श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
पाँचों महाभूतोंके मिले हुए सत्त्वगुण-अंशसे मन और बुद्धि, रजोगुण-अंशसे प्राण और तमोगुण-अंशसे शरीर बना है।
‘विषयानुपसेवते’—जैसे व्यापारी किसी कारणवश एक जगहसे दूकान उठाकर दूसरी जगह दूकान लगाता है, ऐसे ही जीवात्मा एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है; और जैसे पहले शरीरमें विषयोंका रागपूर्वक सेवन करता था ऐसे ही दूसरे शरीरमें जानेपर (वही स्वभाव होनेसे) विषयोंका सेवन करने लगता है। इस प्रकार जीवात्मा बार-बार विषयोंमें आसक्ति करनेके कारण ऊँच-नीच योनियोंमें भटकता रहता है।
भगवान्ने यह मनुष्यशरीर अपना उद्धार करनेके लिये दिया है, सुख-दुःख भोगनेके लिये नहीं। जैसे ब्राह्मणको गाय दान करनेपर हम उसको चारा-पानी तो दे सकते हैं, पर दी हुई गायका दूध पीनेका हमें हक नहीं है; ऐसे ही मिले हुए शरीरका सदुपयोग करना हमारा कर्तव्य है, पर इसे अपना मानकर सुख भोगनेका हमें हक नहीं है।
विशेष बात
विषय-सेवन करनेसे परिणाममें विषयोंमें राग-आसक्ति ही बढ़ती है, जो कि पुनर्जन्म तथा सम्पूर्ण दुःखोंका कारण है। विषयोंमें वस्तुतः सुख है भी नहीं। केवल आरम्भमें भ्रमवश सुख प्रतीत होता है (अठारहवें अध्यायका अङ्कीसवॉ श्लोक)। अगर विषयोंमें सुख होता तो जिनके पास प्रचुर भोग-सामग्री है, ऐसे बड़े-बड़े धनी, भोगी और पदाधिकारी तो सुखी हो ही जाते, पर वास्तवमें देखा जाय
तो पता चलता है कि वे भी दुःखी, अशान्त ही हैं। कारण यह है कि भोग-पदार्थोंमें सुख है ही नहीं, हुआ नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं। सुख लेनेकी इच्छासे जो-जो भोग भोगे गये, उन-उन भोगोंसे धैर्य नष्ट हुआ, ध्यान नष्ट हुआ, रोग पैदा हुए, चिन्ता हुई, व्यग्रता हुई, पश्चात्ताप हुआ, बेइज्जती हुई, बल गया, धन गया, शान्ति गयी एवं प्रायः दुःख-शोक-उद्वेग आये—ऐसा यह परिणाम विचारशील व्यक्तिके प्रत्यक्ष देखनेमें आता है।१
जिस प्रकार स्वप्नमें जल पीनेसे प्यास नहीं मिटती, उसी प्रकार भोग-पदार्थोंसे न तो शान्ति मिलती है और न जलन ही मिटती है। मनुष्य सोचता है कि इतना धन हो जाय, इतना संग्रह हो जाय, इतनी (अमुक-अमुक) वस्तुएँ प्राप्त हो जायँ तो शान्ति मिल जायगी; किंतु उतना हो जानेपर भी शान्ति नहीं मिलती, उल्टे वस्तुओंके मिलनेसे उनकी लालसा और बढ़ जाती है२। धन आदि भोग-पदार्थोंके मिलनेपर भी ‘और मिल जाय, और मिल जाय’—यह क्रम चलता ही रहता है। परन्तु संसारमें जितना धन-धान्य है, जितनी सुन्दर स्त्रियाँ हैं, जितनी उत्तम वस्तुएँ हैं, वे सब-की-सब एक साथ किसी एक व्यक्तिको मिल भी जायँ, तो भी उनसे उसे तृप्ति नहीं हो सकती३। इसका कारण यह है कि जीव अविनाशी परमात्माका अंश तथा चेतन है और भोग-पदार्थ नाशवान् प्रकृतिके अंश तथा जड हैं। चेतनकी भूख जड पदार्थोंके द्वारा कैसे मिट सकती है? भूख है पेटमें और हलवा बाँधा जाय पीठपर, तो भूख कैसे मिट सकती है? प्यास लगनेपर बढिया-से-बढिया गरमागरम हलवा खानेपर
१-भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्तास्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः। कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥
(भर्तृहरिवैराग्यशतक)
‘हमने भोगोंको नहीं भोगा, भोगोंने ही हमें भोग लिया; हमने तप नहीं किया, हम ही तप हो गये; काल व्यतीत नहीं हुआ, हम ही व्यतीत हो गये; तृष्णा जीर्ण नहीं हुई, हम ही जीर्ण हो गये।’
२-न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्तैव भूय एवाभिधर्तते॥
(मनु० २।१४; श्रीमद्भा० १।११।१४)
‘भोग-पदार्थोंके उपभोगसे कामना कभी शान्त नहीं होती, प्रत्युत जैसे घीकी आहुति डालनेपर आग और भड़क उठती है, ऐसे ही भोग-वासना भी भोगोंके भोगनेसे प्रबल होती है।’
३-यत् पृथिव्यां ब्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्रियः। एकस्यापि न पर्याप्तं तस्मात्तृष्णां परित्यजेत्॥
(विष्णुपुराण ४।१०।२४; महा०, आदि० ८५।१३)