श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 988, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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जीव-(चेतन-)ने भगवत्प्रदत्त विवेकका अनादर करके शरीर-(जड-) को 'मैं' और 'मेरा' मान लिया अर्थात् शरीरसे अपना सम्बन्ध मान लिया। जीवके बन्धनका कारण यह माना हुआ सम्बन्ध ही है। यह सम्बन्ध इतना दृढ़ है कि मरनेपर भी छूटता नहीं और कच्चा इतना है कि जब चाहे, तब छोड़ा जा सकता है। किसीसे अपना सम्बन्ध जोड़ने अथवा तोड़नेमें जीव सर्वथा स्वतन्त्र है। इसी स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके जीव शरीरादि विजातीय पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध मान लेता है।
अपने विवेक-(शरीरसे अपनी भिन्नताका ज्ञान-) को महत्त्व न देनेसे विवेक दब जाता है। विवेकके दबनेपर शरीर-(जड-तत्त्व) की प्रधानता हो जाती है और वह सत्य प्रतीत होने लगता है। सत्संग, स्वाध्याय आदिसे जैसे-जैसे विवेक विकसित होता है, वैसे-वैसे शरीरसे माना हुआ सम्बन्ध छूटता चला जाता है। विवेक जाग्रत् होनेपर परमात्मा-(चिन्मय-तत्त्व-) से अपने वास्तविक सम्बन्धका—उसमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। यही 'आत्मनि अवस्थितम्' पदोंका भाव है।
विकारी सत्ता-(संसार-)के सम्बन्धसे अहंता-(‘मैं’-पन) की उत्पत्ति होती है। यह अहंता दो प्रकारसे मानी जाती है—(१) श्रवणसे मानना; जैसे—दूसरोंसे सुनकर 'मैं' अमुक नामवाला हूँ, 'मैं' अमुक वर्णवाला हूँ' आदि अहंता मान लेते हैं (२) क्रियासे मानना; जैसे—व्याख्यान देना, शिक्षा देना, चिकित्सा करना आदि क्रियाओंसे 'मैं' वक्ता हूँ, 'मैं' शिक्षक हूँ, 'मैं' चिकित्सक हूँ' आदि अहंता मान लेते हैं। ये दोनों ही प्रकारकी अहंता सदा रहनेवाली नहीं है, जब कि 'है'-रूप स्वतःसिद्ध सत्ता सदा रहनेवाली है। 'मैं'-रूपमें मानी हुई अहंताका त्याग होनेपर 'हूँ'-रूप विकारी सत्ताका भी स्वतः त्याग हो जाता है और योगीको 'है'-रूप स्वतःसिद्ध सत्तामें अपनी स्थितिका अनुभव हो जाता है। यही अपने-आपमें तत्त्वका अनुभव करना है।
मार्मिक बात
(१)
देश-काल आदिकी अपेक्षासे कहे जानेवाले 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—इन चारोंके मूलमें 'है' के रूपमें एक ही परमात्मतत्त्व समानरूपसे विद्यमान है, जो इन चारोंका प्रकाशक और आधार है। 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—ये चारों निरन्तर परिवर्तनशील हैं और 'है' नित्य
अपरिवर्तनशील है। इनमें 'तू है', 'यह है' और 'वह है'—ऐसा तो कहा जाता है, पर 'मैं है'—ऐसा न कहकर 'मैं हूँ' कहा जाता है। कारण यह है कि 'मैं हूँ' में 'हूँ', 'मैं'-पनके कारण आया है। जबतक 'मैं'-पन है, तभीतक 'हूँ' के रूपमें एकदेशीयता या परिच्छिन्नता है। 'मैं'-पनके मिटनेपर एक 'है' ही शेष रह जाता है।
'आत्मनि अवस्थितम्' का तात्पर्य यह है कि 'हूँ' में 'है' और 'है' में 'हूँ' स्थित है। दूसरे शब्दोंमें व्यष्टिमें समष्टि और समष्टिमें व्यष्टि स्थित है। जिस प्रकार समुद्र और लहरें दोनों एक-दूसरेसे अलग नहीं किये जा सकते, उसी प्रकार 'है' और 'हूँ' दोनों एक-दूसरेसे अलग नहीं किये जा सकते। परन्तु जैसे जल-तत्त्वमें समुद्र और लहरें—ये दोनों ही नहीं हैं (वास्तवमें एक ही जल-तत्त्व है), ऐसे ही परमात्मतत्त्व ('है') में 'हूँ' और 'है'—ये दोनों ही नहीं हैं। ऐसा अनुभव करना ही अपने-आप-(स्वयं-) में स्थित तत्त्वका अनुभव करना है।
'मैं'-पनके कारण (संसारमें सुखासक्ति तथा परमात्मासे विमुखता होनेसे) ही परमात्माका अपने-आपमें अनुभव नहीं होता। इसलिये परमात्माको अपने-आपसे भिन्नमें देखनेके कारण उससे दूरी या वियोगका अनुभव करना पड़ता है और उसकी प्राप्तिके लिये जगह-जगह भटकना पड़ता है। अपने-आपसे भिन्न जितने पदार्थ हैं, उनसे वियोग होना अवश्यम्भावी है। परन्तु अपने-आपमें परमात्माका अनुभव करनेवालेको उससे अपनी दूरी या वियोगका अनुभव नहीं करना पड़ता*।
अपने-आपमें परमात्माको देखना भिन्नता-(द्वैतभाव-) का पोषक नहीं, प्रत्युत भिन्नताका नाशक है। वास्तवमें 'मैं'-पन ही भिन्नताका पोषक है। मनुष्यने भिन्नताके वाचक 'मैं'-पन अथवा परिच्छिन्नता, पराधीनता, अभाव, अज्ञान आदि विकारोंको भूलसे अपने-आपमें ही मान लिया है। इनको दूर करनेके लिये परमात्माको अपने-आपमें देखना है। इन विकारोंका नाश अपने-आपमें परमात्माको देखनेपर ही हो सकता है। ये विकार तभीतक हैं, जबतक साधक 'हूँ' को देखता (मानता) है, 'है' को नहीं। इस 'हूँ' के स्थानपर 'है' को देखनेपर कोई विकार नहीं रहता; क्योंकि 'है' में किंचिन्मात्र भी विकार नहीं है। संसार बदलनेवाला है। संसारका ही अंश होनेके कारण 'मैं' भी बदलनेवाला है, जैसे—'मैं' बालक हूँ, 'मैं' युवा
- तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ (कठ० २।२।१३; श्वेताश्वतर० ६।१२)
'अपने-आपमें स्थित (आत्मस्थ) परमात्माको जो ज्ञानी मनुष्य निरन्तर देखते रहते हैं, उनको ही सदा रहनेवाला सुख प्राप्त होता है, दूसरोंको नहीं।'