्मा कृतिरहित है। कृतिरहित तत्त्वको किसी कृतिसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है—‘नास्त्यकृतः कृतेन।’ (मुण्डको १।२।१२) तात्पर्य यह हुआ कि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि जड़-पदार्थोंके द्वारा नहीं, प्रत्युत जड़ताके त्यागसे होती है। जबतक मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर, देश, काल, वस्तु आदिका आश्रय है, तबतक एक परमात्माका आश्रय नहीं हो सकता। मन, बुद्धि आदिके आश्रयसे परमात्मप्राप्ति होगी—यही साधककी मूल भूल है। अगर जड़ताका आश्रय और विश्वास छूट जाय तथा एकमात्र परमात्माका ही आश्रय और विश्वास हो जाय, तो परमात्मप्राप्तियें देरी नहीं लग सकती।
‘मनः स्मृतिर्ज्ञानमपोहन् च’—किसी बातकी भूली हुई जानकारीका (किसी कारणसे) पुनः प्राप्त होना ‘स्मृति’ कहलाती है। स्मृति और चिन्तन—दोनोंमें फरक है। नयी बातका ‘चिन्तन’ और पुरानी बातकी ‘स्मृति’ होती है। अतः चिन्तन संसारका और स्मृति परमात्माकी होती है; क्योंकि संसार पहले नहीं था और परमात्मा पहले-(अनादिकाल-) से हैं। स्मृतियें जो शक्ति है, वह चिन्तनमें नहीं है। स्मृतियें कर्तापनका भाव कम रहता है, जबकि चिन्तनमें कर्तापनका भाव अधिक रहता है।
एक स्मृति की जाती है और एक स्मृति होती है। जो स्मृति की जाती है, वह ‘बुद्धि’में और जो होती है, वह ‘स्वयं’में होती है। होनेवाली स्मृति जड़तासे तत्काल सम्बन्ध-विच्छेद करा देती है। भगवान् यहाँ कहते हैं कि यह (होनेवाली) स्मृति मेरेसे ही होती है।
परमात्माका अंश होते हुए भी जीव भूलसे परमात्मासे विमुख हो जाता है और अपना सम्बन्ध संसारसे मानने लगता है। इस भूलका नाश होनेपर ‘मैं भगवान्का ही हूँ, संसारका नहीं’ ऐसा साक्षात् अनुभव हो जाना ही ‘स्मृति’ है (गीता—अठारहवें अध्यायका तिहत्तरवाँ श्लोक)। स्मृतियें कोई नया ज्ञान या अनुभव नहीं होता, प्रत्युत केवल
विस्मृति-(मोह-) का नाश होता है। भगवान्से हमारा वास्तविक सम्बन्ध है। इस वास्तविकताका प्रकट होना ही स्मृतिका प्राप्त होना है।
जीवमें निष्कामभाव (कर्मयोग), स्वरूप-बोध (ज्ञान-योग) और भगवत्प्रेम (भक्तियोग)—तीनों स्वतः विद्यमान हैं। जीवको (अनादिकालसे) इनकी विस्मृति हो गयी है। एक बार इनकी स्मृति हो जानेपर फिर विस्मृति नहीं होती। कारण कि यह स्मृति ‘स्वयं’में जाग्रत् होती है। ‘बुद्धि’में होनेवाली लौकिक स्मृति (बुद्धिके क्षीण होनेपर) नष्ट भी हो सकती है, पर ‘स्वयं’ में होनेवाली स्मृति कभी नष्ट नहीं होती।
किसी विषयकी जानकारीको ‘ज्ञान’ कहते हैं। लौकिक और पारमार्थिक जितना भी ज्ञान है, वह सब ज्ञानस्वरूप परमात्माका आभास-मात्र है। अतः ज्ञानको भगवान् अपनेसे ही होनेवाला बताते हैं। वास्तवमें ज्ञान वही है, जो ‘स्वयं’ से जाना जाय। अनन्त, पूर्ण और नित्य होनेके कारण इस ज्ञानमें कोई सन्देह या भ्रम नहीं होता। यद्यपि इन्द्रिय और बुद्धि-जन्म ज्ञान भी ‘ज्ञान’ कहलाता है, तथापि सीमित, अल्प (अपूर्ण) तथा परिवर्तनशील होनेके कारण इस ज्ञानमें सन्देह या भ्रम रहता है; जैसे-नेत्रोंसे देखनेपर सूर्य अत्यन्त बड़ा होते हुए भी (आकाशमें) छोटा-सा दीखता है इत्यादि। बुद्धिसे जिस बातको पहले ठीक समझते थे, बुद्धिके विकसित अथवा शुद्ध होनेपर वही बात गलत दीखने लग जाती है। तात्पर्य यह है कि इन्द्रिय और बुद्धि-जन्म ज्ञान करण-सापेक्ष और अल्प होता है। अल्प ज्ञान ही ‘अज्ञान’ कहलाता है। इसके विपरीत ‘स्वयं’ का ज्ञान किसी करण-(इन्द्रिय, बुद्धि आदि-) की अपेक्षा नहीं रखता और वह सदा पूर्ण होता है। वास्तवमें इन्द्रिय और बुद्धि-जन्म ज्ञान भी ‘स्वयं’ के ज्ञानसे प्रकाशित होते हैं अर्थात् सत्ता पाते हैं।
संशय, भ्रम, विपर्यय (विपरीत भाव), तर्क-वितर्क आदि दोषोंके दूर होनेका नाम ‘अपोहन’ है। भगवान् कहते हैं कि ये (संशय आदि) दोष भी मेरी कृपासे ही दूर होते हैं।
शास्त्रोंकी बातें सत्य हैं या असत्य? भगवान्को किसने देखा है? संसार ही सत्य है इत्यादि संशय और भ्रम भगवान्की कृपासे ही मिटते हैं। सांसारिक पदार्थोंमें अपना हित दीखना, उनकी प्राप्तिमें सुख दीखना, प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले संसारकी सत्ता दीखना आदि विपरीत भाव भी भगवान्की कृपासे ही दूर होते हैं। गीतोपदेशके अन्तमें
श्लोक १५ ]
- साधक-संजीवनी *
११७
अर्जुन भी भगवान्की कृपासे ही अपने मोहका नाश, स्मृतिकी प्राप्ति और संशयका नाश होना स्वीकार करते हैं (अठारहवें अध्यायका तिहतरवाँ श्लोक)।
‘वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः’ —यहाँ ‘सर्वैः’ पद वेद एवं वेदानुकूल सम्पूर्ण शास्त्रोंका वाचक है। सम्पूर्ण शास्त्रोंका एकमात्र तात्पर्य परमात्माका वास्तविक ज्ञान कराने अथवा उनकी प्राप्ति करानेमें ही है।
यहाँ भगवान् यह बात स्पष्ट करते हैं कि वेदोंका वास्तविक तात्पर्य मेरी प्राप्ति करानेमें ही है, सांसारिक भोगोंकी प्राप्ति करानेमें नहीं। श्रुतियोंमें सकामभावका विशेष वर्णन आनेका यह कारण भी है कि संसारमें सकाम मनुष्योंकी संख्या अधिक रहती है। इसलिये श्रुति (सबकी माता होनेसे) उनका भी पालन करती है।
जाननेयोग्य एकमात्र परमात्मा ही हैं, जिनको जान लेनेपर फिर कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता। परमात्माको जाने बिना संसारको कितना ही क्यों न जान लें, जानकारी कभी पूरी नहीं होती, सदा अधूरी ही रहती है*। अर्जुनमें भगवान्को जाननेकी विशेष जिज्ञासा थी। इसीलिये भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण वेदों और शास्त्रोंके द्वारा जाननेयोग्य मैं स्वयं तुम्हारे सामने बैठा हूँ।
‘वेदान्तकृत’ —भगवान्से ही वेद प्रकट हुए हैं (गीता—तीसरे अध्यायका पन्द्रहवाँ और सत्रहवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। अतः वे ही वेदोंके अन्तिम सिद्धान्तको ठीक-ठीक बताकर वेदोंमें प्रतीत होनेवाले विरोधोंका अच्छी तरह समन्वय कर सकते हैं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि (वेदोंका पूर्ण वास्तविक ज्ञाता होनेके कारण) मैं ही वेदोंके यथार्थ तात्पर्यका निर्णय करनेवाला हूँ।
‘वेदविदेव चाहम्’ —वेदोंके अर्थ, भाव आदिको भगवान् ही यथार्थरूपसे जानते हैं। वेदोंमें कौन-सी बात किस भाव या उद्देश्यसे कही गयी है; वेदोंका यथार्थ तात्पर्य क्या है इत्यादि बातें भगवान् ही पूर्णरूपसे जानते हैं; क्योंकि भगवान्से ही वेद प्रकट हुए हैं।
वेदोंमें भिन्न-भिन्न विषय होनेके कारण अच्छे-अच्छे
विद्वान् भी एक निर्णय नहीं कर पाते (गीता—दूसरे अध्यायका तिरपनवाँ श्लोक)। इसलिये वेदोंके यथार्थ ज्ञाता भगवान्का आश्रय लेनेसे ही वे वेदोंका तत्त्व जान सकते हैं और ‘श्रुतिविप्रतिपत्ति’ से मुक्त हो सकते हैं।
इस (पंद्रहवें) अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने संसारवृक्षको तत्त्वसे जाननेवाले मनुष्यको ‘वेदवित्’ कहा था। अब इस श्लोकमें भगवान् स्वयंको ‘वेदवित्’ कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि संसारके यथार्थ तत्त्वको जान लेनेवाला महापुरुष भगवान्से अभिन्न हो जाता है। संसारके यथार्थ तत्त्वको जाननेका अभिप्राय है—‘संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है और परमात्माकी ही सत्ता है’—इस प्रकार जानते हुए संसारसे माने हुए सम्बन्धको छोड़कर अपना सम्बन्ध भगवान्से जोड़ना, संसारका आश्रय छोड़कर भगवान्के आश्रित हो जाना।
प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात
भगवान्ने श्रीमद्भगवद्गीताके चार अध्यायोंमें भिन्न-भिन्न रूपोंसे अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है—
सातवें अध्यायमें आठवें श्लोकसे बारहवें श्लोकतक सृष्टिके प्रधान-प्रधान पदार्थोंमें कारणरूपसे सत्रह विभूतियोंका वर्णन करके भगवान्ने अपनी सर्वव्यापकता और सर्वरूपता सिद्ध की है।
नवें अध्यायमें सोलहवें श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक क्रिया, भाव, पदार्थ आदिमें कार्य-कारणरूपसे सैतीस विभूतियोंका वर्णन करके भगवान्ने अपनेको सर्वव्यापक बताया है।
दसवें अध्यायका तो नाम ही ‘विभूतियोग’ है। इस अध्यायमें चौथे और पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने प्राणियोंके भावोंके रूपमें बीस विभूतियोंका और छठे श्लोकमें व्यक्तियोंके रूपमें पचीस विभूतियोंका वर्णन किया है। फिर बीसवें श्लोकसे उन्तालीसवें श्लोकतक भगवान्ने बयासी प्रधान विभूतियोंका विशेषरूपसे वर्णन किया है।
इस पन्द्रहवें अध्यायमें बारहवें श्लोकसे पन्द्रहवें श्लोकतक भगवान्ने अपना प्रभाव बतलानेके लिये तेरह
- सांगोपांगानपि यदि यश्च वेदान्धीयते। वेदवेद्यं न जानीते वेदभावहो हि सः ॥
(महाभारत, शान्ति० ३१८।५०)
‘सांगोपांग वेद पङ्कक भी जो वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य परमात्माको नहीं जानता, वह मूढ़ केवल वेदोंका बोझ देनेवाला है।’
१९८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
विभूतियोंका वर्णन किया है।
उपर्युक्त चारों अध्यायोंमें भिन्न-भिन्न रूपमें विभूतियोंका वर्णन करनेका तात्पर्य यह है कि साधकको 'वासुदेवः सर्वम्' (गीता ७।१९) 'सब कुछ वासुदेव ही है' इस तत्त्वका अनुभव हो जाय। इसीलिये अपनी विभूतियोंका वर्णन करते समय भगवान्ने अपनी सर्वव्यापकताको ही विशेषरूपसे सिद्ध किया है; जैसे—
'मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति' (७।७)
'मेरेसे बढ़कर इस जगत्का दूसरा कोई भी महान् कारण नहीं है।'
'सदसच्चाहमर्जुन' (९।१९)
'सत् और असत्—सब कुछ मैं ही हूँ।'
'अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते' (१०।८)
'मैं ही सबकी उत्पत्तिका कारण हूँ और मेरेसे ही सब जगत् चैष्टा करता है।'
'न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्।'
(१०।३९)
'चर और अचर कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है, जो मेरेसे रहित हो अर्थात् चराचर सब प्राणी मेरे ही स्वरूप हैं।'
इसी प्रकार इस पन्द्रहवें अध्यायमें भी अपनी विभूतियोंके वर्णनका उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं—
'सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः' (१५।१५)
'मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हूँ।'
तात्पर्य यह हुआ कि सम्पूर्ण प्राणी, पदार्थ परमात्माकी सत्तासे ही सत्तावान् हो रहे हैं। परमात्मासे अलग किसीकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।
प्रकाशके अभाव-(अन्धकार-)-में कोई वस्तु दिखायी नहीं देती। आँखोंसे किसी वस्तुको देखनेपर पहले प्रकाश दीखता है, उसके बाद वस्तु दीखती है अर्थात् हरेक वस्तु प्रकाशके अन्तर्गत ही दीखती है; किन्तु हमारी दृष्टि प्रकाशपर न जाकर प्रकाशित होनेवाली वस्तुपर जाती है। इसी प्रकार यावन्मात्र वस्तु, क्रिया, भाव आदिका ज्ञान एक विलक्षण और अलुप्त प्रकाश—ज्ञानके अन्तर्गत होता है,
जो सबका प्रकाशक और आधार है। प्रत्येक वस्तुसे पहले ज्ञान (स्वयंप्रकाश परमात्मतत्त्व) रहता है। अतः संसारमें परमात्माको व्याप्त कहनेपर भी वस्तुतः संसार बादमें है और उसका अधिष्ठान परमात्मतत्त्व पहले है अर्थात् पहले परमात्मतत्त्व दीखता है, बादमें संसार। परन्तु संसारमें राग होनेके कारण मनुष्यकी दृष्टि उसके प्रकाशक-(परमात्म-तत्त्व-)-पर नहीं जाती।
परमात्माकी सत्ताके बिना संसारकी कोई सत्ता नहीं है। परन्तु परमात्मसत्ताकी तरफ दृष्टि न रहने तथा सांसारिक प्राणी-पदार्थोंमें राग या सुखासक्ति रहनेके कारण उन प्राणी-पदार्थोंकी पृथक् (स्वतन्त्र) सत्ता प्रतीत होने लगती है और परमात्माकी वास्तविक सत्ता (जो तत्त्वसे है) नहीं दीखती। यदि संसारमें राग या सुखासक्तिका सर्वथा अभाव हो जाय, तो तत्त्वसे एक परमात्मसत्ता ही दीखने या अनुभवमें आने लगती है। अतः विभूतियोंके वर्णनका तात्पर्य यही है कि किसी भी प्राणी-पदार्थकी तरफ दृष्टि जानेपर साधकको एकमात्र भगवान्की स्मृति होनी चाहिये अर्थात् उसे प्रत्येक प्राणी-पदार्थमें भगवान्की ही देखना चाहिये (गीता—दसवें अध्यायका इकतालिसवें श्लोक)।
वर्तमानमें समाजकी दशा बड़ी विचित्र है। प्रायः सब लोगोंके अन्तःकरणमें रुप्योंका बहुत ज्यादा महत्त्व हो गया है। रुपये खुद काममें नहीं आते, प्रत्युत उनसे खरीदी गयी वस्तुएँ ही काममें आती हैं; परन्तु लोगोंने रुप्योंके उपयोगको खास महत्त्व न देकर उनकी संख्याकी वृद्धिको ही ज्यादा महत्त्व दे दिया! इसलिये मनुष्यके पास जितने अधिक रुपये होते हैं, वह समाजमें अपनेको उतना ही अधिक बड़ा मान लेता है। इस प्रकार रुप्योंको ही महत्त्व देनेवाला व्यक्ति परमात्माके महत्त्वको समझ ही नहीं सकता। फिर परमात्मप्राप्तिके बिना रहा न जाय—ऐसी लगन उस मनुष्यके भीतर उत्पन्न हो ही कैसे सकती है? जिसके भीतर यह बात बैठी हुई है कि रुप्योंके बिना रहा ही नहीं जा सकता अथवा रुप्योंके बिना काम ही नहीं चल सकता, उसकी परमात्मामें एक निश्चयवाली बुद्धि हो
१-इस अध्यायमें वर्णित तेरह विभूतियाँ इस प्रकार हैं—
(१) सूर्यमें स्थित तेज, (२) चन्द्रमें स्थित तेज, (३) अग्निमें स्थित तेज, (४) पृथ्वीकी धारण-शक्ति, (५) चन्द्रकी पोषण-शक्ति, (६) वैश्वानर, (७) हृदयस्थित अन्तर्यामी, (८) स्मृति, (९) ज्ञान, (१०) अपोहन, (११) वेदोद्धार जाननेयोग्य, (१२) वेदान्तका कर्ता और (१३) वेदोंको जाननेवाला।
२-वस्तुतः रुप्योंकी संख्याके आधारपर अपनेको छोट या बड़ा मानना पतनका चिह्न है। रुप्योंकी संख्या केवल अभिमान बढ़ानेके सिवाय और कुछ काम नहीं आती। अभिमान आसुरी सम्पत्तिका मूल है। जितने भी दुर्गुण-दुराचार, पाप हैं, सब अभिमानरूपी वृक्षकी छायामें रहते हैं।
श्लोक १६ ]
- साधक-संजीवनी *
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ही नहीं सकती। वह यह बात समझ ही नहीं सकता कि रूपयोंके बिना भी अच्छी तरह काम चल सकता है।
जिस प्रकार व्यापारीको (एकमात्र धनप्राप्तिका उद्देश्य रहनेपर) माल लेने, माल देने आदि व्यापार-सम्बन्धी प्रत्येक क्रियामें धन ही दीखता है, इसी प्रकार परमात्मत्त्वके जिज्ञासुको (एकमात्र परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रहनेपर) प्रत्येक वस्तु, क्रिया आदिमें तत्वरूपसे परमात्मा ही दीखते हैं। उसको ऐसा अनुभव हो जाता है कि परमात्माके सिवाय दूसरा कोई तत्त्व है ही नहीं, हो सकता ही नहीं।
मार्मिक बात
अर्जुनने चौदहवें अध्यायमें गुणातीत होनेका उपाय पूछा था। गुणोंके संगसे ही जीव संसारमें फँसता है। अतः गुणोंका संग मिटानेके लिये भगवान्ने यहाँ अपने प्रभावका वर्णन किया है। छोटे प्रभावको मिटानेके लिये बड़े
परिशिष्ट भाव— इस अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने जो बात कही थी, उसका उपसंहार इस श्लोकमें करते हैं।
पहलेके तीन श्लोकोंमें भगवान्ने प्रभाव और क्रियारूपसे अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है, पर प्रस्तुत श्लोकमें स्वयं अपना वर्णन करते हैं। तात्पर्य है कि इस श्लोकमें स्वयं भगवान्का वर्णन है, आदित्यगत, चन्द्रगत, अग्निगत अथवा वैश्वानरगत भगवान्का वर्णन नहीं। मूलमें एक ही तत्त्व है, केवल वर्णनमें फर्क है।
पहले 'ममैवांशो जीवलोकै' पदोंसे यह सिद्ध हुआ कि भगवान् 'अपने' हैं और यहाँ 'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः' पदोंसे यह सिद्ध होता है कि भगवान् 'अपनेमें' हैं। भगवान्को 'अपना' स्वीकार करनेसे उनमें स्वाभाविक प्रेम होगा और 'अपनेमें' स्वीकार करनेसे उनको पानेके लिये दूसरी जगह जानेकी जरूरत नहीं रहेगी।
'अपोहनम्' पदका अर्थ है—'अपगत ओहनम्' अर्थात् संशयका निवारण। 'वेदान्त' का अर्थ है—वेदोंका अन्त अर्थात् निष्कर्ष, निचोड़—'उभयोरपि दृष्टोऽन्तः' (गीता २।१६)
भगवान् कहते हैं कि वेद अनेक हैं, पर उन सबमें जाननेयोग्य मैं एक ही हूँ और उन सबको जाननेवाला भी मैं ही हूँ। तात्पर्य है कि सब कुछ मैं ही हूँ।
सम्बन्ध— भगवान्ने इसी अध्यायके पहले श्लोकसे पंद्रहवें श्लोकतक (तीन प्रकरणोंमें) क्रमशः संसार, जीवात्मा और परमात्माका विस्तारसे वर्णन किया। अब उस विषयका उपसंहार करते हुए आगेके दो श्लोकोंमें उन तीनोंका क्रमशः क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम नामसे स्पष्ट वर्णन करते हैं।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥
| लोके | = इस संसारमें | द्वौ | = दो प्रकारके | क्षरः | = क्षर |
|---|---|---|---|---|---|
| क्षरः | = क्षर (नाशवान्) | एव | = ही | च | = और |
| च | = और | पुरुषौ | = पुरुष हैं। | कूटस्थः | = जीवात्मा |
| अक्षरः | = अक्षर (अविनाशी)— | सर्वाणि | = सम्पूर्ण | अक्षरः | = अक्षर |
| द्वौ | = ये | भूतानि | = प्राणियोंके शरीर | उच्यते | = कहा जाता है। |
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
व्याख्या—‘द्वारविमी पुरुषो लोके क्षरश्चाक्षर एव च’ —यहाँ ‘लोके’ पदको सम्पूर्ण संसारका वाचक समझना चाहिये। इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें ‘जीवलोकै’ पद भी इसी अर्थमें आया है।
इस जगत्में दो विभाग जाननेमें आते हैं—शरीरादि नाशवान् पदार्थ (जड) और अविनाशी जीवात्मा (चेतन)। जैसे, विचार करनेसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि एक तो प्रत्यक्ष दीखनेवाला शरीर है और एक उसमें रहनेवाला जीवात्मा है। जीवात्माके रहनेसे ही प्राण कार्य करते हैं और शरीरका संचालन होता है। जीवात्माके साथ प्राणोंके निकलते ही शरीरका संचालन बंद हो जाता है और शरीर सड़ने लगता है। लोग उस शरीरको जला देते हैं। कारण कि महत्त्व नाशवान् शरीरका नहीं, प्रत्युत उसमें रहनेवाले अविनाशी जीवात्माका है।
पंचमहाभूतों—(आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी-) से बने हुए शरीरादि जितने पदार्थ हैं, वे सभी जड और नाशवान् हैं। प्राणियोंके (प्रत्यक्ष देखनेमें आनेवाले) स्थूलशरीर स्थूल समष्टि-जगत्के साथ एक हैं; दस इंद्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि—इन सत्रह तत्त्वोंसे युक्त सूक्ष्मशरीर सूक्ष्म समष्टि-जगत्के साथ एक हैं और कारण-शरीर (स्वभाव, कर्मसंस्कार, अज्ञान) कारण समष्टि-जगत्—(मूल प्रकृति-) के साथ एक हैं। ये सब क्षरणशील
(नाशवान्) होनेके कारण ‘क्षर’ नामसे कहे गये हैं।
वास्तवमें ‘व्यष्टि’ नामसे कोई वस्तु है ही नहीं; केवल समष्टि-संसारके थोड़े अंशकी वस्तुको अपनी माननेके कारण उसको व्यष्टि कह देते हैं। संसारके साथ शरीर आदि वस्तुओंकी भिन्नता केवल (राग-ममता आदिके कारण) मानी हुई है, वास्तवमें है नहीं। मात्र पदार्थ और क्रियाएँ प्रकृतिकी ही हैं। इसलिये स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरकी समस्त क्रियाएँ क्रमशः स्थूल, सूक्ष्म और कारण समष्टि-संसारके हितके लिये ही करनी हैं, अपने लिये नहीं।
जिस तत्त्वका कभी विनाश नहीं होता और जो सदा निर्विकार रहता है, उस जीवात्माका वाचक यहाँ ‘अक्षरः’ पद है। प्रकृति जड है और जीवात्मा (चेतन परमात्माका अंश होनेसे) चेतन है।
इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने जिसका छेदन करनेके लिये कहा था, उस संसारको यहाँ ‘क्षरः’ पदसे और सातवें श्लोकमें भगवान्ने जिसको अपना अंश बताया था, उस जीवात्माको यहाँ ‘अक्षरः’ पदसे कहा गया है।
यहाँ आये क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम—ये तीनों ही शब्द गीतामें तीनों लिंगोंमें आये हैं। इससे यह समझना चाहिये कि प्रकृति, जीवात्मा और परमात्मा न तो स्त्री हैं, न पुरुष हैं और न नपुंसक ही हैं। वास्तवमें लिंग भी शब्दकी
१-पदार्थों और क्रियाओंको संसारका मानना ‘कर्मयोग’, प्रकृतिका मानना ‘ज्ञानयोग’ और भगवान्का मानना ‘भक्तियोग’ है। इनको चाहे जिसका मानें, पर ये अपने नहीं हैं—यह तो मानना ही पड़ेगा।
२-गीतामें क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम—इन तीनोंका एक साथ वर्णन भिन्न-भिन्न नामोंसे इस प्रकार हुआ है।
| अध्याय-श्लोक | क्षर | अक्षर | पुरुषोत्तम |
|---|---|---|---|
| ७।४—६ | अपरा प्रकृति | परा प्रकृति | अहम् |
| ८।३-४ | अधिभूतः कर्म | अध्यात्मः अधिदैव | ब्रह्मः, अधियज्ञ |
| १३।१-२ | क्षेत्र | क्षेत्रज्ञ | माम् |
| १४।३-४ | महद्ब्रह्मः, योनि | गर्भः, बीज | अहम्, पिता |
३-गीतामें क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तमका वर्णन तीनों लिंगोंमें मिलता है। उदाहरणार्थ—
(१) क्षर—क्षरः (१५।१६)—पुँल्लिंग अपरा (७।५)—स्त्रीलिंग महद्ब्रह्म (१४।३-४)—नपुंसकलिंग
(२) अक्षर—जीवभूतः (१५।७)—पुँल्लिंग जीवभूताम् (७।५)—स्त्रीलिंग अध्यात्मम् (८।३)—नपुंसकलिंग
(३) पुरुषोत्तम—भर्ता (१।१८)—पुँल्लिंग गतिः (१।१८)—स्त्रीलिंग शरणम् (१।१८)—नपुंसकलिंग