श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 984, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १० ]
- साधक-संजीवनी *
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भी प्यास नहीं मिट सकती। इसी प्रकार जीवको प्यास तो है चिन्मय परमात्माकी, पर वह उस प्यासको मिटाना चाहता है जड़ पदार्थके द्वारा, जिससे तृप्ति होनेकी नहीं। तृप्ति तो दूर रही, ज्यों-ज्यों वह जड़ पदार्थको अपनाता है, त्यों-त्यों उसकी भूख भी बढ़ती ही जाती है। यह उसकी कितनी बड़ी भूल है! साधकको चाहिये कि वह आज ही यह दृढ़ विचार (निश्चय) कर ले कि मेरेको भोगबुद्धिसे विषयोंका सेवन करना ही नहीं है। उसका यह पक्का निर्णय हो जाय कि सम्पूर्ण संसार मिलकर भी मेरेको तृप्त नहीं कर सकता। विषय-सेवन न करनेका दृढ़ विचार होनेसे इन्द्रियाँ निर्विषय हो जाती हैं; और इन्द्रियोंके निर्विषय हो जानेसे मन निर्विकल्प हो जाता है। मनके निर्विकल्प हो जानेसे बुद्धि स्वतः सम हो जाती है; और बुद्धिके सम हो जानेसे परमात्माकी प्राप्तिका स्वतः अनुभव हो जाता है (गीता—पाँचवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक); क्योंकि परमात्मा तो सदा प्राप्त ही हैं। विषयोंमें प्रवृत्ति होनेके कारण ही उनकी प्राप्तिका अनुभव नहीं हो पाता।
सुखभोग और संग्रह—इन दोनों जो आसक्त हो जाते हैं, उनके लिये परमात्मप्राप्ति तो दूर रही, वे परमात्माकी
परिशिष्ट भाव —विषयोंका सेवन करनेसे स्वयंकी गौणता हो जाती है और शरीर-संसारकी मुख्यता हो जाती है। इसलिये स्वयं भी जगतरूप हो जाता है (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—पीछेके तीन श्लोकोंमें जीवात्माके स्वरूपका वर्णन किया गया है। उस विषयका उपसंहार करनेके लिये आगेके श्लोकमें ‘जीवात्माके स्वरूपको कौन जानता है और कौन नहीं जानता’—इसका वर्णन करते हैं।
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥
| उत्क्रामन्तम् | = शरीरको छोड़कर जाते हुए | भुञ्जानम् | = विषयोंको भोगते हुए | न | = नहीं |
|---|---|---|---|---|---|
| वा | = या | अपि | = भी | अनुपश्यन्ति | = जानते, |
| स्थितम् | = दूसरे शरीरमें स्थित हुए | गुणान्वितम् | = गुणोंसे युक्त (जीवात्मा-के स्वरूप)-को | ज्ञानचक्षुषः | = ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले (ज्ञानी मनुष्य ही) |
| वा | = अथवा | विमूढाः | = मूढ़ मनुष्य | पश्यन्ति | = जानते हैं। |
व्याख्या—‘उत्क्रामन्तम्’ —स्थूलशरीरको छोड़ते समय जीव सूक्ष्म और कारणशरीरको साथ लेकर प्रस्थान करता है। इसी क्रियाको यहाँ ‘उत्क्रामन्तम्’ पदसे कहा है। जबतक हृदयमें धड़कन रहती है, तबतक जीवका प्रस्थान नहीं माना जाता। हृदयकी धड़कन बंद हो जानेके बाद भी जीव कुछ समयतक रह सकता है। वास्तवमें अचल
तरफ चलनेका दृढ़ निश्चय भी नहीं कर पाते (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)।
गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी महाराज श्रीरामचरितमानसके अन्तमें प्रार्थना करते हैं—
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतरं प्रिय लागहु मोहि राम॥
(मानस ७। १३०)
‘जैसे कामीको स्त्री (भोग) और लोभीको धन (संग्रह) प्यारा लगता है, ऐसे ही रघुनाथका रूप और राम-नाम मुझे निरन्तर प्यारा लगे।’ तात्पर्य यह है कि जैसे कामी स्त्रीके रूपमें आकृष्ट होता है, ऐसे ही मैं रघुनाथके रूपमें निरन्तर आकृष्ट रहूँ और जैसे लोभी धनका संग्रह करता रहता है, ऐसे ही मैं राम-नामका (जपके द्वारा) निरन्तर संग्रह करता रहूँ। संसारका भोग और संग्रह निरन्तर प्रिय नहीं लगता—यह नियम है; पर भगवान्का रूप और नाम निरन्तर प्रिय लगता है। संतोनें भी अपना अनुभव कहा है—
चाख चाख सब छाड़िया माया-रस खारा हो।
नाम-सुधारस पीजिये छिन्न बारंबारा हो॥
लगे मोहि राम पियारा हो॥
होनेसे शुद्ध चेतन-तत्त्वका आवागमन नहीं होता। प्राणोंका ही आवागमन होता है। परन्तु सूक्ष्म और कारणशरीरसे सम्बन्ध रहनेके कारण जीवका आवागमन कहा जाता है।
आठवें श्लोकमें ईश्वर बने जीवात्माके विषयमें आये ‘उत्क्रामति’ पदको यहाँ ‘उत्क्रामन्तम्’ पदसे कहा गया है।
‘स्थितं वा’—जिस प्रकार कैमरेपर वस्तुका जैसा