श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 987, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
भगवान्ने पिछले श्लोकमें पाँच क्रियाएँ बतायी हैं—सुनना, देखना, स्पर्श करना, स्वाद लेना तथा सृंघना और इस श्लोकमें तीन क्रियाएँ बतायी हैं—शरीरको छोड़कर जाना, दूसरे शरीरमें स्थित होना तथा विषयोंको भोगना। इन आठोंमें कोई भी क्रिया निरन्तर नहीं रहती, पर स्वयं निरन्तर रहता है। क्रियाएँ तो आठ हैं, पर इन सबमें स्वयं एक ही रहता है। इसलिये इनके भाव और अभावका, आरम्भ और अन्तका ज्ञान सबको होता है। जिसको आरम्भ और अन्तका ज्ञान होता है, वह स्वयं नित्य होता है।
शरीरका, पदार्थका, हरेक भोगका संयोग और वियोग होता है। अनेक अवस्थाओंमें स्वयं एक रहता है और एक रहते हुए अनेक अवस्थाओंमें जाता है। अगर स्वयं एक न रहता तो सब अवस्थाओंका अलग-अलग अनुभव कौन करता? परन्तु ऐसी बात प्रत्यक्ष होते हुए भी विमूढ़ मनुष्य इस तरफ नहीं देखते, प्रत्युत ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले योगी मनुष्य ही देखते हैं।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित तत्त्वको जो पुरुष यत्न करनेपर जानते हैं, उनमें क्या विशेषता है; और जो यत्न करनेपर भी नहीं जानते, उनमें क्या कमी है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
यतन्तो योगिनश्चैन पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥
| यतन्तः | = यत्न करनेवाले | पश्यन्ति | = अनुभव करते हैं। | अचेतसः | = अविवेकी मनुष्य |
|---|---|---|---|---|---|
| योगिनः | = योगीलोग | च | = परन्तु | यतन्तः | = यत्न करनेपर |
| आत्मनि | = अपने-आपमें | अकृतात्मानः | = जिन्होंने अपना | अपि | = भी |
| अवस्थितम् | = स्थित | अन्तःकरण शुद्ध नहीं | एनम् | = इस तत्त्वका | |
| एनम् | = इस परमात्मतत्त्वका | किया है, (ऐसे) | न, पश्यन्ति | = अनुभव नहीं करते। |
व्याख्या— ‘यतन्तो योगिनश्चैन पश्यन्ति’—यहाँ ‘योगिनः’ पद उन सांख्ययोगी साधकोंका वाचक है, जिनका एकमात्र उद्देश्य परमात्मतत्त्वको प्राप्त करनेका बन चुका है।
यहाँ ‘यतन्तः’ पद साधनपरक है। भीतरकी लगन, जिसे पूर्ण किये बिना चैनसे न रहा जाय, यत्न कहलाती है।
जिन साधकोंका एकमात्र उद्देश्य परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना है, उनमें असंगता, निर्ममता और निष्कामता स्वतः आ जाती है। उद्देश्यकी पूर्तिके लिये अनन्यभावसे जो उत्कण्ठा, तत्परता, व्याकुलता, विरहयुक्त चिन्तन, प्रार्थना एवं विचार साधकके हृदयमें प्रकट होते हैं, उन सबको यहाँ ‘यतन्तः’ पदके अन्तर्गत समझना चाहिये। जिसकी प्राप्तिका उद्देश्य बनाया और जिसकी विमुखताको यत्नके द्वारा दूर किया, उसी तत्त्वका योगिजन अपने-आपमें अनुभव करते हैं। परमात्माके पूर्ण सम्मुख हो जानेके बाद योगीकी परमात्मतत्त्वमें सदा सहज स्थिति रहती है। यही ‘पश्यन्ति’ पदका भाव है।
जो सांख्ययोगी साधक सत्-असत्के विचारद्वारा सत्-तत्त्वकी प्राप्ति और असत् संसारकी निवृत्ति करना चाहते
हैं, विवेककी सर्वथा जागृति होनेपर वे अपने-आपमें स्थित परमात्मतत्त्वका अनुभव कर लेते हैं।
‘आत्मन्यवस्थितम्’ परमात्मतत्त्वसे देश-कालकी दूरी नहीं है। वह समानरूपसे सर्वत्र एवं सदैव विद्यमान है। वही सब भूतोंके हृदयमें स्थित सबका आत्मा है—‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः’ (गीता १०।२०)। इसलिये योगीलोग अपने-आपमें ही इस तत्त्वका अनुभव कर लेते हैं।
सत्ता (अस्तित्व या ‘है’-पन) दो प्रकारकी होती है—(१) विकारी और (२) स्वतःसिद्ध। जो सत्ता उत्पन्न होनेके बाद प्रतीत होती है, वह ‘विकारी’ सत्ता कहलाती है और जो सत्ता कभी उत्पन्न नहीं होती, प्रत्युत सदा (अनादिकालसे) ज्यों-की-त्यों रहती है, वह ‘स्वतःसिद्ध’ सत्ता कहलाती है। इस दृष्टिसे संसार एवं शरीरकी सत्ता ‘विकारी’ और परमात्मा एवं आत्माकी सत्ता ‘स्वतःसिद्ध’ है। विकारी सत्ताको स्वतःसिद्ध सत्तामें मिला देना भूल है।* उत्पन्न हुई विकारी सत्तासे सम्बन्ध-विच्छेद करके अनुत्पन्न स्वतःसिद्ध सत्तामें स्थित होना ही ‘आत्मनि अवस्थितम्’ पदोंका भाव है।
- विकारी सत्ता-(शरीर-) को स्वतःसिद्ध सत्तामें मिलानेका तात्पर्य है—अपनेको शरीर मानना (अहंता) और शरीरको अपना मानना (ममता)। अपनेको शरीर माननेसे शरीर सत्य प्रतीत होता है और शरीरको अपना माननेसे शरीरमें प्रियता होती है।